Category: मध्यप्रदेश

  • दुनिया के देशों जैसा नियंत्रित होगा रियल इस्टेट

    दुनिया के देशों जैसा नियंत्रित होगा रियल इस्टेट

    मंत्रि-परिषद के निर्णय

    भोपाल 25 अप्रैल।

    मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान की अध्यक्षता में आज हुई मंत्रि-परिषद की बैठक में महाप्रबंधक परियोजना एनटीपीसी लिमिटेड खरगोन को 2×600 मेगावॉट विद्युत परियोजना के लिए रेलवे पथ निर्माण के लिए ग्राम खेड़ी तहसील पुनासा जिला खंडवा की कुल 0.532 हेक्टेयर शासकीय भूमि चालू वित्तीय वर्ष की कलेक्टर गाइड लाइन अनुसार निर्धारित कर नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण की शर्तों पर आवंटित करने की अनुमति दी।

    मंत्रि-परिषद ने मध्यप्रदेश रियल एस्टेट विनियामक प्राधिकरण के लिए पदों की संरचना एवं अधिकारी-कर्मचारी के पदों को प्रतिनियुक्ति/संविदा आधार पर भरे जाने, स्वीकृत पदों की संख्या एवं वेतनमान के प्रस्ताव का अनुमोदन किया।

    मंत्रि-परिषद ने कोर्ट मैनेजर एवं सपोर्टिंग स्टाफ के सृजित पदों में से उच्च न्यायालय की स्थापना पर सृजित भृत्य के पद के वेतनमान में ग्रेड पे 1400 के स्थान पर 1300 संशोधित करने का निर्णय लिया।

    मंत्रि-परिषद ने संविदा आधार पर 31 मार्च 2017 तक निरंतर किए गए कोर्ट मैनेजर एवं उनके स्टाफ के पदों में से कार्यरत कोर्ट मैनेजर एवं सपोर्टिंग स्टाफ के पदों को 30 सितंबर 2017 तक अथवा नियमित कोर्ट मैनेजर एवं सर्पोटिंग स्टाफ के पदों पर भर्ती होने तक, जो भी पहले हो, निरंतर किये जाने का अनुसमर्थन किया।

    मंत्रि-परिषद ने अशासकीय स्वयंसेवा अनुदान प्राप्त संस्था अखिल भारतीय दयानंद सेवाश्रम संघ, नई दिल्ली, शाखा थांदला जिला झाबुआ द्वारा संचालित प्रवृत्तियों के लिए अनुदान सहायता प्राप्त करने के लिए अनुदान नियम 1985 एवं मध्यप्रदेश में पंजीयन कराए जाने के प्रावधान से 2015-16 से 10 वर्ष की छूट प्रदान की।

    मंत्रि-परिषद ने पूर्वता क्रम (आर्डर ऑफ प्रेसीडेन्स) 2011 की सारणी के सरल क्रमांक-30 में प्रमुख सचिव गृह के बाद प्रमुख सचिव मध्यप्रदेश शासन एवं प्रमुख सचिव मध्यप्रदेश विधानसभा को एक साथ जोड़े जाने का निर्णय लिया।

    मंत्रि-परिषद ने एम पी रोड डेव्लपमेंट कार्पोरेशन लिमिटेड के संचालन मंडल की 33 वीं बैठक 15 मार्च 2017 में पारित संकल्प के अंतर्गत निकास नीति का अनुमोदन किया।

  • चार पीढ़ियों के त्याग की श्रद्धांजलि हैं मोदी

    चार पीढ़ियों के त्याग की श्रद्धांजलि हैं मोदी

    – भरतचन्द्र नायक…
    भारत में लोकतंत्र ने अंगड़ाई ली है। लोकतंत्र परिपक्वता की ओर बढ़ता नजर आया और परंपराएं ध्वस्त हुई क्योंकि जनता ने सियासी खोखलापन नापसंद कर दिया। पात्रता के अवसरवाद से मुक्ति के बाद सबका साथ-सबका सशक्तिकरण लोकबोध बनता देखा गया। अमित शाह और नरेन्द्र मोदी की इस बात को लेकर आलोचना हुई कि उत्तर प्रदेश में एक भी अल्पसंख्यक को प्रत्याशी नहीं बनाया। लेकिन मतदान करने में अल्पसंख्यक आगे रहे और कमल की नुमाइंदगी पसंद की। यहां तक कि मुस्लिम महिलाओं ने कमल के समर्थन में तमाम फतबों और दबावों को दरकिनार करके गतिशील भारत की दिशा निर्धारित कर दी। देश-विदेश के राजनैतिक विश्लेषक इस बात पर हैरान-परेशान है कि विमुद्रीकरण ने 86 प्रतिशत बड़ी मुद्रा को चलन से बाहर कर बैंकों के सामने लंबी लाईनों में जनता को खड़ा कर दिया। फिर भी जनता ने नोटबंदी के कारण क्लेशित होने के बाद भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के समर्थन में मतदान केन्द्रों पर भी कतारों को लंबा कर दिया। कारण स्पष्ट समझ में आया कि सात दशकों तक राजनीति के दिखाऊ मधुर तेवरों में हकीकत कम फसाना अधिक रहा है। नरेन्द्र मोदी ने देश की काली अर्थव्यवस्था में नस्तर लगाया और इसके पहले ताकीद कर दी कि नस्तर से तकलीफ होगी। लेकिन बनने वाले नासूर से आप और अगली पीढ़ी सुरक्षित हो जायेगी। नतीजा सामने आया उत्तर प्रदेश देश के सबसे बड़े सूबे में कमल खिला और ऐसा विशाल जनमत लगभग पौने चार दशक बाद जनता ने परोसा। सत्ता नस्तर लगाने वालों के हाथों में सौंपकर निश्चिन्त हो गयी। पग-पग पर विरोधाभास ने नरेन्द्र मोदी का प्रेतछाया के समान पीछा किया है और नहीं कहा जा सकता है कि यह सिलसिला कहां से कब तक चलेगा? लेकिन जैसा कि वरिष्ठ नेता वैंकेया नायडू ने कहा कि मोदी देश को दैवीय वरदान (गॉड गिफ्ट) है। विरोधाभास वास्तव में उनके लिए पारस स्पर्श देता आ रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने मोदी को मौत के सौदागर के रूप में संबोधित क्या किया, गुजरात की जनता मोदी पर कुर्बान हो गयी और गुजरात में कांग्रेस का अवसान हो गया। सर्जिकल स्ट्राईक को राहुल बाबा ने सैनिकों के खून की दलाली कहकर जनता का मूड बिगाड़ दिया। पांच में से 4 राज्यों में जीत का सेहरा जनता ने मोदी के सिर बांध दिया।
    बाबरी मजिस्द विवाद के पक्षकार मोहम्मद अंसारी की गणना अल्पसंख्यकों के कट्टर पेरोकार के रूप में हुई है। लेकिन अंसारी मोदी पर ऐसे लटटू हो गये कि उन्होनें अल्पसंख्यकों का आव्हान किया और कहा कि आजादी के बाद पहला प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हुआ जो न तो राग द्वेष रखता और न ही लोक लुभावन नारे परोसकर जनता को छलता है। उसके लिए समूची कौम एक परिवार और नजर एक है। अल्पसंख्यकों के साथ वेमुरोब्बत बात वहीं कर सकता है जो निष्कपट है। हाल का एक वाकया भी गंभीर विमर्श की अपेक्षा करता है। आतंकवाद के विस्तार में सिमी के सपोलों ने सिर उठाया। मध्यप्रदेश में 6 सपोले पुलिस के हत्थे चढ़ गये। उत्तर प्रदेश में हरकत कर पाते इसके पहले ही हुई मुठभेड़ में सैफुल्ला हला हो गया। सेकुलर ब्रिगेड चुप कैसे रहता? उसे वोटों की सियासत का मनचाहा मौका मिल गया। मुठभेड़ पर सवाल दाग दिये गये। लेकिन आतंकवादी सरगना सैफुल्ला के वालिद जनाब सरताज ने सैफुल्ला की लाश लेने और दफन करने से इंकार करते हुए कहा कि जो वतन का नहीं हुआ वह मेरा लड़का कैसे हो सकता है। सेकुलर ब्रिगेड की सियासत की सरताज ने न केवल पोल खोल दी, बल्कि नरेन्द्र मोदी द्वारा की गयी सर्जिकल स्ट्राईक के औचित्य में चार चांद लगा दिये। कांग्रेस के वे सभी नेता चुप हतप्रभ रह गये जो ऐसे मौकों को सियासत के लिए भुनाने की ताक में रहते है। उन्होनें मुंबई आतंकी घटना, बटाला हाउस एनकाउंटर पर सवाल खड़े ही नहीं किये, बल्कि मुठभेड़ में शहीद हुए रक्षाकर्मियों की शहादत का अपमान भी किया। लगातार अल्पसंख्यकों को भ्रमित करके अल्पसंख्यकों के विश्वास को सेकुलर ब्रिगेड ने डिगा दिया। अब तक सेकुलरवादियों की अल्पसंख्यकों के भावनात्मक शोषण करने की फितरतों ने सेकुलरवाद के छद्म से अल्पसंख्यक ने तौबा कर ली। इसी का दुष्परिणाम कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी को उत्तर प्रदेश के चुनाव में भोगना पड़ा। अल्पसंख्यकों के साथ दलितों, पिछड़ों, अति पिछड़ों ने भी नरेन्द्र मोदी की आर्थिक, सामाजिक नीतियों के समर्थन में एकमुश्त मतदान करने की ठान लिया। लोकसभा चुनाव 2014 में नरेन्द्र मोदी के समर्थन में भारतीय जनता पार्टी को जो समर्थन मिला था, ढ़ाई वर्ष बाद भी उसका बरकरार रहना भारतीय लोकतंत्र में विश्वसनीयता का एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। एंटी इन्कमबेंसी की प्रत्याशा में जो ताल ठोक रहे थे वे धराशायी हो गये। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में तीन चौथाई से अधिक बहुमत ने देश और दुनिया को चमत्कृत किया है। राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसा तीन चौथाई बहुमत विधानसभा, लोकसभा चुनाव में पीढ़ी को एक बार ही मयस्सर होता है। 1952 के चुनावों में पं. जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में यह जीत नसीब हुई। बाद में गरीबी हटाओं देश को बचाओं जैसे आकर्षक नारे देकर इंदिरा जी को भी जनता ने मौका दिया। उनके अवसान के बाद 1984 में इंदिरा जी की दुःखद मौत के बाद जनता ने सहानुभूति वोट के रूप में राजीव गांधी को भी इस स्तर पर पहुंचाया। लेकिन 37 वर्ष बाद नरेन्द्र मोदी ने जैसा कहा कि देश की जनता की खिदमत में उनका 56 इंच का सीना चट्टान की तरह आगे रहेगा। उन्होनें 16वीं लोकसभा के चुनाव और उत्तर प्रदेश की 16वीं विधानसभा के चुनाव में अप्रत्याशित जीत हासिल कर साबित कर दिया कि वे सेवादारों की सैना में यदि सेनापति है तो बेरेक में रहकर हुक्म चलाना नहीं जानते, सीना मोर्चा पर हमेशा आगे रहता है। ‘न खाऊंगा न खाने दूंगा’, न चैन से बैठूंगा और न दूसरों को बैठने दूंगा। छाती ठोककर प्रमाणित कर दिखाया है। नरेन्द्र मोदी का कद पं. नेहरू, इंदिरा गांधी से आगे नहीं तो, पीछे भी नहीं है। यह अतिश्योक्ति नहीं। सात समन्दर पार विश्व संचार माध्यम जो अब तक नरेन्द्र मोदी के खिलाफ विष वमन करने में अग्रणी थे, वे ही फरमा रहे है कि नरेन्द्र मोदी की भारत की जनता ऐसी मुरीद है कि 2019 में 17वीं लोकसभा चुनाव में कमल खिलाने को आतुर है। आहट सोलहवीं विधानसभा (उ.प्र.) चुनावों से कर्णगोचर हो चुकी है। समाजशास्त्रियों, राजनैतिक विश्लेषकों और वरिष्ठ सियासतदारों का मानना है कि नरेन्द्र मोदी ने समाज के बिखराव के जो कारक अभी तक राजनेताओं ने ईजाद किये थे, उन्हें झुठला दिया है। उनकी नीतियों से पात्रता क्रम मिट चुका है। उन्होनें सबका साथ-सबका सशक्तिकरण मूलमंत्र साबित किया है। चाहे जन-धन योजना हो, मुद्रा बैंक योजना हो, उज्जवला योजना और 79 प्रकार की जो भी जन हितकारी योजनाएं है, उनमें एक ही सांचा है। भारत का नागरिक, शोषित, पीडि़त, वंचित, गरीब, अबाल, वृद्ध नर-नारी, किसान, मजदूर, युवा, महिला सब एक समान न्याय और समानता के अधिकार के हकदार है। पूर्ववर्ती कांग्रेस की यूपीए सरकार के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने योजना भवन दिल्ली में बैठकर यह कहकर कि देश की संपदा पर पहला अधिकार अल्पसंख्यकों का है, अलगाव के बीज बो दिये थे। लेकिन नरेन्द्र मोदी ने लाग-लपेट बिना कहा कि देश की संपदा पर पहला अधिकार सवा अरब जनता का है, लेकिन प्राथमिकता में गरीब सर्वोच्च है। इसी का नतीजा है कि भारतीय जनसंघ के संस्थापक पं. दीनदयाल उपाध्याय के जन्मशताब्दी समारोह के वर्ष को नरेन्द्र मोदी ने देश के वंचितों, गरीबों को समर्पित कर गरीब कल्याण वर्ष के अनुरूप कार्यक्रम का संचालन किया है। नरेन्द्र मोदी को गरीबों में मसीहा की निगाह से देखे जाने के पीछे एक वजह यह है कि मोदी ने कहा है कि गरीब को राहत, डोल की जरूरत नहीं है। उसे ऐसे अवसर और परिस्थिति चाहिए जिसमें गरीब अपना बोझ उठा सके। इसका नतीजा यह होगा कि देश के मध्यम वर्ग के सिर का बोझ कम होगा। देश के संचालन में किफायत होगी और कराधान उदार मॉडल में पहुंच जायेगा। वास्तव में नरेन्द्र मोदी ने सामाजिक न्याय और सेकुलरवाद को ऐसा परिभाषित कर दिखाया है कि समाजवाद, वामपंथ और अन्य सभी वाद भूलुंठित हो चुके है। उत्तर प्रदेश में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में आशातीत विजय के एकाधिक कारण है जो अन्य दलों के लिए सबक बन सकते है। विजय के रूप में उत्तर प्रदेश की परिघटना में केन्द्र सरकार और भाजपा संगठन का मेलजोल का अपूर्व संगम रहा है। मोदी ने जहां राष्ट्रहित में संकुचित स्वार्थ को बलि चढ़ाने का साहस दिखाया और नोटबंदी करके अमीरांे और गरीबों को एक कतार में खड़ा करते हुए कहा कि आने वाले कल के लिए आज कुर्बान करना होगा। जनता ने तकलीफ भोगी लेकिन गरीब समझ गये कि देश के माफिया, भ्रष्टाचारी सब नोटबंदी के निशाने पर आ चुके है। विपक्ष ने जनता को बहकाने, विरोध करने के लिए उकसाया लेकिन जनता ने राष्ट्रीय हित में मोदी का साथ दिया। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने संगठन में केन्द्रीय कार्यालय से मतदान केन्द्र तक ऐसा संगठनात्मक ताना-बाना बुन डाला और पार्टी की सदस्य संख्या 12 करोड़ पहुंचाकर भारतीय जनता पार्टी को दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी में गणना करा दी। देश में ऐसी परिस्थति बनी कि जनता ने महसूस किया कि यदि हम अपना और आने वाली पीढ़ी का भविष्य चाहते है तो राष्ट्रवाद की परिभाषा गढ़ें। राष्ट्रवाद के नाम पर नाक-भौंह सिकोड़ने वालों से देश को अधिक जोखिम है, जितना बाहर से नहीं। देश में सामाजिक, आर्थिक सुधार का जो सिलसिला आरंभ हुआ है, उससे दुनिया में भारत की साख में चार चांद लग गये है। श्री नरेन्द्र मोदी अंतर्राष्ट्रीय फलक पर नेता के रूप में स्थापित हो चुके है। विश्व शक्तियां भारत की ओर टकटकी लगाये है। 2014 के लोकसभा चुनाव में कमल की विजय के 32 माह बाद यदि उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड में भारतीय जनता पार्टी का परचम शान से फहराया गया है तो मानना पड़ेगा कि नरेन्द्र मोदी युग का प्रादुर्भाव हो गया है। यह युग आरंभ तो हो गया है इसका सुदीर्घ भविष्य भी है। सुनहरा भविष्य भाजपा के लिए ही नहीं सवा अरब जनता के कल्याण के लिए समर्पित। नरेन्द्र मोदी ने सादा जीवन-उच्च विचार का जो सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक दर्शन गढ़ा हे, वास्तव में यह भारतीय जनसंघ और पार्टी के उन महामना नेताओं, जिनकी चार पीढ़ी खप गयी है, के प्रति सच्ची भावांजलि है।

  • विश्व बंधुत्व का उत्तम प्रदेश

    विश्व बंधुत्व का उत्तम प्रदेश

    आजाद हिंदुस्तान में भारतीय जनता पार्टी ने कई गैर कांग्रेसी सरकारें दी हैं। अन्य राजनीतिक दलों को भी गैर कांग्रेसी शासन देने का अवसर मिला है। इसके बावजूद कभी भारतीय संस्कृति का उद्घोष करती सरकारें अपने मुखौटे के साथ अवतरित नहीं हो सकीं हैं। मध्यप्रदेश को भारतीय संस्कृति पर आधारित राजनैतिक व्यवस्था देने वाली प्रयोग शाला के रूप में जाना जाता रहा है। यहां का चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय तो भारतीय संस्कृति पर आधारित राजनैतिक व्यवस्था की सबसे उत्कृष्ट लैब कहा जाता रहा है। इसके बावजूद जब उमा भारती के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की विशाल बहुमत वाली सरकार बनी तो वो फार्मूला बुरी तरह फेल हो गया। उमा भारती जिस जन, जंगल, जमीन, जानवर और जल का नारा लेकर सत्तासीन हुईं थीं वो फार्मूला विश्व आर्थिक प्रवाह के सामने न टिक सका। उमा भारती को बदलकर भाजपा ने बाबूलाल गौर के गोकुल ग्राम का सूत्र दिया वो भी न टिक सका और अंततः भाजपा को कांग्रेस के पूर्व निर्धारित विदेशी कर्ज आधारित विकास का माडल ही अपनाना पड़ा। इस माडल पर पिछले तेरह सालों से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सफल सरकार चला रहे हैं। मध्यप्रदेश पर कर्ज का भार जरूर बढ़ा है लेकिन ढांचागत विकास के पैमाने पर भाजपा की सरकार ने भरपूर लोकप्रियता बटोरी है। कर्ज का ब्याज चुकाने के लिए सरकार ने अपने संसाधनों का दोहन बढ़ाया है। टैक्स जुटाने के तरीके भी बदले हैं और प्रदेश की आय में भारी इजाफा किया है। इसके बावजूद वह रोजगार के साधन बढ़ाने के मोर्चे पर संघर्ष कर रही है। वजह साफ है कि प्रदेश में उत्पादकता का तंत्र आज भी आत्मनिर्भर नहीं बन पाया है।यही वजह है कि मध्यप्रदेश की सरकार भले ही आनंद मंत्रालय के माध्यम से लोगों के दिलों में खुशियों भरा गुब्बारा फुलाने में जुटी हो पर यहां के जन मानस के बीच रह रहकर बढ़ती मंहगाई की कराह सुनाई देती रहती है।
    यूपी में भाजपा को इसी कसौटी पर परखा जा रहा है। पंजाब में मरती कांग्रेस को जीवनदान मिल जाने की वजह भी शायद यही रही है कि भाजपा की सरकारें जनता के बीच आनंद का भाव नहीं जगा पा रहीं हैं। ये बात सही है कि देश की युवा पीढ़ी कांग्रेस से मुक्ति चाहती है। वो कांग्रेस को अब ढोना नहीं चाहती। कांग्रेस कोई भी मुखौटा लगाए वो अब उसके कथित सामाजिक सद्भाव के छलावे में नहीं आना चाहती। कांग्रेस के नेता जब जब भाजपा पर असहिष्णु और साम्प्रदायिक होने के आरोप लगाते रहे हैं तब तब जनता भाजपा को सिर आंखों पर बिठाकर सत्ता में पहुंचाती रही है। यूपी की जनता ने भी लामबंद होकर समाजवादी पार्टी की पाखंडी राजनीति को धूल चटाई है। विकास बोलता के नारों को धूल धूसरित करते हुए जनता ने कोई संशय नहीं किया और भाजपा को दो टूक फैसला सुनाते हुए सत्ता में भेजा है। बहन मायावती के जातिवादी झांसे में न आकर दलित राजनीति की जो सच्चाई सामने आई उससे भी राजनीतिक पंडितों के अरमान धराशायी हो गए हैं।
    इन सबसे अलग योगी आदित्य नाथ लगातार आगे बढ़ते हुए जनता की कसौटी पर खरे उतरते गए। जो गोरखपुर कभी अपने माफिया आतंक के लिए जाना जाता था वहां हिंदु मुस्लिम सद्भाव की मिसाल कायम करके सकारात्मक राजनीति की आधारशिला रखने वाले योगी आज भरोसे की अग्निशिखा के रूप में सबके सामने हैं। इस हवन कुंड में सबके नाम की आहुतियां पड़ रहीं हैं। यूपी आज एकजुट है। विकास के पथ पर आगे बढ़ने के लिए तैयार है। इसके बावजूद भाजपा से लंबा दुराव रखने वाले जो राजनेता दुष्प्रचार में जुटे हैं उन्हें अब जनता ने जवाब देना शुरु कर दिया है। लोग सोशल मीडिया पर आकर बता रहे हैं कि उन्होंने जो फैसला किया है वो सोच समझकर किया है। उन्होंने सक्षम नेतृत्व को चुना है और उन्हें पूरा भरोसा है कि ये नेतृत्व यूपी के लिए हितकारी साबित होगा।
    यूपी के चुनाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जनता को जिस विकास का भरोसा जताया है वह कोई लौह पुरुष ही साकार कर सकता है। अब तक पटरी से उतरकर घिसटती रही यूपी की राजनीति को बदलना किसी आम राजनेता के बस की बात है भी नहीं। न तो वहां जाति के आधार पर दिया गया नेतृत्व कारगर हो सकता है और न ही फार्मूलों से सरकार चलाई जा सकती है। वहां तो सख्त और कुशल प्रशासक की ही जरूरत रही है। ऐसा शासक जो राजनैतिक षड़यंत्रकारियों की गीदड़ भभकियों के सामने जरा भी न सकुचाए। आज जो लोग मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ पर दर्ज पुराने मुकदमों का हवाला देकर लांछन लगाने की कोशिश कर रहे हैं वे उनके लिए अमृत की बूंदें साबित हो रहे हैं। जनता जानती है कि तब योगी ने किस जांबाजी के साथ कानून व्यवस्था को बचाने में लोहे की दीवार बनकर जनता का साथ दिया था। आज यूपी की जनता को भरोसा है कि योगी के रूप में उन्हें एक सक्षम नेतृत्व मिल गया है। जाहिर है कि इन हालात में जनता का आशीर्वाद उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश बनाने में कोई कसर छोड़ने वाला नहीं है।

  • कल्याणी को गौरवी बनाने का समय

    कल्याणी को गौरवी बनाने का समय

    जड़ता को तोड़ना बड़ी बात होती है। समाज की जड़ता को तोड़ना तो आसमान से तारे तोड़ लाने जैसा दुष्कर कार्य है। ये संतोष की बात है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की सरकार कभी कभी खुद के होने का अहसास भी करा देती है।इसी तरह का संतोषजनक अहसास सरकार ने विधवा शब्द को विलोपित करने का कदम उठाकर दिलाया है। सरकारी कामकाज में अब विधवा शब्द की जगह कल्याणी शब्द का इस्तेमाल किया जाएगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि जिस तरह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विकलांग शब्द को हटाकर दिव्यांग प्रयोग करके देश की आबादी के बड़े हिस्से में गौरव जगाने में सफलता पाई उसी तरह कल्याणी शब्द समाज की आधी आबादी के माथे पर दुर्भाग्यवश लगने वाले कलंक को जरूर धो पाएगा। महिला और बाल विकास मंत्री अर्चना चिटनिस जब विधानसभा के शून्यकाल में सरकार के इस प्रयास का उल्लेख कर रहीं थीं तब उनके चेहरे पर खासा संतोष और गौरव का भाव झलक रहा था। बेशक उन्हें महिला जन प्रतिनिधि होने के नाते ये आजीवन संतोष करने लायक अवसर था। उन्होंने राजनीति के माध्यम से समाज को करीब से समझा है। वे जानती हैं कि हमारे पुरुष प्रधान समाज में स्त्री की स्वतंत्र चेतना को किस तरह अवसरों की बाट जोहना पड़ती है। महिला के सामने चुनौती होती है कि पहले तो वह खुद को अविचलित बनाए तब कहीं जाकर समाज के उत्पादक या रचनात्मक कार्य से जुड़ पाए। देश और समाज की उत्पादकता बढ़ाने में ये लिंग भेद बड़ी दीवार बनकर रुकावट पैदा कर रहा है। सदियों से हमारे समाज में स्त्री और पुरुष की भूमिका को दायरे में बांधकर देखा जाता रहा है। जब पारंपरिक समाज था तब भले ही ये दायरे उचित प्रतीत होते रहे हों पर आधुनिक दौर में ये वर्गीकरण निश्चित रूप से काफी मंहगा सौदा है। जब हमारी सारी गतिविधियां आर्थिक उत्पादकता बढ़ाने में ऐड़ी चोटी का जोर लगा रहीं हों तब हम स्त्री और पुरुष के रूप में समाज की शक्ति को बांटकर देखें ये न तो न्यायोचित है और न ही व्यावहारिक । सदियों से भारत में स्त्री की भूमिका को घरों में ही समेटकर रखने की प्रवृत्ति घुमड़ती रही है। समय समय पर कुछ बहादुर महिलाओं ने धारा का रुख मोड़कर भी दिखाया है पर ये बदलाव स्थायी नहीं हो पाया, क्योंकि उसका उदय किसी न किसी व्यक्तित्व के इर्द गिर्द ही होता रहा है। पहली बार किसी बहुमत प्राप्त लोकतांत्रिक सरकार ने इस तरह का बदलाव लाने की पहल की है। निश्चित रूप से इस पहल का स्वागत करना होगा।इसके लिए महिला विकास मंत्री अर्चना चिटनिस और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को बहुत बहुत साधुवाद। इस बदलाव के साथ सरकार की चुनौतियां और भी ज्यादा बढ़ गईं हैं। पति की असमय मृत्यु होने के वक्त अक्सर महिलाएं आत्मनिर्भर नहीं होती हैं। वैसे तो पुरुष भी बड़ी तादाद में आत्मनिर्भर नहीं हो पाए हैं। लोकतांत्रिक सरकारों की ये बड़ी असफलता रही है कि उन्होंने समाज के पैतृक व्यवसाय बंद करा दिए हैं और नए व्यवसाय सृजित नहीं कर पाई हैं। इन हालात में महिलाओं के दैनंदिनी खर्चों के लिए किसी रोजगार का ढांच खड़ा करना फिलहाल संभव नहीं दिखता है। सरकारी नौकरी में कृपा करके भर्ती करना निहायत मूर्खता भरा कदम साबित हुआ है जो पिछली कांग्रेस की सरकारों की नाकामी के जीते जागते सबूत के रूप में हमारे इर्द गिर्द रोज देखा जा सकता है।एनजीओ में नौकरी देकर भी ज्यादा महिलाओं को आत्मनिर्भर नहीं बनाया जा सका है। एकमुश्त राशि देकर या पेंशन देकर भी कल्याणी की सेवा करना कर्ज मे डूबी मध्यप्रदेश सरकार के लिए भी फिलहाल संभव नहीं दिखता। फिलहाल तो विधवा के कल्याणी बनने पर इतना ही संतोष किया जा सकता है कि उसे सामाजिक तिरस्कार से तो बचाया जा सकेगा। कल्याणी शब्द में जो सेवा भाव छिपा है उसके चलते स्त्रियों को नई किस्म की परेशानियों का भी सामना करना पड़ सकता है। सोचने लायक बात है कि बगैर पढ़ी लिखी, जायदाद से वंचित, शारीरिक रूप से अशक्त, छोटे छोटे बच्चों के पालन के बोझ से दबी हुई स्त्री कैसे कल्याणी बन सकती है। जब उसे ही देखभाल की जरूरत हो तो उसे मजबूर होकर कई बार समाज के क्रूर हाथों में खेलने पर मजबूर होना पड़ जाता है। फिर धीरे धीरे वह विधवा से कुलटा बन जाती है और जीवन की शाम उसे काशी के विधवाश्रमों में ही बिताना पड़ती है। सरकार को सोचना होगा कि कल्याणी शब्द की आड़ में क्या उसे देह का सौदा करने के लिए मजबूर तो नहीं किया जाने लगेगा। वास्तव में जब जीवन की दौड़ में स्त्री अकेली पड़ जाती है तब उसे अपने पैरों पर खड़े होना सबसे पहली प्राथमिकता होती है। क्या सरकार इस दिशा में भी कोई कदम उठाने जा रही है। सरकारी नौकरी इसका कोई समाधान नहीं है। एनजीओ के भरोसे बैठे रहना भी संभव नहीं है। वास्तव में सरकार को रोजगार मूलक वे प्रयास शुरु करने होंगे जिनसे न केवल स्त्री बल्कि कोई पुरुष भी बेकार न बैठा रहे। उसके हाथों को इतना काम तो जरूर मिले कि वह अपना और अपने परिवार का भरण पोषण कर सके। जब ये हालात बन जाएं तब जरूर कहा जा सकता है कि स्त्री भी अपनी शान कायम रख सकेगी। कल्याणी शब्द फिलहाल कुछ ज्यादा ही नरम दिखाई दे रहा है। सरकार की जवाबदारी है कि वह उसे अबला न बनने दे। सबला न भी बना पाए तो कम से कम उसे गौरवी तो जरूर बना रहने दे।

  • बीड़ी मजदूरों की भी पंचायत होः शैलेन्द्र जैन

    बीड़ी मजदूरों की भी पंचायत होः शैलेन्द्र जैन


    भोपाल, 08 मार्च। सागर विधानसभा क्षेत्र के विधायक शैलेन्द्र जैन ने आज श्रम विभाग के बजट पर चलने वाली चर्चा में कहा कि मैं जिस क्षेत्र से आता हूं वहां पर बीड़ी श्रमिकों की 33 हजार की संख्या है पूरे जिले में 66 हजार बीड़ी श्रमिक हैं. प्रदेश में अनेक तरह की पंचायतें हुईं उनके माध्यम से उनकी समस्याओं को दूर करने की दिशा में काम हुआ है, लेकिन बीड़ी श्रमिकों की पंचायत घोषणा करने के बाद भी अभी तक नहीं हो पाई है.

             उन्होंने कहा कि मैं समझता हूं कि कम लागत में अधिकतम लोगों को रोजगार दिया जा सकता है. यह संसार में अगर कोई कर सकता है तो बीड़ी उद्योग है. मैं मंत्री जी से कहना चाहता हूं कि यह पंचायत बुलायी जाये. बीड़ी श्रमिकों की प्रदेश में बहुत अधिक संख्या है उनका कोई सम्मेलन यहां भोपाल में बुलाया जाये, यह उचित नहीं होगा. उनकी पंचायत सागर में या और कहीं पर की जाए जहां पर उनकी संख्या बहुत अधिक हो तो उसका लाभ बीड़ी श्रमिकों को होगा.

             श्री जैन ने कहा कि अभी तक बीड़ी श्रमिकों के आवास के लिये शासन ने 40 हजार रूपये के अनुदान की व्यवस्था की थी,हालांकि उस योजना में केन्द्र का योगदान बहुत ज्यादा है उसको बढ़ाकर के डेढ़ लाख रूपये प्रति हितग्राही कर दिया गया है. मैं इस बात के लिये केन्द्र सरकार एवं मध्यप्रदेश की सरकार को बधाई देना चाहता हूं. यह बीड़ी श्रमिकों के हित में एक अच्छा कदम है, लेकिन मैं यह मानता हूं कि अभी भी महंगाई के दौर में डेढ़ लाख रूपये कम है. हमने प्रधानमंत्री आवास योजना में देखा कि इस तरह के हितग्राहियों के लिये ढाई लाख रूपये की योजना है. वह व्यक्ति जो संनिर्माण कर्मकार मण्डल रजिस्टर्ड हैं उनको लगभग साढ़े तीन लाख रूपये अनुदान देने की व्यवस्था है तो मैं समझता हूं कि बीड़ी श्रमिकों के लिये डेढ़ लाख रूपये की जो राशि है वह कम है उसको बढ़ाकर के कम से कम 2 लाख रूपये किया जाये.

    उन्होंने कहा कि सागर में एक बीड़ी कामगार अस्पताल है वह काफी पुराना है, लेकिन यह देखने में आया है कि उस अस्पताल में इन्डोर पेशन्ट की भर्ती करने की व्यवस्था नहीं है जिसके चलते बीड़ी श्रमिक काफी परेशान होते हैं. वहां ओपीडी की संख्या तो अच्छी हो रही है, लेकिन एडमीशन कम हो पाते हैं. वह इस दिशा में काम करें. वहां स्वस्थ्य संबंधी उपकरणों की निहायत कमी है जांच कराने के लिए श्रमिकों को बाहर की अस्पतालों में तथा शासकीय अस्पतालों का सहारा लेना पड़ता है. बीड़ी श्रमिकों के हित में अगर अस्पतालों के उन्नयन काम करेंगे तो बहुत अच्छा होगा.

  • हिन्दुत्व से परहेज जनता से धोखाः जन-न्याय दल

    हिन्दुत्व से परहेज जनता से धोखाः जन-न्याय दल

    सागर/8 मार्च/ आर.एस.एस, विहिप संत-समाज सहित हिन्दुवादी संगठनों की प्रेरणा और सहयोग से बहुसंख्यक हिन्दुओं के वोटों के सहारे प्रचण्ड बहुमत पाकर केन्द्र में सरकार बनाने वाली भाजपा अब अपनी घोषित राष्ट्रवादी-हिन्दुत्व की नीतियों के विपरीत जाकर कांग्रेस की ही नीतियों को स्वीकार करने में ज्यादा रूचि दिखा रही है। यह कांग्रेस को देश की सत्ता से उखाड़ फेंकने में सहयोग करने वाली जनता के साथ धोखा है।
    यह बात आज पत्रकारवार्ता में राजनैतिक पार्टी जन-न्याय दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष एडवोकेट बृजबिहारी चैरसिया ने कही। उन्होंने कहा कि हिन्दुत्व के मुद्दों को सिर्फ अपने स्वार्थो की पूर्ति के लिये इस्तेमाल करने वाली भाजपा को अब संघ की नीतियों को स्वीकार करने से परहेज करना मंहगा पड़ेगा। उन्होंने कांग्रेस की नीतियों को अंगीकार करती जा रही भाजपा से सवाल किया है कि अब जनता के सामने यह स्पष्ट करें कि उसकी राष्ट्रवादी सोच देश के लिये आवश्यक है या कांग्रेस की नीतियां। एक सवाल के जबाब में उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी का आर.एस.एस. से किसी भी प्रकार का संबंध नहीं है मगर संघ के हिन्दु सशक्तिकरण व एकजुट करने की वैचारिक-सोच को हम राष्ट्रीय आवश्यकता मानते हैं।
    मंदिर निर्माण के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि देश की जनता अयोध्या में भव्य राम मंदिर निर्माण के नाम पर पिछले दो दशकों से ठगी जा रही है जिससे आस्थावान राम भक्त भारी सदमे में है। उन्होंने कहा कि गौ-हत्या पर कानूनी प्रतिबंध भी अब सिर्फ भाजपा का जुमला बनकर रह गया है। देश में प्रतिदिन हो रही लाखों गायों की हत्या को उन्होंने चिंताजनक बताया। उन्होंने आश्चर्य जताते हुए कहा कि अब तो गौ-रक्षा करने वाले गौ-सेवकों को ही भाजपा के नेता फर्जी बताने लगे हैं। पत्रकारों से उन्होंने कहा कि राम राज्य की कल्पना में अपराध, शोषण व मंहगाई और भ्रष्टाचार का कोई स्थान नहीं होना चाहिये। लेकिन केन्द्र की भाजपाई सरकार की इन मुद्दों पर असफलता ने पौने तीन साल में ही देश की जनता को अंदर तक हिलाकर रख दिया है।
    एक सवाल के जबाब में उन्होंने कहा कि सभी जानते है कि आर.एस.एस. का वैचारिक आंदोलन छल-कपट की राजनीति से दूर रहकर राष्ट्रवादी ताकतों को मजबूत करने और गरीबों- पिछड़ों से उनके कल्याण के लिये किये गये वायदों को पूरा करने में भरोसा रखता है। लेकिन इसके ठीक विपरीत भाजपा के नेता सत्ता में आने के बाद से ही जनता के कल्याण के स्थान पर अगली बार पुनः सत्ता में काबिज होने की जुगत में लग गये है। इसके लिये ये कांग्रेस की तरह ही अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की दिशा में जाने से भी परहेज नहीं कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि राष्ट्रवाद के उद्देश्य से चुनाव जीती भाजपा का अब एक मात्र लक्ष्य सिर्फ चुनाव जीतना रह गया है। जिसके लिये अब वह विकास, मोदी की छवि, जातीय गणित और लुके-छिपे हिन्दूवाद की चार नावों पर सवार है।
    उन्होंने राम भक्तों, गौर-रक्षकों, संत समाज और हिन्दुवादी संगठनों से अपील की है कि वे भाजपा पर दबाब बनाये जिससे गरीबों- पिछडों से किये वायदों को वह पूरा करे। उन्होंने कहा कि जनादेश का सम्मान करते हुये संसद में कानून बनाकर तत्काल राम मंदिर बनाने, गौ- हत्या रोकने कानून बनाने आदि का मार्ग प्रशस्त करे। नोटबंदी के सवाल पर चैरसिया ने कहा कि हमें देश की अर्थव्यवस्था पर इसके परिणामों के आकलन के लिये डेढ़ वर्ष का इंतजार करना चाहिये। उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार को अब कांग्रेस के समय हुये घोटालों की चुनावी राग अलाप बंद करके जनता को बताना चाहिये कि उसने किन-किन घोटालेबाजों को अब तक जेल भेजा है। विदेशी कालाधन देश में लाने के लिय क्या काम किया है। बेरोजगारों को कितने रोजगार दिलाये है।

  • सत्ता और सेक्युलर के नाते की अंतिम सांसें

    सत्ता और सेक्युलर के नाते की अंतिम सांसें

    (रा.स्व.सं, भाजसं से भाजपा तक)
    भरतचन्द्र नायक…

    ‘‘सूख हाड़ ले जात सठ स्वान, निरखि मृगराज’’ लंपटीय तासीर सत्ता लोलुपों का स्वभाव आदि काल से व्यवहार में देखा सुना गया। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से प्रेरित संगठन की प्रेरणा का यहीं जन्म होता है। अंगे्रजों ने बांटो और राज करो की मंषा से भारतीय समाज के विखंडन के बीज बोये। 1925 में राष्ट्र को एकता के सूत्र में गुंथित करने का अनुष्ठान आरंभ हुआ। समय ने करवट ली। भारत को आजादी मिली। लेकिन सत्ता में आने के साथ समाज को फिरकों में बांट कर तुष्टीकरण को परवान चढ़ाना सत्ता मठाधीशों ने मूल मंत्र अपना लिया। आवश्यकता ही अविष्कार की जननी होती है। राष्ट्रवादी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने सांस्कृतिक गतिविधियों के विस्तार के लिए संगठन का जब विस्तार किया, जाति विहीन, राष्ट्र को समर्पित युवा शक्ति को एकता के सूत्र में पिरोने का संगठित प्रयास सफलता की सीढ़ियां चढ़ने लगा। तत्कालीन मठाधीशों की भुकुटियां तन गयी। संगठन को कुचलने की चेतावनियां मिली। लेकिन राष्ट्रवाद के प्रसार में न साहस थका और न कदम पीछे रहे। जैसे-जैसे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पौधे को सींचा और उसका विस्तार हुआ इसकी छवि देशव्यापी बनती गयी और विदेशों में भी रा.स्व.सं. की चर्चा शुरू हो गयी। मजे की बात यह कि जैसे-जैसे संगठन का कलेवर विस्तृत हुआ, इसके विरूद्ध गलत अटकलबाजियां फैलाना सत्ता और सत्तोन्मुख तत्वों का शगल बन गया। संघ को शंका की दृष्टि से देखा जाने लगा। इसी का नतीजा था कि बार-बार सांस्कृतिक राष्ट्रवादी संगठन को कठघरे में में खड़ा किया गया। न्यायिक आयोग बने संगठन ने सामना किया और न्याय, नीति, नीयत की कसौटी पर संघ ने अपनी सांस्कृतिक धर्मिता की पवित्रता सिद्ध की। उसे क्लीनचिट मिली। लेकिन शंकालु होना सत्ता का स्वभाव है। यही सत्ता लोलुपता प्रपंच गढ़ती है। सांच को भी आंच पहुंचाती है। राजा इन्द्र ने इसी ईष्र्यावश कितने ऋषि मुनियों को लक्ष्य से भटकाने की कोशिश की। षड़यंत्र अतीत के साक्षी है। लेकिन स्वभावगत जो विफलता लगती है कि इन षड़यंत्रों की पोल खोलने का संघ ने प्रयत्न यदा कदा ही किया। जन भ्रम निवारण करने के लिए संघ ने जो खिड़की अब खोली है, उससे बहुत हद तक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को आहत करने वाले तत्वों के सिर से नकाब उतरा है।
    हाल के दौर में जब-जब सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का ज्वार आया तथाकथित सेकुलरवादियों ने शक्ति भर भ्रम फैलाया। सम्मान लौटाकर विरोध करने वालों की पोल तो हाल में खुल गयी, जब कांगे्रस ने जुमे की नमाज पढ़ने तक के लिए अवकाश की घोषणा कर ली। साम्प्रदायिकता के बीज बोकर सेकुलरवाद का जश्न मनाना आज एक राजनैतिक फैशन बन गया है। भारतीय समाज का यह दुर्भाग्य है कि कांगे्रस और उसके साथी संगी सेकुलरवाद की मनमाफिक परिभाषा गढ़ते, समाज को छलते और साम्प्रदायिकता का विस्तार करते है। इससे देश और समाज भले कमजोर हो, इनकी निगाह महज वोटों और सत्ता पर केन्द्रित होती है। लेकिन साम्प्रदायिक हथकंडा का मर्म अब अल्पसंख्यक भी समझ चुके है। सेकुलरवादी अल्पसंख्यकों के हमदर्द नहीं उनकी चातकी दृष्टि सिर्फ वोटों पर है। अल्पसंख्यक प्रेम उनके लिए समाज के संगठित होने, कौम की तरक्की का साधन नहीं केवल सत्ता के लिए साध्य है।

    बाबरी मजिस्द विवाद के मुख्य पक्षकार हासिम अंसारी उत्तर प्रदेश की राजनीति के ऐसे चेहरे रहे है जो आगे बढ़ते थे तो सियासी तूफान आता था। अपने जीवन के आखिरी पड़ाव में हासिम अंसारी साहब ने फरमाया कि देश को नरेन्द्र मोदी जैसे नेताओं की जरूरत है। आजादी के बाद नरेन्द्र मोदी पहला शख्स है जिसने साफ सपाट बात की। उन्होनें ही मुस्लिम समाज से गुजारिश की कि विकास और न्याय का ढिंढ़ौरा नहीं पीटता, लेकिन साथ लेकर चलता है। मजे की बात यह है कि हासिम अंसारी की राम मंदिर विवाद के महंत रामचन्द्र दास से गहरी दोस्ती थी। लेकिन दोस्ती में मंदिर-मजिस्द विवाद आड़े नहीं आया। मुसलमान कौम ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर भरोसा जताया है, साथ ही संघ परिवार की मुसलमानों के साथ की गयी पहल सराही गयी। क्योंकि यहां सब एक मन होकर मुल्क की खिदमत का पैगाम है, वोटों की मारा-मारी नहीं है। जिन अल्पसंख्यकों को खौंफजदा करके कांगे्रस सहित सहयोगी दल उनके वोटों से सत्ता हासिल करने में कामयाब होते रहे है। संघ परिवार से उनके जुड़ाव ने सेकुलरवादियों के ताजिये ठंडे कर दिये है। संघ के वरिष्ठ प्रचारक इंद्रेश कुमार ने अल्पसंख्यकों को भरोसे में लेते हुए कहा कि मुल्क के 25 करोड़ मुसलमानों के बिना भारतीयता अधूरी रहेगी। उन्होनें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इफ़्तार जलसा कर दुनिया के मुस्लिम नेताओं को दावत दे डाली। यथार्थ में देखा जाये तो भारतीय जनसंघ से लेकर भारतीय जनता पार्टी के विकास तक अल्पसंख्यकों से रिश्तों में न तो खटास और न तकरार हुई। यह भी एक यर्थाथ है कि तकरार करने का रसायन पं. नेहरू के वक्त ही तैयार हो गया था, जब उन्होनें बाबरी मजिस्द की ताली फेंक दी और राजीव गांधी ने ताला खुलवा दिया। वास्तव में मुसलमानों से राष्ट्रवादी समुदाय का मेलजोल 9 जुलाई 1966 को ही शुरू हो गया था, जब अटलजी ने दिल्ली शाहजहांनी जामा मजिस्द के सामने अवाम के संपादक अनवर देहलवी को अपना प्रत्याशी बनाया था। अनवर देहलवी जनसंघ के खुर्राट नेता हुए और आज भी जनसंघ के कारपोरेटर के रूप में उनकी सेवाएं याद की जाती है। जहां तक संघ, जनसंघ और भाजपा का ताल्लुक है, इमाम उमर इलियासी जो कि भारत की 5 लाख मस्जिदों की आॅल इंडिया इमाम आॅर्गेनाईजेशन के अध्यक्ष है, का कहना है कि नफरत के बीज बोकर कोई मिठास वाले फल की उम्मीद नहीं की जा सकती। यह इंसानियत का उसूल है गढ़े मुर्दे उखाड़कर सियासत हो सकती है, मुल्क अवाम की भलाई नहीं कर सकते। लोग कहते है कि गर केन्द्र में भाजपा आयी तो अल्पसंख्यक मुसीबत भोगेंगे। लेकिन आशंका को अटल जी ने तो झुठलाया, नरेन्द्र मोदी ने आगे बढ़कर टीम इंडिया कहकर सबको गले लगाया है। आरक्षण को लेकर सर संघचालक और प्रचार प्रमुख का मानना है कि कौम को विकास की मुख्यधारा में लाना है। आरक्षण कोई खैरात नहीं एक रास्ता है, जिसे कायम रहना है लेकिन यह भी सोचने की बात है कि यह फिरका परस्ती को जारी रखने में सहायक बनता है। जब तक जाति पांति अवसर का पेरामीटर रहेगा, जातिविहीन भेदभाव रहित एक रस समाज की कल्पना क्लिष्ट बनी रहेगी। हिन्दू होने के रस का आस्वादन भली प्रकार संभव नहीं होगा।

    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर भ्रांतियों का जाल फैलाने की मुहिम अब गड़रिया की टेर बनकर अनसुनी बन रही है। गड़रिया भेड़ें चराता है और मस्ती में गांव वालों को पुकारता कि शेर आ गया। गांव वाले परेशान हो गये। लेकिन जब शेर आया तो किसी ने गड़रिया का रूदन नहीं सुना। सत्ता और सेकुलकर का नाता अंतिम सांसे ले रहा है। सेकुलरिज्म का छद्म जनता समझ चुकी है। जन-जन समझता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा इंसानियत को जोड़ने वाली शक्ति है, इसका उद्देश्य समाज में सकारात्मकता लाना है, जिसे कोई भी नकारात्मक ताकत हानि नहीं पहुंचा सकती। यही कारण है कि शाखाओं का देश में ही नहीं विदेशों में भी विस्तार हो रहा है। युवाओं में संस्कृति, परंपरा, संस्कार, इतिहास, राष्ट्र भाव जगाने के केन्द्र के रूप में शाखा पुनीत गुरूकुल बनती जा रही है। इसमें उम्र का, जाति-पांति, सम्प्रदाय का कोई फर्क नहीं है। 18 वर्ष से कम आयु के लिए बाल भारती, बाल गोकुल संकुल है। विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों के युवकों के लिए शाखा बौद्धिक विकास, शारीरिक शौष्ठव के केन्द्र है। संघ द्वारा देश भर में 32 हजार 400 संस्थानों पर 50 हजार से अधिक शाखाएं लगायी जा रही है। 12 हजार 32 साप्ताहिक मिशन कार्यक्रम, 7233 मासिक मिशन कार्यक्रम चल रहे है। मजे की बात यह है कि एक मां ने जब बच्चे को संघ में जाकर राष्ट्रीय संस्कारों से संस्कृत होकर देखा तो राष्ट्र सेविका समिति की पे्ररणा मिली। आजादी के पूर्व ही राष्ट्र सेविका समिति को मौसी लक्ष्मीबाई केलकर ने जन्म दिया, जो पुष्पित फलित पल्लवित हो रही है, अपनी अस्सी वर्षीय यात्रा में संघ के संस्कारों का बीजारोपण कर नारीशक्ति का प्रस्फुटन किया है।

    जहां तक मुस्लिम बच्चों को संस्कारित करने का सवाल है, संघ के स्कूलों में 4700 मुस्लिम बच्चे संस्कारित हो रहे है। देशभर में 12364 विद्यालय बाल भारती के है, इनमें मुस्लिम बच्चे खुशी-खुशी प्रवेश पाते है। कश्मीर सहित सभी राज्यों में विद्या भारती के स्कूल है और इनमें 270 मुस्लिम आचार्य कार्यरत है। हिन्दुत्व के इन संस्कार केन्द्रों में एक सौ से अधिक ईसाई आचार्य भी है, जो हिन्दुत्व के संस्कारों को आगे बढ़ा रहे है। हिन्दू होने का एक अपना रस है, क्योंकि यहां इस्लाम का सम्मान करने की सुविधा है। कुरान और वाईविल को पवित्र कहने की सद्भावना विराजमान है। हिन्दू होने के कारण ही हम दुनिया की सारी आस्थाएं स्वीकार करके आल्हादित होते है। हिन्दु होकर आस्तिक रह सकते है और नास्तिक भी बने रह सकते है। ऐसा इसलिए है कि यहां नफरत हिंसा तुल्य मानते है। सहिष्णुता असीम है। हिन्दु होकर विवेक का इस्तेमाल कर सकते है। हिन्दु होने का एक आनंद यह भी है कि भौतिकवादी हो सकता है। आध्यात्मिक होने की छूट है, आस्तिकता से संतुष्ट होते है, इसलिए अंधविश्वास काफूर हो जाता है। अब विचारणीय प्रश्न यह है कि जो असहिष्णुता का इल्जाम लगाते है, वे कितने सहिष्णु है।

  • बडे़ बाबा के दर्शन को पहुंचे स्वामी रवीन्द्र कीर्ति

    बडे़ बाबा के दर्शन को पहुंचे स्वामी रवीन्द्र कीर्ति


    कुण्डलपुरः- विश्व की सबसे ऊँची 108 फुट आदिनाथ भगवान की मांगीतुंगी में स्थापना कराने वाले जम्बूदीप के पीठाधीश स्वस्ति स्वामी रवीन्द्र कीर्ति जी ने कुण्डलपुर पहुँचकर बडे़ बाबा आदिनाथ भगवान के दर्शन किए उन्होने अर्ग समर्पित कर छत्र चढाया उनके साथ कुण्डलपुर कमेटी के अध्यक्ष संतोष सिंघई, विद्ववान डॉ.भगचंद भागेन्दु, तहसीलदार रूपेश सिंघई विमल लहरी, अभय बनगांव, नवीन निराल, श्रेयांस लहरी, मुकेश शाह, शैलेन्द्र मयूर, सुनील वेजीटेरियन, दीपचन्द्र जैन, नरेन्द्र बजाज, अजित खडेरी, चन्द्र कुमार जैन, साथ रहे । बडे़ बाबा के मंदिर का उन्होने सूक्षमता से अवलोकन किया। इस अवसर पर कुण्डलपुर क्षेत्र कमेटी की ओर से उनका सम्मान किया गया। उन्होने कहा कि शीघ्र निर्माण पूर्ण होने से देश की सम्पूर्ण जैन समाज को गौरव एवं प्रसन्नता होगी। मंदिर का निर्माण सून्दर एवं सुचारू रूप से चल रहा है। उन्होने कहा कि सन् 2001 में महोत्सव के समय आया था तब से काफी परिवर्तन आ गया है। और मंदिर का निर्माण भी बहुत हो गया है, आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज का आर्शीवाद प्राप्त है, इसीलिए यह कार्य शीघ्र पूर्ण होगा। मंदिर कमेटी को मेरी यह प्रेरणा है कि मंदिर निर्माण को प्राथमिकता के साथ समय सीमा में पूर्ण करने का प्रयास करें, उन्होने वर्द्यमान सागर के समीप शिखर मंदिरों के दर्शन किये।


    पीठाधीश स्वामी रवीन्द्र कीर्ति जी का हुआ भव्य अभिनंदन
    कुण्डलपुरः- विश्व की सबसे ऊँची 108 फुट आदिनाथ भगवान की मांगीतुंगी में स्थापना कराने वाले पीठाधीश रवीन्द्र कीर्ति जी के दमोह आगमन पर दिगम्बर जैन समाज के द्वारा भव्य स्वागत एवं अभिनंदन किया गया। वसुन्धरा नगर स्थित दिगम्बर जैन मंदिर के समीप स्थित विद्या चिन्मय संत भवन में स्वामी जी का समाज की ओर से अभिवंदना प्रशस्ति भेंट कर सम्मान किया गया।
    कार्यक्रम के आरंभ में मंगलाचरण के उपरान्त स्वामी जी ने बडे बाबा एवं छोटे बाबा आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के चित्र के समक्ष दीप प्रज्जवलन किया।

    समाज के वरिष्ठ विद्ववान डॉ.भागचन्द्र भागेन्दु जी ने स्वामी जी एवं धर्मपीठोें का परिचय दिया, इसके पश्चात् दिगम्बर जैन पंचायत के अध्यक्ष सुधीर सिंघई विमल लहरी,संतोष भारती, रूपेश सिंघई अभय बनगांव, अरविन्द्र इटोरया, सुभाष बमोरया, रूपचंद जैन, अजित जैन, सुनील वेजीटेरियन, दिलेश चौधरी, आनंद जैन ,महेन्द्र जैन आदि के साथ विभिन्न जैन मंदिरों के प्रतिनिधियों एवं पदाधिकारियों ने श्रीफल अर्पित कर स्वामी जी का आर्शीवाद प्राप्त किया।

    इस अवसर पर अपने उदगार् व्यक्त करते हुये। स्वामी जी ने कहा कि मै दमोह पहली वार आया हूँ और बुन्देलखण्ड के भक्तों से मिलने आया हूं, 15 वर्षो पूर्व कुण्डलपुर आया था, तथा वहां के नये मंदिर मॉडल का उद्घाटन करने का मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ था। मंदिर निर्माण कार्य को देखने की मेरी भावना थी, उन्होने कहा कि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज 40वर्षो से बुन्देलखण्ड में है, मुझे यहां आकर ज्ञात हो गया है ं चूंकि बुन्देलखण्ड के भक्तों की त्याग और त्यागियों के प्रति, श्रद्धा और भक्ति असीम है, यही कारण है कि आचार्य श्री इस क्षेत्र को नही छोड पा रहे, आचार्य श्री और आर्यिका शिरोमणि ज्ञानमती माता जी पूरे विश्व में धर्म की महति प्रभावना कर रहे है। पूज्य माता जी की पावन प्रेरणा से हमें विश्व की सबसे बडी प्रतिमा बनाने का सौभाग्य प्राप्त हो सका है जो कि गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज हो चुका है, आज समाज को संगठन की बहुत आवश्यकता है। इसलिए हमें अपने समाज के अस्तित्व को बनायें रखना होगा। हमें खानदान और खानपान को बचाने की आवश्यकता है, तथा युवा पीढी को बचाये रखने के लिये संस्कारित करना जरूरी है।

  • बाजारवाद ने बढ़ाई उपभोक्ता की चेतना

    बाजारवाद ने बढ़ाई उपभोक्ता की चेतना


    – भरतचन्द्र नायक
    इतिहास और परंपराओं में जीवन का सत्व छिपा होता है, यह सबक की चीज है। इसमें लोकनायक के नायकत्व का स्थान आचार, विचार, व्यवहार भविष्य के लिए सीख देता है। लेकिन जब लोकनायक का स्थान बाजारवाद महानायक का मुखौटा लगाकर ले लेता है तो सुधार, स्थिरता, परंपरा की प्रक्रिया स्थगित हो जाती है और हम महानायक के साथ कदम बढ़ाकर आत्ममुग्ध होकर बाजारवाद की गिरफ्त में आ जाते है। लोकनायक और महानायक की इस स्पर्धा में हमें महानायक भाता है। इसका फर्क समझने के लिए लोकनायक जयप्रकाश और महानायक अमिताभ बच्चन प्रतीक बन चुके है। दोनों परिवर्तन के संवाहक है। लेकिन चलन में आज महानायक है, जो उपभोक्ता वस्तुओं की छवि ढ़ो रहा है। चाहे फिल्मी अभिनेता होे, क्रीडागंन में खिलाड़ी हो, इनके नाम से उपभोक्ता ललचा जाता है और उपभोक्ता चाहे-अनचाहे उत्पाद अपनी झोली में भरता है, जेब खाली करता है। खाद्य पेय वस्तुओं के गुण-अवगुण का अनुसंधान करने के बजाय हम अपनी सेहत का सौदा कर रहे होते है। समाज में रोग व्याधि बढ़ने का आमंत्रण अनायास मिलता है।
    उपभोक्ता बाजारवाद की गिरफ्त में इस बात का भी विचार नहीं कर पा रहा है कि खाने-पीने की वस्तुएं तो सेहत को शिकार बना रही है, सौंदर्य प्रसाधन जो सामाजिक प्रतिष्ठा दिलाने के संसाधन बन चुके है, वे भी बीमारी को आमंत्रण दे रहे है। आॅनलाईन से जिस खरीद योजना की पूर्ति मिनटों में हो जाती है, उसमें यह जानने का भी वक्त नहीं है कि भोजन में मिलावट और प्रदूषक का कौन सा तत्व हमनें उदरस्थ करने का तामझाम जुटा लिया। मजे की बात यह है कि नववर्ष जैसे मांगलिक अवसर पर ही हम मिलावटी भोजन, पेय पदार्थों और प्रसाधन सौंदर्य के उत्पादों का सेवन कर प्रफुल्लित होने का स्वांग कर रहे होते है। सवेरे-सवेरे चाय की चुस्कियों का आनंद सभी लेते है, लेकिन वे अंजान है कि चाय कि पत्तियों के अर्क के साथ वे लौह कण भी निगल रहे है जो यदि परिमाण से अधिक हो गये तो उदर रोग होने की गारंटी देते है। पत्तियों को सूखाने के बाद चायपत्ती पर चलाने वाले रोलर से ये कण चाय में छूट जाते है, जो छन्नी द्वारा भी बाहर नहीं किये जा सकते। फलों को पकाने के लिए रसायन कार्बाईड कंपाउन्ड का इस्तेमाल प्रतिबंध के बाद भी धड़ल्ले से किया जा रहा है। प्रतिबंधित केल्शियम कार्बाईड में जब रासायनिक क्रिया होती है तो ऐसे तत्व तैयार होते है जो कैंसर रोग के लिए जमीन तैयार करते है। इसी तरह फल, सब्जी की अच्छी ग्रोथ लेने के लिए लालच में आक्सीटोसिन का उपयोग किया जाता है। इस तरह उत्पादित फल, सब्जी खाने से हृदय रोग, सिर दर्द, बांझपन पनपने के साथ याददाश्त भी क्षीण हो जाती है। चांदी के बर्क को मिठाई की शान माना जाता है। आकर्षक शोकेस में सजी मिठाईयां देखकर मुंह में पानी आ जाता है। लेकिन कोई नहीं जानता कि यह चांदी का बर्क पशु की आंत से बनी शीट पर रखकर कूटने के बाद बनता है। इस प्रक्रिया पर भी प्रतिबंध है, लेकिन प्रक्रिया रूकी नहीं है। दूसरी तरफ चांदी की जगह एल्युमीनियम का उपयोग करना हमारी वणिक बुद्धि में शुमार है। दूध तो भोजन में अमृत तुल्य है। लेकिन हमें नहीं मालूम कि इसमें क्या मटेरियल इस्तेमाल किया जा रहा है। कहीं यूरिया तो कहीं चाक का इस्तेमाल कर दूध बनाया जाता है, जो केवल स्वास्थ्य के लिए हानिप्रद ही नहीं होता अपितु संक्रमित होने से कई विकृतियों को जन्म देता है। लेकिन हम विज्ञापन पढ़ने के बाद उपयोग कर रहे दूध को कामधेनु उत्पाद मानकर मंुह मांगा दाम चुकाते और बीमारी खरीद रहे होते है।
    आर्गेनिक फूड एक सुरक्षित विकल्प होता है, लेकिन इस मंहगाई के दौर में आॅर्गेनिक फूड तक पहुंच पाना आम आदमी के लिए दिवा स्वप्न बन गया है। फिर हमारे हाट में शुद्धता, प्रामाणिकता मानव उपकार की वस्तु नहीं दाम बढ़ाने की पक्रिया में गिनी जाने लगी है। उपभोक्ता फोरम में कई मामले आते रहते है, लेकिन न तो इस प्रक्रिया में कहीं वास्तविक रोक लगी है और न ही इसके विरूद्ध कार्यवाही कोई निश्चित अंजाम तक पहंुची है। बाजारों में विज्ञापनों में महानायक की तकरीर को ही शुद्धता ओर स्वास्थ्य की कसौटी मानकर हम ठगे जाने को बेताब है। खाद्य पेय पदार्थों में खतरे जुटाना हमारी तरकीब बन चुकी है। इसी कारण अब भारत में कुपोषण सिर्फ गरीबों तक सीमित नहीं रहा है। भारत की गिनती दुनिया के सबसे कुपोषण ग्रस्त देशों में करने में हमने सारी शक्ति झौंक दी है। खेत-खलिहान से लेकर बाजार तक पहुंचानें में खाद्य पेय पदार्थों को प्रदूषित, मिलावटी बनानें में सहयोग करने का पूरा चक्र बन चुका है। मानव जीवन के साथ खिलवाड़ इस व्यापार में लगे लोगों का पुनीत कर्मकांड बन जाना वास्तव में राष्ट्रीय चेतना का मृत प्राय हो जाना है। इसमें कानून का लाचार होना, प्रवर्तन तंत्र का लालची होना और उपभोक्ता जागरूकता के अभाव में इस मिलीभगत के प्रति तदर्थवाद की प्रवृत्ति भी कम दोषी नहीं है। कभी-कभी और कहीं-कहीं जब ग्वाले की केन में से अतिरिक्त दूध खरीद लिया जाता है तो ग्वाला शरमाये बगैर ही उतना पानी उपभोक्ता के नल से भरकर अपनी केन में उड़ेल लेता है। उसे से तो बस कमाई से मतलब है। दूसरे के स्वास्थ्य का क्या होगा यह चेतना आजादी के बाद तो कमोवेश हमारी तासीर से जा चुकी है। कहने की बात तो यह है कि मिलावट की रोकथाम में सरकार की जिम्मेदारी है। उपभोक्ता मंच की भूमिका कम नहीं है, लेकिन जो कंपनियां प्रतिष्ठान है उनकी भी गंभीर जिम्मेदारी है। उपभोक्ता की सेहत का सौदा कर ये प्रतिष्ठान समाज में प्रतिष्ठा भी पाते है और दसवीर की सूची में अपना नाम दर्ज कराते है। अन्यथा क्या कारण है कि चंद दिनों में इनका एम्पायर खड़ा हो जाता है और राजनेता इनके इर्द-गिर्द मंडराने लगते है।
    मानव जीवन के प्रति संवेदना का घोर अभाव परिलक्षित हो रहा है। इससे बड़े आश्चर्य की बात यह है कि मानक ब्यूरों भी खाद्य पदार्थों, उनके कंटेनरों और बोतलों में विषैले रसायनों के प्रति सचेत नहीं है। हमारा जीवन प्लास्टिक युग में प्रवेश तो कर गया है लेकिन प्लास्टिक की गुणवत्ता और प्रामाणिकता के बारें में मानक ब्यूरों, उपभोक्ता मंच और जनता बेपरवाही का सबूत दे रही है। भारतीय सादे मिजाज के होने के कारण खाद्य पेय, सौंदर्य प्रसाधन बनाने वाली कंपनियों को उनके दायित्वों के प्रति विवश करने मंे अपने को समर्थ नहीं पाते। सिर्फ यह शिकायत करते है कि वे बीमारी से विकृति से ग्रस्त हो रहे है, जबकि उनका खान-पान स्तर का है। लेकिन वे इस बात को जानने की जेहमत नहीं उठाते कि पता लगाये कि उनके उपयोग में आ रहे उत्पाद शैम्पू, क्रीम, पाउडर, डियोडरेंट गुणवत्ता विहीन और नकली तो नहीं है। विज्ञापन बाजी देकर चकाचैंध में हम झूठी प्रतिष्ठा, झूठी शान में स्तरहीन, नकली उत्पादों का सेवन कर खुद रोग व्याधियों को निमंत्रण दे रहे है। उपभोक्ता मंचों की उपयोगिता पर यह एक प्रश्नचिन्ह है।

  • अब भोपाल में महावीर पथ प्रशस्त करेगा जीतो

    अब भोपाल में महावीर पथ प्रशस्त करेगा जीतो

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    भोपाल,17 दिसंबर(पीआईसीएमपीडाटकाम)। जैन इंटरनेशनल ट्रेड आर्गेनाईजेशन(जीतो) अब भोपाल से भी भगवान महावीर का उद्घोष करता नजर आएगा। संस्था ने आज भोपाल के प्रसिद्ध कारोबारी सुनील जैन 501 को भोपाल चेप्टर की जवाबदारी सौंपी है। तुलसी मानस प्रतिष्ठान के सभागार में आयोजित एक कार्यक्रम में संस्था के भोपाल चेप्टर से जुड़ने वाले सभी पदाधिकारियों को पर्यटन मंत्री सुरेन्द्र पटवा ने शपथ दिलाई।पूर्व विधायक सुनील जैन भी इस अवसर पर मौजूद थे।
    भोपाल के युवा कारोबारी सुनील जैन 501 को दो साल के लिए जीतो के भोपाल चेप्टर का अध्यक्ष बनाया गया है। उनके साथ सीए अखिलेश जैन, जयदीप जैन और निलय जैन ने 11-11 लाख की सहयोग राशि देकर प्रतिभाशाली बच्चों और उद्यमियों को बेहतर नागरिक बनाने की शपथ ली। एक एक लाख रुपए की सहयोग राशि देने वालों में सर्व श्री देवेन्द्र जैन, राकेश जैन, प्रियंक जैन,विजय तारण, राजेंद्र जैन टीआई,नीरव जैन,प्रमोद जैन हिमांशु,प्रदीप जैन नॉहर कलां,संदीप जैन गोधा,सौरभ जैन गोखरू,मुकेश जैन शीतल,विवेक चौधरी,डॉ,रूपेश जैन,अनु डागा, जेएल गाँधी,बीएस मोदी,सुभाष भंडारी,सिम्मी जैन,विक्रम जैन,विकास जैन,नितिन नादगॉंवकर,राकेश अनुपम,ने भी सहयोग की घोषणा की।
    सुरेन्द्र पटवा ने कहा कि हम समाज का कर्ज उसी को लौटाने की व्यवस्था कर रहे हैं।सकारात्मकता से उसे हासिल करेंगे।देश भर मेें आज कई छात्र छात्राएं, उद्योगपति, राजनेता जीतो के सहयोग से भगवान महावीर के उपदेशों के अनुसार सामाजिक गतिविधियों में शामिल हो रहे हैं। संस्था का उद्देश्य देश को सफल राष्ट्र बनाना है। उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी समाज के अंतिम व्यक्ति के कल्याण की बात कहती है। हमारे प्रेरणा पुरुष पं. दीनदयाल उपाध्याय ने अंत्योदय की अवधारणा दी थी। ये स्ंस्था भी संसाधन विहीन लेकिन प्रतिभाशाली युवाओं को खोजकर उन्हें अपना सर्वोत्तम योगदान देने के लिए तत्पर रहती है। भोपाल चेप्टर के प्रारंभ होने से मध्यप्रदेश के बड़े हिस्से में युवाओं को आगे बढ़ने के अवसर प्रशस्त होंगे। उन्होंने संस्था के पदाधिकारियों और नए सदस्यों को शुभकामनाएं दीं।
    डॉ अनिल भंडारी ने स्वागत भाषण दिया,संस्थापक अध्यक्ष शांतिलाल कँवर ने बताया कि संस्था ने भगवान महावीर के जीवन दर्शन से देश और दुनिया को सफल बनाने का अभियान चलाया है।उन्होंने कहा कि विश्व में कई जाति समुदाय अपनी योग्यता के लिए पहचाने जाते हैं। भगवान महावीर के उपदेशों में आस्था रखने वाले जैन बंधु समाज के किसी भी वर्ग से आते हों लेकिन वे समय समय पर समाज के बीच अपने कार्यों, बुद्धिमत्ता और सेवा भावना से प्रकाश स्तंभ बन जाते हैं। उन्हें अपने जीवन की सर्वोत्कृष्ट पारी खेलने के लिए तरह तरह की बाधाओं का सामना करना पड़ता है। जैन समाज के कई बुद्धिजीवियों और साधुओं ने इस विषय पर चिंतन करके इस संस्था का गठन किया है। जैन समाज अपने सारे आयोजन परस्पर सहयोग से सफल बनाते रहे हैं। नई पीढ़ी के प्रतिभाशाली युवाओं को समाज की मुख्य धारा में मजबूती से खड़ा करने के लिए समाज के बीच से ही जीतो का गठन किया गया। आज इस संस्था के पास लगभग 220 करोड़ का स्थायी फंड है। इसके ब्याज से ही संस्था की तमाम गतिविधियां चलती हैं। हमने युवाओं के लिए कोचिंग, हास्टल, उद्यमियों के लिेए वर्किंग कैपिटल आदि देकर उन्हें समाज के बीच सिर उठाकर चलने का मौका दिया है। सबसे बड़ी बात तो ये है कि ये सब किसी व्यक्तिविशेष की कृपा से नहीं बल्कि भगवान महावीर की विचारधारा को सफल बनाने की सोच के कारण संभव हो सका है। हमने साधुओं के स्वास्थ्य के लिए विशेष फंड बनाया है। जैन धर्मावलंबियों की किसी भी विचारधारा से जुड़े साधु के लिए हम संपूर्ण स्वास्थ्य पैकेज प्रदान करते हैं। संस्था से जुड़े उद्योगपति सतीश पारख ने संस्था के कार्यक्रमों की जानकारी दी।सीईओ ललित जैन ने कार्यक्रम का संचालन किया।
    देवरी के पूर्व कांग्रेसी विधायक सुनील जैन,सुरेश जैन आईएएस,जस्टिस अभय गोहिल,उद्योगपति विनोद डागा, ने भी मंच पर अपनी उपद्थिति दर्ज कराई।कार्यक्रम में बड़ी संख्या में जैन गणमान्य नागरिक और समाज के जागरूक लोग भी उपस्थित हुए।

  • मोदीमय हुई शिवराज सरकार की ग्यारहवीं वर्षगांठ

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    भोपाल4 दिसंबर,(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)। शिवराज सिंह चौहान की सरकार के ग्यारह साल पूरे होने पर मनाया गया उत्सव आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विमुद्रीकरण फैसले से सुर मिलाने की कोशिश करता नजर आया। पूरे कार्यक्रम में मुख्यमंत्री नोटबंदी के फैसले से उपजी सकारात्मक लहर पर सवारी करते नजर आए। साथ में जनता से नोटबंदी को सफल बनाने का आव्हान करके उन्होंने अपनी कुर्सी बचाने की र राजनीतिक कवायद भी की। इस दौरान उनके मंत्रिमंडलीय सहयोगी भी मौजूद थे।
    मध्यप्रदेश शासन की ओर से आयोजित जनकल्याण योजनाओं के प्रशिक्षण कार्यक्रम में व्यवस्थाएं पहले हुए आयोजनों की तुलना में बेहतर ढंग से की गईं थीं। सोलह फिल्मों के माध्यम से शासन ने उन सफल योजनाओं पर प्रकाश डाला जिन्हें मध्यप्रदेश सरकार अपनी यशस्वी योजनाएं मानती है। राजधानी के जंबूरी मैदान पर इस विशाल आयोजन के लिए भारी इंतजाम किए गए थे। कार्यक्रम की शुरुआत लोकप्रिय गायिका अलका याज्ञ्निक के गीतों से हुई। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने हमेशा की तरह अपने भाषण की शुरआत जनता को अपना भगवान बताकर की। उन्होंने भाषण के प्रारंभ में ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को कर्मयोगी और युग पुरुष प्रधानमंत्री बताया और कैशलैस ट्रांजेक्शन को बढ़ावा देने के लिए आंदोलन चलाने की घोषणा की। इसके बाद मुख्यमंत्री के पिछले ग्यारह सालों के शासन के दौरान चलाई गई योजनाओं पर फिल्मों का प्रदर्शन शुरु किया गया। पूरे परिसर में लगभग सौ बड़े टीवी पटल लगाए गए थे जिन पर लोगों को ये फिल्में दिखाने का इंतजाम किया गया था। हर योजना से जुड़ी फिल्म दिखाए जाने के बाद उसके पांच पांच हितग्राहियों को योजना की राशि का लाभ देने के लिए मंच पर बुलाया गया।
    श्री चौहान ने विपक्षी कांग्रेस के नेताओं के बयानों का हवाला देकर कहा कि वे कहते हैं कि हम जश्न मना रहे हैं। जबकि हमने सत्ता का सुख नहीं भोगा बल्कि तपस्या की है। कांग्रेस कभी योजनाओं को लेकर इस तरह के खुले आयोजन नहीं करती थी, जबकि हमने लोगों को योजनाओं का लाभ दिया है। इसकी वजह यही है कि हम जनता की सेवा की कर्म साधना की तरह करते हैं। उन्होंने अपने भाषण में फिर प्रधानमंत्री का उल्लेख किया और कहा कि श्री नरेन्द्र मोदी की अगुआई में देश आगे बढ़ रहा है। फटाफट योजनाएं बनाई जा रहीं हैं। उन्होंने कहा कि वामपंथी जिन देशों में शासन करते हैं वहां नागरिकों की स्वतंत्रता छीन ली जाती है। लोगों की विविधता भी छीन ली जाती है। पूंजीवाद में जिंदा रहने की प्रतिस्पर्धा होने लगती है। हम इन दोनों को ही नहीं मानते। हम तो एकात्ममानवतावाद में यकीन करते हैं। हमारी पार्टी का मानना है कि सभी ज़ड़ चेतन में एक ही चेतना समाई हुई है। हम वसुधैव कुटुंबकम को मानते हैं। जियो और जीने दो को मानते हैं।
    श्री चौहान ने कहा कि कांग्रेस के शासनकाल में शोषण की व्यवस्था शुरु हो गई थी। अमीरों और गरीबों के बीच खाई बढ़ती चली गई। कोई तरस रहा उजियारे को कोई सूरज बांधे सोता है। इस तरह की व्यवस्था को मिटाकर भाजपा संसाधनों का लाभ आम जनता तक पहुंचाना चाहती है। उन्होंने सत्यनारायण भगवान की कथा में में सुनाए जाने वाले उद्धरण का हवाला देते हुए कहा कि जिस तरह भगवान को न बताने पर लालची व्यापारी का धन लता और पत्र हो गया था उसी तरह मोदी जी के नोटबंदी अभियान से काला धन रखने वालों की संपदा बेकार हो गई है।करंसी की कमी को सहकर भी लोग मोदीजी के अभियान का समर्थन कर रहे हैं। उन्होंने उपस्थित जन समुदाय से नोटबंदी और मोदीजी के समर्थन में नारे भी लगवाए। उन्होंने कहा कि अब लोग मोबाईल को बटुआ बना सकते हैं। प्रधानमंत्री के भाषणों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जनधन खातों में जिन अमीरों ने अपना धन छुपाया है वे उन्हें न लौटाएं। उन्होंने कहा कि लोगों को बिना रुपया लिए या दिए बगैर कारोबार करना सिखाया जाएगा। ईमानदार व्यापारियों को घबराने की कोई जरूरत नहीं है। वे अपनी दूकान पर पीओएस मशीनें लगाएं। इस मशीन का प्रचलन बढ़े इसके लिए इस पर लगने वाले सारे टैक्स माफ कर दिए जाएंगे। सारे मंत्री विधायकों को मोबाईल से रुपए लेने देने का प्रशिक्षण दिया जाएगा इसके बाद आप सभी को भी बगैर मुद्रा कारोबार करना सिखाया जाएगा।
    श्री चौहान ने कहा कि बजट सत्र में कानून बनाकर सभी नागरिकों को आवास उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जाएगी। लोगों को प्लाट या मकान दिलाने के लिए यदि सरकार को जमीन खरीदना भी पड़ी तो हम खरीदेंगे। इस योजना में घुसपैठ करने वाले भूमाफिया को जेल भेजने की व्यवस्था भी की जाएगी। उन्होंने कहा कि सरकार स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में भी कई नए प्रयोग करने जा रही है। आगामी जनवरी को विद्यार्थी पंचायत बुलाई जाएगी जिसमें विद्यार्थियों को शिक्षा प्राप्त करने की राह में आने वाली रुकावटों को दूर करने का प्रयास किया जाएगा। उन्होंने कहा कि सरकार कानून बनाकर लोगों को मजबूर करेगी कि वे अपने यहां काम करने वाले मजदूरों के रहने की व्यवस्था करें। औद्योगिक घरानों की सीएसआर राशि में अपना सहयोग देकर सरकार गरीबों के लिए दीनदयाल रसोई भी चलाएगी जिसमें गरीब को पांच रुपए में भरपेट खाना मिल सकेगा। उन्होंने बेटियों को शादी में स्मार्ट फोन देने की घोषणा भी की।
    अपने भाषण के अंत में श्री चौहान ने लोगों को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हाथ मजबूत करने की अपील की।उन्होंने लोगों को न खाएंगे और न खाने देंगे का संकल्प भी दिलाया।

  • नीयत, नीति और नेता का नेकपन

    नीयत, नीति और नेता का नेकपन

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    भरतचन्द्र नायक….

    इतिहास बड़ा निर्दयी होता है। शासक और प्रशासक कितना भी महत्वाकांक्षी हो, लेकिन ऐसे शख्स कम ही अपवाद होते है जो समय, परिस्थिति से समझौता नहीं करते। उनके इरादे मजबूत होते है, और समाज-देश में आस्था उनका संबल होता है। आधुनिक काल के निर्माता और प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने गद्दी संभालते ही राजनैतिक, आर्थिक क्षेत्र में व्याप्त प्रदूषण को समाजवाद के रास्ते में रोढ़ा मारकर साफ-सुथरी सरकार देने का मंसूबा संजोया था। भारत में 1961 में आयकर कानून बनानें और बाद में सीबीआई के रूप मंे स्पेशल स्टेब्लिशमेंट एक्ट को परिष्कृत करने के पीछे उनका इरादा देश से भ्रष्टाचार के कदाचार को समाप्त करना था। देश में कालेधन के खिलाफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का अभियान जब वाद-विवाद और चर्चा का केन्द्र बना है, पं. नेहरू के जन्मदिन पर उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में एक सभा में उन्होनें जो कहा और पं. नेहरू का पुण्य स्मरण किया, उससे संकेत मिलता है कि नरेन्द्र मोदी इतिहास की समग्रता से पुनार्वृत्ति करनें के लिए कृत-संकल्प है। विपक्ष द्वारा उठाये जा रहे लेकिन, किन्तु, परन्तु से अविचलित रहकर उन्होनें आर्थिक क्षेत्र में जो स्ट्राईक किया है कालेधन की मुहिम नोट बंदी आर्थिक सर्जिकल स्ट्राईक के रूप में प्रशंसा और विपक्षी मंच पर आलोचना का विषय जरूर बन गयी है। लेकिन लंबी लाइन में पसीना बहाते नये नोटों के इंतजार मंे खड़ा देश का आम आदमी नरेन्द्र मोदी की प्रशंसा किये बिना नहीं रहता। लंबी लाइन में परेशान हो रहे उपभोक्ताओं की सेवा में ठंडा पानी, चाय परोसते युवक मानों इस मुहिम के सही प्रशंसक बन चुके है।

    बड़े नोटों के प्रचनल पर लगायी गयी रोक से आम जनता की परेशानी, बाजार में आयी घबराहट के बावजूद जनता में एक आत्मविश्वास जगता दिखायी दे रहा है और वह इस बात से कतई इत्तेफाक नहीं रखता कि नरेन्द्र मोदी ने देश पर आर्थिक आपातकाल थोप दिया है। नोट बंदी का नया आयाम सिर्फ सामाजिक आर्थिक सिस्टम का परिष्कार ही नहीं है अपितु राजनैतिक क्षेत्र में नयी सरंचना का संकेत भी है। आजादी के बाद चुनाव आयोग ने लंबी बहस की और चुनाव के खर्चीले होने पर सवाल भी उठाया। माना गया कि चुनाव में कालेधन के इस्तेमाल से निर्वाचन की शुचिता दाखिल हुई है। लेकिन मंचीय चिंता व्यक्त करने वाले राजनैतिक दलों की भूमिका एक तटस्थ मौन दर्शक से ज्यादा नहीं रही। शुचिता लाने के लिए उन्होनें कोई प्रयास नहीं किया। 500 और 1000 रू. के बड़े नोटों के प्रचलन पर लगी रोक से लाखों करोड़ रूपया रखने वाले कालाधन धारियों की चिंता का कोई ठिकाना नहीं रहा। राजनैतिक दलों ने आगामी विधानसभा चुनाव के लिए जो बड़े नोटों का अंबार बनाकर रखा था, उनकी सांसे थम गयी और उन्होनें नरेन्द्र मोदी पर निशाना तान दिया है। यहां तक कि देश के सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा भी खटखटा दिया। लेेकिन सर्वोच्च न्यायालय की खंडपीठ ने भी उन्हें निराश कर दिया और इस कदम की नेक नीयति पर अपनी मोहर लगा दी। अलबत्ता, न्यायालय ने सुझाया कि आम आदमी जो रोज कुआं खोदता है और पानी पीता है, उसे किल्लत न हो। इसका केन्द्र को ध्यान रखना होगा। पुराने बड़े नोटों, नकली मुद्रा के खारिज होने के बाद नये नोटों को प्रचलन में लाने का गंभीर दायित्व केन्द्र सरकार को सौंपा है। केन्द्र सरकार भी जनता के प्रति संवेदनशील है। 8-9 नवंबर 2016 की मध्यरात्रि से अचानक बड़े नोटों पर लगी पाबंदी से जनता हैरान है, लेकिन एनडीए सरकार का यह तर्क भी मायने रखता है कि यदि इसकी पूर्व सूचना दी जाती तो उद्देश्य ही पराजित हो जाता। इस आकस्मिक् नोट बंदी में जनता के सब्र का सबसे बड़ा कारण इस पाबंदी से आतंकवाद, तस्करी और भ्रष्टाचार का मेरूदंड झुक जाने से हुई सुखद अनुभूति है। मेहनत मशक्कत कर पेट पालने वाले दिन भर की मजदूरी खोकर अपनी गाढ़ी कमाई के नोट बदलने के लिए लंबी कतार में इंतजार करते हुए भी नरेन्द्र मोदी के साहसिक कदम के दीवाने हो गये है। उनका मानना है कि जहां नोटों का अंबार रद्दी में तब्दील हो गया है, वहीं अमीर और गरीब एक पंक्ति में आ गये है। नरेन्द्र मोदी ने 50 दिनों में स्थिति सामान्य होने की दिलासा दी है। भारतीय जनता पार्टी के नेता और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान का यह कथन मौजू है कि इस कदम ने श्री सत्यनारायण भगवान की कथा में आये किरदार वणिक व्यापारी जैसी हालत उन रईसों की कर दी है,

    जिन्होनें केन्द्र सरकार की तमाम चेतावनियों पर यह दर्शाया कि उनके पास कोई ब्लैक मनी (कालधन) नहीं है। नरेन्द्र मोदी ने जखीराबाजों को तथास्तु कहकर उसी अंजाम पर पहुंचा दिया। ब्लैकमनी का अंबार लतम्-पत्ताम् में नोटों का जखीरा बदल गया है। आर्थिक विशेषज्ञों की राय है कि कालाधन अर्थव्यवस्था में घुन बन रहा था। इससे जहां भ्रष्टाचार का पोषण होता था, आतंकवादियों के स्लीपर सेल पैदा होकर सरसब्ज हो रहे थे। वे धीरे-धीरे कुपोषण का शिकार होकर मृतपाय होंगे। नक्सलियों की कमर टूट चुकी है, क्योंकि वे तो धन एंेठकर जमीन में छिपाते आ रहे है। जरूरत पड़ने पर हथियार खरीद लेते थे। हवाला पर लगाम लगाने के साथ मादक द्रव्यों की तस्करी करने वाले भी हैरान है। उनका दावा है कि बड़े नोट तर्कसंगत कारणों पर बदले जाने और मौजूदा खातों में जमा होने से काली मुद्रा प्रचलन से बाहर हो रही है। और जो पूंजी सुप्त थी, वह बैंकों के माध्यम से विकास और उत्पादनशील प्रयोजनों के काम आयेगी। इससे असली मुद्रा का परिमाण प्रचलन में मर्यादित होने से ईएमआई (ब्याज दर) घटेगी। केन्द्र सरकार की पावंदी का अनुकूल प्रभाव देखने में आया है।

    अनुमान है कि 9 नवंबर से प्रथम चरण में चार दिनों में ही बैंको में एक लाख करोड़ रू0 से अधिक का ट्रांजेक्शन (लेन-देन) हुआ। इससे बैंको की लिक्विडिटी में इजाफा हुआ है, एटीएम में नोटों का आकार-प्रकार बदलने से उनकी क्षमता घटने से हो रही उपभोक्ता की परेशानी के प्रति सरकार की संवेदनशीलता का ही नतीजा है कि केन्द्र ने पोस्ट आॅफिस को भी इस काम में जुटा दिया है। ग्रामीण केन्द्र भी सक्रिय किये जा चुके है। निश्चित रूप से केन्द्र के इस बहुप्रतीक्षित कदम से जनता हलाकान हुई है, लेकिन जनता को भरोसा है कि इससे मुल्क को लगभग 3 लाख करोड़ रू. का लाभ हो सकता है। एक सर्वेक्षण के अनुसार देश में 1000 और 500 रू. की मुद्रा के रूप में 14 लाख करोड़ रू. के नोट है, जिसमें 20 प्रतिशत कालाधन है। यह राशि इस मुहिम में लौटने से रही। यह सरकारी खजाने की निधि में दर्ज हो जायेगी। आरबीआई द्वारा जारी हर नोट सरकार की लायबिलिटी होती है। उन नोटों की देयता स्वयं समाप्त हो जायेगी। राजनैतिक दल भले ही नोट बंदी का विरोध कर रहे हों, लेकिन उद्योग जगत और आम आदमी ने इसे आर्थिक क्षेत्र में सर्जिकल स्ट्राईक बताकर इस कदम का जोरदार स्वागत किया है। एक बात यह भी कि नकद के रूप में भारत में इसका जीडीपी में हिस्सा 12 प्रतिशत है यानि नकदी में लेन-देन चलता है। जबकि दूसरे देशों में नकदी का अंश 3 से 4 प्रतिशत ही रहता है। इस तरह प्रधानमंत्री ने बड़े नोट बंद करके जो आर्थिक शुद्धीकरण की क्रांति की है, उस पर 2014 के पहले भी तत्कालीन प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह सरकार ने विचार किया था। लेकिन न तो वे जनता के चुने हुए प्रधानमंत्री थे और न कांगे्रस ऐसा करने का साहस करने के लिए तैयार थी। कारण जो भी रहा हो।

    नोट बंदी के कई आयाम है। राष्ट्र हित में उन पर बहस की गंुजाईश है, लेकिन उस पर बहस करने के बजाय कुछ लोग अफवाहों को पंख देकर जनता को भ्रमित करनें में जुटे है। 100 रू. और 50 रू. के नोट बंद किये जाने की अफवाह को केन्द्र सरकार ने शरारतपूर्ण बताकर खारिज कर दिया है। विधि आयोग और चुनाव आयोग चुनाव में कालेधन के दुरूपयोग पर लंबे समय से चिंता व्यक्त करते आ रहे है। मंचों पर राजनैतिक दल भी इसकी पेरोकारी करनें में पीछे नहीं रहे। लेकिन इन दलों ने इस पर सहमति बनानें का साहस नहीं दिखाया। इनकी नीयत में हमेशा खोट देखी गयी है। लेकिन नोट बंदी ने देश में हो रहे उपचुनावों में इसका सबूत दे दिया है कि नोट बंदी से नकली नोटों का प्रचलन बंद होने से चुनाव में कालेधन पर रोक लगाने का भरोसा किया जा सकता है। नोट बंदी भ्रष्टाचारियों के लिए सबक है, लेकिन इस अभियान में गेहूं के साथ घुन पिस रहा है, यह एक मजबूरी सरकार के सामने आ रही है। अर्थव्यवस्था के शु़िद्धकरण के अनुष्ठान में आम आदमी को सजा भुगतना राष्ट्रीय अनुष्ठान में आम आदमी की सात्विक आहुति है। देश की उभरती अर्थव्यवस्था का इसे परीक्षाकाल भीमानकर संतोष करना पड़ेगा। इसके लिए यदि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रशंसा और एनडीए सरकार की सराहना की जाये तो यह न तो अतिश्योक्ति होगी और न इसे प्रशस्ति गान माना जाना चाहिए।

    शीतकालीन संसद सत्र में विपक्ष नोटबंदी को लेकर केन्द्र सरकार को घेरने के लिए एकजुटता का संदेश दे चुका है। बुद्धिजीवी भी चाहते है कि लोकतंत्र में विरोध हो और रचनात्मक विरोध और बहस से सिस्टम की कमियां दूर करनें मंे मदद मिलती है। लेकिन विरोध में भी संवेदना आवश्यक है। विपक्ष की आक्रामकता को देखते हुए जनता चकित है। लेकिन प्रधानमंत्री और एनडीए सरकार विपक्ष की लामबंदी पर हैरत में नहीं है। एनडीए ने कहा है कि उसकी नीति और नीयत साफ है। हर मुद्दे पर किसी भी दृष्टिकोण से बहस के लिए केन्द्र सरकार तैयार है। उसे खतरा इसलिए नहीं है कि क्योंकि वह बहुमत में है। इससे भी बड़ी बात यह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को आम आदमी के समर्थन का बल होने से उनका हौंसला बुलंद है।

  • भाजपा का मलाई खाने वाला कैडर

    भाजपा का मलाई खाने वाला कैडर

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    भारतीय जनता पार्टी को उसके कैडर के लिए जाना जाता रहा है। कांग्रेस के धराशायी होने की वजह भीउस पार्टी का कैडर ही रहा। जिस पार्टी का कैडर भ्रष्ट नेताओं और सुविधाभोगी अय्याशों से भर जाए उसे विदा करने में जनता जरा भी देरी नहीं करती। कांग्रेस इसका जीता जागता सबूत है। ये जानते बूझते हुए भी पिछले कुछ सालों में मध्यप्रदेश की भारतीय जनता पार्टी ने कैडर के नाम पर केवल चुनाव जीतने और जिताने वाले लोगों को ही तवज्जो दी है। पार्टी कैडर मेंशीर्ष के आसपास इसी तरह के कार्यकर्ताओं और नेताओं का जमघट हो गया है जो कांग्रेसियों के तमाम हथकंडों को अपनाकर चुनावी विजय का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं। इसमें पार्टी को सफलता भी मिल रही है। हालिया उपचुनाव में पार्टी ने शहडोल और नेपानगर सीट पर विजय भी हासिल की। इस विजय को मोदी सरकार की नोटबंदी का लिटमस परीक्षण बताकर प्रचारित किया जा रहा है। लेकिन हकीकत इसके विपरीत है। आठ तारीख को जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पुराने बड़े नोटों के बंद करने की घोषणा की तबसे भारतीय जनता पार्टी को मानों सांप सूंघ गया है। कांग्रेसियों की बैचेनी की बात करने का तो कोई औचित्य है ही नहीं। भाजपा का प्रदेश नेतृत्व हो या राज्य सरकार दोनों इस मुद्दे पर तभी से चुप्पी साधे हुए हैं। भाजपा के राज्य नेतृत्व ने एक भी बयान अब तक जारी नहीं किया जिसमें कार्यकर्ताओं को नोटबंदी के कारण आ रही परेशानियों से निपटने में जनता के साथ खड़े होने के निर्देश दिए गए हों। जो पार्टी हर चुनाव के दौरान दम भरती हो कि हम बूथ लेवल मैनेजमेंट पर सबसे ज्यादा जोर देते हैं वह पार्टी अपने राष्ट्रीय नेता के क्रांतिकारी फैसले पर आखिर क्यों खामोश खड़ी है। किसका चेहरा देखकर पार्टी ने इस मुद्दे पर चुप्पी साधे रखने का फैसला लिया। क्या पार्टी का लक्ष्य केवल वोट लेना और सत्ता का आनंद लेना भर है। भाजपा के संवाद केन्द्र से जारी प्रेस नोट में युवा मोर्चा के किसी आयोजन का उल्लेख छोड़ दें जिसमें बैंकों में हेल्प डेस्क अभियान चलाने की बात कही गई हो लेकिन पार्टी के स्तर पर न तो कोई आपातकालीन बैठक बुलाई गई और न ही हालात से निपटने की कोई रणनीति बनाई गई। मध्यप्रदेश की भारतीय जनता पार्टी के संगठन को स्व. कुशाभाऊ ठाकरे जैसे जीवट व्यक्तित्व के कारण पूरे देश में गंभीरता से याद किया जाता रहा है। आज इस पार्टी में ऐसा क्या हो गया कि नोट बंदी जैसे जनहितकारी फैसले पर वह चुप्पी साधे बैठी है। मध्यप्रदेश की शिवराज सिहं चौहान सरकार को समाज के सभी वर्गों के लिए नीतियां बनाने के कारण खासी लोकप्रियता हासिल है। जनता ने उसे तीन तीन बार सत्ता सौंपी और प्रदेश के विकास का मौका दिया लेकिन इसके बावजूद सरकार ने नोटबंदी को सफल बनाने के लिए कोई अभियान नहीं चलाया। नोटबंदी की घोषणा के अठारह दिन बीत जाने के बाद भी जब अखबारों में जनता की परेशानियों की खबरें छपना बंद नहीं हुईं तो हाईकमान के निर्देश के बाद सरकार ने आनन फानन में कुछेक अखबारों को एक विज्ञापन जारी किया जिसमें वही बातें दुहराई गईं हैं जो भारत सरकार की ओर से जारी विज्ञापनों में कही जाती रहीं हैं। सरकार समर्थक एक बड़े समाचार पत्र ने तो अपने संपादकीय में नोटबंदी को मोदी का व्यक्तिगत फैसला बताकर इसका खुला विरोध भी किया। वास्तव में सरकार में बैठे महत्वपूर्ण लोगों और भ्रष्ट व्यापारियों के बीच इस तरह का गठजोड़ बन गया है कि वो किसी भी नवाचार को स्वीकार करने तैयार नहीं है। सार्वजनिक धन का अपवंचन करने के लिए इस गठजोड़ ने कई फार्मूले अपना लिए हैं। विकास के नारे लगाना इसमें सबसे उल्लेखनीय है। एक सामान्य सा अर्थशास्त्री भी समझ सकता है कि सत्ता से जुड़े शोषकों के गिरोहों ने विकास योजनाओं का जो धन चोर दरवाजे से अपने पास जुटा लिया उसे वापस लाने के लिए ही नोटबंदी की गई है। पर मध्यप्रदेश में तो सरकार फैसले के बाद से ही लकवा ग्रस्त नजर आ रही है।जिस फैसले को जनता का व्यापक समर्थन मिल रहा हो। भाजपा के पारंपरिक विरोधी वोट बैंक ने भी इस कदम को अच्छा फैसला बताया है। इसके बावजूद सरकार ऊहापोह की स्थिति से बाहर नहीं निकल पा रही है।जिस फैसले को जनता हाथों हाथलेकर चल रही है प्रदेश सरकार इस दौरान जनता से साथ हाथ बंटाने खड़ी नहीं हो पा रही है।क्या इसे भारतीय जनता पार्टी के भीतर आपसी प्रतिद्वंदिता की लड़ाई समझा जाए। पार्टी के नेताओं से ये सवाल पूछा जाना चाहिए कि क्या पार्टी का कैडर केवल मलाई खाने के लिए ही संयोजित किया गया है। क्या मध्यप्रदेश की भारतीय जनता पार्टी सरकार काला धन बनाने वाले व्यापारियों, अफसरों और राजनेताओं के साथ है। जनता की समस्याओं से उसे कोई वास्ता नहीं।

  • कर्ज से गुलछर्रे उड़ाने वालों की दहशत

    कर्ज से गुलछर्रे उड़ाने वालों की दहशत

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    देश में विमुद्रीकरण की आंधी ने जनता के नाम पर कर्ज लेकर गुलछर्रे उड़ाने वाले तथाकथित उद्योगपतियों की नींदें उड़ा दी हैं। विकास योजनाओं के नाम पर कर्ज लेने वाले और गुल्ली करने वाले राजनेताओं की भी जान सांसत में है। उन्होंने विकास योजनाओं पर लिए साफ्ट लोन की राशि को गुल्ली कर लिया था।ये धन उन्होंने मंहगी ब्याज दरों पर भूमाफिया, बिल्डरों, उद्योगपतियों को उपलब्ध करा रखा था ।अबउसे ताबड़तोड़ ढंग से वापस जमा करने की चुनौती ने उनकी नींदें उड़ा दी हैं। नतीजा ये है कि नेताओं और उद्योगपतियों के इस गठजोड़ ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर निशाना लगाना शुरु कर दिया है। आज मध्यप्रदेश के एक अखबार ने संपादकीय लिखा है जिसमें कहा गया है कि सरकार लोगों को नहींसमझा पाई है कि उसने जनता की गाढ़ी कमाई और महिलाओं के बचाकर रखे गए धन को हलक में हाथ डालकर निकाल लिया है वह लोगों के विकास में ही उपयोग की जाएगी। इस तरह की हल्की बातों को कहकर ये गैर जिम्मेदार अखबार विमुद्रीकरण के फैसले के खिलाफ जनमत तैयार करने का काम कर रहा है। ये अखबार ये भी कह रहा है कि विमुद्रीकरण का फैसला केवल और केवल प्रधानमंत्री मोदी ने लिया है। ये बात सही है कि विमुद्रीकरण का फैसला लिए जाते समय पूरी गोपनीयत बरती गई थी। लेकिन ये फैसला सुविचारित ढंग से देश के जिम्मेदार लोगों ने लिया है। सेना के तीनों अध्यक्षों को इसके लिए विश्वास में लिया गया। रिजर्व बैंक के अफसरों, वित्तीय सलाहकारों, और उन तमाम लोगों को भरोसे में लिया गया जो देश की नीति निर्धारण में बड़ी भूमिका निभाते हैं। इसके बावजूद बौखलाए सूदखोर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ जनमत जगाने में जुट गए हैं। उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि उन्होंने वैश्विक मुद्राकोषों से लिए गए जिस साफ्टलोन को मंहगी ब्याजदरों पर बाजार में चला रखा था उसे वे समयसीमा के भीतर वापस कैसे जमा करा सकेंगे। यदि उन्होंने ये धन घोषित नहीं किया तो वह मिट्टी हो जाएगा, और यदि घोषित करते हैं तो जेल जाने के हकदार होंगे। शायद इसीलिए वे जनता की परेशानियों का हवाला देकर तरह तरह की खबरें अखबारों में छपवा रहे हैं। उन घटनाओं को खबर बनाया जा रहा है जिसमें लोग बैक की लाईनों में खड़े होकर अपनी कमजोरियों के कारण बेहोश हो गए या उनकी मौत हो गई। ये सब माहौल वे बना रहे हैं जिन्हें जनता का धन हड़प करने के कारण अपनी मौत करीब नजर आ रही है। खुद भारतीय जनता पार्टी के नेता इस फैसले से अचंभित हैं। उन्हें लग रहा है कि ये फैसला उनकी मौत की वजह बनने जा रहा है। अब तक विकास के नाम पर भाजपा की सरकारों ने भी कांग्रेस की सरकारों की ही तरह भारी कर्ज ले रखा था। इस धन को उन्होंने फर्जी कंपनियों के माध्यम से शेयर मार्केट में भी लगा ऱखा था। जमीनों के भाव अनाप शनाप बढ़ाकर उन्होंने रियल स्टेट सेक्टर में भी भारी निवेश कर ऱखा था। मकानों की जमाखोरी को बढ़ावा देकर वे उस साफ्टलोन से करोड़ों रुपए उलीच रहे थे। सरकार के इस एक फैसले ने उनकी तमाम अय्याशियों को धरातल पर ला दिया है। इसलिए वे ऊपरी तौर से तो भले ही प्रधानमंत्री मोदी की तारीफ कर रहे हैं लेकिन छिपकर वे भारत सरकार पर भी प्रहार करने से बाज नहीं आ रहे हैं। वे भूल गए हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हमेशा से भारतीय अर्थव्यवस्था को नई कसावट देने का पक्षधर रहा है। भाजपा और आरएसएस के चिंतकों का एक बड़ा वर्ग नोटों से महात्मा गांधी की फोटो हटाने के पक्षधर रहे हैं। सच भी तो है महात्मा गांधी अपरिग्रह के पक्षधर थे और वे पूंजी के अधिक उपयोग के विरोधी थे। गांधीवाद वास्तव में पूंजी के विरोध पर टिका था जबकि पूंजीवाद लोगों की भौतिक आवश्यकताओं को पूरा करके सुलझे समाज के निर्माण की बात करता है। ये दोनों विचार परस्पर विरोधी हैं इसलिए अब गांधी को विसर्जित करने का समय आ गया है। महात्मा गांधी को मुख्य धारा से हटाए बगैर हम सुखी समाज के निर्माण का अपना लक्ष्य नहीं पा सकते हैं। अब जबकि भारत ने पूंजीवाद के रास्ते पर पच्चीस सालों तक चलने के बाद ठोस फैसले लेकर पूंजीवाद को सफल बनाने की रणनीति पर काम शुरु कर दिया है तब ये सूदखोरों की लाबी इस फैसले की आलोचना में जुट गई है। वास्तव में विमुद्रीकरण का फैसला जनता के लिए जितना परेशान नहीं कर रहा उतना ये भ्रष्टाचारियों और शोषकों सिर पर लटकी तलवार साबित हो रहा है।प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आलोचना सिर्फ एक बात पर की जा सकती है कि वे नए नोटों को गांधी से मुक्ति नहीं दिला सके हैं। शायद उन्होंने पूंजी को मजबूती देने के लिए अभी गांधी से पंगा लेने से बचने की रणनीति अपनाई है। इसके बावजूद विमुद्रीकरण जिस तरह देश की मुद्रा को मजबूती देने मे मील का पत्थर साबित होने वाला है उससे गरीबों के नाम पर शोषण का दुष्चक्र चलाने वालों की नींदें तो उड़ गई हैं। जनता को उसके अपने हित की रक्षा में लड़ रही इस सरकार के हाथ मजबूत करने के लिए आगे आना होगा। प्रधानमंत्री ने वाकई बड़ा पंगा लिया है और हमें समझना होगा कि राष्ट्रभक्ति के इस अनुष्ठान में आगे बढ़कर अपना योगदान देेने का सही वक्त आ गया है।

  • प्रधानमंत्री श्री मोदी ने आचार्य विद्यासागर महाराज से आशीर्वाद लिया

    प्रधानमंत्री श्री मोदी ने आचार्य विद्यासागर महाराज से आशीर्वाद लिया

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    भोपाल 14अक्टूबर(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)।

    प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने अपने भोपाल प्रवास के दौरान हबीबगंज जैन मंदिर में चातुर्मास कर रहे जैन संत श्री आचार्य विद्यासागर जी महाराज से भेंटकर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने आचार्य विद्यासागर महाराज का पाद-प्रक्षालन किया और उन्हें श्रीफल भेंट किया।

    प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने आचार्य विद्यासागर जी महाराज द्वारा रचित पुस्तक ‘मूक माटी’ के गुजराती संस्करण का विमोचन भी किया। इस मौके पर मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान, रक्षा मंत्री श्री मनोहर पर्रिकर, वित्त मंत्री श्री जयंत मलैया एवं चिकित्सा शिक्षा राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री शरद जैन उपस्थित थे।

  • खाट लुटे या बैंक, सलामत रहे वोट बैंक

    खाट लुटे या बैंक, सलामत रहे वोट बैंक

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    फार्मूलों के दम पर राज करती रही कांग्रेस ने एक नया जुमला उछाला है। कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी कह रहे हैं कि गरीब खाट ले गए तो भाजपा उन्हें चोर बता रही है और विजय माल्या करोड़ों रुपए लेकर भाग गया तो उसे डिफाल्टर बता रही है। कहा जाता है कि एक झूठ सौ बार बोलो तो वह सच की तरह असरकारी बन जाता है। कुछ इसी तरह कांदा कांदा, प्याज प्याज चिल्लाकर भी कांग्रेस सत्ता पर सवारी कर चुकी है। इस बार उसे उम्मीद है कि उसकी सत्ता खाट से होकर गुजरेगी।

    देवरिया में कांग्रेस ने जो खाट पंचायत बुलाई उसका मास्टर माईंड पीके यानि प्रशांत किशोर को बताया जा रहा है। पीके चुनावी राजनीति के सफल खिलाड़ी बताए जाते हैं। वे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए भी मार्केटिंग कर चुके हैं। इस बार कांग्रेस को उम्मीद है कि वे यूपी के चुनाव में अपने लेखकीय जौहर का जलवा जरूर दिखाएंगे। भारत में लोकतंत्र है और सपने देखने का सभी को हक है। कांग्रेस ने आजादी के सत्तर सालों में गरीब की दुहाई देकर जो धन संपदा जुटाई है वह अरबों रुपयों की है। नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक कांग्रेस ने सरकारी योजनाओं से जुटाए धन को दुनिया के कई मुल्कों में निवेश किया है। विदेशी धन और कालाधन चिल्ला चिल्लाकर उसे वापस लाने का दावा करती रही भाजपा अब लगभग हताश नजर आ रही है। क्योंकि वह इस कथित काले धन को देश में वापस नहीं ला पाई है। भाजपा का उपहास उड़ाते कांग्रेसी कहते रहे हैं कि मोदी हर वोटर के खाते में पंद्रह लाख रुपए लाने का वादा करते रहे हैं। जबकि हकीकत ये है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कभी ऐसा कोई दावा किया ही नहीं। चुनाव के दौरान उन्होंने ये जरूर कहा था कि देश का काला धन ….यदि…. वापस आ जाए तो हर नागरिक को पंद्रह लाख रुपए तक मिल सकते हैं। बात को छीलकर मोदी के मुंह में घुसेड़ने का कांग्रेस का अभियान अब तक तो सफल नहीं हो पाया है। कांग्रेसी जरूर कुतर्क देते मिल जाएंगे कि मोदी अपना वादा नहीं निभा सके लेकिन देश का होशियार मतदाता कांग्रेस के इन कुतर्कों को अच्छी तरह समझ चुका है। इंटरनेट पर प्रधानमंत्री मोदी का मूल भाषण आज भी उपलब्ध है जिसे देखसुनकर कांग्रेस के षड़यंत्र को आसानी से समझा जा सकता है।यही वजह है कि कांग्रेस की खटिया लुटने पर देश के लोगों ने राहुल गांधी का ही उपहास उड़ाया है। वे जितनी बार इसके बारे में कुतर्क दे रहे हैं उनकी पार्टी की कलई उतनी ही ज्यादा उतरती जा रही है।

    पीके की इसी तरह की सलाहें यदि जारी रहें तो कोई आश्चर्य नहीं कि यूपी में कांग्रेस गिनती की सीटें भी नहीं पा सकेगी। दरअसल प्रचार माध्यमों की एक सीमा होती है। वे आपकी छवि निखार तो सकते हैं लेकिन उसके लिए जमीनी धरातल और सच्चाई भी होना जरूरी है। कांग्रेस जब अपने सबसे बुरे दौर में गुजर रही है और बार बार शंका की जा रही है कि कांग्रेस अब मर चुकी है तब उसका प्रचार करना वाकई टेढ़ी खीर है। इस लिहाज से कहा जा सकता है कि पहली बार प्रशांत किशोर यूपी में असफल होंगे और बुरी तरह पिटकर बाहर कर दिए जाएंगे। वे जो तर्क गढ़ने का प्रयास कर रहे हैं वह देश की नई पीढ़ी के सामने महज शिगूफा बनकर सामने आ रहे हैं। अब ये कौन नहीं जानता कि विजय माल्या कांग्रेस की अवैध संतान रहे हैं। ये बात सही है कि कांग्रेस की लुटिया डूबते देख माल्या ने भाजपा का दामन पकड़ लिया था। चुनावी दौर में धन की अनिवार्यता को देखते हुए भाजपा ने उसे अपना भी लिया था लेकिन जब उसकी पोल खुली तो भाजपा ने उसके खिलाफ कार्रवाई करने में कोई कसर भी नहीं छोड़ी।

    देश को अच्छी तरह मालूम है कि बैंकों का राष्ट्रीयकरण इंदिरा गांधी की पहल पर हुआ था। तब लंबे चौड़े दावे किए गए थे कि ये सरकारी बैंक देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती देंगे। लेकिन धीरे धीरे ये बैंक लूट लिए गए। उद्योग लगाने के नाम पर कांग्रेसियों ने लोन फायनेंस कराए। ये लोन डूबने ही थे क्योंकि उन्हें केवल बैलेंसशीट पर ही चलने वाले उद्योगों के लिए फायनेंस कराया गया था। माल्या जैसे हजारों उद्योगपतियों ने बैंकों को खाली कर दिया। इसमें सरकारी क्षेत्र के बैंकों के अफसरों की साफ मिली भगत थी। उन्होने अपने प्रमोशन सुनिश्चित करने के लिए नेताओं के निर्देशों का पालन किया और देश की पूंजी को फोकटियों के हवाले कर दिया। नतीजा सामने है। आज देश के सामने पूंजी का संकट है।रुपया ब्रिटेन के पाऊंड की तुलना में 95 गुना भिखारी है। डालर की तुलना में लगभग सत्तर गुना विपन्न है। इसकी वजह यही है कि माल्या जैसे उद्योगपतियों ने डिफाल्टर बनकर ब्रिटेन में शरण ले ली और भारत का पंगु कानून उनका कुछ नहीं बिगाड़ सका। अब गरीबी की दुहाई देने वाला कांग्रेस का राजकुमार कह रहा है कि भाजपाई खटिया ले जाने वालों को लुटेरा बता रहे हैं। ये झूठ इतने पुख्ता अंदाज में बोला जा रहा है और इसे लूट पोषित मीडिया इतनी सफाई से प्रचारित कर रहा है मानों भाजपा किसानों को खटिया लुटेरा ठहरा रही है। जबकि हकीकत ये है कि आजादी के सत्तर सालों बाद भी देश के लोगों की हैसियत इतनी खराब है कि वे खटिया जैसी सस्ती वस्तु को भी मौका मिलने पर उठा ले जाते हैं। यदि उनकी जेबें भरी होतीं तो वे खटिया तो क्या पलंग को भी हाथ नहीं लगाते।

    यही कांग्रेस की कीमियागिरी है कि वह देश के आम लोगों को चोर बनाती है और फिर बड़ी सफाई से उसका लांछन अपने विरोधियों पर मढ़ देती है।देश की नई पीढ़ी से उम्मीद की जा सकती है कि वह कांग्रेस के इस गोरखधंधे को समझ सकेगी । यूपी की अखिलेश यादव सरकार इस झूठ का पर्दाफाश कर सकेगी इसमें संशय है। क्योंकि वह सरकार बसपा की महारानी मायावती के लूट के धन को बचाने के फेर में कदम पीछे खींच लेने के कारण सत्ता में आई थी। यूपी का चुनावी रण कांग्रेस, बसपा और सपा की धमाचौकड़ी के कारण दलदली हो गया है। इसके बीच भाजपा अपना वोटबैंक सहेजने में सफल रही है। इसके बावजूद जो निर्णयकारी मतदाता हैं उनकी खेती करने में भाजपा असफल हो रही है। उसके पास कोई ऐसा प्रभावी नेतृत्व नहीं जो इन फ्लोटिंग मतदाताओं को अपने पक्ष में खड़ा कर सके। इसकी तुलना में राहुल गांधी और शीला दीक्षित दोनों दमदारी से मैदान पर उतर खड़े हुए हैं। यही कारण है कि यूपी का माहौल कांग्रेस की अकूत धनसंपदा और रणनीति के चलते गरमा गया है।

  • दलितों को कांग्रेस ने वोट समझाः लालसिंह

    दलितों को कांग्रेस ने वोट समझाः लालसिंह

    लाल सिंह आर्यःदलितों को केवल वोट बैंक समझती रही कांग्रेस।
    लाल सिंह आर्यःदलितों को केवल वोट बैंक समझती रही कांग्रेस।

    भोपाल। कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री श्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को दलितों पर अत्याचार और उपेक्षा के मामले में या तो इतिहास का ज्ञान नहीं है, या फिर वे देश की जनता को अज्ञानी समझते हैं। सच तो यह है कि लगभग 6 दशक तक देश में एक छत्र राज्य करने वाली कांग्रेस ने दलितों को कभी सम्मान से खड़े नहीं होने दिया। उसे सिर्फ वोट समझा, इंसान नहीं। इतना ही नहीं दलितों के सम्मान की अत्यंत शालीनता के साथ आवाज उठाने वाले और उन्हें संविधान के तहत अधिकार दिलाने वाले राष्ट्र नायक डॉ. भीमराव अंबेडकर को निरंतर अपमानित और उपेक्षित करने में कांग्रेस के पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू से लेकर डॉ. मनमोहन सिंह तक किसी ने कोई कसर नहीं छोड़ी।
    श्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के इस बयान पर कि ‘‘भारतीय जनता पार्टी दलित मुक्त भारत बनाने पर तुली है’’, भाजपा नेता एवं मंत्री श्री लालसिंह आर्य ने गंभीर आपत्ति व्यक्त करते हुए कहा है कि श्री सिंधिया के इन बेहुदे बयानों से इतिहास की सच्चाई को छिपाया नहीं जा सकता। श्री सिंधिया को यह पता होना चाहिए जबकि श्री अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार ने उन्हें भारत के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से अलंकृत किया। दलित समाज के प्रणेता और मार्गदर्शक डॉ. भीमराव अंबेडकर को नीचा दिखाने के लिए पं. जवाहरलाल नेहरू के समय से ही बिसात बिछा दी गई थी। वे अपनी जानकारी दुरूस्त कर लें कि जब डॉ. अंबेडकर मुंबई से 1952 में चुनाव लड़े, तब पं. नेहरू ने उन्हें चुनाव हराने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाया। डॉ. अंबेडकर को जीवनभर इस बात की टीस रही। कांग्रेस के पास इस बात का भी कोई जवाब नहीं है कि डॉ. अंबेडकर दिल्ली के जिस किराए के मकान में रहे, उस मकान को उपेक्षित करके रखा गया और जब देश में श्री अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार बनी, तब अटल जी ने उस मकान से अपना भावनात्मक संबंध स्थापित करते हुए 16 करोड़ में न सिर्फ उसे खरीदा, बल्कि हाल ही में वर्तमान भाजपा सरकार के मुखिया श्री नरेंद्र मोदी ने 100 करोड़ रू. से 26, अलीपुर रोड स्थित इस मकान को संविधान की शक्ल में एक भव्य स्मारक बनाने की घोषणा की है। मध्यप्रदेश में लगभग 43 साल कांग्रेस की सरकार रही है, लेकिन जहां भारत के लाल डॉ. अंबेडकर पैदा हुए उस महू कस्बे को उपेक्षित रखा गया और उनके जन्म स्थान को सम्मान देने का कोई जतन नहीं किया गया। हमें इस बात पर गर्व है कि भारतीय जनता पार्टी की श्री शिवराज सिंह के नेतृत्व वाली सरकार ने बाबा साहब की जन्मभूमि का शत्-शत् नमन करते हुए राष्ट्र को एक स्मारक समर्पित किया है। श्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को शायद यह भी जानकारी नहीं है कि बाबा साहब की दीक्षा भूमि जो नागपुर में है, उसे भाजपा शिवसेना की सरकार ने राष्ट्रीय स्मारक की सूरत दी। भाजपा के वरिष्ठ नेता श्री नितिन गडकरी के इस प्रयास को देश सदैव याद रखेगा। श्री सिंधिया को इस बात का भी अध्ययन करना चाहिए कि संविधान के निर्माता का अंतिम संस्कार मुंबई में जिस स्थान पर किया गया था, उस इंदुमिल की जमीन पर श्री गोपीनाथ मुंडे के प्रयास से स्मृतियां संजोई गईं हैं और हाल ही में श्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने इंदुमिल की जमीन बाबा साहब के अंतिम संस्कार स्थल पर स्मारक बनाने और समाज निर्माण के अन्य प्रकल्प चलाने के लिए आवंटित कर दी है। श्री ज्योतिरादित्य सिंधिया अपनी छुट्टियां बिताने विदेश तो खूब जाते हैं, शायद वह लंदन भी गये होंगे, लेकिन उन्हें यह जानने की फुरसत नहीं मिली कि लंदन में जिस स्थान पर बाबा साहब अंबेडकर ने अपनी उच्च शिक्षा प्राप्त की, उस स्थान को महाराष्ट्र की भाजपा शिवसेना सरकार ने राष्ट्रीय संपत्ति घोषित किया है। सरकार बाबा साहब के नाम पर एक बड़ा शोध केंद्र बनाने पर भी काम कर रही है।
    श्री लालसिंह आर्य ने कहा है कि श्री सिंधिया भाजपा पर आरोप लगाने से पहले अपने जमीर में झांक कर देखें कि अंबेडकर जी के जन्मदिन पर राष्ट्रीय अवकाश की घोषणा किसने की ? संसद के सेंट्रल हाल में दशकों की प्रतीक्षा के बाद बाबा साहब का तैल चित्र किसके प्रयासों से लग सका? श्री सिंधिया को इस बात का जवाब शायद कभी न सूझ सके कि जिस दिन डॉ. मनमोहन सिंह की घोटालेबाज कांग्रेस सरकार विदा हो रही थी उस दिन भी देश में 80 करोड़ गरीब बचे थे। यह किसी को बताने की आवश्यकता नहीं हैं कि देश में गरीबों की कुल आबादी में दलितों और वंचितों का हिस्सा कितना अधिक है। कांग्रेस को जवाब देना पड़ेगा कि 60 साल तक आप गरीबी हटाओ का नारा देते रहे और निरंतर गरीब और दलित राष्ट्र की मुख्य धारा से दूर होते रहे, इसके कारण क्या हैं? श्री सिंधिया की मजबूरी हम समझ सकते हैं कि वे आज अपनी ही पार्टी में कुछ ऐसे लोगांे के रहमोकरम पर अपना राजनैतिक अस्तित्व बनाये हुए हैं, जिनकी कार्य प्रणाली इस राष्ट्र के लिए समझ से परे है। अपने आकाओं को खुश करने के लिए जब श्री सिंधिया जेएनयू में राष्ट्र विरोधी नारे लगाने वालो को राष्ट्र द्रोही मानने से इंकार कर सकते हैं, वे कश्मीर मामले पर अत्यंत असहनीय बयान दे सकते हैं, तो उनसे यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वह समाज के वंचित वर्ग की भावनाओं को आहत नहीं करेंगे। भारतीय जनता पार्टी को श्री सिंधिया जैसे नेताओं से किसी सर्टिफिकेट की आवश्यकता नहीं है। वे यदि दलितों और वंचितों का दर्द समझते तो आज देश की तस्वीर कुछ और होती। इन नेताओं की तखलीफ यह है कि देश में पहली बार एक गरीब का बेटा प्रधानमंत्री बना है और उसने समाज के सभी वर्गों के लिए समानता के आधार पर विकास के द्वार खोल दिये हैं। कांग्रेस को यह बात समझ में आ रही है कि जब देश खुशहाल हो जायगा, तो किसी भी वर्ग को वोट के लिए बरगलाया नही जा सकेगा। ऐसे में बेचारी कांग्रेस कभी सत्ता में लौटेगी कैसे? अनुसूचित जाति-जनजाति अब किसी का वोट बैंक बनने को तैयार नहीं हैं। दलित वर्ग को पता है कि कांग्रेस ने सदैव से उसके साथ उत्थान के नाम पर षड़यंत्र किए हैं, लेकिन कांग्रेस के षड़यंत्रों को समापन की ओर ले जाने के लिए आज के जागरूक दलित समाज ने कमर कस ली है।

  • फिर सदन में कौन बोलेगा

    फिर सदन में कौन बोलेगा

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    कड़वे प्रवचन सुनाने वाले संत तरुण सागर जी के विचारों से असहमति जताई जा सकती है। शायद ये समझ बूझकर ही तरुण सागर जी अपने विचारों को कड़वे प्रवचन कहते रहे हैं। देश भर में बुखार आने पर कहा जाता है कड़ुए भेषज पिए बिन मिटे न तन को ताप । जाहिर है वैचारिक बुखार को दूर करने के लिए कड़वे विचारों की ही औषधि असरकारी हो सकती है। यही सोच समझकर हरियाणा की मनोहर लाल खट्टर सरकार ने इसके लिए सदन का विशेष सत्र भी बुला डाला। यही नहीं राजदंड की ऊंचाई पर बिठाकर तरुण सागर जी से कड़वे प्रवचन भी करने का निवेदन कर डाला। इस गरिमापूर्ण फैसले के लिए हरियाणा की विधानसभा की जितनी प्रशंसा की जाए कम है। इससे इतना तो साबित हो गया है कि खट्टर सरकार समस्याओं का समाधान करने के लिए पूरी तरह संकल्पित है।

    तरुण सागर जी बरसों से अपने प्रवचनों में कहते रहे हैं कि दुनिया के सदनों में सबसे खतरनाक लोग बैठते हैं। वे कहते हैं कि यदि सत्ता के इन सिंहासनों पर बैठने वालों की गलती ये है कि उन्हें कोई बताता नहीं कि वे कैसे जनता के दिलों पर राज कर सकते हैं। सत्ता के मद में डूबे ये सत्ताधीश गरीब और कमजोर लोगों को कुचलने को ही शासन करना समझ बैठते हैं। अब इस विचार में क्या बुराई है। क्या हमारे राजनेता अपनी जिद पूरी करने के लिए जनता की नीतियों का मुंह अपने निजी खजाने के हित में नहीं मोड़ देते हैं। यदि ऐसा न होता तो आज आजादी के सत्तर सालों बाद तक हम देश के आम नागरिकों की मूलभूत जरूरतें तक क्यों नहीं मुहैया करा पाए हैं। चांद सूरज तक की दूरियां तय करने में सफल होने के बावजूद हम देश की अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति को सुखी जीवन क्यों नहीं मुहैया करा पा रहे हैं। वे कौन सी बाधाएं हैं जो हमारे राजनेताओं, अफसरों और न्यायाधीशों को अपना कर्तव्य पूरा करने से रोकती हैं। क्या इन मुद्दों पर चिंतन नहीं होना चाहिए। पर ये करे कौन। सत्ता की सवारी करने वालों को तो बस अपनी सफलताओं का लक्ष्य दिखता है। फिर पिछड़ गए लाचार की बात कौन करेगा।

    सत्ता पर काबिज होने की होड़ इतनी खतरनाक है कि अच्छे से अच्छा राजनेता बुराईयों को देखने और उसे दूर करने की जुर्रत नहीं कर पाता है। वो तभी तक राजनेता है जब तक लोग उसे चुनते रहते हैं। जिस दिन उसे वोट मिलना बंद हुआ उसी दिन वो कचरे के डिब्बे में पहुंचा दिया जाता है। अब इन हालात में बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे। तरुण सागर जी बरसों से देश के गली कूंचों में घूम फिरकर बोलते रहे हैं कि यदि सत्ता के सर्वोच्च सदन सुधर जाएं तो देश के हालात बदले जा सकते हैं। सरकारों को उनकी ये आवाज बहुत पहले सुन लेनी चाहिए थी। इस आवाज को सत्ता का संदेश भी बना दिया जाना था। ये इसलिए न हो पाया क्योंकि देश की जनता कांग्रेस को आजादी दिलाने वाली पार्टी मानती रही है। वो कांग्रेस को ही सत्ता में भेजती रही। कांग्रेस की सरकारें अंग्रेजों की कृपा पर इतनी ज्यादा निर्भर रहीं हैं कि वे देश की आवाज को सदन के पटल तक पहुंचने ही नहीं देती थीं। ज्यादातर समय देश में एक पक्षीय शासन ही चलता रहा। सरकार को जनता के लिए जो नीतियां पसंद थीं वही लागू की जाती रहीं। सत्ता में जनता की भागीदारी उतनी ही रही जितने से लोकतंत्र की छवि बनी रहे। जनता बरसों से इस समस्या को समझती रही है।

    तरुण सागर जी जैसे कई संत बरसों से समाज की आवाज बोलते रहे हैं और समय के साथ विदा होते रहे हैं। तरुण सागर जी कोई पहले आदमी नहीं जिन्होंने सामाजिक समस्याओं के लिए सदनों तक पहुंचने वालो को जिम्मेदार बताया हो। शायद कांग्रेस की सरकारों में इस सच को स्वीकार करने का साहस ही नहीं रहा। निराशा का दौर झेलती रही देश की जनता ने बरसों बाद अंत्योदय की बात कहने वाली भाजपा को देश की बागडोर सौंपी है। इसी वजह से सत्ता के सिंहासनों पर जनता की आवाज सुनाई देने लगी है। मनोहर लाल खट्टर सरकार ने लीक से हटकर देश विदेश में गूंजती एक आवाज को सत्ता की आवाज बनाने का साहसिक कारनामा कर दिखाया है। देश के राजनेताओं और जनता ने भी इस आवाज को सकारात्मक तौर पर लिया है। आखिर राजनेता भी तो जनता के बीच से ही आते हैं। वे भी जनता के दर्द को समझते हैं। उनकी मजबूरी ये होती है कि सत्ता को ताकत देने वालों का लालच उन्हें धकेलकर आगे कर देता है और उसकी आड़ में अपने गोरखधंधे भी खोल देता है। इसलिए हरियाणा सरकार ने सत्ता के पर्दे की आड़ में पलने वाले लालची लोगों को स्पष्ट संदेश दिया है।

    गौरव की बात ये है कि देश के किसी सत्ताधीश ने इस फैसले की बुराई नहीं की है। बुरा तो उन्हें लग रहा है जो सत्ता के नाम पर घोटालों का जंजाल फैलाए रहते हैं। थोड़ा थोड़ा दान और खुद का महाकल्याण जिनका सूत्र वाक्य होता है. वे भी तरुण सागर जी की बात को गलत तो नहीं ठहरा सकते इसलिए उन्होंने कहना शुरु कर दिया कि प्रवचन गलत स्थान पर हो गए। वो स्थान चुने हुए प्रतिनिधियों का है। इसलिए उस स्थान का अतिक्रमण नहीं किया जाना चाहिए। भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ने का दावा करने वाली आप पार्टी के नेता विशाल दादलानी ने तो दिगंबर जैन संत पर ही मजाक छोड़ दिया। ये सभी वो लोग हैं जो सत्ता की आड़ में रबड़ी सूंतते रहे हैं।

    मध्यप्रदेश में दमोह तेंदूखेड़ा की माटी में पैदा हुए इस संत की प्रतिभा को मध्यप्रदेश सरकार पहले ही पहचान चुकी थी। इसलिए मध्यप्रदेश की विधानसभा में भी उनके प्रवचन कराए गए। इस बार उस आवाज को और बुलंद बनाने के लिए हरियाणा की सरकार ने जनता के अधिकृत मंच का उपयोग कर अपनी रचनाधर्मिता का परिचय दिया है। जो लोग कह रहे हैं कि तरुण सागर जी को जनता के दरबार का उपयोग नहीं करने देना था वे भूल जाते हैं कि ये पवित्र सदन जनता की आवाज को ही स्वर देने के लिए बनाए गए हैं। यही काम तो हरियाणा में हुआ। विरोध करने वाले क्या चाहते हैं कि नियमों, कानूनों और परंपराओं के बियाबान में जनता की आवाज को हमेशा कुचला जाता रहे। बच्चा बच्चा जानता है कि यदि राजनेताओं को मजबूर न किया जाए तो वे जनता के हितों की पैरवी जरूर कर सकते हैं। इसके बावजूद ताकतवर लोग जन प्रतिनिधियों को उनके लिए नियम कानून बनवाने में ही लगाए रखते हैं। विरोध की सुगबुगाहट लेकर रेंग रहे लोग तरुण सागर जी के उद्घाटित सच का विरोध करने की औकात तो रखते नहीं इसलिए वे उनके दिगंबर रूप और विधानसभा की परंपरा का तर्क देकर इस विचार को खारिज करने का षड़यंत्र कर रहे हैं। बेचारों को पता नहीं कि जनता की आवाज आंधी होती है जो राह में आने वाले दरख्तों, दीवारों को जमींदोज भी कर देती है।

  • जीएसटी एक क्रांतिकारी आर्थिक सुधार

    जीएसटी एक क्रांतिकारी आर्थिक सुधार

    bharatchandra nayak

    भरतचन्द्र नायक…..

    भारतीय संसद ने वस्तु एवं सेवा कर विधेयक (जीएसटी) पर अपनी मोहर लगाकर आर्थिक उदारीकरण के पश्चात् आजादी के बाद एक ऐतिहासिक आर्थिक सुधार किया है। यह वास्तव में भारतीय अर्थव्यवस्था में विकासोन्मुखी बदलाव लाकर गेम चेंजर सिद्ध होगा, जिसे चलतू भाषा में पाशा पलटना कहते है। इससे ‘वन इंडिया-वन मार्केट’ की कल्पना साकार होने के साथ ही घरेलू उत्पादन पर आयात की जो मार पड़ रही है, उससे भी मुक्ति मिलेगी। आर्थिक विश्लेषक छोटी कारें महंगी और विलासितापूर्ण मंहगी कारें सस्ती होने का जो फार्मूला बता रहे है, वह एक अंकगणितीय तथ्य अवश्य है, लेकिन सरकार की मंशा आम आमदी की दैनंदिन जीवन से जुड़ी वस्तुएं जीएसटी की परिधि से बाहर रखने से जीएसटी आम आदमी को उपभोक्ता सामान मंहगा पड़ने में चेक एंड बेलेंस का काम करेगी। कारों की कीमत के बारें में तो सीधी बात है कि जीएसटी की दर यदि 16 से 18 के बीच स्थिर होती है तो सस्ती कार पर लगने वाला 8 से 10 प्रतिशत का टैक्स बढ़ जायेगा और बड़े वाहनों पर 20 से 22 प्रतिशत टैक्स 18 प्रतिशत पर स्थित हो जायेगा। लेकिन इससे चुनिंदा खरीददार ही प्रभावित होंगे। आम आदमी प्रभावित होने वाला नहीं है। उदाहरण के तौर पर पिछड़ेपन से ग्रसित राज्य उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश उपभोक्ता राज्य है, इनकी अर्थव्यवस्था पर इससे अनुकूल असर पड़ेगा। उपभोक्ता राज्यों में कर संग्रह अधिक होगा। क्योंकि मौजूदा हाल में उपभोक्ता राज्य 20 से 30 प्रतिशत कर चुकाते है, वह घटकर 16 से 18 जो भी निर्धारित होगा रह जायेगा। कर का परिमाण निर्धारित करके का काम जीएसटी परिषद करेगी। जीएसटी के प्रभावी होने पर कराधान प्रशासन की मुश्किले आसान होने के साथ प्रामाणिकता और गुणवत्ता में अनुकूल बदलाव आयेगां जीएसटी की दोहरी माॅनीटरिंग, राज्य और केन्द्र द्वारा किये जाने पर जो चिंता जतायी जा रही है, वह निर्मूल साबित होगी। अलबत्ता, राज्य और केन्द्र के बीच एक स्वस्थ स्पर्धा आरंभ होगी।

    जीएसटी दर निर्धारित करते समय राजस्व संग्रह, टैक्स प्रशासन के सरलीकरण, टैक्स वसूली में प्रोत्साहन और मुद्रा स्फीति में वृद्धि न हो इस बात ऐहतियात बरता जाना है, जिससे भारत में लगने वाला जीएसटी अन्य देशों की तुलना में भारी न होकर न्याय संगत हो। सामाजिक दृष्टिकोण एवं आमजन की उपयोगिता को देखते हुए जीएसटी कव्हरेज में वस्तुओं को लाया जाना चाहिए। जीएसटी से मुक्ति वाले आइटमों का निर्धारण निहित स्वार्थ के बजाय सामाजिक उपयोगिता के आधार पर अपेक्षित होगा तथा गरीबों की आवश्यक वस्तुएं दायरें में आने से बरकायी जायेंगी। जीएसटी विधेयक को लोकसभा और राज्यसभा में पारित किये जाने में भारी विलंब हुआ है, लेकिन ‘अंत भला तो सब भला’। यह भारतीय लोकतंत्र की विजय है। न तो पूर्ववर्ती यूपीए सरकार को दोष दिया जाना चाहिए और न ही मौजूदा एनडीए सरकार को कठघरे में खड़ा किया जाना चाहिए। लेकिन इस विधेयक ने देश के राजनैतिक दलों को ‘सास भी कभी बहू थी’ की स्थिति से रूबरू जरूर करा दिया है। जो पहले विपक्ष में रहकर विरोध कर रहे थे, सत्ता में पहुंचनें के बाद जीएसटी के लाभ गिना रहे थे। जो प्रणव मुखर्जी और पी. चिदम्बरम पूर्व वित्त मंत्रियों की पेरोकारी पर मजाक उड़ा रहे थे, वे जीएसटी की प्रशस्ति करते दिखे और जो इसे ड्रीम सुधार बता रहे थे वही जीएसटी का मार्ग अवरूद्ध करते देखे गये। गोया देशहित में वक्त पर सुधार में सहमति की राय पर पार्टी हित भारी पड़ता जनता ने देखा और संसद के पावस सत्र में सहमति बनने पर वास्तविक प्रसन्नता व्यक्त की।

    मजे की बात यह है कि तमिल राजनीति जीएसटी के विरोध में थी। लेकिन उसने राष्ट्रहित में समर्थन देते हुए देखने के बजाय सदन से वाॅकआउट कर दिया, ‘सांप भी मर गया और लाठी भी नहीं टूटी’। यह भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता का एक नायाब सबूत है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संसद में जीएसटी विधेयक पारित होने पर सभी राजनैतिक दलों के सहयोग के लिए आभार व्यक्त करते हुए जो भरोसा सदन को दिया उसमें सबसे महत्वपूर्ण मंहगायी को 4 प्रतिशत पर स्थित करने का है, यह आम आदमी को प्रफुल्लित कर रहा है। जिस मंहगाई के सामने जाने-माने अर्थशास्त्री विश्व अर्थव्यवस्था की देन बता रहे थे उस पर काबू पाने में भारत की क्षमता वास्तव में सराहनीय मानी जायेगी। केन्द्रीय सरकार का दावा है कि आम आदमी, गरीब के इस्तेमाल की सभी वस्तुएं जीएसटी की परिधि में शामिल नहीं की जायेगी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जीएसटी को ‘ग्रेट स्टेप टूवर्ड ट्रांसफार्मेशन, स्टेप टूवर्ड ट्रांसपरेंसी, गे्रट स्टेप वाई टीम इंडिया’ घोषित करके राजनैतिक सहमति, राजनैतिक दलों के बीच सहयोगी संघवाद, टीम इंडिया की भावना को महिमा मंडित किया है। उपभोक्ता को बादशाह बताते हुए मोदी ने यह भी कहा कि इससे छोटे उत्पादक लाभांवित होंगे और उपभोक्ता को पारदर्शिता की गारंटी मिलेगी। सबसे बड़ी बात तो यह है कि इससे भारत की अर्थव्यवस्था को गति मिलने के साथ भारत दुनिया के कारोबारियों का स्वर्ग बन जायेगा। जब देश में फाईव-एम (मेन, मटेरियल, मशीन, मनी और मेथड) का अधिकतम उपयोग होगा, तब देश में रोजगार के अवसरों का स्वमेव सृजन होगा। एकीकृत कर लगने से राज्यों की आय बढ़ेगी, जिससे विकास का चक्र तेजी से घूमेगा और गरीबी उन्मूलन का अभियान तीव्र गति से आगे बढ़ेगा। आज हम कर वसूली में ही सारा समय गंवा रहे है। मालवाहक वाहन तीसों दिन अधिकांश समय बेरियरों पर खड़े रहकर समय गंवाते है और उनकी गति अवरूद्ध रहने से देश को क्षति होती है। उससे मुक्ति मिलने के साथ जो मेनपाॅवर नाकों पर तैनात रहकर जुगाड़ में लगा रहता है, उसे दीगर उत्पादनशील कार्यों में जुटाया जा सकेगा।

    गरीबों के काम आने वाली औषधियों को जीएसटी से बाहर रखने का केन्द्र का इरादा जनोन्मुखी सोच उजागर करता है। जीएसटी संग्रह में टेक्नाॅलोजी का भरपूर उपयोग होने से कारोबार में शुचिता सुनिश्चित करनें में मदद मिलेगी। देश में एनडीए सरकार ने सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू करके कर्मचारी-अधिकारियों की मुराद तो पूरी की है, अब उन्हें नयी कार्य संस्कृति का सबूत देना है। कामचोरी, भ्रष्टाचार देश की प्रगति में सबसे बड़ी बाधा है। जीएसटी जहां कर संग्रह के रूप में देश को प्रचुर धनराशि सुनिश्चित करेगी वहीं नया दिशा बोध भी विकसित करने मंे सहायक होगा। आर्थिक विश्लेषकों का दावा है कि जीएसटी व्यवस्था के तहत जीएसटी का संग्रह आपूर्तिकर्ता उत्पादकों और सेवा प्रदाता द्वारा कर का भुगतान प्रारंभिक बिन्दु पर किया जायेगा। इससे कर संग्रह की लागत कम होगी। जीएसटी प्रभावी होने के बाद जिस राज्य में सामान बेचा जायेगा, उसी राज्य को टैक्स मिलेगा। इससे मध्यप्रदेश जैसे उपभोक्ता राज्यों के पौ-बारह होंगे। मौजूदा अर्थव्यवस्था विकसित राज्यों के पक्ष में है। यह क्रम बदलेगा। गुजरात, महाराष्ट्र, दक्षिणी राज्य तमिलनाडू, कनार्टक जो औद्योगिक रूप से समृद्ध है, उन्हें होने वाला लाभ अब उपभोक्ता राज्यों को मिलने जा रहा है। उनकी तकदीर और तस्वीर बदलने जा रही है। असम राज्य ने संसद में विधेयक पारित होते ही विधानसभा में विधेयक पर मोहर लगा दी। मध्यप्रदेश ने भी 24 अगस्त को सदन का विशेष सत्र बुलाकर जीएसटी की उपयोगिता को रेखांकित कर दिया है। 30 दिन में कमोवेश 15 राज्य विधेयक पर मोहर लगा चुकेंगे। जिससे इसे राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलना आसान हो जायेगा। जीएसटी लागू होने पर निर्मित वस्तुओं के दामों में कमी होगी। लेकिन कितना आर्थिक लाभ होगा यह समय ही बतायेगा। जीएसटी लागू होते ही कई लागू कानून रद्द हो जायेंगे। यदि परिस्थिति ने राज्य को अतिरिक्त कराधान के लिए विवश किया तो राज्य को इसके लिए जीएसटी कौंसिल की शरण लेना पड़ेगी, जिसका सृजन होना फिलहाल शेष है।

    एमआरपी लूट का जरिया न बनें

    जीएसटी से करों के मकड़जाल में उलझे उद्योगों को राहत मिलेगी। खाद्यान्न, दलहन, शक्कर शून्य दर में रहने से राहत, प्र्रसंस्कृत वस्तुएं मंहगायी का शिकार बन सकती है। दस लाख रू. से कम टर्नओवर दायरे से बाहर होगा। लेकिन जोर का झटका धीरे से कालेधन पर अवश्य लगेगा। सर्राफा में संगठित क्षेत्र सरसब्ज होगा। पुराने स्वर्णाभूषण पर इनपुट कम होगा। जिन 53-54 वस्तुओं पर जीएसटी छूट होगी, उनमें तीन दर्जन से अधिक वस्तुओं के मूल्य कम होंगे। सवाल मौजू है कि एमआरपी अब तक लूट का जरिया बना है, इसका ऐसा फार्मूला तय हो कि उपभोक्ता जान सकें कि इसमें कितना मूल्य कच्चे माल का, कितना मूल्य उत्पादन व्यय और कितना मुनाफा शामिल है। इससे जीएसटी सार्थक होगा और पारदर्शिता सुनिश्चित होगी।

  • एजेंट कांग्रेस क्यों समझे मोदी का दर्द

    एजेंट कांग्रेस क्यों समझे मोदी का दर्द

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    भारत की कांग्रेस गणराज्य के विभिन्न समूहों का महासंघ रही है।उसका किसी विचारधारा से कोई लेना देना कभी नहीं रहा। जो जहां से आ गया उसे उसके नेता समेत मंच पर जगह मिल गई। भारत की आजादी के विचार के लिए ये वक्त की जरूरत थी। यही वजह थी कि अंग्रेजों को अपना उत्तराधिकारी चुनने में आसानी हो गई। जब 1857 की क्रांति असफल हो गई तो अंग्रेजों को ये अहसास हो गया था कि स्थानीय लोगों को सत्ता में भागीदार बनाए बगैर वह इतने विशाल देश पर शासन नहीं कर सकते हैं। इसीलिए ए.ओ.ह्यूम ने तत्कालीन वायसराय लार्ड डफरिन की सलाह से 1884 ईस्वी में इंडियन नेशनल यूनियन की स्थापना की थी। डफरिन भी चाहता था कि भारत के राजनीतिज्ञ वर्ष में एक बार इकट्ठे हों और उनकी सुविधा और नाराजगी को ध्यान रखते हुए भारत का शासन चलाया जा सके।इस संगठन की स्थापना से पूर्व ह्यूम इंग्लैण्ड गये, जहां उन्होंने रिपन, डलहौजी जान व्राइट एवं स्लेग जैसे राजनीतिज्ञों से इस विषय पर व्यापक विचार-विमर्श किया। भारत आने से पहले ह्यूम ने इंग्लैण्ड में भारतीय समस्याओं के प्रति ब्रिटिश संसद के सदस्यों में रुचि पैदा करने के उद्देश्य से एक ‘भारत संसदीय समिति’ की स्थापना की। भारत आने पर ह्यूम ने ‘इण्डियन नेशनल यूनियन’ की एक बैठक मुम्बई में 25 दिसम्बर, 1885 को की, जहां पर व्यापक विचार विमर्श के बाद इण्डियन नेशनल युनियन का नाम बदलकर ‘इण्डियन नेशनल कांग्रेस’ या ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ रखा गया। यहीं पर इस संस्था ने जन्म लिया।

    लाला लाजपत राय ने अपनी पुस्तक ‘यंग इंडिया’ में लिखा है कि ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ की स्थापना का मुख्य कारण यह था कि इसके संस्थापकों की उत्कंठा ब्रिटिश साम्राज्य को छिन्न-भिन्न होने से बचाने की थी। ह्यूम के जीवनीकार वेडरबर्न ने लिखा है है कि भारत में असन्तोष की बढ़ती हुई शक्तियों से बचने के लिए एक अभयदीप की आवश्यकता है और कांग्रेसी आन्दोलन से बढ़कर अभयदीप नामक दूसरी कोई चीज़ नहीं हो सकती। रजनीपाम दत्त ने अपनी पुस्तक इण्डिया टुडे में लिखा है कि ‘कांग्रेस की स्थापना ब्रिटिश सरकार की एक पूर्व नियोजित गुप्त योजना के अनुसार की गयी।” इस कांग्रेस में शामिल भारतीय नेता भी जानते थे कि ये अंग्रेजों की पिछलग्गू संस्था ही है। इसके बावजूद वे लहर पर सवार होने की कोशिश में कांग्रेस में शामिल रहे।

    जब आजादी के बाद इन नेताओं ने गांधीजी से अंग्रेजों के षड़यंत्रों के बारे में शिकायत की और कहा कि वे इसी कांग्रेस के नाम पर अपना छद्म शासन जारी रखना चाहते हैं तो गांधीजी ने सार्वजनिक तौर पर कहा कि कांग्रेस अपना काम कर चुकी है अब उसका अवसान कर देना चाहिए। इसके बावजूद अंग्रेजों के एजेंट बनकर नेहरू ने कांग्रेस की सफलता पर अपनी सवारी नहीं छोड़ी। जाहिर है आज नेहरू के निधन के 52 सालों बाद उनके वंशज राहुल गांधी कैसे अपने पुरखों की गलती स्वीकार सकते हैं। जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भाजपा कार्यालय की आधारशिला रखते वक्त कहा कि आजाद हिंदुस्तान में जितना संघर्ष भाजपा के कार्यकर्ताओं को करना पड़ा है उतना तो आजादी की लड़ाई में कांग्रेस के नेताओं को भी नहीं करना पड़ा था। मोदी के इस बयान पर खिसियानी बिल्ली खंभा नोचें वाले अंदाज में राहुल गांधी बोले कि मोदी को अज्ञानता से आजादी मिले। मरती कांग्रेस के वारिस से इसके अलावा क्या बोलने की उम्मीद की जा सकती थी।

    वहीं मोदी ने अपनी बात को स्पष्ट करते हुए कहा था कि आजादी के बाद उसके नेताओं की हर बात को गलत ठहराया गया। यही वजह है कि भाजपा कार्यकर्ताओं को कठिन संघर्षों से जूझना पड़ा। अब जबकि देश को ये मालूम पड़ चुका है कि अंग्रेजों ने लार्ड माऊंटबेटन और नेहरू के सहयोग से जो ट्रांसफर आफ पावर एग्रीमेंट हस्ताक्षरित किया था उसने किस तरह अंग्रेजों को मुनाफे के धंधों में भागीदारी दिलाई। आज जब ब्रिटेन का पाऊंड 87.85 रुपए में आ रहा है तब इस षड़यंत्र को आसानी से समझा जा सकता है कि किस तरह ब्रिटेन ने आजाद हिंदुस्तान से भी अपनी आय जारी रखी है। यही वजह है कि भारत में ब्रिटेन की लाबी आज भी बड़े निर्णायक के तौर पर कार्य कर रही है। इस लाबी के एजेंट भारत के जमीनी राजनेताओं को धूल धूसरित करने में जुटे रहते हैं। वे उन नेताओं को चंदा दिलाते हैं। उन्हें गुमराह करते हैं और फिर उन्हें बदनाम कर उन्हें सत्ता की दौड़ से बाहर धकेल देते हैं।

    मोदी जी की बात सौ फीसदी सही है। भाजपा को आज के वैभव तक पहुंचाने के लिए इसके नेताओं को तरह तरह की यातनाएं झेलनी पड़ी हैं। प्रधानमंत्री खुद उसी प्रताड़ना तंत्र के बीच से तपकर आए हैं। वे जानते हैं कि जमीनी नेताओं को प्रताड़ित करने का ये अभियान आज भी जारी है। अब इसकी कमान भाजपा और संघ में घुसपैठ कर चुके कुछेक कार्यकर्ता संभाले हुए हैं। इसके बावजूद मोदी इससे मुकाबले का तंत्र विकसित करने में जुटे हुए हैं। ये संतोष की बात है कि देश की नई पीढ़ी ब्रितानी हुकूमत और उसके एजेंटों की हरकतों को समझ रही है। यही वजह है कि तमाम षड़यंत्रों और शिकायतों के बावजूद देश की जनता भाजपा की विकास यात्रा को जारी रखे हुए है। देश को बुलंदियों तक ले जाने में जुटे नेताओं को अपना नजरिया साफ रखना होगा। उन्हें कांग्रेस की पूंछ पकड़कर चलने वाली अपनी प्रवृत्ति पर विराम लगाना होगा। मोदी बेशक शेर की चाल से अपना मार्ग प्रशस्त करते चले जा रहे हैं पर देश के लोगों को भी अपनी भूमिका पर अमल करना होगा। भाजपा ने अपने भीतर छुपे अंग्रेजों के एजेंटों पर लगाम नहीं लगाई तो आज जो लोग भाजपा का बधियाकरण करने में जुटे हैं वे क्षेत्रीय दलों को उभारकर इस नए स्वाधीनता संग्राम को कुचलने में कामयाब हो जाएंगे।