Category: राजनीति

  • साध्वी प्रज्ञा के प्रचार की कमान आम जनता ने संभाली

    साध्वी प्रज्ञा के प्रचार की कमान आम जनता ने संभाली

    भोपाल लोकसभा की हाईप्रोफाईल सीट का आमचुनाव इन दिनों साधू और शैतान की लड़ाई में तब्दील हो गया है। एक ओर जहां कांग्रेस के दिग्विजय सिंह ने जनसंपर्क, धनवर्षा, और पुलिसिया तालमेल के साथ अपराधियों की फौज मैदान में उतार दी है वहीं साध्वी प्रज्ञा सिंह के पक्ष में आम जनता ने मोर्चा संभाल लिया है। आम लोगों के समूह रोज सुबह एक से दो घंटों तक घर घर जाकर मतदान की अपील कर रहे हैं। कई स्वयंसेवियों ने तो अपने कारोबार बंद करके साध्वी के पक्ष में दिन रात की जवाबदारी संभाली है। वे लोगों को दिग्विजय सिंह के मुख्यमंत्रित्व काल के कुशासन की याद दिला रहे हैं और मौजूदा सरकार की असफलता की कहानियां सुना रहे हैं। साध्वी प्रज्ञा को झूठे मुकदमों में फंसाकर हिंदुओं को बदनाम करने वाले दिग्विजय सिंह को वोट न देने की अपील भी कर रहे हैं। इसके जवाब में दिग्विजय सिंह ने कुख्यात कंप्यूटर बाबा के नेतृत्व में बाबाओं की फौज मैदान में उतार दी है। भारी दान दक्षिणा लेकर मैदान में उतरे ये बाबा घर घर जाकर कह रहे हैं कि साध्वी प्रज्ञा कोई संत तो हैं नहीं, जबकि दिग्विजय सिंह ने नर्मदा परिक्रमा करके खुद को हिंदू साबित कर दिया है। दिग्विजय सिंह के समर्थक घर घर जाकर नर्मदा जल की बोतलें, उनके हिंदू होने के प्रमाण पत्र और धन बांट रहे हैं इसके बावजूद आम जनता ने साध्वी प्रज्ञा के प्रचार की कमान संभाली है तो इसकी वजह आसानी से समझी जा सकती है।

    बाबाओं में बंटती खीर पुड़ी का लंकर इतना विशाल है कि प्रदेश भर से बाबाओं की टोलियों ने इन दिनों भोपाल में डेरा डाल दिया है। ये बाबा नमक का कर्ज अदा कर रहे हैं और घर घर घूमकर दिग्विजय सिंह के पक्ष में प्रचार कर रहे हैं। दिग्विजय सिंह ने लंबे समय से भोपाल से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रखी थी। उन्होंने पत्रकारों के बीच सघन संपर्क बना रखा था और उनके पक्ष में माहौल बनाने वाला एनजीओ विकास संवाद इसके लिए कई सालों से भूमिका बनाता रहा है।न्यू मार्केट के इंडियन काफी हाऊस में बैठने वाले उनके समर्थक नए पत्रकारों को अपने खेमें में खींचने का प्रयास करते हैं यहीं से उन पत्रकारों को दिग्विजय के लिए सहयोगी साबित होने वाली खबरें प्लांट की जाती रहीं हैं। यही वजह है कि जैसे ही भाजपा ने साध्वी प्रज्ञा को भोपाल से उम्मीदवार बनाया तो अखबारों और मीडिया चैनलों ने माहौल बनाना शुरु कर दिया कि भाजपा ने आतंकवादी को अपना प्रत्याशी बना दिया है। जबकि हकीकत ये है कि एनआईए ने एटीएस की भगवा आतंकवाद की कहानी को नकार दिया है और अदालत ने केवल सामान्य धाराओं में मुकदमा चलाने की अनुमति दी थी। साध्वी प्रज्ञा और उनके सहयोगियों के विरुद्ध ये प्रकरण अभी भी अदालत में लंबित है लेकिन वो इतना कमजोर है कि जो ज्यादा लंबा नहीं खिंच सकता।

    दिग्विजय सिंह विभिन्न समाजों के सम्मेलन भी आयोजित कर चुके हैं जहां उनसे जुड़े समाज के नेताओं ने अपने नेता के पक्ष में गुणगान करने में कोई कसर नहीं रखी। इस दौरान हर समाज के सहभोज भी कराए गए जिनकी फंडिंग दिग्विजय सिंह ने अपने छद्म सहयोगियों के मार्फत की थी।कांग्रेस कमेटी में प्रवक्ता माणक अग्रवाल के माध्यम से जो भारतीय मुद्रा की बारिश कराई जा रही है उसमें स्नान करने के लिए लोगों का तांता लगा हुआ है। फंडिंग का ये दारोमदार दिग्विजय सिंह के सुपुत्र और राज्य के नगरीय प्रशासन मंत्री जयवर्धन सिंह संभाले हुए हैं।

    फंड का ये सैलाब लाने की तैयारी दिग्विजय सिंह ने लंबे समय से कर रखी थी। एक समय़ भाजपा की आर्थिक रीढ़ समझे जाने वाले दिलीप सूर्यवंशी और उनकी फर्म दिलीप बिल्डकान ने पूरे पंद्रह सालों तक राज्य के निर्माण ठेकों पर एकछत्र राज्य किया है। इस दौरान उनकी फर्म दिलीप बिल्डकान चंद लाख रुपयों से बढ़कर अरबों का आंकड़ा छू गई । बताते हैं कि दिग्विजय ने अबू धाबी की अपनी तेल लाबी के सहयोग से दिलीप बिल्डकान में अरबों रुपयों का निवेश करवाया था। जनवरी माह में अबू धाबी की इन कंपनियों ने अपना निवेश खींच लिया। इससे दिलीप बिल्डकान का जो शेयर लगभग 1200 रुपए की ऊंचाई छू रहा था वो घटकर 450 रुपए की जमीन पर आ गिरा।लगभग तीस प्रतिशत की शुरुआती गिरावट से ही भाजपा की संभावित आर्थिक रीढ़ टूट गई। एक समय जो दिलीप सूर्यवंशी खुद को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का फंड मैनेजर कहते थे वे आज दिग्विजय सिंह के दरवाजे खड़े हैं और चुनाव के लिए धन भी मुहैया करा रहे हैं।

    यही नहीं उदय क्लब नामक उनका सहयोगी संगठन जिसमें भाजपा और कांग्रेस से जुड़े ठेकेदारों, अफसरों और नेताओं का गठजोड़ है वह भी दिग्विजय सिंह के पक्ष में थैलियां खोलकर रुपया खर्च कर रहा है। इसकी वजह है कि दिग्विजय सिंह ने आते ही भोपाल के विकास का विजन पत्र प्रस्तुत किया है। उनका बेटा नगरीय प्रशासन मंत्री है। मुख्यमंत्री कमलनाथ कह रहे हैं कि भोपाल के विकास की चाभी दिग्विजय सिंह के पास रहेगी। ऐसे में भाजपा और कांग्रेस के ठेकेदार दिल खोलकर दिग्विजय सिंह के पक्ष में धनराशि खर्च कर रहे हैं। उन्हें उम्मीद है कि यदि दिग्विजय सिंह चुनाव जीतते हैं तो उन्हें फिर विकास के नाम पर बड़े ठेके मिल सकते हैं। इस तरह विकास का विजन वास्तव में भोपाल के विकास के लिए नहीं बल्कि ठेकेदारों के विकास का विजन बन गया है।यही वजह है कि संगठन विहीन कांग्रेस मैदान में नजर आने लगी है और भाजपा मैदान से बाहर खड़ी दिख रही है। भाजपा के जो नेता ठेकेदार हैं वे इसलिए सामने नहीं दिखना चाहते क्योंकि उन्हें भय है कि भविष्य में ठेके मिलना मुश्किल हो जाएगा।

    जो लोग दिग्विजय सिहं का शासन देख चुके हैं वे भयभीत हैं कि उन्हें एक बार फिर बंटाढार का शासन न झेलना पड़े, इसलिए उन्होंने खुद आगे बढ़कर साध्वी प्रज्ञा के प्रचार की जवाबदारी थाम ली है। उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सहयोगियों का समर्थन मिल रहा है। उन्हें सबसे बड़ा सहयोग तो उन आम नागरिकों का मिल रहा है जो लंबे समय से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को देख सुन रहे हैं। उनके कामकाज की उपलब्धियां जान चुके हैं। कांग्रेस और राहुल गांधी के गाली गलौच भरे दुष्प्रचार को झेल रहे हैं। दिग्विजय सिंह के दंभी कटाक्ष उन्हें याद हैं। वे जानते हैं कि आम नागरिकों को अपमानित करना दिग्विजय सिंह की आदत में शामिल है।

    सबसे बड़ी बात तो ये है कि दिग्विजय सिंह की इस कुख्याति से हिंदू ही नहीं मुसलमान भी अच्छी तरह वाकिफ हैं। रमजान की तैयारी कर रहे मुस्लिम, दिग्विजय सिंह की उस फौज की गतिविधियों को देख सुन रहे हैं जिसने बूथ मैनेजमेंट के लिए भोपाल में डेरा डाल रखा है।एक मेडीकल कालेज में डेरा डाले पड़ी इस अपराधियों की टोली और खुले लंगर के साथ इन्हें टैक्सियां दी गईं हैं। भोपाल लूटने के अंदाज में घूम रहे इन आपराधिक तत्वों पर पुलिस का कोई अंकुश नहीं है। इसकी वजह है कि दिग्विजय सिंह ने अपने चहेते आईपीएस वीके सिंह को पुलिस का मुखिया बनवाया है। उनके माध्यम से पुलिस को साफ निर्देश हैं कि बगैर छानबीन किए कोई प्रकरण दर्ज न करो। चुनाव में पुलिस और जनता के बीच टकराव टालते रहो। यही वजह है कि पुलिस की बंधी हुई घिग्घी को देखकर एक महिला पुलिस अफसर के बेटे ने एक डीएसपी को घर में घुसकर गोली मार दी। राजनैतिक हस्तक्षेप के बीच जब उस हत्यारे ने सरेंडर किया तो पुलिस ने अपने ही अफसर के खिलाफ कहानी प्रचारित कर दी कि वो महिला पुलिस अफसर को अश्लील मैसेज भेजता था इससे गुस्सा होकर बेटे ने उसे गोली मारी है। मुस्लिमों के बीच इस प्रकरण ने चिंता बढ़ा दी है। उन्हें लगने लगा है कि जिस दिग्विजय सिंह के समर्थक चुनाव जीतने के पहले इस तरह की गुंडागर्दी कर रहे हैं वे चुनाव जीतने के बाद तो खुलेआम लूटपाट करने लगेंगे। इस लिहाज से साध्वी को भले ही हिंदूवादी कहकर मुस्लिमों से काटने की कोशिश की जा रही है पर वे उनके लिए ज्यादा सुरक्षित साबित होंगी। इसकी एक वजह शिवराज सिंह चौहान का पिछला कार्यकाल भी है जिसमें मुस्लिमों को भरपूर विकास के अवसर मिले और भाजपा की कथित मुस्लिम विरोधी छवि से वे बाहर निकल चुके हैं।

    जैसे जैसे चुनाव की तारीख नजदीक आती जा रही है वैसे वैसे राजनीतिक दलों ने भी घर घर जाकर प्रचार की मुहिम तेज कर दी है। आम सभाएं और नुक्कड़ सभाएं भी हो रहीं हैं। इन सभी के बीच साध्वी प्रज्ञा को दी गई अमानवीय प्रताड़ना की जो बातें कहीं जाती हैं उनसे आम लोग उद्वेलित हो रहे हैं। देश में जिस राष्ट्रवाद का माहौल बन गया है उसके बीच साध्वी प्रज्ञा पर लगे झूठे आरोप तेजी से सहानुभूति बटोर रहे हैं। इस मुद्दे पर लिखीं गई किताबें (भगवा आतंक एक षड़यंत्र) और (आतंक से समझौता) ने भाजपा कार्यकर्ताओं के मन से संशय के बादल दूर कर दिए हैं। वे अब साध्वी प्रज्ञा की बेगुनाही और दिग्विजय सिंह के षड़यंत्रों के खिलाफ खुलकर प्रचार कर रहे हैं। ऐसे में साध्वी प्रज्ञा षड़यंत्रों की इस दीवार को फांदने के लिए तैयार हो चुकी हैं। जनता उनके पक्ष में जिस तरह स्वतःस्फूर्त ढंग के आगे आ रही है उसे देखते हुए भोपाल का चुनाव भावुक और रोचक हो गया है।

    (लेखक पत्रकार होने के साथ साथ जन न्याय दल के सदस्य और प्रवक्ता भी हैं).

  • करकरे का माफिया कनेक्शन मुझे नहीं मालूम बोले त्रिपाठी

    करकरे का माफिया कनेक्शन मुझे नहीं मालूम बोले त्रिपाठी

    भोपाल,28 अप्रैल(प्रेस सूचना केन्द्र)।मध्यप्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक और बहुजन समाज पार्टी के नेता रहे आईपीएस सुभाष चंद्र त्रिपाठी ने कहा है कि उन्हें मुंबई के 2611/2013 को हुए हमले में असमय काल कवलित हुए हेमंत करकरे के माफिया कनेक्शन के बारे में कोई जानकारी नहीं है। वे तो सिर्फ इतना जानते हैं कि ड्यूटी के दौरान वे आतंकवादी की गोलियों से मारे गए थे और भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया था। इसी वजह से जब उन्होंने सुना कि भोपाल से भाजपा की ओर से लोकसभा प्रत्याशी साध्वी प्रज्ञा ने करकरे पर निर्दोष लोगों को झूठे मामलों में फंसाने वाला बताया है तो उन्होंने अपने साथियों से साथ मिलकर बयान की निंदा की।

    नशा माफिया और डाकू गिरोहों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने के लिए मुस्तैद माने जाने वाले एस.सी.त्रिपाठी ने एक मुलाकात में बताया कि हेमंत करकरे ने अपना कर्तव्य निभाते हुए मुंबई हमले के दौरान मोर्चा संभाला था जहां उन्हें गोलियां लगीं थीं। जिन हालात में करकरे आगे आए थे वो निश्चय ही सराहनीय कदम था। हम इस मुद्दे पर और ज्यादा पहलुओं पर बात करके अपना समय बर्बाद नहीं करना चाहते।

    मध्यप्रदेश में नशे की आवक के लिए दोषी पुलिस वालों पर कड़ी कार्रवाई कर चुके श्री त्रिपाठी से पूछा गया मुंबई में नशे का कारोबार करने वाला माफिया आखिर किसके संरक्षण में पनपा। करकरे की टीम ने जिन 75 के करीब एनकाऊंटर में अपराधियों को मारा उनमें दाऊद गेंग का एक भी नहीं था, सभी अरुण गवली या राजन गैंग के थे। इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि पुलिस ने ये कार्रवाई क्यों की इसके बारे में तो मुंबई एटीएस ही बता सकती है।

    देश के स्तर पर आईपीएस एसोसिएशन ने वर्दीधारी की मौत पर निंदा प्रस्ताव पारित किया पर मध्यप्रदेश के आईपीएस इस मुद्दे पर कुछ नहीं बोल रहे हैं। ये जवाबदारी चंद सेवा निवृत्त आईपीएस ही क्यों निभा रहे हैं ये पूछा जाने पर उन्होंने कहा कि हम सिर्फ देश के लिए जान न्यौछावर करने वाले करकरे की बात कर रहे हैं, हमें उनके पुराने कामकाज के बारे में कुछ नहीं कहना। देश के स्तर पर जो लोग सवाल उठा रहे हैं उनका पक्ष वे ही बता सकते हैं।

    जब उनसे पूछा गया कि साध्वी प्रज्ञा ने खुद को प्रताड़ित किए जाने की बात कहते हुए हेमंत करकरे को इसके लिए दोषी बताया था तो उन्होंने कहा कि ये आरोप अदालत में साबित नहीं हुए हैं। उन्होंने कहा कि कई बार यदि प्रताड़ना की बात ठीक तरह से उठाई जाती है तो अदालत में दोषियों को सजा तक मिलती है। इस मुद्दे पर अदालत के सामने साक्ष्य नहीं आ पाए तो इसके लिए करकरे को दोषी कैसे माना जा सकता है।

    हालांकि उन्होंने ये भी कहा कि देश में रुपए के लेनदेन पर कड़ी निगाह रखी जाती है इसके बावजूद चुनाव आयोग की निगरानी में काला धन बरामद हो रहा है जो जाहिर करता है कि देश की व्यवस्था में कोई लीकेज जरूर है। पुलिस के भी कई अफसर आपराधिक गतिविधियों में संलग्न रहते हैं पर इसके लिए पूरी पुलिस फोर्स को तो दोषी नहीं ठहराया जा सकता। हम सिर्फ यही कहना चाहते हैं।

    साध्वी प्रज्ञा के आरोपों के बारे में उन्होंने कहा कि इससे ऐसा लग रहा है कि भारत में कानून का राज नहीं है। भारत एक बनाना इस्टेट बनकर रह गया है।सच्चाई ये है कि एनआईए की अदालत ने मालेगांव बम कांड के आरोपियों से मकोका हटाया है पर साध्वी प्रज्ञा और उनके सहयोगियों पर मुकदमा तो चलाया ही जा रहा है।वे बेदाग साबित होती हैं या नहीं ये भविष्य के गर्त में है।करकरे का पक्ष उनकी दस्तावेजी कार्रवाई से ही समझा जा सकता है।अदालत के फैसले से भी समझा जा सकता है कि चूक कहां हुई।

  • शहादत और प्रताड़ना के बीच उभरता राष्ट्रवाद

    शहादत और प्रताड़ना के बीच उभरता राष्ट्रवाद

    दिग्विजय सिंहःभगवा आतंकवाद से पिंड छुड़ाने की नाकाम कोशिश

    -आलोक सिंघई-

    साध्वी प्रज्ञा को भोपाल से लोकसभा प्रत्याशी बनाकर भाजपा ने राष्ट्रवाद बनाम परिवारवाद की बहस को तेज कर दिया है। ये बहस आम चुनाव के तीन चरण हो जाने के बाद आकार लेना शुरु हुई है। इस बहस की शुरुआत में जो संशय और सवाल उठ रहे हैं उससे आम मतदाता अभी तक समाधान के दौर तक नहीं पहुंच पाए हैं। आम मतदाता की तो छोड़िए भाजपा के कार्यकर्ता और वरिष्ठ नेता भी इस बहस को लेकर अभी ऊहापोह के बीच झूल रहे हैं। जब प्रत्याशी की घोषणा नहीं हुई थी और कांग्रेस के प्रत्याशी दिग्विजय सिंह ने क्षेत्र में जनसंपर्क शुरु कर दिया था तब भाजपा के नेताओं में खलबली मची हुई थी कि उनका विरोधी दल प्रचार में आगे निकलता जा रहा है। इस बीच भाजपा के कार्यकर्ताओं और टिकिट मांगने वाले नेताओं के बीच भी प्रतिस्पर्धा का माहौल था। हर नेता संपर्क करके खुद को बांका प्रत्याशी घोषित करवाने में जुटा हुआ था। बहुत देर बाद जब साध्वी प्रज्ञा को मैदान में उतारा गया तो टिकिट की दौड़ में जुटे इलाकाई नेतागण मुंह फुलाकर घूमते देखे जाने लगे। हालत ये हो गई कि प्रदेश प्रभारी विनय सहस्त्रबुद्धे को इन नेताओं को लामबंद करना भारी पड़ रहा है।

    दरअसल पिछले पंद्रह सालों के भाजपा शासनकाल में संगठन की घनघोर उपेक्षा की गई। संगठन में सुविधाभोगी नेताओं का जमघट लग गया। संगठन के प्रभारियों से संपर्क जोड़कर उन्हें बदनाम करने के प्रयास भी जोर शोर से हुए। ये काम वो लोग कर रहे थे जिन्हें तात्कालिक संगठन महामंत्री कप्तान सिंह सोलंकी ने अपदस्थ दिग्विजय सिंह और उनके भाई लक्ष्मण सिंह से तालमेल बिठाकर भाजपा में शामिल करा दिया था। वे सभी पंचायत स्तर तक फैल गए थे। जब शिवराज सिंह चौहान सत्तासीन हुए तो उन्होंने संगठन के उन्हीं पदाधिकारियों से काम लेना शुरु कर दिया। इस दौरान संघर्ष में प्रमुख भूमिका निभाने वाला भाजपा का मूल कैडर नेपथ्य में चला गया। शिवराज जी के कार्यकाल में संगठन के पुनर्गठन का काम भी धीमा पड़ गया। प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान के कार्यकाल में संगठन को जिस दयादृष्टि से चलाया गया उसके बीच यही आयातित पदाधिकारी मलाई काटते रहे। आज यदि मुख्यमंत्री कमलनाथ या दिग्विजय सिंह जोर जोर से कह रहे हैं कि मोदी ने अच्छे दिनों का वादा किया था लेकिन अच्छे दिन केवल भाजपा के कार्यकर्ताओं के आए हैं तो वे उन्हीं छद्म भाजपा के नेताओं की बात कर रहे हैं जो इतने लंबे कार्यकाल में जनता के बीच लहीम शहीम जीवन शैली के कारण ईर्ष्या के तौर पर देखे गए। संगठन के मूल कार्यकर्ता तो उपेक्षित ही रहे और उनमें से कुछ ने तो हितग्राही मूलक योजनाओं से खुद को जिंदा रखा और कुछ ने संगठन से किनारा कर लिया।

    साध्वी प्रज्ञा ने जब भोपाल पहुंचकर अपने खिलाफ मालेगांव बम धमाके के फर्जी आरोप में खुद को प्रताड़ित किए जाने का मुद्दा उठाया तो जनता के बीच से तो सकारात्मक प्रतिक्रिया आई लेकिन संगठन का अप्रशिक्षित कैडर इसे जनता का मुद्दा नहीं बना पाया। इसके विपरीत साध्वी प्रज्ञा ने अपने खिलाफ प्रताड़ित करने वाले मुंबई एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे का नाम लिया तो कांग्रेस ने इसे शहीद का अपमान करने वाला बयान बताना शुरु कर दिया। इस दौरान भी कैडर के भीतर से प्रताड़ना की कहानी को वांछित हवा नहीं दी गई। कैडर की इस असफलता का नतीजा ये हुआ कि कांग्रेस महात्मा गांधी की शहादत के समान ही इसे शहीद का अपमान बताने में जुट गई। भाजपा को हस्तक्षेप करके स्वयं को इस मुद्दे से अलग करना पड़ा। उसने ये कहकर पल्ला झाड़ा कि ये साध्वी का निजी अनुभव है हम शहादत का अपमान करने के पक्ष में नहीं हैं। कांग्रेस ने मराठी समाज को भी उकसाकर इस मुद्दे पर साध्वी प्रज्ञा और भाजपा के राष्ट्रवाद की मुखालिफत शुरु कर दी। हालत ये हो गई है कि भाजपा के नेतागण इस मुद्दे पर बचाव की मुद्रा में आ गए हैं उन्हें लगता है कि साध्वी पज्ञा ने अपनी राजनैतिक अपरिपक्वता के कारण उन्हें झमेले में फंसा दिया है। जिस मुद्दे पर पूरे देश में मतदान का तीसरा चरण स्पष्ट मतविभाजन की स्थिति में आ जाना चाहिए था भाजपा उस जनमत को अपने पक्ष में लामबंद करने में असफल रही है।

    वास्तव में प्रज्ञा सिंह तत्कालीन गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे, और दिग्विजय सिंह जैसे कांग्रेस के नेताओं के षड़यंत्र का शिकार रहीं हैं। तत्कालीन गृह सचिव आर के सिंह ने बेशक इस आदेश का पालन करने के लिए नोटशीट लिखी पर इसे सरकार ने ही पारित किया और मुंबई एटीएस को मामले की छानबीन की जवाबदारी सौंपी। आज जब दिग्विजय सिंह चुनाव मैदान में हैं और उन्हें बीस में से पंद्रह लाख हिंदू मतदाताओं के वोट की दरकार है तब वे खुद को निर्दोष बताने के लिए कह रहे हैं कि उन्होंने भगवा आतंकवाद शब्द नहीं रचा, ये तो आरके सिंह की देन था। हालांकि केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने आरके सिंह का बचाव करते हुए कहा कि वे सचिव थे किसी मुद्दे पर फैसला लेने का अधिकार और दायित्व सरकार का होता है इसलिए भगवा आतंकवाद शब्द को हवा देने का षड़यंत्र दिग्विजय सिंह और सुशील कुमार शिंदे की जोड़ी ने ही किया था।

    इस मामले में जो लोग साध्वी प्रज्ञा की प्रताड़ना के बयान को शहादत का अपमान बताने में जुटे हैं वे वास्तव में शहादत की आड़ में परिवारवाद को स्थापित करने की अपनी जानी पहचानी सफल नीति पर अमल कर रहे हैं। बापू महात्मा गांधी की हत्या, श्रीमती इंदिरागांधी की जघन्य हत्या, स्वर्गीय राजीव गांधी की अमानवीय हत्या की आड़ लेकर सफल राजनीति करती रही कांग्रेस को हेमंत करकरे की शहादत के रूप में एक सुरक्षित छतरी मिल गई है। इसके विपरीत भाजपा हेमंत करकरे के कांग्रेस के षड़यंत्र में लिप्तता को नहीं उभार पाई है। मीडिया में भी उनकी बड़ी बेटी जुई करकरे का बयान प्रसारित किया गया जो अमेरिका के बोस्टन में रहती हैं। घटना के वक्त भी वे बोस्टन में ही थीं। पिता की गतिविधियां उन तक परिवारजनों के माध्यम से ही पहुंचती थीं। उनके बेटे आकाश करकरे और छोटी बेटी शायली के बारे में जुई कुछ नहीं बोलना चाहती। इसे वे उनकी निजता बताती हैं। जबकि आकाश करकरे क्या कारोबार करते हैं, उनका कारोबार कब स्थापित हुआ। वे किस देश में कारोबार करते हैं। दिग्विजय सिंह के बेटे जयवर्धन सिंह से उनके क्या कारोबारी संबंध हैं। उसमें पूंजी निवेश किसने और कितना किया था।तब क्या हेमंत करकरे उतना बड़ा निवेश करने की स्थिति में थे या नहीं इन मुद्दों पर भाजपा प्रकाश नहीं डाल पा रही है। ऐसे में वो आरोपों से घिर रही है।

    साध्वी प्रज्ञा ने यदि भगवा आतंकवाद पर अपनी प्रताड़ना का जिक्र किया था तो उन्हें इस मुद्दे पर लोगों के मन में उठ रहे सभी सवालों का जवाब देना था। प्रकरण अदालत में होने के कारण वे कई मुद्दों पर चर्चा नहीं कर पा रहीं हैं। इसके बावजूद भाजपा को किसने रोका कि वे साध्वी के निर्दोष होने के बाजवूद उन्हें प्रताड़ित करने के मुद्दे को जनचर्चा न बनाएं। भाजपा के नेतागण शहादत को मुद्दा बनाए जाने के कांग्रेस के ट्रेप में फंस गए हैं। जबकि साध्वी के निर्दोष होने के बावजूद प्रताड़ित किए जाने का मुद्दा हवा नहीं पकड़ सका है।

    जिन लोगों ने साध्वी प्रज्ञा के छात्र जीवन को करीब से देखा है। उनका तेजाबी रूप देखा है वे भी साध्वी का पक्ष नहीं रख पा रहे हैं। जब प्रज्ञा सिंह नाम की ये छात्रा किसी पद पर नहीं थी तब उसके न्याय करने का ढंग लोगों के आकर्षण का केन्द्र बन चुका था। आरएसएस की पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण वे लोगों की निगाह में आईँ और उन्हें अपने पाले में खींचने के लिए दिग्विजय सिंह ने कई चरणों के प्रयास किए। जब वे सफल नहीं हुए तो उन्होंने भगवा आतंकवाद की कहानी के ट्रेप में साध्वी को फंसाने का जतन किया। अमानवीय यातना झेलने के बाद भी जब साध्वी प्रज्ञा टूटी नहीं और सत्ता परिवर्तन के बाद बदले माहौल में छानबीन हुई तो उसी एटीएस ने पाया कि साध्वी निर्दोष हैं। इसके बाद ही अदालत ने उन्हें जमानत पर रिहा किया।

    अब जबकि अदालत की प्रक्रिया अंतिम दौर में है और भविष्य में साध्वी प्रज्ञा के बेदाग बरी होने की पूरी संभावना है तब भाजपा ने उन्हें मैदान में खड़ा करके राष्ट्रवाद को समझाने का प्रयास किया है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह कह रहे हैं कि साध्वी प्रज्ञा को झूठे मामले में फंसाकर भगवा आतंकवाद का नाम देकर राष्ट्रवाद को लांछित करने का काम कांग्रेस के नेताओं ने किया है। वे सवाल करते हैं कि समझौता एक्सप्रेस में ब्लास्ट करने वाले आरोपी अब कहां हैं। भाजपा यदि शहादत और प्रताड़ना के बीच मौजूद राष्ट्रवाद के तत्व को समझाने में सफल होती है तो आगे आने वाले चरणों के मतदान में उसे अवश्य लाभ होगा। सबसे बड़ी बात तो ये है कि केवल राष्ट्रवाद को कुचलने के लिए परिवारवाद की ध्वजावाहक कांग्रेस ने कैसे कैसे षड़यंत्र किये ये भी स्थापित करना संभव हो सकता है। ये आम चुनाव इस तरह देश में एक क्रांतिकारी बदलाव के मोड़ पर खड़ा है। जनमत के आधार पर राष्ट्रवाद और परिवारवाद के बीच जीत हार का फैसला भी 23 मई को होना तय है।

  • पिद्दी सीट से चुनाव लड़ने क्यों पहुंचे राहुल

    पिद्दी सीट से चुनाव लड़ने क्यों पहुंचे राहुल

    भोपाल,15 अप्रैल(प्रेस सूचना केन्द्र)। केरल की वायनाड जैसी छोटी लोकसभा सीट से जीत सुनिश्चित करने पहुंचे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का दक्षिण प्रेम इस बार भारत की राजनीति को परिभाषित करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश की अमेठी लोकसभा सीट के अलावा वायनाड से जीत सुनिश्चित करने के पीछे कांग्रेस की रणनीति काम कर रही है।

    दरअसल देश में काले धन की जो समानांतर अर्थव्यवस्था कांग्रेस के शासनकाल में विकसित हुई थी वो कांग्रेस की शक्ति का आधार रही है। नोटबंदी और जीएसटी ने उस अर्थव्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया है। इसी वजह से व्यापारियों और साहूकारों का बहुत बड़ा वर्ग आर्थिक सुधारों की लहर से खफा हो गया है। कांग्रेस गरीब की बात जरूर करती रही है लेकिन उसकी पृष्ठभूमि में खड़े राजा महाराजाओं और साहूकारों की शक्ति कांग्रेस को हर चुनौती का सामना करने में सहयोग प्रदान करता रहा है। दक्षिण में जिन स्वयंसेवी संस्थाओं और कंपनियों को प्रतिबंधित किया गया है उससे भी मोदी सरकार के विरोध में नाराजगी देखी गई और कांग्रेस को इस बार दक्षिण भारत जैकपाट नजर आ रहा है।

    केरल की वायनाड लोकसभा सीट के समीकरण देखे तो ये सीट2008 में अस्तित्व में आई. तब से अब तक इस सीट पर कांग्रेस का ही कब्जा है. इस सीट के तहत 7 विधानसभा सीटें आती हैं. ये सातों विधानसभा सीटें मनंथावाड़ी, सुल्तानबथेरी, कल्पेट्टा और कोझीकोड जिलों में पड़ती हैं. 2009 से इस सीट पर कांग्रेस के एमआई शानवास सांसद हैं. अब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के यहां से चुनाव लड़ने की वजह से यह संसदीय सीट हाई-प्रोफाइल सीटों में शुमार हो गई है और सभी की नजर इस सीट पर भी लग गई है.

    वायनाड जिले की आबादी 8.18 लाख है जिनमें से 4.01 लाख पुरुष और 4.15 महिलाएं है. इस जिले की साक्षरता दर 89.03 प्रतिशत है. वायनाड में 49.48% हिंदू, 28.65% जनसंख्या मुस्लिम और ईसाई समुदाय की आबादी 21.34% है. केरल में कांग्रेस की अगुवाई वाली गठबंधन का नाम है यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ). जबकि दूसरी तरफ वामपथी दलों का गठबंधन का नाम है लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ).

    2014 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को वायनाड पर महज 20,870 वोटों के अंतर से जीत हासिल हुई थी. कांग्रेस के एमआई शानवास को सीपीएम के सत्यन मोकेरी से सिर्फ 1.81 फीसदी अधिक वोट मिले थे. शानवास को 3,77,035 और मोकेरी को 3,56,165 वोट मिले थे. बीजेपी तब चुनाव में तीसरे स्थान पर रही थी और उसके प्रत्याशी पीआर रस्मिलनाथ को 80,752 वोट मिले थे.

    वायनाड लोकसभा सीट पर 2009 में पहली बार संसदीय चुनाव कराए गए जिसमें कांग्रेस को बड़ी जीत मिली थी. कांग्रेस के एमआई शानवास ने सीपीआई के एम रहमतुल्लाह को 1,53,439 के भारी अंतर से हराया था. शानवास को तब 4,10,703 और रहमतुल्लाह को 2,57,264 वोट मिले थे.

    कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी दक्षिण के रण में उतरकर वहां के राजनीतिक समीकरण साधने की रणनीति पर काम रहे हैं. एक दौर में दक्षिण भारत कांग्रेस का मजबूत गढ़ माना जाता था, लेकिन वक्त के साथ छत्रपों ने कांग्रेस की जमीन को कब्जा लिया है. ऐसे में राहुल दक्षिण के सियासी रण में खुद उतरकर अपनी सियासी जमीन को वापस पाने की है.

    वायनाड और मल्लपुरम इलाके में कांग्रेस और ऑल इंडिया मुस्लिम लीग की मजबूत पकड़ मानी जाती है. यही वजह है कि पिछले दो लोकसभा चुनाव से कांग्रेस लगातार जीत दर्ज कर रही है. ऐसे में राहुल के लिए वायनाड की राह में बहुत ज्यादा दिक्कतें नहीं होंगी.

    वायनाड एक पर्यटन स्थल भी है, इस लिहाज से भी राहुल गांधी के लिए इस लोकसभा सीट का चयन किया गया है।2008 से ही इस क्षेत्र का विस्तार किया जा रहा है। यहां आठ जन जातियां निवास करती हैं। इसलिए बजट का बड़ा हिस्सा यहां विकास के नाम पर खर्च किया जाता रहा है। कोआपरेटिव सोसायटी बनाकर भी यहां की खेती और पर्यटन को संरक्षण देने का प्रयास बरसों से किया जाता रहा है। कांग्रेस की निगाह बहुत लंबे समय से इस सीट पर थी और इसे दक्षिण के इलाकों में सुरक्षित लांच पेड की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है।

    पर्यटन क्षेत्र वयनाड

    वयनाड पर्यटन संगठन (डबल्यूटीओ) वयनाड में ‘जिम्मेदार और सतत् पर्यटन’ की संस्कृति लाने में मुख्य भूमिका निभा रहा है, जिसने वयनाड के उत्तरी जिले की चार पगडंडियों की पहली पगडंडी आपको यहाँ मिलेगी।

    इन चार पगडंडियों में, हम आपका परिचय पहली पगडंडी ‘आउटडोर ट्रेल’ से कराएंगे जिसमें आपको वयनाड जिले के निम्नलिखित स्थल मिलेंगे ।

    चेम्ब्रा पीक

    2100 मीटर की ऊंचाई पर चेम्ब्रा पीक वयनाड के दक्षिणी हिस्से में मेप्पाडी के समीप स्थित है। यह इस क्षेत्र की चोटियों में सबसे ऊंची चोटी है और इसकी चढ़ाई काफी मुश्किलों भरी है। चेम्ब्रा पीक की चढ़ाई एक रोमांचक अनुभव है, जहां चढ़ाई के हर चरण में वयनाड का व्यापक विस्तार दिखाई पड़ता है और शिखर तक पहुंचते-पहुंचते यहां के दृश्य काफी विस्तृत बन जाते हैं। इस चोटी तक पहुंचकर वापस लौटने में एक दिन का समय लगता है। जो इसके शीर्ष पर कैंप करना चाहते हैं, बेशक उनके लिए तो यह एक यादगार अनुभव ही होगा।

    कैंपिंग के लिए इच्छुक व्यक्ति वयनाड के कलपेट्टा में स्थित डिस्ट्रिक्ट टूरिज्म प्रोमोशन काउंसिल से संपर्क कर सकते हैं।

    नीलिमला

    वयनाड के दक्षिणपूर्वी हिस्से में कलपेट्टा तथा सुल्तान बथेरी से आसानी से पहुंचे जाने वाली स्थिति में अवस्थित नीलिमला ट्रेकिंग के लिए एक उपयुक्त स्थान है, जहां ट्रेकिंग के लिए कई मार्ग उपलब्ध हैं। नीलिमला के शिखर पर से समीप की घाटी में मीनमुट्टी जलप्रपात का दृश्य बेहद यादगार हो उठता है।

    मीनमुट्टी जलप्रपात

    ऊटी और वयनाड को जोड़ने वाली मुख्य सड़क से 2 कि.मी. की ट्रैकिंग करते हुए नीलिमला के पास स्थित इस खूबसूरत मीनमुट्टी जलप्रपात तक पहुँचा जा सकता है। यह वयनाड जिले का सबसे बड़ा जलप्रपात है जहाँ तीन धाराएँ लगभग 300 मीटर से नीचे गिरती हैं।

    चेतलयम

    एक और जलप्रपात जो पर्यटकों को वयनाड की ओर आकर्षित करता है, चेतालयम जलप्रपात है जो वयनाड के उत्तरी इलाके के सुल्तान बतेरी के पास है। मीनमुट्टी जलप्रपात की तुलना में यह आकार में थोड़ा छोटा है। यह जलप्रपात और आसपास के इलाके ट्रैकिंग और पक्षी प्रेमियों के लिए बेहतरीन जगह है।

    पक्षीपातालम

    ब्रह्मगिरी की पहाडियों पर 1700 मी. की ऊंचाई पर घने वन में पक्षीपातालम स्थित है। इस क्षेत्र में बड़े-बड़े बोल्डर देखने को मिलते हैं, उनमें से कुछ तो सचमुच विशाल हैं। यहां मौजूद कई सारी गुफाएं विभिन्न प्रकार के पक्षियों, जंतुओं और वनस्पतियों की विशेष किस्मों के वासस्थान हैं। पक्षीपातालम मानंतवाडी के पास स्थित है और यहाँ जाने के लिए आपको तिरुनेल्ली से शुरु करते हुए, जंगल में लगभग 7 कि.मी. की ट्रैकिंग करते हुए जाना होगा। पक्षीपातालम जाने वालों को डीएफओ – उत्तरी वयनाड से अनुमति लनी होती है।

    बाणासुरा सागर बांध

    बाणासुरा सागर पर बना बांध भारत के सबसे बड़े बांध के रूप में जाना जाता है। यह बांध वयनाड जिले के दक्षिण-पूर्वी हिस्से में स्थित है और यह करलाड झील के समीप है। बाणासुरा सागर बांध में बाणासुरा पीक की चढ़ाई के लिए प्रारंभ स्थान भी स्थित है। यहां का एक रोचक आकर्षण है द्वीपों का समूह, जिसका निर्माण जलाशय द्वारा आस-पास के क्षेत्रों को जलमग्न करने के कारण होता है।

    एक ओर जहाँ आप वयनाड के मनोरम दृष्यों, ध्वनियों और खुशबू का मज़ा लेंगे, वहीं आप वयनाड के कुछ दुर्लभ चीज़ें भी खरीदना चाहेंगे जैसे यहाँ के मसाले, कॉफ़ी, चाय, बांस की वस्तुएँ, शहद और जड़ी-बूटी के पौधे।

    वयनाड में ‘आउटडोर ट्रेल’ के बारे में अधिक जानकारी के लिए, वयनाड पर्यटन संगठन से संपर्क करें।

    संपर्क के विवरण

    महासचिव

    वयनाड पर्यटन संगठन

    वासुदेवा एडम, पोझुताना पी.ओ.

    वयनाड, केरल, भारत

    पिन – 673575

    टेलीफ़ोन +91-4936-255308, Fax.+91-4936-227341

    ई-मेल mail@wayanad.org

    कैसे पहुँचे

    नज़दीकी रेल्वे स्टेशन – कोझिकोड (कालीकट) रेल्वे स्टेशन 62 कि.मी. दूरी पर है

    नज़दीकी एयरपोर्ट – कोझिकोड (कालीकट) अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट लगभग 65 कि.मी. दूरी पर है

    लोकेशन

    अक्षांश : 11.75847, देशांतर : 76.093826

  • हिंदुस्तान की जमीन पर कलंक है बाबरी ढांचा बोले वसीम रिजवी

    हिंदुस्तान की जमीन पर कलंक है बाबरी ढांचा बोले वसीम रिजवी

    लखनऊ,(कुमार अभिषेक)।शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के चेयरमैन वसीम रिजवी ने एक फिर बाबरी मस्जिद को लेकर चौंकाने वाला बयान दिया है. वसीम रिजवी ने मुसलमानों से समझौते के मेज पर बैठकर इसे हिंदुओं को सौंपने की वकालत की है.

    वसीम रिजवी ने कहा कि उस कलंक को मस्जिद कहना गुनाहे अजीम है क्योंकि मस्जिद के नीचे की खुदाई 137 मजदूरों ने की थी जिसमें 52 मुसलमान थे. उस खुदाई के दौरान 50 मंदिर के स्तंभों के नीचे के भाग में ईंटों का बनाया गया चबूतरा भी मिला था.

    उन्होंने दावा किया कि खुदाई के दौरान मंदिर से जुड़े कुल 265 पुराने अवशेष मिले थे. इसी के आधार पर भारतीय पुरातत्व विभाग (एएसआई) इस निर्णय पर पहुंचा था कि ऊपरी सतह पर बनी बाबरी मस्जिद के नीचे एक मंदिर दबा हुआ है. सीधे तौर से माना जाए कि बाबरी इन मंदिरों को तोड़कर इनके मलबे पर बनाई गई है.

    बाबरी मस्जिद का निर्माण तोड़े गए मंदिरों के मलबे पर बनाए जाने को लेकर रिजवी ने कहा कि इसका उल्लेख केके मोहम्मद की किताब ‘मैं भारतीय हूं’ में भी किया गया है. ऐसी स्थिति में उस बाबरी कलंक को जायज मस्जिद कहना इस्लामिक सिद्धांतों के विपरीत है.

    उन्होंने आगे कहा कि अभी भी वक्त है लोग बाबरी मस्जिद से जुड़ें, अपने गुनाहों की तौबा करें और हजरत मोहम्मद के इस्लाम को मानें. आतंकी अबु बक्र, उमर की विचारधारा को छोड़ एक समझौते की मेज पर बैठकर हार जीत के बगैर राम का हक हिंदुओं को वापस करो और एक नई अमन की मस्जिद लखनऊ में जायज पैसों से बनाने की पहल करो

    इससे पहले शिया सेंट्रल बोर्ड के चेयरमैन वसीम रिजवी पूजा स्‍थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम-1991 को खत्म करने की मांग कर चुके हैं. रिजवी के मुताबिक, पूजा स्‍थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम के तहत विवादित मस्जिदें सुरक्षित की जा चुकी हैं. उन्हें हिंदुओं को सौंपने में मुश्किल होगी, इसलिए इसे खत्म किया जाए.

    रिजवी ने इस एक्ट को खत्म करने के साथ-साथ उन 9 मस्जिदों को जिन्हें मुगल काल में मंदिरों को तोड़कर बनाया गया था, जिसमें अयोध्या, काशी, मथुरा, कुतुब मीनार, सहित कुल 9 मस्जिदें बनी हैं. उन्हें वापस हिंदुओं को सौंपने की मांग कर चुके हैं.

    उनकी यह भी मांग की है कि एक स्पेशल कमेटी बनाकर अदालत की निगरानी में विवादित मस्जिदों के बारे में ठीक-ठीक जानकारी दी जाए. अगर यह सिद्ध हो जाता है कि यह हिंदुओं के धर्म स्थलों को तोड़कर बनाया गया है तो फिर उन्हें हिंदुओं को वापस किया जाए.

    रिजवी यहां तक कह चुके हैं कि अयोध्या में उस जगह पर कभी मस्जिद नहीं थी और वहां कभी मस्जिद नहीं हो सकती है. यह भगवान राम का जन्मस्थान है और वहां केवल राम मंदिर बनाया जाएगा. बाबर से सहानुभूति रखने वालों की नियति में हार है.

  • बीआरटीएस से दुश्मनी मतलब महंगा सौदा

    बीआरटीएस से दुश्मनी मतलब महंगा सौदा

    -आलोक सिंघई-

    सत्ता संभालते ही कमलनाथ सरकार के नगरीय प्रशासन मंत्री जयवर्धन सिंह ने भोपाल के बीआरटीएस को उखाड़ने की मुहिम चला दी है। संत हिरदाराम नगर के सिंधी व्यवसायियों से हाथ उठवाकर उन्होंने बताया कि लोग बीआरटीएस से परेशान हैं और चुनावी वादा निभाने के लिए उनकी सरकार इसे उखड़वा देगी।मंत्रीजी के पिता और पंद्रह सालों तक कांग्रेस के निर्वासन के जिम्मेदार दिग्विजय सिंह ने भी बेटे के सुर में सुर मिलाकर बीआरटीएस के विरोध में कानूनी सलाह मशविरा जुटाना शुरु कर दिया है। पूर्ववर्ती यूपीए की कांग्रेस नीत सरकार ने ही केन्द्र में रहते हुए बीआरटीएस बनवाने का प्रोजेक्ट शुरु किया था। जिसे बाद में मोदी सरकार ने जारी रखा और देश के कई बड़े शहरों में इसे आकार दिया गया। भाजपा जिस प्रोजेक्ट को जस का तस स्वीकार करती रही उससे आखिर मध्यप्रदेश की कांग्रेस सरकार खफा क्यों है।इस पर गौर किया जाए तो एक बड़े षड़यंत्र का खुलासा होता है।

    बीआरटीएस की जरूरत शहरों में बढ़ते यातायात के मद्देनजर महसूस की गई थी।पूर्ववर्ती राजीवगांधी सरकार ने जिस तरह आधुनिकीकरण के नाम पर देश में कारों को बनाने और विदेशों में बनी कारों के आयात की अनुमति दी थी उसके दुष्परिणाम जल्दी ही देश के सामने आने लगे। शहरों में आयातित पेट्रोलियम आधारित कारों और दुपहिया वाहनों की बाढ़ आ गई। हर घर के हर सदस्य के लिए लोगों ने अलग वाहन खरीदने शुरु कर दिए। नतीजा ये हुआ कि सड़कों पर वाहनों के चलने की जगह कम पड़ने लगी। लगातार ट्रेफिक जाम से जनता को निजात दिलाने के लिए आनन फानन में सड़कों का चौड़ीकरण करना मजबूरी हो गई। ये परिवहन इसलिए मंहगा था क्योंकि तेल खरीदने के लिए हमें विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती थी। दिग्विजय सिंह की सरकार तो सड़क, बिजली और पानी के संकट से उपजे विरोध के कारण ही उखाड़ फेंकी गई थी।

    इसके बाद आई भाजपा सरकारों ने सड़क बिजली और पानी के लिए भारी कर्ज लेना शुरु कर दिया। उमा भारती की सरकार कर्ज लेने की इस मुहिम के खिलाफ थी। उसने पूंजी उत्पादन के पंच ज अभियान को बढ़ावा दिया था। जिसमें जन, जंगल, जल, जमीन व जानवर को बुनियादी सम्पदा मानते हुए इन तत्वों के प्रति लोगों को जागरूक बनाने का विशेष अभियान 15 मई, 2004 से 15 जून, 2004 तक चलाया गया। हालांकि इस बीच उमा भारती के विरुद्ध भाजपा के भीतर से ही मुहिम चलाई जाने लगी। उनके बाद मुख्यमंत्री बने बाबूलाल गौर ने राजीव गांधी की चलाई तमाम नीतियों को नए नामों से लागू करना शुरु कर दिया।इसमें गोकुल ग्राम योजना भी थी जिसे पूर्ववर्ती दिग्विजय सिंह सरकार की पंचायती राज योजना और उमा भारती की पंच ज अभियान को मिलाकर लागू किया जाना था। ग्यारह महीने की उनकी सरकार की इन योजनाओं का अंत तब हो गया जब स्वर्गीय प्रमोद महाजन ने आगे बढ़कर शिवराज सिंह चौहान को मुख्यमंत्री बनवा दिया। जोर जबरदस्ती से किए इस पदारोहण के बाद मध्यप्रदेश में विदेशी कर्ज आधारित योजनाओं को लागू करने का स्वर्णयुग आ गया। सड़कों, बिजली और पानी की योजनाओं के लिए भारी भरकम कर्ज लिए जाने लगे। भारी बहुमत होने के कारण इन योजनाओं को दना दन मंजूरियां भी मिलती गईं। भाजपा को ये बहुमत लगातार तीन कार्यकालों तक मिलता रहा। हर छोटा बड़ा प्रोजेक्ट विदेशी कर्ज लेकर चलाया जाता रहा। बीआरटीएस के लिए भी भोपाल नगर निगम को साढ़े तीन सौ करोड़ रुपए का कर्ज दिलाया गया। इससे शहर को एक सिरे से दूसरे सिरे तक जोडने वाले मुख्य़ मार्ग का चौड़ीकरण भी किया गया और उसके बीच आरक्षित मार्ग भी बनाया गया। सड़क के बीच बनने वाले इस मार्ग का विरोध भी किया गया। कई जगहों पर लोगों को सड़क पार करने के लिए लंबा रास्ता तय करना पड़ता था जिससे लोग सबसे ज्यादा परेशान हुए। इस प्रोजेक्ट में कई अंडरपास,फ्लाईओवर और ओवरहेड पाथ वे भी बनाए जाने थे,बजट की कमी के कारण ये नहीं बनाए जा सके। बैरागढ़ के बाजार में बीआरटीएस से मुख्य मार्ग के व्यापारियों का कारोबार भी प्रभावित हुआ इसकी वजह से वहां छुटपुट विरोध भी पनपा।

    बीआरटीएस की आज भले ही आलोचना की जाती हो लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में सार्वजनिक परिवहन को बढ़ाने का इससे अच्छा कोई दूसरा तरीका नहीं था। कांग्रेस नीत यूपीए सरकार ने सार्वजनिक परिवहन को बढ़ाने के लिए ही जवाहर लाल शहरी नवीनीकरण परियोजना के तहत लो फ्लोर बसें चलाई थीं। एक कंपनी बनाकर उसे कर्ज दिया गया और बसें शुरु की गईं। इसकी वजह शहरों का अनियंत्रित विकास था। पूर्ववर्ती कांग्रेस की सरकारों ने बहुमंजिला रहवासी प्रोजेक्ट मंजूर नहीं किये नतीजतन दूरदराज के खेतों को बिल्डरों ने कालोनी बनाकर बेचना शुरु कर दिया। इससे कांग्रेस को चंदा देने वाले बिल्डर तो मिले लेकिन शहरों की सीमाएं दूर दूर तक फैल गईं। इससे शहर के एक कोने में रहने वाले व्यक्ति को दूसरे सिरे पर मौजूद अपने दफ्तर, फैक्टरी या बाजार तक पहुंचना भारी मंहगा सौदा साबित होने लगा था। बीआरटीएस इस समस्या के समाधान में मील का पत्थर साबित हुआ। शहर में एंबुलेंस, फायर बिग्रेड, वीआईपी मूवमेंट, सुरक्षित और त्वरित गति से करने के लिए बीआरटीएस सफल साबित हुए। शिवराज सिंह सरकार ने यूपीए सरकार की तमाम योजनाओं को न केवल लागू किया बल्कि कर्ज आधारित विकास के कई नए आयाम भी गढ़े।

    शिवराज सिंह सरकार ने कर्ज लेकर बांटने के लिए नई नई योजनाएं शुरु कर दीं। प्रदेश की आय बढ़ाने में जुटे वित्तमंत्री राघवजी भाई को अनैतिकता के मामले में फंसाने और रास्ते से हटाने की मुहिम भी इसी का हिस्सा थी ताकि कर्ज लेने की जरूरत लगातार बनी रहे। इन योजनाओं से जनता तो प्रसन्न हुई ही साथ में शिवराज सिंह के सहयोगी भी मालामाल हो गए। सड़क निर्माण करने वाली कंपनी दिलीप बिल्डकान का टर्नओवर तो अरबों तक पहुंच गया। कांग्रेस के लिए इस विकास के मायाजाल को काटना बहुत मुश्किल हो गया था। सिंहस्थ के बाद मुख्यमंत्री या सरकार बदलने की मान्यता का सहारा लेकर इस बार कांग्रेस इस जाल को काटने में कामयाब साबित हुई है। कांग्रेस जानती है कि विकास नीति के इस स्वरूप की सबसे बड़ी कीमत दिग्विजय सिंह सरकार को ही चुकानी पड़ी थी।

    दिग्विजय सिंह ने व्यापमं कांड और अन्य प्रयासों से शिवराज सिंह सरकार पर खूब तंज कसे और उसे अपने इलाके के विकास कार्य जारी रखने पर मजबूर किया।इसके बावजूद वे सत्ता खोने के लिए कांग्रेस के भीतर खलनायक बने रहे। शिवराज के मायाजाल को काटने के लिए उन्होंने पैदल नर्मदा परिक्रमा कर डाली। कांग्रेस ने किसानों के बीच शिवराज सिंह की बढ़ती लोकप्रियता को काटने के लिए कर्जमाफी का दांव खेला और शिवराज की ही शक्ति से उन्हें पराजित कर डाला।

    अब कमलनाथ सरकार में जब दिग्विजय सिंह के बेटे जयवर्धन सिंह केबिनेट मंत्री बन गए हैं तब दिग्विजय सिंह अपनी पूर्ववर्ती सरकार का नाश करने वाली विदेशी कर्ज आधारित परियोजनाओं की परतें खोलने में जुट गए हैं। ये योजनाएं भारी भ्रष्टाचार की वजह भी बनीं थीं। प्रदेश पर कर्ज का भारी दबाव भी इनकी वजह से ही बढ़ा है। सरकार को हर महीने कर्ज के ब्याज के रूप में अपनी आय का बड़ा हिस्सा खर्च करना पड़ता है। सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू हो जाने के बाद सरकार की चुनौतियां बढ़ी हैं। उसकी आय का बड़ा हिस्सा तो केवल वेतन भुगतान पर ही खर्च हो जाता है। बाकी पैसा ब्याज चुकाने में खर्च हो जाता है। ऐसे में सरकार उन योजनाओं की कलई उतारने में जुट गई है। बैरागढ़ में सिंधियों के आक्रोश की वजह कई हैं। बीआरटीएस भी उसमें एक छोटी वजह है। इसके बावजूद जयवर्धन सिंह उसे मुद्दा बनाकर बीआरटीएस खोदने की अपील कर रहे हैं। हालांकि इसके लिए अब लगभग सौ करोड़ रुपयों का खर्च आने की संभावना है। क्योंकि बीआरटीएस को खोदना फिर उस पूरे ढांचे को नया रूप देना पड़ेगा जिस पर सरकार ने कर्ज लिया है।इसके बावजूद कर्ज ली गई रकम पर ब्याज तो देना ही पड़ेगा। साथ में मूलधन भी चुकाना होगा। इसलिए बीआरटीएस का विरोध एक तरह से गलती पर गलती ही साबित होने जा रहा है।

    जाहिर है कि नए नवेले मंत्री जयवर्धन सिंह हों या अल्पमत के बीच विरोधी मानसिकता के दलों का सहारा लेकर सत्ता में आई कमलनाथ सरकार इस तरह के विरोधों से वह नए विवादों को ही जन्म दे रही है। वह अंतर्स्फूर्त विकास की नई परिभाषा साकार कर सकती है। उसे प्रदेश के विकास का अवसर मिला है।इस मौके को यदि वो झगड़ों झंझटों के बीच ही गंवा देगी तो ये एक राजनीतिक गलती साबित होगी। सरकार को चाहिए कि वो अपने कामकाज में पारदर्शिता लाए। सरकार के बजट की बारीकियों को सार्वजनिक करे। यदि वो भी विदेशी कर्ज आधारित विकास को लागू करने वाली सरकार है तब तो उसे इस तरह के विवादों को हवा देना आत्महंता कदम साबित होगा। जरूरत इस बात की है कि वो सार्वजनिक परिवहन के इस ढांचे को न केवल स्वीकार करे बल्कि इसे सफल बनाने की कोई जुगत भी निकाले ताकि बीआरटीएस में बसों के फेरे बढ़ाए जा सकें। नियमित अंतराल पर बसों की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके। इससे लोगों को निजी वाहनों से चलने की मजबूरी से निजात मिल सकेगी। उन्हें सस्ता परिवहन उपलब्ध कराया जा सकेगा। जो लोकप्रिय फैसला साबित होगा।

  • वंचितों को सक्षम बना रही मोदी सरकार : कृष्णा राज

    वंचितों को सक्षम बना रही मोदी सरकार : कृष्णा राज


    केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री ने दी अनुसूचित जाति मोर्चा के राष्ट्रीय अधिवेशन की जानकारी

    भोपाल16 जनवरी,(प्रेस सूचना केन्द्र)। समाज के वंचित तबके को कांग्रेस की सरकारें वोट बैंक समझती रहीं। इसलिए यह तबका आज भी पिछड़ा हुआ है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की सरकार इस वर्ग को सक्षम बनाने और उन्हें उनके मूलभूत अधिकार प्रदान करने का काम कर रही है। यह बात बुधवार को केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री श्रीमती कृष्णा राज ने पत्रकारों से चर्चा करते हुए कही। उन्होंने नागपुर में होने वाले अनुसूचित जाति मोर्चा के दो दिवसीय सम्मेलन की जानकारी भी दी।
    भाजपा सरकार ने ली वंचितों की सुध
    केंद्रीय राज्यमंत्री श्रीमती कृष्णा राज ने कहा कि कांग्रेस की सरकारों ने देश पर 70 सालों तक राज किया। इस दौरान ये सरकारें वंचित वर्ग को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करती रही, लेकिन उनकी दयनीय स्थिति को सुधारने के लिए कुछ नहीं किया। 2014 में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनने के बाद सरकार ने इस वर्ग के लिए वास्तविक प्रयास शुरू किए। प्रधानंमत्री श्री मोदी ने डॉ. अम्बेडकर की सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय भावना को मजबूत करने के लिए काम शुरू किया। उन्होंने संसद का विशेष सत्र भी बुलाया और अपने साढ़े चार वर्षों के कार्यकाल में गरीब और वंचित वर्ग को सक्षम बनाने, उनके अधिकार दिलाने के लिए कई योजनाएं शुरू कीं।
    कांग्रेस वोट लेती रही, नहीं किए प्रयास
    श्रीमती कृष्णा राज ने कहा कि आजादी के बाद कांग्रेस लंबे समय तक अनुसूचित जाति वर्ग के वोट लेती रही, लेकिन इन सालों में अनुसूचित जाति वर्ग का सामाजिक और आर्थिक उत्थान नगण्य रहा। बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर के जीवन से जुड़े पांच स्थानों को पंचतीर्थ का दर्जा देने वाली प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने गरीबों और वंचितों को वास्तविक लाभ पहुंचाने के लिए योजनाएं शुरू कीं। उन्होंने कहा कि सबका साथ-सबका विकास की नीति पर चलने वाली मोदी सरकार ने किसी जातिगत आधार पर योजनाएं भले ही न बनाई हों, लेकिन गरीबों के लिए शुरू की उनकी योजनाओं से लाभान्वित होने वाले लोगों में बड़ी संख्या अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग के लोगों की ही हैं। उन्होंने कहा कि चाहे प्रधानमंत्री आवास योजना हो, उज्जवला योजना हो या आयुष्मान भारत योजना हो, सभी का लाभ हमारे अनुसूचित जाति वर्ग के लोग भरपूर ले रहे हैं।
    किसानों की समस्याओं का स्थायी हल खोज रही सरकार
    केन्द्रीय कृषि राज्यमंत्री श्रीमती कृष्णा राज ने कहा कि देश का किसान कर्ज से दबा है। लेकिन कांग्रेस की सरकारें समस्या को समझने की बजाय भटकाने की नीति पर चलती रहीं। उनकी समस्याओं को समझते हुए प्रधानमंत्री श्री मोदी की सरकार ने किसानों के लिए मृदा परीक्षण योजना, प्रधानमंत्री सिंचाई योजना आदि लागू की।
    इसके अलावा वर्ष 2022 तक देश के किसानों की आय को दोगुना करने की नीति पर चलते हुए मोदी सरकार ने स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट से भी अधिक करते हुए किसानों को उनकी लागत का डेढ़ गुना समर्थन मूल्य दिलाने का काम किया है। श्रीमती राज ने कहा कि हमारी सरकार सबको साथ लेकर देश का निर्माण करने की नीति पर चल रही है। देश में अब वोट बैंक की राजनीति नहीं चलेगी और आने वाले लोकसभा चुनाव में भी प्रचंड बहुमत के साथ प्रधानमंत्री श्री मोदी के नेतृत्व में एनडीए की ही सरकार बनेगी।
    राष्ट्रीय अधिवेशन में होगी समस्याओं पर चर्चा
    श्रीमती कृष्णा राज ने कहा कि अनुसूचित जाति वर्ग की समस्याओं और इस वर्ग के लिए सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों पर चर्चा के लिए भारतीय जनता पार्टी अनुसूचित जाति मोर्चा का दो दिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन नागपुर में आयोजित किया जा रहा है। 19 और 20 जनवरी को आयोजित किए जा रहे इस अधिवेशन में मोर्चें के प्रदेश पदाधिकारी, कार्यसमिति सदस्य, जिला अध्यक्ष और महामंत्री भाग लेंगे। उन्होंने बताया कि इस अधिवेशन में करीब 10 हजार प्रतिभागियों के भाग लेने की संभावना है। इस दौरान श्रीमती कृष्णा राज के साथ वरिष्ठ नेता एवं पूर्व मंत्री श्री लालसिंह आर्य एवं अजा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष श्री सूरज केरो, श्री मुकेश टटवाल उपस्थित थे।

  • भाजपा को भारी पड़ा सिंधिया पर हमला करना

    भाजपा को भारी पड़ा सिंधिया पर हमला करना

    भोपाल,(डॉ.अजय खेमरिया)। ग्वालियर चंबल संभागों में कुल मिलाकर 34 विधानसभा की सीट्स है इस बार यहां बीजेपी को जबरदस्त नुकसान उठाना पड़ा है 2013 की तुलना में 13 सीट बीजेपी ने गंवा दी बसपा को भी एक सीट का नुकसान हुआ है।मुरैना ओऱ अशोकनगर जिलों में बीजेपी का सफाया हो गया।चुनाव परिणाम के आंकड़ो को अगर खंगाला जाए तो कुछ मोटे कारण निकलकर सामने आते है बीजेपी की इस पराजय के:
    (1)एट्रोसिटी एक्ट
    (2)खराब प्रत्याशी चयन
    (3)बीजेपी का संगठन स्तर पर उदासीनता
    (4)चुनाव प्रबन्धन के नाम पर कोई मैकेनिज्म का न होना जैसा 2003,2008,2013 में नजर आता था।
    (5)बीजेपी का पहली बार कांग्रेस कल्चर में अवतरित होना जहाँ हर सीट पर बीजेपी ने बीजेपी को हराया।

    सबसे पहले बात श्योपुर जिले की जहां बीजेपी के दुर्गालाल विजयवर्गीय बुरी तरह हारे है श्योपूर सीट से यहां कांग्रेस का टिकट सिंधिया जी के विरोध के बाबजूद बसपा से आये बाबू जंडेल मीणा को मिला पहली बार मीणा जाति ने यहां एकजुट होकर वोट किया जो लगभग 45 हजार है संख्या में। कांग्रेस के नेता चाह कर भी बाबू जंडेल का नुकसान नही कर पाये।मीणा के अलावा मुस्लिम और दलित आदिवासी भी कांग्रेस की बम्पर जीत का आधार बनें।इसके अलावा पूरी बीजेपी ने भी दुर्गालाल को निपटाने का काम किया, बीजेपी के लगभग सभी नेता टिकट बदलबाने के लिये अंतिम समय तक लगे रहे लेकिन पार्टी ने टिकट नही बदला परिणाम सामने है।संभव है टिकट बदलने से यहां इतनी बड़ी हार न हो पाती।जिले की दूसरी सीट है विजयपुर यहां जो उलटफेर हुआ वह कतई चौकाने वाला नही है कांग्रेस के कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष रामनिवास रावत की हार पहले से ही तय थी वे खुद साल भर पहले ही क्षेत्र छोड़कर सबलगढ में सक्रिय थे लेकिन ऐनवक्त पर उनका टिकट नही बदला गया।रामनिवास रावत की हार उनके ही जमाये सिस्टम ने भी तय कर दी बसपा से लड़े बीजेपी नेता बाबूलाल मेवरा को लेकर चरचा थी वे रामनिवास के सबलगढ़ जाते ही कांग्रेस टिकट पर विजयपुर से लड़ सकते है लेकिन सब कुछ गड़बड़ा गया और बाबूलाल मेवरा हाथी की सवारी कर गए यही एक बड़ा फ़ेक्टर रहा रामनिवास रावत की हार का ।आमने सामने की फाइट में वे लगातार दो बार बीजेपी के सीताराम को हराते आ रहे थे लेकिन इस बार बीजेपी के नाराज वोटर और कार्यकर्ताओं की फ़ौज बाबूलाल के साथ जुट गई और दोनो को विरोधी लॉबी सीताराम को जीता ले गई।रामनिवास के लिये जीवन का सबसे बड़ा सदमा है क्योंकि वे इस सरकार में सिंधिया कोटे से सबसे ताकतवर मंत्री होते महेंद्र सिंह कालूखेड़ा के निधन के बाद रामनिवास ही उनके विकल्प थे लेकिन उनकी हार ने खुद के साथ सिंधिया का गणित भी बिगाड़ दिया।रामनिवास की अहमियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1993 की सरकार में वे मंत्री रह चुके है।उनकी हार का बुनियादी कारण 5 बार की एन्टीनकम्बेंसी ही है।

    (1)अब मुरैना जिले की चर्चा करें तो सबसे पहली सीट है सबलगढ।
    सबलगढ़ में बीजेपी प्रत्याशी चयन में भूल कर गई एक ही परिवार मेहरबान रावत को 30 साल से लगातार टिकट आबंटन नुकसानदेह साबित हुआ।एक ही रावत केंडिडेट होने के बाबजूद बीजेपी का तीसरे नम्बर पर रहना परिवार की खिलाफत का फैक्टर क्रिएट करता है यहां से कांग्रेस ने कुशबाह जाति पर दांव खेला जो सफल साबित हुआ कमलनाथ के प्रभावी भूमिका में होने से सुरेश चौधरी परिवार की नाराजगी भी कम हो गई सवर्ण खासकर ब्राह्मण,वैश्य,ठाकुर शुरू से ही मेहरबान रावत के विरुद्ध थे पहले उन्होंने बसपा को सपोर्ट किया फिर कुछ लोग कांग्रेस के पक्ष में आये नतीजतन बीजेपी के साथ केवल रावत और अन्य परम्परागत कैडर वोट रह गए यहां जादोन्न ठाकुरों,ब्राह्मण,और वैश्य वर्ग ने बीजेपी को अपना समर्थन नही दिया।एट्रोसिटी से ज्यादा रिएक्शन रावत परिवार के विरुद्ध था पार्टी अगर यहाँ बीरसिंह रावत,कमल रावत,या बादशाह रावत को टिकट देती तो शायद ये परिणाम नही आता ।बीजेपी के जिलाध्यक्ष खुद यहां से दावेदार थे।सीपी शर्मा,विनोद जादोन्न जैसे नेता मैनेज किये जा सकते थे पर संगठन सिर्फ नाम का नजर आया।पिछला चुनाव मेहरबान सिंह ये कहकर जीते थे कि ये उनका अंतिम चुनाव है इसके बाबजूद पार्टी ने बदलाब की जगह इसी परिवार को टिकट देकर रावत समाज मे भी अपना बेस गंवा दिया।

    (2)जिले की दूसरी सीट है जोरा।पहली बार बीजेपी के सूबेदार सिंह रजौधा जीते थे यहाँ2013 में उनकी हार हुई है इसके बाबजूद इस सीट पर बीजेपी के पास रजौधा का कोई विकल्प नही था पिछले चुनाव में उन्हें जिन त्यागी ब्राह्मणो ने खुलकर सहयोग किया था वे इस बार बनबारी शर्मा के साथ हो गए जो 2013 में नजदीकी मुकाबले में हार गए थे इसके अलावा किरार वोटर का एकमुश्त बसपा के मनीराम के साथ जाना भी यहॉ बीजेपी के लिये नुकसान कर गया।कैलारस और जोरा के व्यापारी वर्ग में भी बीजेपी का वोट कट गया ,कुशवाह वोट सबलगढ़ के कुशबाह के चलते कांग्रेस की तरफ गया इस तरह बीजेपी के रजौधा बाहर हो गए।

    (3)मुरैना की सीट पर मंत्री रुस्तम सिंह की हार पर किसी को आश्चर्य नही है मुरैना में दीवार पर मोटे हरूफ में लिखी इस हार को अनपढ भी पढ़ रहा था पर बीजेपी ने जानकर भी क्यों नही पढा ?ये समझ से परे है।ब्राह्मण, वैश्य दोनो समाज निजी रूप से रुस्तम सिंह के खिलाफ थी अगर रुस्तम सिंह की जगह हमीर पटेल या अनिल गोयल बीजेपी केंडिडेट होते तो मामला उलट सकता था यहां सबसे बड़ा फैक्टर रुस्तम सिंह ही थे ।

    (4)सुमावली की सीट पर बीजेपी के पास अजब सिंह कुशवाह के अलावा कोई अच्छा विकल्प नही था उन्होंने टक्कर भी ठीक दी लेकिन किरार और ब्राह्मण वोटर बीजेपी को उस अनुपात में नही मिला जितना जीत के लिये आवश्यक था किसानों की कर्जमाफी यहां एक फैक्टर रही है।दलित वोट भी बड़ी संख्या में बसपा से कटकर कांग्रेस की तरफ चला गया।

    (5)अंबाह में बीजेपी को सीधा नुकसान ब्राह्मण और ठाकुर बिरादरी ने पहुचाया इन्ही ने नेहा किन्नर को लड़ाया एट्रोसिटी का यहाँ ज्यादा असर था फिर व्यापारी वर्ग ने भी अंबाह पोरसा में बीजेपी का साथ नही दिया।

    (6)दिमनी में कांग्रेस का केंडिडेट बहुत एक्टिव था उसे सभी वर्गों का समर्थन मिला है बीजेपी यहां भी केंडिडेट के मामले में चूक कर गई अगर ब्राह्मण चेहरे या फिर केंद्रीय मंत्री नरेंद्र तोमर के बेटे को लड़ाया जाता तो परिणाम बदल सकता था यहाँ तोमर ठाकुरों ने भी इस बार बीजेपी का विरोध किया है।एट्रोसिटी यहां भी एक बड़ा फैक्टर रहा है।

    *मुरैना जिले में बीजेपी की इस पराजय का मूल कारण है दो बड़ी जातियों की नाराजगी ब्राह्मण और वैश्य। 2013 और 2018 में बीजेपी ने किसी भी ब्राह्मण को टिकट नही दी जबकि काँग्रेस ने इस बार 6 मे से 2 सीटों पर ब्राह्मणो को उतारा।वैश्य जाति में केएस के मालिक रमेश गर्ग की नाराजगी ने मुरैना,अंबाह,सबलगढ़ ओऱ जोरा सीटों पर खेल खराब कर दिया।बीजेपी का संगठन पूरे चुनाव में तमाशबीन नजर आया भगवान और केंडिडेट भरोसे हुए सभी जगह चुनाव।गुर्जर तो बीजेपी के परम्परागत रूप से यहां विरोधी थे ही।साथ ही बसपा का कोर वोटर पूरे जिले में कांग्रेस की तरफ ट्रांसफर हुआ और 2 अप्रेल की घटना के बाद सबसे ज्यादा पुलिस केस और जेल इस जिले में ब्राह्मण,वैश्य,ठाकुरों ने ही झेले थे इन सभी सम्मिलित कारणों ने जिले से बीजेपी के सफाये की पटकथा लिख दी थी।

    ……………….भिण्ड……………. .
    (1)भिण्ड की पराजय अप्रत्याशित नही है जिस तरह से अंतिम समय मे यहां टिकट फाइनल किया गया वह हार का कारण साबित हुआ बसपा प्रत्याशी संजू कुशबाह 5 साल से सक्रिय थे विधायक नरेंद्र कुशबाह के बागी होने,कांग्रेस के ब्राह्मण केंडिडेट आने से भिण्ड का पूरा गणित ही बीजेपी के खिलाफ हो गया था।90 फीसदी संगठन नरेंद्र कुशबाह के साथ था जो सिर्फ बीजेपी को हराने के लिये मैदान में थे।कांग्रेस की ठाकुर लॉबी ने भी चौधरी साब को हराने के लिये मेहनत की ।खुद चौधरी अपना पारिवारिक वजूद बरकरार नही रख पाए।भिण्ड की सीट पर चंबल में अकेली सीट थी जहां बसपा का वोट उसके साथ मजबूती से जुड़ा रहा।

    (2)अटेर की सीट पर बीजेपी के अरविंद भदौरिया इस बार जीतने में इसलिये सफल रहे क्योंकि यहां कांग्रेस और ब्राह्मण लॉबी में हेमन्त कटारे की जमकर खिलाफत की वहीँ भदौरिया बैल्ट में 2013 और उपचुनाव की तरह भीतरघात नही हो पाया,भाजपा के बड़े नेताओं की कम से कम भदौरिया ठाकुरों ने नही सुनी इसके अलावा हेमन्त का लगातार क्षेत्र से गायब रहना, उनका खराब व्यवहार भी उनकी हार का आधार बना है।

    (3)मेहगांव की सीट पर ओपीएस भदौरिया की जीत पहले से ही तय थी पिछली बार वे नजदीकी मुकाबले में हारे थे बीजेपी ने यहां भी केंडिडेट चयन में चूक की अच्छा होता यहाँ केपीएस भदौरिया को टिकट दी जाती वे अपने धनबल से भदौरिया वोटर्स में डिवीजन करा लेते बल्कि अन्य समाज का वोट भी ले सकते थे।राकेश शुक्ला इस मल्टी कास्ट सीट पर पहले दिन से ही फिट नही थे बसपा ने कौशल तिवारी को टिकट देकर उनकी सँभाबना और कमजोर कर दी। लोधी बघेल गुर्जर जैसी जातियों का समर्थन बीजेपी को नही मिला।राकेश शुक्ला 2013 में निर्दलीय लड़े थे उन्हें इसके बाबजूद बीजेपी टिकट देना गलत निर्णय साबित हुआ।

    (4)गोहद में भी केंडिडेट का सिलेक्शन गलत साबित हुआ चुनाव पूर्व एट्रोसिटी का सबसे ज्यादा हल्ला इसी सीट पर था कोई भी लाल सिंह आर्य की जीत की बात स्वीकार्य करने तैयार नही था।यहां विशुद रूप से एट्रोसिटी और माई के लाल फैक्टर ने बीजेपी को हराया है।

    (5)लहार की सीट पर डॉ गोविंद सिंह की जीत पहले से ही तय थी उनका जीवंत सम्पर्क इसका आधार है बीजेपी के रसाल सिंह अच्छे केंडिडेट थे लेकिन गुड्डू शर्मा ने बगाबत कर बीजेपी की सँभाबना को खत्म कर दिया गुड्डू शर्मा की बगाबत गोविंद सिंह को जिताने के लिये ही थी जिसे आसानी से हर कोई समझ रहा था।
    भिण्ड जिले में ऐसा पहली बार हुआ है जब कोई ब्राह्मण विधायक चुनकर नही आया है।बीजेपी के दोनों केंडिडेट राकेश शुक्ला और राकेश चौधरी दोनो हार गए और रमेश दुबे को जिस काम के लिये टिकट दी गई थी उसे उन्होंने भी पूरा कर दिया। इसी तरह मुरैना जिले में भी पहली बार हुआ है जब कोई ठाकुर विधानसभा नही पहुँचा है।
    भिण्ड-मुरैना में बीजेपी की हार एट्रोसिटी, माई के लाल,खराब केन्डिडेचर के चलते हुई है।मुरैना में ब्राह्मण,वैश्य,ठाकुर,जाटव गुर्जर,किरार, जातियां उसके खिलाफ रही है।
    भिण्ड में ठाकुर,वैश्य,जाटव,ब्राह्मणो के अलावा बघेल,लोधी,कौरव ने भी बीजेपी का साथ नही दिया।सिंधिया का आक्रमक प्रचार और बीजेपी का अतिशय रक्षात्मक रुख भी हार के ठोस कारणों में एक है।

  • कांग्रेस के लिए रक्षा क्षेत्र फंडिंग का स्रोतःनरेन्द्र मोदी

    कांग्रेस के लिए रक्षा क्षेत्र फंडिंग का स्रोतःनरेन्द्र मोदी

    नई दिल्ली,15 दिसंबर(प्रेस सूचना केन्द्र)।राफेल मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस पर बड़ा आरोप लगाया है. कांग्रेस पर पीएम मोदी ने पलटवार करते हुए कहा कि वो पैसा बनाने का रास्ता खोज रही है. कांग्रेस ने देश के रक्षा क्षेत्र को लूटा है.

    पीएम मोदी ने कहा, ‘कांग्रेस ने हमेशा पैसा बनाने का रास्ता खोजा है. कांग्रेस के लिए रक्षा क्षेत्र फंडिंग का स्रोत रहा है.’ उन्होंने कहा कि कांग्रेस के घोटालों से सेनाओं के मनोबल में गिरावट आई. उन्होंने (कांग्रेस) सेनाओं के मनोबल की भी चिंता नहीं की.

    उन्होंने ट्वीट कर कहा कि कांग्रेस के राज में यानी 40 और 50 के दशक में जीप घोटाला हुआ. 80 के दशक में बोफोर्स घोटाला हुआ. उन्होंने कांग्रेस राज के घोटालों की लिस्ट को लंबा करते हुए कहा कि उन्हीं की सरकार में अगस्ता और सबमरीन घोटाला हुआ.

    पीएम मोदी ने नई दिल्ली से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए तमिलनाडु के भाजपा कार्यकर्ताओं के साथ संवाद के दौरान कहा, ‘कांग्रेस के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा क्षेत्र या तो तिरस्कृत क्षेत्र या फिर आय का स्रोत है. वे सब (कांग्रेस) इसे धन बनाने का जरिया मानते हैं चाहे इससे हमारे बलों के मनोबल पर ही प्रभाव क्यों न पड़ता हो.’

    प्रधानमंत्री ने कहा, ‘हमें अपने बलों पर गर्व है और उन पर विश्वास है.’ राजस्थान में हाल में चुनाव प्रचार के दौरान मोदी ने सेना द्वारा सितंबर 2016 में सीमा पार किए गए सर्जिकल स्ट्राइक पर ‘संदेह व्यक्त करने’ को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की निन्दा की थी.

    मोदी ने आरोप लगाया था कि सैन्य अभियान से विपक्ष को खुशी की जगह दुख हुआ. कांग्रेस पर उनका हमला ऐसे समय आया है जब गांधी ने मोदी पर सर्जिकल स्ट्राइक को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करने तथा युवाओं को नौकरी देने में विफल रहने का आरोप लगाया.

    इधर, बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता अनिल बलूनी ने कहा कि राफेल पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा दूध का दूध और पानी का पानी करने के बाद कांग्रेस और राहुल गांधी एंड कंपनी बौखला गई है. बीजेपी सोमवार को देश में 70 स्थानों पर प्रेस वार्ता के जरिये कांग्रेस द्वारा देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ और सरकार के खिलाफ षड्यंत्र रचने की साजिश को बेनकाब करेगी.

  • शिवराज से मुक्ति मंहगी,सस्ती है भाजपा की हार

    शिवराज से मुक्ति मंहगी,सस्ती है भाजपा की हार


    -आलोक सिंघई-
    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब एक जनसभा में मध्यप्रदेश के अतिलोकप्रिय मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का संबोधन किया तो लोग हैरान रह गए कि मोदी ने ऐसा क्यों बोला। लोगों का मानना था कि मोदी अपने सहयोगी की शान बढ़ाने के लिए ऐसा बोल गए।जबकि राजनीति के खुरपेंच खंगालने वालों को अहसास हो गया था कि मध्यप्रदेश की राजनीतिक उलटबांसी की जानकारी मोदी तक पहुंच चुकी है।इसके बाद पार्टी संगठन से जुड़े वरिष्ठ पदाधिकारी भी समय समय पर खरीदी जा रही लोकप्रियता की खबरों पर हैरान होते रहे,लेकिन शिवराज को कुर्सी पर बिठाए रखने वाले उद्योगपतियों और दलालों का जाल इतना मजबूत था कि उन्होंने शिवराज को पद से डिगने नहीं दिया। पार्टी संगठन के कई पदाधिकारी बार बार प्रयास करते रहे कि पार्टी के मौजूदा हालात बदलें पर विकल्पहीनता ने उन्हें खामोश कर दिया। ये विकल्पहीनता पार्टी के बधियाकरण का हिस्सा थी। चुन चुनकर कर्मठ नेताओं को पंगु बनाया जाता रहा। जो नेता कभी शक्तिकेन्द्र के रूप में सिर उठा सकता था उसके विरुद्ध आपरधिक मामले खोले जाते रहे। इलाकाई क्षत्रपों को उनके प्रतिद्वंदियों से घेरा जाता रहा। नतीजतन भाजपा एक ऐसी अंधीगली में पहुंच गई जहां आगे का रास्ता बंद था।

    आज भाजपा की हार के लिए जिस एंटी इनकमबेंसी की बात कही जा रही है वो सत्ता विरोधी लहर तो भाजपा के भीतर से ही जन्म ले रही थी। चूहा बिल्ली के इस खेल में शिवराज जी भोली मुखमुद्रा से बच लिए लेकिन उनकी धर्मपत्नी साधना सिंह नेताओं की आंखों की किरकिरी बन गईं।प्रमुख सचिव एसके मिश्रा के माध्यम से सत्ता का शोषण करने की उनकी शैली पार्टी के भीतर चिढ़ की वजह बनने लगी। भ्रष्ट अफसरों को मैदानी कार्य देना और ईमानदार अफसरों को घर बिठा देने की वजह से बदनामियों की सुगबुगाहट शिवराज सिंह के पूरे कार्यकाल में हताशा फैलाती रही।यदि भाजपा और संघ के समर्पित कार्यकर्ताओं की जगह कांग्रेस में ये बातें फैलतीं तो पार्टी में ही विरोध के स्वर भी गूंजने लगते लेकिन भाजपा में शांति छाई रही और लोगों को सत्ता से चिढ़ का अहसास नहीं हुआ। अफसरों ने एसके मिश्रा के भ्रष्टाचारों पर खूब चर्चाएं कीं जो चटखारे लेकर सुनी सुनाई जाती रहीं। अंतिम दौर में शिवराज सिंह के बुधनी फार्म हाऊस की फिल्म पर भी लोगों ने आसानी से यकीन कर लिया,जबकि वो फार्म हाऊस शिवराज ने बैंक से कर्ज लेकर ख़ड़ा किया था। जो मुख्यमंत्री दो लाख दस हजार करोड़ से ऊपर का बजट खर्च करता हो उसके मात्र सात करोड़ के फार्म हाऊस को बड़ा भ्रष्टाचार माना गया।ये खबरें भी उन्हीं अफसरों ने उड़ाईं जो शिवराज में कमीशनखोरी करते हुए अरबपति बन गए थे।

    चुनाव के बाद शिवराज सिंह ने नोटबंदी, एट्रोसिटी एक्ट और जीएसटी को अपनी हार की वजह बताया था। जबकि एट्रोसिटी एक्ट पर शिवराज का दिया वो बयान सुर्खियां बना जिसमें उन्होंने कहा था कि कोई माई का लाल आरक्षण समाप्त नहीं कर सकता। सपाक्स के नेताओं का तो ध्येय वाक्य यही बना और उन्होंने भाजपा के वोट बैंक को छिन्न भिन्न करने में सफलता पाई। सपाक्स ने वोट तो बहुत कम पाए लेकिन भाजपा का जनाधार तोड़ दिया। भाजपा से हटा ये वोट कांग्रेस के खाते में गया और उसके वोट बैंक में भरपूर इजाफा हुआ। दंभी सवर्णों खासतौर पर ब्राह्मणों ने माई के लाल को ध्वजवाक्य बना लिया। आज भी वे इस ध्वजा को फहरा रहे हैं। भाजपा का कमजोर संगठन और दोयम दर्जे के अकुशल नेताओं को अपने करीब जुटा लेने की शिवराज सिंह की अकुशलता ने भाजपा को उसकी जड़ों से काट दिया। जबकि इसकी तुलना में जिस विंध्य प्रदेश को भाजपा के लिए खतरे की घंटी माना जा रहा था वहां संगठन के एक मजबूत स्तंभ बीडी शर्मा ने वो जादू बिखेरा कि जिसकी आंधी में अजय सिंह राहुल,और सुंदरलाल तिवारी जैसे दिग्गज भी उड़ गए। जिस अभय मिश्रा को राजेन्द्र शुक्ल के लिए चुनौती माना जा रहा था वे भी अंततः ध्वस्त कर दिए गए। इसका मतलब साफ है कि जिस चुनौती पर आसानी से विजय पाई जा सकती थी उसके सामने संगठन के अकुशल नेतृत्व ने हथियार डाल दिए। इसकी एक वजह ये भी थी कि भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह फायरब्रांड नेता तो थे लेकिन उनमें संगठन क्षमता का नितांत अभाव देखने मिला। उनके पास संगठन को एकजुट करने का वक्त भी कम था लेकिन यदि वे सरताज सिंह, धीरज पटैरिया, रामकृष्ण कुसमारिया जैसे कई बागियों को मना पाते तो भाजपा कई सीटें आसानी से बचा लेती। भिंड, दमोह, बमोरी, पथरिया, महेश्वर जैसी सीटें ही भाजपा के पास आ जातीं तो वो आसानी से सरकार बनाने की स्थिति में आ जाती।

    जो नोटबंदी और जीएसटी भाजपा की जीत की वजह बन जानी थीं उसे अपने भोंदू सलाहकारों की वजह से वे हार का कारण मानते रहे। नोटबंदी के बाद भाजपा की सरकार और संगठन को जिस तरह से व्यापारियों और आम लोगों का मार्गदर्शन करना था उन्होंने नहीं किया। उलटे शिवराज जी लोगों के बीच सफाई देते घूमते रहे कि नोटबंदी उन्होंने नहीं की है ये तो केन्द्र का फैसला है। समानांतर अर्थव्यवस्था को तोड़ने के लिए उठाए गए ये कदम कैसे लोगों की समृद्धि की चाभी बन सकते हैं इसे समझाने में असफल रहने के कारण नाराजगी बढ़ती गई। कांग्रेस ने इस मुद्दे पर कमर के नीचे वार करने में भी कोई कोताही नहीं बरती। उसका एक विज्ञापन जो कहता था कि धंधा चौपट करने वाली सरकार बदल दो कई दिनों तक चलता रहा। जब जीएसटी काऊंसिल ने कांग्रेस हाईकमान से नाराजगी दर्ज कराई तब जाकर उसे बंद किया गया। ये विज्ञापन टैक्स चोरों को उकसाने वाला था लेकिन भाजपा के सलाहकार उसका जवाब नहीं दे पाए। इसकी तुलना में भाजपा के विज्ञापन नीरस और अहसान थोपने वाले थे जो भाजपा के दंभ की दीवार मजबूत करते चले गए।

    शिवराज सिंह सरकार का बोगस खुफिया तंत्र भी फीडबैक देने में असफल रहा। वो ये तो बताता रहा कि आपकी सरकार सत्ता विरोधी लहर की चपेट में आ गई है लेकिन इसकी वजह और निदान का रास्ता वो नहीं सुझा सका। वास्तव में भाजपा के विरुद्ध सत्ता विरोधी लहर इतनी तेज थी भी नहीं। केन्द्र सरकार ने आयातित ईंधन आधारित जिस सार्वजनिक परिवहन के स्थान पर बिजली से चलने वाले परिवहन को बढ़ावा देने की नीति बनाई। जल परिवहन को बढ़ाकर सार्वजनिक ट्रांसपोर्ट को सस्ता और स्वदेशी बनाने का प्रयास किया।परमाण्विक ऊर्जा और वैकल्पिक सोलर, विंड इनर्जी आधारित संयंत्रों को बढ़ावा देने की रणनीति को जन अभियान बनाने का प्रयास किया उससे तेल माफिया के कान खड़े हो गए। तेल माफिया ने भारत को ऊर्जा का गुलाम बनाने में कांग्रेसी सरकारों में बड़ा निवेश किया था। कार कंपनियों के माध्यम से सत्ताधीशों को मोटी रिश्वतें दिलाई गईं थीं। सड़कें चौड़ी करने के नाम पर भारत को जो कर्ज लेना पड़ा उसकी सूदखोरी को भी फलने फूलने का भरपूर अवसर मिला था।मोदी सरकार जिस तेजी से आयातित ईंधन की खपत घटाने की नीति पर काम कर रही है उससे तेल माफिया को अपने अस्तित्व पर संकट मंडराता नजर आने लगा है। इसे रोकने के लिए तेल उत्पादक देशों ने भारत में भारी धन निवेश किया। ये धन चुनावों से पहले अगड़ियों के माध्यम से बाजार में उतारा गया। पूरे बाजार में इससे खलबली मच गई। जब ये धन उतारा जा रहा था तभी सूदखोर व्यापारी चिल्ला रहे थे कि बाजार से धन गायब हो गया है। इसके बावजूद सरकार के मूर्ख खुफिया तंत्र के कान खड़े नहीं हुए। यही धन चुनाव से पहले मध्यप्रदेश में कमलनाथ ने भाजपा में विद्रोह फैलाने के लिए खर्च किया। छत्तीसगढ़ में जिस जोगी सरकार को भाजपा की बी टीम बताया जाता रहा वो दरअसल कांग्रेस की बी टीम थी। राजस्थान में भी यही काला धन भाजपा में विद्रोह की वजह बना। भाजपा संगठन के आत्मकेन्द्रित नेतागण इस समस्या को नहीं भांप सके और वे सरकार की ओर से प्रचार के नाम पर खर्च किए जा रहे धन को बटोरने की जुगत ही बिठाते रहे। नतीजतन कांग्रेस भाजपा के विरुद्ध जन आक्रोश भड़काने में सफल रही। ईवीएम की विश्वसनीयता पर सवाल उठाकर कांग्रेस उस षड़यंत्र से ध्यान हटाने में असफल रही जिसके चलते फर्जी वोटरों की आड़ में भाजपा के वोट बैंक का बड़ा हिस्सा काट दिया गया। इस सारे षड़यंत्र का केन्द्र मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत का कार्यालय था।ओपी रावत भी शिवराजसिंह चौहान के ही सताए अफसर थे जिन्होंने मौका देखकर चौका जड़ने में देरी नहीं लगाई।

    ये सारा माहौल इसलिए परवान चढ़ा कि भाजपा ने संगठन को लगातार कमजोर किया और उसमें हवा हवाई नेताओं को आगे बढ़ाया जाता रहा। सत्ता पर कमीशनखोरों के बढ़ते प्रभाव ने जनहितकारी योजनाओं की डिलीवरी को बाधित किया। गोपाल भार्गव, भूपेन्द्र सिंह, माया सिंह, कुसुम मेहदेले,बाबूलाल गौर, विश्वास सारंग,रामपाल सिंह,सरताज सिंह, जैसे मंत्रियों के भ्रष्टाचार पर सरकार का कोई अंकुश नहीं था। शिवराज जी अपने पूरे कार्यकाल में ऐसे चापलूसों से घिरे रहे जिनका जनाधार नहीं था और वे मंत्रिपद की आड़ में केवल भ्रष्टाचार करने में लगे रहे। संगठन में भी ऐसे लोगों को बढ़ावा दिया जाता रहा जो अकुशल और आत्मकेन्द्रित थे। नतीजतन पूरी सत्ता और संगठन जनता से कटता चला गया। भाजपा की फौरी निदान करने वाली आर्थिक नीतियों ने प्रदेश को तो कर्जदार बनाया लेकिन उत्पादकता बढ़ाने में असफल साबित हुईं। वित्तमंत्री के रूप में जिस राघवजी भाई ने प्रदेश के आर्थिक विकास की इबारत लिखी उसे अर्जुनसिंह समर्थक सुंदरलाल पटवा की निजी खुन्नस के चलते चरित्रहीनता के लांछन से ध्वस्त कर दिया गया। कभी संवाद का केन्द्र रहा पत्रकार भवन दलालों के हाथों गिरवी रखा जाता रहा।ऐन चुनाव के मौके पर ये भवन भी सत्ता विरोधी षड़यंत्रों का केन्द्र बन गया।इस तरह से कई आत्मघाती नीतियों ने भाजपा के समर्पित कार्यकर्ताओं की फौज को हतोत्साहित करने का षड़यंत्र किया है।जिसकी एकमात्र वजह व्यक्ति केन्द्रित शिवराज सिंह चौहान का नेतृत्व रहा है। सत्ता से उतार दिए जाने के बाद भले ही उन्होंने सार्वजनिक रूप से हार की जिम्मेदारी लेकर खुद को फ्री घोषित कर दिया है लेकिन वास्तव में उन्हें इतनी आसानी से बरी नही किया जा सकता। लाखों करोड़ों कार्यकर्ताओं की मेहनत और समर्पण की कीमत केवल चार शब्दों में माफी मांग लेने से नहीं चुकाई जा सकती। भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नीति निर्धारकों को इस पर गौर करना होगा। मध्यप्रदेश में भाजपा सरकार का पतन इतना मंहगा नहीं है जितनी मंहगी कीमत उसे शिवराज सिंह चौहान को लगातार सत्ता का केन्द्र बनाए रखने पर चुकानी पड़ रही थी।

  • मिजोरम में MNF ने कांग्रेस से सत्ता छीनी, पूर्ण बहुमत से बनाएगी सरकार

    मिजोरम में MNF ने कांग्रेस से सत्ता छीनी, पूर्ण बहुमत से बनाएगी सरकार

    आइजोल,11 दिसंबर,(प्रेस सूचना केन्द्र)। मिजोरम विधानसभा चुनाव की तस्वीर पूरी तरह साफ हो गई है। MNF पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बना रही है। MNF ने 26, कांग्रेस ने 5, बीजेपी ने 1 और निर्दलीय प्रत्याशियों ने 8 सीटों पर जीत दर्ज की है। हालांकि, इस चुनाव में कांग्रेस के मुख्यमंत्री पी. ललथनहवला चंफाई साउथ और सेरछिप दोनों सीटों से चुनाव हार गए हैं। बता दें कि 10 साल के बाद MNF फिर से राज्य की सत्ता पर काबिज होने जा रही है। मिजोरम में अब तक दो ही मुख्यमंत्री हुए हैं।

    इस बीच MNF प्रेजिडेंट जोरम थंगा ने कहा, ‘हमारी बीजेपी के साथ या किसी अन्य स्थिति में गठबंधन सरकार नहीं बनेगी क्योंकि हमारी पार्टी अपने दम पर सरकार बनाने में सक्षम है। हमने 40 में से 26 सीटों पर जीत दर्ज की है। हम NEDA (नॉर्थ-ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस) और NDA का हिस्सा हैं। लेकिन हम कांग्रेस या UPA के साथ नहीं जाना चाहेंगे।

    बता दें कि इस चुनाव में मिजो नैशनल फ्रंट के 40 प्रत्याशी मैदान में थे। बीजेपी के 39 और नैशनल पीपल्स पार्टी के 9 उम्मीदवार चुनाव में अपनी किस्मत आजमा रहे थे। मिजोरम में इस बार 75 फीसदी मतदान हुए। मिजोरम में MNF कार्यकर्ताओं ने मिठाई बांटकर और नाच-गाकर जश्न मनाना शुरू कर दिया है

    मिजोरम में 1998 से 2008 तक नैशनल फ्रंट के लीटर पु. जोरमथंगा की सरकार थी। 1987 में विधायक चुन कर आए जोरम थंगा पहली बार ही राज्य में शिक्षा एवं वित्त मंत्री बने थे। राज्य में बहुमत हासिल करने के लिए 21 सीटें मिलना जरूरी था। मिजोरम में इस बार कुल 209 प्रत्याशी मैदान में थे। वहीं, 2013 के चुनाव में मिजो पीपुल्स पार्टी को मात्र 5 सीटों पर जीत दर्ज हुई थी।

  • देश का अन्नदाता आखिर कर्जदार क्यों?

    देश का अन्नदाता आखिर कर्जदार क्यों?

    देश का किसान संकट में है क्योंकि किसान कर्ज में पैदा होता है, कर्ज में जीता है और अब तो कर्ज के दबाव में इहलीला स्वत: समाप्त कर कर्ज से मुक्ति लेना चाहता है। सरकार किसी दल की हो, बार बार कर्ज माफी का ढोंगकरतथा कथित बुद्धिजीवियों की नजरों में उसे कामचोर बना देती है। हाल के वर्षो की याद करें तो 2009 में पूर्ववर्ती यूपीए सरकार ने ढोल पीटकर किसान को कर्ज माफी घोषित की। महाराष्ट्र का विदर्भ अंचल लगातार सूखा की चपेट में था और केन्द्र सरकार ने किसानों के घावों पर मरहम लगाने का काम तो किया लेकिन हकीकत इस बात से मेल नहीं खाती कि डॉ. मनमोहन सिंह सरकार की इस राजनीतिक उदारता से किसानों को कोई लाभ पहुंचा। रोग बढ़ता ही गया ज्यों-ज्यों दवा की।
    हाल में उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र और पंजाब ने भी कर्ज माफी की घोषणा की और अमल भी हो रहा है। इसके बाद कर्नाटक सरकार ने कर्ज माफी का कदम उठाया है। लेकिन कर्ज के दबाव में मौत का सिलसिला थमा नहीं है। इससे लगता है कि सरकारें इस मर्म को समझ नहीं पा रही है कि किसान की आवश्यकता आर्थिक सशक्तिकरण के उपाय किए जाने की है और यह तभी संभव है जब किसान के कृषि उत्पाद की कीमत इस प्रकार निर्धारित हो कि किसान का सशक्तिकरण हो। कृषि की बढ़ती लागत और कृषि उत्पाद के फिसलते मूल्यों ने किसान को संकट में डाला है। उसके खर्च काटकर उसे दो पैसे मिलने से आगामी फसल में निवेश के लिए किसान की बरकत होगी। इससे किसान की क्षमता बढ़ेगी, उसे दूसरों के सामने हाथ पसारने की नौबत नहीं आयेगी। कृषि वैज्ञानिक डॉ. स्वामीनाथन ने वर्षों पहले यही सुझाव दिया था।
    मध्यप्रदेश सरकार ने इस दिशा में कुछ ठोस पहल आरंभ की है। फलस्वरूप प्रदेश में कृषि उत्पाद मूल्य और कृषि उत्पाद विपणन आयोग बनाया जा रहा है। उद्देश्य सही दिशा में सोच प्रदर्शित करता है। इसके नतीजों पर कहना जल्दबाजी होगी लेकिन आयोग का गठन सामयिक और प्रासंगिक है, इसमें शायद ही दो राय हो। इसके अलावा खेती के लिए कर्ज जीरो प्रतिशत ब्याज पर दिया जा रहा है। मध्यप्रदेश सरकार ने फसलों के समर्थन मूल्य की गारंटी दी है। यहां तक कि मानसून के संकेत मिलने के बाद भी प्याज, दलहन की खरीद जारी रखी है।

    आज के परिप्रेक्ष्य में सोचें तो आजादी के संघर्ष के दौरान किसान की समस्याओं को लेकर संग्राम शुरू हुआ। आजादी के संघर्ष का किसान ध्वजवाहक बना। चंपारन और वारदोली आंदोलन ने देश की जनता को स्वाधीनता के प्रति जागरूक किया लेकिन जो दल आज किसानपरस्ती के ढोंग में कर्ज माफी की बात करते हैं, उन्होंने किसानों के सशक्तिकरण आंदोलन के समर्थन से मुंह मोड़ लिया था। उन्होंने जमीदारों का साथ दिया। अबबत्ता किसान के संघर्ष का विरोध नहीं किया क्योंकि किसानों का वोट बैंक उनकी ओर झुक चुका था। किसानों की लड़ाई में कंधा लगाने वाले जेपी, लोहिया, राहुल सांकृत्यायन, रामवृक्ष बेनीपुरी, नरेन्द्र देव, अशोक मेहता, किशोरी प्रसन्न सिंह, गंगाशरण सिंह, पं. रामनंदन मिश्र जैसे समाजवादी नेता शामिल रहे।
    इन्होंने संचार माध्यमों के जरिए खूब समर्थन दिया। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने तो किसानों के समर्थन में संदेश दिया लेकिन सच्चाई यह है कि किसानों की बदकिस्मती थी कि तब राजनेताओं के सामने सवाल था कि वे किसान और जागीदार, जमीदार के बीच एक का चुनाव करें ? किसे समर्थन दिया जाए? कांग्रेस की प्राथमिकता सूची से किसान बाहर हो गया। किसान की नाराजगी के डर से कांग्रेस ने किसान का विरोध नहीं किया लेकिन समर्थन से पीछे हट गयी। आजादी के बाद भी किसानों का संघर्ष जारी रहा लेकिन छितरा छितरा रहा। इसका नेतृत्व चौधरी चरण सिंह और देवीलाल ने संभाला। शरद जोशी और शरद पवार ने भी किसानों का साथ दिया। महेन्द्र सिह टिकैत भी जुझारू नेता हुए लेकिन उनकी आवाज दिल्ली के इर्द गिर्द सुनी गयी।
    किसानों के समर्थन में आज कुछ नेता सामने आए हैं लेकिन उनकी मौजूदगी परिस्थितिजन्य है। किसानों की आवाज बुलंद करने में दुर्भाग्य से ऐसा कोई नेता नहीं है जिसकी आवाज में वजन हो और देशव्यापी स्वीकार्यता हो। इसलिए तात्कालिक लाभ के लिए राजनेता कर्ज माफी की बात उठाकर मानों किसान के लिए राजनीतिक नजराना दिलाना चाहते है क्योंकि सरकारों ने बार-बार कर्ज माफी का ढिंढोरा पीटा लेकिन किसान कर्ज माफी के बावजूद कर्ज से मुक्ति नहीं पा सका। इसका कारण खोजने की आज जितनी प्रासंगिकता है, उतनी कभी नहीं रही। किसान खेती की लागत बढऩे से परेशान है, उपर से उसे फसल का वाजिब मूल्य नहीं मिल पा रहा है। न तो खाद्य प्रसंस्करण किसानों का उद्योग बन पाया है और न उसे आर्थिक सशक्तिकरण के लिए माली खुराक के बारे में सोचा गया है। फसल आने पर मूल्य गिरना फितरत बन चुकी है क्योंकि किसान भंडारण सुविधा के अभाव में तत्काल माल बेचता है। भंडारण और कोल्ड स्टोरेज की सुविधा आवश्यक है। अपमानजनक है कि किसान को मिलने वाली कर्ज माफी ने समाज में किसान की प्रतिष्ठा कम की है। किसान को कामचोर तक कहा गया है। लेकिन इस बात पर गौर नहीं किया गया कि इस कर्ज ग्रस्तता की जड़ कहां है।
    किसान का दुर्भाग्य तो आजादी के बाद ही शुरू हो गया जब सरकारों की नजरों में उद्योग तो चढ़ गया और कृषि दोयम दर्जे की हो गयी। किसान न्यूनतम सुविधाओं पर अपने सांस्कृतिक परंपरागत कृत्य से जूझता रहा। किसान को अन्नदाता कहकर उसका भावनात्मक शोषण किया गया। एक तरफ खेती घाटे का व्यवसाय बनती गयी दूसरी तरफ सरकार को कृषि उपज का मूल्य बढ़ न जाए, यह चिंता बनी रही। किसान सरकार की नजरों में गौण हो गया। किसान पूरी तरह प्रकृति के सहारे हो गया। अतिवृष्टि, सूखा, ओला जैसे संकट आते गए। सरकारों ने संकट की जड़ तक जाने के बजाए थोड़ी बहुत राहत देकर किसानपरस्ती की भरपूर सियासत कर उसे वोट बैंक समझ लिया। न तो किसान को अपनी फसल का मूल्य पाने का अधिकार मिला और न किसान की गिरती माली सेहत के प्रति सरकार ने गौर किया। ऐसे में दुबला और दो अषाड़ की कहावत तो तब सिद्ध हुई जब 1966-67 में हरित क्रांति का झंडा बुलंद हुआ।
    सरकार ने कृषि उत्पादन में इजाफा करने के लिए आह्वान किया लेकिन किसानी की बढ़ती लागत पर कतई गौर नहीं किया। कृषि से जुड़ा व्यापार खाद बीज पौध संरक्षण का कारोबार मल्टीनेशनल्स के हाथ में बंधक बन गया।इनका पूरा ध्यान वार्षिक लाभ कमाने पर केन्द्रित हो गया। किसान इस कारोबार की भूल भूलैया में ऐसा फंसा कि किसान के उसके कर्ज का घोड़ा बेलगाम हो गया। सहकारिता आंदोलन ने इसका जिक्र किया। नेताओं ने फ्रिक की, लेकिन राहत कहीं नजर नहीं आयी। किसानों पर कर्ज का बोझ, कार्पोरेट का मुनाफा बढ़ा। कार्पोरेट को सरकार ने सुविधा दी। उनका कर्ज भी माफ हुआ लेकिन किसान ने उत्पाद की मूल्य वृद्धि सरकार के राडार पर नहीं आयी। किसानी के अर्थशास्त्र को पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने समझा। किसानों के समर्थन में आंदोलन, लेव्ही विरोध जैसे अभियान चले। लेकिन सही उपचार का समय बहुत विलंब से आया। देश में राजनीतिक परिवर्तन से किसान के अनुकूल हवा के झौंके महसूस किए जा रहे हैं।
    किसान की समस्या की असल जड़ की ओर नरेन्द्र मोदी सरकार की निगाह गयी है। प्रधानमंत्री फसल बीमा, प्रधानमंत्री सिंचाई योजना, राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना, राष्ट्रीय गोकुल योजना, नीली क्रांति मूल्य स्थिरीकरण योजना, बाजार हस्तक्षेप योजना, ई विपणन मंच, कृषि उपज मंडियों को जोडऩे का काम शुरू हुआ है। किसानों को कर्ज सुविधा आसान और सस्ती हुई है। ब्याज 18 से चार प्रतिशत और बाद में मध्यप्रदेश में जीरो प्रतिशत हुआ है। किसान को जमीन का स्वाइल हेल्थकार्ड देकर लागत घटाने का उपक्रम आरंभ हुआ। वास्तव में आवश्यकता किसान को फसल का उचित मूल्य दिलाने, किसानी की लागत कम करने की है। इसी बीच मध्यप्रदेश सरकार ने कृषि उत्पाद मूल्य और विपणन आयोग के गठन का जतन किया है। समय बतायेगा कि किसानों को माफिक दवा मिलने से कर्ज मुक्ति का मार्ग स्वयं खुलेगा। किसानों को दरकार कर्ज मुक्ति की ही है, कर्ज माफी की नहीं। नरेन्द्र मोदी सरकार का 2022 तक किसान की आय दोगुना करने का संकल्प और तानाबाना भी कसौटी पर होगा। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि कठिन डगर पर मोदी सरकार ने कदम बढ़ाया है। नीति सही है। दिशा भी सही है।

  • सत्ता की चाभी बनता आदिवासी मुख्यमंत्री का वादा

    सत्ता की चाभी बनता आदिवासी मुख्यमंत्री का वादा

    मध्यप्रदेश का चुनावी रण नित नए समीकरणों और संभावनाओं का साक्षी बनने लगा है। हर दिन वोट की घेरेबंदी नई नई कहानियों को जन्म दे रही है और सत्ता का परचम फहराने वाले योद्धा अपनी लामबंदी करने में जुट गए हैं। सियासी घोड़े दौड़ाने वाले सत्ताधीशों की राह में इस बार फिर आदिवासी मुख्यमंत्री का दावा नई चुनौती के रूप में उभर रहा है। आदिवासियों के संगठन जायस और मांझियों की पार्टी राष्ट्रीय महान गणतंत्र पार्टी के गठजोड़ ने सत्तारूढ़ भाजपा और प्रतिपक्ष में बैठी कांग्रेस दोनों की ही नींदें उड़ा दीं हैं। सत्ता के लिए वोटों की मारकाट के बीच जायस के राष्ट्रीय संरक्षक डाक्टर हीरालाल अलावा और मछुआरों के नेता आनंद निषाद एक चुनौती के रूप में उभर रहे हैं। सरकार से मान्यता प्राप्त आदिवासी वर्ग और पिछड़ों के बीच धकेल दिए गए मांझियों के बीच पनपी केमिस्ट्री ने सत्ता का खेल बिगाड़ने की तैयारी कर ली है। इन्हें लगता है कि वे अपने विशाल जनाधार को समेटकर कर्नाटक की तरह तीसरी शक्ति के रूप में उभरेंगे जो अंततः सत्ता में भागीदारी के लिए आदिवासी मुख्यमंत्री की अभिलाषा को पूरा करेगी।

    दरअसल आदिवासी वोट बैंक की कल्पना उस वादे के कारण उपजी थी जिसके अनुसार देश के बजट का साढ़े सात प्रतिशत हिस्सा मूल निवासी आदिवासियों पर खर्च किए जाने का प्रावधान किया गया था। आजादी के बाद से आदिवासी विकास के नाम पर अंधाधुंध बजट खर्च किया जाता रहा। कांग्रेस की सरकारों ने इस बजट का दोहन भी किया और आदिवासियों को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल भी किया। संविधान की अनुसूची 29 में दर्ज आदिवासियों को विशेष दर्जा दिया गया है जिसके चलते इस वर्ग को आरक्षण का लाभ दिया जाता है। मांझी उपजाति भी इसी कोटे से आरक्षण का लाभ लेती रही है। पूर्ववर्ती दिग्विजय सिंह की कांग्रेसी सरकार ने पहली बार आदिवासी वोट बैंक को कमजोर करने के लिए कीर, भोई, निषाद, मल्लाह, उपजातियों को इस सूची से हटाकर पिछड़ा वर्ग की अनुसूची 12 में निकाल बाहर किया था। इसके लिए बाकायदा प्यारेलाल कंवर समिति बनाई गई। उसकी सिफारिशों को कैबिनेट से पारित करवाया गया। इसे विधानसभा में भी भेजा गया और 147 विधायकों की सहमति से पारित करवाया गया। बाद में जब उमा भारती के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी तब इसे अनुसूचित जन जाति की पात्रता से बाहर करने का आदेश जारी भी हो गया। दरअसल दिग्विजय सिंह के करीबी तनवंत सिंह कीर खुद पंधाना की रिजर्व सीट से चुनकर आते थे। उनका मानना था कि फूट डालने की इस नीति से आदिवासी मुख्यमंत्री का दबाव हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगा। इसके लिए प्यारेलाल कंवर समिति ने पूजन विधि को आधार बनाया। उसका कहना था कि मांझी समाज हिंदू देवी देवताओं को पूजते हैं इसलिए इन्हें आदिवासी होने का लाभ नहीं दिया जा सकता। यही वजह है कि आरक्षण और बेरोजगारी के मुद्दे पर इस बार आदिवासी मुख्यमंत्री का वादा परवान चढ़ रहा है। हाल ही में हुई आदिवासियों की रैलियों ने भी जनता के स्वरों को अभिव्यक्ति दी है।

    राष्ट्रीय महान गणतंत्र पार्टी ने पिछले कुछ उपचुनावों में अपने मह्त्व को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया था। मुंगावली में चुनाव प्रभारी अरविंद भदौरिया को मांझी वोट के बिफरने की सूचना थी। इसके बावजूद उन्होंने अपने क्षत्रिय नेटवर्क पर भरोसा किया। नतीजतन भाजपा का प्रत्याशी वहां मात्र दो हजार मतों के अंतर से पराजित हो गया। जबकि राष्ट्रीय महान गणतंत्र पार्टी को 5400 मत प्राप्त हुए थे जो निश्चित रूप से भाजपा के मतों में सेंध थी। कोलारस में महान गणतंत्र पार्टी की चुनौती को कांग्रेस के रणनीतिकारों ने समय रहते पहचान लिया और खुद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने प्रयास करके मांझियों के टिकिट पर चुनाव लड़ रहे प्रत्याशी को अपने पक्ष में चुनाव से बाहर करवा लिया। चित्रकूट में कांग्रेस के नीलांशु चतुर्वेदी ने राष्ट्रीय महान गणतंत्र पार्टी के प्रत्याशी प्रमोद कुशवाहा का पर्चा रद्द करवा लिया और अपनी जीत सुनिश्चित कर ली। इस बार आदिवासियों के नेता बनकर उभरे डाक्टर हीरालाल अलावा ने दिग्गी के षड़यंत्र को विफल करने के लिए निषादों से हाथ मिला लिया है। वे उन्हें अनुसूचित जन जाति में शामिल कराने का वादा कर रहे हैं। इसके एवज में वे उन तीस सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारने की तैयारी कर रहे हैं जिन पर आदिवासी वोट निर्णायक रहते हैं। अभी उनमें से चौबीस सीटें भाजपा ने जीत रखीं हैं। आठ कांग्रेस और एक निर्दलीय के पास में है।

    आदिवासी सीटों को कांग्रेस से छीनने में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े वनवासी परिषद और उसके अनुषांगिक संगठनों ने बड़ी भूमिका निभाई थी। उन्होंने बरसों तक वनवासियों के कल्याण की गतिविधियां चलाईं।नतीजतन पूरा आदिवासी इलाका भगवा हो गया था। भाजपा के आदिवासी नेता नेतृत्व की अभिलाषाओं पर खरे नहीं उतरे और भाजपा ने आदिवासियों के लिए चलते आ रहे विशेष दर्जे को लगभग सामान्य में बदल दिया। इसके चलते आदिवासियों के बीच नेतृत्व को लेकर खालीपन सा महसूस किया जाने लगा था। इस बीच उन्हें डाक्टर हीरालाल अलावा के रूप में एक युवा नेतृत्व मिल गया जिसने दोनों बड़े राजनीतिक समीकरणों के बीच सेंध लगाने की तैयारी कर ली है। उनके संगठन जायस के आव्हान पर मंदसौर, मनावर, बड़वाह, बड़वानी, राजपुर, कसरावद, खरगोन, खलगांव जैसे आदिवासी बहुल इलाकों में दर्जन भर सभाएं आयोजित की गईं जिसमें आदिवासियों ने बढ़ चढ़कर भागीदारी दर्ज कराई है।

    आदिवासी मुख्यमंत्री की मांग इस कदर सिर चढ़कर बोल रही है कि भाजपा की रंजना बघेल ने भी बयान जारी करके अपने संगठन को चेताया कि लगभग बीस सीटों का गणित बिगड़ सकता है। वे मनावर से विधायक हैं और उन्हें ये मुद्दा सत्ता में आगे बढ़ने की सीढ़ी नजर आ रहा है। कांग्रेस के बाला बच्चन ने भी आदिवासियों के लामबंद होते जाने को खतरे की घंटी बताया है। कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ विभिन्न राजनैतिक दलों को भाजपा के विरुद्ध लामबंद करने की रणनीति पर चल रहे हैं इसलिए उन्हें ये हलचल गंभीर नजर नहीं आ रही है। जबकि उनके सहयोगी के रूप में उभर रहे दलित नेताओं की जमीन खिसक चुकी है और वे कांग्रेस के लिए अधिक उपयोगी साबित नहीं हो पा रहे हैं। उनमें बसपा की मायावती के साथ फूल सिंह बरैया जैसे नेता भी शामिल हैं।

    आदिवासियों के बीच नाराजगी की वजह कई ऐतिहासिक घटनाओं के कारण उपजी है। उनका कहना है कि जब शिवभानु सिंह सोलंकी का मुख्यमंत्री बनना तय था तब अर्जुनसिंह ने दिल्ली दरबार में कोर्निश बजाकर सत्ता का अपहरण कर लिया। इसके बाद शिवभानु सिंह सोलंकी को सर्किट हाऊस में बंद करके उनके गुर्गों ने भारी मारपीट की। जब इसी पिटाई कांड के बाद सोलंकी ने अस्पताल में मिलने गए अर्जुनसिंह को उनके बेटे का ध्यान रखने का निवेदन किया तो उन्होंने बेटे अरविंद नेताम को सांसद के रूप में सत्ता में शामिल होने का अवसर दिया। इसके बाद उनका भी पत्ता काट दिया गया। भाजपा के आदिवासी नेता फग्गन सिंह कुलस्ते सांसद निधि के उपयोग तक ही सिमटकर रह गए। आदिवासियों की जमीनों पर सवर्णों के कब्जे हो गए और जंगलों, खनिजों के दोहन में भी आदिवासियों को उनका हक कथित तौर पर नहीं दिया गया।

    अब जबकि चुनावी दंगल में तेजी आती जा रही है तब आरक्षण, बेरोजगारी और आदिवासी मुख्यमंत्री की आवाज को जनसमर्थन बढ़ता जा रहा है। जाहिर है कि ये आवाज भाजपा के सत्ता संधान अभियान में सेंध लगाने का सबब बन सकती है। कांग्रेस को अपने अवसान की चिंता सता रही है। ऐसे में देखना होगा कि दोनों राजनीतिक दलों के दिग्गज क्या फार्मूला निकालते हैं जो मध्यप्रदेश को कर्नाटक बनने से रोक सके। (प्रेस सूचना केन्द्र)

  • भाजपा का सैलाबी जवाब

    भाजपा का सैलाबी जवाब



    कांग्रेस वाकई रसातल की ओर जा रही है। लहरों की सवारी करने वाली उसकी राजनीति अब दलदल में गोता लगा रही है। जबकि उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक प्रतिद्वंदी भारतीय जनता पार्टी निरंतर अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत बनाती जा रही है। निठल्ले बैठकर हर हलचल को गाली और बददुआ देने वालों के सुर में सुर मिलाकर कांग्रेसी एक बार फिर मध्यप्रदेश के विपक्ष में बैठने की तैयारी कर रहे हैं। जिस तरह कांग्रेस के शोरगुल के बीच मध्यप्रदेश का अनुपूरक बजट बगैर चर्चा कराए पास हो गया उससे सत्ता पक्ष का नहीं बल्कि कांग्रेस का नुक्सान ज्यादा हुआ है। सत्ता पक्ष को तो जनता के अपने हित के काम करने का जनादेश दिया था। मध्यप्रदेश की भाजपा सरकारें पिछले साढ़े चौदह सालों से जनसुविधाओं की डिलीवरी कर रहीं हैं। आने वाले चुनावों से पहले सरकार ने कल्याणकारी योजनाओं की पूरी फेरहिस्त तैयार की है। वह उस दिशा में अपना काम किए जा रही है। नाकारा और गैरजिम्मेदार विपक्ष की भूमिका निभा रही कांग्रेस ने अपने ही दंभ के जाल में उलझकर वो मौका गंवा दिया जिसके माध्यम से वो सरकारी योजनाओं में कथित सुधार कराने का श्रेय लूट सकती थी। भाजपा की उमाभारती सरकार ने दिसंबर2003 में जब सत्ता संभाली थी तब मध्यप्रदेश का बजट मात्र तेईस हजार करोड़ हुआ करता था। आज वो दो लाख करोड़ पार कर चुका है। पंद्रह सालों में दस गुना बढ़ा बजट प्रदेश की बेहतर होती अर्थव्यवस्था का उद्घोष कर रहा है। लगातार बढ़ती अर्थव्यवस्था ने आम उद्यमियों के दिल में अपेक्षाओं का ज्वार पैदा कर दिया है। भाजपा सरकार उस ज्वार पर सवार होकर अपने नीति निर्धारकों के उस सूत्र वाक्य को साकार करने आगे बढ़ रही है कि तेरा वैभव अमर रहे मां हम दिन चार रहें न रहें। इस घोषित वाक्य के सामने खड़ी होकर कांग्रेस और उसके नेतागण आरोप प्रत्यारोप की राजनीति कर रहे हैं। विधानसभा में प्रस्तुत अनुपूरक मांगें बगैर चर्चा पारित हो गईं इसे कांग्रेस इतिहास का काला दिन बता रही है। जबकि ये घटना कांग्रेस के लिए काला दिन साबित होने जा रही है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के करीबी मंत्री रामपाल सिंह ने अपनी बहू प्रीति की कथित आत्महत्या पर सच स्वीकार करने में भले देरी की हो। उनकी पारिवारिक वजहें जो भी रहीं हों। बेटे गिरिजेश की मनोदशा ने उन्हें तथ्यों से अनभिज्ञ भले ही रखा हो लेकिन देर से ही सही उन्होंने प्रीति को अपनी बहू स्वीकार तो कर ही लिया था। ये इतना लोक महत्व का मुद्दा भी नहीं था जिसके कारण कांग्रेस ने प्रदेश के सात करोड़ लोगों के भविष्य को ठेंगा दिखा दिया। जबकि ये सर्वविदित तथ्य है कि प्रीति ने अपने कथित पत्र में गिरिजेश या मंत्रीजी के नाम तक का उल्लेख नहीं किया था। इसके बावजूद महिला वोट अर्जित करने के लिए कांग्रेस ने इस लिजलिजे मुद्दे को ही अपने माथे पर सजा लिया। कांग्रेस के नेता भूल गए कि प्रदेश की महिलाएं अपनी विकास यात्रा भाजपा के साथ बेहतर तरीके से कर रहीं हैं।रही सही कसर उसने विधानसभा अध्यक्ष डाक्टर सीतासरन शर्मा के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाकर पूरी कर दी। प्रदेश की आम जनता को जीवन के हर जरूरी मुद्दे पर तरसाने वाली दिग्विजयसिंह सरकार की तुलना में शिवराज सरकार महिलाओं के करीब ज्यादा रही है। उनका बेटी बचाओ नारा हो या बच्चों के मामा के रूप में जनकल्याण की योजनाएं चलाना सभी प्रदेश के आम मतदाता के दिलों को छूते रहे हैं। न केवल विधानसभा में बल्कि दूसरे दिन सड़कों पर भी कांग्रेस प्रीति की मौत को भुनाने की असफल कोशिश करती रही। गलती एक बार हो जाए तो उसे सुधारा भी जा सकता है पर कांग्रेस के नेतागण अपनी निरंतर गलतियों से कोई सबक लेने तैयार नहीं हैं। वोटरों को बहकाने के उसके षड़यंत्र कई बार केवल इसलिए सफल होते नजर आते हैं क्योंकि लोगों की अपेक्षाएं बढ़ गईं हैं। सरकारी कर्मचारियों को इस सरकार ने जितनी अधिक वेतनमान दिया है उतना आजादी के बाद कभी नहीं मिला इसके बावजूद सरकारी अधिकारी कर्मचारी ज्यादा वेतन भत्तों की मांग कर रहे हैं। वे ये समझने भी तैयार नहीं कि जिन लोगों के घरों में सरकारी वेतन नहीं आता है वे पूंजी के उत्पादन के लिए कैसे पसीना बहा रहे हैं। दरअसल में भाजपा की शिवराज सिंह सरकार की ज्यादातर नीतियां पिछली सरकारों की असफल नीतियों में फेरबदल करके उन पर अमल करने की रहीं हैं। इसलिए आम नागरिकों को ज्यादा फर्क नजर नहीं आ रहा है। जबकि आंकड़ों की बिसात पर देखें तो उपलब्धियों का मंच अतिविशाल नजर आता है।

    कांग्रेस के बतोलेबाज नेताओं से जब पूछा जाता है कि यदि मान लें कि भाजपा सरकार असफल रही है तो आप प्रदेश के विकास का क्या ब्लूप्रिंट सोचते हैं। इस पर वे अपनी वही सड़ी गली सबसिडी वाली नीतियों की दुहाई देने जुट जाते हैं जो वैश्विक अर्थपटल पर अप्रासंगिक हो चलीं हैं। वे श्रमिकों को लुभाने वाली वही भाषा बोलते हैं जो कभी साम्यवादी अर्थव्यवस्था वाले देशों से आयातित की गईं थीं। बरसों तक कांग्रेस उन्हीं साम्यवादी परिभाषाओं को गांधीवादी समाजवाद की चासनी में लपेटकर जनता को चुसाती रही है। उनसे जनता का भला न होना था न हुआ। फूट डालो और राज करो की नीति को धर्मनिरपेक्षता के धारदार चाकू से छीलकर पेश करती रही पर सोशल मीडिया की आंधी ने उसकी भी कलई उतारकर रख दी। अब कांग्रेस के नेताओं को समझ नहीं आ रहा है कि वे आगामी चुनावों में जनता को क्या कहानियां सुनाएंगे। इसलिए उसके नेता झूठे जुमलों को उछालकर भ्रम फैलाने का प्रयास कर रहे हैं। भारत का इतिहास गवाह है कि यहां प्याज की मंहगाई भी सरकारें बना बिगाड़ देती रही हैं। इसके बावजूद समय जितनी तेजी से बदला है उसके चलते अब झूठे मुद्दों की कलई खोलना बड़ा सरल हो गया है। चंद मिनिटों में ऐसे गुब्बारों की हवा देश भर में निकाली जा सकती है जो केवल जनता को बरगलाने के लिए फुलाए जाते हैं। आज जब कांग्रेस के प्रदेश नेतृत्व ने राजभवन के दरवाजे पर प्रीति सिंह रघुवंशी की मौत पर बासी कढ़ी में उबाल लाने की कोशिश की तब वह अपने सभी समर्थकों को भी नहीं जुटा पाई।जनता के पास ऐसे मुद्दों के लिए अब समय ही नहीं है। ऐसी कांग्रेस यदि बजट जैसे गूढ़ मुद्दे पर सरकार को लांछित करने का प्रयास करे तो भला उसकी आवाज को कौन सुनेगा। सरकार के संसदीय कार्य मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने जिस तरह से आगे बढ़कर कांग्रेस के योद्धाओं को शस्त्र विहीन कर दिया वो संसदीय ज्ञान की परिपक्वता की मिसाल बन गया है। कांग्रेस के कुतर्कों को रौंदने का इससे अधिक सैलाबी जवाब दूसरा नहीं हो सकता था।

  • विज्ञापन चोर मंडली आखिर है कौन

    विज्ञापन चोर मंडली आखिर है कौन




    (फाईल फोटो)
    मध्यप्रदेश इन दिनों अपनी विकास यात्रा नहीं बल्कि शासन शैली को लेकर चर्चाओं में है। चौदह साल बीत जाने के बाद भी मध्यप्रदेश की जनता भाजपा के सुशासन पर रीझ नहीं पा रही है। कांग्रेस को भूल चुके मतदाता भी आने वाले चुनावों से पहले भाजपा की फींच फींचकर धुलाई करने में जुट गए हैं। प्रदेश भर से जनता की जो आवाजें सुनाई पड़ रहीं हैं वो अपेक्षाओं से लबरेज हैं। उन्हें भाजपा से कुछ ऐसा करने की उम्मीद है जो पहले कभी न हुआ हो। यही वजह है कि भाजपा विरोधियों के साथ साथ उसके समर्थक भी सरकार पर गुलेल तान रहे हैं। सवालों से घिरी शिवराज सरकार के राज दरबार यानि विधानसभा के सदन में भी शासन शैली को लेकर तीखे आरोप लगाए जा रहे हैं। प्रतिपक्ष नहीं बल्कि सत्तापक्ष के भी कई सदस्य सरकार के जवाबों और कार्यशैली से खफा हैं। कई विधायक तो खीजकर सदन में ही कह चुके हैं कि जो सरकार हमारी आवाज नहीं सुनती उससे अब हमें कोई सवाल ही नहीं पूछना है। जो कर्कश विवाद पिछले दिनों सदन में देखने सुनने मिले उससे तो महाभारत काल के प्रहसन भी फीके पड़ते दिख रहे हैं। जो बात सहजता से कही जा सकती है उसे माननीय विधायकगण छिछोरे अंदाज में कहते नजर आ रहे हैं। ऐसा लगता है कि किसी को लोकतांत्रिक व्यवस्था पर भरोसा ही नहीं रह गया है। विधानसभा अध्यक्ष डाक्टर सीतासरन शर्मा जब पक्ष और विपक्ष के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करते हैं तब भी विधायकगण अपनी जिद पर अड़े रहते हैं। विधायक ये गौर करने तैयार नहीं कि वे कल के इतिहास की इबारत लिख रहे हैं। कांग्रेस के जीतू पटवारी ने जब नौ मार्च को कथित तौर पर सत्ता पक्ष को चोरों की मंडली कह दिया और कहा कि ये चोरों को विज्ञापन देते हैं । अंधा अंधे को रेवड़ी बांटे बाली इस व्यवस्था जर्नलिज्म वाले परेशान हैं। जो ओरीजनल जर्नलिज्म वाले हैं वे आज भी खाली हाथ हैं। उनके इस कथन से सत्ता पक्ष के विधायक बिफर पड़े। जनसंपर्क मंत्री डाक्टर नरोत्तम मिश्रा ने कहा कि ये मीडिया को चोर कह रहे हैं। उन्होंने अध्यक्ष से मांग की कि पत्रकारों को चोर कहने वाली बात सदन की कार्यवाही से विलोपित करवाईए। इस पर अध्यक्ष ने इन पंक्तियों को सदन का कार्यवाही के रिकार्ड से निकलवा दिया। बारह मार्च को विपक्ष की ओर से रामनिवास रावत ने स्पष्ट किया कि जीतू पटवारी ने मीडिया पर नहीं बल्कि उसकी आड़ में चलने वाले विज्ञापन घोटाले का उल्लेख किया है।इसके बाद भी यदि उनके शब्दों से किसी की भावनाएं आहत हुईं हों तो वे सदस्यों की ओर से माफी मांगते हैं। इसके बाद भी सत्ता पक्ष के विधायकगण मानने तैयार नहीं थे। दस सदस्यों ने इस कथन पर सदन का विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव दिया जो सत्तापक्ष के सदस्यों के दबाव में स्वीकार कर लिया गया। हालांकि इस घटना पर पत्रकारों के बीच बेचैनी का माहौल देखा गया। युवा पत्रकार संघ के अध्यक्ष दिनेश शुक्ल ने अध्यक्ष डाक्टर सीतासरऩ शर्मा के सदन संचालन में सजगता और निष्पक्षता को लेकर धन्यवाद प्रस्ताव सौंपा है। उनका कहना है कि जब सदन में दोनों पक्षों के बीच आरोप प्रत्यारोप का दौर चल रहा था तब भी अध्यक्ष की आसंदी से सभी को अपनी बात रखने का अवसर दिया गया। विधायकों की दबावपूर्ण भाषाशैली और जिद के सामने अध्यक्ष ने पूरा धैर्य रखा और विपक्ष को अपनी बात रखने का अवसर देकर उदारता का परिचय दिया। उन्होंने कहा कि अब जबकि ये मामला विशेषाधिकार हनन समिति को सौंप दिया गया है तब पक्षकार की हैसियत से हम चाहते हैं कि कथित तौर पर कहे गए चोरों की मंडली शब्द का आशय स्पष्ट हो
    , क्योंकि जीतू पटवारी ने अपने आरोप में कहीं भी मीडिया या पत्रकार शब्द का उल्लेख नहीं किया था। उन्होंने कहा कि यदि कतिपय माफिया तत्व सत्ताधीशों की आड़ में जन धन का अपवंचन करते रहे हैं तो उन्हें उजागर किया जाना चाहिए। इस संबंध में दोषी अधिकारियों और राजनेताओं को भी न बख्शा जाए। पत्रकारों की ओर से ये वक्तव्य तब सामने आया जब सेन्ट्रल प्रेस क्लब के अध्यक्ष गणेश साकल्ले,महासचिव राजेश सिरोठिया, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष विजय कुमार दास ने राहुल गांधी को लिखे पत्र में कहा कि जीतू पटवारी की ….सरकार चोरों की मंडली मीडिया ….. को विज्ञापन दे रही ये टिप्पणी अनुचित और अवांछित है। मूल वक्तव्य में हालांकि चोर मंडली के साथ मीडिया शब्द का उल्लेख ही नहीं किया गया था। पत्रकारों की इसी नाराजगी का उल्लेख सदन में हुआ और मामला विशेषाधिकार हनन समिति को सौंप दिया गया। सदन में संसदीय कार्य मंत्री ने ये भी कहा कि पटवारी का मूल वक्तव्य सदन की कार्यवाही से नहीं निकाला गया है। अब इस शब्द संग्राम का अंत कहां होगा ये तो नहीं कहा जा सकता पर इस प्रहसन में मध्यप्रदेश के मीडिया की साख पर जरूर कीचड़ उछाला गया है। वो भी उन लोगों की आड़ में जिन्होंने विज्ञापन के नाम पर जनता के बजट की खुली लूट की है। सरकार को इस मसले का समाधान बड़ी तत्परता और प्राथमिकता से करना होगा। ये बात भी सही है कि मौजूदा भाजपा सरकार ने मीडिया को जो संसाधन उपलब्ध कराए हैं वैसे मध्यप्रदेश के इतिहास में पहले कभी नहीं उपलब्ध थे। इसके बावजूद ये भी सही है कि मीडिया की आड़ में ज्यादातर धन अवांछित तत्वों ने लूटा है। भाजपा सरकार को अब अपने कथित गोदी मीडिया और वास्तविक मीडिया के बीच अंतर करने की समझ विकसित करनी होगी। आगामी चुनावों में यही मीडिया जनता का मार्गदर्शन करेगा और जिसकी कीमत हर जनविरोधी राजनेता को चुकाना पड़ेगी। क्योंकि विचार का कहर बाढ़ नहीं सैलाब लाता है।

  • भाजपा चाहे सत्ता की समानांतर धुरी

    भाजपा चाहे सत्ता की समानांतर धुरी


    मध्यप्रदेश में चुनावी बुखार शुरु हो गया है। कांग्रेस के चुनावी मोड में आते ही भाजपा ने अपनी सतत संगठित होने की प्रक्रिया को भांजना शुरु कर दिया है। फिलहाल भाजपा के दिग्गजों की चिंता यही है कि चौदह साल से सत्ता पर आसीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भाजपा के लिए कहीं दिग्विजय न साबित हों। जिस तरह दिग्विजय सिंह ने जान बूझकर कांग्रेस का बंटाढार किया उसी तरह शिवराज भी भाजपा के लिए भस्मासुर न साबित हो जाएं। उनके बयानों ने और ताजा राजनीतिक यात्राओं ने भाजपा के दिग्गजों के कान खड़े कर दिये हैं। इसके चलते भाजपा अब मध्यप्रदेश में कोई नया राजनीतिक फेरबदल कर सकती है। कम से कम मुख्यमंत्री की गतिविधियों पर निगाह रखने के लिए वह किसी नेता को उप मुख्यमंत्री बना सकती है। इसके अलावा फिलहाल राज्यपाल की कुर्सी भी लगभग खाली है। इसलिए भाजपा इस पद का भी इस्तेमाल कर सकती है। फिलहाल नई राज्यपाल के रूप में गुजरात की पूर्व मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल की नियुक्ती की घोषणा ने भाजपा के दिग्गजों की चूलें हिला दी हैं।

  • अब तो मिटा दीजिए धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद

    अब तो मिटा दीजिए धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद

    -संदीप कोरी-

    बदलते वक्त ने भारत की कई व्यवस्थाओं को अप्रासंगिक कर दिया है। इसके बावजूद ढर्रे पर चलने वाली सरकारों ने उन्हें छोड़ने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई है। देश पर आपातकाल थोपने वाली इँदिरागांधी के कई फैसले वक्त की कसौटी पर देश से गद्दारी साबित हो रहे हैं। इसके बावजूद सत्ता की सुविधा को देखते हुए उन फैसलों पर सरकारें खामोश बनी हुईं हैं। अब तक की कांग्रेसी सरकारों से तो उन फैसलों को बदलने की कोई उम्मीद नहीं की जा सकती थी लेकिन इसके बाद आई गैर कांग्रेसी सरकारों ने भी उन फैसलों पर चुप्पी साधे रखी। संविधान में किया गया 42 वां संशोधन इसी तरह का एक विवादास्पद हस्तक्षेप था जिसे अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार इसलिए नहीं बदलना चाहती क्योंकि इससे मतों का ध्रुवीकरण होता है और वो सत्ताधीश के लिए फायदेमंद महसूस होता है। हालांकि ये संशोधन भारतीय गणराज्य को एकजुट रखने की दिशा में सबसे बड़ा व्यवधान बना हुआ है।

    इंदिरा गांधी ने आपातकाल के दौरान कानून में जो संशोधन किए उनके बाद उसे अंग्रेजी में ‘कंस्टीट्यूशन ऑफ इंडिया’ की जगह ‘कंस्टीट्यूशन ऑफ इंदिरा’ कहा जाने लगा था. इस दौर में संविधान में जो बदलाव किए गए उनके क्या नतीजे निकले और बाद में जनता पार्टी सरकार ने 44 वें संशोधन के माध्यम से जो बदलाव किए क्या वे भी कारगर कहे जा सकते हैं।संविधान से खिलवाड़ का ये दौर इंदिरागांधी की तानाशाही भरी सोच से उपजी थी। जिसने पूर्ववर्ती सरकारों के वायदों को धूल धूसरित कर दिया था।

    19 मार्च 1975 को इंदिरा गांधी को चुनाव याचिका की सुनवाई के लिए न्यायालय में गवाही के लिए आना पड़ा था।इसी वक्त जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में लाखों लोगों की भीड़ दिल्ली की सडकों पर इंदिरा गांधी के खिलाफ नारे लगा रही थी। दिल्ली की सड़कों पर सिंहासन खाली करो कि जनता आती है और जनता का दिल बोल रहा है इंदिरा का शासन डोल रहा है के नारे लगाए जा रहे थे।

    इंदिरा गांधी ने तब अपनी सरकार का बचाव करते हुए कहा कि कुछ विदेशी ताकतें भारत में अस्थिरता लाना चाहती हैं। इसलिए आपातकाल समय की जरूरत है। इसके लिए उन्होंने कई संविधान संशोधन किए। 40 वें और 41 वें संशोधन के बाद उन्होंने 42 वां संशोधन पास करवाया जिसमें समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता जैसे लुभावन शब्दों की आड़ में पूर्ववर्ती सरकारों के कई वायदे तोड़ दिए गए।

    कुछ ही दिनों बाद 12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में इंदिरा गांधी के चुनाव को गलत बताते हुए रद्द कर दिया। इसी महीने 25 जून को देश में आपातकाल घोषित कर दिया गया. इसके बाद संविधान में कई संशोधन किए गए और जनता के हाथों दी गईं शक्तियां छीनकर शासक के हाथों में सौंप दी गईं.

    आपातकाल में हुए संशोधनों में सबसे पहला था भारतीय संविधान का 38वां संशोधन. 22 जुलाई 1975 को पास हुए इस संशोधन के द्वारा न्यायपालिका से आपातकाल की न्यायिक समीक्षा करने का अधिकार छीन लिया गया. इसके लगभग दो महीने बाद ही संविधान का 39वां संशोधन लाया गया. यह संविधान संशोधन इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री पद को बनाए रखने के लिए किया गया था. इलाहाबाद उच्च न्यायालय इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द कर चुका था. लेकिन इस संशोधन ने न्यायपालिका से प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त व्यक्ति के चुनाव की जांच करने का अधिकार ही छीन लिया. इस संशोधन के अनुसार प्रधानमंत्री के चुनाव की जांच सिर्फ संसद द्वारा गठित की गई समिति ही कर सकती थी. आपातकाल को समय की जरूरत बताते हुए इंदिरा गांधी ने उस दौर में लगातार कई संविधान संशोधन किये. 40वें और 41वें संशोधन के जरिये संविधान के कई प्रावधानों को बदलने के बाद 42वां संशोधन पास किया गया. इसी संशोधन के कारण संविधान को ‘कंस्टीट्यूशन ऑफ इंदिरा’ कहा जाने लगा था. इसके जरिये भारतीय संविधान की प्रस्तावना तक में बदलाव कर दिए गए थे.

    42वें संशोधन के सबसे विवादास्पद प्रावधानों में से एक था – मौलिक अधिकारों की तुलना में राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों को वरीयता देना. इस प्रावधान के कारण किसी भी व्यक्ति को उसके मौलिक अधिकारों तक से वंचित किया जा सकता था. इसके साथ ही इस संशोधन ने न्यायपालिका को पूरी तरह से बौना कर दिया था. वहीँ विधायिका को अपार शक्तियां दे दी गई थी. अब केंद्र सरकार को यह भी शक्ति थी कि वह किसी भी राज्य में कानून व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर कभी भी सैन्य या पुलिस बल भेज सकती थी. साथ ही राज्यों के कई अधिकारों को केंद्र के अधिकार क्षेत्र में डाल दिया गया.

    42वें संशोधन का एक और कुख्यात प्रावधान ‘संविधान में संशोधन’ के सम्बंध में भी था. हालांकि आपातकाल से कुछ साल पहले सर्वोच्च न्यायालय ने केशवानंद भारती मामले में ऐतिहासिक फैसला देते हुए संविधान में संशोधन करने के पैमाने तय कर दिए थे. लेकिन 42वें संशोधन ने इन पैमानों को भी दरकिनार कर दिया. इस संशोधन के बाद विधायिका द्वारा किए गए ‘संविधान-संशोधनों’ को किसी भी आधार पर न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती थी. साथ ही सांसदों एवं विधायकों की सदस्यता को भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती थी. किसी विवाद की स्थिति में उनकी सदस्यता पर फैसला लेने का अधिकार सिर्फ राष्ट्रपति को दे दिया गया और संसद का कार्यकाल भी पांच वर्ष से बढाकर छह वर्ष कर दिया गया.

    आपातकाल के दौरान भारतीय संविधान में कुछ संशोधन ऐसे भी हुए जिन्हें उस वक्त सकारात्म नजरिए से देखा गया। संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवाद’, ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘अखंडता’ जैसे शब्दों को जोड़ दिया गया।कहा गया कि ये हमारा मौलिक कर्तव्य भी है। जबकि आज समाजवाद पूरे विश्व से तिरोहित हो चला है। धर्मनिरपेक्षता ने समाज को बांटकर रख दिया है। इससे जहां मुस्लिम तुष्टिकरण को बढ़ावा देकर कांग्रेस की सरकारों ने वोट बैंक पालिटिक्स खेली वहीं आगे चलकर ये ध्रुवीकरण भाजपा के सत्तासीन होने की प्रमुख सीढ़ी भी बना।आज जो लोग भारत तेरे टुकड़े होंगे जैसे नारे लगाते हैं उसके पीछे इस संशोधन से जबरिया पैदा किया दबाव भी शामिल है। जब वैश्विक उपभोक्तावाद ने प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दिया है तब ये संशोधन जबरन मारें रोवन न देय के हालात पैदा कर रहा है।

    आपातकाल के बाद हुए चुनावों में इंदिरा गांधी बुरी तरह चुनाव हारीं। 1977 में पहली बार भारत में एक गैर-कांग्रेसी सरकार बनी. मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली जनता पार्टी की सरकार ने आते ही संविधान के बदलावों को सुधारने का काम किया। इसकी जवाबदारी तत्कालीन कानून मंत्री शांति भूषण को दी गई। जनता पार्टी ने सबसे पहले 43वें संशोधन के जरिये सर्वोच्च एवं उच्च न्यायालयों को उनके अधिकार वापस दिलाए। इसके बाद संविधान में44वां संशोधन किया गया। सर्वोच्च न्यायालय ने भी 42वें संशोधन के कई प्रावधानों को असंवैधानिक बताते हुए संविधान को उसका मूल स्वरुप लौटाया।

    न्यायपालिका को दोबारा मजबूती देकर और 42वें संशोधन के दोषों को दूर करने के साथ ही 44वें संशोधन ने संविधान को पहले से भी ज्यादा मजबूत करने का काम भी किया है. इस संशोधन ने संविधान में कई ऐसे बदलाव किये जिससे 1975 के आपातकाल जैसी स्थिति दोबारा उत्पन्न न हो. आपातकाल सम्बन्धी प्रावधानों में ‘आतंरिक अशांति’ के स्थान पर ‘सशस्त्र विद्रोह’ शब्द जोड़ा गया. इसके साथ ही इस संशोधन ने मौलिक अधिकारों को भी मजबूती दी।हालांकि कांग्रेस की सरकारों ने षड़यंत्र इसके बाद भी खत्म नहीं किए। जब मनमोहन सिंह की सरकार के खिलाफ आंदोलन शुरु हुए तो अफवाह फैलाई गई कि सेना की एक सशस्त्र टुकड़ी दिल्ली की ओर कूच कर गई है। सजग सेनाध्यक्ष ने तब इस अफवाह का खंडन किया और आपातकाल लगाने का कांग्रेस का षड़यंत्र फिर फेल हो गया।

    जनता पार्टी की सरकार अपने आंतरिक विरोधों की वजह से ज्यादा नहीं चल सकी। कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा जोड़कर बनाई गई सरकार के घटक आपसी खींचतान में उलझ गए और उन्होंने सरकार को बिखेर दिया। कांग्रेस की सरकारों की रीढ़ तोड़कर भले ही जनता पार्टी की सरकार ने देश में लोकतंत्र की बहाली की इबारत लिखी हो लेकिन वह एक नए देश के निर्माण का वादा पूरा नहीं कर सकी। इसके बाद आई गैर कांग्रेसी सरकारों ने भी काफी काम किया लेकिन वे इंदिरा गांधी के सत्ता को केन्द्रित करने वाले फैसलों को नहीं बदल सकीं। मौजूदा मोदी सरकार समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता जैसे शब्दों को बदलकर अपना दायित्व निभा सकती है क्योंकि इन शब्दों को लेकर आरएसएस और भाजपा ने ही देश को आशा की नई किरण दिखलाई थी।

    (लेखक जन न्याय दल के भ्रष्टाचार मुक्त भारत,जनांदोलन के राष्ट्रीय संयोजक हैं)

  • संविधान से समाजवाद और धर्मनिरपेक्ष शब्द हटाएं – जन न्याय दल

    संविधान से समाजवाद और धर्मनिरपेक्ष शब्द हटाएं – जन न्याय दल

    सागर,8 जनवरी(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)। जन न्याय दल ने राष्ट्रपति महामहिम रामनाथ कोविंद को ज्ञापन भेजकर मांग की है कि सर्वधर्म समभाव स्थापित करने के लिए संविधान से समाजवाद और धर्मनिरपेक्ष शब्द हटाने के निर्देश दें। ये शब्द पूर्व वर्ती कांग्रेस सरकार ने 42 वें संविधान संशोधन के माध्यम से जोड़े थे। ज्ञापन में कहा गया है कि इन शब्दों के मनमाने अर्थ निकालकर कांग्रेस ने सेक्युलरिज्म के नाम पर मुस्लिम वोट कबाड़ने के लिए तुष्टिकरण की नीति अपनाई थी। इसके साथ साथ भाजपा ने भी प्रतिक्रिया स्वरूप हिंदू वोट कबाड़े। ज्ञापन की प्रतियां सभी सांसदों को भी भेजी गईं हैं।

    सागर में आयोजित पत्रकार वार्ता में जन-न्याय दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष एडवोकेट बृजबिहारी चैरसिया ने कहा कि इन शब्दों के कारण देश की समरसता दूषित हो रही है। उन्होंने कहा कि आर.एस.एस. की हिन्दुत्व व राष्ट्रवादी वैचारिक सोच देश की एकता और अखण्डता के लिए मील का पत्थर है। एक सवाल के जबाब में उन्होंने कहा कि आर.एस.एस. ने जो जन संवाद किया उसके कारण ही आज कांग्रेस मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति त्यागकर हिन्दुत्व की राह पर चलने को मजबूर हुई है। उन्होंने बताया कि उनकी पार्टी सुप्रीम कोर्ट से रिटायर्ड जस्टिस के.टी. थॉमस के उस बयान का स्वागत करती है जिसमें उन्होंने कहा है कि संविधान और सेनाओं के बाद आर.एस.एस. ने भारत के लोगों को सुरक्षित रखा।

    उन्होंने भाजपा पर आरोप लगाया कि भले ही वह आर.एस.एस. के वैचारिक सोच का राजनैतिक मुखौटा बनकर सत्तासीन हो गई है मगर अब उस सोच के विपरीत वह कांग्रेस की कार्बन कापी बनकर रह गई है। उन्होंने कहा कि राममंदिर, गौरक्षा कानून, समान नागरिक संहिता, धारा 370, स्वदेशी जैसे मूलभूत मुद्दों पर भाजपा की कथनी और करनी अब जनता के सामने उजागर हो चुकी है।

    जातिवाद पर पूछे गये सवाल पर उन्होंने कहा कि जाति भारतीय समाज की सच्चाई है। उन्होंने राजनैतिक पार्टियों पर आरोप लगाया कि वे अपने राजनैतिक नफा-नुकसान के आधार पर जातिवाद को परिभाषित कर रहीं हैं। उन्होंने एस.सी.,एस.टी. और ओ.बी.सी. वर्गो के संवैधानिक गठन का आधार सिर्फ जाति को बताते हुये देश के संसाधनों व अवसरों के वितरण को इन्हीं वर्गो की जनसंख्या के आधार पर करने की वकालत की।

    उन्होंने प्रदेश की भाजपा सरकार पर आरोप लगाया कि शराब की बुराई को स्वीकार करने के बाद भी भाजपा प्रदेश में कानूनन शराबबंदी की दिशा में पहल न करके जन-अपराध कर रही है। उन्होंने मुख्यमंत्री से आग्रह किया है कि वे शराबबंदी ना कर पाने की अपनी लाचारी जनता के सामने रखें और कारण बतायें। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के जो नेता शराबबंदी की बात करते हैं उन्हें पहले अपनी पार्टी के भीतर इस मुद्दे पर नीतिगत निर्णय करवाना चाहिए।

    श्री चौरसिया ने कहा कि महिलाओं पर अत्याचार और कानून व्यवस्था के मामले में पिछले कुछ समय से मध्यप्रदेश में हालात काफी बिगड़े हैं। ऐसे में पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने पुलिस जन-संवाद कार्यक्रम के माध्यम से अगले तीन महीनो में थाना स्तर पर जनता से जुड़ने का जो अभियान चलाया है वो एक बेहतर कदम साबित हो सकता है।

    एक सवाल के जवाब में श्री चौरसिया ने कहा कि उनकी पार्टी मतदाताओं को वोट बैंक नहीं मानती इसलिए केवल ऊर्जावान प्रत्याशियों को ही चुनाव मैदान में उतारेगी। जातिगत तुष्टिकरण के चलते किसी भी मुसलमान को टिकिट नहीं देगी। उन्होंने कहा कि भारत और पाकिस्तान का विभाजन धर्म के आधार पर हुआ था। मुसलमानों के लिए पाकिस्तान बना था। इस लिहाज से यदि भारत का मुसलमान धर्म की बात करता है तो उसे पाकिस्तान जाना होगा। भारत के मुसलमानों ने धर्म के बजाए देश चुना था इसलिए उनके सामने धर्म को लेकर कोई दुविधा नहीं होनी चाहिए।

    उन्होंने बताया कि उनकी पार्टी वर्ष 2018 के प्रदेश विधानसभा चुनाव में हिस्सा लेकर अपनी लोकतांत्रिक भूमिका का निर्वहन करेगी। पार्टी की कार्यसमिति ने शिवराज सिंह ठाकुर को प्रभारी बनाकर छत्तीस सदस्यीय प्रदेश चुनाव संचालन समिति गठित कर दी है। उन्होंने बताया कि पार्टी अपनी चुनावी तैयारी विधानसभावार कर रही है। उनकी पार्टी चुनाव प्रचार के साथ ही विधानसभावार संसद से कानून बनाकर राम मंदिर व गौ हत्या रोकने के कानून बनाने और मध्यप्रदेश में कानूनन शराबबंदी के लिये जनता को संकल्पित करेगी जिसके लिये पार्टी ‘‘संकल्प-अभियान’’ जारी करने जा रही है। पत्रकार वार्ता में पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता आलोक सिंघई, इंजी.संदीप कोरी और अनूप चौकसे भी उपस्थित थे।