Category: राजनीति

  • कब्जाधारी कांग्रेसियों की सूची सार्वजनिक करेगी भाजपा बोले लुणावत

    कब्जाधारी कांग्रेसियों की सूची सार्वजनिक करेगी भाजपा बोले लुणावत

    भोपाल,21 जनवरी(प्रेस सूचना केन्द्र)। भारतीय जनता पार्टी ने अपने पंद्रह सालों के शासनकाल में सार्वजनिक संपत्तियों पर कब्जा जमाने वाले अतिक्रमण कारियों के खिलाफ कार्रवाई की लेकिन कभी दलगत राजनीति के आधार पर भेदभाव नहीं किया। मौजूदा कांग्रेस सरकार चुन चुनकर भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्तांओं को अतिक्रमण के नाम पर प्रताड़ित कर रही है। ऐसे झूठे मामलों में प्रताड़ित किए जा रहे आम लोगों का नेतृत्व करते हुए कल भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता पूरे प्रदेश में कलेक्टर कार्यालयों का घेराव करेंगे। सरकार से मांग की जाएगी कि वह आम नागरिकों को भाजपा का कार्यकर्ता बताकर प्रताड़ित करना बंद करे। भाजपा ने हर जिले में कांग्रेस के पदाधिकारियों के अतिक्रमणों की सूची बनाई है जिसे सार्वजनिक किया जाएगा और सरकार से उन अतिक्रमण कारियों के विरुद्ध बेदखली की कार्रवाई करने की मांग की जाएगी। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष बृजेश लुणावत ने आज पार्टी के प्रदेश कार्यालय में आयोजित पत्रकार वार्ता में ये बात कही है।


    श्री लुणावत ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी जिस तरह के भेदभाव और अवैध वसूली के आरोप प्रदेश सरकार पर लगाती रही है, उसे स्वयं मुख्यमंत्री कमलनाथ भी मानते हैं और मुख्य सचिव की नोटशीट भाजपा के आरोपों पर मोहर लगाती है। मुख्यमंत्री ने माना है कि इस मुहिम के दौरान माफिया के नाम पर आम जनता को परेशान किया जा रहा है। उन्होंने लिखा है कि बिल्डिंग परमीशन जैसी छोटी-छोटी बातों के लिए हजारों नोटिस दिये जा रहे हैं, पुलिस और प्रशासन के लोग इसमें शामिल हैं, जबकि मैंने स्पष्ट आदेश दिया था कि कार्रवाई माफिया पर हो, जनता पर नहीं।

    श्री लुणावत ने कहा कि कमलनाथ सरकार प्रदेश में अराजकता का वातावरण बना रही है। प्रदेश में अवैध शराब माफिया, उत्खनन माफिया और ट्रांसपोर्ट माफिया सक्रिय हैं, लेकिन उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। कांग्रेस नेताओं और अधिकारियों की मिलीभगत से सरकारी जमीनों को हथियाया जा रहा है, अवैध कब्जे किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि प्रदेश में सबसे ज्यादा अतिक्रमण कांग्रेसियों के ही हैं, लेकिन गरीब जनता और भाजपा कार्यकर्ताओं को चुन-चुनकर निशाना बनाया जा रहा है।

    श्री लुणावत ने कहा कि हमारी मांग है कि प्रदेश सरकार द्वारा माफियाओं की जो सूची तैयार कराई गई है, सरकार उसे जनता के बीच प्रस्तुत करे। यदि सरकार ऐसा नहीं करती है, तो भारतीय जनता पार्टी अपने स्तर पर तैयार की जा रही अतिक्रमण, अवैध कब्जों की सूचियां मुख्यमंत्री को सौंपेगी। उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी को यह जानकारी है कि किस मंदिर की जमीन पर किस कांग्रेस नेता का कब्जा है और सरकारी तालाबों की जमीन किसने हथिया रखी है। उन्होंने कहा कि हमारी मांग है कि सरकार इन लोगों पर कार्रवाई करे और गरीब जनता तथा कार्यकर्ताओं को परेशान करना बंद करे।

    प्रदेश में 24 जनवरी को होने वाले विरोध प्रदर्शन के दौरान पार्टी के वरिष्ठ नेता अलग-अलग जिलों में आंदोलन का नेतृत्व करेंगे। प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह इंदौर में नगर-ग्रामीण द्वारा आयोजित विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व करेंगे। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चैहान एवं सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर भोपाल में आंदोलन का नेतृत्व करेंगी। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष व सांसद नंदकुमार सिंह चैहान खण्डवा में तथा नरोत्तम मिश्रा जबलपुर में उपस्थित रहेंगे। शिवपुरी में श्रीमती यशोधरा राजे सिंधिया, छतरपुर में भूपेन्द्र सिंह, उमरिया में रामलाल रौतेल, सतना में राजेन्द्र शुक्ला, दमोह में जयंत मलैया, टीकमगढ़ में लालसिंह आर्य, कटनी में गणेश सिंह, ग्वालियर नगर-ग्रामीण में विवेक शेजवलकर, होशंगाबाद में डॉ. सीताशरण शर्मा, हरदा में हेमंत खंडेलवाल, खरगोन में जितू जिराती, झाबुआ में सुदर्शन गुप्ता, धार में सुश्री ऊषा ठाकुर, मुरैना में जयसिंह कुशवाह, भिण्ड में रूस्तम सिंह, दतिया में श्रीमती संध्या राय, श्योपुर में अभय चैधरी, गुना में वेदप्रकाश शर्मा, अशोकनगर में नरेन्द्र बिरथरे, सागर में गौरीशंकर बिसेन, निवाड़ी में उमेश शुक्ला, पन्ना में बृजेन्द्रप्रताप सिंह, रीवा में जनार्दन मिश्र, सीधी में श्रीमती रीति पाठक, सिंगरौली में शशांक श्रीवास्तव, शहडोल में गिरीश द्विवेदी, अनूपपुर में ओमप्रकाश धुर्वे, डिण्डौरी में संपत्तिया उईके, मंडला में नरेश दिवाकर, बालाघाट में ढालसिंह बिसेन, सिवनी में कन्हाईराम रघुवंशी, नरसिंहपुर में राव उदयप्रताप सिंह, छिन्दवाड़ा में कमल पटेल, भोपाल नगर-ग्रामीण में साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, रायसेन में डॉ. गौरीशंकर शेजवार, विदिशा में ध्रुवनारायण सिंह, सीहोर में रमाकांत भार्गव, बुरहानपुर में सुभाष कोठारी, बड़वानी में गजेन्द्र पटेल, अलीराजपुर में श्रीमती रंजना बघेल, उज्जैन नगर-ग्रामीण में रमेश मेंदोला, शाजापुर में महेन्द्र सोलंकी, आगर में विजेन्द्र सिंह सिसोदिया, देवास में कृष्णमुरारी मोघे, रतलाम में जी.एस. डामोर, मंदसौर में सुधीर गुप्ता एवं जगदीश देवड़ा नीमच में कार्यकर्ताओं के साथ कलेक्ट्रेट का घेराव करेंगे।

  • मीसाबंदी की विधवा को पेंशन दें बोला छग हाईकोर्ट

    मीसाबंदी की विधवा को पेंशन दें बोला छग हाईकोर्ट

    बिलासपुर.13 जनवरी,(प्रेस सूचना केन्द्र)। छत्तीसगढ़ (Chhattisagrh) की बिलासपुर हाईकोर्ट (Bilaspur High court) ने एक याचिका पर सुनवाई के बाद मीसाबंदी (Misabandi) की विधवा को आधी पेंशन (Pension) देने का आदेश दिया है. कांग्रेस सरकार के फैसले को सुधारने का आदेश देने वाला ये अदालत का पहला फैसला है।पेंशन के नियमों के मुताबिक बिलासपुर के इस मीसाबंदी की विधवा को पति की मृत्यु के बाद आधी पेंशन दी जाती थी। जिसे राज्य शासन ने कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद जनवरी 2019 से बंद कर दिया। कोर्ट के इस फैसले के बाद साफ हो गया है कि सरकार का फैसला गलत था और अब मीसाबंदियों की विधवाओं की पेंशन जारी रहेगी।

    कांग्रेस सरकार ने सत्ता में आने के बाद तमाम मीसाबंदियों की पैंशन सत्यापन के नाम पर रोक दी थी। पिछली भाजपा सरकार ने बाकायदा शासकीय अधिसूचना के माध्यम से ये पेंशन जारी की थी। नई सरकार के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई जिसके आधार पर हाईकोर्ट ने बिलासपुर के 28 और दुर्ग के 32 मीसाबंदियों को पेंशन देने का आदेश दिया था। इसके बावजूद मीसाबंदियों की विधवाओं की पेंशन जारी नहीं की गई थी। पेंशन बंद किए जाने के खिलाफ बिलासपुर के मीसाबंदी की विधवा ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। हाईकोर्ट के जस्टिस पी सेम कोशी की सिंगल बेंच ने मीसाबंदी की विधवा के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उनके रोकी गई पेंशन की राशि और सारे एरियर्स को तत्काल जारी करने का आदेश दिया है। मीसाबंदी की विधवा की ओर से दायर यह राज्य का पहला मामला है। ऐसा माना जा रहा है कि अब बाकी विधवा पेंशन पाने वालों के लिए भी रास्ता साफ हो गया है.

    मध्यप्रदेश में भी अभी तक मीसाबंदियों की मौजूदगी और सच्चाई का सत्यापन होने के बावजूद कई पेंशन धारकों को भुगतान नहीं किया जा रहा है। पिछले 9 महीनों से पेंशन नहीं मिलने से परेशान मीसाबंदियों ने हाईकोर्ट की शरण भी ली है।छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने तमाम याचिकाओं पर एक स्वर में सरकार के आदेश को रद्द कर दिया है। अभी 4 दिनों पहले बिलासपुर के ही 28 मीसाबंदियों को हाईकोर्ट ने सुनवाई के बाद बड़ी राहत देते हुए उनकी तमाम पेंशन और भत्तों की राशि तत्काल जारी करने का आदेश दिया था. दो दिन पूर्व दुर्ग के 38 मीसाबंदियों को भी हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली थी और अब विधवा पेंशन के प्रकरण में भी हाईकोर्ट ने वही फैसला दिया है।

  • कैलाश पर प्रहार को मजबूर कांग्रेस

    कैलाश पर प्रहार को मजबूर कांग्रेस

    कमलनाथ सरकार को सबसे बड़ा खतरा महसूस हो रहे कैलाश विजयवर्गीय को जल्दी ही धारा 144 का उल्लंघन करने के आरोप में गिरफ्तार किया जा सकता है। उनके साथ इंदौर कमिश्नर के आवास के बाहर धरना देने वाले इंदौर से बीजेपी सांसद शंकर लालवानी, बीजेपी विधायक रमेश मेंदोला, महेंद्र हार्डिया और जिला अध्यक्ष गोपीकृष्ण नेमा के खिलाफ भी धारा 144 उल्लंघन करने की FIR दर्ज की गई है। इस दौरान कैलाश विजयवर्गीय ने बयान दिया था कि हम कमिश्नर से मिलने आए हैं इसके बाद भी अधिकारियों ने प्रोटोकाल का पालन नहीं किया और हमें सूचना नहीं दी कि कमिश्नर शहर में नहीं हैं। उन्होंने कहा कि हम इसे बर्दाश्त नहीं करेंगे। साथ में उन्होंने पुछल्ला लगा दिया कि आज शहर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेतागण मौजूद हैं नहीं तो मैं शहर में आग लगा देता। कैलाश के इस बयान से सत्तारूढ़ कांग्रेस बौखला गई। कैबिनेट की बैठक में विकास योजनाओं को छोड़कर चर्चा का सबसे बड़ा मुद्दा कैलाश विजयवर्गीय का ये बयान ही बन गया। सज्जन सिंह वर्मा, जीतू पटवारी और स्वास्थ्य मंत्री तुलसी सिलावट ने प्रेसवार्ता में ही कैलाश के बयान को निशाना बना दिया। सज्जन सिंह वर्मा बोले कि कैलाश विजयवर्गीय जैसी भाषा बोल रहे हैं वह इंदौर के लोग पसंद नहीं करते। इंदौर विकास प्रेमियों का शहर है और वहां इस तरह की भाषा नहीं चल सकती। दरअसल कैलाश विजयवर्गीय को कमलनाथ सरकार सबसे बड़ा खतरा महसूस करती है। पश्चिम बंगाल के प्रभारी होने के कारण कैलाश विजयवर्गीय राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती बने हुए हैं। ममता बैनर्जी के गुंडों से लड़ते हुए कैलाश ने पश्चिम बंगाल में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई है। वहां कांग्रेस का मुकाबला ममता बैनर्जी की तृणमूल कांग्रेस से तो है ही साथ में भाजपा से भी है। जिस तरह महाराष्ट्र में कांग्रेस ने शरद पंवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी से तालमेल बिठाकर सत्ता पाई है उसी तरह वह बंगाल में भी ममता बैनर्जी के सामने झुकने तैयार है। इसलिए कांग्रेस का हाईकमान नहीं चाहता कि वह बंगाल में भी कैलाश की भाजपा को सफलता के झंडे गाड़ने की छूट दे दे। यही वजह है कि मध्यप्रदेश में वह कैलाश को घेरकर भाजपा के सफल हथियार को भौंथरा करना चाहती है। धारा 144 के उल्लंघन जैसे छोटे से मुद्दे को उठाकर वह कैलाश को घुटना टेक कराना चाहती है। कांग्रेस की इस रणनीति का दूसरा असर यह भी हो रहा है कि कैलाश मध्यप्रदेश भाजपा का चेहरा भी बनते जा रहे हैं। हाईकमान से करीबी होने के नाते भाजपा संगठन का भी एक बड़ा धड़ा कैलाश से जुड़ता जा रहा है। ऐसे में कांग्रेस की कमलनाथ सरकार जाने अनजाने में कैलाश पर प्रहार करके भाजपा को उसका सर्वमान्य नेता दिए दे रही है। कांग्रेस का दिग्विजय सिंह गुट भी कैलाश से करीबी महसूस करता है। ऐसे में कमलनाथ सरकार अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा कार्य कर रही है। जब प्रदेश में कमलनाथ सरकार के प्रति बैचेनी बढ़ रही है तब उसे विकासात्मक कार्यों पर जोर देना चाहिए। इसके विपरीत वह तोड़फोड़ की राजनीति में ही उलझी बैठी है। कमलनाथ सरकार की यह रणनीति आने वाले समय में प्रदेश की राजनीतिक स्थितियों में बड़ा बदलाव लाने वाली साबित हो सकती है।

  • आपातकाल की बूढ़ी कुढ़न

    आपातकाल की बूढ़ी कुढ़न

    लोकस्वामी अखबार पर तालाबंदी और संपादक जीतू सोनी पर दस हजार रुपए का इनाम घोषित करके कमलनाथ सरकार ने आपातकाल की यादें ताजा कर दीं हैं। एक बार फिर ये साबित हो गया है कि देश में केवल दो वर्ग हैं एक शोषक और दूसरा शोषित। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने जिस एसके मिश्रा छोटू को आईएएस बनाया था वे शिवराज सिंह चौहान के प्रमुख सचिव रहे और भ्रष्टाचार के सबसे बड़े संरक्षक भी रहे। पूरी आईएएस बिरादरी लंबे समय तक केवल इसलिए सदमे में रही क्योंकि उसे छोटू मिश्रा के निर्देशों का पालन करना पड़ा। रिश्वत में सोने और रत्नों की रिश्वत लेने वाले छोटू मिश्रा को तमाम शिकायतों के बावजूद शिवराज ने अपने से दूर नहीं किया। तमाम झंझावातों के बीच छोटू मिश्रा संवाद की कड़ी बने रहे। दिग्विजय सिंह को सत्ता का लाभ दिलाते रहे छोटू कांग्रेस के गुटीय संतुलन में भी प्रमुख कड़ी बने रहे। मुकेश नायक के जीजा होने के कारण वे उनकी पवई से जीत के शिल्पकार भी बने। शिवराज सिंह चौहान के वित्तीय सलाहकार होने के कारण ये जीजा साले भारतीय जनता पार्टी के कार्यकाल में मलाई छानते रहे। वित्तीय प्रबंधन की यही एकमात्र कला आज भी उन्हें कमलनाथ सरकार की सबसे पावरफुल शख्सियत बना रही है। वे आज भी इतने ताकतवर हैं कि जैसे ही इंदौर के जांबाज जीतू सोनी ने अपने अखबार में उनकी अय्याशी की कहानी छापी तो मौजूदा सरकार में भूचाल आ गया। बात दरअसल हरभजन सिंह की ब्लैकमेलिंग की नहीं है। दरअसल जीतू सोनी ने मध्यप्रदेश की सत्ता की उस चाभी को घुमा दिया जिससे कई सत्ताधीशों की तिजोरियों का राजमार्ग जुड़ा हुआ है। जीतू सोनी के पास जो सबूत हैं उनकी अगली किस्तें यदि जारी हो जातीं तो प्रदेश और देश को कर्ज के दलदल में घसीटने वाले उन सफेदपोशों के चेहरों पर कालिख पुत जाती जो लंबे समय से गद्दारी की इबारत लिख रहे हैं। इसमें भाजपा और कांग्रेस के वे तमाम चेहरे हैं जिन्हें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तरीके से प्रदेश पर शासन करने का अवसर मिला। जीतू सोनी का अखबार जब कैलाश विजयवर्गीय के खिलाफ खबरें छापता था तो इंदौर में तनाव हो जाता था। आज सतही तौर पर ही सही कैलाश विजय वर्गीय लोकस्वामी पर पड़े छापे की निंदा कर रहे हैं।दरअसल जीतू सोनी और उनकी पत्रकारिता को लंबे समय से देखने वाले पत्रकार भी जानते हैं कि माई होम को कैसे पुलिस महकमे ने समाज के नाबदान की तरह इस्तेमाल किया। माईहोम एकमात्र ऐसा डांस बार है जहां हर वक्त पुलिस की निगरानी रहती थी। इंदौर के तमाम नवधनाड्य वहां आते जाते रहते हैं। ऐसा दो दशकों से ज्यादा समय से चल रहा था। ये सारा तमाशा समाज के लिए इतना उपयोगी था कि अनुराधा शंकर जैसी दबंग पुलिस अधिकारी ने भी कभी इसे छेडने की कोशिश नहीं की। कमलनाथ ने जिन मनगढ़ंत कहानियों से इस अड्डे को तबाह करने का प्रयास किया है उसके नतीजे इंदौर के लोग अच्छी तरह जानते हैं। इंदौर वही शहर है जहां अनिल धस्माना पर जानलेवा हमला हुआ था। खुद रुचिवर्धन मिश्रा को इस मामले की गंभीरता बता दी गई थी। इसके बावजूद उन्होंने सरकार के इशारे पर अपने ही विभाग की बरसों की मेहनत को पलीता लगाने का फैसला कर लिया। हालांकि इसका थोड़ा बहुत आभास उन्हें भी हो गया था तभी जब वे प्रेस वार्ता में सरकार की गढ़ी कहानी सुना रहीं थीं तब उनके हाथ कांप रहे थे। जीतू सोनी को फरार करने और दस हजार रुपए का इनाम घोषित करने के पीछे कमलनाथ सरकार की मंशा केवल आतंक फैलाने की है। जैसा कि वह खाद्य पदार्थों में मिलावट के नाम पर रासुका लगाने के अभियान में कर चुकी है।

    इंदिरा गांधी की जमाखोरों के खिलाफ चलाई गई मुहिम की नकल बरसों बाद दुहराने के बाद भी कमलनाथ को वांछित सफलता नहीं मिल पा रही है। आपातकाल का हश्र पूरे देश के सामने है। कमलनाथ तो इंदिरा गांधी के समान बेदाग भी नहीं हैं। इसके बावजूद वे उसी पिटी फिल्म को दुबारा सुपरहिट कराने का ख्वाब पाले बैठे हैं। देश के असली उद्यमियों के विरुद्ध चलाई गई इस मुहिम की कुढ़न कोई अच्छे नतीजे लाएगी ये नहीं कहा जा सकता। दरअसल ये फर्जी उद्योगपतियों या कहा जाए देश के लुटेरों से जनता के संग्राम की शुरुआत कही जा सकती है। जीतू सोनी को तो माईहोम जैसे प्रोजेक्ट की वजह से प्रताड़ित किया जा सकता है लेकिन सूचना क्रांति के इस दौर में सच्चाई को छुपाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। फर्जी उद्योगपतियों की उद्यमिता के कारनामे भी जल्दी ही जनता जान जाएगी।तब एक नहीं हजारों जीतू सोनी खड़े होंगे और प्रदेश की पुलिस भी उनका मुकाबला नहीं कर पाएगी।

  • निर्दोष सिखों के नरसंहार के दोषी कब दंडित होंगे

    निर्दोष सिखों के नरसंहार के दोषी कब दंडित होंगे

    स. इकबाल सिंह लालपुरा

    1984 में निर्दोष सिखों का बर्बरता से नरसंहार किया गया, सरेराह गले में टायर डालकर उन्हें जलाया गया, सामूहिक कत्ल किए गए, बलात्कार किए गए, लूट की गई और गुरुद्वारों को तोड़ दिया गया। अच्छे भले लोग भी ‘खून का बदला खून’, ‘खून के छींटे सिखों के घर तक पहुंचने चाहिए’ और ‘जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है’ की बातें करने लगे

    31 अक्टूबर 1984 को देश की तात्कालिक प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का कत्ल उन्हीं की सुरक्षा में नियुक्त दो पुलिस कर्मचारियों (एक सब इंस्पेक्टर व एक सिपाही) ने प्रधानमंत्री के आवास पर ही कर दिया। किसी भी देश में प्रधानमंत्री व उसका निवास सबसे सुरक्षित स्थान होता है। जो भी व्यक्ति सेना, अर्धसैनिक दस्ते या पुलिस की वर्दी पहनता है, वह केवल देश के कानून व नागरिकों की सुरक्षा तक ही समर्पित होता है। उसका व्यक्तिगत धर्म/जाति का बंधन उसे अपनी ड्यूटी निरपक्षता से करने में रुकावट नहीं होना चाहिए। यदि सुरक्षा कर्मचारी अनुशासन की अवहेलना करें व रखवाले बनने की जगह कातिल, हत्यारे बन जाएं तब जरूर कुछ बड़े मानसिक कारणों की संभावना होती है।

    इंदिरा गांधी जी पर हमला 31 अक्टूबर 1984 को सुबह तकरीबन 9:20 पर हुआ। तुरंत उन्हें ‘ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस’ दिल्ली में ले जाया गया। जहां पर डॉक्टरों ने 10:50 पर उन्हें मृत घोषित कर दिया। 11:00 बजे प्रातः ऑल इंडिया रेडियो प्रधानमंत्री जी को उन्हीं के दो सिख शस्त्रधारी अंगरक्षकों द्वारा कत्ल किया जाने का ऐलान करता है। साधारणत: ‘ग्रेव एंड सडन प्रोवोकेशन’ जो जुर्म की गंभीरता को नहीं बल्कि सजा को कम करने की प्रक्रिया है जिसका तात्पर्य यह है कि दोषी की भावनाओं को ठेस पहुंची तो उसने जुर्म कर दिया। पर दिल्ली सिख कत्लेआम की कहानी तो कुछ अलग ही है।

    भावनाएं तो कुछ मिनटों के बाद ही शांत हो जाती हैं। परंतु दिल्ली में सिखों कत्लेआम कुछ मिनटों बाद नहीं, बल्कि कई घंटों की विचार मंथन से उत्पन्न हुई घटना प्रतीत होती है। । राजीव गांधी शाम 4:00 बजे वापस एम्स पहुंचते हैं। पहली पत्थरबाजी की घटना शाम 5:30 बजे तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह जी के एम्स पहुंचने पर होती है। रात में अकबर रोड दिल्ली के एक बंगले पर ऐसे कुछ मुख्य लोग इकट्ठे होते हैं, जिनमें से अधिकतर पर सिख कत्लेआम करवाने का दोष आज भी लगाया जाता है।

    1 नवंबर 1984 को सुबह केवल दिल्ली ही नहीं भारत के कई राज्यों में सिखों का नरसंहार आरंभ होता है। जिन्होंने प्रधान मंत्री जी की हत्या की थी। उनमें से एक को तो गिरफ्तार कर लिया गया व दूसरे को मौके पर ही मार गिराया गया। परंतु नरसंहार उन हजारों निर्दोष सिखों का हुआ जिनका कोई जुर्म ही नहीं था।

    निर्दोष सिखों का बर्बरता से नरसंहार किया गया, सरेराह गले में टायर डालकर उन्हें जलाया गया, सामूहिक कत्ल किए गए, बलात्कार किए गए, लूट की गई और गुरुद्वारों को तोड़ दिया गया। अच्छे भले लोग भी ‘खून का बदला खून’, ‘खून के छींटे सिखों के घर तक पहुंचने चाहिए’ और ‘जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है’ की बातें करने लगे। 3 नवंबर तक देश की पुलिस, फौज और अदालतें खामोश रही, इंसानियत उनके ह्रदय में नहीं जागी। सरकारी आंकड़ों के अनुसार इन 3 दिनों में करीब 2800 सिख दिल्ली में और 3350 सिख भारत के दूसरे राज्यों में कत्लेआम की भेंट चढ़े। लूट खसोट और नुकसान का तो कोई हिसाब ही नहीं। सरकारी तंत्र चाहे अराजकता की तस्वीर बना रहा परंतु आम आदमी के ह्रदय में इंसानियत जरूर कचोटती रही। उन्होंने मजलूमों को अपनी छाती से लगाकर, अपने घर में छुपाकर भी रखा कई जगह बचाने वाले भी भीड़ तंत्र के शिकार बनें और य​ह भले लोग शरणार्थी कैंपों में भी उनका सहारा बने। ये हमला एक धर्म को मानने वालों के द्वारा दूसरे पंथ पर नहीं था बल्कि बदला लेने की नियत से अपराधियों और राजनीतिक दल के नापाक गठबंधन का घिनौना कृत्य था|

    इस कत्लेआम की पड़ताल तो क्या होनी थी, पुलिस ने कोई मुकदमा भी दर्ज नहीं किया और न ही किसी अदालत ने कानून के पालन हेतु, स्वयं ही कोई कार्रवाई की। दुनिया भर में बदनामी के दाग से बचने हेतु तात्कालिक सरकार ने नवंबर 1984 में एक एडिशनल कमिश्नर पुलिस वेद मरवाह की अध्यक्षता में कमेटी बनाई । जिसे 1985 में बंद कर दिया गया। उस रिपोर्ट का भी कुछ पता नहीं। अगला कमीशन जस्टिस रंगनाथ मिश्रा का बना। जस्टिस रंगनाथ मिश्रा कमीशन ने कहा कि दोषियों की शिनाख्त करनी उसकी जिम्मेदारी का हिस्सा ही नहीं थी। इसी क्रम में अब तक 10 से अधिक कमीशन और कमेटियां बन चुकी हैं। परंतु पूर्ण इंसाफ की प्रक्रिया अभी देश की राजधानी दिल्ली में ही अधूरी है। देश के अन्य राज्यों में 35 साल पूरे होने के बाद भी सरकार इंसाफ की निष्पक्ष जांच, मुआवजा व दोषियों को सजा दिलाने हेतु पूरी तरह सजग नहीं है।

    सन 1993 में मदन लाल खुराना जी की तरफ से बनाई गई ‘जस्टिस नरूला कमेटी’ को भी उस समय कि केंद्र सरकार ने मान्यता नहीं दी थी। पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेई जी की सरकार ने सन 2000 में ‘जस्टिस जी. टी. नानावती कमीशन’ का गठन करके इस नरसंहार की जांच को आगे बढ़ाया। जो आज भी कभी तेज ओर कभी धीमी गति से चल रही हैं।

    बेगुनाह लोगों के कत्लेआम, लूटमार और औरतों के साथ बलात्कार करने वाले दोषियों को सजा करवाने की प्रक्रिया यदि 35 साल में पूरी नहीं हो सकी तो लगता है कि पूरी न्यायिक प्रक्रिया की भी जांच आवश्यक है।

    आज जब सारा विश्व और विशेषकर भारत सरकार श्री गुरु नानक देव जी का 550 साला प्रकाश उत्सव बना रही है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की तरफ से सिख भाईचारे के हरे जख्मों पर मरहम लगाने का प्रयास हो रहा है। तो अच्छा हो, कि समय निश्चित करके 1984 के अपराधियों की सजा दिलवाने के कार्य को भी प्रमुखता से किया जाए।

    ( लेखक पंजाब पुलिस से सेवानिवृत्त डीआईजी हैं )

  • अबकी बारी शिवसेना भारी, राऊत बोले सरकार बनाएंगे

    अबकी बारी शिवसेना भारी, राऊत बोले सरकार बनाएंगे

    मुंबई,2 नवंबर(प्रेस सूचना केन्द्र)। महाराष्ट्र में भाजपा शिवसेना युति के बीच मुख्यमंत्री को लेकर जो रार ठनी है उसका कोई समाधान होता नजर नहीं आ रहा है। 50-50 सीटों पर तालमेल से चुनाव लड़कर भाजपा ने 105 और शिवसेना ने 56 सीटें हासिल कीं हैं। स्वाभाविक तौर पर महाराष्ट्र के नागरिकों ने सर्वाधिक 25.7 प्रतिशत मत देकर भाजपा की निवृतमान सरकार को आगे अपना काम जारी रखने का जनादेश दिया है लेकिन उसका ये मत प्रतिशत तब है जब शिवसेना से उसका गठबंधन था। शिवसेना को भी इस चुनाव में 16.5 प्रतिशत मत प्राप्त हुए हैं। उसे भाजपा से गठबंधन की मंहगी कीमत चुकानी पड़ी है। यही वजह है कि शिवसेना अब अपना अस्तित्व बचाने के लिए आदित्य ठाकरे को मुख्यमंत्री बनाने की जिद पर अड़ी हुई है।

    शिवसेना सांसद संजय राऊत ने आज अल्टीमेटम दिया है कि यदि भाजपा पंद्रह दिनों तक सरकार नहीं बना पाएगी तो फिर शिवसेना सरकार बनाने का दावा पेश करेगी। शिवसेना हर हाल में अपना मुख्यमंत्री बनाने की जिद पर अड़ी हुई है। उसके नेताओं का कहना है कि एक बार सत्ता का संचालन भाजपा कर चुकी है इसलिए इस बार शिवसेना को मौका मिलना चाहिए। भाजपा का कहना है कि गठबंधन के बीच भाजपा ने ज्यादा सीटें पाईं हैं इसलिए बड़े दल होने के नाते उसे सरकार चलाने का अवसर मिलेगा। हालांकि कम सीटें आने के लिए शिवसेना अब भाजपा को ही दोषी बता रही है। उसके नेताओं का कहना है कि भाजपा के मत प्रतिशत में गिरावट बता रही है कि भाजपा को सत्ता चलाने का जनादेश नहीं है। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के आए नतीजों के मुताबिक 2014 के 122 सीटों के मुकाबले भाजपा इस बार 105 सीटों पर ही जीत दर्ज कर सकी। चुनाव आयोग के आंकड़े के अनुसार पार्टी को 17 सीटों का नुकसान होने के साथ कुल मिले मतों में भी करीब दो फीसदी की गिरावट आई है। आंकड़ो के मुताबिक भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के अलावा महाराष्ट्र की राजनीति की तीन अहम पार्टियों शिवसेना, कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के मत प्रतिशत में भी गिरावट आई है। इसकी वजह कई सीटों पर बागियों के मिले मत हैं।

    भाजपा ने 2014 में 260 सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे और उसके खाते में कुल पड़े मतों का 27.8 प्रतिशत गया जो इस चुनाव में घटकर 25.7 फीसदी रह गया। हालांकि, इस पिछले चुनाव में अकेले भाजपा लड़ी थी लेकिन इस बार वह शिवसेना के साथ गठबंधन में उतरी थी। शिवसेना को 288 सदस्यीय विधानसभा में 16.4 फीसदी मतों के साथ 56 सीटों पर जीत मिली है। इस प्रकार पिछले चुनाव के मुकाबले उसे सात सीटों और 2.9 फीसदी मतों का नुकसान हुआ है। हालांकि इस बार पार्टी ने 124 सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे जबकि पिछली बार 282 पर उसने दावेदारी की थी।

    इस चुनाव में निर्दलीय सहित 28 गुटों को कुल 23.06 प्रतिशत मत मिले हैं जो 2014 के चुनाव के मुकाबले नौ फीसदी अधिक है और इन दलों को 19 सीटें मिली थीं। इन छोटे दलों में प्रकाश आंबेडकर के नेतृत्व वाली वंचित बहुजन अगाड़ी और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एमआईएमआईएम) शामिल हैं।

    इस बार 13 निर्दलीय जीतकर विधानसभा पहुंचे हैं। शरद पवार के नेतृत्व वाली राकांपा को इस बार 16.7 फीसदी के साथ 54 सीटें मिली है, जो 2014 के मुकाबले 13 सीटें अधिक है। हालांकि राकांपा के मत प्रतिशत में गिरावट आई है। पार्टी को 2014 में 17.2 प्रतिशत मत मिले थे। पार्टी ने 2019 में 117 सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे।

    कांग्रेस को 2014 के 18 फीसदी के मुकाबले इस बार 15.9 प्रतिशत मिले हैं। हालांकि, उसकी सीटें 42 से बढ़कर 44 हो गई है। कांग्रेस ने इस बार 147 सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे जबकि पिछली बार 287 सीटों पर दावेदारी की थी। राज ठाकरे के नेतृत्व वाली महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के मत प्रतिशत में भी गिरावट आई है। पार्टी को 2.3 प्रतिशत मत मिले हैं जो 2014 के मुकाबले 1.4 फीसदी कम है।

  • सरकार को मिला पिट्ठू महापौर बिठाने का हक

    सरकार को मिला पिट्ठू महापौर बिठाने का हक

    देश के नीति निर्धारकों ने सत्ता की चाभी जनता को देने की मंशा से भारतीय संविधान के अनुच्छेद 40 में राज्यों को पंचायतों का गठन करने का निर्देश दिया था। स्वर्गीय राजीव गांधी ने 1991 में संविधान में 73 वां संविधान संशोधन अधिनियम 1992 लाकर पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक मान्यता दे दी। मध्यप्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायती राज को जोर शोर से लागू किया गया। दस सालों तक दिग्विजय सिंह की सरकार पंचायती राज का ढोल पीटती रही। इसमें गली के गुंडों को संवैधानिक पदों पर पहुंचा दिया गया। नतीजा ये निकला कि घनघोर अराजकता फैल गई और कुशासन के चलते कांग्रेस की सरकार को जनता ने घरों से निकलकर सत्ता से बाहर धकिया दिया। संवैधानिक व्यवस्था संभाल रही कार्यपालिका और पंचायती राज व्यवस्था में तीखा टकराव हुआ नतीजन पूरी अफसरशाही ने जनता के आक्रोश का नेतृत्व संभाल लिया। ये आक्रोश इतना अधिक था कि सत्ता में आने के बाद भाजपा की सरकारें तमाम खामियों के बावजूद पंद्रह सालों तक सत्ता में टिकी रहीं। लोग कांग्रेस को सत्ता में नहीं आने देना चाहते थे और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इसे अपनी लोकप्रियता बताकर प्रदेश की अर्थव्यवस्था चौपट करने वाली घोषणाएं करते रहे। लोकप्रियता बटोरने के फार्मूलों पर चलने वाली शिवराज सिंह चौहान सरकार की प्रशासनिक असफलताओं ने एक बार फिर करवट ली और अनमने भाव के बीच कांग्रेस को सत्ता की चाभी मिल गई। इस बार राजीव गांधी नहीं हैं और कांग्रेस अपनी गलतियों को दुहराना नहीं चाहती। इसलिए नगरीय निकाय चुनावों से पहले कमलनाथ सरकार ने जनता से महापौर चुनने का हक छीन लिया है।

    राज्यपाल महामहिम लालजी टंडन ने महापौर का चुनाव अप्रत्यक्ष प्रणाली से कराए जाने संबंधी सरकार के अध्यादेश को मंजूरी दे दी है। कमलनाथ का अनुमान है कि वे सत्ता के बल का इस्तेमाल करके आसानी से नगर निगमों में अपने पिट्ठू महापौर बिठा लेंगे। सरकार की मंत्रिपरिषद का फैसला है तो राज्यपाल को इसे मंजूरी देनी ही थी। भाजपा इस फैसले से सहमत नहीं है और भाजपा के दिग्गजों ने राज्यपाल से भेंटकर इस अध्यादेश के प्रति अपनी नाराजगी भी जताई थी। इस फैसले के पीछे काम कर रहे पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने राज्यपाल पर दबाव बनाने के लिए बताते हैं राज्यसभा सांसद विवेक तन्खा से बयान दिलवाया कि राज्यपाल को विधेयक पास करके अपने संवैधानिक दायित्वों का पालन करना चाहिए। इस सार्वजनिक बयान को लेकर राजभवन की नाराजगी की खबरों के बाद मुख्यमंत्री कमलनाथ स्वयं राज्यपाल महोदय से मिलने पहुंचे और कहा कि विवेक तनखा का बयान उनकी व्यक्तिगत राय है सरकार इससे इत्तेफाक नहीं रखती। एक तरह से सार्वजनिक माफीनामे के बाद राजभवन ने विधेयक को मंजूरी दे दी। जाहिर है कि कांग्रेस अब पंचायती राज जैसी गलती नहीं दुहराना चाहती है और वो चुने हुए जन प्रतिनिधियों के भरोसे बैठे रहने के बजाए अपने पिट्ठू नेताओं के माध्यम से शासन चलाना चाह रही है।

    दरअसल पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह अब कमलनाथ सरकार में अपनी भूमिका का इस्तेमाल करके गलतियां सुधारने का प्रयास कर रहे है।वे राजनीति से सत्ता को मजबूत करने का फार्मूला तो पहले ही पा चुके हैं। अपने पुत्र जयवर्धन सिंह के माध्यम से वे प्रदेश के नगरीय ढांचे से प्रशासनिक धींगामुश्ती को पूरी तरह समाप्त करने का प्रयास कर रहे हैं। जयवर्धन सिंह नगरीय प्रशासन मंत्री हैं और कमलनाथ ने उन्हें वरद हस्त दे रखा है। भारत सरकार ने जबसे गांवों में जन सुविधाओं पहुंचाने के बजाए शहरीकरण की नीति पर जोर देना शुरु किया है तबसे नगरीय निकायों पर कब्जा जमाना सभी राजनीतिक दलों की ख्वाहिश बन चुकी है। भविष्य में नगरीय निकायों पर जिसका कब्जा होगा वही प्रदेश और देश की सत्ता पर काबिज हो सकेगा। कांग्रेस इसीलिए नगरीय निकायों में अपने पिट्ठू महापौर बिठाकर विकास की योजनाओं पर अपना नियंत्रण बनाना चाह रही है।

    केन्द्र से आने वाली अधिकतर योजनाओं की भी नोडल एजेंसी नगरीय निकाय होते हैं। इन सभी योजनाओं को मंजूरी के लिए महापौर की सहमति जरूरी होती है। नगरीय निकायों पर कब्जा जमाने की इस रणनीति से ठेकेदारों की पूरी लाबी सहमत है। सत्ता माफिया का रूप ले चुकी ये ताकतें जानती हैं कि यदि लोकतांत्रिक तरीके से नगरीय निकाय चलेंगे और निर्माण कार्यों के टेंडर खुलेआम सार्वजनिक मंच पर खोले जाएंगे तो फिर वे ठेके नहीं पा सकेंगे। यही वजह है कि जब दिग्विजय सिंह भोपाल से लोकसभा चुनाव लड़ रहे थे तब यही ठेकेदारों की लाबी उनके समर्थन में भाजपा का साथ छोड़कर समर्थन दे रही थी। यदि जनता ने साध्वी प्रज्ञा को समर्थन देकर चुनाव न जिताया होता तो दिग्विजय सिंह एक सुपर मुख्यमंत्री के तौर पर सार्वजनिक मंच पर अपनी भूमिका निभाते देखे जाने लगते। हार के बाद वे पृष्ठभूमि में सक्रिय हैं और सरकार के फैसलों को प्रभावित कर रहे हैं।

    ऐसा नहीं कि सरकार के इस फैसले से अफसरशाही बहुत खुश है। कतिपय आला अफसर सत्ता पर पकड़ बनाती कांग्रेस के फैसलों से नाखुश हैं। उन्हें लगता है कि अभी जनता के फैसलों के नाम पर वे प्रमुख भूमिका निभा लेते थे। अब जबकि सरकार अपने पिट्ठू जनप्रतिनिधियों के माध्यम से फैसले लागू करेगी तब उनकी भूमिका में बड़ी कटौती हो जाएगी। जिस तरह भाजपा शासनकाल में व्यापमं के माध्यम से नौकरियों की भर्तियां कराए जाने से अफसरशाही के हाथों से बड़ा अधिकार छीन लिया गया था उसी तरह नगरीय निकायों पर कब्जा जमाकर कांग्रेस सभी निर्माण कार्यों पर अपनी पकड़ बना लेगी। वैसे सूत्र बताते हैं कि शिवराज सिंह चौहान का व्यापमं से भर्तियां कराने का फैसला भी पृष्ठभूमि में सक्रिय रहकर दिग्विजय सिंह ने ही करवाया था। अपने छोटे भाई लक्ष्मण सिंह और भाजपा के मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा के बीच तालमेल स्थापित करवाकर भर्तियों के अधिकारों का केन्द्रीकरण किया गया था।उसी सलाह का लाभ लेते हुए शिवराज सरकार पर भर्ती घोटाले के आरोप लगाए गए। अब सत्ता में आने के बाद कांग्रेस उस व्यापमं घोटाले का नाम भी नहीं लेना चाहती। कांग्रेस में सत्ता के विकेन्द्रीकरण की कवायद से उपजी हताशा की वजह से दिग्विजय सिंह सत्ता के केन्द्रीकरण के सबसे बड़े पैरवीकोर बन चुके हैं और कमलनाथ सरकार भी अब सत्ता के केन्द्रीकरण की ओर कदम बढ़ा रही है। नगरीय निकाय चुनावों के संदर्भ में लिया गया फैसला इसकी सबसे बड़ी नजीर बन गया है।

  • वाहन कंपनियों की सेल्स एजेंट क्यों बनी कमलनाथ सरकार

    वाहन कंपनियों की सेल्स एजेंट क्यों बनी कमलनाथ सरकार

    मध्यप्रदेश की कमलनाथ कांग्रेस सरकार इन दिनों भारी अंतर्विरोधों से जूझ रही है इसके बावजूद वह अपनी घिसी पिटी शासन शैली से मुक्त होने का प्रयास नहीं कर रही है। इसकी वजह उसके आकाओं की वह रणनीति है जिससे पार्टी को भारी आय होती रही है। पार्टी की आय का ढांचा जिस चुनावी चंदे पर टिका है उसे केन्द्रीय मोटर व्हीकल एक्ट के सुधारों ने तगड़ी चुनौती दी है। इसी कारण से आर्थिक संकटों से घिरी कमलनाथ सरकार प्रदेश की आय बढ़ाने का ये नया अवसर छोड़ रही है। एक्ट पर तत्काल अमल न करने के लिए उसने जनता की असुविधा का हवाला दिया है। हकीकत ये है कि वह अपने नागरिकों को वैकल्पिक सस्ता परिवहन दिलाने के बजाय जीवाश्म ईंधन आधारित मंहगे परिवहन के लिए मजबूर कर रही है।

    नए मोटर व्हीकल एक्ट में तगड़े जुर्माने के प्रावधान को लेकर पूरे देश में बहस चल रही है। कई राज्यों ने तो इसे लागू कर दिया है पर कई राज्य इसके प्रावधानों का विरोध कर रहे हैं। मध्यप्रदेश सरकार के परिवहन मंत्री गोविंद राजपूत ने ये कहकर प्रावधान लागू करने से इंकार कर दिया कि हम इन प्रावधानों का परीक्षण करा रहे हैं। हमारे पास ये अधिकार है कि हम एक्ट के प्रावधानों का परीक्षण करे और उसे स्थानीय जरूरतों के अनुसार लागू करें। हालांकि ऐसा करते हुए सरकार को अपनी आय बढ़ाने का एक बड़ा अवसर छोड़ना पड़ रहा है।

    केद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी का कहना है कि देश में वाहन दुर्घटनाएं बढ़ रहीं हैं और प्रतिवर्ष लगभग डेढ़ लाख दुर्घटनाओं में 48000 लोगों को जान से हाथ धोना पड़ रहा है। अधिकतर दुर्घटानाओं के मामलों में सड़क परिवहन के नियमों का उल्लंघन ही प्रमुख वजह होता है। नियमों के पालन के लिए जो शर्तें रखीं गईं थीं वे इतनी सरल थीं कि लोग आसानी से चालान भरकर निश्चिंत हो जाते थे। अब दंड के प्रावधान इतने कड़े किए गए हैं कि लोग सड़कों पर चलते समय यातायात के नियमों का पालन करने को मजबूर हो जाएंगे। दस्तावेजों के अभाव में घायलों और मृत व्यक्तियों को क्षतिपूर्ति भी नहीं मिल पाती है इसलिए नए मोटर व्हीकल एक्ट के प्रावधान लोगों को सुरक्षा दिलाने में मददगार साबित होंगे।

    इसके विपरीत मध्यप्रदेश राज्य के पुलिस और परिवहन विभाग ने दस्तावेजों के परीक्षण के लिए सिर्फ नियमों का उल्लंघन करने वाले वाहन चालकों को रोके जाने की व्यवस्था की है। यदि वाहन चालक नियमों का पालन करते हुए यातायात करेंगे तो पुलिस उन्हें नहीं रोकेगी। वाहन चालक नियम तोड़ते हैं तो फिर उनके दस्तावेज भी चेक किए जाएंगे और चालानी कार्रवाई भी की जाएगी। वास्तव में इसकी बड़ी वजह राज्य सरकार के आरटीओ दफ्तरों में फैला भ्रष्टाचार और अव्यवस्था है। वाहन लाईसेंस बनवाने के लिए लोगों को इतने चक्कर काटने होते हैं कि वे बगैर दस्तावेज पूरे करवाए ही वाहन चलाना शुरु कर देते हैं। वाहन चालकों को वाहन का पंजीयन प्रमाणपत्र, और लाईसेंस बनवाने के लिए जो रिश्वत देना पड़ती है वह इसके लिए निर्धारित शुल्क से कई गुना ज्यादा होती है। चक्कर काटने होते हैं सो अलग।

    दरअसल भारत में राजीव गांधी की कांग्रेस सरकार ने इतनी सारी वाहन कंपनियों को दुपहिया, चारपहिया वाहन बनाने की छूट दे डाली थी कि पूरे देश में सार्वजनिक परिवहन का ढांचा धराशायी हो गया। बड़ी संख्या में चार पहिया वाहन आ जाने से बसों से होने वाला सार्वजनिक परिवहन ढप पड़ गया। मध्यप्रदेश में राज्य सड़क परिवहन निगम जैसे प्रतिष्ठान को बंद करने की एक बड़ी वजह यह भी रही है। सार्वजनिक परिवहन बहुत सस्ता पड़ता है लेकिन इसके बावजूद भारत जैसे गरीब देश में राजीव गांधी की सरकार ने मंहगे वैयक्तिक परिवहन को बढ़ावा दिया। तेल उत्पादक देशों के व्यापारियों ने वाहन निर्माण में रुचि ली और देश में कई वाहन निर्माता कूद पड़े। जिसकी वजह से भारत की सड़कें वाहनों से पट गईं। हालात ये हो गए कि सड़कें चौड़ी करने के लिए, नए राजमार्ग बनाने के लिए देश को कर्ज लेना पड़ा। पिछली भाजपा सरकारों ने सड़क, बिजली और पानी के सुधार के नाम पर इतना कर्ज लिया कि प्रदेश को अपनी आय का बड़ा हिस्सा कर्ज का ब्याज चुकाने पर खर्च करना पड़ रहा है।

    कमलनाथ सरकार के सामने चुनौती है कि वह कैसे उत्पादकता बढ़ाए। उत्पादकता की लागत कैसे घटाए। इसके बावजूद उसकी रुचि जनता को सस्ता सार्वजनिक परिवहन उपलब्ध कराने में नहीं है। कांग्रेस पार्टी के चुनावी चंदे का बड़ा हिस्सा तेल उत्पादक देशों, वाहन कंपनियों, वाहन कलपुर्जे बनाने वाली कंपनियों से ही आता है। यदि वह केन्द्रीय मोटर व्हीकल एक्ट को सख्ती से लागू करती है तो लोग सार्वजनिक परिवहन के साधनों की मांग करेंगे।वे अपने वाहन खरीदने के बजाए सार्वजनिक बसों में यात्रा करना पसंद करेंगे।इससे वाहन कंपनियों का मुनाफा घटेगा। तेल की खपत घटेगी और तेल कंपनियों को नुक्सान होगा।यही वजह है कि कमलनाथ सरकार मोटर व्हीकल एक्ट के प्रावधानों को सख्ती से लागू नहीं करना चाहती है। बेशक तेल खरीदी के नाम पर प्रदेश और देश की जनता को अपनी आय का बड़ा हिस्सा खर्च करना पड़ता है। ये रकम विदेशी तेल कंपनियों तक जाती है। भारत की उत्पादकता की लागत बढ़ती है और मुनाफा तेल कंपनियों को होता है। यही वजह है कि तेल उत्पादक कंपनियां भारत में ऐसी सरकारें चाहती हैं जो परिवहन के नाम पर न तो वाहनों की कटौती करे और न ही सड़कों पर खर्च घटाए। इसके लिए वे राजनीतिक दलों को मोटा चंदा भी देती हैं।

    वैकल्पिक ईंधन के रूप में बिजली आधारित सार्वजनिक परिवहन के साधन आज मौजूद हैं। प्रदेश में बिजली का उत्पादन खपत से ज्यादा हो रहा है। बिजली कंपनियों को अपने अनुबंधों की वजह से बिजली खरीदी किए बगैर भी उसकी कीमत चुकानी पड़ रही है। ऐसे में जरूरत है कि अतिरिक्त बिजली की मदद से सरकार जनता को सस्ता सार्वजनिक परिवहन उपलब्ध कराए। चुटका परमाणु बिजलीघर चालू होने के बाद देश के बिजली नेटवर्क में ऊर्जा का उत्पादन और भी ज्यादा बढ़ जाएगा। तब बिजली आधारित सार्वजनिक परिवहन सबसे सस्ता विकल्प होगा। कई राज्यों ने भविष्य की इस व्यवस्था को देखते हुए अपने शहरों में बिजली आधारित सार्वजनिक परिवहन शुरु भी कर दिया है। कमलनाथ सरकार के सामने मॉडल मौजूद हैं लेकिन वह पच्चीस साल पुराने अपने चंदा कमाऊ मॉडल पर ही चल रही है। वास्तव में वह तेल उत्पादक कंपनियों के सेल्स एजेंट की तरह काम कर रही है जो प्रदेश के विकास के लिए एक मंहगा सौदा साबित हो रहा है।

  • सिंघार की दहाड़ से आदिवासी खुश,ब्लैकमेलिंग विदा

    सिंघार की दहाड़ से आदिवासी खुश,ब्लैकमेलिंग विदा

    दिग्विजय सिंह को ब्लैकमेलर कहकर वनमंत्री उमंग सिंघार ने जन मन की आवाज का उद्घोष किया है। पार्टी के भीतर कमोबेश हर बड़ा छोटा नेता ये बात जानता है कि दिग्विजय सिंह के समर्थकों का गुट कैसे प्रदेश की सत्ता पर अपना जाल फैला चुका है। तबादले और पोस्टिंग का कारोबार जिस धड़ल्ले से दिग्विजय सिंह के दफ्तर से हुआ उससे वे खुद सत्ता के सबसे ताकतवर खिलाड़ी बन चुके हैं। कांग्रेस की सरकार आने के बाद से दिग्विजय सिंह का दफ्तर सत्ता पर कब्जा जमाने वाले,नेताओं, भ्रष्ट अफसरों और दलालों का अड्डा बना हुआ है। ये सब एक दिन में नहीं हुआ। पिछले तीस सालों से दिग्विजय सिंह की सतत राजनीतिक साधना का नतीजा है। दस साल मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने पूरे प्रदेश के गांव गांव तक अपने समर्थकों की फौज तैयार कर ली थी। ये फौज कांग्रेस के भीतर से ही नहीं बल्कि तमाम विरोधी राजनैतिक दलों के बीच से भी चयनित और गठित की गई थी। लंबे समय से कांग्रेस में राजनीतिक दूकान चला रहे मठाधीशों को तबाह करने के लिए उन्होंने भाजपा के उभरते नेताओं को भी अपना समर्थक बनाया था। उनकी ये रणनीति कारगर रही। कांग्रेस में दिग्गी का एकछत्र शासन चला और सत्ता जाने के बाद भी उनके यही समर्थक उन्हें प्रासंगिक भी बनाए रहे।

    ऊटपटांग बयानों और जनविरोधी फैसलों की आड़ में जब उन्होंने मध्यप्रदेश की सत्ता भाजपा को सौंपी तब वे जानते थे कि कांग्रेस फिलहाल सत्ता में लौटने वाली नहीं है। यही वजह थी कि उन्होंने दस सालों तक कोई चुनाव न लड़ने की घोषणा कर दी।अपने सभी समर्थकों को उन्होंने भाजपा के संगठन महामंत्री कप्तान सिंह सोलंकी से मिलकर भाजपा में भेज दिया। कांग्रेस के पंचायती राज में उनके इन्हीं समर्थकों ने भरपूर लूटपाट मचाई थी। भाजपा में शामिल होकर इन्होंने फिर से सत्ता पर कब्जा जमा लिया। सत्ता के इन दलालों को शुरुआती दौर में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का भरपूर संरक्षण भी मिलता रहा। इसकी एक वजह पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा थे,दूसरी वजह दिग्विजय सिंह की ब्लैकमेलिंग थी। पटवा को ये राजनीतिक विरासत स्वर्गीय अर्जुनसिंह से मिली थी। जब जब शिवराज सिंह चौहान को जानकारी मिली कि दिग्विजय सिंह के समर्थक जनहितकारी योजनाओं का लाभ आम जनता तक नहीं पहुंचने दे रहे हैं तब तब उन्होंने इनके खिलाफ कार्रवाई करने की कोशिश भी की। हर बार सुंदरलाल पटवा आड़े आए और उन्होंने शिवराज को कार्रवाई से रोक दिया। बाद में तो शिवराज सिंह स्वयं मजबूरी में इस लाबी का समर्थन करते नजर आए।

    शिवराज सिंह चौहान ने राजनीतिक हस्तक्षेप से बचने के लिए सत्ता की बागडोर खुर्राट आईएएस अफसरों को थमाई थी। राधेश्याम जुलानिया जैसे तेज तर्रार आला अफसर ने तो पंचायतों को दिए जाने वाला फंड रोक दिया था जिसके खिलाफ पंचायत सचिवों ने कई बार आंदोलन भी किए। ये सभी दिग्विजय सिंह की उसी स्लीपर सेल के सदस्य थे जो पिछले चुनाव में भाजपा का साथ छोड़कर कांग्रेस के साथ वापस जुड़ गए थे। शोभा ओझा आज उमंग सिंघार के घर के सामने पुतला जलाने वाले उन्हीं भाड़े के नेताओं को भाजपा का बता रही है।दिग्विजय सिंह इन्हीं दलालों के माध्यम से सबसे ज्यादा तबादले और पोस्टिंग कराने में सफल हुए हैं। जब तक कमलनाथ सरकार के मंत्री कामकाज समझ पाते तब तक सारा कारोबार दिग्गी समर्थकों ने समेट लिया है। उमंग सिंघार की दहाड़ की एक बड़ी वजह यह भी है।

    विधानसभा चुनाव के पहले कांग्रेस को जयस के नेतृत्व में चलने वाले आदिवासी आंदोलन का समर्थन मिला था। जिन आदिवासियों को भाजपा और संघ के तपोनिष्ट कार्यकर्ताओं ने बरसों के जनशिक्षण के बाद कांग्रेस से मुक्त करने में सफलता पाई थी उन्हें जयस ने आदिवासी मुख्यमँत्री की चाहत जगाकर अपने साथ कर लिया। सत्ता में आने के लिए जयस के नेता डॉ.हीरालाल अलावा ने अलग पार्टी बनाकर संघर्ष करने के बजाए खुद कांग्रेस का विधायक बनना पसंद कर लिया। कमलनाथ ने उन्हें सीटों के समझौते पर भी अपनी शर्तों पर सहमत कर लिया था। हीरालाल अलावा के कांग्रेस में शामिल होने से आदिवासियों के बीच थोड़ी नाराजगी भी फैली थी जिसकी वजह से अलावा को स्वयं अपना चुनाव जीतने में खासी मशक्कत करना पड़ी थी।

    आदिवासियों का आंदोलन आज कांग्रेस की सत्ता का साथ पाकर एक बार फिर मजबूती से उभर रहा है। यह बेलगाम भी होता जा रहा है। इस पर लगाम लगाने के लिए कांग्रेस के भीतर से ही किसी आदिवासी नेतृत्व की सख्त जरूरत महसूस की जा रही थी। हीरालाल अलावा भी बार बार अपना वजूद बढ़ाने के लिए सरकार पर दबाव बना रहे थे। वे अभी राजनीति के नए नवेले खिलाड़ी हैं। सरकार के सत्ता में आने के बावजूद वे तबादलों और पोस्टिंग का धंधा समझ पाते इससे पहले सत्ता की मलाई दिग्विजय सिंह समर्थक चाट गए। इससे भाजपा से कांग्रेस में पहुंचे आदिवासी नेता खुद को छला महसूस करने लगे थे। इन सभी के बीच दिग्विजय सिंह की ब्रिगेड खलनायक के रूप में चर्चित रही है। यही वजह है कि आदिवासियों का नेतृत्व पाने के लिए उमंग सिंघार ने दिग्गी पर प्रहार करके आदिवासियों को खुश करने का प्रयास किया है।

    मुख्यमंत्री कमलनाथ भी दिग्गी ब्रिगेड पर लगाम लगाना चाहते थे। इसके बावजूद उनकी ये हैसियत कभी नहीं रही कि वे दिग्विजय से सीधा टकराव ले सकें। दिग्विजय सिंह की ब्लैकमेलिंग की शैली से वे अच्छी तरह वाकिफ हैं। खुद उनके कारोबार की कई कच्ची कड़ियां दिग्विजय सिंह जानते हैं। बताते हैं कि लोकसभा चुनाव के दौरान जिस हवाला गिरोह पर छापा पड़ा था उसकी गतिविधियों की सूचना दिग्विजय सिंह खेमे से ही लीक की गई थी। कमलनाथ के ओएसडी प्रवीण कक्कड और आरके मिगलानी तक तो जांच टीम पहुंची लेकिन कमलनाथ ने खुद को ज्यादातर आरोपों से बचा लिया। अब जिस तरह से उमंग सिंघार ने खुले आरोप लगाए तब राजनीतिक हलकों में यही माना जा रहा है कि उन्हें इसकी शह कमलनाथ खेमे से ही मिली थी।

    उमंग सिंघार ने तो दिग्गी को नंबर एक का ब्लैकमेलर कहने के साथ साथ उन्हें शराब तस्करी और रेत व खनिजों की तस्करी को संरक्षण देने के आरोप भी लगाए हैं। दरअसल आरोपों की फेरहिस्त तो और भी लंबी है जिन्हें वे सार्वजनिक तौर पर बोलने से बचते रहे हैं। दिग्विजय सिंह से उमंग सिंघार की अदावट वैसे तो काफी पुरानी है। उनकी बुआ स्वर्गीय जमुनादेवी तो कई बार दिग्विजय सिंह के विरुद्ध मोर्चा खोलती रहीं हैं। तब दिग्विजय सिंह सरकार के कार्यकाल में उमंग सिंघार के खिलाफ कई आरोप लगाए गए थे। इस बार सत्ता में आने के साथ उमंग सिंघार ने पुरानी अदावट का सूद समेत बदला ले डाला है।

    उमंग सिंघार की इस ललकार को ज्योतिरादित्य सिंधिया का भी समर्थन मिला है। उन्होंने यह कहकर सिंघार का बचाव ही किया कि मामला अब मुख्यमंत्री जी के पास है इसलिए विवाद की कोई वजह नहीं बची है। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने प्रदेश अध्यक्ष पद पर चल रहे विवाद को शांत करने के लिए फिलहाल कमलनाथ को ही जवाबदारी संभालने को कहा है।दिग्विजय सिंह इस मुद्दे पर खामोश हैं और उन्होंने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया है कि खुद कमलनाथ इस विषय को देख रहे हैं। कमलनाथ से मुलाकात के बाद उमंग सिंघार ने भी चुप्पी साध ली है। उन्होंने कहा है कि वे अपनी बात कह चुके अब पार्टी हाईकमान ही आगे की कार्रवाई करेगी।फौरी तौर पर तो यह मामला शांत होता नजर आ रहा है लेकिन दिग्विजय सिंह समर्थक आगे भी खामोश रहेंगे यह नहीं कहा जा सकता। पहली बार राजनीति के अखाड़े में किसी योद्धा ने दिग्विजय सिंह को सीधी चुनौती दी है,जिस पर अभी कई नए दांवपेंच जरूर खेले जाएंगे।

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  • सिंधिया को कैसे स्वीकारे ठाकुरों से घिरी भाजपा

    सिंधिया को कैसे स्वीकारे ठाकुरों से घिरी भाजपा

    रामभुवन सिंह कुशवाह

    इसमें तो दो राय नहीं हो सकती कि कांग्रेस से ज्योतिरादित्य सिंधिया का शनैः शनैः मोह भंग होता जा रहा है पर वह अभी कितना जमीन पर दिखेगा इसका आज कुछ कहा नहीं जा सकता। यह तो निसंदेह सत्य है कि कोई कितना भी अपने को और दूसरों को अंधेरे में रखे राजशाही के दिन अब लद चुके हैं। स्वतंत्र भारत लोकतन्त्र का सात दशक तक का आनंद ले चुका है और अब जो पीढ़ी देश पर वर्चस्व स्थापित करती जा रही है वह आजाद भारत की है। राजा रानियों के किस्से अब कहानियों में तो अच्छे लगते हैं पर अतीत लौटकर तो नहीं आता।किन्तु जो वर्ग सत्ता और सुविधा में रहा हो वह सहज अपने अधिकार नहीं छोडना चाहता और भारतीय समाज भी मूर्तिपूजक श्रद्धावान रहा है इसलिए नए प्रकार की ‘सामंतशाही’ विकसित होने लगी है। क्योंकि लोकतंत्र ने वह आदर्श और अवसर तो नहीं दिया जिसकी आम जन को उम्मीद थी। सुखद और आशाजनक स्थिति यह भी है कि देश लोकतन्त्र से निराश कतई नहीं हैं क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अभ्युदय इसी व्यबस्था में होना संभव है।

    यहाँ मैं जिक्र सिंधिया राजघराने की कर रहा हूँ। उसकी मौजूदा पीढ़ी भारतीय राजनीति में अपेक्षाकृत अच्छा खासा दखल रखती है तो इसके प्रमुख रूप से दो कारण हैं। पहला इस खानदान में दो शख्शियतें ऐसी हुईं जिन्होंने उसे लोकतान्त्रिक बनाये रखा है। । पहली ‘माधो महाराज’ और दूसरी स्वर्गीय राजमाता विजया राजे सिंधिया । माधो महाराज अर्थात माधव राव सिंधिया का आशय वर्तमान पीढ़ी ज्योतिरादित्य सिंधिया के पिता और पूर्व केंद्रीय मंत्री माधव राव सिंधिया नहीं बल्कि उनके पितामह ( ज्योतिरदित्य सिंधिया के प्रपितामह ) महाराजा माधवराव सिंधिया , जिन्हें तत्कालीन ग्वालियर राज्य की जनता अत्यंत आदर से “ माधौ महाराज ” कहकर पुकारती थी । वे कितने उदार और दूरदर्शी थे यह इसी बात से जाना जा सकता है कि जब उनसे कोई सामान्यजन , किसान ‘अन्नदाता’ कहकर पुकारता था तब वे उसे बुरी तरह डाटते थे और कहा करते थे कि अन्नदाता मैं नहीं, आप लोग किसान हैं जो हमें अन्न देते हैं । दूसरे उन्होंने अपने राज्य में जिस तरह की कानून व्यवस्था की स्थापना की थी वह आदर्श थी। उन्होंने तत्कालीन जमींदारी जागीरदारी व्यवस्था को समन्वयकारी और जन हितैषी बनाया था। उस समय की “ जमींदार हितकारिणी सभा ” जनता के बीच आदर्श और लोकतान्त्रिक ढंग से कार्य करती थी और उसमें आमजन की समस्याएँ बड़ी सदाशयता से सुनी जातीं थीं। आज डॉ. भीमराव अंबेडकर को अनुसूचित वर्ग का संरक्षक और आरक्षण के व्यवस्था का जनक भले ही माना जाता हो परंतु आरक्षण की अवधारणा सबसे पहले इन्हीं माधव राव सिंधिया ने दी थी। जनता के “माधो महाराज” पहले ऐसे शासक थे जिन्होने तत्कालीन जमीदारों और जागीरदारों को सलाह दी थी कि आर्थिक और सामाजिक रूप से दबे कुचले लोगों को नौकरियों में आरक्षण दिया जावे और उनका संरक्षण किया जावे। मैंने स्वयं उस समय की बहुचर्चित पुस्तक “जमींदार हितकारिणी” को पढ़ा है उस पर शोध किया है। आज भी जो लोग इस विषय में शोध करना चाहें तो राष्ट्रीय अभिलेखागार में मौजूद उस पुस्तक को पढ़ सकते हैं।

    दूसरा व्यक्तित्व था राजमाता विजया राजे सिंधिया जिनका अभ्युदय स्वतंत्र भारत में हुआ । अत्यंत लोकप्रिय, संघर्षशील , अन्याय के विरुद्ध अनूठी योद्धा जिन्होंने तत्कालीन कांग्रेस की तानाशाही को उखाड़ फैका था और इंन्दिरा गांधी के आपातकाल का जमकर विरोध किया । वे इमरजेंसी में मीसा में निरुद्ध रहीं और दो बार उनके पक्ष में स्पष्ट बहुमत होने के बाद भी मुख्यमंत्री पद को ठुकरा कर मध्यप्रदेश में आदर्श और ईमानदार सुशासन देने का प्रयास किया। उन्होंने ही भारतीय जनसंघ , जनता पार्टी और भारतीय जनता पार्टी को इस काबिल बनाया कि आज वह भारत की एकमात्र पार्टी बन गई है जो कांग्रेस को सत्ताच्युत कर सकी। उस पर देश ने भरोसा भी दिखाया है।

    इसके अलावा भी कुछ कारण और भी है कि जिससे ग्वालियर राजघराना और कांग्रेस का सत्तारूढ़ खानदान में लंबे दौर तक राजनीतिक संबंध नहीं बनाए रखे जा सकते। ग्वालियर राज्य के शासक कट्टर हिन्दू विचारधारा के रहे हैं। मुस्लिम और ईसाई उनके स्वाभाविक शत्रु रहे हैं और उनके पुरखों ने लंबे समय तक उनसे युद्ध लड़ते रहे हैं। सिंधिया अंग्रेजों के अधीन अवश्य रहे हैं किन्तु उन्हें कभी अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। 1857 के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम में भी सिंधिया दोनों पक्षों , अंग्रेज़ शासकों और स्वतन्त्रता सैनानियों में सदैव बैलेन्स करते रहे । इस कारण दोनों में भ्रम की स्थिति भी बनी रही । यह दूसरी बात थी कि सिंधिया ने अंततः अंग्रेजों का साथ दिया और आजादी के लिए संघर्ष कर रहे लोगों को क्रूरतापूर्वक दबाया भी, किन्तु लोग समझते हैं कि यह उनकी मजबूरी थी । तत्कालीन ग्वालियर के महाराजा ने अंग्रेज़ शासकों के अधीन रहते हुये महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के साथ भी संबंध बनाए रखे । उन्होंने अपने क्षेत्र में स्वतन्त्रता सैनानियों को संरक्षण दिया। ग्वालियर राज्य की सीमाएं मध्यप्रान्त (सेंट्रलप्रोविन्स) जहां अंग्रेजों का सीधा शासन था, से मिलतीं थीं इसलिए वहाँ के क्रांतिकारियों और तथाकथित विद्रोहियों को खुला संरक्षण ग्वालियर राज्य में मिलता था। सेंट्रलप्रोविन्स के ‘बागी’ बरदात करके भिंड , दतिया और ग्वालियर के कतिपय ग्रामों में संरक्षण पाते थे और ग्वालियर के बागी उस क्षेत्र में जाकर लूट खसोट करते थे यह तथ्य ऐतिहासिक हैं । लुटेरे पिंडरियों की ग्वालियर से दोस्ती और संरक्षण की खबरें तो लंदन तक पहुँचती रहीं थी। प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम 1857 के समय सेंट्रलप्रोविन्स का दक्षिणी जिला इटावा के कलेक्टर लॉर्ड ए ओ हयूम थे ( जो बाद में राष्ट्रीय कांग्रेस महासभा के संस्थापक बनें ) जिन्होने ब्रिटिश वाइसराय और इंग्लेन्ड में कंपनी हुकूमत से ग्वालियर के तत्कालीन महाराजा की शिकायत की थी । बाद में महाराजा को सत्ता से हटाने की ‘धमकी’ दी गई । तब कहीं तत्कालीन महाराजा ने हयूम के साथ एक सप्ताह भिंड में पड़ाव डालकर विद्रोहियों के खिलाफ अभियान चलाने को सहमत हुये। कथित विद्रोहियों उन्हें सहायता देने के आरोप में कई अधिकारियों को नौकरी से हटाया गया। यही नहीं 1857 के आंदोलन के विफल होने के बाद लॉर्ड हयूम के नेतृत्व में रियासत की सेना ने सीमांत गाँव में अत्याचार भी बहुत किए गए ।

    यह भी एतिहासिक तथ्य है कि 1857 के स्वाधीनता संग्राम के प्रमुख हीरो तांत्या टोपे के ग्वालियर की सेना में आना जाना था। वे कई दिनों सेना के मराठा अधिकारियों के यहाँ ही रुकते थे और झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई ग्वालियर के किले में कब्जा करने से पूर्व कई दिनों मुरार छाबनी में दल बल सहित रुकी रहीं थी। भारत के स्वतंत्र हो जाने के बाद सबसे बड़ी रियासत के महाराजा सिंधिया ने सबसे पहले विलयपत्र पर हस्ताक्षर किए थे और सबसे अधिक खजाना सौंपा था। परिणामस्वरूप उन्हें मध्यभारत प्रांत का राज्यप्रमुख भी बनाया गया था।
    ग्वालियर के महाराजा अन्य देशी रियासतों की तरह कुछ समय स्वतंत्र पार्टी के सक्रिय सदस्य भी बनें किन्तु उनकी रुझान हिन्दू महासभा की ओर अधिक थी और ग्वालियर की हिन्दू महासभा उस समय सबसे सशक्त इकाई के रूप में जानी जाती थी जिसके परिणाम स्वरूप पहले चुनाव में कांग्रेस की वांछित सफलता न मिलने पर स्वयं प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ग्वालियर आए थे और उन्होंने तत्कालीन राज्यप्रमुख महाराजा जीवाजी राव सिंधिया से उनकी पत्नी महारानी विजयराजे सिंधिया को कांग्रेस के लिए मांगा था। महाराजा की सहमति प्राप्त होने पर महारानी सिंधिया कांग्रेस में शामिल हुईं और कांग्रेस की सांसद बनीं । इसके बाद ग्वालियर क्षेत्र में कांग्रेस के खाते खुलने लगे किन्तु ग्वालियर कोई जनता मूल रूप से हिन्दू महासभाई ही बनी रही जो समय के साथ भारतीय जनसंघ की समर्थक बन गईं।

    सन 1956 में सभी रियासतों और राज्यों को मिलाकर मध्यप्रदेश बनाया गया । राजमाता सिंधिया कांग्रेसी संसद होने के नाते उसमें काफी प्रभाव रखतीं थीं किन्तु 1967 में पं. द्वारिका प्रसाद मिश्र और उनके बीच में तब ठन गई। जब मिश्र ने राजमाता से मिलने से मना कर दिया।इसका प्रमुख कारण राजमाता सिंधिया ने बस्तर के महाराजा प्रवीणचंद्र भंजदेव की पुलिस द्वारा निर्मम हत्या की आलोचना की थी। राजमाता सिंधिया द्वारिका प्रसाद मिश्रा से बुरी तरह नाराज हो गईं और उन्होंने उन्हें हटाने का संकल्प लिया। परिणामस्वरूप प्रदेश और देश में पहली संविद सरकार बनीं । राजमाता चाहती तो मुख्यमंत्री बन सकतीं थीं किन्तु उन्होंने मुख्यमंत्री बनने के बजाय सत्तासूत्र अपने हाथ में रखना ही उचित समझा। फिर 1971 के चुनाव हुये राजमाता सिंधिया ने भारतीय जनसंघ को समर्थन दिया और स्वयं भी जनसंघ के चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ा और जीत गईं।उस समय 1971 में इन्दिरा गांधी की बेंक राष्ट्रीयकरण और गरीबी हटाओ नारे के कारण देश भर में प्रबल हवा चल रही थी किन्तु मध्यभारत क्षेत्र में सभी सीटें भारतीय जनसंघ के प्रत्याशी जीते और राजमाता सिंधिया की ख्याति राष्ट्रव्यापी होकर जनसंघ के लिए पूरे देश में दौरा करने लगीं । 1975 में इन्दिरा गांधी ने देश पर आपातकाल थोप दिया और राजमाता सिंधिया को गिरफ्तार कर लिया गया। मीसा में गिरफ्तार तो उनके पुत्र महाराजा माधवराव सिंधिया भी हुये किन्तु उन्हें पहले दिन ही पेरोल दे दी गई। कहा जाता है कि कांग्रेस की यह ‘घरभेदू’ नीति के कारण माँ और पुत्र में दूरियाँ बढ़ गईं तो महाराजा माधव राव सिंधिया के समर्थक मानते हैं कि महाराजा अपनी माँ की सहमति लेकर ही कांग्रेस में शामिल हुये थे। कुछ भी हो उन दोनों में दूरियाँ बढ़तीं रहीं और माधवराव सिंधिया के पाँव कांग्रेस में जमते रहे। किन्तु इन्दिरा गांधी बहुत चालक थीं उन्होने माधव राव जी को राज्यमंत्री बनाया बाद में वे केंद्र में उन्हें केबिनेटमंत्री बनया गया। इधर राजमाता सिंधिया जनता पार्टी की संस्थापक नेत्री बन कर और फिर भारतीय जनता पार्टी को पूरे देश में सर्वस्वीकार्य बनने में जुटीं रहीं। भारतीय जनता पार्टी ने उनकी सार्वजनिक सेवाओं और संघर्ष को सदैव सम्मान दिया। उनकी पुत्री वसुंधरा राजे राजस्थान की मुख्यमंत्री , उनकी दूसरी पुत्री यशोधरा राजे , भाई ध्यानेन्द्र सिंह ,भाभी श्रीमती माया सिंह मध्यप्रदेश सरकार में मंत्री बनीं। इसके विपरीत कांग्रेस में माधव राव सिंधिया को वह सम्मान कभी नहीं मिला जिसके वे अधिकारी थे। इसका प्रमुख कारण ग्वालियर रियासत के परंपरागत प्रतिद्वंदी राघौगढ़ के राजा दिग्विजय रहे जो बाद में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बने।

    राजशाही का अंत होने के बाद भी माधव राव सिंधिया गुना से जीतते रहे । उन्होंने 1971 में पहली बार जनसंघ के टिकट चुनाव जीता तब वे महज 26 साल के थे। जिसके बाद वे एक भी चुनाव नहीं हारे। वे लगातार नौ बार लोकसभा के सांसद रहे। 1984 में उन्होंने भाजपा के दिग्गज नेता अटल बिहारी वाजपेयी को ग्वालियर से चुनाव हराया। 30 सितंबर, 2001 के दिन माधवराव सिंधिया की एक हवाई हादसे में मृत्यु हो गई । तब उनके पुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया गुना से सांसद बनें। इस दर्दनाक हादसे ने ज्योतिरादित्य सिंधिया की जिंदगी का रुख ही बदल दिया। स्टेनफोर्ड हार्वर्ड से पढ़कर लौटे ज्योतिरादित्य को विरासत के साथ अपने पिता की राजनीतिक विरासत भी संभालनी पड़ी। वे गुना से सांसद भी रहे हैं। इनकी गिनती सबसे युवा सांसदों में भी होती रही है। उनकी शादी नेपाल के राजघराने की की बेटी और उनकी बेटी चित्रांगदा की शादी जम्मू-कश्मीर और जमवाल घराने के युवराज विक्रमादित्य सिंह के साथ हुई। राजमाता सिंधिया और उनकी संतानों में मूल अंतर व्यवहार का है। राजमाता जी सदैव स्वयं को राजकीय गरिमा से बचतीं रहीं हैं वही चाहें माधव राव सिंधिया हों या उनके पुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया राजकीय गरिमा ने स्वयं को कभी भी उससे मुक्त होने का प्रयास नहीं किया और उनकी पुत्रियाँ भी लोकप्रिय होने के बाद भी ‘एरोगेन्ट’ के आरोप से कभी भी मुक्त नहीं हो पाईं।

    अभी हाल के 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को पूर्ण बहुमत तो नहीं मिला फिर भी सपा और बसपा की एकतरफा समर्थन देने से सरकार कांग्रेस की बन गई। ग्वालियर क्षेत्र में सबसे अधिक सीटें कांग्रेस को मिलने से मुख्यमंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया का बनना तय था किन्तु दिग्विजय सिंह ने कमलनाथ का साथ दे दिया और ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थक मात्र प्रदर्शन करते रह गए।इसके बाद प्रदेश में गुटबाजी चरम पर रही। माधव राव सिंधिया की उपेक्षा इतनी ज्यादा हुई कि उन्हें एक अदद सरकारी मकान भी नहीं दिया गया। वे जो मकान देखते उसी को किसी अन्य नेता के नाम कर दिया जाता। जब लोकसभा चुनाव हुये तो उन्हें षड्यंत्र पूर्वक हरा भी दिया गया। जब राहुल गांधी ने हार की ज़िम्मेदारी लेकर इस्तीफा दिया तो हवा उड़ा दी गई कि ज्योतिरादित्य सिंधिया को राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया गया है। सच्चाई ये थी कि राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाना तो दूर उन्हें प्रदेश का अध्यक्ष भी नहीं बनाया गया।

    अब बारी ज्योतिरादित्य सिंधिया की थी । उन्होने भी कांग्रेस हाइकामन को राजनीतिक झटका देते हुये अनुच्छेद 370 की कश्मीर से समाप्ति का समर्थन कर दिया। अभी हल में वे ऐसा कोई अवसर नहीं चूकते जिसमें से यह धारणा न बने कि उनका कांग्रेस से मोहभंग हो रहा है। इधर भाजपा ने भी इस भ्रम को बढ़ाने में सहायता की है। राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया ने रक्षाबंधन के मौके पर भाई माधवराव को याद किया और एक पुराना फोटो शेयर किया। एक भावुक संदेश में राजे ने लिखा कि उनके जीवन में भाई माधवराव जी की कमी हमेशा खटकती रहेगी।इस बीच 24 अगस्त को पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली की मृत्यु के अवसर पर ज्योतिरादित्य सिंधिया उनके घर अंतिम दर्शन करने और परिवार को ढाढ़स बंधाने माँ, महारानी , पुत्री और पुत्रवधु के साथ पहुँच गए। जिसके कारण यह धारणा बनती नजर आ रही है कि हो न हो ज्योतिरादित्य सिंधिया भाजपा में शामिल हो सकते हैं ।

    भाजपा और सिंधिया की सम्बन्धों को डोर बहुत पुरानी है। भाजपा भी मानती है कि सिंधिया राजघराने के नेताओं और कांग्रेस के नेताओं में एक मूल अंतर है कि वे कम से कम अन्य कांग्रेसियों कि तरह बेईमान और भ्रष्ट नहीं हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी राहुल गांधी को बहुत निकट से देखा है । उन्हें निश्चित ही लगता होगा कि जो अपनी बहिन के लिए स्वस्थ और अनुकूल विचार नहीं रखता वह उनके लिए क्या और कितना सुविधा जनक होगा ? ज्योतिरादित्य सिंधिया यह भी भलीभांति मानते हैं कि भाजपा नेतृत्व का व्यवहार सदैव ‘सिंधियाज़’ के साथ सदाशयी और अनुकूलता का रहा है।

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  • कांग्रेस पर भारी मीसाबंदियों से वैमनस्य का सौदा

    कांग्रेस पर भारी मीसाबंदियों से वैमनस्य का सौदा

    मुख्यमंत्री कमलनाथ मध्यप्रदेश में श्रीमती इंदिरा गांधी की राजनीति की नकल करके अपनी सत्ता बचाने का प्रयास कर रहे हैं। बार बार वे केन्द्र सरकार के आर्थिक सुधारों को लागू करने का आश्वासन देते हैं लेकिन उसकी आड़ में राजनैतिक विरोधियों को कुचलने वाली राजनीति कर रहे हैं। वास्तव में वे किसी मूडी शासक की तरह बर्ताव कर रहे हैं। उनके नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी आम नागरिकों पर लांछन लगाने का काम कर रही है। मध्यप्रदेश में मिलावट को लेकर जो अभियान चलाया जा रहा है उसके बाद मिलावट के मामले घटने के बजाए बढ़ने लगे हैं। सरकार व्यापारियों पर रासुका लगा रही है इसके बावजूद उत्पादकता न बढ़ने से आई मंदी से जूझते लोग धड़ल्ले से मिलावट कर रहे हैं। कमोबेश ऐसी ही तस्वीर श्रीमती इंदिरागांधी के शासनकाल में भी देखी गई थी। उन्होंने आंतरिक सुरक्षा अधिनियम ( मेंटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्यूरिटी एक्ट ) लागू करके मिलावटखोरों,जमाखोरों के विरुद्ध अभियान चलाया था। इसकी आड़ में तमाम राजनैतिक विरोधियों को भी जेलों में ठूंस दिया गया था। आज कमलनाथ सरकार आंदोलन करने वाले नेताओं पर जुर्माना लगाकार कमोबेश वही संदेश देने का प्रयास कर रही है। मीसा बंदियों के लिए चालू की गई पेंशन योजना को भी बंद करके कमलनाथ अपने राजनैतिक वैमनस्य का परिचय पहले ही दे चुके हैं।

    हाल ही में दो दिन पहले जब मुख्यमंत्री कमलनाथ को दिल्ली दरबार में हाजिरी देनी थी तब उनके मीडिया सलाहकारों ने खबर फैलाई कि सरकार ने मीसाबंदियों की पेंशन फिर शुरु कर दी है। शुरुआती कदम के रूप में दो हजार पेंशनरों को एरियर्स के साथ भुगतान कर दिया गया है। हालांकि इससे जुडा़ कोई आदेश जारी नहीं किया गया। सत्ता संभालते ही कमलनाथ ने पहले मीसाबंदियों की पेंशन बंद करने का आदेश दिया था बाद में सोच विचारकर कहा कि कुछ फर्जी लोग पेंशन ले रहे हैं इसलिए सरकार जांच के बाद पेंशन जारी करेगी।

    दरअसल पिछली भाजपा सरकार ने मीसा बंदी के दौरान जेल में निरुद्ध किए गए राजनीतिक विरोधियों को लोकतंत्र सेनानी बताते हुए पेंशन शुरु की थी। ये पेंशन स्वतंत्रता सेनानियों की तर्ज पर जारी की गई। विधानसभा में पारित मध्यप्रदेश लोकतंत्र सेनानी सम्मान नियम 2018 के अंतर्गत ऐसे लोकतंत्र सेनानी जो एक माह से कम कालावधि के लिए निरुद्ध रहे उन्हें 8000 रुपए और जो एक माह या एक माह से अधिक समय तक निरुद्ध रहे उन्हें 25000 रुपए प्रतिमाह की दर से सम्मान निधि की पात्रता प्रदान की गई। सरकार की ओर से स्वाधीनता सेनानियों को भी पच्चीस हजार रुपए प्रतिमाह की पेंशन दी जाती है।

    मीसाबंदी पेंशन के हकदार लोगों में भाजपा के साथ साथ कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दलों के जन प्रतिनिधि भी शामिल हैं। सरकार ने अपने बजट में वर्ष 2018-19 के लिए 40 करोड़ रुपए का प्रावधान भी किया है। पिछली सरकार ने वर्ष 2017 में सभी कलेक्टरों को परिपत्र जारी करके कहा था कि दिवंगत लोकतंत्र सेनानियों की पत्नियों या पतियों को सम्मान निधि का अंतरण एक महीने में हो जाना चाहिए।इसके बाजवूद सत्ता में आते ही कमलनाथ सरकार ने तमाम लोकतंत्र सेनानियों की पेंशन पर रोक लगा दी। सरकार के इस फैसले को हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ में चुनौती भी दी गई। जिसमें कहा गया कि विधानसभा में पारित सरकार के फैसलो को कोई व्यक्ति केवल आदेश देकर खारिज नहीं कर सकता।जब 18 सितंबर 2018 को इसका प्रकाशन राजपत्र में भी कर दिया गया तो कोई व्यक्ति इसे सदन की अनुमति लिए बगैर कैसे खारिज कर सकता है।

    लोकतंत्र सेनानी संघ के अध्यक्ष कैलाश सोनी का कहना है कि सरकार ने जब जांच कराने का फैसला लिया तो किसी ने इस पर आपत्ति नहीं की। कुछ ऐसे मामलों का हवाला दिया गया था कि पेंशन गलत लोग भी दे रहे हैं। इसके बावजूद जांच में एक भी व्यक्ति को गलत पेंशन दिए जाने का मामला सामने नहीं आया। इसके बावजूद सरकार पिछले नौ महीनों से पेंशन पर लोक लगाए हुए थी। उन्होंने सभी पेंशनधारियों को पूर्ववत भुगतान जारी रखने की मांग भी की है।

    वास्तव में भाजपा सरकार ने जिन चार हजार लोकतंत्र सेनानियों को पेंशन चालू की थी उसका आधार जेलर से प्राप्त प्रमाण पत्र था। जिसमें जेल रिकार्ड के हवाले से निरुद्ध व्यक्ति के विरुद्ध दर्ज अपराध और जेल में बिताया उसका कार्यकाल प्रमाणित किया गया था। व्यक्ति या उसके परिजनों के जीवित होने का प्रमाणपत्र जांच करना विभागीय प्रक्रिया में पहले से ही शामिल है। इस लिहाज से पेंशन पर रोक लगाए जाने की जरूरत नहीं थी। इसके बावजूद सरकार ने पेंशन बंद कर दी। अब जबकि राज्य में वित्तीय संसाधनों की कमी है और राज्य संचालन के लिए केन्द्र से आर्थिक मदद की जरूरत महसूस हो रही है तब कमलनाथ सरकार ने पेंशन चालू करके केन्द्र सरकार को खुश करने का दांव खेला है।

    पिछले नौ महीनों से पेंशन के लिए भागदौड़ करते रहे पेंशनधारकों का कहना है कि सरकार ने पेंशन बंद करने को लेकर अस्पष्ट नीति बना रखी है। कई जिलों के कलेक्टर मनचाहे तरीके से पेंशन जारी कर रहे हैं जबकि शेष प्रदेश में पेंशन बंद कर दी गई है। इसी तरह कांग्रेस से जुड़े मीसाबंदी पेंशन प्राप्त कर रहे हैं जबकि अन्य राजनीतिक दलों से जुड़े लोगों को पेंशन के लिए भटाकाया जा रहा है। मीसाबंदी पेंशन को बंद करने के पीछे कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति भी एक बड़ा मुद्दा रही है। कमलनाथ इस पेंशन को बंद करके इंदिरागांधी के प्रति अपनी आस्थाओं का प्रदर्शन करना चाह रहे हैं। यही वजह है कि कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी हों या राहुल गांधी और प्रियंका सभी कमलनाथ को अपना प्रतिनिधि मानते हैं। जबकि राहुल गांधी के करीबी होने के बावजूद ज्योतिरादित्य सिंधिया इसके बाद आते हैं। प्रदेश की ठाकुर लाबी इस गणित में सबसे पीछे आती है। ऐसे में कमलनाथ मीसाबंदी पेंशन को बंद करके अपनी पार्टी में राजनीतिक संतुलन साधने का प्रयास भी कर रहे हैं।

    इस सबके बावजूद देश पहले ही श्रीमती इंदिरा गांधी की राजनीति का हश्र देख चुका है। एमपी में उस राजनीति का दुहराव राज्य के विकास में बड़ा रोड़ा बन रहा है।जिस तरह से वैमनस्य की राजनीति करके अब कमलनाथ मीसाबंदी का समर्थन करते नजर आ रहे हैं उससे साफ है कि जनता के बीच उमड़ता आक्रोश जल्दी ही सरकार को भारी पड़ने वाला है। सत्तर अस्सी के दशक में तो कांग्रेस ही सबसे प्रमुख राजनीतिक दल होता था। वक्त के साथ कांग्रेस की राजनीति अपनी लोकप्रियता खो चुकी है। ऐसे में कमलनाथ की वैमनस्य भरी मूडी राजनीति भाजपा के लिए मददगार ही साबित होगी।

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  • युवाओं को रोजगार पाने लायक बनाएंगे बोले कमलनाथ

    युवाओं को रोजगार पाने लायक बनाएंगे बोले कमलनाथ

    भोपाल,20अगस्त(प्रेस सूचना केन्द्र)। राजीव गांधी की विकास नीति अब मध्यप्रदेश में साल भर तक प्रचारित की जाएगी। स्वर्गीय राजीव गांधी के 75 वें जन्मदिवस पर राजधानी के रवीन्द्र भवन में आयोजित सद्भावना दिवस समारोह में मुख्यमंत्री कमलनाथ के नेतृत्व में ये घोषणा की गई। युवा संकल्प वर्ष के रूप में मनाया जाने वाला ये आयोजन साल भर चलेगा, जिसमें युवाओं को राजीव गांधी की विकास नीति के आधार पर उद्योगों के अनुकूल बनाने के लिए कई कार्यक्रम चलाए जाएंगे।

    मुख्यमंत्री कमलनाथ ने स्वर्गीय राजीव गांधी के साथ दून स्कूल में पढ़ते समय अपने अनुभवों को साझा किया। उन्होंने कहा कि वे स्वर्गीय संजय गांधी के साथ पढ़ते थे और राजीव गांधी उनसे चार साल आगे थे। ज्ञान और शिक्षा में अंतर बताते हुए उन्होंने कहा कि स्कूलों में शिक्षा दी जाती है लेकिन ज्ञान हम प्रयोग करके हासिल करते हैं। जब स्वर्गीय इंदिरा गांधी की हत्या हुई तब देश की एकता पर आक्रमण हुआ था। देश पुरानी तकनीकों पर चल रहा था। ऐसे में राजीव गांधी ने आईटी और कंप्यूटर लाने की बात कही। 21 वीं सदी के भारत की परिकल्पना देश के सामने रखी। तब कांग्रेस के लोग भी मजाक बनाते थे। वे कहते थे कि इससे रोजगार के अवसर घट जाएंगे। रेलवे में कंप्यूटरीकरण के खिलाफ आंदोलन भी हुए लेकिन आज देश को इस तकनीक का लाभ मिल रहा है।

    देश को विविधता के बीच आगे बढ़ाने की कांग्रेस की सोच का शंखनाद करते हुए उन्होंने कहा कि भारत विभिन्नताओं से भरा देश है। यहां कई जातियां, धर्म, त्यौहार, रस्में, हैं। उत्तर में जो लोग धोती पहिनते हैं दक्षिण तक जाते जाते वो लुंगी बन जाती है। भारत की संस्कृति इस विविधता को बांधे रखती है। सोवियत संघ हमारे देखते बिखर गया। आज उसका नाम निशान भी नहीं बचा। भारत में ज्ञान की वजह से ही सद्भाव की संस्कृति रही। चंद्रगुप्त से सम्राट अशोक तक सद्भाव की ही बुनियाद रखी गई। यही विचार हमारा भविष्य भी सुरक्षित रखेगा।

    राजीव जी के सद्भाव के संदेश ने ही देश को दिशा दी और आज दुनिया भर में भारत का सम्मान बढ़ने की वजह भी उनकी ही सोच है। ये काम पिछले पांच सालों में नहीं हुआ है। इसका बीज राजीव जी ने डाला था। आज दुनिया भर में भारत के युवा इंजीनियर विकास के विभिन्न क्षेत्रों में अपना नाम रोशन कर रहे हैं।

    उन्होंने कहा कि दुनिया में तीन तरह के नेता होते हैं। एक वे जिन्हें देश प्यार करता है। दूसरे वे जिनसे देश डरता है और तीसरे वे जिनकी देश उपेक्षा कर देता है।राजीव जी से देश प्यार करता था। उन्होंने कहा कि आज का युवा पढ़ लिखकर बेरोजगार हो रहा है। वह न तो अपनी पारिवारिक जीविका चलाने लायक रह पाता है और न ही वह तकनीकी रूप से औद्योगिक क्षेत्र के उत्पादन का हिस्सा बन सकता है,इसलिए हमें युवाओं की शिक्षा की स्थितियां बदलनी होंगी।

    आयोजन में पहुंचे युवाओं के सवालों के जवाब के दौरान उन्होंने कहा कि आज प्रदेश को पूंजी निवेश की जरूरत है। इसके लिए हमें विश्वास का वातावरण बनाना होगा। प्रदेश में उद्योग लगेंगे तभी रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। बिना निवेश के प्रदेश न तो आगे बढ़ सकता है और न ही अन्य प्रदेशों के सामने प्रतिस्पर्धा में टिक सकता है। इसके लिए प्रदेश के युवाओं को स्किल आधारित गुणवत्ता युक्त शिक्षा दिए जाने की जरूरत है। शैक्षणिक संस्थाओं से रोजगार के लिए उपयोगी विद्यार्थी निकलें ये जरूरी है। उन्होंने कहा कि नौकरी पाना अचीवमेंट(उपलब्धि) हो सकता है लेकिन हमें आत्मसंतोष तभी मिल सकता है जब हम कसौटियों का फुलफिलमेंट करके खरे उतर पाएं।

    उन्होंने कहा कि राज्य में बेहतरीन स्टेडियम बनाए जा रहे हैं। खिलाड़ियों को विश्वस्तरीय प्रशिक्षण दिलाया जाएगा ताकि वे जीवन के हर मोर्चे पर सफलता हासिल करें।खेल के मैदान में जो दिमागी अनुशासन विकसित होता है वह क्लासरूम में नहीं पाया जा सकता। छिंदवाड़ा माडल पर पूछे गए सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि ये आज के स्किल इंडिया जैसा है जिसे हम फिनिशिंग स्कूल कह सकते हैं। इसमें हम समाज की जरूरत के मुताबिक युवा तैयार करते हैं। उन्होंने कहा कि सरकार इन दिनों शुद्ध का युद्ध कार्यक्रम चला रही है जिसमें हम नागरिकों को गुणवत्ता युक्त खाद्य उपलब्ध कराने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में नशे के खिलाफ भी अभियान चलाया जाएगा।

  • तू चोर मैं सिपाही वाला खेल कांग्रेस की हताशा – शरदेंदु तिवारी

    तू चोर मैं सिपाही वाला खेल कांग्रेस की हताशा – शरदेंदु तिवारी

    भोपाल18 अगस्त(प्रेस सूचना केन्द्र)। नकली दुग्ध उत्पादों के नाम पर प्रदेश भर में मारे गए छापों के बावजूद प्रदेश में आज भी नकली दूध,मावा,पनीर,घी आदि धड़ल्ले से बेचा जा रहा है। सरकारी अमले की जांच में लगातार ये बात उजागर हो रही है। इसकी वजह आपूर्ति और मांग के बीच बड़ा अंतर होना है। इन छापों से जनता के बीच सरकार ने थोथी लोकप्रियता बटोरी है,यदि इतना ही प्रयास दुग्घ उत्पादन बढ़ाने की दिशा में किया जाता तो समस्या का स्थायी समाधान निकाला जा सकता था। चुरहट से भाजपा के विधायक शरदेंदु तिवारी ने आज पत्रकारों से चर्चा में सरकार के विभिन्न अभियानों को लेकर पूछे गए सवालों पर बेबाकी से जवाब दिए।

    चुरहट से कांग्रेस के दिग्गज नेता अजय सिंह को परास्त करके राजनीति के मैदान में खलबली मचाने वाले युवा विधायक शरदेंदु तिवारी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश की राजनीति को जाति, धर्म, संप्रदाय के संकीर्ण नजरिए से बाहर लाकर विकास की दौड़ में खड़ा कर दिया है। आज का समाज अमीर और अमीरी के लिए प्रयासरत दो वर्गों में बंट गया है। कांग्रेस जिस तरह लोगों को धर्म और संप्रदायों में बांटकर राजनीति करती थी आज जनता की नब्ज पर उसकी पकड़ छूट गई है। वो अपना जनाधार तलाशने के लिए तू चोर मैं सिपाही का खेल खेल रही है। ये खेल थोड़े समय तो लोगों का ध्यान आकर्षित कर सकता है लेकिन अंततः लोग यह खेल समझ जाएंगे और इस पाखंड को विदा कर देंगे।

    अपने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी दादा की विरासत को याद करते हुए श्री तिवारी ने कहा कि कमलनाथ सरकार इतने अंतर्विरोधों में घिरी है कि प्रशासनिक मशीनरी पर उसका नियंत्रण स्थापित नहीं हो पा रहा है। सरकार का आपदा प्रबंधन धराशायी हो गया है। पूरे प्रदेश में लोग बाढ़ की आपदा झेल रहे हैं और मुख्यमंत्री छापेमारी को ही प्रशासनिक सफलता मान बैठे हैं। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ऐसे मौकों पर जनता के बीच जाकर लोगों को ढाढ़स बंधाते थे और आवश्यक प्रबंध करते थे लेकिन आज जनता को उनकी कमी खल रही है।

    श्री तिवारी ने कहा कि विंध्य अंचल ने भाजपा की राजनीति में अपने क्षेत्रीय विकास की झलक देखी है। भाजपा ने सबका साथ सबका विकास का लक्ष्य लेकर सबका विश्वास भी प्राप्त किया है। केन्द्र सरकार जनता की मूलभूत समस्याओं का समाधान कर रही है। ऐसे में कमलनाथ सरकार की विद्वेष से भरी राजनीति जनता के बीच आक्रोश की वजह बन रही है। उन्होंने कहा कि सरकार के मंत्री उन्हें वोट न देने वालों को दंडित करने का भाव लेकर सरकार चला रहे हैं। ऐसे में कोई आश्चर्य नहीं कि जल्दी ही सरकार के प्रतिनिधियों और जनता के बीच टकराव के हालात बनने लगें।

    कश्मीर में धारा 370 पर मिले व्यापक जन समर्थन के बारे में पूछे गए सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि मोदी सरकार के कार्यों ने कांग्रेस की जड़ें हिला दीं हैं। कांग्रेस आरोप लगाने में जुटी है और सरकार जनता को डिलीवरी देने में जुटी है। यही वजह है कि पूरे देश में जहां जहां कांग्रेस की सरकारें हैं उन्हें जनता की उपेक्षा का सामना करना पड़ रहा है। मध्यप्रदेश में तो कांग्रेस के नेताओं और दलालों की फौज लूटो भागो की रणनीति पर चल रही है। यही वजह है कि कांग्रेस यहां सिर्फ लोकप्रियता बटोरने वाले अभियान चला रही है।समस्या ये है कि समय बदल चुका है जनता इन हथकंडों को समझने लगी है,जिससे कांग्रेस सरकार के वादे खोखले साबित हो रहे हैं।

  • अब तक मुखिया नहीं बन पाए मुख्यमंत्री कमलनाथ

    अब तक मुखिया नहीं बन पाए मुख्यमंत्री कमलनाथ

    वित्तमंत्री को ठेंगा और कमलनाथ के छिंदवाड़ा को विश्वविद्यालय

    भोपाल,24जुलाई(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। कांग्रेस की कमलनाथ सरकार अंधा बांटे रेवड़ी बार बार खुद को दे वाले अंदाज में शासन चला रही है। जब पूरे देश में शिक्षा के निजीकरण का दौर चल रहा है तब मुख्यमंत्री कमलनाथ ने अपने चुनाव क्षेत्र में सरकारी विश्वविद्यालय खोलने की मंजूरी करा ली है जबकि वित्तमंत्री तरुण भनोट के गृह जिले जबलपुर के मत्स्य विज्ञान महाविद्यालय को दो हजार रुपए का अनुदान देकर ठेंगा दिखा दिया है। हैरत की बात तो ये है कि नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन करके परिवारवादी मानसिकता का ही समर्थन किया है।

    मध्यप्रदेश विधानसभा ने कल मंगलवार को छिंदवाड़ा में सरकारी विश्वविद्यालय खोले जाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। मध्यप्रदेश विश्वविद्यालय(संशोधन) विधेयक 2019 के नाम से प्रस्तुत इस प्रस्ताव को सदन ने सर्वसम्मति से पारित करके विश्वविद्यालयों के अधिकार क्षेत्र को नए सिरे से परिभाषित कर दिया है। छिंदवाड़ा के इस नए विश्वविद्यालयका अधिकार क्षेत्र छिंदवाड़ा, सिवनी, बालाघाट और बैतूल राजस्व जिलों की सीमा रहेगा। विधेयक का औचित्य प्रतिपादित करते हुए कहा गया है कि संबंधित जिलों के युवाओं को उच्च शिक्षा की सहज पहुंच प्रदान करने के उद्देश्य से ये नया विश्वविद्यालय स्थापित किया जा रहा है। जबकि वहां पहले से ही जी.एच.रायसोनी विश्वविद्यालय स्थापित है और बेहतर शिक्षा मुहैया करा रहा है।

    अब तक छिंदवाड़ा के युवा रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय जबलपुर और बरकतउल्ला विवि भोपाल से डिग्री प्राप्त कर लेते थे। इस व्यवस्था में कोई परेशानी भी नहीं थी क्योंकि छिंदवाड़ा में कई निजी कालेज इन विश्वविद्यालयों से संबद्ध हैं। इसके बावजूद छिंदवाड़ा में सरकारी विश्वविद्यालय तब खोला जा रहा है जब मुख्यमंत्री बात बात पर कहते हैं कि प्रदेश का खजाना खाली है। नए सत्र से विश्वविद्यालय का सत्र आरंभ करने के लिए सरकार ने आनन फानन में तीन करोड़ रुपए मंजूर भी कर दिए हैं। ये राशि तो प्रारंभिक है लेकिन अब भविष्य में इस विश्विद्यालय का बड़ा खर्च भी सरकार के गले पड़ जाएगा।

    शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए प्रदेश में 34 निजी विश्वविद्यालय कार्यरत हैं।सरकारी क्षेत्र में पहले से कार्यरत सात विश्वविद्यालयों के साथ साथ अब राज्य सरकार ने ये आठवा विश्वविद्यालय भी खोलने की तैयारी कर ली है।जबकि सरकारी क्षेत्र के विश्वविद्यालय पहले से राज्य सरकार के लिए सरदर्द बने हुए हैं। अपना आर्थिक बोझ घटाने के लिए ही सरकार ने कालेजों को स्वायत्ता देकर उन्हें अपने आर्थिक संसाधन खुद जुटाने की जवाबदारी सौंप रखी है।

    रा्ज्य की भाजपा सरकार ने मछुआ समाज की मांग को देखते हुए जबलपुर में मत्स्य विज्ञान महाविद्यालय खोला था। सरकारी वेटनरी कालेज जबलपुर से संबद्ध ये महाविद्यालय प्रदेश का एकमात्र कालेज है जो मछली पालन की तकनीक पर अनुसंधान भी करता है। इस कॉलेज से निकले विद्यार्थी आज पूरे भारत और दुनिया में अपने कुशलता के झंडे गाड़ रहे हैं। वित्तमंत्री तरुण भनोट खुद जबलपुर के हैं और कालेज का महत्व जानते हैं इसके बावजूद कालेज को मौजूदा सत्र में मात्र दो हजार रुपए का अनुदान स्वीकृत किया गया है। इसमें एक हजार रुपए वेतन और एक हजार रुपए अन्य मदि में दिए गए हैं।

    प्रमुख सचिव मछुआ कल्याण एवं मत्स्य विभाग अश्विनी कुमार राय इस तथ्य से पूरी तरह वाकिफ हैं फिर भी सरकार की नीति को देखते हुए उन्होंने चुप्पी साध रखी है। मुख्यमंत्री कमलनाथ ने छिंदवाड़ा विश्वविद्यालय खोले जाने की जरूरत प्रतिपादित करते हुए सदन में कहा कि हम चाहते हैं कि प्रदेश में और विश्वविद्यालय बनें। इससे प्राईवेट यूनिवर्सिटीज कम बनेंगी।वे नफे के लिए विश्वविद्यालय बनाते हैं। यदि सरकारी विश्वविद्यालय खुलेंगे और उन्हें मुनाफा नहीं होगा तो वे इस बारे में सोचना बंद कर देंगे।

    कांग्रेस जिस कमलनाथ को उद्योगपति और नई सोच वाला बताती है उनकी सोच को प्रतिबिंबित करने वाले ये वाक्य एक बार फिर बताते हैं कि विकास का छिंदवाड़ा माडल पूरी तरह आधारहीन है। सरकारी बजट और टैक्स चोरी के लिए राजनैतिक दलों को बड़ा चंदा देने वाले कार्पोरेट घरानों की सीएसआर राशि से दिखावटी विकास के माडल खड़े करने की कलाकारी की पोल अब खुलने लगी है। विकास के नाम पर मुख्यमंत्री के इस हस्तक्षेप से वित्तमंत्री तरुण भनोट खुद अचंभित हैं। छिंदवाड़ा के विश्विद्यालय का प्रस्ताव रखकर क्षेत्रीयता की इस आंधी में भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री गौरीशंकर चतुर्भुज बिसेन ने भी अपने हाथ धो लिए। गोपाल भार्गव ने इसके एवज में सागर में सरकारी विश्वविद्यालय खोलने जाने का थोथा आश्वासन लेकर चुप्पी साध ली।

    जबलपुर मत्स्य विज्ञान महाविद्यालय का अनुदान बंद करने से राष्ट्रीय महान गणतंत्र पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष आनंद निषाद खासे खफा हैं। उनका कहना है कि मुख्यमंत्री कमलनाथ को भरोसा नहीं है कि उनकी सरकार ज्यादा चलेगी इसीलिए उन्होंने अपने क्षेत्र में विश्वविद्यालय खोलने में जल्दबाजी दिखाई। जब प्रदेश का खजाना खाली है तो नया विश्वविद्यालय खोलने की जरूरत क्या थी। प्रदेश में मछली पालन सिखाने वाले जबलपुर के एकमात्र महाविद्यालय को तो वे बजट दे नहीं पा रहे हैं उच्च शिक्षा के लिए संसाधन कहां से जुटा पाएंगे। उन्होंने कहा कि कमलनाथ की सरकार प्रदेश से छलावा कर रही है। सरकार को निषाद समाज के बच्चों के अध्यापन की पूरी व्यवस्था करनी चाहिए। यही नहीं बच्चों को इन महाविद्यालयो में कोटा आबंटित किया जाए। सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिया जाए। निषाद समाज प्रदेश की आर्थिक उन्नति में बड़ा योगदान देता है। ऐसे में सरकारी भेदभाव समाज के बीच आक्रोश की बड़ी वजह बन गया है।

  • अफसरों की गैर मौजूदगी से बैकफुट पर आई सरकार,कार्यवाही स्थगित

    अफसरों की गैर मौजूदगी से बैकफुट पर आई सरकार,कार्यवाही स्थगित

    भोपाल,19 जुलाई(प्रेस सूचना केन्द्र)। पूर्व संसदीय कार्यमंत्री नरोत्तम मिश्रा के तीखे तेवरों ने पिछले दो दिनों में सरकार को बैकफुट पर आने को मजबूर कर दिया है। हालात ये हैं कि उनके तीखे सवालों के सामने सदन भी नतमस्तक होता नजर आया। इस तरह की संसदीय बहस प्रदेश की राजनीति में लंबे समय बाद देखने मिल रही है जिससे सहमत विधानसभा अध्यक्ष एनपी प्रजापति ने सदन को अगले दिन तक के लिए स्थगित करने की घोषणा कर दी। उनके फैसले की सभी वर्गों के बीच प्रशंसा की जा रही है।

    कल जब गृह विभाग पर बजट चर्चा का जवाब गृहमंत्री बाला बच्चन देने जा रहे थे तभी पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने व्यवस्था के प्रश्न के हवाले से अधिकारी दीर्घा की ओर सदन का ध्यान आकर्षित कराया। उन्होंने कहा कि माननीय अध्यक्ष जी ने ही ये निर्देश दिए थे कि जब किसी विभाग के संबंध में चर्चा चल रही हो तब उस विभाग के प्रमुख अधिकारी दीर्घा में अवश्य मौजूद रहें। इसके बावजूद पुलिस महानिदेशक वीपी सिंह और डीजी जेल संजय चौधरी आज दीर्घा में उपस्थित नहीं हैं। क्या उन्होंने अपनी गैरहाजिरी के लिए किसी से अनुमति ली है। उन्होंने कहा कि गृहमंत्री इतने निरीह हैं कि अधिकारी उनकी सुनते तक नहीं हैं।

    इस पर संसदीय कार्य मंत्री डाक्टर गोविंद सिंह ने कहा कि निश्चित तौर पर ये बहुत गंभीर बात है। मालूम चला है कि वे किसी बैठक में हैं। सदन की बैठक से ज्यादा महत्वपूर्ण और कौन सी बैठक हो सकती है। अधिकारियों को दीर्घा में उपस्थित रहना चाहिए। ये बहुत गंभीर बात है।मुख्यमंत्री और गृह सचिव को इस पर कार्रवाई करनी चाहिए। विपक्ष ने जिस ओर ध्यान आकर्षित कराया है उस पर सदन को संज्ञान लेना चाहिए। इस दौरान गृह सचिव एस.एन.मिश्रा भी दीर्घा में मौजूद थे।

    नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने कहा कि माननीय अध्यक्ष जी आपने ही व्यवस्था दी थी कि जनरल बजट पर चर्चा के दौरान विभाग प्रमुख और सचिव भी दीर्घा में उपस्थित रहें। उन्होंने कहा कि माननीय मंत्री जी आज अपने विभाग की चर्चा का उत्तर न दें। जब डीजी महोदय और जेल डीजी उपस्थित रहें तब कल या किसी और समय चर्चा का उत्तर दिया जाए।

    इस पर नरोत्तम मिश्रा ने कहा कि माननीय गृहमंत्री जी सक्षम हैं और वे आज भी जवाब दे सकते हैं। यदि वे आज अधिकारियों की अनुपस्थिति के कारण जवाब नहीं देते हैं तो ये भविष्य के लिए नजीर बन जाएगी। इस पर अध्यक्ष जी कोई व्यवस्था दे दें तो उचित होगा।

    जवाब में अध्यक्ष एन.पी.प्रजापति ने कहा कि सदन के निर्देशों का पालन नहीं होगा तो मुझे भी किताबें पलटकर नियमों का पालन कराना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि मैं जब बिजली मंत्री था और तब ओ एंड एम मेंबर मिस्टर भोंडे उपस्थित नहीं थे तो मैंने उन्हें नोटिस दिया था और धारा 11 ए के तहत कार्रवाई की थी। हमारा सदन लोकतंत्र का मंदिर है, गफलत बाजी की जाएगी तो ये सदन की अवमानना के दायरे में आएगा। उन्होंने कहा कि चर्चा के दौरान अधिकारियों को सदन में रहना चाहिए। यदि कोई नया विधायक अपनी बात सदन में उठा रहा है तो वह बात अधिकारियों तक प्रेषित होनी ही चाहिए। यदि नहीं जा रही है तो फिर क्या मतलब। इसके साथ ही उन्होंने सदन को शुक्रवार 11 बजे तक के लिए स्थगित करने की घोषणा कर दी।

    अध्यक्ष एन.पी.प्रजापति के इस फैसले पर पूरे सदन की ओर से उनकी सराहना की गई। इस तरह का माहौल बरसों बाद सदन में देखा गया।

  • खर्च कम करके आय बढ़ाएगा कमलनाथ सरकार का बजट

    खर्च कम करके आय बढ़ाएगा कमलनाथ सरकार का बजट

    मध्यप्रदेश विधानसभा के बजट सत्र में आज की कार्यवाही ने प्रदेश के राजनैतिक और आर्थिक हालात की पूरी तस्वीर प्रस्तुत कर दी। वित्तमंत्री तरुण भनोट के बजट भाषण पर सदन के 32 विधायकों ने पिछले दो दिनों में जिस तरह अपने विचार प्रस्तुत किए उन्हें लेकर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच कई मुद्दों पर तीखी तकरार हुई। सदन के समवेत होते ही विधानसभा अध्यक्ष नर्मदा प्रसाद प्रजापति ने जब प्रश्नकाल प्रारंभ करने की अनुमति दी तो आरोप प्रत्यारोप का दौर भी शुरु हो गया। भाजपा विधायक जालम सिंह पटेल ने शिक्षा मंत्री प्रभुराम चौधरी से पूछा कि चुनाव के दौरान कांग्रेस ने अपने वचनपत्र में वादा किया था कि वह सत्ता में आने पर निजी स्कूलों के शिक्षकों का नियमितीकरण करेगी। अब सात महीने बीत चुके हैं, निजी स्कूलों के शिक्षक तनावपूर्ण माहौल में काम करते हैं। उन्हें सरकार कब नियमित करेगी और उनके वेतनमान बढ़ाएगी। उन्होंने कहा कि सरकार ने युवाओं को रोजगार देने का वादा करते हुए कहा था कि पीएससी से शिक्षकों के पद भरे जाएंगे और युवाओं को नौकरी दी जाएगी। श्री पटेल ने कहा कि यदि पीएससी होती है तो कई सालों से निजी स्कूलों में पढ़ा रहे शिक्षक बेरोजगार हो जाएंगे। ऐसे हालात में सरकार पहले उन्हें नियमित करे और फिर युवाओं की नई भर्तियां करे। कांग्रेस ने चुनाव में वादा तो कर दिया था पर वह इस पर अमल कब कर रही है। इस पर प्रभुराम चौधरी ने कहा कि सरकार इस पर विचार कर रही है और सभी संभावनाओं का अध्ययन कराया जा रहा है। इस पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोप प्रत्यारोप का दौर शुरु हो गया। इस बीच नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने प्रभुराम चौधरी के जवाब पर व्यंग्य कसते हुए कहा कि एक तरफ तो वोटें ठग लीं और अब कह रहे हैं कि वादों पर अमल की समय सीमा बताना संभव नहीं है। आपकी भी समय सीमा नहीं है कि सरकार आखिर कब तक रहेगी। इस पर गृहमंत्री बाला बच्चन ने कहा कि क्या आप हमारी समयसीमा तय करेंगे। हमारा फैसला तो विधायकगण कर चुके हैं। इस बीच लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री तुलसी सिलावट ने कहा कि आप अपनी समयसीमा बता दो कि आप कब तक नेता प्रतिपक्ष बने रहेंगे। इस पर भाजपा के डाक्टर नरोत्तम मिश्रा ने कहा कि एक मेरे पास एक वाट्सएप संदेश आया था जिसमें कहा गया था कि एक मानसून कर्नाटक से होता हुआ मध्यप्रदेश की ओर आने को अग्रसर है। इस पर अध्यक्ष एनपी प्रजापति ने कहा कि यह सदन का विषय नही है। इस पर बाला बच्चन ने जवाब दिया कि ये मानसून मध्यप्रदेश में प्रवेश नहीं कर पाएगा. एक सवाल के जवाब में विधायक मुन्नालाल गोयल ने पूछा कि स्मार्टसिटी प्रोजेक्ट में मध्यप्रदेश और केन्द्र के बीच हिस्सेदारी क्या है। इसके जवाब में नगरीय विकास एवं आवास मंत्री जयवर्धन सिंह ने बताया कि ये प्रोजेक्ट केन्द्र प्रवर्तित है और इसमें केन्द्र व राज्य की पचास पचास प्रतिशत की हिस्सेदारी है। इस पर श्री गोयल ने कहा कि इस प्रोजेक्ट के संबंध में जो गाईड लाईन बनाई गई है उसका पालन नहीं हो रहा है। स्मार्ट सिटी में शिक्षा, स्वास्थ्य, पार्क आदि की व्यवस्था की जानी है लेकिन राज्य सरकार गाईड लाईन का पालन नहीं कर रही है। उन्होंने कहा कि जो फंड केन्द्र से आ रहा है या राज्य खर्च कर रहा है उसका खर्च कैसे हो रहा है इसे जानने के लिए स्थानीय जन प्रतिनिधियों की निगरानी भी होनी चाहिए। ये राशि किसी व्यक्ति के अधिकार क्षेत्र में नहीं है। जनता का पैसा है और उसका पूरा उपयोग सुनिश्चित किया जाना चाहिए। इस पर नगरीय प्रशासन मंत्री जयवर्धन सिंह ने कहा कि मैं माननीय विधायक जी को पूरा आश्वासन देता हूं कि गाईड लाईन का पूरा पालन किया जाएगा।उन्होंने कहा कि ग्वालियर में फेस टू के लिए तीन सौ पचास करोड़ का फंड आया है। लेकिन अभी उसमें से केवल सैंतीस करोड़ ही खर्च हो पाए हैं। उन्होंने कहा कि स्मार्ट सिटी के लिए ग्वालियर में जो जगह निर्धारित है उसमें से विधायक जी की विधानसभा का बहुत छोटा क्षेत्र आता है। उन्होंने कहा कि खेल क्षेत्र और मेडीकल कालेज के लिए पांच करोड़ इन्क्यानवे लाख रुपए स्वीकृत हो चुके हैं। भोपाल के मास्टर प्लान के संबंध में विधायक रामेश्वर शर्मा ने नगरीय प्रशासन मंत्री जयवर्धन सिंह से पूछा कि मास्टर प्लान की सड़कों का निर्माण अब तक क्यों नहीं हो पाया है और सरकार इन्हें कब तक पूरा करेगी। इस पर श्री जयवर्धन सिंह ने कहा कि सड़कों का निर्माण बजट की व्यवस्था के आधार पर किया जाता है। जैसे जैसे बजट मिलता जाएगा सड़कों का निर्माण होता जाएगा। उन्होंने कहा कि भोपाल के मास्टर प्लान का काम जारी है। इसे 2005 में और 2015 में बन जाना था पर पिछली सरकार उसे लागू क्यों नहीं कर पाई इसकी वजह वे नहीं बता सकते। उन्होंने कहा कि अंतिम मास्टर प्लान 1995 में लागू हुआ था तबसे भोपाल की तस्वीर बहुत बदल चुकी है। हमारी सरकार का प्रयास है कि इस साल के अंत तक नया मास्टर प्लान लागू हो जाए। उन्होंने कहा कि कई एजेंसियां सड़कों का निर्माण करती हैं। कई सड़कें नगर निगम की होती है, कई सीपीए, कई लोक निर्माण विभाग और कई बीडीए की भी होती हैं इसलिए ये काम सदन के भीतर बैठकर तो तय नहीं किया जा सकता कि कौन सी सड़क कौन सी एजेंसी लेगी।

    विधायक नागेन्द्र सिंह ने रीवा जिले में अवैध उत्खनन का मामला उठाया तो खनिज मंत्री प्रदीप जयसवाल ने कहा कि अवैध उत्खनन रोकने के लिए सरकार मुस्तैदी से काम कर रही है। जुर्माना भी वसूला जा रहा है, वाहनों के राजसात करने की कार्रवाई भी की जा रही है। इस पर नागेन्द्र सिंह ने कहा कि अवैध उत्खनन की तुलना में सरकार की कार्रवाई बहुत सीमित है। इस विषय पर कई सदस्यों की टिप्पणियों को अध्यक्ष ने विलोपित कर दिया। प्रश्नकाल समाप्त होते ही कई सदस्य टोका टाकी करके अपनी बातें कहने लगे। इस पर अध्यक्ष श्री प्रजापति ने कहा कि शून्यकाल का मतलब ये नहीं कि सब शून्य हो गया है। जब घड़ी के दोनों कांटे बारह बजे पर आते हैं तो इसे शून्यकाल कहा जाता है। इसके बाद भी कार्यवाही चलती है इसलिए आप लोग हस्तक्षेप करना बंद करें। पथरिया विधायक राम बाई ने क्षेत्र के एक परिवार के अट्ठाईस लोगों को पुलिस मुकदमे में जबरन फंसाए जाने का मामला उठाया। इस पर अध्यक्ष श्री प्रजापति ने कहा कि जब कोई मामला अदालत में विचारणीय होता है तो उस पर सदन में चर्चा नहीं की जाती है। नरोत्तम मिश्रा ने विधानसभा में मीडिया के व्यवस्थापन का मुद्दा भी उठाया। इस पर नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने कहा कि आसंदी से कुछ ऐसी व्यवस्था की जानी चाहिए कि मीडिया का भी सम्मान बना रहे और विधायिका का भी गौरव बढ़े। इस पर अध्यक्ष ने कहा कि जो संस्था विधायिका के लिए बनी है उसमें ही यदि वो धक्के खाने को मजबूर हो जाए तो काम कैसे होगा। पहले मीडिया का स्वरूप बहुत छोटा था अब इलेक्ट्रानिक मीडिया भी है और प्रिंट मीडिया भी इसलिए दोनों के लिए अलग कक्ष दे दिए गए हैं। धीरे धीरे व्यवस्था जम जाएगी जो बातें सामने आएंगी उसके मुताबिक और भी बदलाव हो जाएंगे। नरोत्तम मिश्रा ने कहा कि एक ही सवाल के जवाब देने के लिए सदस्यों को दो अलग अलग स्थानों पर जाना पड़ रहा है। गोपाल भार्गव ने कहा कि विधानसभा सलाहकार समिति की राय से उचित व्यवस्था दे दें तो इसके जवाब में अध्यक्ष ने कहा कि उचित समय पर निर्णय ले लिया जाएगा। सदन के कामकाज को देखते हुए अध्यक्ष महोदय ने भोजनावकाश निरस्त कर दिया और मौजूदा वर्ष के आय व्ययक पर चर्चा आहूत की। बजट पर चर्चा करते हुए नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने कहा कि सदन में कहा गया कि आर्थिक सर्वेक्षण में जारी आंकड़ों के अनुसार प्रदेश पिछड़ गया है और बीमारू राज्य हो गया है। हकीकत में राज्य का विकास तेज गति से हुआ है। दो हजार तीन की तुलना में देखें तो राज्य में बिजली, सड़क,पानी, सिंचाई जैसे कई क्षेत्रों में अभूतपूर्व विकास हुआ है। जहां तीन हजार मेगावाट बिजली बनती थी वहां अब अठारह हजार छह सौ साठ मेगावाट बिजली बनती है। इस पर वाणिज्यिक कर मंत्री बृजेन्द्र सिंह राठौर ने कहा कि दो लाख करोड़ का कर्ज किसने लिया। इस पर गोपाल भार्गव ने कहा कि आपने तो सत्ता में आते ही कर्ज और फिजूलखर्ची शुरु कर दी है। अगले महीने से तो सरकार वेतन भी नहीं बांट पाएगी। पिछले पंद्रह सालों में हमारी सरकार ने कभी ओवरड्राफ्ट नहीं किया था। उन्होंने कहा कि इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगना चाहिए। यदि हम कहें कि नेहरू जी, इंदिरा जी, लाल बहादुर शास्त्री जी, अटलजी के जमाने में देश में कुछ नहीं हुआ तो ये कहना उन विभूतियों के साथ अन्याय करना होगा। उन्होंने कहा कि वित्त मंत्रीजी ने बजट में जो आय बढ़ने का आंकडा प्रस्तुत किया है उसे उन्हें एक बार फिर जांच करके कंफर्म करना चाहिए। उन्होंने कहा कि राज्य उत्पाद कर में सैंतीस प्रतिशत की ग्रोथ दिखाई गई है, जबकि अधिकतर ठेके बीस से अठारह प्रतिशत पर हो रहे हैं। पिछले दस वर्षों की ग्रोथ रेट को आधार बनाकर ये बजट बनाया जाता तो ज्यादा उपयुक्त होता। श्री भार्गव ने कहा कि मैं इस बजट को खोखला कहता हूं। उन्होंने कहा कि इस तरह के आंकड़ों के आधार पर बजट बनने से ये स्थितियां बनेंगी कि न तो निर्माण हो पाएंगे न ही भुगतान हो पाएंगे। उन्होंने कहा कि जीएसटी में 70 फीसदी की बढ़त दिखाई गई है , जबकि ये संभव नहीं है। यदि आप इतनी बढ़त दिखाएंगे तो फिर केन्द्र अतिरिक्त राशि क्यों देगा। नियम ये है कि यदि आप घाटे में जा रहे हैं तो घाटे की प्रतिपूर्ति केन्द्र से की जाएगी। जब आप मुनाफा दिखाएंगे तो संसाधन कैसे जुटा पाएंगे। इसी तरह स्टाम्प ड्यूटी में 23 फीसदी की बढ़त दिखाई गई है, जबकि कलेक्टर गाईड लाईन में 20 प्रतिशत की कमी की गई है। इसी तरह भू राजस्व में सौ फीसदी बढ़त दिखाई गई है जो किसी भी तरह संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि ऊर्जा विभाग की सब्सिडी आदि पर आठ हजार करोड़ का प्रावधान किया गया है जबकि हमने लगभग साढ़े चौदह हजार करोड़ रुपए का प्रावधान किया था। जाहिर है कि सरकार को अपने इस फैसले पर एक बार फिर विचार करना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि सरकार ने सहकारी बैंकों को एक हजार करोड़ देने का फैसला किया है। यदि ऐसा होता है तो सरकार खस्ताहाल बैंकों की मालिक ही बन जाएगी। ऐसे में रिजर्व बैंक इन सहकारी बैंकों का लाईसेंस निरस्त कर देगा। सरकार को कर्ज के एवज में इन बैंकों में पूंजी निवेश करने का अधिकार नहीं है। उन्होंने कहा कि सारी सहकारी मिलें घाटे में चल रही हैं उन्हें उबारने के लिए बजट में कोई प्रावधान नहीं किए गए हैं।

    बजट भाषण के संबंध में सभी सदस्यों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित करते हुए वित्तमंत्री तरुण भनोट ने कहा कि इस संबंध में सभी आपत्तियों का कोई आधार नहीं है। सरकार प्रदेश की बेहतरी के लिए काम कर रही है। शराब पर इस बार पंद्रह के स्थान पर बीस फीसदी वृद्धि की गई है इससे प्रदेश का राजस्व बढ़ेगा। उन्होंने पांच रुपए में गरीबों को भोजन कराने वाली दीन दयाल रसोई योजना बंद किए जाने के आरोप का खंडन करते हुए कहा कि राज्य में हर दिन तेरह हजार गरीबों को पांच रुपए में भोजन कराया जा रहा है। ये योजना कई कंपनियों से फंड जुटाकर चलाई जा रही है। सरकार इसमें आवश्यक सुधार भी करेगी। इस पर भाजपा के जालम सिंह पटेल ने कहा कि मैं स्वयं ये योजना चलाता रहा हूं। इसमें पांच रुपए की राशि बहुत कम पड़ती है। रसोई का पूरा खर्च नहीं निकल पाता है इसलिए इस राशि को बढ़ाया जाना चाहिए। इस पर वित्तमंत्री तरुण भनोट ने कहा कि सरकार इस सुझाव पर अवश्य विचार करेगी। मनोहर ऊंटवाल के आरोप के जवाब में श्री भनोट ने कहा कि हमने गौशालाओं के लिए दी जाने वाली चार रुपए की राशि को बढ़ाकर बीस रुपए प्रतिदिन प्रतिगाय की दर से बढ़ा दिए हैं। इससे गौवंश की देखभाल अच्छी तरह हो पाएगी। इसके लिए बजट में पर्याप्त प्रावधान किया गया है। आगे और भी संशोधन किए जाएंगे। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछली भाजपा की सरकार तो एक गौशाला भी नहीं खोल सकी थी जबकि कमलनाथ सरकार ने जो प्रावधान किए हैं उससे प्रदेश में पर्याप्त गौशालाएं खोली जा सकेंगी। धीरे धीरे ये स्थिति बन जाएगी कि एक भी गौवंश आवारा हाल में सड़कों पर नहीं फिरेगा। इस बीच भाजपा के बहादुर सिंह चौहान ने कहा कि सरकार ने सारी जन हितैषी योजनाओं की दुर्गति कर दी है। तीर्थ दर्शन योजना में दो सौ करोड़ रुपए का प्रावधान किया जाता था सरकार ने बजट में उसे मात्र छह करोड़ रुपए कर दिया है।

    सदन में तीन अशासकीय संकल्प प्रस्तुत किए गए जिन्हें अध्यक्ष की घोषणा के अनुसार सर्वानुमति से पारित कर दिया गया। जिसमें प्रधानमंत्री आवास योजना के लिए ग्रामीण इलाकों में आबंटित की जाने वाली राशि डेढ़ लाख रुपए से बढ़ाकर ढाई लाख रुपए किए जाने का संकल्प भी शामिल था। दशहरा दीपावली की छुट्टियों में या उसके तुरंत बाद परीक्षाओं का आयोजन न किए जाने और इटारसी से इलाहाबाद के लिए प्रतिदिन ट्रेन चलाने के संकल्प भी सदन ने पारित कर दिए। अपरान्ह अध्यक्ष महोदय ने सदन की कार्यवाही बुधवार सत्रह जुलाई तक के लिए स्थगित करने की घोषणा कर दी।

  • गांधीवाद के बोझ से कराहती कांग्रेस

    गांधीवाद के बोझ से कराहती कांग्रेस

    आम चुनाव में करारी हार के बाद कांग्रेस में आत्ममंथन का दौर शुरु हो गया है। राहुल गांधी का कहना है कि कांग्रेस की बागडोर अब परिवार से बाहर के किसी व्यक्ति को संभालनी चाहिए। चुनावी भाषणों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कांग्रेस के परिवारवाद को जिस तरह देश के लिए घातक बताया उस पर जनता ने गंभीरता से विचार किया। खुद को इस परिवारवाद से अलग दिखाने के लिए भाजपा ने तो कई बड़े दिग्गजों और उनके परिजनों के भी टिकिट काट दिए। अपने चुनावी इंटरव्यू में अमित शाह ने बार बार कहा कि आप नहीं जान सकते भाजपा का अगला अध्यक्ष कौन होगा लेकिन कांग्रेस में तो सबको मालूम रहता है कि अगला अध्यक्ष गांधी परिवार का ही कोई बेटा बेटी होगा। ये बात कांग्रेस पर सौ फीसदी सही भी उतरती है। कांग्रेस के भीतर से इसे लेकर काफी आक्रोश पनपता रहा है। कांग्रेस के कई नेता तो खुलकर बोलते रहे हैं कि कांग्रेस में अनुकंपा नियुक्तियों का दौर समाप्त होना चाहिए। मध्यप्रदेश कांग्रेस में सभी बड़े दिग्गज गांधी परिवार से असहमत रहे हैं। स्वर्गीय अर्जुनसिंह ने तो तिवारी कांग्रेस बनाकर विद्रोह का शंखनाद किया था। उनके चेले रहे दिग्विजय सिंह भी कांग्रेस परिवार का दंश झेल चुके हैं। सिंधिया राजवंश पर इंदिरागांधी के प्रहार के कारण ही तो प्रदेश में आधुनिक भाजपा की नींव पड़ी थी। दरअसल में नेहरू गांधी खानदान का हस्तक्षेप देश की राजनीति में इतना प्रभावी रहा है कि कोई भी क्षेत्रीय या राष्ट्रीय नेता इस परिवार की कोटरी के खिलाफ सिर नहीं उठा सका है। जब जिसने अपना वजूद बढ़ाने का प्रयास किया उसे राजनीति के मैदान से ही विदा होना पड़ा। यही वजह है कि नेहरू गांधी खानदान भारत की राजनीति का एजेंडा तय करने की एकमात्र धुरी रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह पीव्ही नरसिंम्हाराव सरकार की आर्थिक नीतियों पर अमल शुरु किया उससे पूर्व प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह की सोच ही साकार हुई है। आर्थिक सुधारों ने देश में समानांतर अर्थव्यवस्था को समाप्त करने की दिशा में बड़ी दूरी तय कर ली है।विशाल भारत तेजी से अर्थव्यवस्था के नए नए मुकाम हासिल करता जा रहा है।ऐसे में कांग्रेस की कथित गांधीवादी सोच की कोई जरूरत शेष नहीं रह गई है। यह सोच देश को आत्मनिर्भर बनाने की राह में सबसे बड़ा रोड़ा रही है। महात्मा गांधी तो ग्राम स्वराज की बात करते थे लेकिन कांग्रेस ने उसे नेहरू गांधी राज में तब्दील कर दिया। ऐसे में किसी भी राजनेता के बस की बात नहीं रही कि वो कांग्रेस को इस लौह आवरण से मुक्त करा सके। यही वजह है कि कांग्रेस के दिग्गज नेताओं ने भाजपा को आगे बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई। मध्यप्रदेश में तो शिवराज सिंह सरकार इतना लंबा सफर केवल इसलिए तय कर सकी क्योंकि उसे कांग्रेस के दिग्गजों ने ही सहारा दे रखा था। जब शिवराज की भाजपा कांग्रेस से भी आगे बढ़कर कथित गांधीवादी नीतियों की गुलाम बन गई तो उससे प्रदेश को निजात दिलाने के लिए भाजपा के भीतर से ही बदलाव की बयार महसूस की गई। उससे बड़ी समस्या तो आज महसूस की जा रही है जब वक्त है बदलाव का नारा साकार करने के बावजूद मध्यप्रदेश में वही पुरातन पंथी कांग्रेस का दौर लौट आया है। मुख्यमंत्री कमलनाथ के हाथों में ही संगठन की कमान है और वे उसी पोंगापंथी कांग्रेस की तस्वीर साकार कर रहे हैं जिसे प्रदेश ने बेचैनी से भरकर सत्ता से बाहर धकेला था। संगठन का ताना बाना बुनने के लिए कमलनाथ ने चोर दरवाजा खोल दिया है। उन्होंने तबादलों और पोस्टिंग का जो काला कारोबार शुरु किया उसकी वजह से प्रदेश का विकास ठप पड़ गया है। दलालों की फौज फोन कर करके भ्रष्ट अफसरों को मनचाही पोस्टिंग का न्यौता भेज रही है।लोग चंदा देकर पोस्टिंग नहीं पाना चाहते क्योंकि प्रदेश सरकार ने आर्थिक संसाधनों की व्यवस्था नहीं की है। कमलनाथ की सोच जिन दलालों को संगठन के तौर पर एकजुट कर रही है उसे ही वे समाज के नीति नियंता मानते हैं।कमलनाथ को करीब से जानने वाले बताते हैं कि वे समाज में धौंस डपट से संसाधनों पर कब्जा जमाने वालों को ही लीडर मानते हैं। यही वजह है कि भाजपा और कांग्रेस के तमाम दलाल कांग्रेस के बैनर पर एकजुट होने लगे हैं। कमलनाथ की सोच सही है या गलत इस पर विचार न करें तो भी ये तो तय है कि वे अपनी सोच के आधार पर संगठन का एक ढांचा गढ़ रहे हैं। भाजपा से विशाल संगठन से दो दो हाथ करने के लिए कांग्रेस को लड़ने वाले योद्धाओं की जरूरत है। ये जरूरत कमलनाथ पूरी कर रहे हैं। समस्या ये आ रही है कि शोभा ओझा, नरेन्द्र सलूजा,आर.के.मिगलानी या प्रवीण कक्कड़ जैसे लोग जिस संगठन के नाम पर तबादले पोस्टिंग का कारोबार चला रहे हैं वे वास्तव में जनसेवा के विचार से कोई वास्ता नहीं रखते। अब ऐसे लोगों की भीड़ जुटाकर जनहितकारी कांग्रेस तो नहीं बनाई जा सकती। भाजपा में आज भी जब अपना घर फूंककर समाजसेवा करने वाली पीढ़ी जिंदा है तब ऐसी चंदाखोरों की कांग्रेस की जरूरत क्या है। शिवराज सिंह चौहान ने सेवाभावी भाजपा को भले ही प्राथमिकता न दी हो लेकिन उन्होंने इसे समाप्त भी नहीं किया। कमलनाथ कांग्रेस तो सेवाभावी कार्यकर्ताओं और नागरिकों को ही धकियाकर घर बिठाने में जुट गई है। इसमें राहुल गांधी के इस्तीफे की पेशकश के बाद खलल पड़ रहा है। कमलनाथ को उद्योगपति के रूप में प्रचारित किया गया था। सत्ता में आने के बाद वे तबादला और पोस्टिंग पति साबित हो रहे हैं। उनकी सरकार ने कृषि, उद्योग, सार्वजनिक क्षेत्र सभी का भट्टा बिठा दिया है। वैमनस्य से भरे कमलनाथ को प्रदेश के तमाम क्षेत्रों से जुड़े लोग चोर नजर आते हैं। उनका कहना है कि पिछली सरकार खजाना खाली करके गई है। जबकि वे स्वयं सत्ता में आने के बाद प्रदेश के नाम पर दस हजार करोड का लोन ले चुके हैं। प्रदेश की नियमित आय चार हजार करोड़ से अधिक है जिसमें से 3200 करोड़ रुपया वेतन में बंट जाता है। बाकी रकम ब्याज सुविधाओं आदि में खत्म हो जाती है। ये स्थिति पिछली सरकार के कार्यकाल में भी थी और विकास योजनाओं के लिए शिवराज सरकार ने भी धड़ाधड़ कर्ज लिया था। प्रदेश की उत्पादकता धराशायी होने के कारण ये स्थितियां निर्मित हुई हैं। कमलनाथ कहते रहे हैं कि आप लोग मौजूदा काम छोड़कर कोई नए धंधे कर लीजिए। जाहिर है कि देश में चल रही आर्थिक सुधारों की बयार में ये अभीष्ठ भी है। इसके बावजूद लोग क्या करें, कैसे करें इसका मार्गदर्शन देने में कमलनाथ सरकार बुरी तरह असफल साबित हुई है। वे स्वयं कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष भी हैं इसलिए कांग्रेस भी नेतृत्व विहीनता का दौर झेल रही है। कांग्रेस के भीतर किसी नेता का कद इतना बड़ा नहीं कि वो कमलनाथ को उनकी नाकामियों के लिए डंडा दिखा सके। ऐसे में कांग्रेस के भीतर से चल रही नेतृत्व की बयार कुछ मार्गदर्शन जरूर कर सकती है। राहुल गांधी यदि सच में देश को बदला हुआ देखना चाहते हैं तो उन्हें पद छोड़ने की झूठी रट को छोड़कर कांग्रेस से दूरियां बनानी होंगी। कमलनाथ जैसे लकीर पर चलने वाले नेताओं के बजाए यदि वे कांग्रेस का नया ढांचा खड़ा करने में सक्षम नेताओं को अवसर देंगे तो वे एक मजबूत संगठन जरूर खड़ा कर सकते हैं। यदि वे कांग्रेस को अपना जेबी संगठन बनाने की ही लीक पर चलते रहे तो तय है कि धीरे धीरे प्रदेश की जनता में पनप रहा आक्रोश सैलाब बनकर कांग्रेस की सरकारों को खदेड़ देगा। तब सुधारों का अवसर नहीं बचेगा। गांधी के नाम पर शोषणवादी नीतियों की खेती कर रही कांग्रेस को अपने गिरेबान में झांककर देखना होगा और सुधारों को अमली जामा भी पहनाना पड़ेगा।

  • टूटी कांग्रेस को कैसे चला पाएंगे कमलनाथ

    टूटी कांग्रेस को कैसे चला पाएंगे कमलनाथ

    • राजा,महाराजा औऱ कमलनाथ की रियासतों में बंटी मप्र कांग्रेस।

    (डॉ अजय खेमरिया) गुना से ज्योतिरादित्य सिंधिया की हार ने मप्र की कांग्रेस राजनीति में आपसी संघर्ष की नई पटकथा लिख दी है नकुलनाथ को छोड़कर मप्र के सभी कांग्रेसी सूरमा बुरी तरह से हारे है सरकार के तीन चौथाई मंत्रियों के इलाकों से कांग्रेस बुरी तरह हारी है।मुख्यमंत्री ने 22 प्लस का नारा दिया था लेकिन 29 में से 28 सीटों पर कांग्रेस बुरी तरह हारी है।भोपाल में दिग्विजयसिंह, गुना में सिंधिया, सीधी में अजय सिंह,जबलपुर में विवेक तन्खा जैसे दिग्गज नेता बुरी तरह परास्त हुए है।मप्र की इस हार ने एक बार फिर कांग्रेस दिग्गजों को एक दूसरे के आमने सामने लाकर खड़ा कर दिया है।पूर्व मंत्री और 6 बार से विधायक केपी सिंह ने यह कहकर मामले की गंभीरता को सामने ला दिया कि अब राजा महाराजा को चाहिये कि मुख्यमंत्री कमलनाथ को फ्री हैंड छोड़कर राजा(दिग्गिराजा),महाराजा( सिंधिया) दिल्ली में आराम करें।इधर बाल विकास मंत्री इमरती देवी ,पशुपालन पालन मंत्री लाखन सिंह यादव ने मुख्यमंत्री के नेतृत्व पर सवाल उठाना शुरू कर दिए है।एक टीव्ही शो में कांग्रेस की हार पर पक्ष रखते हुए मुकेश नायक ने भी कमलनाथ की कार्यशैली पर उनके अंतर्मुखी व्यक्तित्व को लेकर कुछ इसी तरह से सवाल खड़ा किया है।लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद सबसे ज्यादा घबराहट मप्र की कमलनाथ सरकार में देखी और सुनी जा रही है ।क्या वाकई मप्र में कमलनाथ सरकार को कोई खतरा है?कल की विधायक दल की बैठक के बाद से लगता तो नही है जिसमे 121 का आंकड़ा परेड के लिये तैयार था।लेकिन बाबजूद इसके खतरा घर मे खड़ा है बहुमत से 2 विधायक कम रहने के कारण कमलनाथ मन्त्रिमण्डल गठन में सीनियरिटी ,क्षेत्रीय सन्तुलन का ध्यान नही रख पाए।6 बार तक के लगातार विधायक मंत्री नही बनाये गए और दूसरी बार विधायक बने के कई लोग मंत्री बनने में सफल रहे यह स्थिति कमलनाथ के लिये मजबूरी में निर्मित हुई क्योंकि सिंधिया, दिग्गिराजा के दबाब में उनके कोटे पूरे करने पड़े इस बीच वरिष्ठता, कैडर, को पीछे रखना पड़ा यही से इस सरकार स्थिरता को लेकर सवाल उठने लगे खुद कांग्रेस विधायकों के बयानों ने इस हवा को बनाने का काम किया।मंत्रिमंडल में आने से वंचित रहे सीनियर विधायको ने एक दूसरे सरदारों पर खुलेआम निशाना साधना शुरू कर दिया।एडल सिंह कंषाना,जयवर्द्धन सिंह दत्ती गांव ,बिसाहूलाल सिंह, नातीराजा,केपी सिंह,लक्ष्मण सिंह,जैसे 20 से अधिक विधायक मंत्री पद की महत्वाकांक्ष लिए हुए है सपा, बसपा,औऱ सभी4 निर्दलीय विधायक भी मंत्री रुतबा चाहते है।कमलनाथ की बुनियादी दिक्कत यह है कि उनके पास दावेदारों को समायोजित करने के लिये विकल्प बहुत सीमित है ।कल विधायक दल की बैठक में एक विधायक ने 20 कांग्रेस विधायको के बीजेपी के सम्पर्क में रहने का दावा किया है।बुरहानपुर औऱ सुसनेर के निर्दलीय विधायक भी आंखे तरेर रहे है भिंड के बसपा विधायक मूलतः भाजपाई ही है ।कुल मिलाकर कांग्रेस में अंदरूनी चुनौतीयां कम नहीं है।
    लोकसभा चुनावों ने इस अंदरूनी क्लेश को औऱ भी गहरा कर दिया है।सिंधिया के प्रभाव क्षेत्र वाला मध्यांचल में पार्टी बुरी तरह हारी है सिंधिया से जुड़े एक बड़े नेता के अनुसार इस स्थिति के लिये मुख्यमंत्री और दिग्विजयसिंह जिम्मेदार है क्योंकि टिकट वितरण में सिंधिया की पसन्द को दरकिनार किया गया।भिंड में सिंधिया नही चाहते थे कि देवाशीष जरारिया को टिकट दी जाए क्योंकि उनकी इमेज कट्टर दलित एक्टिविस्ट की है और 2 अप्रेल के सवर्ण वर्सेज दलित झगड़े में उनकी भूमिका आपत्तिजनक थी इसके बाद भी सीएम औऱ दिग्गिराजा की सिफारिश पर भिंड से देबाशीष को टिकट दी गई परिणाम 2 लाख से कांग्रेस हार गई और इस केन्डिडेचर का असर अंचल के आसपास भी पड़ा ।
    ग्वालियर की सीट पर भी सिंधिया नही चाहते थे कि अशोक सिंह को कांग्रेस की टिकट मिले अशोक 3 चुनाव यहां से हार चुके थे दो बार तो उन्होनें महल के उम्मीदवार सिंधिया की बुआ श्रीमती यशोधरा राजे को कड़ी टक्कर दी थी।सिंधिया यहां से किसी अन्य समर्थक को टिकट दिलाने के लिये प्रयासरत थे लेकिन कमलनाथ औऱ दिग्गिराजा के दबाब में अशोक सिंह टिकट पाने में सफल रहे। मुरैना में जरूर उनकी सिफारिश पर रामनिवास रावत को टिकट मिली।सिंधिया भिंड औऱ ग्वालियर के टिकट वितरण से इतने नाराज थे कि जब इनके समर्थन में राहुल गांधी सभा करने आये तो सिंधिया शिवपुरी में रहते हुए भी इन सभाओं में नही गए।ग्वालियर औऱ भिंड में एक एक सभा लेने वे गए जरूर पर सभा मंच से ही स्पष्ट कर दिया कि दोनो राहुल गांधी के खड़े किये प्रत्याशी है उनका इशारा आसानी से समझा जा सकता था।इस बीच कट्टर महल विरोधी दलित नेता फूल सिंह बरैया, साहब सिंह गुर्जर को कमलनाथ ने सीधे कांग्रेस ज्वाइन करा दी इससे सिंधिया नाराज हो गए उन्होंने भी जबाबी हमला करते हुए ठाकुर लॉबी के दुश्मन चौधरी राकेश को अपने मंच से ही कांग्रेस में शामिल कर दिया।मुरैना से 2014 में डॉ गोविन्द सिंह की हार सुनिश्चित करने वाले व्रन्दावन सिंह को भी सिंधिया ने इसी होड़ में बसपा से कांग्रेस में शामिल कराया।सिंधिया कोटे से मंत्री प्रधुम्न सिंह,इमरती देवी,गोविंद राजपूत, प्रभुराम चौधरी,तुलसी सिलावट, लाखन सिंह पूरे समय अपने अपने जिले छोड़कर गुना में जुटे रहे।यह स्थिति कांग्रेस के अन्दर के असली हालातों को बयां करने के लिये पर्याप्त है।
    भिंड,ग्वालियर के टिकट को लेकर सिंधिया की नाराजगी का स्तर इस बात से ही समझा जा सकता है की वे 12 मई को वोटिंग के बाद सिर्फ एक सभा के किया धार गए इसके बाद वे विदेश रवाना हो गए।जबकि 19 मई को जिन 9 सीटों पर मप्र में मतदान था वे सभी सिंधिया स्टेट के प्रभाव क्षेत वाली थी इंदौर उज्जैन में तो प्रियंका गांधी तक प्रचार करने आई पर सिंधिया नही गए।इसी तरह सिंधिया के चुनाव में दिग्गिराजा के समर्थक भी उदासभाव के साथ सिंधिया की पराजय की कामना करते रहे उन्हें 2002 के बाद से वैसे ही पूछा नही जा रहा है यह अलग बात है कि सिंधिया विरोधी समझे जाने वाले पिछोर के विधायक केपी सिंह के यहां से सिंधिया 16 हजार से जीतने में सफल रहे शेष सभी असेंबली सेग्मेंट में सिंधिया हार गए।
    आने वाले समय कांग्रेस के लिये बेहद चुनौतीपूर्ण होने है क्योंकि सरकार की स्थिरता पर सदैव सवाल बना रहेगा औऱ खेमेबाजी तेजी से बढ़ने वाली है इधर कार्यकर्ताओं के लिये संगठन जनसेवा के लिये प्रेरित कर पायेगा इसकी संभावना क्षीण इसलिये है क्योंकि एक तो सत्ता 15 साल बाद मिली है दूसरा कांग्रेस यहां बहुसंस्करणीय है दिग्गिराजा कि कांग्रेस, महाराजा की कांग्रेस, कमलनाथ की कांग्रेस इनमे इतना ज्यादा आपसी इन्टॉलरेंस है कि आप कांग्रेस खोज नही सकते है राहुल गांधी और उनके वामी सलाहकार पहले मप्र कांग्रेस के आपसी इन्टॉलरेंस को ही खत्म कर दे तो यह बड़ी बात होगी उनके नेतृत्व में।

  • हिंदुओं को आतंकवादी बताने की साजिश

    हिंदुओं को आतंकवादी बताने की साजिश

    “हिंदुओं को ‘आतंकवादियों’ के रूप में बदनाम करने की साजिश से धीरे धीरे हट रहा है पर्दा” in Punjab Kesari
    October 31, 2017/0 Comments/in News /by Lalita NIjhawan

    हाल ही में गुजरात से आईएस के दो आतंकी – मौहम्मद कासिम स्टिंबरवाला और ओबेद अहमद मिरजा गिरफ्तार किए गए। पता लगा कि मौहम्मद कासिम कुछ दिन पहले तक अंकलेश्वर के एक अस्पताल में काम करता था जो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल के निकट सहयोगियों का है। पटेल कुछ समय पहले तक इस अस्पताल की प्रबंध समिति में भी थे। इस मामले पर जब हंगामा मचा और भारतीय जनता पार्टी ने पटेल को घेरा तो कांग्रेस ने इसे चुनावी राजनीति बता कर टरकाने की कोशिश की। पर वास्तव में क्या ये मामला इतना हलका है? क्या इससे पटेल का कोई लेना-देना नहीं है? जांच जारी है। असलियत क्या है, इस आतंकी को पटेल से जुड़े अस्पताल में किसने नौकरी दी, ठीक चुनाव से पहले इसने नौकरी क्यों छोड़ी, कौन कौन से धार्मिक स्थल इसके और इसके सहयोगी के निशाने पर थे, ये जांच के बाद ही सामने आ पाएगा।

    गुजरात और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को केंद्र में रखकर कांग्रेस ने लंबे अर्से तक इस्लामिक सांप्रदायिक राजनीति की है। यही नहीं इस्लामिक आतंकियों के प्रति नरमी और सहानुभूति का भी कांग्रेस का लंबा इतिहास रहा है। इसे देखते हुए भाजपा का इस मुद्दे को गंभीरता से लेना जायज बनता है। कांग्रेस नीत यूनाइटेड प्रोग्रेसिव एलायंस (यूपीए) सरकार ने बहुत ही सोचे समझे तरीके से हिंदुओं को आतंकवादियों के रूप में बदनाम करने की साजिश की, इसे कोई कैसे भूल सकता है। इस षडयंत्र की परतें भी अब धीरे धीरे खुलती जा रही हैं और साथ ही इस बात के संकेत भी मिलने लगे हैं कि इसमें कौन कौन शामिल थे। अब ये भी समझ में आने लगा है कि इस दुष्प्रचार का कारण सिर्फ मुस्लिम वोट बैंक ही नहीं था, इसके पीछे संभवतः कांग्रेस के कुछ बड़े नेताओं की मजबूरियां भी थीं। संकेत ये भी मिल रहे हैं कि ये मामला सिर्फ हिंदूवादी नेताओं को फंसाने का ही नहीं था, ये किसी बाहरी ताकत के इशारे पर इस्लामिक आतंकवाद के बरक्स ‘हिंदू आतंकवाद’ का नेरेटिव खड़ा करने का भी था। बड़ा सवाल ये है कि क्या ये पूरी साजिश सोनिया और उनके सलाहकार अहमद पटेल की सहमति और शिरकत के बिना संभव थी?

    इस विषय में आगे बढ़ने से पहले बात सुधाकर चतुर्वेदी की। 2008 मालेगांव ब्लास्ट मामले में नौ साल सलाखों के पीछे रहने के बाद वो हाल ही में जमानत पर रिहा हुए हैं। वो बताते हैं कि कैसे महाराष्ट्र एंटी टेरर स्क्वाड (एटीएस) ने उन्हें फर्जी तरीके से फंसाया। उन्हें देवलाली (नाशिक) में उनके घर से जबरदस्ती उठाया गया और मुंबई ले जाया गया। मुंबई में उन्हें थर्ड डिग्री टाॅर्चर दिया गया। एटीएस अफसरों ने उनके घर की चाबी छीन कर उनके घर में विस्फोटक पदार्थ आरडीएक्स रखा। उन्हें अवैध रूप से पुलिस हिरासत में रखा गया, प्रताड़ित किया गया, फंसाने के लिए फर्जी दस्तावेज बनाए गए, उनके पास से पिस्तौल की बरामदगी दिखाई गई और फिर माटुंगा पुलिस स्टेशन में फर्जी मामला दर्ज करवाया गया जिसमें कहा गया कि उन्हें हथियारों के साथ गिरफ्तार किया गया।
    चतुर्वेदी के खिलाफ कितने फर्जी पर मजबूत मामले बनाए गए और साजिश कितनी गहरी थी, उसे इस बात से समझा जा सकता है कि उन्हें जमानत मिलने में ही नौ साल लग गए। ध्यान रहे इसी मामले में साध्वी प्रज्ञा ठाकुर और कर्नल श्रीकांत पुरोहित सहित कई और लोगों को भी फंसाया गया। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद कर्नल पुरोहित और साध्वी प्रज्ञा को पहले ही जमानत मिल चुकी है। कर्नल पुरोहित की पत्नी को तो इसके लिए सुप्रीम कोर्ट तक जाना पड़ा।

    सुधाकर चतुर्वेदी बताते हैं कि उन्हें और अन्य लोगों को इस मामले में सिर्फ इसलिए फंसाया गया कि महाराष्ट्र की तत्कालीन कांग्रेस-एनसीपी सरकार और केंद्र की यूपीए सरकार मुसलमानों को खुश करने के लिए हिंदुओं को आतंकवादी साबित करना चाहती थी। हिरासत के दौरान एटीएस वाले उनसे लगातार योगी आदित्यनाथ, हिंदू युवा वाहिनी, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और उसके प्रमुख मोहन भागवत के बारे में पूछताछ कर रहे थे। सुधाकर कहते हैं कि वो मुझसे जिस तरह सवाल कर रहे थे, उससे साफ था कि अनेक वरिष्ठ हिंदूवादी नेता उनके निशाने पर थे और वो किसी भी हालत में उन्हें फंसाना चाहते थे।

    ध्यान रहे तब केंद्र में पी चिदंबरम और महाराष्ट्र में आर आर पाटिल गृहमंत्री थे। मालेगांव मामले में हिंदुओं का पकड़ने और उनके खिलाफ षडयंत्र रचने वाले हेमंत करकरे को 2008 में मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख (कांग्रेस) और आरआर पाटिल (एनसीपी) ने ही एटीएस प्रमुख बनाया था।

    ‘हिंदू आतंकवाद’ शब्दावली का सबसे पहले प्रयोग एक वामपंथी पत्रिका ने 2002 में किया। ध्यान रहे 2002 में गुजरात में सांप्रदायिक दंगे हुए थे। कांग्रेसियों ने इनके लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को तो बहुत बदनाम किया पर गोधरा कांड को भुला दिया जिसके कारण दंगे शुरू हुए। गोधरा में मुस्लिम षडयंत्रकारियों ने बहुत सोचे समझे तरीके से अयोध्या से आ रही साबरमती एक्सप्रेस के डिब्बों में आग लगाई जिसमें 59 लोग जिंदा जल गए। इसकी जांच से पता चला कि इसके मास्टरमाइंड कराची में बैठे थे और इसे कश्मीरी आतंकवादियों की मदद से अंजाम दिया गया। गुजरात दंगों में पाकिस्तानी हाथ को कांग्रेस ने बहुत आसानी से अनदेखा कर दिया।

    गुजरात में ही एक अन्य घटना में 2004 में इशरत जहां अपने तीन सहयोगियों (दो पाकिस्तानी – जीशान जौहर और अमजद अली अकबर अली राणा तथा एक भारतीय जावेद शेख) के साथ मारी गई। केंद्र सरकार की सूचना के बाद उनका एनकाउंटर हुआ। लेकिन बाद में कांग्रेस ने इसे भी हिंदू नरेंद्र मोदी द्वारा मुस्लिम अबला इश्रत की हत्या का मामला बना दिया। जबकि बाद में सीआईए और आईएसआई के डबल एजेंट जेम्स हेडली ने खुलासा किया कि वो लश्कर ए तौएबा की सदस्य थी। उसकी हत्या के बाद खुद लश्कर ने उसे अपनी वेबसाइट में शहीद बताया था। कांग्रेसियों ने इशरत की बात तो बहुत उछाली पर उन पाकिस्तानियों को भूल गए जो उसके साथ मारे गए।

    इन घटनाओं के सहारे कांग्रेसियों ने मोदी को ‘हिंदू खलनायक’ के रूप में भारत ही नहीं विदेशों में भी बदनाम किया। उनके खिलाफ अमेरिका में ऐसी लाॅबिंग की गई कि उन्हें वीसा दिए जाने पर ही रोक लग गई।

    ‘हिंदू आतंकवाद’ शब्दावली पहली बार भले ही 2002 में प्रयोग की गई, लेकिन इसे प्रचारित किया यूपीए सरकार के गृहमंत्री पी चिदंबरम ने जिन्होंने 2008 के मालेगांव ब्लास्ट के संदर्भ में अगस्त 2010 में हिंदु या भगवा आतंकवाद का जुमला उछाला। इस पर काफी बवाल मचा जिसके बाद तत्कालीन कांग्रेस महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने स्पष्टीकरण जारी किया। इसके बाद 2013 में आॅल इंडिया कांग्रेस कमेटी के सत्र में तत्कालीन गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने बयान दिया कि भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कैंपों में ‘हिंदू आतंकवाद’ का प्रशिक्षण दिया जाता है। यहां आपको विकीलीक्स के उस खुलासे की भी याद दिला दें जिसमें राहुल गांधी ने अमेरिकी राजदूत टिमोथी रोमर से कहा था कि भारत को पाकिस्तान से आने वाले इस्लामिक आतंकवाद से ज्यादा बड़ा खतरा देसी हिंदू आतंकवाद से है। रोमर जुलाई 2009 से अप्रैल 2011 तक भारत में अमेरिका के राजदूत रहे।

    राहुल, चिदंबरम और शिंदे कांग्रेस के शीर्षस्थ नेताओं में से हैं। यूपीए शासन में इनके शब्द पत्थर की लकीर समझे जाते थे। जाहिर है सरकारी महकमे और कांग्रेस नीत राज्य सरकारें इनकी सोच के हिसाब से ही काम करते थे और उसे अमली जामा पहनाने की कोशिश करते थे। क्या ये लोग सोनिया गांधी और उनके राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल की सहमति के बिना ‘हिंदू विरोधी’ राजनीति कर सकते थे? क्या इनकी सहमति के बिना विभिन्न आतंकवादी घटनाओं में पकड़े गए इस्लामिक संदिग्धों को छोड़ा जा सकता था? मालेगांव में 2008 से पहले सितंबर 2006 में भी धमाके हुए। एटीएस ने पहले तो इन धमाकों के लिए स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट आॅफ इंडिया (सिमी) के नौ लोगों को गिरफ्तार किया पर 2013 में चार्जशीट दाखिल करते समय हिंदूवादी संगठन अभिनव भारत को जिम्मेदार ठहरा दिया।
    इसके बाद 29 सितंबर 2008 को गुजरात के मोडासा और महाराष्ट्र के मालेगांव में एक साथ धमाके हुए। इस विषय में आगे बढ़ने से पहले बता दें कि सितंबर धमाकों से पहले इसी वर्ष जयपुर, बेंगलूरू, फरीदाबाद और अहमदाबाद में भी धमाके हुए। तत्कालीन सरकार ने बाकी के धमाकों की जांच को तो दरकिनार कर दिया पर मालेगांव धमाकों के आरोप में साध्वी प्रज्ञा ठाकुर, शिवनारायण सिंह कलसांगरा, और भंवरलाल साहू आदि को गिरफ्तार किया और इसे जोर शोर से ‘हिंदू आतंकवादी’ घटना के रूप में प्रचारित किया गया। सुधाकर चतुर्वेदी के बारे में हम पहले ही बता चुके हैं।

    इस से पहले फरवरी 2007 में भारत और पाकिस्तान के बीच चलने वाली समझौता एक्सप्रेस में धमाके हुए। एक अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट ने इसके लिए पाकिस्तानी नागरिक और लश्कर ए तौएबा के सदस्य आरिफ कसमानी को जिम्मेदार ठहराया और उसे संयुक्त राष्ट्र ने आतंकवादी भी घोषित किया। धमाकों के बाद एक संदिग्ध पाकिस्तानी को गिरफ्तार भी किया गया परंतु उसे 14 दिन के भीतर उसे छोड़ दिया गया। कांग्रेस सरकार ने इसके लिए एक बार फिर इस्लामिक आतंकवादियों को छोड़ कर अभिनव भारत को जिम्मेदार ठहराया और कर्नल पुरोहित का नाम भी उछाला गया जबकि चार्जशीट में उनका नाम तक नहीं था।
    जांच एजेंसियों ने इस मामले में सिमी नेता सफदर नागौरी, कमरूद्दीन नागौरी और आमिल परवेज पर नारको टेस्ट भी किए। इसमें एक शख्स अब्दुल रज्जाक का हाथ होने की बात सामने आई और ये भी साफ हुआ कि उसने इस विषय में सफदर नागौरी को बताया भी था। लेकिन सिमी और उनके पाकिस्तानी हैंडलर्स पर कार्रवाई करने की जगह कांगे्रस सरकार ने अपने ही देश के लोगों को ही इसके लिए बदनाम किया।

    बात अगर इन धमाकों तक ही रह जाती तब भी गनीमत थी। राहुल गांधी के राजनीतिक गुरू दिग्विजय सिंह ने तो नवंबर 2008 में मुंबई पर हुए आतंकवादी हमले के लिए भी आरएसएस को जिम्मेदार ठहरा दिया। एक पत्रकार अजीज बर्नी ने ‘26/11 – आरएसएस की साजिश’ नाम से किताब तक लिख डाली जिसका 6 दिसंबर 2010 को खुद दिग्विजय सिंह ने विमोचन किया। इस अवसर पर अन्य इस्लामिक कट्टरवादियों के साथ फिल्म निर्माता महेश भट्ट भी मौजूद थे। इस मौके पर दिग्विजय सिंह ने कहा कि हमले से दो घंटे पहले हेमंत करकरे ने उन्हें फोन करके कहा कि उन्हें मालेगांव मामले में जांच से खफा ‘हिंदू अतिवादियों’ से जान का खतरा है। ज्ञात हो कि इस हमले में करकरे मारा गया था। ये बात अलग है कि बाद में करकरे की पत्नी ने कहा कि दिग्विजय उसके पति की लाश पर राजनीति कर रहे हैं। खुफिया एजेंसियों के कुछ विशेषज्ञ तो यहां तक कहते हैं कि मुंबई हमले सत्तारूढ़ पार्टी की मिलीभगत से हुए। सभी हमलावरों ने हिंदू नामों के पहचान पत्र लिए हुए थे और मौली पहनी हुई थी। अगर कसाब जिंदा न पकड़ा जाता तो बड़ी आसानी से इसके लिए ‘हिंदुओं’ को जिम्मेदार ठहरा दिया जाता। बहरहाल ये वहीं दिग्विजय सिंह हैं जिन्हें दुर्दांत इस्लामिक आतंकवादी भी सम्मानीय नजर आते हैं। ये ओसामा बिन लादेन को ‘ओसामा जी’ और हाफिज सईद को ‘हाफिज साहब’ कहते हैं।

    देश में अनेक आतंकवादी घटनाओं के लिए जिम्मेदार सिमी पर 2008 में सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिबंध लगा दिया था। लेकिन ये अब भी दक्षिण भारतीय राज्यों में पाॅपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया (पीएफआई) के नाम से चल रही है। इस पर भारतीय मुस्लिम युवकों का बे्रनवाश कर आईएस भेजने के आरोप हैं। पर कांग्रेस इस मसले में चुप है। पीएफआई पर हिंदू लड़कियों का धर्मपरिवर्तन करवाने का आरोप है लेकिन कांग्रेसी नेता कपिल सिब्बल ऐसे मामलों में अदालत में पीएफआई की वकालत कर रहे हैं। धर्म के नाम पर घृणा फैलाने वाले जाकिर नायक को भी कांग्रेस सरकार ने पूरा बढ़ावा दिया जबकि अनेक देशों ने उस पर प्रतिबंध लगा दिया था। दिग्विजय सिंह ने तो उसे शांतिदूत करार दिया और उसकी हर तरह से मदद की। हाल हीे में एनआईए ने जाकिर नायक के खिलाफ चार्जशीट दायर की जिसमें उसके सारे आतंकी संपर्कों का कच्चा चिट्ठा दिया गया है। जब सरकार उसके खिलाफ कार्रवाई कर रही है तो उसे समर्थन और बढ़ावा देने वाले नेताओं को क्यों बख्शा जा रहा है?

    कश्मीर से केरल तक पाकिस्तानी आतंकियों और इस्टैबलिशमेंट के प्रति कांग्रेस की नरमी की यूं तो अनेक कहानियां हैं। लेकिन हाल ही में इस संबंध में कुछ और तथ्य सामने आए हैं जो वास्तव में सनसनीखेज हैं। एक न्यूज चैनल ने अपने खुलासे में बताया कि कांग्रेस के शीर्ष नेताओं ने बदनाम पाकिस्तानी बैंक – बैंक आॅफ क्रेडिट एंड काॅमर्स इंटरनेशनल (बीसीसीआई) के जरिए बोफोर्स सौदे के घूस की रकम को ठिकाने लगाया। आर्थिक अनियमितताओं के आरोप में जब इस बैंक की मुंबई ब्रांच को ताला लगाया गया तो इसके प्रमुख ने घूस देकर इसे फिर खुलवा लिया। देश-विेदेश में बदनामी के बाद इसे 1991 में बंद कर दिया गया। यहां समझने की बात ये है कि एक तरफ तो भारत और पाकिस्तान की कथित दुश्मनी थी, तो दूसरी तरफ कांग्रेस के प्रमुख नेता इस बैंक के जरिए घूस के पैसे को ठिकाने लगा रहे थे। क्या ये संवेदनशील जानकारियां इस बैंक के अधिकारियों ने पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों को नहीं दी हांगी?
    एक अन्य मामला हवाला व्यापारी मोइन कुरैशी का है। इसके पारिवारिक और व्यापारिक रिश्ते अनेक पाकिस्तानियों से हैं। भारत में ये प्रमुख कांग्रेसी नेताओं की नाक का बाल समझा जाता है। यूपीए सरकार के दौरान सीबीआई और ईडी जैसी जांच एजेंसियों में इसका दबदबा चलता था। ये मोटी रकम की एवज में मामले ‘रफा-दफा’ कराने का काम भी करता था। इस बात से कैसे इनकार किया जा सकता है कि कुरैशी देश की महत्वपूर्ण जानकारियां पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों को नहीं देता होगा?

    मामला चाहे आतंकवादी गतिविधियों का हो या मुस्लिम तुष्टिकरण का या संवेदनशील आर्थिक जानकारियों का, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कांग्रेस की गतिविधियों में पाकिस्तान का हाथ दिखाई देता है। ऐसे में बहुत संभव है भारत में हिंदुओं को आतंकवादी के रूप में बदनाम करने के पीछे भी पड़ोसी देश की कोई सोची समझी रणनीति हो जिसे कांग्रेस चाहे-अनचाहे अंजाम दे रही हो। हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी ने पी चिदंबरम पर कश्मीर मामले में पाकिस्तानी जुबान बोलने का आरोप लगाया। कोई तो कारण होगा जो उन्होंने इतना गंभीर आरोप लगाया। बहरहाल बहुत से मामले अभी अदालत में हैं और बहुत से फाइलों में दबे हैं। माले गांव से लेकर मोइन कुरैशी तक के उदाहरण बताते हैं कि जो दिखता है वो सत्य नहीं होता। लेकिन हम सत्य का अनुमान अवश्य लगा सकते हैं। आप भी स्वतंत्र हैं इस विषय में अपनी राय बनाने के लिए।( ये पुराना आलेख आपको पृष्ठभूमि समझने में मदद करेगा.हमने इसे पंजाब केसरी से साभार लिया है।).

  • कन्हैया के नाम पर क्यों बिचके कमलनाथ

    कन्हैया के नाम पर क्यों बिचके कमलनाथ

    मध्यप्रदेश की राजनीति पर अपना परचम फहराने की खींचतान इन दिनों भोपाल में साफ देखी जा रही है। मुख्यमंत्री कमलनाथ ने लोकसभा चुनावों में अपनी पार्टी को फतह दिलाने के लिए जिस तरह आनन फानन मे कर्जमाफी की औपचारिकताएं पूरी कीं वहीं वे कई मुद्दों पर अपनी सरकार का बचाव करते नजर आ रहे हैं। लोकसभा चुनावों के माध्यम से पार्टी पर कब्जा जमाने के षड़यंत्र को उन्होंने सफल नहीं होने दिया। उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष के अपने वीटो पावर का प्रयोग करके बेगुसराय से सीपीआई के उम्मीदवार कन्हैया कुमार को प्रचार के लिए बुलाने के दिग्विजय सिंह के प्रस्ताव को रद्दी की टोकरी में डाल दिया। इससे एक बात साफ हो गई है कांग्रेस दिग्विजय सिंह के साथ तो कम से कम नहीं है।

    दरअसल भोपाल सीट पर कांग्रेस के टिकिट से चुनाव लड़ रहे पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह जिस अंदाज में अपना प्रचार कर रहे हैं उससे वे खुद को पार्टी हाईकमान से भी ऊपर दिखाने की कोशिश करते दिख रहे हैं। पत्रकार अमृता राय से बुढ़ापे में शादी रचाने के बाद राघौगढ़ किले में उन्हें पारिवारिक कलह और विरोध का सामना करना पड़ा। उसके बाद उन्होंने राघौगढ़ सीट से चुनाव लड़ने का फैसला छोड़ दिया और भोपाल की ओर रुख किया था। इसे पार्टी का फैसला बताने के लिए उन्होंने कमलनाथ का सहारा लिया। मुख्यमंत्री कमलनाथ ने जब पत्रकारों से सार्वजनिक तौर पर कहा कि मैं दिग्विजय सिंह से अनुरोध करता हूं कि वे भोपाल से चुनाव लड़ें तो पत्रकारों ने मुख मुद्रा देखकर अनुमान लगाया कि उन्हें राजनीतिक दांव में फंसा दिया गया है। वे अपने चुनाव में जुटे रहेंगे तो प्रदेश की अन्य सीटों का माहौल भी नहीं बिगाड़ पाएंगे। हालिया विधानसभा चुनाव में स्वयं दिग्विजय सिंह ने स्वीकार किया था कि उनकी पार्टी ने उन्हें प्रचार करने से इसलिए रोक दिया है क्योंकि प्रचार करने से पार्टी के वोट कट जाते हैं। भोपाल राजनीतिक मूड के हिसाब से भाजपा का गढ़ माना जाता है। इस लोकसभा सीट पर पिछले तीस सालों से भाजपा का कब्जा है। कांग्रेस के दिग्गजों का भी मानना है कि पिछले विधानसभा चुनावों में इस क्षेत्र में मतदाताओं का जो रुझान पाया गया उसके बीच दिग्विजय सिंह तो ठीक कांग्रेस के किसी भी प्रत्याशी का जीतना भी मुश्किल है।

    हालांकि दिग्विजय सिंह ने इसे चुनौती के रूप में इसलिए स्वीकार किया क्योंकि वे अपने जीवन की राजनीतिक पारी खेल चुके हैं। वे अपनी विरासत अपने बेटे जयवर्धन सिंह को भी सौंप चुके हैं। ऐसे में जीत उनके लिए कोई मायने नहीं रखती बल्कि वे सिर्फ अपनी धूल धूसरित साख को पुनर्जीवित करना चाहते हैं कम से कम इस लक्ष्य में तो वे बहुत हद तक सफल भी हुए हैं। अब वे चुनाव हार भी जाएं तो कम से कम उन्होंने अपनी कुछ जय जयकार तो करवा ही ली।

    इस हारी हुई बाजी के पर्दे के पीछे जो लक्ष्य दिग्विजय सिंह का था उसे पाने में वे पूरी तरह सफल रहे हैं। चुनाव की जीत का ख्वाब उनके लिए सिर्फ उपोत्पाद(बाईप्रोडक्ट) है।उन्होंने कमलनाथ सरकार में अपने बेटे को नगरीय प्रशासन मंत्री पहले ही बनवा लिया था। अब वे भोपाल में अपने उस कारोबार का दोहन करना चाह रहे हैं जो उन्होंने शिवराज सिंह चौहान की सरकार में अपने चहेते अफसरों और ठेकेदारों के माध्यम से फैलाया था। ठेकेदारों अफसरों के एक गिरोह के माध्यम से वे मध्यप्रदेश के उन सभी ठेकों में अपनी भागीदारी करते रहे हैं जो जरूरी बजट से पांच गुना पूर्वाकलन(इस्टीमेट) पर दिए जाते रहे हैं। इसमें सड़कों,पुलों, बिजलीघरों, बांध जैसी आधारभूत संरचनाओं का निर्माण प्रमुख रहा है। उन सभी ठेकों में दिग्विजय सिंह अपने चहेते अफसरों के माध्यम से चहेते ठेकेदारों को उपकृत कराते रहे हैं। उन ठेकों में अपने समर्थकों का धन निवेश कराते रहे हैं। इसीलिए उन्होंने भोपाल विजन नाम से एक दस्तावेज भी चुनावी मैदान में फेंका जिससे वे खुद को षड़यंत्रकारी आतंकवादी कहलाए जाने के आरोपों से बचने की जुगत करते दिखने लगे हैं।

    जनता ने जब 2003 में दिग्विजय सिंह को अपदस्थ करके उमा भारती को मध्यप्रदेश की कुर्सी सौंपी थी तब ये माना जा रहा था कि दि्ग्विजय सिंह की जेल यात्रा सुनिश्चित है। उस दौरान भाजपा ने श्वेतपत्र जारी किया था और लूटो भागो नाम से एक पुस्तिका भी प्रकाशित की थी जिसमें दिग्विजय सिंह सरकार के लूट भरे वित्तीय प्रबंधन और भ्रष्टाचारों की पोल खोली गई थी। जाहिर था जनादेश दिग्विजय सिंह को जेल भेजने का था। समय की नजाकत भांपकर दिग्विजय सिंह ने अपने छोटे भाई लक्ष्मण सिंह को भाजपा में भेजकर खुद को जेल जाने से बचा लिया। उनके माध्यम से शिवराज सिंह सरकार से तालमेल भी बिठा लिया। इसके साथ साथ सरकार की आड़ में चलने वाले कारोबारों में भी घुसपैठ जमा ली।

    यह घुसपैठ कुछ इसी तरह थी जैसे अंग्रेजों ने भारत छोड़ते समय सभी मुनाफे के कारोबारों में अपना शेयर डाल दिया था। वे भारत तो छोड़ गए लेकिन इन छद्म बहुराष्ट्रीय कंपनियों के माध्यम से सभी मुनाफे के धंधों से चांदी काटते रहे। यही नहीं उन्होंने बैंकों के सरकारीकरण का लाभ उठाते हुए स्थानीय चेहरों के नाम पर भारी कर्ज भी प्राप्त किया और इन छद्म उद्योगपतियों को डिफाल्टर बनाकर उन्हें ब्रिटेन में बसा दिया। भारत से प्रतिभा पलायन के साथ साथ पूंजी का ये पलायन देश को गरीब बनाए रखने की सबसे बड़ी वजह बन गई है। यही वजह है कि इस आमचुनाव में राष्ट्रवाद का मुद्दा पूरी तरह परवान चढ़ा है।मोदी इसी के सहारे स्थानीय नेत्तृव की असफलताओं को लांघकर सीधे मतदाता तक पहुंच गए हैं।इसने दिग्विजय सिंह के षड़यंत्र को भी धूल चटा दी है,क्योंकि मतदाता अब सीधे मोदी के नाम पर मतदान कर रहे हैं।

    इस षड़यंत्र के माध्यम से दिग्विजय सिंह ने अपने सभी सहयोगियों को भी भाजपा में एडजस्ट करा लिया था। हालत ये हो गई थी कि भाजपा के लिए रात दिन काम करने वाले कार्यकर्ताओं को तो किनारे कर दिया गया पर उनके चेले चपाटे सरकार पर हावी हो गए। भाजपा संगठन के बीच बार बार ये आवाजें उठती रहीं कि अफसरशाही उनकी बात नहीं सुन रही है पर शिवराज सिंह चौहान ने उन आवाजों को अनसुना कर दिया था. स्थिति यहां तक पहुंच गई कि पंद्रह सालों में जो भाजपा अजेय मानी जाती थी वो छिन् भिन्न हो गई। शिवराज सिंह चौहान की इसी शासनशैली का खमियाजा भाजपा को उठाना पड़ा है और पार्टी के तमाम सहयोग के बावजूद पार्टी जीत की देहरी पर जाकर भी सत्ता से वंचित रह गई।

    अब जबकि कांग्रेस राज्य की सत्ता पर काबिज हो गई है, भले ही उसकी लंगड़ी सरकार अल्पमत की है ऐसे में कमलनाथ अपनी सत्ता खोना नहीं चाहते। दिग्विजय सिंह ने उनसे बगैर पूछे सीपीआई की बैठक में जाकर ये घोषणा कर दी कि कन्हैया कुमार उनका प्रचार करने भोपाल आएंगे। उन्होंने इससे आगे बढ़कर ये भी कह दिया कि वे कन्हैया कुमार के प्रशंसक हैं।ऐसे में कांग्रेस के सभी रणनीतिकार भौंचक्के रह गए। प्रदेश अध्यक्ष के रूप में कमलनाथ ने अचकचाकर दिग्विजय सिंह को बुलाया और कहा कि कन्हैया कुमार को लाकर आप कांग्रेस का जनाजा क्यों निकालना चाहते हैं। हम इसकी अनुमति नहीं देंगे। आप इस फैसले पर फिर विचार करें और कन्हैया कुमार को भोपाल न आने के लिए कहें। तब तक पार्टी के भीतर और विरोधी खेमें में भी विरोध शुरु हो गया था। सोशल मीडिया पर तो कहा जाने लगा था कि कन्हैया कुमार भोपाल से पिटे बगैर नहीं जाएगा। उसे मालूम पड़ जाएगा कि देश टुकड़े टुकड़े गेंग को पसंद नहीं करता।

    कांग्रेस के रणनीतिकारों ने भी दिग्विजय सिंह को सलाह दी कि वे सीपीआई के किसी भी नेता को बुला लें पर कन्हैया कुमार को न बुलाएं। इससे उनकी विरोधी भाजपा जिस राष्ट्रवाद के मुद्दे पर चुनाव लड़ रही है वह आसानी से काग्रेस पर देशद्रोहियों से हाथ मिलाने का आरोप साबित कर देगी। नतीजतन दिग्विजय सिंह को अपना कदम वापस खींचना पड़ा और सीताराम येचुरी की सभा से संतोष करना पड़ा। हालांकि सीताराम येचुरी ने भी भोपाल आकर दूसरा बखेड़ा खड़ा कर दिया। उन्होंने कहा कि साध्वी प्रज्ञा कहती हैं कि हिंदू आतंकवादी नहीं होता जबकि भारत का इतिहास लड़ाईयों से भरा पड़ा है। रामायण और महाभारत भी हिंसा के उदाहरणों से भरे हुए हैं। आरोप लगाने के अतिरेक में वे ये भूल गए कि युद्ध और आतंकवाद दो अलग अलग चीजें होती हैं।

    जबसे दिग्विजय सिंह के भोपाल से लड़ने की घोषणा हुई है तबसे कई राजनीतिक विश्लेषक कहते रहे हैं कि ये फैसला भोपाल के साथ साथ कांग्रेस के लिए प्रदेश की सभी 29 सीटों के लिए हार की बड़ी वजह बनेगा। ये होता दिख रहा है। साध्वी प्रज्ञा पर आतंकवाद में शामिल होने का आरोप एनआईए कोर्ट में झूठा साबित हो चुका है। ऐसे में दिग्विजय सिंह को एक निरपराध महिला को झूठा फंसाने और भगवा आतंकवाद के नाम पर हिंदुओं को कलंकित करने का आरोप जनता के बीच गंभीरता से लिया जाने लगा है। इससे साफ है कि 23 मई को आने वाले नतीजों में कांग्रेस को जनमत की उपेक्षा करने का खमियाजा चुकाने के लिए तैयार रहना होगा।