बिहार में नीतीश कुमार भाजपा को पानी पिला रहे हैं या नाकों लौहे के चने चबवा रहे या या फिर हमेशा की तरह ब्लैकमेल कर अपनी बात मनवा रहे हैं, यह आप तय कर लें। पलटूराम बन कर राजद में जाकर वहां मुख्यमंत्री बनने और फिर वापस आकर भाजपा के साथ मुख्यमंत्री बनने अथवा बहुत कम बहुमत के बाद भी मुख्यमंत्री बने रहे के पीछे भाजपा के चुनाव पूर्व कमिटमेंट से ज्यादा ब्लैकमेल की भूमिका थी। यह अब साफ हो रहा है। अपने को राजनीति का चाणक्य समझनेवाली भाजपा को एक बार फिर पटखनी देने को भाजपा तैयार है। बेहद बीमार लग रहे नीतीश कुमार ने बिहार चुनाव के समय स्वस्थ्य आदमी से ज्यादा सक्रियता बताकर सबको गलत साबित कर दिया था। चुनाव बाद वे फिर बीमार लगने लगे और तीन माह बाद ही राज्यसभा जाने को तैयार हो गए। मुख्यमंत्री भाजपा का होगा यह भी भाजपा को लगा और प्रचारित कर दिया। भाजपा कोटे के उपमुख्यमंत्री चौधरी को उनका उनका उत्तराधिकारी बताया जाने लगा। नीतीश कुमार भी इस और इशारे करते रहे। पर चालक नीतीश कुमार ने अपने मुंह से कभी नहीं कहा कि वे मुख्यमंत्री पद से कब इस्तीफा देंगे या उनका उत्तराधिकारी कौन होगा। हां जदयू पार्टी में प्रचार कर अपने पुत्र के लिये मांग उठवा दी और पार्टी की सदस्यता दिलवा दी। नीतीश कुमार की चालाकी देखिये उन्होंने आज तक अपने बेटे की राजनीति के बारे में कुछ नहीं कहा न ही अपने राजनीतिक उत्तराधिकारी के बारे में कहा। यह पहले ही बता चुके हैं कि मुख्यमंत्री पद पर उनका उत्तराधिकारी कौन होगा यह भी नहीं कहा। राज्यसभा के चुनाव हुए तो नीतीश के साथ राजद के एक और सदस्य का नाम चुना। भाजपा ने भी अपने बिहार भाजपा अध्यक्ष के साथ एक और नाम चुना। पांच स्थान थे जबकि जदयू और भाजपा चार ही सफलतापूर्वक चुनवा सकते थे। तब भाजपा ने एनडीए के सहयोगी दल के कुशवाह के नाम को आगे बढ़ाया। चूंकि कुशवाह का चयन भाजपा ने किया था तो जितवाने की जिम्मेदारी भी भाजपा की थी इसलिए नीतीश कुमार चुप्पी साधे रहे। बिहार में विधायकों की खरीद फरोख्त आम बात है और विपक्षी राजद ने एक धनकुबेर को खड़ा किया जो जीत के पैसा लुटाने को तैयार था। राजद को अपने विधायकों के साथ छह कांग्रेस, एक बसपा, पांच मुस्लिम पार्टी के विधायक सहमत करने थे वो उसने किया और जीत के लिए 41 वोट का इंतजाम कर लिया। भाजपा ने पहले खरीद फरोख्त और बागियों का इंतजाम किया। उसने अपने एक चयनीत प्रत्याशी को पीछे कर पांचवां प्रत्याशी बनाया। चौथा स्थान सहयोगी पार्टी के कुशवाह को दिया। फिर चारों को 41 से ज्यादा वोट आवंटित किये। इसमें सावधानी बरती कि बगावत तो भी चारों जीत जाएं। फिर अपने पांचवे प्रत्याशी का ध्यान किया और कहा कि सभी विधायक दूसरी वरियता का वोट सिर्फ और सिर्फ पांचवे प्रत्याशी को दें। उसके आगे की वरियताओं का इस्तेमाल नहीं करें। राज्यसभा चुनाव कहने को गोपनीय होता है पर वोट देनेवाले को अपनी पार्टी के ऐजेंट को इस तरह से बताना होता है कि एजेंट के अलावा कोई और न देख ले। यही कारण है कि मतदान खत्म होते ही पार्टियां बता देती है कि उनका कौन बागी हुआ और किसको वोट दिया। इसके अलावा भाजपा ने आपरेशन कमल चलाया। नतीजा यह निकला कि कांग्रेस के तीन और राजद का एक विधायक वोट डालने ही नहीं आए। बाकी का मतदान अपेक्षा अनुसार हुआ। गणना में 41 के अतिरिक्त वोट स्वतः ही भाजपा के पांचवे उम्मीदवार के खाते में आ गए। चार अनुपस्थियों के कारण राजद के उम्मीदवार के 37 वोट रह गए। और भाजपा के उम्मीदवार को 30 वोट मिले। पर दूसरी वरियता के वोटों के मूल्यांकन और अतिरिक्त वोटों को मिलाकर भाजपा के पांचवे उम्मीदवार के 38 वोट माने गए और वह जीत गया। इस प्रकार से भाजपा नीतीश कुमार सहित एनडीए के पांचों उम्मीदवार जितवा लाई। सारी लंबी कहानी देर से ही सही संदर्भ के लिए बताने का कारण यह है कि इस घटनाक्रम ने नीतीश कुमार को चौंका दिया। जो नीतीश कुमार राज्यसभा के नामांकन के समय अस्वस्थ दिख रहे थे वह फिर स्वस्थ दिखने लगे और उत्साह के साथ बिहार में समृद्धि यात्रा में लग गए। लोग अटकलें लगाते रहे कि नीतीश विधान परिषद और मुख्यमंत्री पद से कब इस्तीफा देंगे। अगला मुख्यमंत्री जदयू से होगा या भाजपा से। किसी का भी बने पर होगा कौन। इन सवालों पर सब चुप्पी साधे रहे। हमने आपको काफी पहले बताया था कि एक तय समय सीमा के बाद कोई भी व्यक्ति दो सदनों का सदस्य नहीं रह सकता। वह समय सीमा में इस्तीफा न दे तो नया निर्वाचन निरस्त हो जाता है। यह भी कहा था कि बिना किसी सदन का सदस्य बने कोई भी व्यक्ति छह माह तक मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री रह सकता है। बस उसे संबंधित सदन में अपना बहुमत साबित करना होता है। बहुमत न हो तो निर्वाचित सदस्य भी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री नहीं रह सकता है। काफी बहस के बाद राजनीतिक समीक्षकों और विशेषज्ञों ने समय सीमा 14 दिन बताई। तब कहा गया कि 30 मार्च या उससे पहले नीतीश कुमार विधानपरिषद से इस्तीफा दे देंगे ताकि राज्यसभा की सदस्यता बच जाए। दिलचस्प बात यही है कि इस पर भी नीतीश कुमार चुप रहे। अब राजनीतिक समीक्षक बता रहे हैं कि राज्यसभा निर्वाचन के परिणामों गजट नोटिफिकेशन की तिथि से 14 दिन गिने जाएंगे। अभी तक राज्यसभा निर्वाचन परिणामों का गजट नोटिफिकेशन नहीं हुआ है। इस पर बहस जारी है। इसमें स्वयं नीतीश कुमार के केन्द्रीय रेलमंत्री से इस्तीफा देकर बिहार के मुख्यमंत्री बनने का उदाहरण दिया जा रहा है। जिनका अंतर 14 दिन से ज्यादा था। अजित जोगी के छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री बनने का भी उदाहरण दे रहे हैं क्योंकि मुख्यमंत्री बनते समय जोगी मध्यप्रदेश विधानसभा के सदस्य थे। बाद में छत्तीसगढ़ विधानसभा के सदस्य बने इसमें भी समयावधि ज्यादा थी। इस मामले में अटलजी की 13 दिन की सरकार एक वोट से गिरने का उदाहरण याद करें जब सरकार एक राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री के वोट से गिरी थी क्योंकि उस दिन वह लोकसभा के सदस्य भी थे। फिर बिहार पर लौटें और कहा जा रहा है कि नीतीश कुमार 30 मार्च को इस्तीफा नहीं देंगे। वहीं जानकार सूत्रों के हवाले से कहा जा रहा है कि जब भी नीतीश कुमार इस्तीफा देंगे तब देंगे पर अभी वह तीन माह और मुख्यमंत्री रहने की इच्छा भाजपा को बता रहे हैं। राज्यसभा चुनाव की रणनीति से नीतीश कुमार के सतर्क होने को भाजपा ने गंभीरता से लिया था और कभी भी यह नहीं कहा कि अगर भाजपा का मुख्यमंत्री बना तो कौन होगा। यही कहा गया कि जो भी होगा उस पर नीतीश कुमार की सहमति रहेगी। इसलिए बस अटकलें चलती रहीं। अब फिर पूछा जा रहा है कि क्या भाजपा नीतीश कुमार के तीन बार और मुख्यमंत्री चाहने की बात मान ले। अब हम पूछना चाहते हैं कि तीन माह बाद वह तीन माह और मांग लेंगे तब भाजपा क्या करेगी। उसे मानने के बाद यानि छह माह बाद राजनीतिक परिदृश्य क्या बनेगा यह कौन बता सकता है। वैसे भी जदयू की मुख्यमंत्री या भाजपा और जदयू के ढ़ाई ढ़ाई साल के मुख्यमंत्री की भी तो चर्चा उठती रही है। भाजपा जानती है कि बिहार में बगैर नीतीश कुमार की कृपादृष्टि के उसका मुख्यमंत्री नहीं बन सकता है। इसलिए क्या वह नीतीश कुमार की कथित सहमति यानि ब्लेकमेल के लिए अभिशप्त है।
भोपाल,23 फरवरी(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता यश भारतीय ने राज्यसभा सदस्य एवं संसद की शिक्षा समिति (भारत सरकार) के अध्यक्ष, दिग्विजय सिंह से भेंट करके कहा है कि राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान (एनआईओएस), से जुड़े शिक्षा माफिया ने यहां डिग्रियां बेचने का गोरखधंधा चला रखा है। इससे मेहनती विद्यार्थियों के अवसर छिन रहे हैं। उन्होंने ज्ञापन में कहा कि NIOS सीधे शिक्षा मंत्रालय (MHRD) के अधीन कार्य करता है, इसके बावजूद 2017 में सीहोर, रतलाम और उमरिया में 1,200 अनुपस्थित छात्रों को पास घोषित करने जैसा बड़ा घोटाला हुआ। CBI चार्जशीट के अनुसार, साक्ष्य मिटाने के लिए उत्तर पुस्तिकाएं तक जला दी गईं। ज्ञापन में कहा गया है कि मध्य प्रदेश के कई जिलों में बाहरी राज्यों के छात्रों से 25,000 से 30,000 रुपये लेकर “गारंटी पास” का खेल चल रहा है। शिक्षा मंत्रालय के इस संस्थान का क्षेत्रीय कार्यालय भोपाल में होने के बावजूद, कोविड के बाद से यहाँ ‘ऑन डिमांड एग्जाम’ (ODES) केंद्र बंद कर दिया गया है। इसे पुनः प्रारंभ न करना छात्रों के साथ अन्याय है ।उनका कहना है कि NIOS के अध्ययन केंद्रों का वर्षों से भुगतान लंबित है। ये केंद्र ही ड्रॉप-आउट छात्रों की काउंसलिंग और नियमित कक्षाओं का आधार हैं। भुगतान न होने से गरीब और पिछड़े छात्रों की शिक्षा बाधित हो रही है। उनके मुताबिक NIOS ने सुप्रीम कोर्ट में तर्क दिया था कि अध्ययन केंद्रों के माध्यम से नियमित कक्षाएं और प्रायोगिक कार्य कराए जाते हैं, इसी आधार पर इसके सर्टिफिकेट फार्मेसी और नर्सिंग काउंसिल में मान्य हैं। लेकिन वर्तमान अव्यवस्था इस साख को खत्म कर रही है। संसद की शिक्षा समिति के अध्यक्ष के रूप में दिग्विजय सिंह जी से हस्तक्षेप की मांग करते हुए कहा गया है कि मध्य प्रदेश में पिछले 5 वर्षों के NIOS परिणामों का निष्पक्ष ‘थर्ड पार्टी ऑडिट’ कराया जाए। शिक्षा मंत्रालय के स्तर पर उन अधिकारियों को चिन्हित किया जाए जो भ्रष्टाचार को संरक्षण दे रहे हैं। भोपाल में ‘ऑन डिमांड एग्जाम’ केंद्र तत्काल प्रभाव से पुनः प्रारंभ किया जाए। अध्ययन केंद्रों का बकाया भुगतान तुरंत जारी कर शिक्षा व्यवस्था सुचारू की जाए।
भोपाल चेंबर आफ कामर्स एंड इंडस्ट्रीज के चुनावों में जिस तरह कार्पोरेट जगत से जुड़े धन्नासेठों का बोलबाला दिखा और पच्चीस हजार व्यापारियों के बीच महज बाईस सौ व्यापारियों के बीच ये चुनाव कराए गए उसे देखकर कहा जा सकता है कि एक छोटी सी संस्था को भोपाल के व्यापार जगत की शीर्ष संस्था बनाने की कोशिश की जा रही है। सबसे बड़ी बात तो ये है कि सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी से जुड़े व्यापारियों ने अपना कोई प्रत्याशी मैदान में नहीं उतारा था। प्रगतिशील पैनल के अध्यक्ष पद के प्रत्याशी तेजकुल पाल सिंह पाली हों या उनके प्रतिद्वंदी उन्नति पैनल के गोविंद गोयल दोनों पूर्व में कांग्रेस से जुड़कर राजनीति करते रहे हैं। ये बात अलग है कि चुनाव जीतने के बाद गोविंद गोयल अपने समर्थकों के साथ भाजपा कार्यालय पहुंचे और मीडिया प्रभारी आशीष अग्रवाल से भेंट करके शुभकामनाएं प्राप्त कीं। दरअसल ये जताने की कोशिश है कि भोपाल के व्यापारी सरकार के साथ खड़े हैं।प्रगतिशील पैनल के उपाध्यक्ष पद पर निर्वाचित कमल पंजवानी बरसों से गोविंद गोयल के ही साथी रहे हैं। व्यापारियों की आवाज ने उन्हें प्रगतिशील पैनल में भेज दिया। अब चेंबर में जो नया नेतृत्व उभरा है वह मौजूदा समस्याओं पर लगभग एकराय है। जो भाजपा के लिए खतरे की घंटी बनने जा रहा है।
कमल पंजवानीःप्रगतिशील पैनल के व्यापारियों की विचार प्रक्रिया को आगे ले जाने का दारोमदार
भोपाल में लगभग पच्चीस हजार व्यापारी हैं जिनके कारोबार को बड़ा कहा जा सकता है और जो जीएसटी भी जमा करते हैं।जबकि चुनाव में मत डालने पहुंचे ज्यादातर छोटे व्यापारी थे और उनमें भी जीएसटी भरने वालों की संख्या तो बहुत कम है।जिस तरह व्यापार जगत में इन दिनों आनलाईन कारोबार ने दस्तक दी है और स्थानीय कारोबारी परेशानी महसूस कर रहे हैं उन हालात में व्यापारी यदि कांग्रेस से दूरी रखते हैं तो वे भाजपा मे भी बैचेनी ही महसूस कर रहे हैं। भाजपा ने व्यापारियों की समस्याओं के समाधान के लिए कोई विशेष प्रयास नहीं किए हैं। जीएसटी और अन्य तरह की दस्तावेजी जरूरतों ने व्यापार करना बहुत कठिन बना दिया है. जाहिर है कि ये स्थिति भोपाल चेंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज के एक चुनाव तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके भीतर भारतीय राजनीति, व्यापारिक वर्ग और बदलते वैश्विक आर्थिक परिदृश्य के बीच के जटिल संबंध छिपे हैं। लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी को ‘बनियों की पार्टी’ या व्यापार-उद्योग समर्थक दल के रूप में देखा जाता रहा है। ऐसे में भोपाल जैसे प्रमुख व्यापारिक केंद्र में चेंबर के अध्यक्ष पद पर भाजपा से जुड़े किसी भी प्रत्याशी का न होना कई तरह के सवाल खड़े करता है।
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि चेंबर ऑफ कॉमर्स जैसे संगठनों के चुनाव औपचारिक रूप से गैर-राजनीतिक माने जाते हैं, लेकिन व्यवहार में उनका सीधा रिश्ता सत्ता, नीतियों और राजनीतिक दलों से रहता है। व्यापारिक समुदाय अक्सर उसी दल या विचारधारा के करीब खड़ा दिखता है, जिसे वह अपने हितों के लिए अधिक अनुकूल मानता है। भाजपा को दशकों तक यही लाभ मिलता रहा। उदारीकरण के बाद, जीएसटी, कॉर्पोरेट टैक्स में कटौती, इंफ्रास्ट्रक्चर पर जोर जैसी नीतियों ने इस धारणा को और मजबूत किया कि भाजपा व्यापार के स्वाभाविक साथी के रूप में खड़ी है। ऐसे में भोपाल चेंबर के चुनावों में भाजपा पृष्ठभूमि वाले किसी चेहरे का आगे न आना या न उभर पाना एक सामान्य घटना नहीं कही जा सकती।
यह स्थिति व्यापार जगत में हो रहे उन बदलावों की ओर इशारा करती है, जिन पर शायद भाजपा का सीधा संवाद कमजोर पड़ा है। छोटे और मध्यम व्यापारियों का एक बड़ा वर्ग बीते कुछ वर्षों में असहजता महसूस करता रहा है—चाहे वह जीएसटी की जटिलताएं हों, अनुपालन का बोझ हो, ऑनलाइन और कॉर्पोरेट व्यापार से बढ़ती प्रतिस्पर्धा हो या फिर नोटबंदी के बाद नकदी आधारित कारोबार पर पड़े दीर्घकालिक प्रभाव। बड़े उद्योग समूहों और कॉर्पोरेट सेक्टर के लिए नीतियां अपेक्षाकृत अनुकूल रहीं, लेकिन परंपरागत व्यापारिक वर्ग, जिसे कभी भाजपा का सबसे पक्का आधार माना जाता था, स्वयं को हाशिये पर महसूस करने लगा है। भोपाल चेंबर का चुनाव इसी असंतोष का एक स्थानीय प्रतिबिंब भी हो सकता है।
दूसरी ओर, वैश्विक बाजार में चल रही उथल-पुथल—चीन-अमेरिका तनाव, आपूर्ति श्रृंखला में बदलाव, युद्धों और भू-राजनीतिक संघर्षों का असर, तकनीकी परिवर्तन—भारतीय व्यापार जगत की मानसिकता को भी बदल रहा है। आज व्यापारी केवल स्थानीय या राष्ट्रीय नीतियों तक सीमित नहीं सोच रहा, वह वैश्विक प्रतिस्पर्धा, निर्यात-आयात, डिजिटल अर्थव्यवस्था और नई पीढ़ी के उपभोक्ताओं को ध्यान में रखकर अपनी रणनीति बना रहा है। ऐसे में राजनीतिक दलों से उसकी अपेक्षाएं भी बदली हैं। वह केवल कर रियायत या संरक्षण नहीं, बल्कि स्पष्ट दीर्घकालिक दृष्टि, सरल नियम और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा के लिए सक्षम वातावरण चाहता है।
यहां सवाल उठता है कि क्या भाजपा के भीतर इन बदलावों को लेकर पर्याप्त चिंतन चल रहा है, या पार्टी अब भी पुराने ‘व्यापार समर्थक’ टैग पर ही संतुष्ट है। पार्टी की नीति-निर्माण प्रक्रिया में अर्थशास्त्री, कॉर्पोरेट सलाहकार और बड़े उद्योग समूहों की आवाज तो सुनाई देती है, लेकिन जमीनी व्यापारिक संगठनों, मंडियों, छोटे उद्योगों और चेंबरों की बदलती सोच को समझने का प्रयास अपेक्षाकृत कमजोर दिखता है। भोपाल चेंबर का चुनाव इस दूरी को उजागर करता है—जहां व्यापारिक समुदाय ने संभवतः किसी राजनीतिक पहचान से अलग हटकर अपने आंतरिक समीकरणों और प्राथमिकताओं के आधार पर नेतृत्व चुना।
यह मौन भी गौर करने लायक है। भाजपा या उसके स्थानीय नेतृत्व की ओर से इस तरह के संकेतों पर सार्वजनिक आत्ममंथन कम ही दिखाई देता है। जबकि एक ऐसे दौर में, जब वैश्विक अर्थव्यवस्था अनिश्चितता से घिरी हो, राजनीतिक दलों का व्यापारिक वर्ग से संवाद और भरोसा बनाए रखना बेहद जरूरी है। यदि भाजपा सचमुच स्वयं को व्यापार और उद्योग की पार्टी मानती है, तो उसे केवल नीतिगत घोषणाओं से आगे बढ़कर व्यापारिक संगठनों के भीतर उभर रहे नए नेतृत्व, नई चिंताओं और नई अपेक्षाओं को समझना होगा।
अंततः, भोपाल चेंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज के चुनाव में भाजपा से जुड़ा कोई अध्यक्ष प्रत्याशी न होना एक घटना भर नहीं, बल्कि एक संकेत है। यह संकेत है कि व्यापार जगत एक संक्रमण के दौर से गुजर रहा है और उसकी राजनीति से अपेक्षाएं बदल रही हैं। यदि भाजपा इन बदलावों को समय रहते पढ़ने और उन पर गंभीर मंथन करने में सफल होती है, तो वह अपने पुराने आधार को नए संदर्भ में फिर से जोड़ सकती है। अन्यथा, ‘बनियों की पार्टी’ की छवि केवल एक पुरानी राजनीतिक स्मृति बनकर रह जाने का खतरा भी नकारा नहीं जा सकता।
भोपाल,15 दिसंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश मीडिया प्रभारी आशीष अग्रवाल आज अचानक प्रेस इंफार्मेशन सेंटर के दफ्तर पहुंचे। उन्होंने यहां जनसंवेदना कल्याण फाउंडेशन के संस्थापक अध्यक्ष श्री राधेश्याम अग्रवाल के 80वें जन्मदिवस के मौके पर उन्हें बधाई दी।
इस अवसर पर प्रेस इंफार्मेशन सेंटर के अध्यक्ष आलोक सिंघई, पत्रकार उदयभानु सिंह, और जय जनतंत्र सागर के संपादक डाक्टर रवीन्द्र सिलाकारी ने भी श्री अग्रवाल को जन्मदिन की शुभकामनाएं दीं। श्री आशीष अग्रवाल ने राधेश्याम जी को शाल और पुष्पगुच्छ भेंट कर उनके दीर्घायु जीवन की कामना की। उन्होंने श्री अग्रवाल से केक कटवाकर जन्मदिन उल्लास पूर्वक मनाया।
भाजपा नेता आशीष अग्रवाल ने कहा कि “श्री राधेश्याम जी का जीवन मानव सेवा, संवेदना और निस्वार्थ समाजसेवा का जीवंत उदाहरण है। जनसंवेदना संस्था ने पिछले दो दशकों से निराश्रित और लावारिस व्यक्तियों के अंतिम संस्कार का जो कार्य किया वह समाज के लिए प्रेरणा देने वाला है।”
इस अवसर पर जनसंवेदना परिवार के सदस्यों एवं शुभचिंतकों ने भी भावपूर्ण वातावरण में जन्मदिवस मनाया और सेवा संकल्प को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया।
भोपाल,18 दिसंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर) मुख्यमंत्री डाक्टर मोहन यादव ने राज्य की प्रति व्यक्ति आय बढ़ाकर बाईस लाख पचास हजार रुपए करने का रोडमैप प्रस्तुत किया है। विधानसभा के एक दिवसीय विशेष सत्र में धारा प्रवाह उद्बोधन के बीच उन्होंने अपने आंकड़ों से कर्ज के लिए आलोचना करने वाले विपक्ष के आरोपों का तथ्यात्मक जवाब भी दिया।उन्होंने कहा कि हम सभी प्रदेश की विकास यात्रा में सहभागी बन सकें इसके लिए ही विधानसभा अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर के प्रयासों से ये विशेष सत्र आहूत किया गया है। उन्होंने प्रदेश के हर नागरिक से इस यात्रा में बढ़ चढ़कर भागीदारी करने का आव्हान भी किया। विकास यात्रा की इस मैराथन चर्चा का जवाब देते हुए उन्होंने सदन में कहा कि जब हम आपसे विजन डॉक्यूमेंट 2047 की बात कर रहे हैं तो यह विजन डॉक्यूमेंट कोई कागज का टुकड़ा नहीं है ,यह हमारा व्यक्तिगत संकल्प भी है। ये मानकर चलिए 2047 तक मध्यप्रदेश का युवा, महिला सभी वर्गों का इस प्रकार का माहौल बनेगा कि हमारे युवा और महिला नेतृत्व नौकरी देने वाले बनें । उन्हें नौकरी मांगने की जरूरत न पड़े। हम इस प्रकार के संकल्प से आगे बढ़ रहे हैं। मध्यप्रदेश 2047 का विजन डॉक्यूमेंट्स राज्य को आर्थिक रूप से सशक्त, सांस्कृतिक रूप से समृद्ध और नागरिक जीवन की गुणवत्ता को उच्चतम स्तर तक ले जाने के लिए संकल्पबद्ध हैं। यह हमारा सबका संकल्प है। उन्होंने कहा कि हम अपनी इस सरकार के गठन से 2 वर्षों में लगभग 14-15 परसेंट की ग्रोथ रेट से आगे बढ़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि लोग अक्सर कर्ज को लेकर चिंता व्यक्त करते रहते हैं। कहते हैं कि सरकार ने फिर कर्जा ले लिया, कर्जा हो गया, बजट से ज्यादा कर्जा हो गया। आंकडों पर हिसाब लगाएं तो एक साल के अंदर लगभग हमने 82 हजार करोड़ लिया है । हमारा बजट 4 लाख, 21 हजार करोड़ का था । कर्ज में वो राशि भी शामिल है जो पिछली सरकारों ने विकास पर खर्च की है। हमें तो उसका ब्याज और मूलधन भी चुकाना है। सरकारें तो बनती बिगड़ती हैं पर हमारी लायबिलिटी तो हमें चुकाना पड़ेगी। हमारे कर्ज में से हमने तीस हजार करोड़ तो मूलधन दिया है। अगर 4 लाख, 21 हजार में से 82 हजार घटा दें तो यह बचा हुआ साढ़े तीन लाख करोड़ कहां से आया। जाहिर है ये हमारी कमाई है। यह हमारी सरकार की नेक नियत है,हमारा कर्ज हमारी तीन प्रतिशत की सीमा के अंदर ही है। हमें इस गणित को दिमाग में रखना होगा। उसको समझकर ही ये बात जनता के बीच में लाएं। उन्होंने कहा कि बड़े से बड़े उद्योगपति तीन प्रतिशत की लिमिट में ही कारोबार करते हैं। अगर कोई उद्यमी बैंक में अपना कोई ऋण नहीं बताएगा तो आने वाले समय में उसकी ग्रोथ रुक जाएगी. स्वाभाविक रूप से बैलेंस शीट तो हमारे लिए कागज लिखने का तरीका है । यदि हमने बिजली,सड़क और पानी जैसी मूलभूत जरूरतों का ढांचा विकसित किया है तो ये हमारी सफलता है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2002-03 तक केवल 20 हजार करोड़ रुपये का बजट होता था आज हमारा बजट 4 लाख, 21 हजार करोड़ का है। पीडब्ल्यूडी मंत्री राकेश सिंह ने चर्चा के दौरान कहा कि सरकार ने इस बार हमारा बजट सोलह हजार करोड़ रुपए बढ़ाया है। आंकड़ों के अनुसार यह 36 प्रतिशत होता है। इस तरह हम विकास के पैमाने पर आगे बढ़ रहे हैं। कैलाश विजयवर्गीय ने कहा कि जब मैं 2003 में पीडब्ल्यूडी मिनिस्टर था तब सरकार का बजट सिर्फ 900 करोड़ रुपये का था और उसके बाद हमने उसको 10 हजार करोड़ का किया था. यह हमारी सरकार की उपलब्धि थी और लगातार डेवलपमेंट के मामले में मध्यप्रदेश की सरकार आगे बढ़ती जा रही है. यह हम सबके लिए बहुत गर्व की बात है. मुख्यमंत्री डाक्टर मोहन यादव ने कहा कि 2047 तक लगभग सवा तीन लाख करोड़ का बजट हम हर पांच साल में दोगुना करेंगे। इसका मतलब है कि 2028 तक यह लगभग 7 लाख करोड़ के आसपास पहुंचेगा. फिर 5 साल बाद हमारी सरकार बनेगी तो यह 7 का 14 होगा. फिर 5 साल बाद हमारी सरकार बनेगी तो यह 14 का 28 होगा. फिर 5 साल बाद सरकार बनेगी तो 28 का 56 होगा. फिर 5 साल बाद सरकार बनेगी तो सीधा 100 होगा। इसीलिए तो हमने कहा कि 2047 तक 2.5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थ व्यवस्था हमारे राज्य की होगी । प्रति व्यक्ति सालाना आय का आंकड़ा देखें तो वर्ष 2002-03 तक 11 हजार रुपये प्रति व्यक्ति थी । वर्ष 1956 में मध्यप्रदेश बना. 55 साल में ये आय सिर्फ 11 हजार थी। मुझे गर्व है कि आज 1 लाख, 56 हजार रुपये प्रति व्यक्ति आय है। यह हमारी ग्रोथ रेट है और अब वर्ष 2047 तक प्रति व्यक्ति आय 22 लाख 50 हजार करने का संकल्प हम आपके माध्यम से कर रहे हैं। इसमें हम विपक्षी सदस्यों का भी सहयोग चाहेंगे। जब हम राज्य की बेहतरी की बात करेंगे तो गरीब आदमी के सपने भी पूरे क्यों नहीं होना चाहिए । वो आर्थिक रुप से संपन्न क्यों नहीं होना चाहिए। धीरे-धीरे कृषि बढ़ रही है. परमात्मा चाहेगा तो औसत आयु, साक्षरता दर, जिस प्रकार की स्वास्थ्य सुविधाएं और बाकी चीजें हम बढ़ा रहे हैं इनमें हम लगातार ग्रोथ देखेंगे । साक्षरता तो 100 प्रतिशत बढ़ाने का संकल्प आप सभी के माध्यम से चाहेंगे। उन्होंने विपक्षी सदस्यों को संबोधित करते हुए कहा कि आप बताइए कहां-कहां पर स्कूल खोलें, स्कूल के अंदर कौन-कौन सी सौगात दें. कमियां बताएं बहुत अच्छी बात है लेकिन समाधान भी बताईए । हम और आप मिलकर उसका रास्ता निकालें. हमारे मन में कोई भेदभाव नहीं है. हम सबको साथ लेकर चलने को तैयार हैं. इस मामले में हमारा बहुत खुला दृष्टिकोण है. कृषि आधारित अर्थव्यवस्था, उद्योग आधारित अर्थव्यवस्था, सेवा आधारित कामों को, राज्य को आत्म निर्भर और विकसित बनाने के लिए विस्तृत प्लान हम बना रहे हैं। वर्ष 2047 तक दलों से ऊपर उठकर प्रदेश की बेहतरी के लिए हम संकल्प करके आगे बढ़ रहे हैं। क्योंकि मध्यप्रदेश के भविष्य के लिए हम और आप सब मिलकर एक हैं. इसी भावना के साथ हम चल रहे हैं. हमारी और आपकी सामूहिक जवाबदारी है.
महिला मोर्चा की नई अध्यक्ष अश्विनी परांजपे ने कहा मतदाताओं की गणना का कार्य भारत माता की आराधना
भोपाल,06 दिसंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष व विधायक हेमंत खण्डेलवाल ने शनिवार को भाजपा प्रदेश कार्यालय में महिला मोर्चा की प्रदेश अध्यक्ष श्रीमती अश्विनी परांजपे को पदभार ग्रहण कराकर संबोधित किया। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष श्री हेमंत खण्डेलवाल ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने महिलाओं को संसद में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने का निर्णय लेकर राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने का कार्य किया है। महिलाएं अब जागरूक हैं, वह अच्छी तरह से समझती हैं कि लोकतंत्र किस दिशा में जाना चाहिए। महिलाएं अब किसे वोट देना है, यह स्वयं निर्णय करती हैं। वर्ष 2023 में मध्यप्रदेश में हुए विधानसभा और इसके बाद लोकसभा चुनाव के साथ हाल ही में बिहार में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में महिलाओं ने भाजपा की जीत को आसान बना दिया। महिला मोर्चे की प्रदेश अध्यक्ष अश्विनी परांजपे ने कहा कि चुनावों के लिए मतदाताओं की गणना का अभियान वास्तव में राष्ट्र की आराधना है।
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष श्री हेमंत खण्डेलवाल ने कहा कि महिला मोर्चा की कार्यकर्ता पार्टी की सभी संगठनात्मक गतिविधियों को गति देने का कार्य कर रही हैं। महिला मोर्चा का अस्तित्व तो जनसंघ के समय से रहा है, लेकिन महिलाओं की राजनीति में बहुत कम भागीदारी रहती थी। मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार ने स्थानीय चुनावों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाकर उन्हें नेतृत्व करने के अधिकार देने का कार्य किया है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने तो देश की संसद और राज्य की विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने का कानून बनाकर राजनीति में देश की आधी आबादी का प्रतिनिधित्व बढ़ाने का ऐतिहासिक कार्य किया है। आजादी के बाद महिलाएं मतदान किसे करना है, यह निर्णय स्वयं बहुत कम कर पाती थी। अब महिलाएं यह अच्छी तरह से जानती हैं कि लोकतंत्र को किस दिशा में लेकर जाना है। मध्यप्रदेश के विधानसभा और लोकसभा के साथ हाल ही में बिहार में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा की जीत को बहनों ने ही आसान बनाया है, क्योंकि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में देश भर की महिलाएं भाजपा पर विश्वास करती हैं।
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष श्री हेमंत खण्डेलवाल ने कहा कि इस समय मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण का कार्य कार्य चल रहा है। यह कार्य चुनाव आयोग 20-25 वर्ष में करता रहता है। एसआईआर के कार्यों में आप सभी कार्यकर्ता जितना अधिक सहयोग और कार्य करेंगे, आगामी चुनाव में पार्टी की जीत उतनी ही आसान हो जाएगी। एसआईआर की प्रक्रिया में एक भी सही मतदाता छूटने न पाए, इसका भी सभी कार्यकर्ताओं को ध्यान रखना है। पारदर्शी चुनाव कराने के लिए मतदाता सूची का पूरी तरह से सही होना चाहिए। एसआईआर मतदाता सूची को सही करने का ही कार्य है। एसआईआर में सहयोग इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि कोई भी फर्जी मतदाता बचना नहीं चाहिए। कई ऐसे लोग भी मतदाता बन जाते हैं, जो बांग्लादेश से आकर यहां चोरी छिपे बस गए हैं। ऐसे मतदाताओं की कोई विचारधारा नहीं होती, वह सिर्फ चुनाव परिणामों को प्रभावित करते हैं।
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष श्री हेमंत खण्डेलवाल ने कहा कि आप सभी महिला कार्यकर्ता पार्टी संगठन को मजबूत करने के लिए कार्य करें। पार्टी संगठन सभी को समय-समय पर दायित्व देता रहता है। पार्टी में सभी कार्यकर्ता समान होते हैं, सिर्फ दायित्व अलग-अलग होते हैं। आप सभी कार्यकर्ताओं को संगठन की मजबूती के लिए और हर घर तक भाजपा की पहुंच हो, इसके लिए कार्य करना है। आप सभी बहनें अपनी चिंता छोडकऱ पार्टी की विचारधारा को घर-घर तक पहुंचाने के लिए कार्य करें। संगठन आप सभी बहनों के सम्मान की चिंता स्वयं कर रहा है। मध्यप्रदेश में भाजपा सरकार के नेतृत्व में आज महिलाएं सरपंच, जनपद सदस्य, जिला पंचायत सदस्यों से लेकर महापौर, विधायक और सांसद तक हैं। श्रीमती अश्विनी परांजपे को पार्टी संगठन से महिला मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष का दायित्व सौंपा है। भाजपा एक परिवार है। यहां सभी कार्यकर्ता समान हैं। जिसे जो दायित्व मिला है, वह पूरी निष्ठा से अपने दायित्व का निर्वहन कर पार्टी संगठन को बुलंदियों तक पहुंचाने में जुटे रहें।
भाजपा महिला मोर्चा की पूर्व प्रदेश अध्यक्ष व सांसद श्रीमती माया नारोलिया ने कहा कि महिला मोर्चा की प्रदेश अध्यक्ष श्रीमती अश्विनी परांजपे मां नर्मदा की बेटी हैं। वह महिला मोर्चा में प्रदेश महामंत्री के दायित्व का निर्वहन कर चुकी हैं। मोर्चा के कार्यों को पूरी तरह समझती हैं। श्रीमती अश्विनी परांजपे के नेतृत्व में मध्यप्रदेश का महिला मोर्चा अपने संगठनात्मक कार्यों में इतिहास रचेगा। भाजपा महिलाओं की समाज और राजनीति में भागीदारी बढ़ाने के लिए लगातार कार्य कर रहा है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में केंद्र और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में मध्यप्रदेश सरकार द्वारा महिलाओं के सर्वांगीण विकास के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष श्री हेमंत खण्डेलवाल ने संगठन में भी महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने का कार्य किया है। भाजपा महिलाओं के सम्मान के लिए लगातार कार्य कर रही है।
भाजपा महिला मोर्चा की प्रदेश अध्यक्ष श्रीमती अश्विनी परांजपे ने पदभार संभालने के बाद अपने संबोधन में कहा कि एसआईआर का कार्य भारत माता की पूजा की तरह है। मध्यप्रदेश में इस समय एसआईआर का कार्य चल रहा है। महिला मोर्चा की सभी कार्यकर्ता एसआईआर के कार्य में सहयोग करें, ताकि एक भी सही मतदाता वंचित न रहने पाए। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में भाजपा ने महिलाओं को सम्मान देने के साथ नेतृत्व करने के भी अवसर दिए हैं। प्रधानमंत्री जी ने महिला आरक्षण कानून बनाकर सभी महिलाओं को बहुत बड़ा अवसर दिया है। हम सभी महिला मोर्चा की कार्यकर्ता प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में भारत को विश्व गुरू बनाने के कार्य में अपना सहयोग देने के लिए हमेशा तैयार रहना है। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व और संगठन ने जो जिम्मेदारी दी है, उसे पूरी निष्ठा के साथ निभाना और संगठन को बुलंदियों तक पहुंचाने का कार्य हम सभी कार्यकर्ता को मिलकर करना है। मंच का संचालन श्रीमती माया पटेल ने किया एवं आभार श्रीमती शशि यादव ने माना।
इस दौरान मंच पर पार्टी की प्रदेश मंत्री सुश्री राजो मालवीय, मोर्चा प्रभारी श्री मनोरंजन मिश्रा, महापौर श्रीमती मालती राय, विधायक श्रीमती रीति पाठक, जिलाध्यक्ष श्री रविन्द्र यति, महिला मोर्चा जिलाध्यक्ष श्रीमती वंदना जाचक, श्रीमती शशि पटेल, श्रीमती उमा सिंह, श्रीमती श्वेता त्यागी, श्रीमती अजोध्या गोधरा, श्रीमती अर्पणा सिंह, सुश्री नेहा बग्गा, श्रीमती कविता डाबी, श्रीमती माधुरी सावले, सुश्री प्रियांशा उरमलिया उपस्थित रहीं।
भोपाल 5 दिसंबर (प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने कहा है कि यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के विकसित भारत के स्वप्न को विकसित मध्य प्रदेश बनाकर साकार करेंगे। हमारे प्रयास निरंतर जारी रहेंगे। विकसित भारत बनाना केवल एक मिशन नहीं हमारा धर्म भी है।
मुख्यमंत्री डॉ.यादव शुक्रवार को मध्य प्रदेश विधानसभा के सत्र के समापन अवसर पर सदन को संबोधित कर रहे थे। मुख्यमंत्री डॉ यादव ने कहा कि विधानसभा प्रजातंत्र का मंदिर है।अध्यक्ष श्री नरेंद्र सिंह तोमर जी ने कुशलता के साथ सदन का संचालन किया है, जो अभिनंदन है।
मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि सत्ता पक्ष और विपक्ष प्रजातंत्र की धुरी है। मुख्यमंत्री डॉ यादव ने नेता प्रतिपक्ष को भी धन्यवाद दिया कि उनके नेतृत्व में विपक्ष ने पूरे सत्र में सकारात्मक चर्चा की और अपने प्रश्नों एवं उद्बोधनों से लाभान्वित किया।
द्वितीय अनुपूरक के संबंध में मुख्यमंत्री डॉ यादव ने कहा कि 13,476.94 करोड़ का प्रावधान किया गया है जिसमें अनेक महत्वपूर्ण योजनाएं संचालित होगी। प्रधानमंत्री आवास योजना ग्रामीण के लिए 4000 करोड़, उपार्जन संस्थाओं को ऋण देने के लिए 2000 करोड़, लाडली बहना योजना के लिए 1794 करोड़, पंचायत विभाग के अंतर्गत 15वें वित्त आयोग के दिए 1,633 करोड़ और उद्योग ,कृषि और अन्य महत्वपूर्ण विकास कार्यों के लिए सदन ने राशि स्वीकृत की है।
अनूपूरक बजट की विशेषताएं
· द्वितीय अनुपूरक अनुमान में कुल ₹ 13476.94 करोड़ का प्रावधान
· विकास के लिए बजट की कोई कमी नहीं
· जरूरतमंद को आवास देना प्रदेश सरकार की पहली प्राथमिकता
· प्रधानमंत्री आवास योजना में 4000 करोड़ का प्रावधान. आगे और भी करने का प्लान
· बहनों को आर्थिक रूप से और ज्यादा सक्षम बनाने के लिए मुख्यमंत्री लाड़ली बहना योजना में 1794 करोड़ का प्रावधान
· मध्य प्रदेश का परफॉर्मेंस देखते हुए 15वें वित्त आयोग का विशेष सहयोग
· मूलभूत जन सुविधाओं के लिये स्थानीय निकायों को 1633 करोड़ का प्रावधान
· मध्यप्रदेश पूंजीगत व्यय में सदैव अग्रणी
· अधोसंरचना विकास के लिए बजट में कोई कमी नही
· पूंजीगत मद में ₹ 5028.37 करोड़ का प्रावधान
· मुख्य बजट 4 लाख 21 हजार 32 करोड़ रुपये का बजट था. यह अब तक का सबसे बड़ा बजट.
· गरीब, महिला, किसान और युवा सभी वर्गों की बेहतरी के लिए सरकार आगे बढ़ रही है।
मुख्यमंत्री डॉ यादव ने कहा कि इन स्वीकृतियों से मध्य प्रदेश विकास के पथ पर तेज गति से अग्रसर होगा। इसके साथ ही एक महत्वपूर्ण विधेयक मध्य प्रदेश नगर पालिका संशोधन विधायक 2025 प्रस्तुत हुआ, जिसमें नगर पालिकाओं और नगर पंचायत में अध्यक्ष का निर्वाचन प्रत्यक्ष प्रणाली से करने का प्रावधान किया गया है। निश्चित रूप से इससे वर्तमान में निकायों में कार्य करने में आ रही समस्याओं में काफी कमी आएगी और ये निकाय स्वतंत्र रूप से ओर भी तेज गति से कार्य कर सकेंगे।
मुख्यमंत्री डॉ यादव ने पक्ष और विपक्ष दोनों के सदस्यों को धन्यवाद दिया जिसके कारण यह सत्र गरिमामय ढंग से संचालित हुआ। मुख्यमंत्री डॉ यादव ने कहा कि मध्य प्रदेश विधानसभा का स्वर्णिम इतिहास रहा है। इस सत्र से इसमें एक और महत्वपूर्ण अध्याय जुड़ गया है। प्रदेश की जनता की आकांक्षाओं के प्रति सदन में हम उपस्थित हैं और केवल निवेश की बात नहीं कर रहे ,मध्य प्रदेश के भाग्य और भविष्य की नींव रख रहे हैं।
मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने चरैवेति चरैवेति के मंत्र के अनुसार राज्य सरकार द्वारा जनकल्याण के लिए निरंतर कार्य करने के संकल्प को व्यक्त किया।
भोपाल,04 दिसंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। मुख्यमंत्री डाक्टर मोहन यादव ने जबसे मध्यप्रदेश सरकार को पाखंडी परिपाटियों से बाहर निकालने की मुहिम चलाई है तबसे तंत्र की आड़ में बैठकर आम नागरिकों का खून चूसने वाले दलालों में हड़कंप मचा हुआ है। पूर्ववर्ती शिवराज सिंह चौहान जिस गोदी मीडिया को पालने पोसने के लिए सरकारी खजाने से लगभग हजार करोड़ रुपए खर्च कर रहे थे वह तो लगभग बौखला गया है । उसने सरकारी फरमान को हाईकोर्ट का भय दिखाकर पापों का पिटारा छुपाने की कोशिश शुरू कर दी है।
जनता से सीधा संवाद स्थापित करने के लिए शासन ने नर्मदापुरम संभाग में उपायुक्त राजस्व 2012 बैच के गणेश कुमार जायसवाल को जनसंपर्क विभाग में अपर संचालक के पद पर पदस्थ करने का आदेश जारी कियाथा। जैसे ही ये आदेश जारी हुआ तो जनसंपर्क विभाग के अधिकारियों कर्मचारियों ने ये कहकर शासन के आदेश को मानने से इंकार कर दिया कि ये अधिकारी तो जूनियर है। हमारे तो उपसंचालक भी इससे वरिष्ठ हैं। सरकार किसी बाहिरी अफसर को हमारे विभागीय कैडर में कैसे पदस्थ कर सकती है। इससे पहले शिवराज सिंह सरकार ने जिस आईपीएस अधिकारी को संचालक बनाकर भेजा था वह सीनियर था लेकिन ये तो बहुत जूनियर है। हम इसके अधीन कैसे काम कर सकते हैं। इस एक दिवसीय कलमबंद हड़ताल की कमर तब टूट गई जब उन्हें समझाया गया कि शासन के आदेश का विरोध सड़कों पर करना अनुशासन हीनता होगी।
विभाग के अधिकारियों का कहना था कि वे सरकार का प्रचार कार्य संभालते हैं। यदि सरकार उनकी बात नहीं मानेगी तो वे सरकार का जनसंवाद ढप कर देंगे । उन्होंने अपना विरोध मुखरता पूर्वक दर्ज कराने के लिए कर्मचारी संगठनों को भी साथ खड़ा कर लिया था। जैसे ही इस प्रदेशव्यापी हड़ताल की खबर मंत्रालय तक पहुंची तो आला अधिकारियों ने विभाग को निर्देश दिए कि वे अपनी हड़ताल समाप्त करें ,हम इन स्थितियों को संवाद से समझेंगे। कमिश्नर जनसंपर्क आईएएस दीपक सक्सेना ने अधिकारियों को समझाया कि वे हड़ताल समाप्त करें हम आपकी मांगों पर सदाशयता पूर्वक विचार करके कोई रास्ता निकालेंगे।
अधिकारियों ने मौके की नजाकत को भांपकर हड़ताल तो वापस ले ली लेकिन अपने दांव पेंच जारी रखे। जिन पत्रकारों और मीडिया संस्थानों के नाम पर बजट की बड़ी राशि खर्च की जाती थी उन्हें अपने पक्ष में लामबंद करके अधिकारियों ने उनके कंधे से अपनी बंदूक चलानी शुरु कर दी। विभिन्न पत्रकार संगठनों और मीडिया संस्थानों ने भी अधिकारियों की नाराजगी से हामी भरते हुए सरकारी फरमान की मुखालिफत शुरु कर दी। अब जबकि सरकारी खजाने से भजकलदारम करने वाले इस गोदी मीडिया को समझ में आ गया है कि शासन अपने जनसंवाद को बगैर किसी दलाली झोल के जारी करना चाहता है तो उन्होंने सरकारी फरमान को अदालत में चुनौती देने की तैयारी कर शुरु कर दी है।
इस संबंध में आज एक पत्रकार की जनहित याचिका की प्रति सोशल मीडिया पर प्रसारित की गई है । इस पत्रकार का कहना है कि विभाग के अधिकारी सीधे सरकार से पंगा नहीं ले सकते इसलिए उनके कहने पर ही मैं हाईकोर्ट जा रहा हूं। जब उसे बताया गया कि वह पीड़ित पक्ष नहीं है। वह विभाग में अधिकारी नहीं है । इस सरकारी आदेश से जनता को कोई नुक्सान नहीं हो रहा है इसलिए वह पीड़ित पक्ष बनकर यदि अदालत जाएगा तो उसे स्टे मिलने के बजाए दंड भी भुगतना पड़ सकता है। यदि अधिकारियों के हक छीने जा रहे हैं तो वे स्वयं अदालत जा सकते हैं।
गोदी मीडिया से जुड़े अधिकारियों और कर्मचारियों को भय है कि यदि बाहिरी अधिकारी विभाग में आ गया तो वह यहां बरसों से चल रहे गोरखधंधे की पोल खोल देगा। इससे उन्हें प्रमोशन की जगह जेल यात्रा तक भुगतना पड़ सकती है। ऐसे में सरकारी फरमान का विरोध करना उनकी मजबूरी है। हालांकि अभी सरकार ने नव आगंतुक को फिलहाल अपनी पुरानी पदस्थापना पर ही बने रहने को कहा है। उसे कहा गया है कि जब विभागीय अधिकारियों की नाराजगी दूर हो जाएगी तब आपको भेजा जाएगा।
भाजपा संगठन से जुड़े कुछ कार्यकर्ताओं का कहना है कि ये डाक्टर मोहन यादव की सरकार है। सरकार यदि कोई फैसला करती है तो उसे सख्ती से लागू भी करती है। यदि जनसंपर्क विभाग के अफसर इसी तरह विरोध करते रहेंगे तो उनका ये कदम विभाग के पैरों पर मारी गई कुल्हाड़ी साबित होगा।
मध्य प्रदेश में, भाजपा ने निर्णय लिया है कि अब राज्य के मंत्रियों को हफ्ते में पांच दिन दोपहर 1 से 3 बजे तक पार्टी (प्रदेश) कार्यालय में बैठना होगा, ताकि कार्यकर्ता और आम लोग सीधे उनसे अपनी समस्याएँ या सुझाव रख सकें। इस व्यवस्था के तहत सोमवार से शुक्रवार हर दिन दो-दो मंत्री लगाए जाएँगे। शनिवार–रविवार इस सूची में नहीं होंगे। इस पहल की शुरुआत राज्य के उपमुख्यमंत्री और अन्य राज्य मंत्रियों से की गई है। राजस्थान के भाजपा कार्यालय में “वर्कर हियरिंग” (कार्यकर्ता सुनवाई) का ये मॉडल लागू किया गया है, जहाँ मंत्री प्रति हफ्ते तय दिन कार्यालय में बैठेंगे।इस व्यवस्था से जमीनी स्तर पर कार्य करने वाला कार्यकर्ता सीधे सरकार के शीर्ष व्यक्ति से सीधे संवाद कर पाएगा।ये कामकाजी व्यवस्था कार्यकर्ताओं व आम लोगों को सीधे अपने प्रतिनिधियों (मंत्रियों) तक पहुँचने का अवसर देती है। इससे संगठन और सरकार में “नीचे से ऊपर” (bottom-up) संवाद की संभावना बढ़ती है। सरकारी ढांचे के कार्य करने का जो माडल आजादी के बाद से बना हुआ था उसमें भाजपा की सरकारों ने मुख्यमंत्री से सीधे मुलाकात का माडल विकसित किया था। इसके पहले की कांग्रेसी सरकारों के मंत्री अपने बंगलों पर जनता से मुलाकात करते रहे हैं। वहां मंत्री के स्टाफ का एक काकस स्थापित हो जाता था और तबादलों, पोस्टिंग के अलावा कई अन्य जन शिकायतों का निवारण किया जाता था।इस व्यवस्था में अक्सर शिकायतकर्ता (worker / आम नागरिक) को लम्बा इंतजार करना पड़ता था, या मंत्री तक पहुँचने में दिक्कत होती थी। अब तय समय होने से, मुद्दों को सुनने व समाधान का असली मौका मिलेगा।इससे प्रशासन में जवाबदेही (accountability) और प्रतिसाद (responsiveness) की छवि मजबूत हो सकती है। पार्टी कार्यकर्ता महसूस कर सकते हैं कि “उनकी आवाज सुनी जाती है” — इससे संगठन में भरोसा और जुड़ाव (motivation) बनेगा। विशेष रूप से, ऐसे कार्यकर्ताओं जिन्हें पहले अनदेखा महसूस होता था, वे अब सक्रिय और जागरूक महसूस करेंगे। सीधे जनता से संवाद होने से क्षेत्र की विशिष्ट समस्याएं, लोक-विकास की मांगें, समझौतों की जरूरत आदि सामने आएँगी।इससे सरकार को नीतिगत फैसलों में grassroots का इनपुट मिलेगा, जो विकास व प्रशासन में सुधार ला सकता है। भक्त या समर्थक नहीं बस, आम नागरिक या कार्यकर्ता भी अपनी बात रख सकते हैं — इससे राजनीतिक जीवन थोड़ा “लोक-केंद्रित” बनेगा। केवल दो घंटे प्रतिदिन और सिर्फ दो मंत्री से बहुत सारे कार्यकर्ता या आम लोग अपनी बातें पूरी तरह नहीं रख पाएँगे। केवल सुनना पर्याप्त नहीं है; समस्या हल करना अलग है। संसाधन, अधिकार, बजट, प्रशासनिक बाधाएं आदि हो सकते हैं।यदि केवल पार्टी कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता दी गई आम नागरिकों या निवासियों को नहीं तो लोकतंत्र से समाधान के मूल लक्ष्य को हासिल नहीं किया जा सकेगा। वे ही लोग आगे आएंगे जिनके पास पहुंच होगी; इससे “नज़रअंदाज़” वर्ग फिर पीछे रह सकते हैं। जब मंत्री नियमित रूप से संगठन कार्यालय में बैठेंगे, तो सरकार तथा पार्टी की भूमिका और दायित्व में कई भ्रम भी फैल सकते हैं। कार्यकर्ता-मुद्दों पर सरकारी फैसले लेंगे या सिर्फ उनके प्रश्नों का जवाब देकर अपना ज्ञान पेलेंगे। यह कदम संभवतः 2027 के लिए तैयारियों की दिशा में है पार्टी संगठन को मजबूत करना, grassroots कार्यकर्ताओं को जोड़ना, सुनने की संस्कृति बनाना। यह जनता (या कार्यकर्ता) के दृष्टिकोण से भाजपा की “खुली” और “जवाबदेह” छवि पेश करता है, जिससे विपक्षी आलोचना कम हो सकती है। क्षेत्रीय और स्थानीय स्तर पर पार्टी की पकड़ मजबूत होगी जिससे मतदाताओं से जुड़ाव आसान होगा। लेकिन अगर यह सिर्फ एक दिखावा (symbolic gesture) बना रह गया , जहाँ सुनने का समय है, लेकिन समाधान नहीं — तो आलोचना और असंतोष भी बढ़ सकता है।ये कहा जा सकता है कि यह व्यवस्था सही दिशा में एक सकारात्मक पहल है, बशर्ते इसे सिर्फ “प्रोटोकॉल” न समझा जाए, बल्कि “सशक्त लोकतांत्रिक संवाद” के रूप में सक्रिय रूप से लागू किया जाए। अगर मंत्रियों ने वास्तव में जनता व कार्यकर्ताओं की सुनवाई की, उनकी समस्याओं पर संवेदनशीलता दिखायी, और त्वरित समाधान व असर दिखाया तो इससे पार्टी-सरकार दोनों को ही लाभ होगा। लेकिन सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि यह व्यवस्था कितनी नियमित, पारदर्शी, निष्पक्ष और जवाबदेह साबित होती है।
आईएएस संतोष वर्मा के रूप में इस बार फिर विदेशी ताकतों ने भारतीय समाज में फूट डालने का डायनामाईट लगाया है।ब्राह्म्ण की बेटी के दान और संबंध बनाने जैसी ओछी भाषा का इस्तेमाल करके वर्मा ने देश पर कमर के नीचे वार किया है। अस्सी के दशक में दलित शोषित समाज संघर्ष समिति (डीएसफोर) बनाकर बसपा सुप्रीमो कांसीराम ने जब तिलक तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार का नारा दिया तो देश की समग्र चेतना ये सुनकर अवाक रह गई थी। भारतीय समाज में फूट के बीज डालने के लिए उन्होंने एक और नारा दिया था ब्राह्मण , ठाकुर , बनिया छोड़, बाकी सब हैं डीएस4″ ये तबका दौर था जब भारत में जनता पार्टी सरकार की असफलता के बाद एक बार फिर श्रीमती इंदिरा गांधी सत्ता में आ चुकी थीं। कांसीराम पंजाब के रोपड़ जिले के एक गांव के सिख धर्म में परिवर्तित हुए चमार समुदाय से आते थे। बीएससी करने के बाद वे पुणे की गोलाबारूद फैक्टरी में तकनीकी सुपरवाईजर बन गए थे। जनता पार्टी की सरकार को अपदस्थ करने के लिए जो विदेशी ताकतें भारत में सक्रिय थीं वे भारत के सैन्य क्षेत्र में फूट डालने का भी प्रयास कर रहीं थीं। तब उन्होंने कांसीराम को अपना औजार बनाया जो भारत की जातिवादी व्यवस्था के खिलाफ मुखर रहते थे और नौकरी छोड़ चुके थे । उनकी पकड़ सैन्य फैक्टरी के बड़े समुदाय पर पहले से बनी हुई थी। कांसीराम ने महात्मा गांधी का बताया बहुसंख्यक हरिजन वादी ब्रह्मास्त्र चलाया था । वे अच्छी तरह जानते थे कि इस उपेक्षित समुदाय को आसानी से बरगलाया जा सकता है। बाद में उन्होंने लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की ताकत पाने के लिए बहुजन समाज पार्टी बनाई और सत्ता की ऊंचाईयों तक जा पहुंचे। ये विदेशी पटकथा खूब सुपर हिट हुई और 1989 में वीपीसिंह की सरकार के रूप में अपने क्लाईमेक्स पर भी पहुंची। तब भी भारत पर राज करने वाली विदेशियों की ख्वाहिशें परवान चढ़ रहीं थी।कांसीराम ने भी सरकारी अफसरों से चंदा उगाही के लिए दलित कार्ड खेला था। कांसीराम के निधन के बाद ये खुमार थोड़ा मद्धिम पड़ा लेकिन तब भी आरक्षण के नाम पर दलित वर्ग की सामाजिक गुंडागर्दी जारी रही । तब से आज तक जातिवादी समानता के नाम पर सर्वधर्म के टैक्स के सहारे आरक्षण की मीठी गोली बांटी जा रही है। हालांकि आज देश में कथित जातिवादी भेदभाव की झलक तक नहीं मिलती है। राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने 30 जनवरी 1990 को नाराज दलितों को साधने के लिए अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 लागू किया था। कांग्रेस ये कानून अपने खिसकते दलित वोट बैंक को बचाने के लिए डरकर लाई थी इसलिए इस कानून को लागू करने का बहुत शोर मचाया गया । आगे चलकर ये कानून सामाजिक भेदभाव और अत्याचार की मिसाल बनकर सामने आया। इस हथियार का प्रयोग सभी जातियों ने किया। किसी से दुश्मनी भुनाना हो तो किसी दलित से शिकायत करवा दो , उसे आसानी से निपटाया जा सकता था। कांसीराम का वो हथकंडा आज की संतोष वर्मा वाली पीढ़ी भी सफलता पूर्वक इस्तेमाल कर रही है। देश की मोदी सरकार ने सबका साथ सबका विकास का नारा देकर देश को सकल घरेलू उत्पाद के पैमाने पर चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था के सोपान पर ला खड़ा किया है । आगे बढ़ने की इस लडाई को कमजोर करने के लिए एक बार फिर बासी कढ़ी में उबाल लाने का प्रयास किया जा रहा है। संतोष वर्मा (IAS) ने अपाक्स अधिकारियों के सम्मेलन में 23 नवंबर 2025 को आयोजित सार्वजनिक सभा में ये आपत्तिजनक बयान दिया है। उन्होंने कहा कि मैं आईएएस बन गया हूं तो मेरे बेटो को क्रीमी लेयर मानकर आरक्षण का लाभ भले नहीं मिले, लेकिन असली उद्देश्य तो तब पूरा होगा जब तक उसे कोई ब्राह्मण अपनी बेटी दान कर दे या वह उससे संबंध बना ले। जब तक समाज में रोटी बेटी का संबंध शुरु न हो जाए तब आरक्षण का लाभ मिलते रहना चाहिए। वर्मा ने कहा कि हमें भी अब बदले की भावना से काम करना होगा। हमारी लड़ाई विचारधारा से है जब तक हम इसका मूल नष्ट नहीं कर देते तब तक हमें अपनी कमाई का छटवा हिस्सा इस लड़ाई के लिए खर्च करना होगा। उनकी इस टिप्पणी को कई समुदायों और सामाजिक संगठनों ने “जात-पात, ब्राह्मण विरोधी, अपमानजनक और महिलाओं के खिलाफ मानवीय गरिमा को ठेस पहुँचाने वाला” बताते हुए कड़ी निंदा की है। वे इस विवाद को देश पर हमला मान रहे हैं।पूर्व आईएएस श्रीमती वीणा घाणेकर कहती हैं कि ये कार्यपालिका की निर्धारित सीमाओं का उल्लंघन है इसलिए अनुशासनहीन वर्मा को बर्खास्त किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि ऐसा बयान सामाजिक एकता, सहिष्णुता और समानता की नींव को ही कमजोर कर देता है। भारत एक बहु-जातीय, बहु-संस्कृतिक देश है, यहां जाति-आधारित भेदभाव और पूर्वाग्रहों से संघर्षों का इतिहास रहा है। ऐसी टिप्पणी, जिसमें एक जाति-विशेष के खिलाफ अपमान और सामान्यीकरण हो, सामाजिक सौहार्द्र को भंग करती है। जब कोई उच्च पदस्थ सरकारी अधिकारी आईएएस, सार्वजनिक मंच से ऐसे भेदभावपूर्ण वाक्य बोलता है, तो यह संदेश जाता है कि जात-पात का विभाजन, भेदभाव और अपमान का विचार सरकारी संरक्षण में फल फूल रहा है। इसीलिए इसे “देश की आत्मा” – सामाजिक सद्भाव, भाईचारा, समान नागरिकता पर हमला माना जाना चाहिए। बयान में “कन्या-दान” शब्द का प्रयोग कर ब्राह्मण बेटियों को “दान की वस्तु” बना देना, महिलाओं के साथ सिर्फ उनके परिवार या जाति के आधार पर पूरे देश में असम्मान की भावना जगाता है। यह बयान न सिर्फ संवाद-स्वतंत्रता की सीमाओं को पार करता है, बल्कि उन नैतिक और संवैधानिक मूल्यों पर हमला है, जिनके आधार पर दूसरा-पक्ष समानता, सम्मान, व्यक्तिगत स्वतंत्रता के साथ खड़ा हुआ है।भारतीय परिवेश में बेटी मान का प्रतीक है जिस पर हमला करने की चेष्ठा हर नजरिए से अस्वीकार्य है। जब कोई अधिकारी जात-पात, आरक्षण, सामाजिक असमानता जैसे संवेदनशील विषयों पर ऐसे विवादित और उत्तेजक बयान देता है, तो यह सरकार, प्रशासन और संवैधानिक मूल्यों के प्रति अनादर है। जाहिर है कि ये देश की स्थिरता और सार्वभौमिक अधिकारों पर हमला है। इस तरह के बयान लोगों में कट्टरता, द्वेष, अविश्वास और सामजिक दरारें पैदा कर सकते हैं । खासकर जब जातीय भावना और सम्मान का प्रश्न जुड़ा हो। इतिहास में देखा गया है कि ऐसे वक्तव्यों से सामाजिक अशांति, सांप्रदायिक विभाजन और हिंसा जैसी स्थितियां पैदा होती हैं। वर्तमान विवाद मात्र पहली घटना नहीं है संतोष वर्मा का नाम कई पुराने आरोपों से भी जुड़ा हुआ है। उनके ऊपर पहले यह आरोप था कि उन्होंने जज के हस्ताक्षर की नकल कर फर्जी दस्तावेज बनाये थे, ताकि प्रमोशन हासिल कर सकें। साथ ही, उनके खिलाफ यौन शोषण और धोखाधड़ी के मामलों की भी शिकायतें रही हैं जिनका सिलसिला अभी भी सवालों के घेरे में है। इस पृष्ठभूमि में, उनका यह नया जात-विरोधी और महिलाओं को वस्तु की तरह दिखाने वाला बयान, उनकी विश्वसनीयता, नैतिकता, और संवैधानिक भूमिकाओं पर गहरा सवाल खड़ा करता है। अगर ऐसे व्यक्ति जिनका इतिहास भ्रष्टाचार व धोखाधड़ी के आरोपों से जुड़ा रहा है यदि वे संवेदनशील पदों पर बने रहेंगे तो आम जनता का विश्वास पूरे सिस्टम से उठ जाएगा। जाहिर है कि देश को ऐसे प्रयासों का पुरजोर विरोध करके विदेशी षडयंत्र को बगैर किसी परिणाम की चिंता किए कुचलना होगा।
-हितानंद शर्मा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 100 वर्षों की यात्रा वास्तव में राष्ट्र जागरण की ध्येय यात्रा है। वर्ष 1925 में विजयादशमी के दिन नागपुर के मोहिते बाड़ा में रोपा गया राष्ट्र साधना का छोटा सा बीज आज एक विशाल वटवृक्ष बन चुका है। राष्ट्र प्रथम के एकनिष्ठ़ भाव के साथ किए जा रहे सतत और अनथक प्रयासों से संघ की पहचान आज विश्व के सबसे बड़े संगठन के रूप में बनी है। राष्ट्र, संस्कृति, धर्म एवं समाज के हित में सर्वस्व अर्पण कर देने वाले स्वयंसेवक भारत के पुनरुत्थान की साधना में निरंतर लगे हुए हैं। संघ शताब्दी वर्ष चरैवेति-चरैवेति के मंत्र के साथ बढ़ रहे वैचारिक अधिष्ठान का एक सोपान है।
संघ के आद्य सरसंघचालक परम पूजनीय डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार द्वारा स्थापित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का उद्देश्य भारत को स्वाधीन बनाने के साथ ही स्व-बोध की चेतना से युक्त एक संगठित समाज का निर्माण करना था। माँ भारती को परम वैभव पर आसीन करने की 100 वर्षों की यह यात्रा सरल नहीं रही। अनेक कठिनाइयों, विरोधों और बाधाओं को ही मार्ग बनाते हुए संघ ने भारत माता की सेवा में व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण का कार्य सतत जारी रखा है।
स्वतंत्रता आंदोलन और स्वतंत्रता के पश्चात संघ ने समाज को देश की सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का कार्य किया। स्वतंत्रता के पश्चात् भी जब देश में औपनिवेशिक मानसिकता से प्रेरित और गुलाम पीढ़ी तैयार करने वाली मैकाले शिक्षा पद्धति जारी रखी गई तब संघ प्रेरणा से 1952 में ‘विद्या भारती’ की स्थापना की गई, जो शिक्षा एवं संस्कार देने वाला आज विश्व का सबसे बड़ा अशासकीय शैक्षणिक संगठन है। युवाओं को राष्ट्रीय विचारों से जोड़ने के लिए अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, श्रमिकों के हित में कार्य करने भारतीय मजदूर संघ, किसानों के लिए भारतीय किसान संघ, सेवा कार्यों के लिए सेवा भारती और संस्कार भारती आदि अनेक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रेरणा से स्वयंसेवकों द्वारा स्थापित किए गए जो आज भी समाज में सक्रियता से कार्य कर रहे हैं। 1936 में स्थापित राष्ट्र सेविका समिति के साथ मिलकर संगठन ने महिलाओं की भूमिका को भी समान महत्व दिया है। आज विचार परिवार के प्रत्येक संगठन में महिला नेतृत्व की सशक्त उपस्थिति इसी दृष्टिकोण का परिणाम है।
स्वतंत्रता के पश्चात् जब भारतीय राजनीति अपने मूल और दिशा से भटकने लगी, देश की संप्रभुता के लिए ही संकट उत्पन्न हो गया, तब पं. दीनदयाल उपाध्याय एवं डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भारतीय जनसंघ की स्थापना की। भारतीय जनसंघ आगे चलकर भारतीय जनता पार्टी के रूप में विकसित हुआ। भारतीय जनता पार्टी वर्तमान में विश्व का सबसे बड़ा राजनीतिक संगठन है। इसे एक ऐसे संगठन के रूप में भी समाज का सम्मान प्राप्त होता है, जिसने अपने गठन के समय से चले आ रहे लगभग सभी प्रमुख संकल्पों को पूर्ण करने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। जम्मू-कश्मीर से धारा 370 की समाप्ति, अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण और भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाना इसी विचारधारा के ऐतिहासिक कार्य हैं।
संघ की सौ वर्ष की यात्रा कठिन चुनौतियों से भरी रही है। संघ अपने आरंभिक काल से ही अपनों के ही विरोध, आक्रमण, उपहास और अपमान सहकर भी इस अनवत यात्रा में आगे बढ़ा है। महात्मा गांधी की हत्या के मिथ्या आरोप, दो बार लगाए गए प्रतिबंध, आपातकाल की असहनीय यातनाएं और तमाम विरोधों के पश्चात भी संघ अपने संकल्पों पर दृढ़ रहा। इस साधना की यज्ञ वेदी में असंख्य स्वयंसेवक समिधा बन कर होम भी हुए हैं। स्वयंसेवकों की तपस्या और प्रचारकों के समर्पण ने संगठन को उस स्थिति तक पहुंचाया, जहां आज विश्वभर में लोग संघ को निकट से जानना और उससे जुड़ना चाहते हैं।
भारत के गौरवशाली स्वर्णिम इतिहास, संस्कृति, ज्ञान-परंपरा के संघरूपी वटवृक्ष की जड़ें गहरे तक समायी हुई हैं। संघ की शाखाएं संगठन का सबसे प्रबल पक्ष हैं। समाज में यह वाक्य प्रचलन में भी आ चुका है कि यदि संघ को समझना है तो शाखा में जाकर भलीभांति समझा जा सकता है। संघ की शाखाएं व्यक्ति निर्माण की नर्सरी भी कही जाती हैं। शाखा के माध्यम से स्वयंसेवकों का शारीरिक, मानसिक और चारित्रिक विकास होता है। खेल, गीत, अनुशासन और बौद्धिक कार्यक्रमों के माध्यम से उन्हें नेतृत्व, अनुशासन, बंधुत्व और कर्तव्यनिष्ठा की प्रेरणा मिलती है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं के माध्यमम से समाज का ऐसा संगठन तैयार हुआ है कि देश में कहीं भी प्राकृतिक आपदाओं, मानवीय संकटों और विदेशी आक्रमणों, हर परिस्थिति में संघ के स्वयंसेवक सबसे पहले सेवा कार्य के लिए उपस्थित रहते हैं। गुजरात के भुज में आए भूकंप से लेकर हाल की भीषण बाढ़ की घटनाओं और कोरोना महामारी के दौरान भोजन, परिवहन, दवाइयों से लेकर पीड़ितों के अंतिम संस्कार तक की सेवाओं में स्वयंसेवकों ने निःस्वार्थ भाव से अपना योगदान दिया। इससे पूर्व स्वतंत्रता संग्राम, गोवा मुक्ति आंदोलन, कश्मीर के भारत में विलय, चीन के आक्रमण जैसे ऐतिहासिक घटनाक्रमों में भी संघ की भूमिका उल्लेखनीय रही।
शताब्दी वर्ष संघ की संकल्प यात्रा को और अधिक गति देने का अवसर है। संगठन ‘पंच परिवर्तन’ के माध्यम से स्वदेशी, पर्यावरण संरक्षण, नागरिक कर्तव्यों, सामाजिक समरसता और परिवार प्रबोधन जैसे विषयों को जन-जन तक पहुंचाने में सक्रिय है। शताब्दी वर्ष के इस महत्वपूर्ण एवं स्मरणीय अवसर पर संघ किसी भव्य आयोजन की बजाय प्रत्येक भारतीय नागरिक तक पहुंचकर उसे अपने परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति कर्तव्यों का बोध कराने का कार्य कर रहा है।
संघ का कार्यकर्ता होना जीवन को राष्ट्र सेवा की दिशा में लगा देने की प्रक्रिया है। शाखा का संस्कार व्यक्ति में मातृभूमि के प्रति ऐसा असीम प्रेम जगा देता है कि वह निजी स्वार्थों से ऊपर उठकर समाज और राष्ट्र के लिए समर्पित हो जाता है। स्वयंसेवक के लिए “भारत माता की जय” ही उसका परम ध्येय बन जाता है। 2026 में जब संघ का शताब्दी वर्ष पूर्ण होगा, तब लक्ष्य यही रहेगा कि प्रत्येक भारतीय को राष्ट्र यज्ञ में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभानी है, ताकि भारत फिर से विश्वगुरु के रूप में विश्व का मार्गदर्शन कर सके। इस लक्ष्य के साधक होने के नाते हम सब भी इस राष्ट्र यज्ञ में अपनी-अपनी कर्तव्यों रूपी समिधा आहूत करें। ‘पूर्ण विजय संकल्प हमारा अनथक अविरत साधना। निषिदिन प्रतिपल चलती आयी राष्ट्रधर्म आराधना।’
आज जब भारत नए आत्मविश्वास और स्वाभिमान के साथ विश्व मंच पर स्वाभिमान और स्व-बोध के गौरव के साथ खड़ा है, तब संघ की यह सौ वर्षीय यात्रा केवल एक संगठन की कथा नहीं, बल्कि उस विचार की गौरव गाथा है जिसने राष्ट्र को आत्मबोध, संगठन और संस्कृति की शक्ति से जोड़ा। इस अवसर पर प्रत्येक स्वयंसेवक और नागरिक को यह संकल्प लेना चाहिए कि वह भारत माता को परम वैभव पर आसीन करने में अपना योगदान देंगे। सभी स्वयंसेवकों और देशवासियों को संघ शताब्दी वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं।
(लेखक भारतीय जनता पार्टी, मध्यप्रदेश के प्रदेश संगठन महामंत्री हैं)
भोपाल, 23 सितंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)।भारत के कई राज्यों में बिहारियों को निशाना बनाया गया लेकिन धीरे धीरे लोगों ने उनकी भूमिका का मह्त्व स्वीकार कर लिया। बिहारियों से जिन्हें एलर्जी है उनके लिए तो हम केवल यही कह सकते हैं कि वे एंटी एलर्जी दवाई खाकर अपना काम चलाएं। आज का बिहार तेज गति से आगे बढ़ रहा है और वह अपना परम वैभव पाकर ही रहेगा। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी मर्मभेदी रचनाओं से भारत के गौरव का गान किया और तरुणायी को जाग्रत किया था । बिहार फाऊंडेशन के भोपाल चेप्टर ने बिहारियों के योगदान को रेखांकित करने के लिए कवि दिनकर की रचनाओं के साथ जो अनुष्ठान प्रारंभ किया है वो सार्थक नतीजे लेकर सामने आएगा। भोपाल के कवि दुष्यंत संग्रहालय सभागृह में आयोजित राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर जयंती समारोह में सेवानिवृत्त पुलिस महानिदेशक अनुराधा शंकर ने कहा कि बिहारी शब्द विहार से निकला है। हंगरी में भी एक बिहार प्रांत है। बिहारी होने का अर्थ घूमंतु होना है। मौर्य वंश, मगध साम्राज्य, गुप्त वंश, भगवान बुद्ध, जैनियों के 23 तीर्थंकरों ,अष्टावक्र,वाचस्पति, मंडन मिश्र,चंपारन सत्याग्रह जैसे अनेकानेक कारणों की वजह से बिहार हमेशा से भारत की अभिन्न पहचान रहा है। जिस तरह बिहार फाऊंडेशन ने यहां एक समृद्ध विरासत का गरिमावंदन शुरु किया है वह सराहनीय है। उन्होंने रामधारी सिंह दिनकर के विश्व प्रसिद्ध हिंदी कविता अनुवाद सीपी और शंख की पंक्तियों का उल्लेख करते हुए कहा कि वे प्रकृति की महिमा गाते हुए कहते हैं कि ..मत छुओ इस झील को, कंकड़ी मारो नहीं, पत्तियां डारो नहीं, फूल मत बोरो,और कागज की तरी इसमें नहीं छोड़ो। खेल खेल में तुमको पुलक उन्मेष होता है, लहर बनने में सलिल को क्लेश होता है। बिहार के मौजूदा हालात में दिनकर की इन पंक्तियों का महत्व समझा जा सकता है। आयोजन की अध्यक्षता कर रहे पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर ने कहा कि चंपारन सत्याग्रह से बिहार ने कर्मवीर गांधी को महात्मा गांधी बना दिया था। जयप्रकाश आंदोलन तक कांग्रेस ने देश पर एकछत्र राज्य किया लेकिन इसके बाद उसकी सत्ता डोल गई। तब राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने लिखा था कि हुंकारों से महलों की नींव उखड़ जाती, सांसों के बल से ताज हवा में उड़ता है, जनता की रोके राह,समय में ताव कहां? वह जिधर चाहती,काल उधर ही मुड़ता है। दो राह,समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो, सिंहासन खाली करो कि जनता आती है। उन्होंने कहा कि राजनेताओं को बिहार से उपजे उस जनांदोलन से सबक सीखना चाहिए। यदि व्यापार ही सत्ता का लक्ष्य हो जाएगा तो मानवता नष्ट होने लगेगी। तब सरकारों को जनता के कोप का सामना भी करना पड़ेगा। तकनीकी शिक्षा विभाग में अपर संचालक संजय कुमार ने कहा कि छायावादी कविताओं के बाद दिनकर की ओज और राष्ट्रीयता भरी कविताओं ने देश की दिशा बदल दी थी। उन्होंने जिस तरह कर्ण के त्याग को रेखांकित किया उससे नई पीढ़ी को प्रेरणा मिलती है और वे जान पाते हैं कि प्रतिभाएं कष्ट में रहकर ही उभरती हैं। प्रसिद्ध साहित्यकार प्रियदर्शी खैरा, एचएन मिश्रा एवं अन्य लोगों ने भी राष्ट्रकवि दिनकर की कविताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि वे आज भी देश के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। बिहार फाऊंडेशन के भोपाल चेप्टर के अध्यक्ष राधा मोहन प्रताप सिंह ने देश को गढ़ने में बिहारी साहित्यकारों के योगदान को रेखांकित किया। सेंट्रल स्कूल से सेवा निवृत्त साहित्यकार श्रीमती रागिनी सिंह ने कार्यक्रम का संचालन करते हुए कवि दिनकर की कविताओं के विभिन्न आयामों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कार्यक्रम को सफल बनाने में योगदान के लिए सभी आगंतुकों के प्रति आभार भी व्यक्त किया।
भोपाल, 20 सितंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय सह संगठन महामंत्री शिवप्रकाश , प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खण्डेलवाल, आत्मनिर्भर भारत संकल्प अभियान के राष्ट्रीय सह-संयोजक सी. पी. जोशी एवं प्रदेश संगठन महामंत्री हितानंद जी ने शनिवार को भाजपा प्रदेश कार्यालय में ‘आत्मनिर्भर भारत संकल्प’ अभियान को लेकर कार्यशाला को संबोधित किया। भाजपा के राष्ट्रीय सह संगठन महामंत्री श्री शिवप्रकाश जी ने कहा कि स्वदेशी सिर्फ आर्थिक नहीं है, बल्कि इसमें देशभक्ति की भावना है और स्वयं का स्वाभिमान भी है। यह हमारी भाषा, रीति रिवाज, पहनावे, संस्कृति आदि सभी से संबंधित है। जो अपने देश में बना है, उसके प्रति स्वाभिमान ही स्वदेशी है। हमें प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के स्वदेशी के संकल्प के साथ आगे बढ़ना है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष व विधायक हेमंत खंडेलवाल ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी भारत को दुनिया की आर्थिक महाशक्ति बनाने के लिए कार्य कर रहे हैं। लेकिन इसके लिए हर व्यक्ति के मन में स्वदेशी उत्पाद खरीदने की मानसिकता बनाने की जरूरत है। कार्यकर्ता स्वदेशी को अपनाकर आत्मनिर्भर भारत बनाने के अभियान को साकार करें। राजस्थान के पूर्व प्रदेष अध्यक्ष व आत्मनिर्भर भारत संकल्प अभियान के राष्ट्रीय सह संयोजक सी पी जोशी ने कहा कि हम आजादी के पहले स्वदेशी के कारण आत्मनिर्भर थे, आजादी के बाद दुनिया पर निर्भर हो गए। जीएसटी रिफॉर्म कोई सामान्य बात नहीं है, आने वाले समय में यह स्वदेशी के लिए बड़ा आधार बनेगा। भाजपा के प्रदेश संगठन महामंत्री हितानंद ने कहा कि स्वदेशी और स्वावलंबन से ही भारत आत्मनिर्भर बनेगा। स्वतंत्रता आंदोलन के समय स्वदेशी की अलख जगाई गई थी। आजादी के बाद स्वदेशी आंदोलन को प्रमुखता नहीं दी गई। भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए 25 सितंबर से 25 दिसंबर तक ‘‘आत्मनिर्भर भारत संकल्प अभियान‘‘ चलाया जाएगा। आज के संदर्भ स्वदेशी की परिभाषा अलग-श्री शिवप्रकाश जी भाजपा के राष्ट्रीय सह संगठन महामंत्री शिवप्रकाश ने कहा कि आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों को देश से भगाने के लिए स्वदेशी के दो प्रयोग हुए। एक प्रयोग बाल गंगाधर तिलक जी ने किया। उन्होंने गणेश उत्सव और शिवाजी उत्सव शुरू किए। वहीं गांधी जी ने चरखा चलाया। उस समय के विचारकों का मानना था कि अंग्रेज भारत में विदेशी वस्त्र बेचकर देश को लूट रहे हैं। ऐसे में गांधी जी ने खादी पहनने का आग्रह किया और चरखे के माध्यम से हर व्यक्ति को जोड़ा। महर्षि दयानंद, स्वामी विवेकानंद, रवींद्रनाथ टैगोर और महर्षि अरविंद आदि ने भी अपने-अपने तरीके से स्वदेशी की बात की। लेकिन आज का स्वदेशी वो चरखे वाला स्वदेशी नहीं है। हमें आज के संदर्भों में स्वदेशी की व्याख्या करनी होगी। उन्होंने कहा कि पं. दीनदयाल उपाध्याय जी ने एकात्म मानवतावाद में स्वदेशी और विकेंद्रीकरण की चर्चा करते हुए नए परिदृश्य में स्वदेशी की परिभाषा दी। उन्होंने कहा था कि स्वदेशी और आत्मनिर्भरता हमारे तंत्र हो सकते हैं। स्वदेशी का मतलब दुनिया में कल्याणकारी व्यवस्था भाजपा के राष्ट्रीय सह संगठन महामंत्री शिवप्रकाश ने कहा कि 15 अगस्त को लाल किले से दिये गए भाषण और काशी की सभा में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने कहा था कि दुनिया आज आर्थिक संकट से जूझ रही है। हर देश अपनी अर्थव्यवस्था को संभालने का प्रयास कर रहा है। ऐसे में भारत के आर्थिक विकास को जारी रखने और विकसित देश बनाने का वही तरीका उचित है, जिसमें आत्मनिर्भरता और स्वदेशी का मंत्र हो। उन्होंने इसे ‘मन की बात’ कार्यक्रम में भी दोहराया और कोरोना संकट के समय भी कहा था। श्री शिवप्रकाश जी ने कहा कि आज दुनिया में पूंजीवाद, साम्यवाद और समाजवादी व्यवस्थाओं का खोखलापन उजागर हो चुका है। यूक्रेन-रूस और इजराइल-फिलस्तीन के युद्ध चल रहे हैं। पर्यावरण का संकट पैदा हो गया है। अतिवृष्टि हो रही है और जगह-जगह बादल फट रहे हैं। ऐसे में भारत की लिव एंड लैट लिव यानी वसुधैव कुटुंबकम की संस्कृति प्रासंगिक हो जाती है। ऐसी व्यवस्था जिसमें रोजगार हो, पर्यावरण का संरक्षण हो, कम पूंजी लगती हो और भारतीय चिंतन हो, वही दुनिया के लिए कल्याणकारी हो सकती है। इस अर्थ में स्वदेशी का मतलब है दुनिया में कल्याणकारी व्यवस्था। इसमें बाजार और व्यापार नहीं, परिवार की सोच होती है। यह भारत को आत्मनिर्भर बनाएगी और दुनिया के संकटों को दूर करेगी। स्वदेशी के मंत्र पर आगे बढ़ रहा भारत भाजपा के राष्ट्रीय सह संगठन महामंत्री शिवप्रकाश ने कहा कि 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने मेड इन इंडिया और मेक इन इंडिया पर जोर दिया। ये दोनों ही नीतियां स्वदेशी को पोषित करने वाली हैं। बीते 11 वर्षों में उन्होंने स्वदेशी चिंतन के आधार पर व्यवस्थाएं खड़ी की। इसी का परिणाम है कि 2014 तक हमारा जो रक्षा निर्यात कुछ सौ करोड़ का था, वो 2025 में बढ़कर 24000 करोड़ हो गया। अब हमारे रक्षा उत्पाद 100 देशों में खरीदे जा रहे हैं। चंद्रयान और मिशन मंगल के बाद अब हम अनेक देशों को सैटेलाइट सिस्टम दे रहे हैं। 10 से अधिक देशों को हम रेल कोच बेच रहे हैं। एमएसएमई का हमारी जीडीपी में 30 प्रतिशत योगदान है। हम सेमी कंडक्टर भी बना रहे हैं। ट्रैक्टर, जैविक उत्पाद, मोबाइल फोन और जैनेरिक दवाएं हम सारी दुनिया को बेच रहे हैं। हम सारी दुनिया में खिलौने सप्लाई कर रहे हैं। प्रधानमंत्री जी का संकल्प ‘स्वदेशी’, हम उसके साथ खड़े होना है भाजपा के राष्ट्रीय सह संगठन महामंत्री शिवप्रकाश ने कहा कि हमें समाज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में, भारत के युवाओं, बुद्धिजीवियों, व्यापारियों सबके मन में एक भाव पैदा करना है कि हम ये कर सकते हैं। हमें स्वदेशी वस्तुओं का निर्माण करने वालों को प्रोत्साहित करना है और इस विचार को प्रसारित करना है। निश्चित रूप से एक दिन भारत सारी दुनिया में फिर प्रसिद्ध होगा और हमारे उत्पाद दुनिया के बाजारों में भरे रहेंगे। उन्होंने कहा कि अभी हाल ही में अमेरिका ने टैरिफ के जरिए भारत पर यह दबाव बनाने के कोशिश की कि हमारा कृषि क्षेत्र, फिशरीज और डेयरी उद्योग उसके लिये खोल दिये जाएं। लेकिन प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने कहा कि हम यह नहीं होने देंगे। उनका यह संकल्प ही ‘स्वदेशी’ है और हमें उनके इस संकल्प के साथ खड़ा होना है।
हेमंत खंडेलवालः भाजपा के लिए ठोस धरातल गढ़ने का जतन
प्रधानमंत्री जी का संकल्प आत्मनिर्भर भारत और ‘स्वदेशी’- हेमंत खंडेलवाल भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष व विधायक हेमंत खंडेलवाल ने कहा कि भारत और चीन साथ में आजाद हुए, लेकिन हम निर्यात में पिछड़ गए। इसकी वजह यह थी कि पूर्ववर्ती सरकारों ने निर्यात बढ़ाने के बारे में नहीं सोचा। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की सरकार हर क्षेत्र में निर्यात बढ़ाने और भारत को आत्मनिर्भर राष्ट्र बनाने के लिए प्रयास कर रही है। आत्मनिर्भर का मतलब है हम देश में बनी चीजें खरीदें और हमारा आयात कम तथा निर्यात ज्यादा हो। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहते हैं कि वही उत्पाद खरीदें, जिसमें भारत के श्रमिक का पसीना हो, जो भारत में बना हो। उन्होंने कहा कि हमारे देश की लगभग 50 प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है, लेकिन कृषि का हमारी जीडीपी में योगदान सिर्फ 17 प्रतिशत है। प्रधानमंत्री चाहते हैं कि हमारे कृषि उत्पाद सारी दुनिया में एक्सपोर्ट हों। उन्होंने पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिलाने का सफल प्रयोग किया, जिससे गन्ना उत्पादक किसानों को तो लाभ हुआ है और 2 लाख करोड़ रुपये के राजस्व की भी बचत हुई। हर व्यक्ति के मन में स्वदेशी की भूख जगाएं कार्यकर्ता भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष श्री हेमंत खंडेलवाल ने कहा कि पार्टी कार्यकर्ता हर व्यक्ति के मन में स्वदेशी वस्तुएं खरीदने की मानसिकता बनाने की जरूरत है। इससे रोजगार बढ़ेगा, हमारा उत्पादन बढ़ेगा और हम निर्यात के क्षेत्र में आगे बढ़ेंगे। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री जी भारत को अगले कुछ सालों में दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था और 2047 तक दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाना चाहते हैं। इस संकल्प को साकार करने के लिए जरूरी है कि हम हर दिल तक यह बात पहुंचायें कि कोई भी व्यक्ति कुछ भी खरीदने से पहले एक बार यह जरूर सोचे कि वह वस्तु देशी है या विदेशी। जीएसटी रिफॉर्म कोई सामान्य बात नहीं, स्वदेशी को मिलेगा आधार-श्री सी.पी. जोशी राजस्थान के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष एवं आत्मनिर्भर भारत संकल्प अभियान के राष्ट्रीय सह-संयोजक सी. पी. जोशी ने कहा कि पं. दीनदयाल उपाध्याय जी की जयंती 25 सितंबर से स्वदेशी के मूल मंत्र के साथ शुरू होने वाला सबसे बड़ा आत्मनिर्भर भारत संकल्प अभियान पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी की जयंती 25 दिसंबर तक चलेगा। यह कोई सामान्य अभियान नहीं, बल्कि देश की दिशा और दशा बदलने वाला अभियान है। यह भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का संकल्प है। अखंड भारत के समय हमारी अर्थव्यवस्था विश्व की 40 प्रतिशत थी। पहली शताब्दी से पंद्रहवीं शताब्दी तक हमारा देश विश्व उत्पादन का 32 प्रतिशत करता था। 1720 ईस्वी तक भी हमारी अर्थव्यवस्था 18 प्रतिशत थी। हमारी आर्थिक संपन्नता और आत्मनिर्भरता के कारण ही मुग़लों से लेकर अंग्रेज़ों तक ने हमारे देश को लूटा। अंग्रेज़ों के आने से पहले हम “उत्तम कृषि, मध्यम व्यापार और निम्न चाकरी” की नीति पर चलते थे, लेकिन अंग्रेज़ों के शासन के बाद यह सब बदल गया। आज़ादी के बाद हम गरीबी रेखा के नीचे और निरक्षरता में 75 प्रतिशत तक पहुँच गए। हम आज़ादी से पहले स्वदेशी के कारण आत्मनिर्भर थे, लेकिन आज़ादी के बाद दुनिया पर निर्भर हो गए। जो लोग शासन में थे, उन्होंने ऐसी नीतियाँ बनाईं जिनके कारण हम दूसरों पर निर्भर होते चले गए। स्वदेशी के मूलमंत्र को हर नागरिक तक पहुंचाएं कार्यकर्ता भारत संकल्प अभियान के राष्ट्रीय सह-संयोजक श्री सी. पी. जोशी ने कहा कि आज हमारा देश दुनिया का सबसे बड़ा युवा देश है। युवा न केवल उपयोग अधिक करता है, बल्कि अधिक उत्पादन भी करता है और देश की जीडीपी में बड़ा योगदान दे सकता है। इसलिए हमें आत्मनिर्भर भारत संकल्प अभियान को घर-घर तक पहुँचाकर स्वदेशी के मूल मंत्र को प्रत्येक नागरिक तक पहुँचाना होगा। उन्होंने कहा कि जीएसटी रिफॉर्म कोई सामान्य बात नहीं है, हमने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि ऐसा होगा। यह आने वाले समय में स्वदेशी के लिए बहुत बड़ा आधार बनेगा। हमारे देश के पास दुनिया की सबसे अधिक कृषि भूमि है। मध्यप्रदेश संसाधनों से समृद्ध है। भारत दुनिया के कुल निर्यात का लगभग 40 प्रतिशत करता है और गेहूं, दूध तथा सौर ऊर्जा के क्षेत्र में अग्रणी है। अब हमारा देश हथियारों के क्षेत्र में भी आत्मनिर्भर बनकर अन्य देशों को हथियार उपलब्ध करा रहा है। कोरोना काल में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के आह्वान पर देश एकजुट होकर खड़ा था। अब स्वदेशी के लिए भी वैसी ही एकजुटता की आवश्यकता है। 25 सितंबर से 25 दिसंबर तक स्वदेशी का संदेश हर घर और हर दुकान तक पहुँचना चाहिए, ताकि भारत एक बार फिर आत्मनिर्भर बनकर 2047 तक विकसित राष्ट्र बन सके। आत्मनिर्भर भारत बनाने स्वदेशी के आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाएं कार्यकर्ता – श्री हितानंद जी भाजपा के प्रदेश संगठन महामंत्री हितानंद ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी कहते हैं कि आत्मनिर्भर भारत का रास्ता गरीब, किसान, महिला और युवाओं की भागीदारी से होकर जाता है। आत्मनिर्भर भारत संकल्प अभियान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी की सोच का विस्तार है, जिसका लक्ष्य भारत को सामाजिक और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना है। आत्मनिर्भर भारत बनाने के लिए हर त्यौहार पर आमजन जो खरीदारी करते हैं, वह सिर्फ स्वदेशी वस्तुओं की ही करें। प्रधानमंत्री जी ने कहा है कि हम भारत के लोग वही वस्तुएं खरीदें, जिसे बनाने, तैयार करने में भारतीयों का पसीना बहा हो। प्रधानमंत्री जी के इन विचारों को आत्मसात करते हुए हम सभी कार्यकर्ताओं को आत्मनिर्भर भारत संकल्प सम्मेलन का आयोजन कर स्कूली छात्रों से लेकरी शासकीय विभागों, धार्मिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक संगठनों, युवाओं, महिला संगठनों, बुद्धिजीवियों के साथ व्यापारिक संगठनों को इस आंदोलन में सहभागी बनाना है। भाजपा के सभी मोर्चां, प्रकोष्ठों के साथ समान विचारधारा वाले संगठनों को साथ में लेकर उद्योग सम्मेलन, प्रभात फेरी, रथ यात्रा, एमएसएमई उद्योगपति सम्मेलनों का आयोजन कर स्वदेशी के इस आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाना है। प्रधानमंत्री जी भारत को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बना रहे हैं भाजपा के प्रदेश संगठन महामंत्री श्री हितानंद जी ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी भारत को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए स्वदेशी को एक आंदोलन के रूप में ले रहे हैं। भारत की स्वतंत्रता का आंदोलन जो हुआ था, वह सिर्फ देश को आजादी दिलाने के लिए आंदोलन नहीं था। वह आंदोलन भारत को संस्कृति, भाषा, संस्कार और उपयोग की वस्तुओं में स्वदेशी की खुशबू के लिए था। स्वदेशी को बढ़ावा देने के लिए प्रधानमंत्री जी ने अमेरिका से ट्रड डील नहीं की। उन्होंने कहा कि भारत के किसानों, पशुपालकों का अहित नहीं होने दूंगा। यह अभियान जनभागीदारी से चलाया जाना है, इसलिए इसमें सभी समाजिक, व्यापारिक और समान विचारधारा वाले संगठनों की सहभागिता सुनिश्चित करें। स्वदेशी आंदोलन से हर भारतीय को जोड़कर इसे जन आंदोलन बनाने के लिए कार्य करना है, ताकि स्वदेशी को बढ़ावा मिल सके और भारत की सांस्कृतिक पहचान को और मजबूत बनाया जा सके। स्वदेशी अपनाने के लिए बड़े स्तर पर हस्ताक्षर अभियान चलाया जाएगा। इसके लिए 21 से 25 सितंबर तक जिला कार्यशालाएं आयोजित होगी। 26 से 30 सितंबर तक मंडल कार्यशालाएं एवं प्रदेश स्तरीय पत्रकार वार्ता का आयोजन होगा। 1 से 5 अक्टूबर तक वक्ता कार्यशाला, 1 से 30 नवंबर तक स्वदेशी रील्स प्रतियोगिता ऑनलाईन क्विज प्रतियोगिता, आत्मनिर्भर भारत निबंध प्रतियोगिता, आत्मनिर्भर भारत स्पीच प्रतियोगिता का आयोजन भी किया जाना है। 1 से 25 दिसंबर तक घर-घर संपर्क, जिला स्तर पर 3 से 15 अक्टूबर तक पत्रकार वार्ताएं, 16 से 30 अक्टूबर तक महिला एवं युवा सम्मेलन, 1 से 15 नवंबर तक व्यापारी, लघु उद्योगी एवं प्रोफेशनल्स सम्मेलन व कालेज स्तरीय स्वदेशी संकल्प सेमीनार, 16 से 30 नवंबर तक स्वदेशी मेला, 1 से 25 दिसंबर तक घर-घर संपर्क, आत्मनिर्भर भारत संकल्प रथ और पदयात्रा का आयोजन होगा। मंडल स्तर पर 15 अक्टूबर से 15 नवंबर के बीच मंडल सम्मेलन, 16 से 30 नवंबर तक महिला एवं युवा सम्मेलन, 1 से 15 दिसंबर तक स्ट्रीट वेंडर, छोटे दुकानदार एवं स्थानीय कारीगर सम्मेलन व संपर्क, 1 से 25 दिसंबर तक घर-घर संपर्क के साथ 25 दिसंबर को अभियान का समापन होगा। इस दौरान प्रदेश शासन के मंत्री श्री नारायण सिंह कुशवाह, श्री नागर सिंह चौहान, श्रीमती कृष्णा गौर, प्रदेश महामंत्री व अभियान के प्रदेश संयोजक श्री रणवीर सिंह रावत, प्रदेश उपाध्यक्ष व सह संयोजक श्रीमती सीमा सिंह, श्री योगेश ताम्रकार, प्रदेश मंत्री श्री राजेश पाण्डे, प्रदेश कोषाध्यक्ष श्री अखिलेश जैन, आर्थिक प्रकोष्ठ के प्रदेश संयोजक श्री योगेश मेहता सहित प्रदेश टोली के सदस्य मंचासीन रहे। कार्यशाला में पार्टी के प्रदेश पदाधिकारी, संभाग प्रभारी, जिला प्रभारी एवं अभियान के जिला टोली के सदस्य उपस्थित रहे।
लखनऊ,02 सितंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने कैबिनेट बैठक में 15 बड़े फैसले लिए हैं. इसमें आउटसोर्सिंग सेवाओं को पारदर्शी बनाने के लिए UP आउटसोर्स सेवा निगम का गठन किया गया. इसके साथ-साथ लखनऊ-कानपुर में ई-बस प्रोजेक्ट, नई निर्यात प्रोत्साहन नीति 2025-30 और शाहजहांपुर में स्वामी शुकदेवानंद विश्वविद्यालय की स्थापना शामिल है. इन कदमों से शिक्षा, रोजगार, इंफ्रास्ट्रक्चर और निर्यात को बढ़ावा मिलेगा.
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने प्रदेश में आउटसोर्सिंग सेवाओं को अधिक पारदर्शी, सुरक्षित और जवाबदेह बनाने के लिए एक ऐतिहासिक कदम उठाया है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अगुवाई में हुई कैबिनेट बैठक में कुल 15 प्रस्तावों को स्वीकृति दी गई. इसमें कम्पनीज एक्ट-2013 के सेक्शन-8 के अंतर्गत उत्तर प्रदेश आउटसोर्स सेवा निगम लिमिटेड के गठन को मंजूरी देना भी शामिल रहा. यह एक पब्लिक लिमिटेड कंपनी होगी, जिसे नान-प्रॉफिटेबल संस्था के रूप में संचालित किया जाएगा. इसके माध्यम से अब आउटसोर्सिंग एजेंसियों का चयन सीधे विभाग नहीं करेंगे. इनका चयन निगम जेम पोर्टल के माध्यम से निष्पक्ष और पारदर्शी प्रक्रिया के माध्यम किया जाएगा. आउटसोर्स कर्मचारियों का चयन तीन वर्ष के लिए किया जाएगा. कर्मचारियों के लिए 16 से 20 हजार रुपए प्रतिमाह मानदेय निर्धारित किया गया है. इस निर्णय के माध्यम से सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि प्रत्येक कर्मचारी को उसका पूरा हक मिले और उसका भविष्य सुरक्षित रहे. यह निर्णय न केवल लाखों युवाओं को बेहतर अवसर देगा, बल्कि प्रदेश में रोजगार और सुशासन का नया मॉडल भी स्थापित करेगा. प्रदेश के वित्त एवं संसदीय कार्यमंत्री सुरेश खन्ना ने कैबिनेट के निर्णयों की जानकारी दी. उन्होंने बताया कि प्रदेश के विभिन्न विभागों और संस्थाओं में लंबे समय से आउटसोर्सिंग एजेंसियों के माध्यम से बड़ी संख्या में कार्मिक सेवाएं प्रदान कर रहे थे. लेकिन, लगातार यह शिकायतें सामने आ रही थीं कि उन्हें सरकार द्वारा स्वीकृत मानदेय का पूरा भुगतान नहीं मिल रहा. साथ ही ईपीएफ, ईएसआई जैसी अनिवार्य सुविधाओं का नियमित अंशदान भी कई बार एजेंसियों द्वारा नहीं किया जाता था. इन अनियमितताओं को खत्म करने और कर्मचारियों के हितों की रक्षा के लिए यह निगम गठित किया गया है. अब आउटसोर्सिंग एजेंसियों का चयन सीधे विभाग नहीं करेंगे, बल्कि निगम जेम पोर्टल के माध्यम से निष्पक्ष और पारदर्शी प्रक्रिया से एजेंसी तय करेगा.कर्मचारियों का मानदेय 16 से 20 हजार रुपये प्रतिमाह निर्धारित किया गया है.आउटसोर्स कर्मचारियों से महीने में 26 दिन सेवा ली जा सकेगी.कर्मचारी तीन वर्षों के लिए अपनी सेवाएं दे सकेंगेकर्मचारियों का वेतन 1 से 5 तारीख तक सीधे उनके खातों में जाएगा.ईपीएफ और ईएसआई का अंशदान अब सीधे कर्मचारियों के खाते में जाएगा, पहले यह राशि सर्विस प्रोवाइडर के पास चली जाती थी.किसी भी प्रकार की अनियमितता पाए जाने पर सेवा तुरंत समाप्त की जा सकेगी.आउटसोर्सिंग के लिए चयन प्रक्रिया में लिखित परीक्षा और साक्षात्कार का प्रावधान किया गया है. इससे बेहतर गुणवत्ता वाले और योग्य कार्मिकों की नियुक्ति सुनिश्चित होगी. वित्त मंत्री ने बताया कि नई व्यवस्था में संवैधानिक प्रावधानों के तहत एससी, एसटी, ओबीसी, ईडब्ल्यूएस, दिव्यांगजन, भूतपूर्व सैनिक और महिलाओं को नियमानुसार आरक्षण मिलेगा. महिलाओं को मैटरनिटी लीव का भी अधिकार दिया जाएगा. कर्मचारियों की कार्यक्षमता और दक्षता बढ़ाने के लिए समय-समय पर प्रशिक्षण भी प्रदान किया जाएगा. इसके अलावा, सेवा के दौरान कर्मचारी की मृत्यु होने पर 15 हजार रुपये अंतिम संस्कार सहायता के रूप में दिए जाएंगे.
सांसद आलोक शर्मा की पहल पर आयोजित राष्ट्रव्यापी विचार एवं परामर्श सम्मेलन
भोपाल 30 अगस्त(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर) संविधान संशोधन के माध्यम से संसद और विधानसभाओं के चुनावों को एक साथ कराने के मुद्दे पर देश में आम सहमति बन गई है। इस मुद्दे पर बनी रामनाथ कोविंद कमेटी ने सभी दलों के प्रतिनिधियों के प्रयासों से तैयार सिफारिशें प्रस्तुत कर दीं हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चाहते हैं एक सौ चालीस करोड़ नागरिकों के इस देश में ये सुधार आम जनता की पहल पर किया जाए। यही वजह है कि देश के उद्यमियों और विचारशील लोगों से संवाद करके इस कानून के स भी पहलुओं पर राय जुटाई जा रही है। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय मंत्री ओम प्रकाश धनखड़ ने आज इस मुद्दे पर विचारोत्तेजक भाषण करके राजधानी के बुद्धिजीवियों और उद्योगपतियों के बीच समर्थन जुटाया।इस अवसर पर इंदौर के महापौर पुष्यमित्र भार्गव, विधायक भगवानदास सबनानी, महापौर मालती राय, भाजपा जिलाध्यक्ष रवीन्द्र यति भी उपस्थित थे। ये कार्यक्रम भोपाल सीहोर सांसद आलोक शर्मा की पहल पर आयोजित किया गया था। भाजपा के प्रखर राष्ट्रीय वक्ता ओमप्रकाश धनखड़ ने कहा कि भोपाल पूरे देश का दिल है । इस दिल से उठी आवाज को पूरा देश गौर से सुनता है। सांसद आलोक शर्मा ने यहां के उद्यमियों और बुद्धिजीवियों के माध्यम से एक देश एक चुनाव का विचार देश के समक्ष प्रस्तुत किया है। निश्चित तौर पर पूरा देश आम जन के दिल की ये आवाज के समर्थन में आगे बढ़ेगा। अपने तथ्यात्मक उद्बोधन में उन्होंने बताया कि देश पांच ट्रिलियन डालर की अर्थव्यवस्था का टारगेट पूरा करने जा रहा है। हमारी अर्थव्यवस्था चार दशमलव दो ट्रिलियन डालर तक तो पहुंच चुकी है। हम दुनिया के देशों के बीच चौथे नंबर पर हैं अब तीसरे नंबर पर आने के लिए प्रयासरत हैं। हमारी विकास दर छह दशमलव पांच है जबकि हमसे ऊपर वाले तीनों देशों की विकास दर दो के आंकड़े से नीचे है। हमारी आबादी और बाजार दोनों विशाल हैं। हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तो अहर्निशं सेवामहे के सूत्र वाक्य पर अमल करते हुए तेजी से नए नए आयामों पर कार्य कर रहे हैं। यही वजह है कि विश्व की महाशक्तियों को भरोसा हो गया है कि भारत की यही विकास दर रही तो जल्दी ही विकसित देशों का उनका ताज छिन जाएगा। श्री धनख़ड़ ने कहा कि हर चार महीनों में देश में कहीं न कहीं चुनाव आ जाते हैं। इससे देश के विकास पर सीधा असर पड़ता है। उन्होंने बताया कि रामनाथ कोविंद कमेटी ने पाया कि यदि देश में एक साथ चुनाव कराए जाएं तो हमारे चुनाव खर्च में तीस प्रतिशत की कमी आ सकती है। प्रशासनिक अमला और राजनैतिक दलों के लगभग पैंतालीस करोड़ लोग मिलकर ये चुनाव संपन्न कराते हैं। इससे धन के साथ लगभग 136 कार्य दिवसों की हानि भी होती है। उन्होने बताया कि हमारी सरकारों का राजस्व व्यय बढ़ता जा रहा है। सरकारी तंत्र पर किया गया ये खर्च हमारी अर्थव्यवस्था में केवल दो बार घूम पाता है। इसके विपरीत हमें पूंजीगत व्यय से विकास के काम करना पड़ते हैं। ये राशि हमारी अर्थव्यवस्था में छह बार घूमती है,जिससे हमारी आय बढ़ती है। उन्होंने बताया कि देश में 1967 तक सारे चुनाव एक साथ ही होते थे।लाल बहादुर शास्त्री के निधन के बाद श्रीमती इंदिरा गांधी ने अपना वर्चस्व बढ़ाने के लिए 1972 में होने वाले चुनाव 1971 में ही करा दिए। उनका पांसा उलटा पड़ा और जनादेश उनके खिलाफ आ गया। श्रीमती गांधी फंस गईं तो उन्होंने चुनावों का कानून ही बदल दिया। नई पीढ़ी को तो पता ही नहीं है कि कैसे मनमाने फैसले लिए गए। उन्होंने संसद के नाम पर कानून बना दिया कि राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के चुनावों पर दायर याचिकाएं सुनने का अधिकार सुप्रीम कोर्ट को भी नहीं है। इस कानून को उन्होंने 1971 के चुनावों के पहले की तिथि से ही लागू कर दिया। इसके बाद का चुनाव 1976 में होना था उसे 1977 में एक साल बाद करवाया। सत्ता के लिए मनमानी की ये प्रथा आगे भी जारी रही। राजीव गांधी की हत्या के बाद चुनाव तीन महीने आगे खिसका दिए गए। इस दौरान देश भर में कलश यात्राएं निकालकर सहानुभूति को भुनाने का अभियान चलाया गया। सिर्फ एक आदमी के लिए पूरे देश के चुनावों के साथ खिलवाड़ किया गया। उन्होंने कहा कि राजनैतिक दल हर बूथ पर अपना बीएलए नियुक्त करता है। इस बीएलए को यदि कुछ गलत होता दिखे तो चुनाव आयोग उसकी सिफारिश पर गौर करता है। भाजपा तो हर बूथ पर अपना पंजीकृत बीएलए तैनात करती है। जबकि कांग्रेस को ज्यादातर बूथों पर बीएलए भी नहीं मिलते। वह अपना ढांचा तो खड़ा कर नहीं पाती और चुनाव आयोग पर मनगढ़ंत लांछन लगाती रहती है। हम तो साठ सालों तक विपक्ष में रहे। हमारे नेताओं को फर्जी आरोपों में जेल भेजा जाता रहा। इसके बावजूद हमने कभी देश की संवैधानिक संस्थाओं पर आरोप नहीं लगाए। कांग्रेस के नेता देश की संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल खड़े करके दुश्मन देशों की भाषा बोलते हैं।
सांसद आलोक शर्मा की पहल पर ओमप्रकाश धनखड़ ने सेल्फी प्वाईंट का उद्घाटन भी किया।
उन्होंने बताया कि कांग्रेस तो बंदी प्रत्यक्षीकरण जैसा दमनकारी कानून लाई थी। जिसमें इकतरफा कार्रवाई में जेल भेजे गए व्यक्ति के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पाती थी। उसे अदालत में भी प्रस्तुत नहीं किया जाता था. यही वजह है कि देश में कानूनों को आम सहमति से निर्मित करने का प्रयास किया जा रहा है। दुनिया के कई विकसित देश अपने चुनाव एक साथ करवाते हैं। हम तो हमेशा से एक देश एक चुनाव की बात कहते रहे हैं। हमारे चुनावी घोषणा पत्र इसके गवाह हैं। मोदी जी चाहते हैं कि जनमत की राय लेकर ही चुनाव जैसा महत्वपूर्ण कानून बनाया जाए। संसद के भीतर इस पर काम पूरा हो चुका है। कोविद कमेटी ने सिफारिश की है कि राष्ट्रपति एक तारीख घोषित करें।उसे आम चुनाव की तिथि कहा जाएगा। हर बार इसी तिथि को चुनाव होंगे। इन चुनावों को एक पखवाड़े के भीतर संपन्न करा लिया जाएगा। यदि कहीं सरकारें अल्पमत की वजह से गिर जाएं तो मध्यावधि चुनावों से चुनी सरकारों का कार्यकाल भी इसी तिथि तक ही होगा।समिति ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 82ए और 324ए में संशोधन का प्रस्ताव रखा है, ताकि लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और स्थानीय निकायों के लिए एक साथ चुनाव कराए जा सकें। इस मुद्दे पर पूर्व कमिश्रर कवीन्द्र कियावत , पूर्व आईएएस राजेश प्रसाद मिश्र, और कई अन्य गणमान्य नागरिकों ने इस मुद्दे पर अपने सुझाव रखे जिन्हें चुनाव आयोग को भेजा जाएगा। ट्रक ट्रांसपोर्ट ओनर वेलफेयर आर्गेनाईजेशन के अध्यक्ष कमल पंजवानी ने कहा कि भोपाल के उद्यमी अपव्यय पर रोक लगाने के प्रयासों का हमेशा से समर्थन करते रहे हैं। भोपाल के उद्यमियों की ओर से डाक्टर शैलेश लुनावत ने सभी आगंतुकों के प्रति आभार व्यक्त किया।
भोपाल,14 अगस्त(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। भारतीय लोकतंत्र ने सेना को जो दायित्व सौंपा है उसे वह पूरी जिम्मेदारी से निभा रही है। सेना किसी भी आंतरिक मामले में बगैर बुलाए हस्तक्षेप नहीं करती है। ऐसे में सेना के आपरेशंस पर सवाल खड़े करके हमें अपनी रणनीति उजागर करने पर मजबूर क्यों किया जाता है। सेना के पूर्व अफसरों एयर वाइस मार्शल डॉ प्रमोद श्रीवास्तव, कर्नल राजीव सूद, बिग्रेडियर आर विनायक,और कैप्टन नेवी विनोद बक्शी ने अपने अनुभवों को साझा करते हुए ये बैचेनी व्यक्त की। इस कार्यक्रम का संयोजन कर्नल डॉ.गिरिजेश सक्सेना ने किया था। आयोजन की संकल्पना दुष्यन्त कुमार स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय की निदेशक करुणा राजुरकर की थी।संचालन डॉ विशाखा राजुरकर ने किया एवं आभार दुष्यन्त कुमार स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय के अध्यक्ष रामराव वामनकर ने व्यक्त किया। कार्यक्रम का शुभारम्भ करते हुए डॉ गिरिजेश ने अपने बीज वक्तव्य में कहा। मानव जीवन की शुरुआत ही युद्ध से हुई और उसका पहला युद्ध भोजन के लिये था। जैसे – जैसे सभ्यताओं का विकास और विस्तार हुआ युद्ध के स्वरूप बदलते गये पर युद्ध सदैव ही स्वार्थ की सिद्धि के लिये हुए हैं। उन्होंने कहा कि आज़ादी के बाद सेना को जो भी मिशन दिया गया उसने बखूबी पूरा किया और कभी कोई सवाल नहीं किया । इसके बावजूद बालाकोट स्ट्राइक,पुलवामा और पहलगाम हमले के बाद विपक्ष ने सेना से जो सवाल किये उससे सेना का मनोबल तोड़ने की कोशिश हुई है । अच्छी बात यह कि वर्तमान केन्द्र सरकार ने पहलगाम घटना के बाद सेना को स्वतंत्र रूप से काम करने का मौका दिया । यही वजह थी कि देश की तीनों सेनाओं ने तैयारी के साथ ऑपरेशन सिन्दूर को अंजाम दिया। इस अवसर पर कर्नल राजीव सूद ने कहा कि ऑपरेशन सिन्दूर का उद्देश्य पाकिस्तान स्थित आतंकवादी ठिकानों को नष्ट करना था। पाकिस्तान से लड़ना या पीओ के लेना इसका उद्देश्य नहीं था। उन्होंने बताया मध्य रात्रि में ये अभियान शुरू हुआ और मात्र 25 मिनट में सेना ने अपना टारगेट भेद दिया । बाद में पाकिस्तान ने हम पर ड्रोन हमले करने की कोशिश की जिन्हें सेना ने आसमान में ही नष्ट कर दिया । इस आपरेशन की सफलता में हमारे वैज्ञानिकों ने बड़ी भूमिका निभाई थी। बिग्रेडियर आर विनायक ने अपने 36 साल के अनुभवों को साझा करते हुए कहा कि भारतीय सेना कभी हारी नहीं है। उन्होंने कहा कि प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटिश सेना की ओर से पांच लाख सैनिक लड़े और द्वितीय विश्व युद्ध में हमारे साठ हजार सैनिकों में से छब्बीस हजार शहीद हुए। उन्होंने बासठ,पैंसठ, इकहत्तर के युद्ध कारगिल और आपरेशन सिन्दूर के संदर्भ में भारतीय सैनिकों के साहस और पराक्रम का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि हम कभी भी हमलावर नहीं रहे केवल बचाव की कार्रवाई की ,इसकी हमें बड़ी कीमत भी चुकानी पड़ी। इस अवसर पर समुद्री सुरंग विशेषज्ञ कैप्टन विनोद बख्शी ने बताया सेना में शामिल होने के बाद संविधान की रक्षा की शपथ लेनी होती है। उन्होंने बताया कि नेवी की सेवा में चार- चार महीने दिन – रात का पता नहीं चलता।परिवार से भी कोई सम्पर्क नहीं रहता। उन्होंने 1983 में बागमति नदी में डूबीं ट्रेन का जिक्र करते हुए बताया कि जब मैंअस्सी फीट की गहराई में डूबे ट्रेन के डिब्बे से लाश निकालता था तो मेरी रूह कांप जाती थी। कार्यक्रम के अंत में एयर वाइस मार्शल डॉ प्रमोद श्रीवास्तव ने अनेक सवाल भी उठाये । उन्होंने कहा कि सेना में सेवा देने के बाद जब हम सेवानिवृत होते हैं तो अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है । छोटे – छोटे कामों के लिये रिश्वत देनी पड़ती है तो हमें शर्म आती है। उन्होंने कहा कि फौजी में जुनून होता है और उसे कोई लालच नहीं होता । इस अवसर पर प्रश्नकाल का दौर भी हुआ जिसमें श्रोताओं की जिज्ञासाओं का समाधान भी मंच ने किया गया।
भोपाल, 27 जुलाई(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। मध्यप्रदेश की सोलहवीं विधान सभा का मानसून सत्र सोमवार, 28 जुलाई, 2025 से आरंभ होकर 8 अगस्त 2025 तक चलेगा। आज विधान सभा अध्यक्ष श्री नरेंद्र सिंह तोमर ने सत्र की तैयारियों का जायजा लिया । उन्होंने सत्र के सुचारू रूप से संचालन के लिए अधिकारियों को दिशा निर्देश दिए।
प्रमुख सचिव श्री ए. पी. सिंह के अनुसार इस बारह दिवसीय सत्र में सदन की कुल 10 बैठकें होंगी। बजट सत्र की अधिसूचना जारी होने से अब तक विधान सभा सचिवालय में तारांकित प्रश्न 1718 एवं अतारांकित प्रश्न 1659 कुल 3377 प्रश्नों की सूचनाएं प्राप्त हई हैं। जबकि ध्यानाकर्षण की 226, स्थगन प्रस्ताव की 01, अशासकीय संकल्प की 23, शून्यकाल की 65, नियम -139 की 01 सूचनाएं प्राप्त हई हैं। शासकीय विधेयक भी 03 प्राप्त हुए हैं।
उल्लेखनीय है कि मध्यप्रदेश की सोलहवीं विधान सभा का यह षष्टम सत्र होगा।
भोपाल, 22 जुलाई(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। जो राजनेता भाजपा को राष्ट्रवादी एक्सप्रेस मानकर सहयात्री बने हैं वे सभी एकमत हैं। इसलिए आज की भाजपा अंतर्विरोधों से ऊपर उठकर वसुधैव कुटुंबकम का उद्घोष करती चल रही है। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने पत्रकारों के आत्मीय सवालों के जवाब में कहा कि हम एक परिवार की तरह राष्ट्र आराधना करते हैं। यही वजह है कि भाजपा का हर कार्यकर्ता अपने पदाधिकारी का दर्पण बनकर काम करता है। श्री खंडेलवाल ने कहा कि भाजपा की स्थापना से लेकर आज तक सभी नेताओं ने अपनी अपनी योग्यता और समझ के अनुसार सामाजिक जिम्मेदारियों को निभाया है। नेता अपना काम करता है और कार्यकर्ता अपनी भूमिका का निर्वहन पूरी निष्ठा के साथ करता है। उन्होंने कहा कि भाजपा हाईकमान अपने फीडबैक और नजरिए के आधार पर फैसले लेता है।हमें उन फैसलों की जानकारी कई बार मीडिया के माध्यम से ही मिलती है। उन्होंने कहा कि उप राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के इस्तीफे की खबर उन्हें मीडिया से ही मिली थी। उन्होंने स्वास्थ्य कारणों से इस्तीफा दिया ये जानकारी भी उन्हें मीडिया से ही मिली है। इसी तरह हर स्तर पर पार्टी के पदाधिकारी अपने क्षेत्राधिकार को समझकर फैसले लेते हैं। इन सभी फैसलों का लक्ष्य भारत माता की आराधना करना होता है। खंडेलवाल ने कहा कि पार्टी का प्रत्येक कार्यकर्ता उनके लिए महत्वपूर्ण है और हर किसी को उसकी क्षमता के अनुसार जिम्मेदारी दी जाएगी। “पार्टी अब जन-आंदोलन से आगे बढ़कर एक जनविश्वास बन चुकी है। समाज हमसे अच्छे आचरण और जिम्मेदार नेतृत्व की उम्मीद करता है, जिसे हमें पूरी निष्ठा से निभाना होगा,” उन्होंने कहा। हेमंत खंडेलवाल ने अपने परिवार की राजनीतिक विरासत को भी याद किया। उन्होंने बताया कि उनके दादा 1930 में कांग्रेस को हराकर नगर पालिका अध्यक्ष बने थे और उनके पिता चार बार सांसद रहे। “हमारे परिवार में सिर्फ संस्कार, अनुशासन और भाजपा की विचारधारा की ही चर्चा होती है,” उन्होंने कहा। अपने अध्यक्षीय दृष्टिकोण को साझा करते हुए खंडेलवाल ने कहा, “मैं इसे सत्ता का प्रतीक नहीं, बल्कि सेवा और संगठन के प्रति समर्पण का अवसर मानता हूं। हम सौभाग्यशाली हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसा नेतृत्व हमें मिला है।”
पूरी दुनिया इन दिनों शैतान पर कंकर फेंककर अपने कर्तव्यों की इतिश्री मान लेने वाली घिनौनी मानसिकता से परेशान है। इस रेगिस्तानी सोच के परंपरा वाहक काल्पनिक शैतान पर लेबल चिपकाने और फिर उस पर आतंकी हमला करने में ही जुटे रहते हैं। उनकी इसी राजनैतिक शैली की वजह से कई देश आज बंजर और वीरान हो चुके हैं। इसके बावजूद भारत की कांग्रेस उस मनोदशा से उबरने के बजाए उस लुटेरी मानसिकता की ध्वजवाहक बनी हुई है। दरअसल ये मनोदशा कांग्रेस के डीएनए में शामिल है। कभी अंग्रेजों के निवेश को बचाकर उन्हें बच निकलने का सेफ पैसेज देने के लिए गढ़ी गई कांग्रेस आज भी अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रही है। नगरीय विकास एवं आवास व संसदीय कार्य मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने हाल ही में एक सामाजिक संवाद के दौरान जब कहा कि भारत हमेशा से लक्ष्मीजी, सरस्वती जी जैसी देवियों की उपासना करता रहा है। यही वजह है कि हमारी बहन बेटियां सोलह श्रंगार से सज्जित रहती आईं हैं। आज भी भारतीय वेशभूषा में सजी संवरी नारियां समाज को संस्कारित करने की बड़ी भूमिका निभाती हैं। उन्होने कहा कि कई बार बेटियां जब ऊटपटांग कपड़े पहिनकर मेरे साथ फोटो खिंचवाने आती हैं तो मैं उन्हें मना कर देता हूं और कहता हूं कि वे रुचिकर वस्त्र पहिनकर आएं। मुझे ऊटपटांग कपड़े पहिनकर आने वाली संस्कार विहीन स्त्रियां अच्छी भी नहीं लगतीं। कैलाश विजयवर्गीय राज्य के एक वरिष्ठतम मंत्री हैं। मालवा के इंदौर जैसे शहर को विकास की ऊंचाईयों तक ले जाने में उनका भी उल्लेखनीय योगदान है। इंदौर वैसे भी राज्य का सबसे प्रगतिशील नगर है। यहां के युवा देश ही नहीं पूरी दुनिया में सफलताओं के झंडे गाड़ रहे हैं। पूरा शहर एक परिवार की तरह आगे बढ़ने की चुनौतियों से जूझता है। शहर में वो हर छोटी बात चर्चा का विषय बनती है जिसकी वजह से सामाजिक व्यवस्था में मजबूती आ सकती है। यही वजह है कि सफाई के मापदंडों पर आज इंदौर ने सिंगापुर की बराबरी कर ली है। यदि कोई बाहिरी व्यक्ति गलती से सड़क पर कचरा फेंक दे तो स्थानीय राहगीर भी उसे टोक देता है. यही नहीं वह कचरा उठाकर कूढ़ेदान में भी फेंक देगा। शहर में लड़के लड़कियों की बदलती आदतें भी जनचर्चा का विषय बनती हैं। युवाओं की गलतियों को माडरेट करने में भी इंदौर का कोई जवाब नहीं है। ऐसे में वहां का जन नेता यदि युवतियों को सज संवरकर रहने और देवियों की तरह समाज का प्रतिनिधित्व करने की सलाह दे रहा है तो इस कदम का खुले दिल से स्वागत करना चाहिए। कैलाश विजयवर्गीय अपने इस उद्बोधन में समाज के आधे हिस्से को अपनी भूमिका में सफल होने का आव्हान करते नजर आ रहे हैं। वे लड़कियों से कह रहे हैं कि स्त्रियों की आजादी का मतलब छोटी छोटी वेशभूषा में नहीं बल्कि पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने में है। इंदौर के आम लोगों ने अपने लाड़ले नेता की इस सलाह को सिर आंखों पर लिया है। घर घर में लड़कियां अपने वरिष्ठ नेता का संकेत समझ रहीं हैं और सम्मानजनक वेशभूषा का उद्देश्य पूरा करने में जुट गईं हैं। इंदौर ही नहीं मालवा से उठी इस पुकार ने समूचे देश में विकास के इस पैमाने को स्वीकार किया है। इसके विपरीत कांग्रेस के नेताओं के जो बयान सामने आए हैं वे क्षोभजनक हैं। संभव था कि कांग्रेस के नेता इस मुद्दे पर चुप रहकर अपनी खोखली मानसिकता का प्रकटीकरण न करते। वोट बटोरने वाली मानसिकता से वशीभूत कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने पार्टी की अराजक सोच सामने ला दी है। उन्होंने कैलाश विजयवर्गीय के बयान का विरोध करते हुए कहा कि भाजपा के नेताओं को महिलाओं के कपड़े ही क्यों दिखाई देते हैं। यही नहीं उनके सुर में सुर मिलाते हुए कुछ प्रगतिशील सोच का झंडा उठाए फिरने वाले अखबारों ने भी इस बयान का विरोध शुरु कर दिया है। खुद को प्रगतिशील कहलाने का दंभ भरने वाले वामपंथियों के लिए तो कैलाश जी का ये बयान पच भी नहीं सकता। दुनिया भर में अराजकता फैलाने वाले धर्मों और तानाशाही ताकतों के लिए ये सुविधाजनक लगता है कि वे समाज में स्थापित मूर्तियों का भंजन करें ताकि येन केन प्रकारेन सत्ता शीर्ष पर बैठ सकें। भारत का इतिहास पढ़ने वाले जानते हैं कि किस तरह भारत में मुगल सल्तनत का पतन अय्याशी और हरमों की दुर्दशा की वजह से हुआ था। आजादी के बाद अंग्रेजों के पिट्ठुओं ने फिल्म संसार की मदद से उसी नंगई को समाज के बीच बोने का प्रयास किया ताकि भारत कभी अपने पैरों पर न खड़ा हो सके और बहुराष्ट्रीय कंपनियों का कारोबार इस विकलांग समाज में बदस्तूर जारी रहे। भारतीय समाज में शालीन वस्त्र पहिनकर प्रगतिशील सोच रखने वाली देवी अहिल्या बाई समूचे मालवा को विकास पथ पर अग्रसर कर पाईं तो ये हमारी देशज सोच की वजह से ही संभव हो सका था। वे तो रानी साहिबा थीं। उन्हें ऊटपटांग वस्त्र पहिनकर विदेशी माडल बनने से कौन रोक सकता था। वे पढ़ी लिखीं थीं और दुनिया भर के कई देशों से उनका सीधा संपर्क था। इसके बावजूद वे माता अहिल्याबाई से देवी अहिल्या केवल इसलिए बन पाईं क्योंकि उन्होंने खंडित सोच के बजाए अनुशासित सोच को प्राथमिकता दी। आज जब समाज और वर्गों को खंड खंड करके आपस में लडाने वाली कांग्रेस को लोगों ने सत्ता से बाहर धकेल दिया है तब उसके नए नेता बार बार अपने पूर्वजों की गलतियों को दुहराकर यही जताने का प्रयास कर रहे हैं कि हम नहीं सुधरेंगे। संघ और भाजपा के संस्कारों में पले बढ़े कैलाश विजयवर्गीय ने अपनी बात ठीक ढंग से कह दी और समाज ने उसको सकारात्मक नजरिए से स्वीकार किया ये संतोष की बात है।समाज को ये भी तय करना होगा कि विदेशी षड़यंत्रों को जड़ जमाने का मौका न मिले। ऐसे मूर्ति भंजकों को कुचलना हमारी भी जवाबदारी है।
दिल्ली में रविवार, 25 मई को NDA शासित राज्यों के सीएम और डिप्टी सीएम की मीटिंग में पीएम नरेंद्र मोदी ने पार्टी नेताओं से कहा है, “कहीं भी, कुछ भी मत बोलिए.”यह कहकर उन्होंने भाजपा और एनडीए के नेताओं को साफ साफ समझाईश दी है। रविवार को मुख्यमंत्रियों और डिप्टी मुख्यमंत्रियों के बीच सम्मेलन में उन्होंने देश में कैसा विकास चाहिए इस विषय पर भी अपने खेमे का मार्गदर्शन किया है। दरअसल पिछले दिनों मध्यप्रदेश के आदिवासी नेता और वरिष्ठ मंत्री कुंवर विजय शाह की जुबान ऐसी फिसली कि पूरे देश में हंगामा शुरु हो गया। विपक्ष और मोदी विरोधियों ने इसे लेकर भारी उछलकूद शुरु कर दी। मीडिया के तमाम दिग्गज भी बहती गंगा में हाथ धोने उतर आए। ऐसा माहौल बनाया गया कि मानों देश के विरुद्ध कोई बड़ी साजिश की जा रही हो. इसी सीरीज में राज्य के वित्त मंत्री जगदीश देवड़ा ने भी पार्टी नेता नरेन्द्र मोदी के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हुए सेना को अपने साथ खड़ा कर लिया । इसे भी मोदी विरोधियों ने सेना का अपमान बताना शुरु कर दिया। इसी तरह पहलगाम आतंकी हमले पर अब हरियाणा से BJP के राज्यसभा सांसद रामचंद्र जांगड़ा ने विवादित बयान दिया है। उन्होंने कहा कि अपना सुहाग खोने वाली महिलाओं में वीरांगना का भाव व जोश नहीं था, इसलिए 26 लोग गोली का शिकार बने।नेताओं के बड़बोलेपन के इन कुछ उदाहरणों ने भाजपा को बैकफुट पर ला दिया है। उनके ऊटपटांग बयानों पर नाराजगी भरी प्रतिक्रियाएं भी आईँ हैं। भारतीय समाज के लोकतांत्रिक सोच का उद्घोष करती इन प्रतिक्रियाओं के बीच न्यायपालिका के भी कुछ जजों ने बढ़ चढ़कर अपनी आस्तीनें चढाना शुरु कर दिया। कुंवर विजय शाह का मामला तो अदालत के सामने भी पहुंचा दिया गया है। सोशल मीडिया के दौर में जनता के बीच से जो प्रतिक्रियाएं आईं उससे परेशान जनजाति मामलों के मंत्री कुंवर विजय शाह घबरा गए और उन्होंने विभिन्न समाचार माध्यमों और सोशल मीडिया पर अपने बयानों पर खेद व्यक्त किया और माफी मांगी।दरअसल कुंवर विजय शाह भाजपा के संघर्ष के दौर में उभरे नेताओं में से हैं. जब दिग्विजय सिंह की सरकार हरसूद के विस्थापितों पर लाठियां भांज रही थी तब विजय शाह सरकार के आक्रोश के बीच नेता बनकर उभरे थे। राज्य के लगभग बाईस प्रतिशत आदिवासी मतदाताओं के बीच सबसे सशक्त नेता के रूप में विजय शाह सबकी निगाहों में बने रहते हैं। उनके इसी तरह के बयानों से एक बार शिवराज सिंह चौहान ने उन्हें राजनीति के मैदान से हटाने का मन बना लिया था। इसके बावजूद विजय शाह को जानने वालों को ये पता है कि वे किस तरह जन भावनाओं की अभिव्यक्ति करते हुए कुछ भी कह गुजरते हैं। उनके चुटीले अंदाज को अक्सर नजरंदाज किया जाता रहा है। यही सब जानकर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उन्हें उनके घर जाकर मनाया और पार्टी में उनका महत्व बरकरार रखा।इस बार मंच पर मौजूद भाजपा की वरिष्ठ नेत्री ऊषा ठाकुर स्वयं कह रहीं हैं कि ये जुबान फिसलने जैसा मामला है। विजय शाह अक्सर अपनी रौ में बहकर वो बातें भी कह देते हैं जो अमूमन सड़कों की भाषा कही जाती है। पाकिस्तान के कट्टर पंथियों के बारे में भारत के राष्ट्रप्रेमी जिस तरह की भाषा का प्रयोग करते हैं ऐसी की कुछ भाषा का इस्तेमाल विजय शाह ने किया था।खुद ऊषा ठाकुर बेहतरीन वक्ता हैं और उनका ओजस्वी भाषण मुर्दों में भी जान फूंकने जैसा होता है। अपनी बहन की बराबरी करने के लिए विजय शाह ने भी बढ़ चढ़कर बयान दे दिया। उनका बयान पाकिस्तान के उन कट्टर पंथियों के लिए चेतावनी देने वाला था कि हमारे हिंदुस्तान की एक मुसलमान महिला ही तुम्हारा मुकाबला कर लेती है, तो फिर पूरे हिंदुस्तान से टकराने की जुर्रत न करो। बेशक उनका भाषण गली छाप कहा जा सकता है लेकिन वह न तो देश के खिलाफ था न सेना के विरुद्ध। सेना की प्रवक्ता कर्नल सोफिया कुरैशी के प्रति अपमान का भाव भी नहीं था। बल्कि वे तो सोफिया कुरैशी को पूरे पाकिस्तान की सेना से भी ज्यादा भारी बताना चाह रहे थे। शब्दों का उचित चयन न करने की वजह से विजय शाह को दोनों हाथ जोड़कर माफी मांगनी पड़ी। विभिन्न माध्यमों पर उनकी प्रतिक्रियाओं से लोगों ने उन्हें माफ भी कर दिया और हल्का फुलका व्यंग्य समझकर बात समाप्त कर दी। भाजपा प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने भी विजय शाह के बयान को अदालत का विषय बताकर अपना पल्ला झाड़ लिया। उन्होंने तो कांग्रेस के नेताओं के देश विरोधी बयानो का उल्लेख करते हुए कहा कि कांग्रेस नेताओं को अपने गिरेबान में झांकना चाहिए। विजय शाह के मामले में अदालत क्या निर्णय लेती है ये तो सुनवाई के बाद ही पता चलेगा लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एऩडीए के नेताओं को इस तरह के बयानों में न उलझने की सलाह देते हुए स्वयं को विशाल हृदय वाले नेता होने का परिचय दिया है. बेशक विजय शाह जैसे नेताओं के बयानों को नैतिकता या मर्यादा की कसौटी पर कम नंबर मिलें लेकिन इससे उनके पूर्व में किए गये कार्यों को नजरंदाज नहीं किया जा सकता। वैसे भी लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम राजनेताओं को बोलने की आजादी देता है। वह नेताओं को जनता की आवाज बनने की छूट भी देता है।अभिव्यक्ति की आजादी तो हर भारतीय नागरिक का अधिकार है ही। ऐसे में विजय शाह को केवल लापरवाही से भरी बयानबाजी के बाद मंत्रिमंडल से बर्खास्त करने की मांग करना ज्यादति कही जाएगी। फिलहाल नरेन्द्र मोदी ने विजय शाह के माध्यम से भारत सरकार को नैतिकता के कटघरे में खड़ा करने वाले षड़यंत्रकारियों को करारा जवाब दे दिया है.ये उनकी परिपक्व राजनीति का परिचायक है।वास्तव में किसी भी पार्टी का मुखिया होता ही इसलिए है कि वो सभी नेताओं को संरक्षण प्रदान करे. कहा भी गया है कि मुखिया मुख सौ चाहिए, खानपान को एक, पाले पौसे सकल अंग तुलसी सहित विवेक। जाहिर है कि विजय शाह के माध्यम से मोदी विरोध का ख्वाब पालने वालों के स्वप्न अब धरातल पर उतर आएंगे।