
भोपाल 20 जुलाई(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)।सरकार के सूक्ष्म एवं लघु उद्योग विभाग ने जिन उद्यमियों को प्रशिक्षण देकर कुशल कामगार के रूप में जिलों में भेजा है उन्हें कई कलेक्टर वेतन ही नहीं देना चाहते हैं। गुना कलेक्टर ने ऐसे करीब दस कर्मचारियों से साल भर काम कराया और बाद में कर्मचारियों की चयन प्रक्रिया में शामिल सैडमैप को ये कहते हुए वापस लौटा दिया कि उन्हें काम करना नहीं आता है। कर्मचारियों ने अपना हक पाने के लिए शासन के दरवाजे खटखटाए हैं।
मामला सैडमैप संस्था का है। इस अर्धशासकीय संस्था को सरकार ने नई पीढ़ी के उद्यमियों को प्रशिक्षित करने के लिए तैनात कर रखा है।संस्था विभिन्न रुचियों वाले उद्यमियों को प्रशिक्षण देकर तैयार करती है और कार्पोरेट व सरकारी संस्थानों को उपलब्ध कराती है। निजी क्षेत्रकी भी कई बड़ी कंपनियां कुशल कर्मचारियों के लिए सैडमैप को डिमांड भेजती हैं और उन्हें अपनी उद्यमिता बढ़ाने में मदद मिलती है। विभिन्न जिलों में पदस्थ संस्था के क्षेत्रीय अधिकारी युवाओं को उनकी रुचि के अनुरूप प्रशिक्षण उपलब्ध कराते हैं और शासन की निर्धारित दर पर सैडमेप को भी अपना खर्ची निकालने की जवाबदारी दी गई है। शासन सीधे तौर पर संस्था को अनुदान नहीं देता है।
ताजा मामला गुना कलेक्टर सत्येन्द्र सिंह के उस इंकार से गरमाया है जिसमें उन्होंने चयन प्रक्रिया से चयनित कर्मचारियों का वेतन जारी करने से इंकार कर दिया। उनकी ओर से सैडमैप को पत्र जारी किया गया जिसमें कहा गया है कि वे कर्मचारी सक्षम नहीं हैं और उन्हें काम नहीं आता है। गुना कलेक्ट्रेट को ये अहसास तब हुआ जब उन कर्मचारियों ने कई महीनों का लंबित वेतन मांगते हुए कलेक्टर कार्यालय से संपर्क किया। कलेक्टर महोदय ने कर्मचारियों का वेतन तो जारी नहीं किया बल्कि उनके चयन का ठीकरा सैडमैप पर ही फोड़ दिया।
गौरतलब है कि सैडमैप में इन पैनल्ड रूप से जुड़ी हुई एजाईल सिक्यूरिटी फोर्स प्राईवेट लिमिटेड फर्म की ओर से आयोजित चयन प्रक्रिया में जिला शिक्षा केन्द्र के परियोजना समन्वयक का भी एक प्रतिनिधि शामिल था। उनसे अपनी कसौटी पर जांचकर युवाओं का चयन किया था। लगभग साल भर तक परियोजना में काम करते रहने के बावजूद जब कर्मचारियों का वेतन नहीं दिया गया तब उन्होंने शोरगुल मचाना प्रारंभ कर दिया। उनकी जरूरतों को देखते हुए लगभग दो माह का वेतन सैडमैप ने अपने फंड से उपलब्ध कराया ताकि बजट जारी होने और वेतन मिलने तक कर्मचारियों का जीवनयापन हो सके।
कलेक्टर गुना की ओर से जब कर्मचारियों को वेतन देने से इंकार कर दिया गया तब उन्होंने अपनी पीड़ा से शासन को अवगत कराया है। शोरगुल बढ़ता देख गुना कलेक्टर की ओर से जारी पत्र सार्वजनिक कर दिया गया जिसमें कर्मचारियों के चयन के लिए ठीकरा सैडमैप पर फोड़ा गया है।
मामले में पेंच तो ये है कि यदि गुना जिला शिक्षा केन्द्र के समन्वयक के पास वेतन देने की हैसियत नहीं थी तो उन्होंने सैडमैप से कर्मचारी मांगे ही क्यों। कर्मचारियों का चयन भी उनके प्रतिनिधि ने स्वयं किया तब क्या कलेक्टर महोदय से अनुमति नहीं ली गई थी। गुना जिला प्रशासन यदि कर्मचारियों का वेतन देने में सक्षम नहीं था तो कलेक्टर महोदय ने उन्हें अन्य उद्यमों में रोजगार मुहैया कराने की जवाबदारी क्यों नहीं निभाई। लगभग साल भर कर्मचारियों से काम लिया गया और बाद में उनकी योग्यता पर सवालिया निशान लगाकर युवाओं के जीवन से खिलवाड़ क्यों किया गया।
जनता के खजाने से लगभग अस्सी हजार करोड़ रुपयों का स्थापना व्यय वसूलने वाली नौकरशाही आखिर क्यों युवाओं को अपना दुश्मन मान रही है। इतना बड़ा बजट लेकर भी ये नौकरशाही उत्पादकता बढ़ाने के पैमाने पर लगातार फिसड्डी साबित होती जा रही है। तमाम कार्पोरेट संस्थान अपने कर्मचारियों की कुशलता बढ़ाने के लिए उन्हें नए नए प्रशिक्षण देते हैं ऐसे में सैडमैप से प्रशिक्षण पाकर सेवाएं उपलब्ध कराने वाले युवाओं के साथ ये खिलवाड़ क्यों किया जा रहा है इस पर शासन को विचार अवश्य करना होगा।
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