Month: March 2022

  • गोल्डन सिम के लिए धोखाधड़ी करने वाले धराए

    गोल्डन सिम के लिए धोखाधड़ी करने वाले धराए

    भोपाल, 17 मार्च(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। थाना गोरखपुर में 15 मार्च को हरजिन्दर सिंह उम्र 53 वर्ष निवासी गुप्तेश्वर वार्ड गुडलक अपार्टमेंट के सामने महानद्दा गोरखपुर ने लिखित शिकायत की थी कि वह स्पेयर पार्टस की दुकान चलाता है। दो फरवरी 22 को एक अज्ञात व्यक्ति द्वारा उसके साढू भाई हरविन्दर सिंह निवासी प्रेमनगर के मोबाइल में गोल्डन नम्बर सीरीज के लिये टेक्सट मैसेज भेजा गया। जिसमें गोल्डन नम्बर सीरीज के लिये 49 हजार 999 रूपये के आफर में मोबाइल में बात करने तथा व्हाटसएप मैसेज करने के लिये लिखा था। तब हरविंदर सिंह ने इस स्कीम के बारे में मुझे बताया था। हरविंदर सिंह से मेने वह नंबर लेकर उक्त मोबाइल नम्बर के धारक से कॉल एवं व्हाटसएप पर मैसेज से बात की। मोबाइल नम्बर के धारक ने स्वयं को एयरटेल का एजेन्ट बताया एवं एयरटेल के गोल्डन मोबाइल नम्बर 900000000 की सिम के एलाटमेंट के लिये व्हाटसएप में टेक्सट इन्वाइस भेजी। जिसमें अकाउण्ट नम्बर, आईएफएससी कोड देते हुये बैंक खाते नम्बर पर 41 हजार 300 रूपये पेमेण्ट करने के लिये कहा गया था। मेने एयू स्माल फायनेंस बैंक शाखा नेपियर टाउन के खाते से बताये गये बैंक खाते में पेमेण्ट कर दी गई। किंतु अभी तक मुझे गोल्‍डन सिम प्राप्‍त नहीं हुई और न ही मोबाईल धारक उसका फोन उठा रहा है। अज्ञात व्यक्ति द्वारा मेरे साथ 41 हजार 300 रूपये की धोखाधडी की गयी है। शिकायत पर अज्ञात मोबाइल धारक के विरूद्ध अपराध पंजीबद्ध कर प्रकरण विवेचना में लिया गया।

    पुलिस अधीक्षक जबलपुर श्री सिद्धार्थ बहुगुणा ने घटित हुई घटना को गंभीरता से लेते हुये अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक शहर दक्षिण/अपराध श्री गोपाल खाण्डेल के मार्गदर्शन में नगर पुलिस अधीक्षक गोरखपुर श्री आलोक शर्मा के नेतृत्व में थाना गोरखपुर, क्राइम ब्रांच एवं सायबर सेल की संयुक्त टीम गठित कर अज्ञात आरोपी को शीघ्र गिरफ्तार करने के निर्देश दिए।

    विवेचना के दौरान ज्ञात हुआ कि भरतीपुर के रहने वाले अशोक तीरथानी के बैंक अकाउंट में शिकायतकर्ता का पैसा ट्रांसफर कराया गया है। जिस पर अशोक तीरथानी को अभिरक्षा में लेते हुये सघन पूछताछ की गयी तो उसने अपने मित्र दिलीप कुकरेजा तथा शुभम उर्फ शिवम राय के साथ कई बैंक अकाउंट खोलकर धोखाधडी का पैसा बैंक अकाउंट में ट्रांजैक्शन करना स्वीकार किया।

    टीम ने दिलीप कुकरेजा एवं शुभम राय को गिरफ्तार कर पूछताछ करने पर जानकारी प्राप्त हुई कि मुम्बई में रहने वाले रवि मिश्रा एवं राज के कहने पर शुभम राय ने जबलपुर शहर में कई लोगों के नाम से विभिन्न बैंकों में कई बैंक अकाउंट खुलवाये हैं। जिसमें रवि मिश्रा एवं राज एयरटेल कम्पनी का एजेंट बताकर लोगों को गोल्डन सिम प्रोवाईड कराने का लालच देकर अपने गिरोह के लोगों के खाते में पैसे ट्रांसफर कराते थे। इन पैसों में से शुभम राय अपना हिस्सा लेकर शेष राशि रवि मिश्रा को ट्रांसफर कर देता था। इस तरह शुभम राय ने अन्य लोगों को भी फर्जी खाता खोलने के लिए प्रेरित किया और 52 बैंक अकाउंट में लगभग तीन करोड रूपये का ट्रांजेक्शन कराया और अपने साथी रवि मिश्रा के साथ शेयर किया।

    आरोपी शुभम राय की निशानदेही पर घटना में प्रयुक्त 52 बैंक अकाउंट के ट्रांजेक्शन, सात नग एटीएम डेबिट कार्ड, एक पासबुक, दो चैक बुक, दो आधार कार्ड, एक पेनकार्ड, एक केवायसी फार्म, आठ मोबाईल फोन, एक स्कूटी जप्त की गयी है। आरोपीगण के बैंक खातो की जानकारी प्राप्त की गयी। जिसके अनुसार लगभग तीन करोड रुपये का धोखाधडी की गयी है। तीनों आरोपियों को प्रकरण में विधिवत गिरफ्तार करते हुये मान्नीय न्यायालय के समक्ष पेश करते हुये आरोपी शुभम राय को रिमाण्ड पर लिया जा रहा है।

    गिरोह का मुख्य आरोपी मुम्बई निवासी रवि मिश्रा मूलतः बिहार पटना का रहने वाला है। वह लोगों को मैसेज एवं काल करके एयरटेल कम्पनी का वीआईपी नम्बर/फैंसी नम्बर देने का लालच देकर पैसों की मांग करता था। शुभम राय जबलपुर में लोगों को प्रति खाता 1000 रुपये का लालच देकर उनसे खाते खुलवाकर चैक बुक, एटीएम अपने पास रख लेता था तथा उक्त खातों में जालसाजी का पैसा डलवाकर शुभम राय अपना हिस्सा रखने के बाद शेष रूपए रवि मिश्रा के अकाउंट में ट्रांसफर कर देता था।

    आरोपी शुभम राय, रवि मिश्रा का दोस्त है जो कि पहले मुम्बई में लगभग पांच साल वर्ष 2007-2012 तक फिल्म सिटी में साथ में काम कर चुका है। पूर्व में शुभम राय इसी प्रकार की जालसाजी में वर्ष 2017 में लखनउ उत्तर प्रदेश में पकड़ा जा चुका है। आरोपी शुभम राय ने महाराष्ट्र, तमिलनाडू, केरल के अलावा कई राज्यों में धोखाधडी करना स्वीकारा किया है। अभी तक की पूछताछ में लगभग 500 से ज्यादा व्यक्तियों के साथ धोखाधडी एवं लगभग 52 बैंक अकाउंट खुलवाने एवं उसमें लगभग तीन करोड रुपये के ट्रांजेक्शन की जानकारी प्राप्त हुई है।

  • एक वैभवशाली राष्ट्र के निर्माण में हम सब अपना योगदान दें : विश्वास सारंग

    एक वैभवशाली राष्ट्र के निर्माण में हम सब अपना योगदान दें : विश्वास सारंग

    • राज्य स्तरीय स्व. भुवन भूषण देवलिया पत्रकारिता पुरस्कार से पत्रकार जयराम शुक्ल सम्मानित
    • पत्रकारिता और राष्ट्रवाद पर विद्वानों ने रखे सारगर्भित विचार

    भोपाल। स्व भुवन भूषण देवलिया स्मृति व्याख्यानमाला समिति की तरफ से रविवार को माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि के सभा कक्ष में पत्रकारिता और राष्ट्रवाद पर एक विमर्श का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि मप्र के चिकित्सा शिक्षा मंत्री विश्वास सारंग थे जबकि अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार रमेश शर्मा ने की। कार्यक्रम में प्रसार भारती बोर्ड के अध्यक्ष जगदीश उपासने, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. केजी सुरेश, भारतीय जनसंचार परिषद नई दिल्ली के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी, वरिष्ठ पत्रकार राजेश बदल ने प्रमुख वक्ता के रूप में अपने ओजस्वी। विचारों से विषय की गम्भीरता को प्रतिपादित किया। जबकि इस विमर्श में विषय प्रवर्तन का कार्य स्वदेश भोपाल के संपादक शिवकुमार ‘विवेक’ ने किया। इस अवसर पर विंध्य क्षेत्र से नाता रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार जयराम शुक्ल को राज्य स्तरीय स्व. भुवन भूषण देवलिया पत्रकारिता पुरस्कार से प्रदेश के चिकित्सा मंत्री विश्वास सारंग ने सम्मानित किया।
    भुवनभूषण देवलिया पत्रकारिता सम्मान का इस वर्ष ग्यारहवां वर्ष था। प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार श्री शुक्ल को सक्रिय और सार्थक लेखन के लिए सम्मान प्रदान किया गया। पुरस्कार स्वरू श्री शुक्ल को 11 का चेक, शॉल श्रीफल के साथ स्मृति चिन्ह भेंट किये गए।
    इस अवसर पर पत्रकारिता और राष्ट्रवाद पर अपने विचार रखते हुए प्रदेश के चिकित्सा मंत्री विश्वास सारंग ने कहा कि जब पत्रकारिता किसी बात को कहती है तो वह नीचे तक जाती है, इसलिए पत्रकार को राष्ट्रवादी होना ही चाहिए। उन्होंने कहा कि हम सब मिलकर एक वैभवशाली राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान दे, यह समय की मांग और हमारा राष्ट्र प्रेम भी है। श्री सारंग ने कहा कि कोई भी राष्ट्र सही रूप में तब बनता है जब उसका संघीय ढांचा मजबूत हो। इसे बनाने में आंचलिक पत्रकारिता का बड़ा योगदान है। श्री सारंग ने इस बात पर दुःख जताते हुए कहा कि आजादी के पचहत्तर साल बाद भी हमें यदि राष्ट्रवाद पर चर्चा करनी पड़े तो यह सोचनीय है। उन्होंने कहा कि आजादी के बाद तो कारखाना निर्माण और पुल निर्माण की बात तो होती रही पर व्यक्ति निर्माण पर किसी ने चर्चा नहीं की। उन्होंने इस बात पर संतोष जाहिर करते हुए कहा कि स्व भुवन भूषण देवलिया स्मृति व्याख्यानमाला समिति ने जो आज विषय रखा है वह प्रासंगिक है। समिति निरन्तर यह आयोजन कर रही है जो सराहनीय है। श्री सारंग ने कहा कि उनकी अपने जीवन में कभी देवलिया जी से भेंट नहीं हुई लेकिन उनके शागिर्दों से बहुत तारीफ़ सुनी है। ऐसे योग्य गुरु और काबिल पत्रकार नई पीढ़ी का मार्गदर्शन करते हैं, श्रेष्ठ कार्य के लिए उनके प्रेरक भी बनते हैं। ऐसी विभूति को नमन करता हूं। श्री सारंग ने शुरुआत में स्व भुवन भूषण देवलिया जी के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित की।

    वर्तमान पत्रकारिता में राष्ट्रबोध का संकट : उपासने

    विचार गोष्ठी को ऑनलाइन सम्बोधित करते हुए प्रसार भारती बोर्ड के अध्यक्ष जगदीश उपासने ने कहा कि राष्ट्र के प्रति प्रेम और ईमानदारी का भाव हो तभी पत्रकारिता सार्थक हो सकती है और तभी लोकतांत्रिक व्यवस्था भी सफल रहेगी। श्री उपासने ने कहा कि बहुत से लोगों को लगता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आने के बाद राष्ट्रवाद बढ़ गया है, जबकि ऐसा नहीं है। यह राष्ट्रवाद नहीं बल्कि राष्ट्रबोध कहा जा सकता है, जिसका संकट पत्रकारिता में दिख रहा है। किसी भी राष्ट्र के पत्रकार हो या निवासी उनमें राष्ट्रबोध तो होना ही चाहिए। 2013 की एक घटना का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि राष्ट्रबोध नीचे के स्तर से ही नही ऊपर के स्तर से ही गायब है। श्री उपासने ने कहा कि जो लोग समन्वयवादी संस्कृति की बात करते हैं वह कहीं नहीं है, यह बात सिर्फ भारत में होती है जबकि हम समन्वयवादी नहीं हैं पर सब को स्वीकार कर लेते हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि सात हजार पुरानी हमारी संस्कृति है तो यह बोध किसको आएगा। श्री उपासने ने जोर देते हुए कहा कि यदि जब तक एक भी व्यक्ति जीवित रहेगा हमारा भारत और हमारी संस्कृति जीवित रहेगी। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र का आनन्द यही है कि आप विरोध तो करें पर किसी का मजाक न बनाएं। पत्रकारिता के पक्षधर होने पर कड़ी आपत्ति जताते हुए प्रसार भारती बोर्ड अध्यक्ष ने कहा कि जिनका काम ही सही सूचना देना है वह स्वयं ही अज्ञानी हैं। श्री उपासने ने पत्रकारों को सलाह देते हुए कहा कि अपनी विचारधारा को सिर्फ सम्पादकीय पेज पर जगह दें, पर समाज में मतभेद पैदा न करें।

    पत्रकारिता राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत होनी चाहिये : प्रो. सुरेश

    पत्रकारिता और राष्ट्रवाद पर अपने विचार व्यक्त करते हुए माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति केजी सुरेश ने कहा कि पत्रकारिता किसी विचारधारा की नहीं होनी चाहिए बल्कि पत्रकारिता राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत होनी चाहिए। बालकोट हमले का जिक्र करते हुए सुरेश प्रोफेसर सुरेश ने कहा कि कुछ ऐसे विषय पर हमें अपनी सरकार पर विश्वास करना ही चाहिए, न कि किसी दूसरे देश की सेना के प्रवक्ता और या दूसरे राष्ट्र के समाचार पत्रों पर, यह हमारा राष्ट्र प्रेम नहीं है । 1971 के युद्ध का जिक्र करते हुए प्रोफेसर सुरेश ने कहा कि उस समय पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान के दो टुकड़े इसलिए कर दिए थे क्योंकि संपूर्ण राष्ट्र उनके साथ था और यही राष्ट्रवाद है। प्रो. सुरेश ने कहा कि राष्ट्रवाद को इतिहास के पन्नों में गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया। उसे नाजीवाद और फासीवाद की तरह संकुचित तरीके से जनता के सामने प्रस्तुत किया गया। उन्होंने कहा कि भारत के अलग-अलग जगहों, मठ-मंदिरों या अन्य स्थानों में जो विभिन्न प्रकार की संस्कृति दिखाई देती है, वही हमारा राष्ट्रत्व है और वही भारत का राष्ट्रबोध है। यूक्रेन का जिक्र करते हुए विपक्षी दलों के बयान को हास्यास्पद करार देते हुए प्रो. सुरेश ने कहा कि आप इसलिए विरोध कर रहे कि एक व्यक्ति या दल आपको पसंद नहीं है। वहां फंसे भारतीयों को लेने कोई मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री नहीं जाएंगे, पर सरकार ने अपनी जिम्मेदारियों को निभाते हुए 4 मंत्री भेजे हैं, जो लोगों को सुरक्षित निकालकर ला रहें। उन्होंने कहा कि सरकार की आलोचना राष्ट्र विरोध नहीं है पर वह परिस्थितियों पर निर्भर होनी चाहिए

    75 सालों में हम अपना राष्ट्र चरित्र नहीं बना पाए : बादल

    पत्रकारिता और राष्ट्रवाद विषय पर व्याख्यान माला को सम्बोधित करते हुए राज्यसभा टीवी के पूर्व निदेशक एवं वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल ने कहा कि मुझे यह कहते हुए अफसोस हो रहा है कि इन 75 सालों में हम अपना राष्ट्र चरित्र नहीं बना पाए। श्री बादल ने कहा कि यदि हम देश के प्रति ईमानदार नहीं हैं तो हम राष्ट्रद्रोही हैं। उन्होंने कहा कि एक हजार साल से हमारा हिंदुत्व खतरे में नहीं था पर इस सियासी पुट का नतीजा है। उन्होंने कहा कि सियासत ने हमें बांट दिया है, कोई भी दल इसमें कम नहीं है। सब अपने-अपने स्वार्थ के लिए इस तरह के प्रपंच रच रहे हैं। श्री बादल ने कहा कि सियासतदानों ने इसे धंधा बना दिया है। स्व भुवन भूषण देवलिया का जिक्र करते हुए श्री बादल ने कहा कि वह राष्ट्रप्रेम करते थे और अन्य सभी में भी राष्ट्रप्रेम जगाते थे। स्व. आज हर पत्रकार के ह्रदय में विराजमान हैं। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता देश का चौथा स्तम्भ है, यह बड़ी जिम्मेदारी उस समय हमें बुजुर्गों ने दी है, उसे हमें पूरी ईमानदारी से निभाना है।

    यह विभाजनकारी ताकतों को उखाड़ फेंकने का समय : प्रो. द्विवेदी

    पत्रकारिता और राष्ट्रवाद विषय पर व्याख्यान माला में प्रो. संजय द्विवेदी ने कहा कि हम आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं। यह समय विभाजन करने वाली ताकतों को पूरी तरह से उखाड़ फेंकने का संकल्प लेने का समय है। उन्होंने कहा कि आजादी के समय हमारे नायको और पत्रकारों की लड़ाई स्वराज की थी। आज देश को जोड़ें रखने वाली शक्ति के सामने यह एक बड़ी चुनौती है। जो स्थान-स्थान पर संघर्षों को हवा दे रहे हैं उनको पहचानने की जरुरत है। प्रो. द्विवेदी ने सवाल उठाते हुए कहा कि हिंदुस्तान में क्या सब कुछ गलत ही हो रहा है। इस षड्यंत्र के कर्ताओं को देखिए किस तरह तिल का ताड बना रहे हैं। मानवता विरोधी विचार हमारे संकट को बढ़ा रहे हैं। उन्होंने कहा कि हम किसी एक विचार, धर्म या पंत को मानने वाले नहीं है। हम भारत को जाने, उसे बनाएं, छोटी-छोटी बातों पर लड़कर उसे महान नहीं बनाएं बल्कि समाज को तोड़ने की जगह जोड़ने वाले तथ्य को लेकर चलना होगा। प्रो. द्विवेदी ने कहा कि भारत बोध का जागरण ही एकमात्र मंत्र है। अनादि काल से जो हमारी शक्ति रही है उसे भारत पर विश्वास रहा है। मीडिया को इस देश की एकता व बहुलता को स्थापित करना होगा, यही हमारा राष्ट्रवाद है क्योकि पत्रकारिता समाज से जुड़ा विषय है। उन्होंने कहा कि पत्रकारों की पॉलिटिकल लाइन तो होनी चाहिए पर पार्टी लाइन नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि भारतीय जीवन की लोक चेतना ही हमारी मूल चेतना है। मीडिया राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान दें।

    मीडिया समाज में घोल रहा जाति का जहर : शर्मा

    व्यख्यान माला की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ पत्रकार रमेश शर्मा ने कहा कि आजादी के पहले और बाद की पत्रकारिता में बड़ा अंतर आ गया है। आजादी के समय का एक भी अखबार या पत्रिका आज प्रकाशित नहीं हो रही है। उन्होंने कहा कि 1807 में अंग्रेजों ने देश और समाज को बांटने का जो कार्य किया था आज समाज उसी से जकड़न में पूरी तरह फंस गया है। उन्होंने कहा कि आज पत्रकारिता देश को जाति के नाम पर बांटने का काम कर रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि जो अंग्रेजों और मुगलों के प्रिय रहे सिर्फ वही हमारे पाठ्यपुस्तक का हिस्सा क्यों रहे हैं। श्री शर्मा ने कहा कि भारत में जाति प्रथा नहीं थी, बल्कि वर्ण व्यवस्था थी। अंग्रेजों ने हमारी परंपरा को नुकसान पहुंचाने के लिए देश में जातिगत जहर घोलने का काम किया जिसकी शिकार पत्रकारिता भी हो गई। उन्होंने कहा कि वैभव के कारण ही हमारा देश सोने की चिड़िया कहलाता था। उन्होंने कहा कि पत्रकारों को भीड़ के साथ राष्ट्रवाद को जगाकर चलना होगा।

    पत्रकारिता राष्ट्रबोध की प्रखर अभिव्यक्ति थी : विवेक

    व्याख्यानमाला में विषय प्रवर्तन करते हुए स्वदेश के संपादक शिवकुमार विवेक ने कहा कि यह वास्तव में आंचलिक पत्रकारिता का सम्मान है। उन्होंने कहा कि आंचलिक पत्रकारिता का स्वरूप बढ़ रहा है। उस समय चौपाल ही पत्रकारिता की कक्षा होती थी। श्री विवेक ने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन का फलसफा ही राष्ट्रवाद था। पत्रकारिता राष्ट्रबोध की प्रकार अभिव्यक्ति थी। उन्होंने कहा कि अंग्रेज एक साम्राज्यवादी सत्ता के बोधक थे। वह हमारी संस्कृत और व्यवस्था को खराब कर कर रहे थे। आज भी राष्ट्रवाद की जरूरत है। हमारी भाषा पर आज भी अतिक्रमण है, ऐसे में हमारी पत्रकारिता ही परे चले जाए तो सोचने की जरूरत है।
    कार्यक्रम में स्व. देवलिया की धर्मपत्नी श्रीमती कीर्ति देवलिया भी उपस्थित हुईं। कार्यक्रम में सतीश एलिया, आशीष देवलिया, डा अर्पणा और राजीव सोनी ने अतिथियों का स्वागत किया। संचालन आदित्य श्रीवास्तव ने किया। अंत में भुवनभूषण देवलिया स्मृति व्याख्यान माला समिति के सदस्य अशोक मनवानी ने आभार व्यक्त किया।कार्यक्रम में स्मारिका का विमोचन मंत्री श्री सारंग और अन्य अतिथियों ने किया।

  • सवालों का फतवा जारी करने से पहले जान तो लें

    सवालों का फतवा जारी करने से पहले जान तो लें

    • प्रशांत पोळ

    द कश्मीर फाईल्स की जबरदस्त सफलता के कारण तमाम वामपंथी और इस्लामिस्ट्स बौखला गए हैं. आज तक खड़ा किया सारा विमर्श उन्हे बिखरता हुआ नजर आ रहा हैं. इसलिए राष्ट्रवाद के इस नए तूफान को भ्रमित करने, वे सोशल मीडिया के तमाम मंचों पर यह प्रश्न उठा रहे हैं, “तब आप क्या कर रहे थे..? दिल्ली में सरकार आपकी थी. राज्यपाल जगमोहन आपके थे. फिर भी यह नरसंहार क्यूँ हुआ.? क्या किया आपने तब ?”

    ‘उल्टा चोर कोतवाल को डांटे’ इस मुहावरे का इससे अच्छा प्रयोग नहीं हो सकता.

    1984 में आठवी लोकसभा के चुनाव में काँग्रेस को राक्षसी बहुमत मिला था. कुल 514 में से 404 सीट्स. भाजपा के मात्र 2 सांसद चुन कर आए थे. किन्तु परिस्थिति तेजी से बदली. 1989 के चुनाव मे, उन्ही राजीव गांधी के नेतृत्व में काँग्रेस बहुमत का आंकड़ा भी नहीं छूं सकी. उन्हे मिली 197 सीटें. नवगठित ‘जनता दल’ के 143 सदस्य चुनकर आए. रामजन्मभूमि आंदोलन के कारण पहली बार, भाजपा का आंकड़ा 2 से बढ़कर 85 तक पहुंचा था. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी को 33 सीटें मिली थी. अतः जनता दल की सरकार बनी, जिसे भाजपा और कम्युनिस्ट पार्टी ने बाहर से समर्थन दिया. विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री बने.

    इधर कश्मीर की परिस्थिति क्या थी.? नेहरू के चहेते, शेख अब्दुल्ला के बेटे फारुख अब्दुल्ला मुख्यमंत्री थे. कश्मीर से ही चुने गए मुफ़्ती मोहम्मद सईद देश के गृहमंत्री थे. 1987 के विधानसभा चुनाव में 76 में से फारुख अब्दुल्ला की नेशनल कॉन्फ्रेंस को 40 और काँग्रेस को 26 सीटें मिली थी. जम्मू क्षेत्र से भाजपा के मात्र 2 विधायक चुन कर आए थे. इस चुनाव के बाद, सन 1988 से ही, कश्मीर घाटी में पाकिस्तानीयों की घुसपैठ बढ़ गई थी. हिंदुओं को घाटी से भगाने का आंदोलन प्रारंभ हो गया था. यासीन मलिक (जिसे फिल्म में ‘बिट्टा’ के रूप में दिखाया हैं), यह आतंकवादी गुट, ‘जम्मू – कश्मीर लिबरेशन फ्रंट’ (JKLF) का नेता था. अनेक आतंकवादी गुटों के साथ, वह खुले आम केंद्र शासन को चुनौती देता था. चुन – चुन कर घाटी के हिन्दू नेताओं को मारता था. 1986 के काश्मीर दंगों में इसकी बड़ी भूमिका थी. 14 सितंबर 1989 को ‘टीका लाल टपलू’ की दिन दहाड़े, खुले आम हत्या कर के दहशत फैलाने का काम प्रारंभ हो गया था. टीका लाल टपलू यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के निष्ठावान और समर्पित स्वयंसेवक थे. कश्मीरी पंडित उन्हे अतीव आदर से देखते थे.

    1989 में कश्मीर में हो रही इन हत्याओं के दौर में दिल्ली में वी. पी. सिंह की सरकार थी, जिसमे मुफ़्ती मोहम्मद सईद गृहमंत्री थे और इश्कबाजी में डुबे हुए फारुख अब्दुल्ला मुख्यमंत्री..! इसी बीच 8 दिसंबर 1989 को, गृहमंत्री मुफ़्ती साहब की लड़की, रूबिया सईद का आतंकवादी अपहरण कर लेते हैं. उसके बदले कश्मीर के जेल में बंद पांच खूंखार आतंकवादियों को रिहा करने की मांग रखी जाती हैं. अपहरण की ज़िम्मेदारी जेकेएलएफ और उसका नेता यासीन मलिक लेते हैं. पांच दिन यह नाटक चलता हैं. पांच दिनों के बाद रूबिया सईद को सुरक्षित लौटाया जाता हैं और वहां पांच खूंखार आतंकवादी रिहा किए जाते हैं..!

    इस पूरे प्रकरण में, ना तो जेकेएलएफ़ का कोई नेता गिरफ्तार होता हैं, ना ही यासीन मलिक को गिरफ्तार किया जाता हैं. गिरफ्तारी छोड़िए, पुंछताछ के लिए भी नहीं बुलाया जाता… 1989 के दिसंबर और 1990 के जनवरी महीने में पूरा कश्मीर आतंकवादियों के हवाले कर दिया गया हैं. जैसा कश्मीर फाईल्स में दिखाया गया हैं, बिलकुल वैसा ही कश्मीर का माहौल हैं. रोज रात को मशाल जुलूस निकाल रहे हैं जिसमे हिंदुओं को, उनकी औरतों को कश्मीर में छोड़कर, भाग जाने के लिए कहा जा रहा हैं. 4 जनवरी 1990 को श्रीनगर से प्रकाशित होने वाले दैनिक ‘आफताब’ ने एक बड़ा सा विज्ञापन प्रकाशित किया, जिसमे हिजबूल मुजाहिदीन ने सारे हिन्दू – सीख समुदाय को घाटी छोड़ के जाने के लिए कहा गया था. पूरे घाटी में पाकिस्तानी करेंसी का प्रयोग हो रहा था.

    कश्मीर में हो रहे हिंदुओं के हत्याकांड पर जब भाजपा ने आवाज उठाना चालू किया, चिल्लाना शुरू किया, तब फारुख अब्दुल्ला को हटाकर राष्ट्रपति शासन लगाया गया. यह दिन था, 19 जनवरी 1990. आतंकवादियों को यह पहले से पता चल गया था, की 19 जनवरी को राज्यपाल का शासन लगेगा. इसलिए 18 जनवरी की रात और 19 जनवरी को पूरे दिन भर कश्मीर घाटी में हिंदुओं के खून की होली खेली गई. इसी दिन राज्यपाल के रूप में जिस व्यक्ति को दिल्ली ने भेजा, वह थे – जगमोहन !

    इस समय तक जगमोहन का और भाजपा का, दूर – दूर तक कोई संबंध नहीं था. जगमोहन काँग्रेस के आदमी थे. विशेषतः गांधी परिवार के खास. आपातकाल (1975 – 1977) में संजय गांधी की आज्ञा से तुर्कमान गेट और अन्य स्थानों के अतिक्रमण तोड़ने वाले प्रशासक. संजय गांधी के कारण ही वे ‘नाम’ समिट के समय गोवा के और एशियाड के समय दिल्ली के उप-राज्यपाल बने. इन आयोजनों की सफलता के कारण वे इंदिरा गांधी और बाद में राजीव गांधी के चहेते बने. वे कुशल प्रशासक थे.

    जगमोहन ने कश्मीर के हिंदुओं की जो स्थिति देखी, उससे वो अंदर तक हिल गए. उन दिनों पर उन्होने पुस्तक लिखी हैं – My Frozen Turbulence in Kashmir’. कश्मीर के राज्यपाल के नाते उनका कार्यकाल मात्र पांच महीनों का ही रहा. जब वे वहां मुस्लिम आतंकवादियों पर कहर बरसाने लगे, तो उन्हे गृहमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद ने राज्यपाल पद से हटा दिया. इस के बाद जगमोहन ने भाजपा में शामिल होने का निर्णय लिया.

    कश्मीर की इन तत्कालीन घटनाओं पर सबसे ज्यादा आवाज उठाई तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने. उस समय नए बनने जा रहे ‘पुनुन कश्मीर’ (हमारा कश्मीर) के शीर्ष नेताओं को, जिसमे ‘अग्निशेखर जी’ प्रमुख थे, संघ ने देश भर, विभिन्न स्थानों पर लोगों से, पत्रकारों से मिलवाया. कश्मीर की स्थिति को लोगों तक लेकर जाने के पूरे प्रयास किए. दुर्भाग्य से उन दिनों संघ को उतना नहीं सुना जाता था, जितना आज सुना जाता हैं !

    इसलिए कोई अगर यह कहे की ‘उस समय आप क्या कर रहे थे?’ तो उनसे पूछिए –

    • शेख अब्दुल्ला, फारुख अबुल्ला और ओमर अब्दुल्ला की खासमखास काँग्रेस पार्टी क्या कर रही थी ?
    • जितने वामपंथी यह सवाल उठा रहे हैं, उनसे पूछना हैं, वे क्या कर रहे थे? वी. पी. सिंह सरकार को उनका भी तो समर्थन था.
    • देश के तमाम बुध्दीजीवी मुस्लिम नेताओं ने इस घटना पर क्या कहा? किसी एक मुसलमान नेता ने भी इस घटना का विरोध किया?
    • फारुख अब्दुल्ला परिवार की खास समर्थक काँग्रेस सरकार दस साल तक दिल्ली में राज करती रही. उस ने एक बार, एक बार भी इस समस्या का हल ढूँढने की कोशिश की?
    • और सिनेमा जगत…. दुनिया भर के प्रश्नों पर सिनेमा बनाने वाले हमारे बॉलीवुड के निर्माता, कश्मीर के इस सच को इतने वर्षों तक क्यूँ नहीं पर्दे पर लाये?
  • बच्चों के अधिकारों पर देश की नीति साफःप्रियंक कानूनगो

    बच्चों के अधिकारों पर देश की नीति साफःप्रियंक कानूनगो


    भोपाल,4 मार्च (प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। आजादी के अमृत महोत्सव श्रंखला के अंतर्गत बाल अधिकारों के संरक्षण और संभावनाओं पर विचार विमर्श के लिए आज भोपाल में देश भर के विद्वानों का जमावड़ा हो रहा है। जल एवं भूमि प्रबंधन संस्थान(वाल्मी) में आयोजित इस कार्यशाला का आयोजन राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने किया है। इस कार्यशाला में केन्द्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती स्मृति ईरानी वर्चुअल रूप से उपस्थित होकर बच्चों के लिए संवाद करेंगी।
    राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के अध्यक्ष प्रियंक कानूनगो ने बताया कि राज्यपाल श्री मंगू भाई पटेल उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहेंगे। केन्द्रीय महिला एवं बाल विकास राज्यमंत्री मुजपार महेन्द्र भाई तथा केन्द्रीय महिला एवं बाल विकास सचिव इंदीवर पांडेय भी यहां उपस्थित रहेंगे। पत्रकारों से चर्चा के दौरान आयोग की सदस्य सचिव रूपाली बैनर्जी सिंह, के अलावा आयोग के सदस्य द्रविन्द्र मोरे और बृजेन्द्र चौहान भी उपस्थित थे।

  • सात दशकों बाद साकार हुआ भोपाल विलीनीकरण का स्वप्न

    सात दशकों बाद साकार हुआ भोपाल विलीनीकरण का स्वप्न


    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भाजपा सरकार ने प्रधानमंत्री आवास योजना के माध्यम से देश की तस्वीर बदलने का जो अभियान चलाया है उससे एक नया भारत खड़ा होने लगा है। दंभ से भरी नेहरू सरकार ने आजादी के बाद देश में बड़े कारखाने, बड़े बांध और बड़े वित्तीय संस्थान तैयार करने की नीति अपनाई थी। उस वक्त समझा जाता था कि बड़े प्रतिष्ठानों से रिसकर पूंजी का प्रवाह देश के निचले तबके तक पहुंचेगा। धीमी रफ्तार के इस विकास को गति देने के लिए श्रीमती इंदिरागांधी ने सार्वजनिक उपक्रमों और सरकारी संस्थानों के माध्यम से पंचवर्षीय योजनाएं लागू कीं। जब ये नीति मुंह के बल गिरी और भारी भ्रष्टाचार ने जनता का जीवन दूभर कर दिया तो श्रीमती गांधी के इंस्पेक्टर राज ने छापेमारी करके सुशासन लागू करने का अभियान चलाया। ये भी बुरी तरह असफल हुआ और देश लगभग पचास साल पीछे सरक गया। प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव की सरकार ने नई आर्थिक नीतियां लागू करके नेहरू गांधी परिवार की गलतियों को सुधारने का क्रांतिकारी फैसला लिया। नतीजे अच्छे आए लेकिन डाक्टर मनमोहन सिंह की सरकार उन आर्थिक सुधारों को लागू नहीं कर पाई। इसकी वजह कांग्रेसियों का वो मानस था जो कल्याणकारी राज्य की ठगनीति से इतर कुछ और नहीं देखना चाहता था। अटल बिहारी की सरकार ने देश के गांवों को सड़कों सेजोड़ने का भगीरथ किया। इसके बाद बेरोजगारी की जो तस्वीर सामने आई उसे देखकर सरकारें हिल गईं। मोदी सरकार ने बड़े औद्योगिक घरानों का खजाना भरने के स्थान पर गांव स्तर तक पूंजी का प्रवाह खोलने के कई अभियान चलाए हैं। नए एलईडी मोदी बल्ब से देश को रोशन करने ,गांवों को खुले में शौच से मुक्ति, कचरे वाले को घरों तक पहुंचाने के अभियानों की सफलता के बाद अब प्रधानमंत्री आवास योजना के माध्यम से पूंजी का प्रवाह समाज के अंतिम छोर तक पहुंचाने का चमक्तारिक प्रयास सफल बनाया है।
    राज्य सरकारों ने मोदी सरकार के इन अभियानों को अपने अपने अंदाज में लागू किया है। मध्यप्रदेश की शिवराज सिंह चौहान सरकार ने लगभग एक लाख हितग्राहियों को प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ देकर शहरों और गांवों में रंग भरने में सफलता पाई है। गांव गांव तक आवास योजना में श्रमिकों को तो काम मिल ही रहा है साथ में लोगों को अपने मकानों को सुविधाजनक बनाने का अवसर भी मिलने लगा है। शिवराज सिंह चौहान सरकार ने इस बदलती तस्वीर को स्थानीय जरूरतों और पहचानों से जोड़कर अभियान की सफलता को नया स्वरूप दिया है। भोपाल की बदलती तस्वीर ने उन अरमानों को साकार किया है जिन्हें विलीनीकरण के बाद से भोपाल के जनमानस ने अपने दिलों में संजोकर रखा था। अंग्रेजों की सरकार ने जब भारत को आजादी देने का मन बनाया तो उसने धर्म के आधार पर फूट के बीज भी बो दिए थे। पाकिस्तान के विभाजन को तत्कालीन शासकों ने न केवल स्वीकार किया बल्कि पाकिस्तान परस्ती की ज़ड़ों में मट्ठा डालने के बजाए उन्हें पालने पोसने की नीति भी अपना ली। पंडित जवाहर लाल नेहरू का ध्वज जिस तरह जिन्ना के सामने झुका रहा उसकी वजह से नेहरू को लगता था कि यदि उन्होंने पाकिस्तान के प्रति प्रेम रखने वाले नवाबों और रिसायतों पर जोर जबर्दस्ती की तो वे विद्रोह भी खडा कर सकते हैं। यही वजह थी कि जब सारा हिंदुस्तान आजादी के गीत गा रहा था तब भोपाल के नवाब खुद को पाकिस्तान के साथ जोड़े जाने की रट लगाए हुए थे। भारत सरकार के पास इस बात की पूरी खबर थी लेकिन सरकार ने वेट एंड वाच की नीति अपनाई। कांग्रेस के नेताओं को कहा गया कि वे स्थानीय शासकों को मनाएं और भारत के साथ रहने के लिए तैयार करें। भौगौलिक तौर पर कुछ रियासतें पश्चिमी पाकिस्तान से दूर भी थीं। इसके बावजूद उन्हें पूर्वी पाकिस्तान की तरह अलग रियासतें बनाकर अपना तख्तो ताज बचाने की उम्मीद थी। कांग्रेस के स्थानीय नेताओं ने विलीनीकरण का आंदोलन चलाया और भारी शहादतें देने के बाद अंततः रानी कमलापति के राज्य को हथियाकर बनाए गए भोपाल को नई पहचान मिल सकी।
    तबसे लेकर अब तक लगभग सात दशकों का लंबा अंतराल बीत चुका है जब भोपाल को उसकी पहचान देने का स्वप्न साकार होता नजर आने लगा है। भोपाल की आजादी के वक्त स्थानीय तरुणाई को अपनी नई राह और नई मंजिल बहुत नजदीक नजर आ रही थी। सरकार के भरोसे विकास की जो इबारत कांग्रेस के शासकों ने लिखी उससे ये मंजिल मीलों दूर खिसक गई। भ्रष्टाचार और गरीबी को संरक्षण देने की इस नीति ने अपनी विरोधी भारतीय जनता पार्टी को व्यापारियों की पार्टी के रूप में खूब बदनाम किया। भाजपा के नेताओं को कांग्रेस के इस दुष्प्रचार से इतना डर लगता था कि जब वीरेन्द्र कुमार सखलेचा की सरकार ने अफसरों की लगाम कसी तो उनके विरोधियों ने तरह तरह के आरोप लगाकर उनकी सरकार गिरवा दी। उसके बाद सुंदरलाल पटवा की सरकार अफसरशाही के सामने झुकी सरकार के रूप में सामने आई। दिग्विजय सिंह की भ्रष्ट सरकार को जब जनता ने धक्के मारकर सत्ता से बाहर भेज दिया तबसे भाजपा की सरकारें अफसरशाही के साथ कदमताल करती रहीं हैं। मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों ने देश के सामने नवनिर्माण का वैकल्पिक मार्ग प्रशस्त किया है।
    भ्रष्ट सरकारी तंत्र की वजह से जो धनराशि विभिन्न छेदों से भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती थी मौजूदा नीति ने हितग्राही के खाते में सीधे भुगतान पहुंचाकर उस खामी को दूर कर दिया है। आज न तो सरकारी तंत्र और भ्रष्ट राजनेताओं का कमीशनखोरी का नेटवर्क सफल हो पा रहा है और न ही विकास की रफ्तार पर कोई ब्रेक बाकी रहा है। यही वजह है कि भोपाल संभाग और जिलों में हितग्राही मूलक योजनाओं को साकार करना सफल हो पा रहा है। भोपाल के नवाब के हाथों से सत्ता छीनकर जनता के हाथों में देने के बावजूद यहां के लोगों का जीवन रोशन करने का जो लक्ष्य अब तक पूरा नहीं हो पाया उसमें मानों पर लग गए हैं।
    वैसे तो विलीनीकरण के स्वप्न को जमीन पर उतारने के लिए अभी कई पायदान बाकी हैं। लगभग पच्चीस हजार घुसपैठियों ने भोपाल के आम नागरिक के संसाधनों पर डाका डाल दिया है। फुटपाथों गलियों में अतिक्रमण हो गया है। गंदी बस्तियों की तादाद बढ़ गई है। वोट बैंक के लिए कांग्रेस के जिन नेताओं ने झुग्गी माफिया खड़ा किया था वे आज अपने इलाकों में प्रधानमंत्री आवास योजना का प्रचार करने में जुटे हुए हैं। इसकी वजह है कि भले ही उन्हें कमीशन नहीं मिल पा रहा है पर उन्हें लगता है कि उनका वोटर कम से कम इस योजना को उनकी मेहनत का फल ही मान ले तो उनका भविष्य सुरक्षित हो सकता है।
    शहर का मास्टर प्लान अब तक राजधानी की तस्वीर नहीं बदल पाया है। भीड़ भरे इलाकों में अस्पतालों का निर्माण, बीच सड़कों पर पुरानी कारों की बिक्री के बाजार, गैरेज, और धुलाई ने राजधानी को भिखमंगों का शहर बनाकर रख दिया है। सरकारी दफ्तरों के आसपास लगने वाले सब्जी और कपड़ा बाजारों ने यातायात की व्यवस्था चौपट कर रखी है। अवैध निर्माणों की कोई मानीटरिंग नहीं है। यही वजह है कि चौड़ी सड़कें भी संकरी गलियों में तब्दील हो गईँ हैं। कभी बुलडोजर मंत्री के रूप में बाबूलाल गौर ने शहर की इस जरूरत को रेखांकित किया था। बाद की भाजपा सरकारों ने शहर में कई मूलभूत बदलाव किए हैं। फ्लाईओवर और चौराहों के चौड़ीकरण ने हालांकि राहत दी है लेकिन बढ़ते चार पहिया वाहनों की संख्या ने उन सारे सुधारों की हवा निकाल दी है। सार्वजनिक परिवहन का कोई विश्वसनीय और समय का पाबंद नेटवर्क अब तक नहीं तैयार हो सका है। धर्मस्थलों के नाम पर किए जाने वाले अतिक्रमणों ने शहर की खूबसूरती को लील लिया है।यही नहीं धर्म के नाम पर बढ़ रहीं दूकानों ने जनमानस को भी विकास की मुख्यधारा से परे धकेल दिया है।
    नवाबकालीन भवनों की हालत जर्जर हो चुकी है और वे जनता की आज की जरूरतों के लिए भी उपयोगी नहीं रह गए हैं। आज कंप्यूटरीकरण के दौर में न तो उन भवनों में स्थान बाकी है न ही बिजली हवा पानी की मूलभूत जरूरतें पूरी हो पा रहीं हैं। दिग्विजय सिंह सरकार ने पुराने भवनों की मरम्मत कराकर कथित विरासतों को बचाने का पाखंड जरूर किया था लेकिन जनता की गाढ़ी कमाई के करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी ये इमारतें खंडहर होती जा रहीं है। अब समय आ गया है कि शहर का अंधाधुंध विस्तार रोकने के लिए पुर्नघनत्वीकरण योजना का सख्ती से पालन किया जाए। इन जर्जर इमारतों को धराशायी करके आज की जरूरतों के अनुसार भवनों का निर्माण कराया जाए। जो लोग विरासतों को सहेजे रखने का शोर मचाकर जनजीवन को दूभर बनाने का षड़यंत्र रच रहे हैं उनके लिए पुराने इतिहास को किताबों में संजोकर रखा जा सकता है।
    शहरों को विकास का इंजन बनाने के लिए नियोजकों ने ग्रीन और ब्लू मास्टर प्लान तैयार किय़े थे। वृक्षारोपण को सफल बनाने के लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को स्वयं एक वृक्ष रोज लगाने के लिए आगे आना पड़ा है। ताल तलैयों की नगरी मानी जाने वाली राजधानी के अधिकांश जलग्रहण क्षेत्र दूषित पड़े हुए हैं। भोपाल तालाब की सफाई के लिए जो भोज वैटलैंड परियोजना चलाई गई थी उसने आम जनता पर कर्ज का पहाड़ तो खड़ा कर दिया लेकिन भोपाल तालाब की नई तस्वीर आज भी अधूरी है। तालाब का पानी सेप्टिक टैंक से भी ज्यादा गंदा बना हुआ है। उसमें आक्सीजन का स्तर नहीं बढ़ पाया है। सरकार और शासन को तय करना होगा कि आखिर वह आम नागरिकों को सम्मान जनक जीवन का माहौल कब तक मुहैया करा पाएगा।

  • पहला स्वतंत्रता संग्राम और भोपाल – सीहोर की शहादत

    पहला स्वतंत्रता संग्राम और भोपाल – सीहोर की शहादत

    राजेश बेन

    आज़ादी के अमृत महोत्सव के इस वर्ष में हम याद कर रहे हैं अपने उन क्रांतिकारियों को जिन्होंने भारत माता को आज़ाद करवाने के लिए पहले-पहल क्रांति की ज्वाला प्रज्जवलित की थी। भोपाल से शुरू हुआ आज़ादी के इस पहले संग्राम ने अंग्रेजों के शासन को जोरदार टक्कर दी। मातृभूमि को स्वतंत्र कराने वाले इन वीरों को देश कभी भी भूल नहीं सकेगा।

    अब से 164 साल पहले यानि 15 जनवरी 1858 को शाम 6 बजे कर्नल हयूरोज ने 149 क्रांतिकारियों को सीहोर कॉन्टिन्जेण्ट में एक लाइन में खड़ा कर गोली मार दी। भोपाल गजेटियर का संदर्भ 149 क्रांतिकारियों को लम्बी लाइन में खड़ा कर गोली मारने की पुष्टिकर्ता है तो सीहोर में जनश्रृति और एक प्रतिष्ठित दैनिक समाचार पत्र की रिपोर्ट में इस संख्या को 356 बताया गया है।

    भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम की कहानी भी रोंगटे खड़े करने वाली है और आज की तथा आने वाली पीढ़ी के लिये प्रेरणादायी है। 

    प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की कहानी कुछ ऐसी है कि अप्रैल, 1857 में भोपाल बेगम को पत्थर पर लिखकर छपाई गई क्रांति कारियों की (लिथोग्राफ) एक उदघोषणा प्राप्त हुई, जिसमें अंग्रेजों को निकाल बाहर करने और नष्ट करने का आव्हान किया गया था। बेगम ने इस घोषणा में कहीं गई बातें ब्रिटिश एजेन्ट को सूचित कर दी और इस प्रकार अंग्रेजों के प्रति अपनी वफादारी का सबूत दे दिया। 

    जब यह महान क्रांति मई, 1857 में भारत को आन्दोलित करने वाली थी उस समय भोपाल कॉन्टिन्जेन्ट सीहोर मुख्यालय में 60 तोपची,  206 घुड़सवार सैनिक तथा 600 पैदल सैनिक थे,  अर्थात् कुल मिलाकर 866 सैनिक थे, जिनमें सभी भारतीय थे। इस कॉन्टिन्जेन्ट के साथ केवल 6 अंग्रेज थे। इस कॉन्टिन्जेन्ट की एक टुकड़ी बेरछा में तैनात की गई किन्तु वहां कमान संभालने वाला एक भी अंग्रेज नहीं था।

     मेरठ तथा दिल्ली में हुई घटनाओं का समाचार सबसे पहले 13 मई, 1857 को इन्दौर में प्राप्त हुआ। परिणामस्वरूप, विद्रोह के अकस्मात् फैलने की आशंका से कर्नल ड्यूरेन्ड ने 14 मई को सीहोर को भोपाल कान्टिजेन्ट की 2 तोपें,  पैदल सैनिकों की 2 कंपनियां तथा घुड़सवारों के दो सैन्य दल भेजने के लिये अत्यावश्यक संदेश भेजा।

    20 मई को इन्दौर पहुँचने के लिये सैन्य दल भेज दिया गया और भोपाल क्षेत्र पर आसन्न संकट की छाया छाई रही। पड़ोस में और भारत के अन्य भागों में जो कुछ भी हो रहा था, उससे भोपाल रियासत की प्रजा प्रभावित हुये बिना नहीं रह सकी। मध्य भारत के लिये गर्वनर जनरल के एजेन्ट राबर्ट हैमिल्टन ने भारत सरकार के सेकेट्ररी को लिखा कि सामान्यत: दिल्ली, लखनऊ तथा रोहिलखंड में जो कुछ भी हो रहा था, उससे भोपाल के अनेक निवासी प्रभावित थे। भोपाल के मुसलमान लोग मुगल सम्राट बहादुर शाह से सहानुभूति रखते थे और हिन्दु लोग नाना साहब पेशवा से सहानुभूति रखते थे। “

    कैप्टन हुचिन्सन ने यह देखा कि भोपाल के अभिजात लोगों में ईसाई विरोधी तथा अंग्रेज विरोधी भावना बहुत अधिक थी। नियाज मुहम्मद खान, फौजदार मुहम्मद खा, बदी मुहम्मद खान, त्रिभुवन लाल जैसे महतवपूर्ण नेता तथा अनेक अन्य लोग उस समय वर्तमान व्यवस्था से असंतुष्ट थे। वे सिकन्दर बेगम के शासन के इसलिये विरोधी थे क्योंकि वह कम्पनी सरकार के अंगूठे नीचे थी। जब अवसर आया तो ऐसे व्यक्तियों ने विद्रोह में प्रमुखता से भाग लिया। “

    इस बीच 1 जुलाई, 1857 को इन्दौर के सैनिकों ने विद्रोह कर दिया। उन्हें दंडित करने के लिये भोपाल कॉन्टिन्जेन्ट कैवलरी के लगभग पचहत्तर सैनिकों का एक दल बुलाया गया । किन्तु कमांडर ट्रैवर्स को यह देखकर आश्चर्य हुआ कि पूरे दल में से केवल 6 सैनिकों ने उसकी आज्ञा मानी। अन्तत: अंग्रेजों को इंदौर छोड़कर जाना पड़ा। कर्नल डयूरेन्उ और उस दल के लोग, जिसमें 17 अधिकारी, 8 महिलायें और 2 बच्चे शामिल थे, भोपाल कॉन्टिनेन्ट के कुछ सैनिकों की रक्षा में उसी दिन सीहोर चले गये। वे लोग 3 जुलाई को आष्टा और 4 जुलाई को सीहोर चले गये। सिकंदर बेगम ने उन्हें आश्रय और संरक्षण दिया। सिकंदर बेगम को अनेक कठिनाईयों का सामना करना पड़ा। उसकी माँ तथा मामाओं ने उससे आग्रह किया कि वह अंग्रेजों के विरूद्ध धर्मयुद्ध घोषित कर दे। शहर के मौलवी भी जिहाद का उपदेश दे रहे थे और उसके सैनिकों ने भी उसे आतंकित किया। किन्तु सिकन्दर बगेम नहीं मानी। कर्नल ड्यूरेन्ड तथा उसके दल के साथ वह होशंगाबाद गईं, जहां वे 8 जुलाई को सुरक्षित पहुँच गये।

    9 जुलाई को सीहोर के पॉलिटिकल एजेन्ट मेजर रिचर्डस ने 20 यूरोपियों के साथ सीहोर छोड़ दिया। सीहोर छोड़ते समय उसने स्टेशन का प्रभार कुछ समय के लिये सिकंदर बेगम के अधिकारियों को सौंप दिया, किन्तु सभी व्यावहारिक प्रयोजनों उसका प्राधिकार कुछ भी नहीं था। कॉन्टिन्जेण्ट के सैनिकों ने सीहोर कैन्टोनमेण्ट पर कब्जा कर लिया। उन्होंने अंग्रेजों के बंगलों, डाकघर और सीहोर चर्च को लूट लिया। इस अवसर पर विद्रोही नेता शुजात खान पिंडारी ने मुख्य अधिकारी को मार डाला तथा बेरछा स्थित कम्पनी के खजाने को लूट लिया। जब सिकंदर बेगम ने सीहोर के सैनिकों को शुजात खान के विरूद्ध कार्रवाई करने का आदेश दिया तो उन्होंने आदेश मानने से इंकार कर दिया। इसके पहले के बेगम बदला लेतीं, सीहोर कैवलरी के रिसालदार ने 6 अगस्त, 1857 को खुले तौर पर विद्रोह की घोषणा कर दी। सैनिकों ने सीहोर कैन्टोंमेण्ट की 9 पौंडर तोपों तथा एक 24 पौंडर हो‍विट्जर को अपने कब्जे में ले लिया तथा उन्हें कैवलरी लाइन्स में रख दिया। बेगम ने सीहोर के सैनिकों के विद्रोह को कुचलने के लिये भोपाल से एक सैन्य बल भेजा। भोपाल के सैनिक भी उतने ही क्रांतिकारी थे, जितने सीहोर के सैनिक यद्यापि उन्होंने बेगम के पक्ष में सीहोर के खजाने को बचा लिया। तथापि सीहोर के अधिकांश क्रांतिकारी जिन्हें छोड़ दिया गया था, अन्तत: कानपुर जा पहुँचे और उन्होंने नाना साहब के झंडे के नीचे वीरतापूर्वक युद्ध किया।

    जुलाई, 1857 से लेकर नवंबर, 1857 तक सीहोर तथा उसके आसपास के क्षेत्र में इन्हीं क्रांतिकारियों का वर्चस्व रहा। विद्रोह के रोकने के लिये बेगम ने एक मैत्री विभाग की स्थापना की। उन्होंने सभी ओर से भागकर आये अंग्रेजों को सहायता दी और उन्हें सुरक्षा दी। इतना ही नहीं बल्कि अपने राज्य क्षेत्रों के बाहर भी उत्तर में काल्पी तक अनाज और चारा भेजकर और सागर तथा बुन्देलखण्ड में शान्ति स्थापित करने के लिये सैनिक टुकडियां भेजकर अंग्रेजों की भरसक सहायता की। अंबापानी के जागीरदार फाजिल मुहम्मद खान तथा आदिल मुहम्मद खान पर जिन्होंने विद्रोह कर दिया था, बेगम द्वारा तुरन्त हमला किया गया और उनकी संपदायें छीन ली गईं जबकि राहतगढ़ के हठी किलेदार को, जिसने अंग्रेजों को प्रवेश नहीं करने दिया था, पकड़ लिया गया तथा सूली पर चढ़ा दिया गया। इस बीच वह सीहोर में पुन: शांति स्थापित करने में सफल हो गई और अनेक क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया, जिन्हें बाद में फांसी दे दी गई।

    दिसम्बर, 1857 में ह्यूरोज ने विद्रोह को कुचलने के लिये सेना की कमान सम्हाली, 8 जनवरी को इन्दौर से रवाना होकर वह 15 जनवरी, 1858 को सीहोर पहुँचा। जैसा कि पहले कहा जा चुका है, सीहोर में अनेक क्रांतिकारी पहले से बन्द थे और कोर्ट मार्शल की प्रतीक्षा कर रहे थे। उनमें से 149 क्रांतिकारियों को न्यायालयों ने दोषी पाया तथा उन्हें गोली मार देने की सजा सुनाई गई। इस दण्डादेश के क्रियान्वयन का कार्य तीसरे यूरोपियन सैनिकों को सौंपा गया। सूर्यास्त के समय कैदियों को बाहर लाया गया और उन्हें एक लंबी पंक्ति में खड़ा कियागया और संकेत देते ही उन्हें गोली मार दी गई लेकिन उनमें से एक व्यक्ति बच निकला।

    जब मृत्युदंड देने की कार्रवाई पूरी हो गई तो अंधेरा हो गया और 15 जनवरी की उस लंबी, भयानक रात में तीसरे यूरोपियन बिग्रेड का एक अधिकारी और सैनिक क्रांतिकारियों के शवों की पंक्ति पर पहरा देते रहे और बिग्रेड 16 जनवरी को सुबह 3 बजे राहतगढ़ की ओर बढ़ गई।

    हमारे पहले क्रांतिकारियों को नमन

    (लेखक संभागीय जनसम्पर्क कार्यालय में उप संचालक हैं।)