Month: May 2019

  • टूटी कांग्रेस को कैसे चला पाएंगे कमलनाथ

    टूटी कांग्रेस को कैसे चला पाएंगे कमलनाथ

    • राजा,महाराजा औऱ कमलनाथ की रियासतों में बंटी मप्र कांग्रेस।

    (डॉ अजय खेमरिया) गुना से ज्योतिरादित्य सिंधिया की हार ने मप्र की कांग्रेस राजनीति में आपसी संघर्ष की नई पटकथा लिख दी है नकुलनाथ को छोड़कर मप्र के सभी कांग्रेसी सूरमा बुरी तरह से हारे है सरकार के तीन चौथाई मंत्रियों के इलाकों से कांग्रेस बुरी तरह हारी है।मुख्यमंत्री ने 22 प्लस का नारा दिया था लेकिन 29 में से 28 सीटों पर कांग्रेस बुरी तरह हारी है।भोपाल में दिग्विजयसिंह, गुना में सिंधिया, सीधी में अजय सिंह,जबलपुर में विवेक तन्खा जैसे दिग्गज नेता बुरी तरह परास्त हुए है।मप्र की इस हार ने एक बार फिर कांग्रेस दिग्गजों को एक दूसरे के आमने सामने लाकर खड़ा कर दिया है।पूर्व मंत्री और 6 बार से विधायक केपी सिंह ने यह कहकर मामले की गंभीरता को सामने ला दिया कि अब राजा महाराजा को चाहिये कि मुख्यमंत्री कमलनाथ को फ्री हैंड छोड़कर राजा(दिग्गिराजा),महाराजा( सिंधिया) दिल्ली में आराम करें।इधर बाल विकास मंत्री इमरती देवी ,पशुपालन पालन मंत्री लाखन सिंह यादव ने मुख्यमंत्री के नेतृत्व पर सवाल उठाना शुरू कर दिए है।एक टीव्ही शो में कांग्रेस की हार पर पक्ष रखते हुए मुकेश नायक ने भी कमलनाथ की कार्यशैली पर उनके अंतर्मुखी व्यक्तित्व को लेकर कुछ इसी तरह से सवाल खड़ा किया है।लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद सबसे ज्यादा घबराहट मप्र की कमलनाथ सरकार में देखी और सुनी जा रही है ।क्या वाकई मप्र में कमलनाथ सरकार को कोई खतरा है?कल की विधायक दल की बैठक के बाद से लगता तो नही है जिसमे 121 का आंकड़ा परेड के लिये तैयार था।लेकिन बाबजूद इसके खतरा घर मे खड़ा है बहुमत से 2 विधायक कम रहने के कारण कमलनाथ मन्त्रिमण्डल गठन में सीनियरिटी ,क्षेत्रीय सन्तुलन का ध्यान नही रख पाए।6 बार तक के लगातार विधायक मंत्री नही बनाये गए और दूसरी बार विधायक बने के कई लोग मंत्री बनने में सफल रहे यह स्थिति कमलनाथ के लिये मजबूरी में निर्मित हुई क्योंकि सिंधिया, दिग्गिराजा के दबाब में उनके कोटे पूरे करने पड़े इस बीच वरिष्ठता, कैडर, को पीछे रखना पड़ा यही से इस सरकार स्थिरता को लेकर सवाल उठने लगे खुद कांग्रेस विधायकों के बयानों ने इस हवा को बनाने का काम किया।मंत्रिमंडल में आने से वंचित रहे सीनियर विधायको ने एक दूसरे सरदारों पर खुलेआम निशाना साधना शुरू कर दिया।एडल सिंह कंषाना,जयवर्द्धन सिंह दत्ती गांव ,बिसाहूलाल सिंह, नातीराजा,केपी सिंह,लक्ष्मण सिंह,जैसे 20 से अधिक विधायक मंत्री पद की महत्वाकांक्ष लिए हुए है सपा, बसपा,औऱ सभी4 निर्दलीय विधायक भी मंत्री रुतबा चाहते है।कमलनाथ की बुनियादी दिक्कत यह है कि उनके पास दावेदारों को समायोजित करने के लिये विकल्प बहुत सीमित है ।कल विधायक दल की बैठक में एक विधायक ने 20 कांग्रेस विधायको के बीजेपी के सम्पर्क में रहने का दावा किया है।बुरहानपुर औऱ सुसनेर के निर्दलीय विधायक भी आंखे तरेर रहे है भिंड के बसपा विधायक मूलतः भाजपाई ही है ।कुल मिलाकर कांग्रेस में अंदरूनी चुनौतीयां कम नहीं है।
    लोकसभा चुनावों ने इस अंदरूनी क्लेश को औऱ भी गहरा कर दिया है।सिंधिया के प्रभाव क्षेत्र वाला मध्यांचल में पार्टी बुरी तरह हारी है सिंधिया से जुड़े एक बड़े नेता के अनुसार इस स्थिति के लिये मुख्यमंत्री और दिग्विजयसिंह जिम्मेदार है क्योंकि टिकट वितरण में सिंधिया की पसन्द को दरकिनार किया गया।भिंड में सिंधिया नही चाहते थे कि देवाशीष जरारिया को टिकट दी जाए क्योंकि उनकी इमेज कट्टर दलित एक्टिविस्ट की है और 2 अप्रेल के सवर्ण वर्सेज दलित झगड़े में उनकी भूमिका आपत्तिजनक थी इसके बाद भी सीएम औऱ दिग्गिराजा की सिफारिश पर भिंड से देबाशीष को टिकट दी गई परिणाम 2 लाख से कांग्रेस हार गई और इस केन्डिडेचर का असर अंचल के आसपास भी पड़ा ।
    ग्वालियर की सीट पर भी सिंधिया नही चाहते थे कि अशोक सिंह को कांग्रेस की टिकट मिले अशोक 3 चुनाव यहां से हार चुके थे दो बार तो उन्होनें महल के उम्मीदवार सिंधिया की बुआ श्रीमती यशोधरा राजे को कड़ी टक्कर दी थी।सिंधिया यहां से किसी अन्य समर्थक को टिकट दिलाने के लिये प्रयासरत थे लेकिन कमलनाथ औऱ दिग्गिराजा के दबाब में अशोक सिंह टिकट पाने में सफल रहे। मुरैना में जरूर उनकी सिफारिश पर रामनिवास रावत को टिकट मिली।सिंधिया भिंड औऱ ग्वालियर के टिकट वितरण से इतने नाराज थे कि जब इनके समर्थन में राहुल गांधी सभा करने आये तो सिंधिया शिवपुरी में रहते हुए भी इन सभाओं में नही गए।ग्वालियर औऱ भिंड में एक एक सभा लेने वे गए जरूर पर सभा मंच से ही स्पष्ट कर दिया कि दोनो राहुल गांधी के खड़े किये प्रत्याशी है उनका इशारा आसानी से समझा जा सकता था।इस बीच कट्टर महल विरोधी दलित नेता फूल सिंह बरैया, साहब सिंह गुर्जर को कमलनाथ ने सीधे कांग्रेस ज्वाइन करा दी इससे सिंधिया नाराज हो गए उन्होंने भी जबाबी हमला करते हुए ठाकुर लॉबी के दुश्मन चौधरी राकेश को अपने मंच से ही कांग्रेस में शामिल कर दिया।मुरैना से 2014 में डॉ गोविन्द सिंह की हार सुनिश्चित करने वाले व्रन्दावन सिंह को भी सिंधिया ने इसी होड़ में बसपा से कांग्रेस में शामिल कराया।सिंधिया कोटे से मंत्री प्रधुम्न सिंह,इमरती देवी,गोविंद राजपूत, प्रभुराम चौधरी,तुलसी सिलावट, लाखन सिंह पूरे समय अपने अपने जिले छोड़कर गुना में जुटे रहे।यह स्थिति कांग्रेस के अन्दर के असली हालातों को बयां करने के लिये पर्याप्त है।
    भिंड,ग्वालियर के टिकट को लेकर सिंधिया की नाराजगी का स्तर इस बात से ही समझा जा सकता है की वे 12 मई को वोटिंग के बाद सिर्फ एक सभा के किया धार गए इसके बाद वे विदेश रवाना हो गए।जबकि 19 मई को जिन 9 सीटों पर मप्र में मतदान था वे सभी सिंधिया स्टेट के प्रभाव क्षेत वाली थी इंदौर उज्जैन में तो प्रियंका गांधी तक प्रचार करने आई पर सिंधिया नही गए।इसी तरह सिंधिया के चुनाव में दिग्गिराजा के समर्थक भी उदासभाव के साथ सिंधिया की पराजय की कामना करते रहे उन्हें 2002 के बाद से वैसे ही पूछा नही जा रहा है यह अलग बात है कि सिंधिया विरोधी समझे जाने वाले पिछोर के विधायक केपी सिंह के यहां से सिंधिया 16 हजार से जीतने में सफल रहे शेष सभी असेंबली सेग्मेंट में सिंधिया हार गए।
    आने वाले समय कांग्रेस के लिये बेहद चुनौतीपूर्ण होने है क्योंकि सरकार की स्थिरता पर सदैव सवाल बना रहेगा औऱ खेमेबाजी तेजी से बढ़ने वाली है इधर कार्यकर्ताओं के लिये संगठन जनसेवा के लिये प्रेरित कर पायेगा इसकी संभावना क्षीण इसलिये है क्योंकि एक तो सत्ता 15 साल बाद मिली है दूसरा कांग्रेस यहां बहुसंस्करणीय है दिग्गिराजा कि कांग्रेस, महाराजा की कांग्रेस, कमलनाथ की कांग्रेस इनमे इतना ज्यादा आपसी इन्टॉलरेंस है कि आप कांग्रेस खोज नही सकते है राहुल गांधी और उनके वामी सलाहकार पहले मप्र कांग्रेस के आपसी इन्टॉलरेंस को ही खत्म कर दे तो यह बड़ी बात होगी उनके नेतृत्व में।

  • गांधी हत्या पर गोडसे के बहाने लुटेरों को बचाने की साजिश

    गांधी हत्या पर गोडसे के बहाने लुटेरों को बचाने की साजिश

    भोपाल,17मई(प्रेस सूचना केन्द्र)। भाजपा की लोकसभा प्रत्याशी साध्वी प्रज्ञा ने आम चुनाव के अंतिम दौर में महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे की देशभक्ति पर जैसे ही बयान दिया भूचाल आ गया। खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसे खारिज किया और कहा कि वे इसके लिए मन से साध्वी को माफ नहीं कर पाएंगे। प्रश्न फिल्म अभिनेता कमल हासन के गोडसे को आतंकवादी बताए जाने पर था लेकिन इस पर समूची भाजपा बैकफुट पर आ गई।

    इसकी एक बड़ी वजह 19 मई को होने जा रहा आम चुनाव का अंतिम चरण भी है। गांधी देश के लोकप्रिय व्यक्तित्व हैं और उनके हत्यारे को देशभक्त बताना राजनीतिक रूप से उचित नहीं था।साध्वी का बयान आसानी से देश के आम मतदाता के गले उतरने वाला नहीं था । इसलिए आनन फानन में भाजपा ने साध्वी प्रज्ञा को माफी मांगने के निर्देश दिए। उनके समर्थन में बहस को गांधीवाद पर लाने के प्रयास करने वाले अनिल सौमित्र को तो भाजपा ने निलंबित ही कर दिया। अनुशासन समिति उनके बयानों पर स्पष्टीकरण लेगी और फिर तय किया जाएगा कि पार्टी इन बयानों को कैसे देखे। हालांकि तब तक आम चुनाव का अंतिम दौर बीत जाएगा।

    महात्मा गांधी की हत्या के बाद उनके व्यक्तित्व की जिस तरह मीमांसा की गई है उससे भारत में गांधी को महापुरुष माना जाता है। दुनिया भी उन्हें शांतिदूत मानती है। जिस तरह उन्होंने सत्य और अहिंसा को लेकर प्रयोग किए उससे गांधी के व्यक्तित्व की विशालता का पता चलता है। उनके व्यक्तित्व का एक पक्ष हत्या के लिए फांसी पाने वाले नाथूराम गोडसे ने भी अपने बयानों में रेखांकित किया है। हालांकि तत्कालीन कांग्रेसी सरकारों ने उन विचारों पर लिखी पुस्तक यह कहते हुए प्रतिबंधित कर दी कि बापू के हत्यारे को महिमा मंडित नहीं किया जा सकता।

    चुनाव प्रचार के अंतिम दौर में आयोजित पत्रकार वार्ता में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने एक सवाल के जवाब में कहा कि जिस तरह मालेगांव बम धमाके की आड़ में हिंदुओं को आतंकवादी बताने का षड़यंत्र किया गया हमने उसके विरुद्ध साध्वी प्रज्ञा को मैदान में उतारकर अपना सत्याग्रह दर्ज कराया है। साध्वी प्रज्ञा को इस मामले में झूठा फंसाया गया था। एनआईए अदालत ने विचारण के बाद इसीलिए उन पर से आतंकवादी निरोधक कानून(मकोका) हटाया था।

    साध्वी प्रज्ञा तथा कथित हिंदू आतंकवाद की शिकार रहीं हैं। कांग्रेस पार्टी की ओर से भाजपा पर हिंसा को समर्थन देने के जो आरोप लगाए जाते रहे हैं उसे षड़यंत्र बताने के लिए ही साध्वी प्रज्ञा को प्रत्याशी बनाया गया था। जरूरत थी कि साध्वी प्रज्ञा इस मुद्दे पर खूब बोलतीं। वे बताती कि हिंदू आतंकवाद के षड़यंत्र का वे कैसे शिकार बनीं। उनके बयान कांग्रेस के लिए संकट खड़े करने वाले साबित हो सकते थे। इसीलिए कांग्रेस ने अपनी चिरपरिचित शैली में इस पर चर्चा को रोकने की रणनीति बनाई और उसे सफल बनाने में कामयाब भी हुई। कांग्रेस के इस षड़यंत्र में उसके भाजपाई सहयोगियों ने बढ़ चढ़कर सहयोग दिया। उनके हर बयान को वे भाजपा के लिए संकट में डालने वाला बताते रहे और अपनी ओर से स्पष्टीकरण देने के बजाए साध्वी से बयान वापस लेकर माफी मंगवाने की रणनीति अपनाते रहे।

    जब साध्वी प्रज्ञा ने बाबरी ढांचा और राम मंदिर के संदर्भ में बयान दिया तो भाजपा के इन्हीं बौड़म रणनीतिकारों ने बयान वापस करवा दिया। जबकि ये बयान बहुसंख्यक वोट दिलाने में मददगार था। हेमंत करकरे के अत्याचारों का उल्लेख करने पर इसे मराठी भाषियों को नाराज करने वाला बताकर माफी मंगवा दी गई। जब कमलहासन ने गोडसे को देश का पहला आतंकवादी बताया तो साध्वी प्रज्ञा ने अपनी जानकारी के आधार पर उन्हें देशभक्त बता दिया। दरअसल वे जिस अभिनव भारत नाम के संगठन से कथित तौर पर जुड़ी रहीं हैं वो संगठन देश विरोधी ताकतों को चुनौती देने के लिए जाना जाता है। इस संगठन ने बापू वध के उस पक्ष को भी करीब से देखा सुना है जिसे आम लोग नहीं जानते। न केवल कांग्रेस बल्कि कई भाजपा की सरकारें भी चाहती रहीं हैं कि जनता देश के जरूरी मुद्दों के बजाए काल्पनिक कहानियों में ही उलझी रहे। कुछ इसी रणनीति के चलते प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा हाईकमान को भी सीमित जानकारियां पहुंचाई गईं हैं।

    अनिल सौमित्रःसाध्वी प्रज्ञा को जनता की आवाज बनाने की कीमत चुकाई

    भाजपा मीडिया विभाग के प्रमुख अनिल सौमित्र ने साध्वी के बयान के दुष्परिणामों से पार्टी को बचाने के लिए निजी हैसियत से जो स्पष्टीकरण दिया और बहस को मोदी सरकार के गांधीवादी कार्यों की ओर मोड़ने का प्रयास किया उस पर भी राज्य भाजपा ने निलंबन की अज्ञानता भरी जल्दबाजी दिखाई। श्री सौमित्र का कहना था कि भारत तो सनातनी देश है। इसका कभी निर्माण नहीं किया गया। यहां कोई भी महापुरुष धरती माता का सुपुत्र होता है पिता या पति नहीं।निर्माण तो पाकिस्तान का हुआ था। अंग्रेजों ने इसके लिए बाकायदा षड़यंत्र किया जिसकी कीमत देश के हिंदू मुस्लिम दोनों समुदायों के नागरिकों को चुकानी पड़ी। ये विभाजन गांधी जी के दो शिष्यों जवाहरलाल नेहरू और मोहम्मद अली जिन्ना के आपसी टकराव की वजह से हुआ था। अंग्रेजी भाषा में देश बनाने वाले को फादर आफ द नेशन कहा जाता है। इस लिहाज से गांधी तो पाकिस्तान के राष्ट्रपिता हुए। श्री सौमित्र ने कहा कि कांग्रेस के नेतागण ही कहते हैं कि इंदिरा गांधी जी ने पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिए। इस लिहाज से बंगलादेश बनाए जाने पर उन्हें बंगलादेश की माता कहा जाना चाहिए।

    तर्कों और तथ्यों के आधार पर ये बातें पहली बार नहीं कही गईं हैं। देश के कई मूर्धन्य विद्वानों ने महात्मा गांधी के व्यक्तित्व की मीमांसा करते हुए ये बातें कही हैं। देश के कई विद्वान और संगठन इनसे सहमत हैं और समय समय पर ये कहते भी रहते हैं। भाजपा अपना जनाधार बढ़ाने के लिए इन देशभक्त संगठनों से सहयोग भी लेती रहती है। इन संगठनों से जुड़े लोग राष्ट्रवादी संगठन आरएसएस से भी जुड़े रहे हैं। इस लिहाज से वे भाजपा से भी जुड़े रहे हैं। इस आम चुनाव में जब भाजपा का संगठन खुलकर मैदान में नहीं था तब अनिल सौमित्र ने अपने संपर्कों के जरिए आगे बढ़कर साध्वी प्रज्ञा के प्रचार की कमान संभाली थी। इस लिहाज से वे भाजपा के उन दिग्गजों के निशाने पर आ गए थे जो कांग्रेस के दिग्विजय सिंह के साथ खड़े ठेकेदारों के गिरोह से जुड़े रहे हैं। यही समूह चुनाव में साध्वी प्रज्ञा के बयान और भाषण रोकने की रणनीति पर काम कर रहा था। अब जबकि चुनाव अंतिम चरण में पहुंच गया है तब ये गिरोह अपने षड़यंत्र उजागर न होने देने के लिए किसी को जिम्मेदार ठहराने का प्रयास कर रहा था। अनिल सौमित्र का ताजा बयान उनके लिए बहाना बन गया।

    पिछले पंद्रह सालों के शासनकाल में भाजपा के प्रदेश नेतृत्व ने पार्टी की विचारधारा को मजबूत न होने देने के लिए भरसक प्रयास किए । पार्टी का मुखपत्र रही चरैवेति चरैवेति पत्रिका और अन्य प्रकाशनों को भी छिन्न भिन्न कर दिया गया। प्रदेश में स्वस्थ परिचर्चा न हो इसके लिए मालवीय नगर के पत्रकार भवन को भी आपराधिक तत्वों के हाथों में सौंपकर गूंगा बना दिया गया। यही वजह है कि देश के मूलभूत मुद्दों पर जब भी कोई चर्चा होती है पत्रकार और नागरिक सभी ज्ञानशून्य और दिशा शून्य नजर आते हैं। प्रदेश में सत्ता माफिया की लूट को छुपाने के लिए भी इसी षड़यंत्र का सहारा लिया गया। पहली बार साध्वी प्रज्ञा के मैदान में आ जाने से इस गिरोह को अपनी रणनीति असफल होती नजर आने लगी है। इस गिरोह को साध्वी प्रज्ञा एक बड़ी बाधा नजर आ रहीं हैं। पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती के खिलाफ षड़यंत्र करने वाला ये गिरोह अब साध्वी प्रज्ञा और उन्हें समर्थन देने वालों के विरुद्ध भी साजिशें रच रहा है। देखना है कि खुद को जनता का चौकीदार कहने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस मामले पर क्या भूमिका निभा पाते हैं। यदि जनता उन्हें एक बार फिर सत्ता सौंपती है भूमिका भी तभी तय होगी।

  • साध्वी प्रज्ञा को भगवा आतंकी बताने के पीछे सत्ता माफिया का षड़यंत्र

    साध्वी प्रज्ञा को भगवा आतंकी बताने के पीछे सत्ता माफिया का षड़यंत्र

    साध्वी प्रज्ञाःभगवा आतंकवाद कहकर हिंदुत्व को बदनाम किया गया, हम तो सबका साथ सबका विकास चाहते हैं।

    भोपाल,9 मई(प्रेस सूचना केन्द्र)। भगवा आतंकवाद का शोर मचाकर मालेगांव बम धमाके के असली आरोपियों को छुड़ाने और साध्वी प्रज्ञा को आतंकी बताने की साजिश एनआईए की अदालत में धराशायी हो गई। आतंकवाद विरोधी दस्ते(एटीएस) का षड़यंत्र अब केवल सामान्य मुकदमे में बदल गया है जो इतना आधारहीन है कि जल्दी समाप्त हो जाएगा। मुंबई हाईकोर्ट के वकील और साध्वी प्रज्ञा प्रताड़ना कांड की हर कड़ी से वाकिफ रणजीत सांगले ने एक पत्रकार वार्ता में इस षड़यंत्र की सभी बारीकियों का खुलासा किया और इसे सत्ता माफिया का षड़यंत्र बताया।

    भारत रक्षा मंच के राष्ट्रीय मंत्री श्री सांगले ने बताया कि एटीएस के प्रमुख स्वर्गीय हेमंत करकरे और उनके सहयोगियों ने अपनी कथित छानबीन के बाद जो कहानी तैयार की थी वो एनआईए की अदालत में हवा हवाई साबित हुई। एनआईए ने साध्वी प्रज्ञा और उनके सहयोगियों पर लगाया मकोका हटा दिया और केवल सामान्य धाराओं में मुकदमा चलाने की इजाजत दी है। कानूनी प्रक्रियाओं का पालन जरूरी है इसलिए ये मुकदमा चलाया जा रहा है । इस मुकदमे में इतनी खामियां हैं कि वो अदालत में नहीं टिक पाएगा।

    उन्होंने बताया कि कांग्रेस के खेमे से साध्वी प्रज्ञा को आतंकवादी कहकर बदनाम किया जाता रहा है। ये कहा जाता है कि वे बीमार थीं इसलिए अदालत ने उन्हें जमानत दे दी। हकीकत ये है कि न्यायालय को उनके विरुद्ध प्रथम दृष्टया ही बमकांड में शामिल होने के सबूत नहीं मिले। वे स्त्री हैं और साढ़े आठ साल उन्होंने विचाराधीन अवस्था में न्यायिक हिरासत में गुजारे हैं। हिरासत में रहते हुए ही उन्हें कैंसर जैसे रोग ने जकड़ लिया। उन्हें पर्याप्त इलाज नहीं मिल पा रहा था इसलिए स्वास्थ्य को अतिरिक्त कारण समझकर उनकी जमानत मंजूर की गई।

    तत्कालीन गृहमंत्री पी चिदंबरम ने संसद में झूठा आश्वासन दिया था कि हम गैर कानूनी गतिविधियां प्रतिबंधक कानून और उसके अधीन बनाए गए अधिनियमों का दुरुपयोग रोकने के लिए न्यायाधीश स्तर का परिवीक्षा अधिकारी नियुक्त करेंगे। उसकी रिपोर्ट पर ही सबूतों की जांच की जाएगी। इसके बावजूद मुकदमे की समीक्षा के लिए कोई स्वतंत्र न्यायिक अधिकारी नियुक्त नहीं किया। विधि विभाग के सरकारी अधिकारी की राय पर साध्वी प्रज्ञा की गिरफ्तारी की गई थी जिससे सरकार की नियत उजागर होती है।

    श्री सांगले ने बताया कि 2008 में घटित मालेगांव बम धमाके में मारे गए और घायल व्यक्तियों की जो रिपोर्ट अदालत में प्रस्तुत की उसमें 101 घायलों के इंज्यूरी सर्टिफिकेट फर्जी साबित हुए। छह मृत व्यक्तियों की पोस्ट मार्टम रिपोर्ट के आधार पर डाक्टरों ने अदालत में कहा कि मृतकों के शरीर पर बम धमाके के निशान नहीं मिले थे। कुछ मृत शरीरों में से तो बंदूक की गोलियां तक बरामद हुईं जिससे बम धमाके की कहानी ही काल्पनिक साबित हो रही है। ऐसा लगता है कि वहां कम क्षमता का बम तो फटा लेकिन किन्हीं असामाजिक तत्वों ने बंदूकों से गोलियां भी चलाईं थीं।

    उन्होंने कहा कि बम धमाके के बाद साध्वी की मोटरसाईकिल मिलने की कहानी भी कई घुमावदार रास्तों से जोड़ी गई जिससे भगवा आतंकवाद की कहानी एक षड़यंत्र साबित होती है।

    रणजीत सांगलेःभगवा आतंकवाद के पीछे सत्ता माफिया

    गौर तलब है कि भगवा आतंकवाद को हवा देने का काम गृहमंत्री पी चिदंबरम और सुशील कुमार शिंदे के कार्यकाल में हुआ। शिवराज पाटिल और दिग्विजय सिंह ने कई स्थानों पर जिस तरह से इस मुद्दे का हौआ खड़ा किया उससे भी स्पष्ट होता है कि ये एक षड़यंत्र था। बाटला हाऊस एनकाऊंटर में इंस्पेक्टर मोहन शर्मा की शहादत को जिस तरह से बदनाम करने का षड़यंत्र किया गया उससे तो जांच एजेंसियों से जुड़े लोग साफ समझ गए थे कि हिंदू मुस्लिम वैमनस्य फैलाने के लिए भगवा आतंकवाद की कहानी को बल दिया जा रहा है।

    भोपाल लोकसभा क्षेत्र से कांग्रेस प्रत्याशी और प्रदेश के जन विद्रोह के बाद हटाए गए पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह अपने सहयोगियों के माध्यम से जिस तरह साध्वी प्रज्ञा को आतंकवादी साबित करने का जो प्रयास आज भी कर रहे हैं उससे भी कांग्रेस के षड़यंत्रों का खुलासा हो रहा है। उनकी दूसरी पत्नी और पत्रकार अमृता राय अपने मित्रों के माध्यम से जो कहानियां प्रसारित करने का प्रयास कर रहीं हैं उससे भी भगवा आतंकवाद को लेकर दिग्गी खेमे की सक्रियता उजागर हो रही है। दिग्विजय सिंह हिंदू विरोधी छवि से बचने के लिए कहते रहे हैं कि उन्होंने कभी भगवा आतंकवाद नहीं शब्द इस्तेमाल नहीं किया बल्कि संघी आतंकवाद कहा था। जबकि हकीकत ये है कि अभिनव भारत जैसे संगठन हिंदुत्व की विचारधारा के तो समर्थक रहे हैं पर आरएसएस से उनका सीधा जुड़ाव नहीं था।

    हाल ही में देश के कई अखबारों में कर्नाटक की पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या के लिए बनाई गई एसआईटी की क्लोजर रिपोर्ट का हवाला देकर खबरें छपवाई गईं हैं। जिनमें कथित तौर पर वही कहानी दुहराई गई है जो मालेगांव बम धमाके और समझौता एक्सप्रेस धमाके में एटीएस ने रची थी। ये कहानी एनआईए की सख्त छानबीन में आधारहीन साबित हो चुकी है। इसके बावजूद कांग्रेस का दुष्प्रचार तंत्र इसे लगातार दुष्प्रचारित कर रहा है। भोपाल में साध्वी प्रज्ञा के दावे के बाद जिस तरह कंप्यूटर बाबा के नेतृत्व में बाबाओं की तंत्र साधना और परेड कराई गई उससे भी कांग्रेस का षड़यंत्र जनता के सामने आ गया है। कई बाबाओं ने कैमरे के सामने स्वीकार किया कि उन्हें दक्षिणा देकर बुलाया गया था। जाहिर है कि 12 मई हो होने वाले मतदान में भोपाल की जनता इस मुद्दे पर अपनी राय जरूर देगी।

  • हिंदुओं को आतंकवादी बताने की साजिश

    हिंदुओं को आतंकवादी बताने की साजिश

    “हिंदुओं को ‘आतंकवादियों’ के रूप में बदनाम करने की साजिश से धीरे धीरे हट रहा है पर्दा” in Punjab Kesari
    October 31, 2017/0 Comments/in News /by Lalita NIjhawan

    हाल ही में गुजरात से आईएस के दो आतंकी – मौहम्मद कासिम स्टिंबरवाला और ओबेद अहमद मिरजा गिरफ्तार किए गए। पता लगा कि मौहम्मद कासिम कुछ दिन पहले तक अंकलेश्वर के एक अस्पताल में काम करता था जो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल के निकट सहयोगियों का है। पटेल कुछ समय पहले तक इस अस्पताल की प्रबंध समिति में भी थे। इस मामले पर जब हंगामा मचा और भारतीय जनता पार्टी ने पटेल को घेरा तो कांग्रेस ने इसे चुनावी राजनीति बता कर टरकाने की कोशिश की। पर वास्तव में क्या ये मामला इतना हलका है? क्या इससे पटेल का कोई लेना-देना नहीं है? जांच जारी है। असलियत क्या है, इस आतंकी को पटेल से जुड़े अस्पताल में किसने नौकरी दी, ठीक चुनाव से पहले इसने नौकरी क्यों छोड़ी, कौन कौन से धार्मिक स्थल इसके और इसके सहयोगी के निशाने पर थे, ये जांच के बाद ही सामने आ पाएगा।

    गुजरात और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को केंद्र में रखकर कांग्रेस ने लंबे अर्से तक इस्लामिक सांप्रदायिक राजनीति की है। यही नहीं इस्लामिक आतंकियों के प्रति नरमी और सहानुभूति का भी कांग्रेस का लंबा इतिहास रहा है। इसे देखते हुए भाजपा का इस मुद्दे को गंभीरता से लेना जायज बनता है। कांग्रेस नीत यूनाइटेड प्रोग्रेसिव एलायंस (यूपीए) सरकार ने बहुत ही सोचे समझे तरीके से हिंदुओं को आतंकवादियों के रूप में बदनाम करने की साजिश की, इसे कोई कैसे भूल सकता है। इस षडयंत्र की परतें भी अब धीरे धीरे खुलती जा रही हैं और साथ ही इस बात के संकेत भी मिलने लगे हैं कि इसमें कौन कौन शामिल थे। अब ये भी समझ में आने लगा है कि इस दुष्प्रचार का कारण सिर्फ मुस्लिम वोट बैंक ही नहीं था, इसके पीछे संभवतः कांग्रेस के कुछ बड़े नेताओं की मजबूरियां भी थीं। संकेत ये भी मिल रहे हैं कि ये मामला सिर्फ हिंदूवादी नेताओं को फंसाने का ही नहीं था, ये किसी बाहरी ताकत के इशारे पर इस्लामिक आतंकवाद के बरक्स ‘हिंदू आतंकवाद’ का नेरेटिव खड़ा करने का भी था। बड़ा सवाल ये है कि क्या ये पूरी साजिश सोनिया और उनके सलाहकार अहमद पटेल की सहमति और शिरकत के बिना संभव थी?

    इस विषय में आगे बढ़ने से पहले बात सुधाकर चतुर्वेदी की। 2008 मालेगांव ब्लास्ट मामले में नौ साल सलाखों के पीछे रहने के बाद वो हाल ही में जमानत पर रिहा हुए हैं। वो बताते हैं कि कैसे महाराष्ट्र एंटी टेरर स्क्वाड (एटीएस) ने उन्हें फर्जी तरीके से फंसाया। उन्हें देवलाली (नाशिक) में उनके घर से जबरदस्ती उठाया गया और मुंबई ले जाया गया। मुंबई में उन्हें थर्ड डिग्री टाॅर्चर दिया गया। एटीएस अफसरों ने उनके घर की चाबी छीन कर उनके घर में विस्फोटक पदार्थ आरडीएक्स रखा। उन्हें अवैध रूप से पुलिस हिरासत में रखा गया, प्रताड़ित किया गया, फंसाने के लिए फर्जी दस्तावेज बनाए गए, उनके पास से पिस्तौल की बरामदगी दिखाई गई और फिर माटुंगा पुलिस स्टेशन में फर्जी मामला दर्ज करवाया गया जिसमें कहा गया कि उन्हें हथियारों के साथ गिरफ्तार किया गया।
    चतुर्वेदी के खिलाफ कितने फर्जी पर मजबूत मामले बनाए गए और साजिश कितनी गहरी थी, उसे इस बात से समझा जा सकता है कि उन्हें जमानत मिलने में ही नौ साल लग गए। ध्यान रहे इसी मामले में साध्वी प्रज्ञा ठाकुर और कर्नल श्रीकांत पुरोहित सहित कई और लोगों को भी फंसाया गया। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद कर्नल पुरोहित और साध्वी प्रज्ञा को पहले ही जमानत मिल चुकी है। कर्नल पुरोहित की पत्नी को तो इसके लिए सुप्रीम कोर्ट तक जाना पड़ा।

    सुधाकर चतुर्वेदी बताते हैं कि उन्हें और अन्य लोगों को इस मामले में सिर्फ इसलिए फंसाया गया कि महाराष्ट्र की तत्कालीन कांग्रेस-एनसीपी सरकार और केंद्र की यूपीए सरकार मुसलमानों को खुश करने के लिए हिंदुओं को आतंकवादी साबित करना चाहती थी। हिरासत के दौरान एटीएस वाले उनसे लगातार योगी आदित्यनाथ, हिंदू युवा वाहिनी, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और उसके प्रमुख मोहन भागवत के बारे में पूछताछ कर रहे थे। सुधाकर कहते हैं कि वो मुझसे जिस तरह सवाल कर रहे थे, उससे साफ था कि अनेक वरिष्ठ हिंदूवादी नेता उनके निशाने पर थे और वो किसी भी हालत में उन्हें फंसाना चाहते थे।

    ध्यान रहे तब केंद्र में पी चिदंबरम और महाराष्ट्र में आर आर पाटिल गृहमंत्री थे। मालेगांव मामले में हिंदुओं का पकड़ने और उनके खिलाफ षडयंत्र रचने वाले हेमंत करकरे को 2008 में मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख (कांग्रेस) और आरआर पाटिल (एनसीपी) ने ही एटीएस प्रमुख बनाया था।

    ‘हिंदू आतंकवाद’ शब्दावली का सबसे पहले प्रयोग एक वामपंथी पत्रिका ने 2002 में किया। ध्यान रहे 2002 में गुजरात में सांप्रदायिक दंगे हुए थे। कांग्रेसियों ने इनके लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को तो बहुत बदनाम किया पर गोधरा कांड को भुला दिया जिसके कारण दंगे शुरू हुए। गोधरा में मुस्लिम षडयंत्रकारियों ने बहुत सोचे समझे तरीके से अयोध्या से आ रही साबरमती एक्सप्रेस के डिब्बों में आग लगाई जिसमें 59 लोग जिंदा जल गए। इसकी जांच से पता चला कि इसके मास्टरमाइंड कराची में बैठे थे और इसे कश्मीरी आतंकवादियों की मदद से अंजाम दिया गया। गुजरात दंगों में पाकिस्तानी हाथ को कांग्रेस ने बहुत आसानी से अनदेखा कर दिया।

    गुजरात में ही एक अन्य घटना में 2004 में इशरत जहां अपने तीन सहयोगियों (दो पाकिस्तानी – जीशान जौहर और अमजद अली अकबर अली राणा तथा एक भारतीय जावेद शेख) के साथ मारी गई। केंद्र सरकार की सूचना के बाद उनका एनकाउंटर हुआ। लेकिन बाद में कांग्रेस ने इसे भी हिंदू नरेंद्र मोदी द्वारा मुस्लिम अबला इश्रत की हत्या का मामला बना दिया। जबकि बाद में सीआईए और आईएसआई के डबल एजेंट जेम्स हेडली ने खुलासा किया कि वो लश्कर ए तौएबा की सदस्य थी। उसकी हत्या के बाद खुद लश्कर ने उसे अपनी वेबसाइट में शहीद बताया था। कांग्रेसियों ने इशरत की बात तो बहुत उछाली पर उन पाकिस्तानियों को भूल गए जो उसके साथ मारे गए।

    इन घटनाओं के सहारे कांग्रेसियों ने मोदी को ‘हिंदू खलनायक’ के रूप में भारत ही नहीं विदेशों में भी बदनाम किया। उनके खिलाफ अमेरिका में ऐसी लाॅबिंग की गई कि उन्हें वीसा दिए जाने पर ही रोक लग गई।

    ‘हिंदू आतंकवाद’ शब्दावली पहली बार भले ही 2002 में प्रयोग की गई, लेकिन इसे प्रचारित किया यूपीए सरकार के गृहमंत्री पी चिदंबरम ने जिन्होंने 2008 के मालेगांव ब्लास्ट के संदर्भ में अगस्त 2010 में हिंदु या भगवा आतंकवाद का जुमला उछाला। इस पर काफी बवाल मचा जिसके बाद तत्कालीन कांग्रेस महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने स्पष्टीकरण जारी किया। इसके बाद 2013 में आॅल इंडिया कांग्रेस कमेटी के सत्र में तत्कालीन गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने बयान दिया कि भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कैंपों में ‘हिंदू आतंकवाद’ का प्रशिक्षण दिया जाता है। यहां आपको विकीलीक्स के उस खुलासे की भी याद दिला दें जिसमें राहुल गांधी ने अमेरिकी राजदूत टिमोथी रोमर से कहा था कि भारत को पाकिस्तान से आने वाले इस्लामिक आतंकवाद से ज्यादा बड़ा खतरा देसी हिंदू आतंकवाद से है। रोमर जुलाई 2009 से अप्रैल 2011 तक भारत में अमेरिका के राजदूत रहे।

    राहुल, चिदंबरम और शिंदे कांग्रेस के शीर्षस्थ नेताओं में से हैं। यूपीए शासन में इनके शब्द पत्थर की लकीर समझे जाते थे। जाहिर है सरकारी महकमे और कांग्रेस नीत राज्य सरकारें इनकी सोच के हिसाब से ही काम करते थे और उसे अमली जामा पहनाने की कोशिश करते थे। क्या ये लोग सोनिया गांधी और उनके राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल की सहमति के बिना ‘हिंदू विरोधी’ राजनीति कर सकते थे? क्या इनकी सहमति के बिना विभिन्न आतंकवादी घटनाओं में पकड़े गए इस्लामिक संदिग्धों को छोड़ा जा सकता था? मालेगांव में 2008 से पहले सितंबर 2006 में भी धमाके हुए। एटीएस ने पहले तो इन धमाकों के लिए स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट आॅफ इंडिया (सिमी) के नौ लोगों को गिरफ्तार किया पर 2013 में चार्जशीट दाखिल करते समय हिंदूवादी संगठन अभिनव भारत को जिम्मेदार ठहरा दिया।
    इसके बाद 29 सितंबर 2008 को गुजरात के मोडासा और महाराष्ट्र के मालेगांव में एक साथ धमाके हुए। इस विषय में आगे बढ़ने से पहले बता दें कि सितंबर धमाकों से पहले इसी वर्ष जयपुर, बेंगलूरू, फरीदाबाद और अहमदाबाद में भी धमाके हुए। तत्कालीन सरकार ने बाकी के धमाकों की जांच को तो दरकिनार कर दिया पर मालेगांव धमाकों के आरोप में साध्वी प्रज्ञा ठाकुर, शिवनारायण सिंह कलसांगरा, और भंवरलाल साहू आदि को गिरफ्तार किया और इसे जोर शोर से ‘हिंदू आतंकवादी’ घटना के रूप में प्रचारित किया गया। सुधाकर चतुर्वेदी के बारे में हम पहले ही बता चुके हैं।

    इस से पहले फरवरी 2007 में भारत और पाकिस्तान के बीच चलने वाली समझौता एक्सप्रेस में धमाके हुए। एक अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट ने इसके लिए पाकिस्तानी नागरिक और लश्कर ए तौएबा के सदस्य आरिफ कसमानी को जिम्मेदार ठहराया और उसे संयुक्त राष्ट्र ने आतंकवादी भी घोषित किया। धमाकों के बाद एक संदिग्ध पाकिस्तानी को गिरफ्तार भी किया गया परंतु उसे 14 दिन के भीतर उसे छोड़ दिया गया। कांग्रेस सरकार ने इसके लिए एक बार फिर इस्लामिक आतंकवादियों को छोड़ कर अभिनव भारत को जिम्मेदार ठहराया और कर्नल पुरोहित का नाम भी उछाला गया जबकि चार्जशीट में उनका नाम तक नहीं था।
    जांच एजेंसियों ने इस मामले में सिमी नेता सफदर नागौरी, कमरूद्दीन नागौरी और आमिल परवेज पर नारको टेस्ट भी किए। इसमें एक शख्स अब्दुल रज्जाक का हाथ होने की बात सामने आई और ये भी साफ हुआ कि उसने इस विषय में सफदर नागौरी को बताया भी था। लेकिन सिमी और उनके पाकिस्तानी हैंडलर्स पर कार्रवाई करने की जगह कांगे्रस सरकार ने अपने ही देश के लोगों को ही इसके लिए बदनाम किया।

    बात अगर इन धमाकों तक ही रह जाती तब भी गनीमत थी। राहुल गांधी के राजनीतिक गुरू दिग्विजय सिंह ने तो नवंबर 2008 में मुंबई पर हुए आतंकवादी हमले के लिए भी आरएसएस को जिम्मेदार ठहरा दिया। एक पत्रकार अजीज बर्नी ने ‘26/11 – आरएसएस की साजिश’ नाम से किताब तक लिख डाली जिसका 6 दिसंबर 2010 को खुद दिग्विजय सिंह ने विमोचन किया। इस अवसर पर अन्य इस्लामिक कट्टरवादियों के साथ फिल्म निर्माता महेश भट्ट भी मौजूद थे। इस मौके पर दिग्विजय सिंह ने कहा कि हमले से दो घंटे पहले हेमंत करकरे ने उन्हें फोन करके कहा कि उन्हें मालेगांव मामले में जांच से खफा ‘हिंदू अतिवादियों’ से जान का खतरा है। ज्ञात हो कि इस हमले में करकरे मारा गया था। ये बात अलग है कि बाद में करकरे की पत्नी ने कहा कि दिग्विजय उसके पति की लाश पर राजनीति कर रहे हैं। खुफिया एजेंसियों के कुछ विशेषज्ञ तो यहां तक कहते हैं कि मुंबई हमले सत्तारूढ़ पार्टी की मिलीभगत से हुए। सभी हमलावरों ने हिंदू नामों के पहचान पत्र लिए हुए थे और मौली पहनी हुई थी। अगर कसाब जिंदा न पकड़ा जाता तो बड़ी आसानी से इसके लिए ‘हिंदुओं’ को जिम्मेदार ठहरा दिया जाता। बहरहाल ये वहीं दिग्विजय सिंह हैं जिन्हें दुर्दांत इस्लामिक आतंकवादी भी सम्मानीय नजर आते हैं। ये ओसामा बिन लादेन को ‘ओसामा जी’ और हाफिज सईद को ‘हाफिज साहब’ कहते हैं।

    देश में अनेक आतंकवादी घटनाओं के लिए जिम्मेदार सिमी पर 2008 में सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिबंध लगा दिया था। लेकिन ये अब भी दक्षिण भारतीय राज्यों में पाॅपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया (पीएफआई) के नाम से चल रही है। इस पर भारतीय मुस्लिम युवकों का बे्रनवाश कर आईएस भेजने के आरोप हैं। पर कांग्रेस इस मसले में चुप है। पीएफआई पर हिंदू लड़कियों का धर्मपरिवर्तन करवाने का आरोप है लेकिन कांग्रेसी नेता कपिल सिब्बल ऐसे मामलों में अदालत में पीएफआई की वकालत कर रहे हैं। धर्म के नाम पर घृणा फैलाने वाले जाकिर नायक को भी कांग्रेस सरकार ने पूरा बढ़ावा दिया जबकि अनेक देशों ने उस पर प्रतिबंध लगा दिया था। दिग्विजय सिंह ने तो उसे शांतिदूत करार दिया और उसकी हर तरह से मदद की। हाल हीे में एनआईए ने जाकिर नायक के खिलाफ चार्जशीट दायर की जिसमें उसके सारे आतंकी संपर्कों का कच्चा चिट्ठा दिया गया है। जब सरकार उसके खिलाफ कार्रवाई कर रही है तो उसे समर्थन और बढ़ावा देने वाले नेताओं को क्यों बख्शा जा रहा है?

    कश्मीर से केरल तक पाकिस्तानी आतंकियों और इस्टैबलिशमेंट के प्रति कांग्रेस की नरमी की यूं तो अनेक कहानियां हैं। लेकिन हाल ही में इस संबंध में कुछ और तथ्य सामने आए हैं जो वास्तव में सनसनीखेज हैं। एक न्यूज चैनल ने अपने खुलासे में बताया कि कांग्रेस के शीर्ष नेताओं ने बदनाम पाकिस्तानी बैंक – बैंक आॅफ क्रेडिट एंड काॅमर्स इंटरनेशनल (बीसीसीआई) के जरिए बोफोर्स सौदे के घूस की रकम को ठिकाने लगाया। आर्थिक अनियमितताओं के आरोप में जब इस बैंक की मुंबई ब्रांच को ताला लगाया गया तो इसके प्रमुख ने घूस देकर इसे फिर खुलवा लिया। देश-विेदेश में बदनामी के बाद इसे 1991 में बंद कर दिया गया। यहां समझने की बात ये है कि एक तरफ तो भारत और पाकिस्तान की कथित दुश्मनी थी, तो दूसरी तरफ कांग्रेस के प्रमुख नेता इस बैंक के जरिए घूस के पैसे को ठिकाने लगा रहे थे। क्या ये संवेदनशील जानकारियां इस बैंक के अधिकारियों ने पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों को नहीं दी हांगी?
    एक अन्य मामला हवाला व्यापारी मोइन कुरैशी का है। इसके पारिवारिक और व्यापारिक रिश्ते अनेक पाकिस्तानियों से हैं। भारत में ये प्रमुख कांग्रेसी नेताओं की नाक का बाल समझा जाता है। यूपीए सरकार के दौरान सीबीआई और ईडी जैसी जांच एजेंसियों में इसका दबदबा चलता था। ये मोटी रकम की एवज में मामले ‘रफा-दफा’ कराने का काम भी करता था। इस बात से कैसे इनकार किया जा सकता है कि कुरैशी देश की महत्वपूर्ण जानकारियां पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियों को नहीं देता होगा?

    मामला चाहे आतंकवादी गतिविधियों का हो या मुस्लिम तुष्टिकरण का या संवेदनशील आर्थिक जानकारियों का, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कांग्रेस की गतिविधियों में पाकिस्तान का हाथ दिखाई देता है। ऐसे में बहुत संभव है भारत में हिंदुओं को आतंकवादी के रूप में बदनाम करने के पीछे भी पड़ोसी देश की कोई सोची समझी रणनीति हो जिसे कांग्रेस चाहे-अनचाहे अंजाम दे रही हो। हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी ने पी चिदंबरम पर कश्मीर मामले में पाकिस्तानी जुबान बोलने का आरोप लगाया। कोई तो कारण होगा जो उन्होंने इतना गंभीर आरोप लगाया। बहरहाल बहुत से मामले अभी अदालत में हैं और बहुत से फाइलों में दबे हैं। माले गांव से लेकर मोइन कुरैशी तक के उदाहरण बताते हैं कि जो दिखता है वो सत्य नहीं होता। लेकिन हम सत्य का अनुमान अवश्य लगा सकते हैं। आप भी स्वतंत्र हैं इस विषय में अपनी राय बनाने के लिए।( ये पुराना आलेख आपको पृष्ठभूमि समझने में मदद करेगा.हमने इसे पंजाब केसरी से साभार लिया है।).

  • कन्हैया के नाम पर क्यों बिचके कमलनाथ

    कन्हैया के नाम पर क्यों बिचके कमलनाथ

    मध्यप्रदेश की राजनीति पर अपना परचम फहराने की खींचतान इन दिनों भोपाल में साफ देखी जा रही है। मुख्यमंत्री कमलनाथ ने लोकसभा चुनावों में अपनी पार्टी को फतह दिलाने के लिए जिस तरह आनन फानन मे कर्जमाफी की औपचारिकताएं पूरी कीं वहीं वे कई मुद्दों पर अपनी सरकार का बचाव करते नजर आ रहे हैं। लोकसभा चुनावों के माध्यम से पार्टी पर कब्जा जमाने के षड़यंत्र को उन्होंने सफल नहीं होने दिया। उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष के अपने वीटो पावर का प्रयोग करके बेगुसराय से सीपीआई के उम्मीदवार कन्हैया कुमार को प्रचार के लिए बुलाने के दिग्विजय सिंह के प्रस्ताव को रद्दी की टोकरी में डाल दिया। इससे एक बात साफ हो गई है कांग्रेस दिग्विजय सिंह के साथ तो कम से कम नहीं है।

    दरअसल भोपाल सीट पर कांग्रेस के टिकिट से चुनाव लड़ रहे पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह जिस अंदाज में अपना प्रचार कर रहे हैं उससे वे खुद को पार्टी हाईकमान से भी ऊपर दिखाने की कोशिश करते दिख रहे हैं। पत्रकार अमृता राय से बुढ़ापे में शादी रचाने के बाद राघौगढ़ किले में उन्हें पारिवारिक कलह और विरोध का सामना करना पड़ा। उसके बाद उन्होंने राघौगढ़ सीट से चुनाव लड़ने का फैसला छोड़ दिया और भोपाल की ओर रुख किया था। इसे पार्टी का फैसला बताने के लिए उन्होंने कमलनाथ का सहारा लिया। मुख्यमंत्री कमलनाथ ने जब पत्रकारों से सार्वजनिक तौर पर कहा कि मैं दिग्विजय सिंह से अनुरोध करता हूं कि वे भोपाल से चुनाव लड़ें तो पत्रकारों ने मुख मुद्रा देखकर अनुमान लगाया कि उन्हें राजनीतिक दांव में फंसा दिया गया है। वे अपने चुनाव में जुटे रहेंगे तो प्रदेश की अन्य सीटों का माहौल भी नहीं बिगाड़ पाएंगे। हालिया विधानसभा चुनाव में स्वयं दिग्विजय सिंह ने स्वीकार किया था कि उनकी पार्टी ने उन्हें प्रचार करने से इसलिए रोक दिया है क्योंकि प्रचार करने से पार्टी के वोट कट जाते हैं। भोपाल राजनीतिक मूड के हिसाब से भाजपा का गढ़ माना जाता है। इस लोकसभा सीट पर पिछले तीस सालों से भाजपा का कब्जा है। कांग्रेस के दिग्गजों का भी मानना है कि पिछले विधानसभा चुनावों में इस क्षेत्र में मतदाताओं का जो रुझान पाया गया उसके बीच दिग्विजय सिंह तो ठीक कांग्रेस के किसी भी प्रत्याशी का जीतना भी मुश्किल है।

    हालांकि दिग्विजय सिंह ने इसे चुनौती के रूप में इसलिए स्वीकार किया क्योंकि वे अपने जीवन की राजनीतिक पारी खेल चुके हैं। वे अपनी विरासत अपने बेटे जयवर्धन सिंह को भी सौंप चुके हैं। ऐसे में जीत उनके लिए कोई मायने नहीं रखती बल्कि वे सिर्फ अपनी धूल धूसरित साख को पुनर्जीवित करना चाहते हैं कम से कम इस लक्ष्य में तो वे बहुत हद तक सफल भी हुए हैं। अब वे चुनाव हार भी जाएं तो कम से कम उन्होंने अपनी कुछ जय जयकार तो करवा ही ली।

    इस हारी हुई बाजी के पर्दे के पीछे जो लक्ष्य दिग्विजय सिंह का था उसे पाने में वे पूरी तरह सफल रहे हैं। चुनाव की जीत का ख्वाब उनके लिए सिर्फ उपोत्पाद(बाईप्रोडक्ट) है।उन्होंने कमलनाथ सरकार में अपने बेटे को नगरीय प्रशासन मंत्री पहले ही बनवा लिया था। अब वे भोपाल में अपने उस कारोबार का दोहन करना चाह रहे हैं जो उन्होंने शिवराज सिंह चौहान की सरकार में अपने चहेते अफसरों और ठेकेदारों के माध्यम से फैलाया था। ठेकेदारों अफसरों के एक गिरोह के माध्यम से वे मध्यप्रदेश के उन सभी ठेकों में अपनी भागीदारी करते रहे हैं जो जरूरी बजट से पांच गुना पूर्वाकलन(इस्टीमेट) पर दिए जाते रहे हैं। इसमें सड़कों,पुलों, बिजलीघरों, बांध जैसी आधारभूत संरचनाओं का निर्माण प्रमुख रहा है। उन सभी ठेकों में दिग्विजय सिंह अपने चहेते अफसरों के माध्यम से चहेते ठेकेदारों को उपकृत कराते रहे हैं। उन ठेकों में अपने समर्थकों का धन निवेश कराते रहे हैं। इसीलिए उन्होंने भोपाल विजन नाम से एक दस्तावेज भी चुनावी मैदान में फेंका जिससे वे खुद को षड़यंत्रकारी आतंकवादी कहलाए जाने के आरोपों से बचने की जुगत करते दिखने लगे हैं।

    जनता ने जब 2003 में दिग्विजय सिंह को अपदस्थ करके उमा भारती को मध्यप्रदेश की कुर्सी सौंपी थी तब ये माना जा रहा था कि दि्ग्विजय सिंह की जेल यात्रा सुनिश्चित है। उस दौरान भाजपा ने श्वेतपत्र जारी किया था और लूटो भागो नाम से एक पुस्तिका भी प्रकाशित की थी जिसमें दिग्विजय सिंह सरकार के लूट भरे वित्तीय प्रबंधन और भ्रष्टाचारों की पोल खोली गई थी। जाहिर था जनादेश दिग्विजय सिंह को जेल भेजने का था। समय की नजाकत भांपकर दिग्विजय सिंह ने अपने छोटे भाई लक्ष्मण सिंह को भाजपा में भेजकर खुद को जेल जाने से बचा लिया। उनके माध्यम से शिवराज सिंह सरकार से तालमेल भी बिठा लिया। इसके साथ साथ सरकार की आड़ में चलने वाले कारोबारों में भी घुसपैठ जमा ली।

    यह घुसपैठ कुछ इसी तरह थी जैसे अंग्रेजों ने भारत छोड़ते समय सभी मुनाफे के कारोबारों में अपना शेयर डाल दिया था। वे भारत तो छोड़ गए लेकिन इन छद्म बहुराष्ट्रीय कंपनियों के माध्यम से सभी मुनाफे के धंधों से चांदी काटते रहे। यही नहीं उन्होंने बैंकों के सरकारीकरण का लाभ उठाते हुए स्थानीय चेहरों के नाम पर भारी कर्ज भी प्राप्त किया और इन छद्म उद्योगपतियों को डिफाल्टर बनाकर उन्हें ब्रिटेन में बसा दिया। भारत से प्रतिभा पलायन के साथ साथ पूंजी का ये पलायन देश को गरीब बनाए रखने की सबसे बड़ी वजह बन गई है। यही वजह है कि इस आमचुनाव में राष्ट्रवाद का मुद्दा पूरी तरह परवान चढ़ा है।मोदी इसी के सहारे स्थानीय नेत्तृव की असफलताओं को लांघकर सीधे मतदाता तक पहुंच गए हैं।इसने दिग्विजय सिंह के षड़यंत्र को भी धूल चटा दी है,क्योंकि मतदाता अब सीधे मोदी के नाम पर मतदान कर रहे हैं।

    इस षड़यंत्र के माध्यम से दिग्विजय सिंह ने अपने सभी सहयोगियों को भी भाजपा में एडजस्ट करा लिया था। हालत ये हो गई थी कि भाजपा के लिए रात दिन काम करने वाले कार्यकर्ताओं को तो किनारे कर दिया गया पर उनके चेले चपाटे सरकार पर हावी हो गए। भाजपा संगठन के बीच बार बार ये आवाजें उठती रहीं कि अफसरशाही उनकी बात नहीं सुन रही है पर शिवराज सिंह चौहान ने उन आवाजों को अनसुना कर दिया था. स्थिति यहां तक पहुंच गई कि पंद्रह सालों में जो भाजपा अजेय मानी जाती थी वो छिन् भिन्न हो गई। शिवराज सिंह चौहान की इसी शासनशैली का खमियाजा भाजपा को उठाना पड़ा है और पार्टी के तमाम सहयोग के बावजूद पार्टी जीत की देहरी पर जाकर भी सत्ता से वंचित रह गई।

    अब जबकि कांग्रेस राज्य की सत्ता पर काबिज हो गई है, भले ही उसकी लंगड़ी सरकार अल्पमत की है ऐसे में कमलनाथ अपनी सत्ता खोना नहीं चाहते। दिग्विजय सिंह ने उनसे बगैर पूछे सीपीआई की बैठक में जाकर ये घोषणा कर दी कि कन्हैया कुमार उनका प्रचार करने भोपाल आएंगे। उन्होंने इससे आगे बढ़कर ये भी कह दिया कि वे कन्हैया कुमार के प्रशंसक हैं।ऐसे में कांग्रेस के सभी रणनीतिकार भौंचक्के रह गए। प्रदेश अध्यक्ष के रूप में कमलनाथ ने अचकचाकर दिग्विजय सिंह को बुलाया और कहा कि कन्हैया कुमार को लाकर आप कांग्रेस का जनाजा क्यों निकालना चाहते हैं। हम इसकी अनुमति नहीं देंगे। आप इस फैसले पर फिर विचार करें और कन्हैया कुमार को भोपाल न आने के लिए कहें। तब तक पार्टी के भीतर और विरोधी खेमें में भी विरोध शुरु हो गया था। सोशल मीडिया पर तो कहा जाने लगा था कि कन्हैया कुमार भोपाल से पिटे बगैर नहीं जाएगा। उसे मालूम पड़ जाएगा कि देश टुकड़े टुकड़े गेंग को पसंद नहीं करता।

    कांग्रेस के रणनीतिकारों ने भी दिग्विजय सिंह को सलाह दी कि वे सीपीआई के किसी भी नेता को बुला लें पर कन्हैया कुमार को न बुलाएं। इससे उनकी विरोधी भाजपा जिस राष्ट्रवाद के मुद्दे पर चुनाव लड़ रही है वह आसानी से काग्रेस पर देशद्रोहियों से हाथ मिलाने का आरोप साबित कर देगी। नतीजतन दिग्विजय सिंह को अपना कदम वापस खींचना पड़ा और सीताराम येचुरी की सभा से संतोष करना पड़ा। हालांकि सीताराम येचुरी ने भी भोपाल आकर दूसरा बखेड़ा खड़ा कर दिया। उन्होंने कहा कि साध्वी प्रज्ञा कहती हैं कि हिंदू आतंकवादी नहीं होता जबकि भारत का इतिहास लड़ाईयों से भरा पड़ा है। रामायण और महाभारत भी हिंसा के उदाहरणों से भरे हुए हैं। आरोप लगाने के अतिरेक में वे ये भूल गए कि युद्ध और आतंकवाद दो अलग अलग चीजें होती हैं।

    जबसे दिग्विजय सिंह के भोपाल से लड़ने की घोषणा हुई है तबसे कई राजनीतिक विश्लेषक कहते रहे हैं कि ये फैसला भोपाल के साथ साथ कांग्रेस के लिए प्रदेश की सभी 29 सीटों के लिए हार की बड़ी वजह बनेगा। ये होता दिख रहा है। साध्वी प्रज्ञा पर आतंकवाद में शामिल होने का आरोप एनआईए कोर्ट में झूठा साबित हो चुका है। ऐसे में दिग्विजय सिंह को एक निरपराध महिला को झूठा फंसाने और भगवा आतंकवाद के नाम पर हिंदुओं को कलंकित करने का आरोप जनता के बीच गंभीरता से लिया जाने लगा है। इससे साफ है कि 23 मई को आने वाले नतीजों में कांग्रेस को जनमत की उपेक्षा करने का खमियाजा चुकाने के लिए तैयार रहना होगा।

  • साध्वी प्रज्ञा के प्रचार की कमान आम जनता ने संभाली

    साध्वी प्रज्ञा के प्रचार की कमान आम जनता ने संभाली

    भोपाल लोकसभा की हाईप्रोफाईल सीट का आमचुनाव इन दिनों साधू और शैतान की लड़ाई में तब्दील हो गया है। एक ओर जहां कांग्रेस के दिग्विजय सिंह ने जनसंपर्क, धनवर्षा, और पुलिसिया तालमेल के साथ अपराधियों की फौज मैदान में उतार दी है वहीं साध्वी प्रज्ञा सिंह के पक्ष में आम जनता ने मोर्चा संभाल लिया है। आम लोगों के समूह रोज सुबह एक से दो घंटों तक घर घर जाकर मतदान की अपील कर रहे हैं। कई स्वयंसेवियों ने तो अपने कारोबार बंद करके साध्वी के पक्ष में दिन रात की जवाबदारी संभाली है। वे लोगों को दिग्विजय सिंह के मुख्यमंत्रित्व काल के कुशासन की याद दिला रहे हैं और मौजूदा सरकार की असफलता की कहानियां सुना रहे हैं। साध्वी प्रज्ञा को झूठे मुकदमों में फंसाकर हिंदुओं को बदनाम करने वाले दिग्विजय सिंह को वोट न देने की अपील भी कर रहे हैं। इसके जवाब में दिग्विजय सिंह ने कुख्यात कंप्यूटर बाबा के नेतृत्व में बाबाओं की फौज मैदान में उतार दी है। भारी दान दक्षिणा लेकर मैदान में उतरे ये बाबा घर घर जाकर कह रहे हैं कि साध्वी प्रज्ञा कोई संत तो हैं नहीं, जबकि दिग्विजय सिंह ने नर्मदा परिक्रमा करके खुद को हिंदू साबित कर दिया है। दिग्विजय सिंह के समर्थक घर घर जाकर नर्मदा जल की बोतलें, उनके हिंदू होने के प्रमाण पत्र और धन बांट रहे हैं इसके बावजूद आम जनता ने साध्वी प्रज्ञा के प्रचार की कमान संभाली है तो इसकी वजह आसानी से समझी जा सकती है।

    बाबाओं में बंटती खीर पुड़ी का लंकर इतना विशाल है कि प्रदेश भर से बाबाओं की टोलियों ने इन दिनों भोपाल में डेरा डाल दिया है। ये बाबा नमक का कर्ज अदा कर रहे हैं और घर घर घूमकर दिग्विजय सिंह के पक्ष में प्रचार कर रहे हैं। दिग्विजय सिंह ने लंबे समय से भोपाल से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रखी थी। उन्होंने पत्रकारों के बीच सघन संपर्क बना रखा था और उनके पक्ष में माहौल बनाने वाला एनजीओ विकास संवाद इसके लिए कई सालों से भूमिका बनाता रहा है।न्यू मार्केट के इंडियन काफी हाऊस में बैठने वाले उनके समर्थक नए पत्रकारों को अपने खेमें में खींचने का प्रयास करते हैं यहीं से उन पत्रकारों को दिग्विजय के लिए सहयोगी साबित होने वाली खबरें प्लांट की जाती रहीं हैं। यही वजह है कि जैसे ही भाजपा ने साध्वी प्रज्ञा को भोपाल से उम्मीदवार बनाया तो अखबारों और मीडिया चैनलों ने माहौल बनाना शुरु कर दिया कि भाजपा ने आतंकवादी को अपना प्रत्याशी बना दिया है। जबकि हकीकत ये है कि एनआईए ने एटीएस की भगवा आतंकवाद की कहानी को नकार दिया है और अदालत ने केवल सामान्य धाराओं में मुकदमा चलाने की अनुमति दी थी। साध्वी प्रज्ञा और उनके सहयोगियों के विरुद्ध ये प्रकरण अभी भी अदालत में लंबित है लेकिन वो इतना कमजोर है कि जो ज्यादा लंबा नहीं खिंच सकता।

    दिग्विजय सिंह विभिन्न समाजों के सम्मेलन भी आयोजित कर चुके हैं जहां उनसे जुड़े समाज के नेताओं ने अपने नेता के पक्ष में गुणगान करने में कोई कसर नहीं रखी। इस दौरान हर समाज के सहभोज भी कराए गए जिनकी फंडिंग दिग्विजय सिंह ने अपने छद्म सहयोगियों के मार्फत की थी।कांग्रेस कमेटी में प्रवक्ता माणक अग्रवाल के माध्यम से जो भारतीय मुद्रा की बारिश कराई जा रही है उसमें स्नान करने के लिए लोगों का तांता लगा हुआ है। फंडिंग का ये दारोमदार दिग्विजय सिंह के सुपुत्र और राज्य के नगरीय प्रशासन मंत्री जयवर्धन सिंह संभाले हुए हैं।

    फंड का ये सैलाब लाने की तैयारी दिग्विजय सिंह ने लंबे समय से कर रखी थी। एक समय़ भाजपा की आर्थिक रीढ़ समझे जाने वाले दिलीप सूर्यवंशी और उनकी फर्म दिलीप बिल्डकान ने पूरे पंद्रह सालों तक राज्य के निर्माण ठेकों पर एकछत्र राज्य किया है। इस दौरान उनकी फर्म दिलीप बिल्डकान चंद लाख रुपयों से बढ़कर अरबों का आंकड़ा छू गई । बताते हैं कि दिग्विजय ने अबू धाबी की अपनी तेल लाबी के सहयोग से दिलीप बिल्डकान में अरबों रुपयों का निवेश करवाया था। जनवरी माह में अबू धाबी की इन कंपनियों ने अपना निवेश खींच लिया। इससे दिलीप बिल्डकान का जो शेयर लगभग 1200 रुपए की ऊंचाई छू रहा था वो घटकर 450 रुपए की जमीन पर आ गिरा।लगभग तीस प्रतिशत की शुरुआती गिरावट से ही भाजपा की संभावित आर्थिक रीढ़ टूट गई। एक समय जो दिलीप सूर्यवंशी खुद को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का फंड मैनेजर कहते थे वे आज दिग्विजय सिंह के दरवाजे खड़े हैं और चुनाव के लिए धन भी मुहैया करा रहे हैं।

    यही नहीं उदय क्लब नामक उनका सहयोगी संगठन जिसमें भाजपा और कांग्रेस से जुड़े ठेकेदारों, अफसरों और नेताओं का गठजोड़ है वह भी दिग्विजय सिंह के पक्ष में थैलियां खोलकर रुपया खर्च कर रहा है। इसकी वजह है कि दिग्विजय सिंह ने आते ही भोपाल के विकास का विजन पत्र प्रस्तुत किया है। उनका बेटा नगरीय प्रशासन मंत्री है। मुख्यमंत्री कमलनाथ कह रहे हैं कि भोपाल के विकास की चाभी दिग्विजय सिंह के पास रहेगी। ऐसे में भाजपा और कांग्रेस के ठेकेदार दिल खोलकर दिग्विजय सिंह के पक्ष में धनराशि खर्च कर रहे हैं। उन्हें उम्मीद है कि यदि दिग्विजय सिंह चुनाव जीतते हैं तो उन्हें फिर विकास के नाम पर बड़े ठेके मिल सकते हैं। इस तरह विकास का विजन वास्तव में भोपाल के विकास के लिए नहीं बल्कि ठेकेदारों के विकास का विजन बन गया है।यही वजह है कि संगठन विहीन कांग्रेस मैदान में नजर आने लगी है और भाजपा मैदान से बाहर खड़ी दिख रही है। भाजपा के जो नेता ठेकेदार हैं वे इसलिए सामने नहीं दिखना चाहते क्योंकि उन्हें भय है कि भविष्य में ठेके मिलना मुश्किल हो जाएगा।

    जो लोग दिग्विजय सिहं का शासन देख चुके हैं वे भयभीत हैं कि उन्हें एक बार फिर बंटाढार का शासन न झेलना पड़े, इसलिए उन्होंने खुद आगे बढ़कर साध्वी प्रज्ञा के प्रचार की जवाबदारी थाम ली है। उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सहयोगियों का समर्थन मिल रहा है। उन्हें सबसे बड़ा सहयोग तो उन आम नागरिकों का मिल रहा है जो लंबे समय से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को देख सुन रहे हैं। उनके कामकाज की उपलब्धियां जान चुके हैं। कांग्रेस और राहुल गांधी के गाली गलौच भरे दुष्प्रचार को झेल रहे हैं। दिग्विजय सिंह के दंभी कटाक्ष उन्हें याद हैं। वे जानते हैं कि आम नागरिकों को अपमानित करना दिग्विजय सिंह की आदत में शामिल है।

    सबसे बड़ी बात तो ये है कि दिग्विजय सिंह की इस कुख्याति से हिंदू ही नहीं मुसलमान भी अच्छी तरह वाकिफ हैं। रमजान की तैयारी कर रहे मुस्लिम, दिग्विजय सिंह की उस फौज की गतिविधियों को देख सुन रहे हैं जिसने बूथ मैनेजमेंट के लिए भोपाल में डेरा डाल रखा है।एक मेडीकल कालेज में डेरा डाले पड़ी इस अपराधियों की टोली और खुले लंगर के साथ इन्हें टैक्सियां दी गईं हैं। भोपाल लूटने के अंदाज में घूम रहे इन आपराधिक तत्वों पर पुलिस का कोई अंकुश नहीं है। इसकी वजह है कि दिग्विजय सिंह ने अपने चहेते आईपीएस वीके सिंह को पुलिस का मुखिया बनवाया है। उनके माध्यम से पुलिस को साफ निर्देश हैं कि बगैर छानबीन किए कोई प्रकरण दर्ज न करो। चुनाव में पुलिस और जनता के बीच टकराव टालते रहो। यही वजह है कि पुलिस की बंधी हुई घिग्घी को देखकर एक महिला पुलिस अफसर के बेटे ने एक डीएसपी को घर में घुसकर गोली मार दी। राजनैतिक हस्तक्षेप के बीच जब उस हत्यारे ने सरेंडर किया तो पुलिस ने अपने ही अफसर के खिलाफ कहानी प्रचारित कर दी कि वो महिला पुलिस अफसर को अश्लील मैसेज भेजता था इससे गुस्सा होकर बेटे ने उसे गोली मारी है। मुस्लिमों के बीच इस प्रकरण ने चिंता बढ़ा दी है। उन्हें लगने लगा है कि जिस दिग्विजय सिंह के समर्थक चुनाव जीतने के पहले इस तरह की गुंडागर्दी कर रहे हैं वे चुनाव जीतने के बाद तो खुलेआम लूटपाट करने लगेंगे। इस लिहाज से साध्वी को भले ही हिंदूवादी कहकर मुस्लिमों से काटने की कोशिश की जा रही है पर वे उनके लिए ज्यादा सुरक्षित साबित होंगी। इसकी एक वजह शिवराज सिंह चौहान का पिछला कार्यकाल भी है जिसमें मुस्लिमों को भरपूर विकास के अवसर मिले और भाजपा की कथित मुस्लिम विरोधी छवि से वे बाहर निकल चुके हैं।

    जैसे जैसे चुनाव की तारीख नजदीक आती जा रही है वैसे वैसे राजनीतिक दलों ने भी घर घर जाकर प्रचार की मुहिम तेज कर दी है। आम सभाएं और नुक्कड़ सभाएं भी हो रहीं हैं। इन सभी के बीच साध्वी प्रज्ञा को दी गई अमानवीय प्रताड़ना की जो बातें कहीं जाती हैं उनसे आम लोग उद्वेलित हो रहे हैं। देश में जिस राष्ट्रवाद का माहौल बन गया है उसके बीच साध्वी प्रज्ञा पर लगे झूठे आरोप तेजी से सहानुभूति बटोर रहे हैं। इस मुद्दे पर लिखीं गई किताबें (भगवा आतंक एक षड़यंत्र) और (आतंक से समझौता) ने भाजपा कार्यकर्ताओं के मन से संशय के बादल दूर कर दिए हैं। वे अब साध्वी प्रज्ञा की बेगुनाही और दिग्विजय सिंह के षड़यंत्रों के खिलाफ खुलकर प्रचार कर रहे हैं। ऐसे में साध्वी प्रज्ञा षड़यंत्रों की इस दीवार को फांदने के लिए तैयार हो चुकी हैं। जनता उनके पक्ष में जिस तरह स्वतःस्फूर्त ढंग के आगे आ रही है उसे देखते हुए भोपाल का चुनाव भावुक और रोचक हो गया है।

    (लेखक पत्रकार होने के साथ साथ जन न्याय दल के सदस्य और प्रवक्ता भी हैं).

  • दिग्विजय सिंह ने रची थी हिंदुओं को आतंकी बताने की साजिशःप्रेम शुक्ल

    दिग्विजय सिंह ने रची थी हिंदुओं को आतंकी बताने की साजिशःप्रेम शुक्ल

    भोपाल,3 मई(प्रेस सूचना केन्द्र)। साध्वी प्रज्ञा को बमकांड के झूठे आरोप में फंसाकर हिंदुओं को आतंकवादी बताने का षड़यंत्र कांग्रेस के नेता दिग्विजय सिंह और उनके सहयोगियों ने रचा था। इससे वे पूरी दुनिया में हिंदुओं को उसी तरह संदिग्ध बनाने की साजिश कर रहे थे जिस तरह पाकिस्तान के नागरिकों को कई देशों में शंका की दृष्टि से देखा जाता है। मालेगांव बम धमाके में साध्वी प्रज्ञा को जिस पुरानी मोटरसाईकिल से रिश्ता जोड़कर गिरफ्तार किया गया था वह पुलिस ने आठ दिन बाद बरामद की, जिससे साबित होता है कि ये सोची समझी साजिश थी।

    भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता और ख्यातनाम पत्रकार प्रेम शुक्ल ने आज भोपाल में आयोजित बुद्धिजीवियों की चाय पर चर्चा में ये बात कही। भारत में आतंकवाद से हिंदुओं को जोड़ने के विषय पर लिखी गई चार पुस्तकों पर चर्चा के दौरान देश की आतंकवादी घटनाओं की पृष्ठभूमि की पड़ताल करने का प्रयास किया गया।इस दौरान भगवा आतंक एक षड़यंत्र किताब के लेखक आरवीएस मणि और द ग्रेट इंडियन कांस्पिरेसी के लेखक प्रवीण तिवारी ने आतंकी घटनाओं की पृष्ठभूमि पर अपने नजरिए का खुलासा किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार रामेश्वर मिश्र पंकज ने की। आयोजक के तौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण मंच की महासचिव रेशम सिंह ने अपना मार्गदर्शन दिया। मंच की ओर से कार्यक्रम का संचालन विचारक अनिल सौमित्र ने किया।

    अपने वक्तव्य में प्रेम शुक्ल ने कहा कि बाबरी विध्वंस के बाद राजनीति में जिस तरह भाजपा का उदय हुआ उसे देखते हुए कांग्रेस ने हिंदू आतंकवाद की कहानी रचकर देश को बदनाम करने की साजिश रची। मालेगांव में फोड़ा गया बम जहां बनाया गया उसकी मिट्टी और बम रखने के लिए इस्तेमाल साईकिल बरामद करके आतंकवादियों को भी गिरफ्तार कर लिया गया था। सफदर नागौरी के नार्को एनालिसिस टेस्ट में सारी कहानी सामने आ गई। पुलिस ने मुंबई हमले की साजिश में उजागर हुए डेविड कोलमेन हेडली ने भी इसी कहानी को सत्यापित किया।इसके बावजूद पुलिस ने लंबे समय तक चालान पेश नहीं किया और बाद में आरोपी संदेह का लाभ देकर छोड़ दिए गए।

    इसकी वजह तत्कालीन गृहमंत्री शिवराज पाटिल, दिग्विजय सिंह और सुशील कुमार शिंदे जैसे नेता थे। किन्हीं विदेशी ताकतों के साथ मिलकर इन्होंने देश के खिलाफ षड़यंत्र किया। मालेगांव बम धमाके में अचानक एटीएस साध्वी प्रज्ञा भारती,समीर कुलकर्णी, कर्नल पुरोहित, असीमानंद और अन्य के नाम सामने लाए गए। कहा गया कि आरएसएस की विचारधारा से जुड़े इन लोगों ने ये बम फोड़ा था। इस कहानी का आधार साध्वी प्रज्ञा की वो कथित मोटरसाईकिल थी जिसे इन लोगों की गिरफ्तारी के आठ दिनों बाद बरामद किया गया। हिंदू आतंकवाद की कहानी दिग्विजय सिंह ने ही रची थी।यदि 26।11हमले में अजमल कसाब नहीं पकड़ा जाता और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई की भूमिका का खुलासा नहीं होता तो मारे गए आतंकवादियों के फर्जी हिंदू नामों वाले परिचयपत्रों और हाथों में बंधे कलावा के आधार पर हिंदू आतंकवाद को प्रमाणित कर दिया जाता।

    उन्होंने बताया कि जब ये घटना हुई थी तब कांग्रेस नेता अहमद पटेल ने दबाव डालकर हसन कपूर को मुंबई पुलिस का मुखिया बनवाया गया था। उनके हस्तक्षेप से इन घटनाओं के साक्ष्य मिटाने की साजिश की गई। अजीज बर्नी की जिस विवादित पुस्तक को आनन फानन में लिखवाया गया और दिग्विजय सिंह उसका विमोचन करने पहुंचे उसमें कहा गया कि हेमंत करकरे हिंदू आतंकवाद के कारण मारे गए। जबकि उस दुष्टात्मा का निधन आतंकवादियों की गोली से हुआ था। उन्होंने कहा कि देश में अब तक जो आतंकवादी पकड़े गए या मारे गए वे अजमेर शरीफ की दरगाह, फातिमा की दरगाह को तो निशाना बनाते रहे लेकिन उन्होंने कभी किसी देवबंदी मस्जिद को निशाना नहीं बनाया। श्री शुक्ल ने आव्हान किया कि जिन लोगों ने साध्वी प्रज्ञा को नौ सालों तक अमानवीय प्रताड़ना दी जनता उन्हें सौ सालों तक के लिए सत्ता से बाहर फेंक देगी।

    जब देश में ये आतंकवादी घटनाएं चल रहीं थीं तब गृह मंत्रालय में अवर सचिव रहे आरवीएस मणि ने जब देशभक्तों के खिलाफ इन षडयंत्रों को करीब से देखा तो उन्होंने इसका राज फाश करने का बीड़ा उठाया। उन्होंने भगवा आतंक एक षड़यंत्र नाम से लिखी पुस्तक में पूरे षड़यंत्र के दस्तावेजी प्रमाण भी प्रस्तुत किए हैं। उन्होंने पुस्तक में लिखी बातों के संबंध में बताया कि गृहमंत्री चिदंबरम ने 2010 में देवबंद जाकर भगवा आतंकवाद शब्द कहकर देश के लोगों को ही अपराधी बताने का काम किया था। एटीएस ने ही समझौता एक्सप्रेस के आतंकवादियों को भाग निकलने में मदद की। बाटला हाऊस एनकाऊंटर को फर्जी बताकर दिग्विजय सिंह, सोनिया गांधी जैसे नेताओं ने बहादुर अफसर मोहन शर्मा की शहादत का मजाक उड़ाया था। इस तरह कांग्रेस ने आतंकवाद को अल्पसंख्यकों पर अत्याचार बताकर न केवल मुस्लिमों की हत्याएं करवाईं बल्कि हिंदू आतंकवाद जैसा झूठा शब्द रचकर देश के मूल नागरिकों को बदनाम करने का काम किया था।

    आतंक से समझौता पुस्तक के लेखक प्रवीण तिवारी ने कहा कि जिस दिन स्वामी विवेकानंद के शरीर के भगवा रंग के कपड़ों को आतंक से जोड़ने की साजिश की गई उसे देखकर हर आम भारतीय का मन दुखी हुआ था। एटीएस ने आतंकवाद की जड़ें खोदने वाले कर्नल पुरोहित और उनके सहयोगियों को ही इस कांड में आरोपी बना दिया और असली दोषियों को बच निकलने की पृष्ठभूमि तैयार की। भाजपा की प्रत्याशी प्रज्ञा भारती भी इस षड़यंत्र का शिकार हुई थीं। उन्हें लौमहर्षक प्रताड़ना दी गई। आज हर राष्ट्रभक्त नागरिक का दायित्व है कि वो देश के विरुद्ध षड़यंत्र करने वालों को दंडित करे।

    कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए साहित्यकार रामेश्वर मिश्र पंकज ने कहा भारत की अस्मिता का अपमान करने वाले दिग्विजय सिंह, चिदंबरम जैसे लोगों को सजा देने का दायित्व अब जनता का है।आयोजन में श्रोता के रूप में शामिल सूर्यकांत केलकर ने कहा कि भारत रक्षा मंच से जुड़े एड्व्होकेट हिंदू आतंकवाद जैसा शब्द रचने के दोषी लोगों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई करेंगे। एड्व्होकेट साधना पाठक ने कहा कि जब हम अपने वकील साथियों को लेकर साध्वी प्रज्ञा के बयान लेने जाते थे तब हमने उनकी असहनीय वेदना को करीब से महसूस किया था। उन्होंने कहा कि निर्दोष नागरिकों के विरुद्ध षड़यंत्र करने वालों के विरुद्ध हम अब तक लगभग उदार रहे हैं, पर अब समय आ गया है कि जब हम उन्हें आगे बढ़कर दंडित करें।