Month: April 2018

  • भारत को कश्मीर पर दो टूक फैसला लेना होगा-जनरल बख्शी

    भारत को कश्मीर पर दो टूक फैसला लेना होगा-जनरल बख्शी

    भोपाल, 10 अप्रैल,(मध्यप्रदेश प्रेस क्लब)। कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है, जो लोग इस पर दावा करते हैं उन्हें खुली चुनौती है कि वे इसे लेने का प्रयास करके देख लें। भारत सरकार की सहनशील नीति के कारण ही आज तक कश्मीर अशांत है। सरकार को दो टूक फैसला लेना होगा। यदि हम सहते रहेंगे तो कश्मीर के नाम पर लोग हमारे सिर पर बैठने का प्रयास करते रहेंगे। अब समय आ गया है जब कश्मीर की समस्या हमेशा के लिए सुलझा ली जाए और देश में अमन चैन स्थापित किया जाए। सेना के रिटायर्ड मेजर जनरल जीडी बख्शी ने आज पत्रकार वार्ता में ये बात कही। मध्यप्रदेश प्रेस क्लब के रजत जयंती समारोह के अवसर पर आयोजित पत्रकार वार्ता में आज दूरदर्शन के अतिरिक्त महानिदेशक और विख्यात लेखक राजशेखर व्यास ,कंप्यूटर वैज्ञानिक चंद्रकांत राजू ने भी अपने विचार व्यक्त किए।

    जनरल जी डी बख्शी ने कहा कि भारत विरोधी ताकतें बरसों से देश को खंडित करने का प्रयास करती रहीं हैं। जाति और धर्म के नाम पर देश को विभाजित करके भारत की विकास यात्रा बाधित की गई है। अंग्रेजों ने पहली जातिगत जनगणना वर्ष 1872 में कराई थी। देश को आजाद कराने के लिए 1857 की क्रांति के बाद अंग्रेजों ने देश में जातिवादी वैमनस्य के बीज बोए। आजादी के बाद संविधान के नाम पर कभी जमीनी सच्चाई बताकर जातियों की खाई खोदी जाती रही है। भारत को कमजोर बनाने वाली ताकतें यहां अपनी पकड़ नहीं खोना चाहतीं इसलिए वे तरह तरह के षड़यंत्र कभी आईएसआई कभी वैश्विक संस्थाओं के माध्यम से करती रहती हैं।

    जनरल बख्शी ने कहा कि भारत के करदाताओं से एकत्रित धन से चलने वाले जवाहर लाल नेहरू विवि के हर छात्र पर आठ लाख रुपया हर साल खर्च होता है। इसके बावजूद वहां अफजल हम शर्मिंदा हैं तेरे कातिल जिंदा हैं जैसे नारे लगाने वाली मानसिकता पढ़ाई जाती है। ये अभिव्यक्ति की आजादी नहीं हैं। दुनिया के किसी भी देश में इस तरह के नारे लगाने की इजाजत नहीं है। इसके बावजूद भारत में ही मानवाधिकारों के नाम पर और अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर देश को कमजोर करने की कोशिशें चलती रहती हैं। भारत सरकार को इस अराजकता को रोकना होगा।

    उन्होंने कहा कि भारत की आजादी की लड़ाई में नेताजी सुभाष चंद्र बोस का योगदान अतुलनीय रहा है। इसके बावजूद पिछली सरकारों ने दिल्ली के प्रमुख स्थानों पर उनकी मूर्तियां नहीं लगाई । देश को बताया गया कि आजादी केवल गांधीजी के प्रयासों से आई जबकि ये सच्चाई नहीं है। आजाद हिंद फौज यदि ब्रिटिश हुकूमत को खुला चैलेंज नहीं देती तो अंग्रेज यहां से नहीं भागते। इसीलिए हम देश में पैन इंडिया मूवमेंट चला रहे हैं। हम देश से आव्हान करते हैं कि आजाद हिंद फौज के गठन के दिन इस बार हम दिल्ली चलो के नारे के साथ राम लीला मैदान में एकत्रित हों। सरकार से मांग करें कि वो जस्टिस मुखर्जी की रिपोर्ट लागू करे। उन्होंने कहा कि हमें भारत सरकार से बहुत सारी उम्मीदें हैं पर अब तक के कार्यकाल में सरकार ने इस दिशा में बहुत प्रयास नहीं किया है। बेशक सरकार के सामने देश को संवारने की काफी सारी चुनौतियां हैं पर देश को कारगर बनाने के लिए हमें कई मूलभूत फैसले लेने होंगे जिससे मौजूदा व्यवस्था को बदला जा सके।

    दूरदर्शन के अतिरिक्त महानिदेशक राजशेखर व्यास ने कहा कि देश को मानसिक गुलामी से मुक्ति के लिए मैंने स्वयं 29 ग्रंथ लिखे हैं ताकि देश की नई पीढ़ी इस विशाल देश का पथ सुनिश्चित कर सके। आजादी के बाद के बरसों में हमें गुलामी की भाषा ही सिखाई जाती रही है। पांच सौ साल मुगलों और दो सौ साल अंग्रेजों की गुलामी से पहले का गौरवशाली इतिहास हमें नहीं बताया गया है। विदेशों से पढ़कर आने वाले भारत के नेताओं का भारतीयता से परिचित न होना इसकी सबसे बड़ी वजह थी। उज्जैन के ही पद्मभूषण पंडित सूर्यनारायण व्यास ने इसीलिए 1928 से उज्जैन में अखिल भारतीय कालिदास समारोह मनाना शुरु किया था।भारत के नेतागण शेख्सपियर की बात तो करते थे लेकिन वे कालिदास को नहीं जानते थे। जबकि तुलनात्मक रूप से महाकवि कालिदास की रचनाएं ऊंचे दर्जे की रहीं हैं।

    उन्होंने कहा कि भारत का दूरदर्शन आज भी देश से गहरा जुड़ाव रखता है। मीडिया के इस मंच की विराटता का अहसास आमतौर पर लोग नहीं लगा पाते हैं जबकि इसके विभिन्न चैनल समाज के हर तबके से सीधा संवाद करते हैं। उन्होंने कहा कि जो आकाशवाणी कभी घाटे का सौदा बना दी गई थी वो अब अपने पैरों पर खडी है। सरकारी मीडिया को निगम बनाने के बाद इस पर सरकार का भोंपू होने के आरोप तो नहीं लगते हैं लेकिन अभी इसकी लोकप्रियता बढ़ाने की बहुत सारी संभावनाएं बाकी हैं। ऊर्जावान लोगों को इससे जोड़कर इस माध्यम का पूरा उपयोग करने के प्रयास किए जा रहे हैं।

    कंप्यूटर वैज्ञानिक चंद्रकांत राजू ने कहा कि भारत में उपनिवेशीकरण की मानसिकता ने विश्वविद्यालयों को अपने चंगुल में फंसा रखा है। यहां पढ़ने वाले छात्र छात्राएं केवल नौकरी खोजते रहते हैं जबकि वे दुनिया के अन्य देशों में जाकर चमत्कृत करने वाले काम करते हैं। अनुसंधान और पेटेंट के मामले में भारत इसलिए पिछड़ा है कि यहां की पढ़ाई विद्यार्थियों को पिछलग्गू बना देती है। बच्चों को गणित समझ नहीं आती फिर भी इस विषय पर आम चर्चा नहीं होती है। उन्होंने कहा कि भारत की शिक्षा प्रणाली पर देश में खुला संवाद होना चाहिए। हमें वास्तविक शिक्षा की दिशा में बहुत प्रयास करने होंगे।

    श्री राजू ने कहा कि देश को उपनिवेशीकरण की मानसिकता से मुक्ति दिलाने के लिए हमें अपनी शिक्षा व्यवस्था में आमूल चूल बदलाव करने होंगे। कंप्यूटर जैसे विषय को बोधगम्य बनाने के लिए हमें अपनी पारंपरिक सोच पर अमल करना होगा। कंप्यूटर गणनाओं का सरल हल प्रस्तुत करता है। यदि हम गणनाओं की शैली नहीं बदलेंगे तो कंप्यूटर के चमत्कारों से वंचित रह जाएंगे। शिक्षा पर सार्वजनिक बहस होगी तो एक नए भारत का उदय होगा।

    पत्रकार वार्ता का संचालन मध्यप्रदेश प्रेस क्लब के अध्यक्ष डाक्टर नवीन जोशी ने किया। आभार प्रदर्शन क्लब के महासचिव नितिन वर्मा ने किया। अथितियों का स्वागत वरिष्ठ पत्रकार आलोक सिंघई, प्रसन्ना शहाणे, ब्रजेश द्विवेदी,अरविंद पटेल, अनुवेद नगाइच ने किया। इस अवसर पर प्रेस क्लब के पदाधिकारियों के अलावा मीडिया के प्रतिनिधि गण भी उपस्थित थे।

  • अस्पतालों में दवाओं की कमी न रहे बोलीं राज्यपाल

    अस्पतालों में दवाओं की कमी न रहे बोलीं राज्यपाल

    भोपाल 7 अप्रैल(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)। राज्यपाल श्रीमती आनंदीबेन पटेल ने कहा है कि स्वास्थ्य विभाग सुनिश्चित करे कि अस्पतालों में जो दवाएं डाक्टर लिखें उनका भंडारण पूरा हो। डाक्टरों को कहा जाए कि वे गरीबों और ग्रामीणों को वही दवाएँ लिखें, जो अस्पतालों में उपलब्ध हों। सरपंचों तथा जन-प्रतिनिधियों की जिम्मेदारी है कि टीकाकरण अभियान में पूरा सहयोग दें। उन्होंने किशोरियों के स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देने पर जोर देते हुए कहा कि जांच के दौरान अगर हीमोग्लोबिन कम निकले, तो उसका पोषण बढ़ा कर इलाज करें। राज्यपाल ने विश्व स्वास्थ्य दिवस पर स्वास्थ्य विभाग की ओर से आयोजित बच्चों को निमोनिया तथा दिमागी बुखार जैसी जानलेवा बीमारी से सुरक्षा प्रदान करने वाली नवीन वैक्सीन पीसीबी के शुभारम्भ समारोह को सम्बोधित कर रही थीं। उल्लेखनीय है कि प्रदेश की सभी स्वास्थ्य संस्थाओं में नवीन वैक्सीन पीसीवी (टीका) नि:शुल्क टीकाकरण के लिए उपलब्ध रहेगा।

    राज्यपाल श्रीमती आनंदीबेन पटेल ने कहा कि डाक्टर गांवों में जाकर सरपंचों और जनप्रतिनिधियों के साथ मिलकर स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध करायें और विकास में अपना योगदान दें। उन्होंने डॉक्टरों से कहा कि बच्चों को कुपोषण से बचाने के लिए सरकार को सहयोग प्रदान करें। आँगनवाड़ी और प्राथमिक शालाओं में बच्चों को वितरित होने वाले भोजन की गुणवत्ता और पौष्टिकता और पानी की शुद्धता की भी जांच करें। गांव, शहर, स्कूल, आँगनवाड़ी तथा सार्वजनिक स्थलों पर सफाई अभियान में सभी वर्ग सहयोग करें। उन्होंने कहा कि महिलाओं के लिए शौचालय बहुत आवश्यक है। देश में शौचालय बनाने का 80 प्रतिशत कार्य पूरा हो चुका है। आने वाले 2-3 साल में हमारे देश में शत-प्रतिशत शौचालय का निर्माण हो जायेगा।

    स्वास्थ्य मंत्री श्री रूस्तम सिंह ने कहा कि डाक्टरों के साथ-साथ सभी में सेवाभाव होना चाहिए। मध्यप्रदेश को स्वस्थ प्रदेश बनाने के लिए सभी मिल-जुलकर कार्य करें। इस बात पर ध्यान दें कि हम ग्रामीणों, गरीबों और पिछड़े लोगों तक बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ कैसे पहुँचा सकते हैं। उन्होंने कहा कि प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं में निरंतर सुधार हो रहा है और अस्पतालों में सुविधाएँ बढ़ रही हैं।

    स्वास्थ्य विभाग की प्रमुख सचिव श्रीमती गौरी सिंह ने समारोह में अतिथियों का स्वागत किया। राज्यपाल ने कायाकल्प कार्यक्रम के अंतर्गत उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाली संस्थाओं और सरपचों को भी पुरस्कृत किया। इस अवसर पर आयुक्त स्वास्थ्य श्रीमती पल्लवी जैन, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के संचालक श्री एस. विश्वनाथन, यूनिसेफ के प्रतिनिधि माईकल जूमा और विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रतिनिधि डॉ. बी.पी. सुब्रामण्यम उपस्थित थे।

  • उत्तर पुस्तिका पाना परीक्षार्थी का अधिकार

    उत्तर पुस्तिका पाना परीक्षार्थी का अधिकार

    विक्रम विश्वविद्यालय के कुलपति व कुलसचिव को सूचना आयोग की फटकार
    अपीलार्थी को उत्तर पुस्तिका की प्रति 7 दिन में देने का आदेश

    भोपाल,4 अप्रैल(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)। म.प्र. राज्य सूचना आयोग ने परीक्षार्थी को उसकी उत्तर पुस्तिका की प्रमाणित प्रति प्रदाय करने से इंकार करने के विधि विरूध्द कृत्य के लिए विक्रम विश्विद्यालय उज्जैन के कुलपति व कुलसचिव को जमकर फटकार लगाते हुए आदेश दिया है कि वे 7 दिन में अपीलार्थी को उसकी उत्तर पुस्तिका की प्रमाणित प्रति निःशुल्क प्रदाय कर 28 अप्रेल तक आयोग के समक्ष सप्रमाण पालन प्रतिवेदन प्रस्तुत करना सुनिष्चित करें । अन्यथा स्थिति में उनके विरूध्द सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 20 (1) व 20 (2) के अंतर्गत दंडात्मक प्रावधान आकर्षित होंगे ।

    अपीलार्थी कु0 तितिक्षा शुक्ला की अपील मंजूर करते हुए राज्य सूचना आयुक्त आत्मदीप ने अपने आदेश में कहा है कि सूचना का अधिकार अधिनियम के प्रावधानानुसार मूल्यांकित उत्तर पुस्तिका परीक्षक की राय का दस्तावेज है जो धारा 2 के तहत ‘सूचना’ की परिभाषा के अंतर्गत आता है। नागरिकों को लोक प्राधिकारी के नियंत्रण या अधिकार में रखी ऐसी सभी सूचनाओं को पाने का अधिकार है। केन्द्रीय सूचना आयोग व विभिन्न राज्य सूचना आयोगों द्वारा पारित निर्णयों में भी अपनी उत्तरपुस्तिका की प्रमाणित प्रति प्राप्त करने के परीक्षार्थी के वैधानिक अधिकार की पुष्टि की जा चुकी हैं । सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भी केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा मण्डल बनाम आदित्य बंदोपाध्याय मामले में सुस्पष्ट आदेश पारित किया जा चुका है कि परीक्षार्थी को अपनी मूल्यांकित उत्तरपुस्तिका की प्रमाणित प्रति प्राप्त करने का वैधानिक अधिकार है । उत्तरपुस्तिकाओं में दी गई सूचनाओं के प्रकटन से प्रतिलिप्याधिकार का भी उल्लंघन नहीं होता है । अतः परीक्षा लेने वाले निकायों को सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 9 की छूट प्राप्त नहीं होगी ।

    सूचना आयुक्त ने विश्वविधालय की इस दलील को विधि विरूध्द करार दिया कि वि0वि0 समन्वय समिति द्वारा मंजूर स्थायी समिति की अनुशंसा अनुसार वि0 वि0 व महाविधालय के विधार्थियों की उत्तर पुस्तिकाओं की प्रति नहीं दी जा सकती है क्योंकि इसके कारण वैधानिक कठिनाईयां बढ़ने की आशंका है। अतः सूचना के अधिकार के तहत उत्तर पुस्तिका की प्रति नहीं दी जा सकती है, केवल उसका अवलोकन कराया जा सकता है।

    आरटीआई एक्ट सर्वोपरि: इस संबंध में अपीलीय अधिकारी/कुलपति व लोक सूचना अधिकारी/कुलसचिव के निर्णय खारिज करते हुए आयुक्त आत्मदीप ने फैसले में कहा – अधिनियम की धारा 22 के अनुसार सूचना का अधिकार अधिनियम के प्रावधानों का सर्वोपरि (ओवर राईडिंग) प्रभाव रहेगा । इसका आषय यह है कि यदि अन्य किसी कानून/नियम/प्रावधान में सूचना का अधिकार अधिनियम के प्रावधानों से विसंगति रखने वाला कोई प्रावधान है तो ऐसा असंगत प्रावधान मान्य नहीं होगा और उसके स्थान पर सूचना का अधिकार अधिनियम के प्रावधान मान्य होंगे । सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भी स्पष्ट किया गया है कि सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 22 के अनुसार, अधिनियम के प्रावधान सर्वोपरि होने से, परीक्षा लेने वाले निकाय इस बात से आबद्ध हैं कि वे अपने नियमों/विनियमों में विपरीत प्रावधान होने के बावजूद, परीक्षार्थी को उत्तरपुस्तिका का निरीक्षण करने दें और चाहे जाने पर उसकी प्रति प्रदान करें ।

    अपील संबंधी जानकारी देना जरूरी: अपीलार्थी के सूचना के आवेदन का नियत अवधि में निराकरण न करने, अपीलार्थी को प्रथम व द्वितीय अपील संबंधी जरूरी सूचना न देने तथा प्रथम अपील की सुनवाई में अपीलार्थी के प्रतिनिधि को न सुनने पर भी नाराजगी जताते हुए आयोग ने कुलपति व कुलसचिव कोे आइंदा ऐसी वैधानिक त्रुटि न करने की चेतावनी दी है ।

    यह है मामला: कु0 तितिक्षा शुक्ला ने वि0 वि0 से मेनेजमेंट एकाउंटिंग विषय के प्रश्नपत्र की स्वयं की उत्तर पुस्तिका की प्रति चाही थी जिसे देने से कुलसचिव ने यह कह कर इंकार कर दिया कि सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत उत्तर पुस्तिका की प्रति देने का प्रावधान नहीं है । कुलपति ने भी इसी आधार पर प्रथम अपील खारिज कर दी । आयोग ने कुलपति व कुलसचिव के आदेशों को निरस्त कर अपीलार्थी को उत्तर पुस्तिका की प्रति देने का आदेश पारित कर दिया ।

  • तंबाखू छोड़ना सिखाएगा क्विट लाईन नंबर

    तंबाखू छोड़ना सिखाएगा क्विट लाईन नंबर

    भोपाल 04 अप्रेल। सरकार ने तम्बाकू सेवन की लत को छोड़ने वालों के लिए तम्बाकू छोड़ो नंबर (क्विटलाइन नंबर) जारी की है। सरकार ने कंपनियों को ऐसे लेागों के लिए अब तम्बाकू उत्पादों के पैकेट पर ही क्विट लाइन नंबर लिखने की अधिसूचना जारी की है। नई चेतावनी 1 सितंबर, 2018 से प्रभावी होंगी ।
    वायॅस आॅफ टोबेको विक्टिम्स (वीओटीवी) के स्टेट पैट्रन एंव कैंसर सर्जन डा.ललित श्रीवास्तव ने बताया कि स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने 3 अप्रैल, 2018 को जारी अधिसूचना में कहा है कि तम्बाकू पैकेटों पर 85 प्रतिशत की नई पैक चेतावनी होगी, जिसमें तम्बाकू उपयोग के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव, और तम्बाकू सेवन की लत को छोड़ने वालों के लिए तम्बाकू छोड़ो नंबर (क्विट लाइन नंबर) लिखना हेागा। अधिसूचना के अनुसार अब तम्बाकू के हर उत्पाद के पैकेट पर तम्बाकू से कैंसर होता है और तम्बाकू के कारण दर्दनाक मौत हेाती है के संदेश के साथ तम्बाकू छोड़ो नंबर (क्विट लाइन नंबर) 1800-11-2356 लिखा होगा।
    सरकार ने ग्लोबल एडल्ट टोबेको सर्वे रिपोर्ट 2017 के परिणामों को देखकर तम्बाकू छोड़ो नंबर (क्विट लाइन नंबर) को शुरू किया है। इस सर्वे में 62 प्रतिशत सिगरेट धूम्रपान करने वालों, 54प्रतिशत बिड़ी धूम्रपान करने वालों और 46 प्रतिशत धुएं रहित तम्बाकू उत्पादों के उपयोगकर्ताओं ने तम्बाकू उत्पादों पर सचित्र चेतावनी लेबल देखकर छोड़ने का सोचा था।
    सरकार द्वारा तंबाकू छोड़ो नंबर (क्विट लाइन नंबर) जारी होने की अधिसूचना पर पेशे से वकील 68 वर्षीय उमेश नारायण ने कहा कि तम्बाकू पैकेटों पर तम्बाकू छोड़ो नंबर (क्विट लाइन नंबर) यदि यह पहले पेश किया गया होता तो इससे उन्हें तम्बाकू छोड़ने में मदद मिलती। वे तम्बाकू छोड़ो नंबर (क्विट लाइन नंबर) की अधिसूचना जारी होने के बाद पहली प्रतिक्रिया दे रहे थे। वे ओरल कैंसर से पीड़ित हैं। उन्होंने कहा, बहुत से लोग तम्बाकू छोड़ना चाहते हैं लेकिन कभी-कभी अलस की वजह से इंटरनेट पर तम्बाकू छोड़ो नंबर (क्विट लाइन नंबर) का पता लगाने या जानकारी की कमी या दूसरों से पूछने में शर्म महसूस करने और अन्य कारणों से, उनकी तंबाकू का उपभोग करने की आदत बनी रहेती है और वे कैंसर और अन्य घातक रोगों के शिकार होकर अपना जीवन खत्म कर लेते हैं।
    उन्हेाने कहा कि हर बार, यदि कोई व्यक्ति तम्बाकू उत्पाद खरीदता है तो उसे स्वास्थ्य पर तम्बाकू के उपयोग के प्रभाव को दिखाए जाने वाले चित्रों को देखेगा, जो निश्चित रूप से उसे तम्बाकू उपभोक्ता को छोड़ने के लिए मजबूर करेगी और अब पैकेट पर तम्बाकू छोड़ो नंबर (क्विट लाइन नंबर) उपभोक्ता को निश्चित रूप से नंबर पर कॉल करने और तंबाकू की लत छोड़ने के तरीके ढूंढ़ने के लिए प्रोत्साहित करेगा।
    टाटा मेमोरियल अस्पताल के कैंसर सर्जन डॉ.पंकज चतुर्वेदी के अनुसार, भारत में तंबाकू के उपयोग के कारण हर साल करीब 12 लाख मौतें होती हैं। गैर-प्रसारी रोग (एनसीडी) का लगभग 40ः कैंसर, हृदय-नाड़ी रोगों और फेफड़ों के विकारों सहित सीधे तौर पर तम्बाकू के उपयोग के कारण होते हैं। भारत में लगभग 50 प्रतिशत कैंसर तंबाकू से हेाताहै और 9 प्रतिशत मौखिक कैंसर के रेागी इलाज के 12 महीने के भीतर मर जाते हैं। डॉ.पंकज चतुर्वेदी उस समिति का के भी सदस्य है, जिसने तम्बाकू उत्पादों के पैकेटों पर चेतावनी लिखने को अंतिम रूप दिया है।
    तम्बाकू पैकेजों पर ग्राफिक स्वास्थ्य चेतावनी तंबाकू के उपयोग के गंभीर और प्रतिकूल स्वास्थ्य परिणामों के बारे में जागरूकता पैदा करने का सबसे प्रभावी माध्यम है, खासकर युवाओं, बच्चों और अनपढ़ व्यक्तियों के बीच। इसे साबित करने के पर्याप्त प्रमाण हैं कि प्रभावी चेतावनी लेबल तंबाकू के उपयोग से संबंधित खतरों के बारे में जानकारी को बढ़ाते हैं और किशोरावस्था में तंबाकू का उपयोग करने के लिए इरादों को कम कर सकते हैं, तम्बाकू उपयोगकर्ताओं को छोड़ने के लिए राजी कर सकते हैं और पूर्व उपयोगकर्ताओं को फिर से शुरू करने से रोक सकते हैं।
    संबध हैल्थ फांउडेशन (एसएचएफ) के ट्रस्टी संजय सेठ ने कहा कि इस अधिसूना जारी होने के बाद महत्वपूर्ण यह है कि तंबाकू उत्पादो के पैकेटों पर तम्बाकू छोड़ो नंबर (क्विट लाइन नंबर) (1800112356) की छपाई उपयोगकर्ताओं को तम्बाकू छोड़ने में सहायता करेगा। नए चेतावनियों के परीक्षण के दौरान परीक्षण के दौरान उपयोगकर्ताओं के लक्षित समूहों (धूम्रपान और धुआं रहित दोनों) और गैर-उपयोगकर्ता और फोकस ग्रुप के प्रतिभागियों के बीच डमी पैक के साथ परीक्षण के लिए फील्ड परीक्षण किया गया था। तम्बाकू छोड़ो नंबर (क्विट लाइन नंबर) (1800112356) तम्बाकू उत्पादों के पैक पर लिखना एक नया विचार है जो धूम्रपान करने वालों को तम्बाकू छोड़ने के लिए सहायता प्राप्त करने के लिए प्रेरित करेगा। वे इस बात को मानते हैं कि धूम्रपान करने वाले उपभोक्ता इसे लत से बाहर निकलना चाहते हैं, लेकिन उन्हें पता नहीं है कि सहायता कहाँ और कैसे प्राप्त करें। ऐसे लोगों के लिए, तम्बाकू छोड़ो नंबर (क्विट लाइन नंबर) बहुत उपयोगी होगी।
    कुछ प्रतिभागियों ने कहा कि पेशेवर सलाहकार बहुत महंगे हैं और जो लोग इनकी फीस वहन नहीं कर सकते, अब तम्बाकू छोड़ो नंबर (क्विट लाइन नंबर) पर कॉल करके सेवा का उपयोग कर सकते हैं। प्रतिभागियों द्वारा उठाए गए एक और पहलू कि तम्बाकू छोड़ो नंबर (क्विट लाइन नंबर) से मदद मांगने से फोन करने वाले का नाम अज्ञात रखने की भावना की भी रक्षा हेाती है। प्रतिभागियों ने बताया कि अगर कोई धूम्रपान करने वाला व्यक्ति तम्बाकू छोड़ो नंबर (क्विट लाइन नंबर) को फोन करेगा और तम्बाकू छोड़ने के बारे में परामर्श लेगा, तो वह साथियों, दोस्तों, सहकर्मियों के साथ सकारात्मक अपनी प्रतिक्रिया साझा करेगा। इससे भी अन्य लोग तम्बाकू सेवन को छोड़ने के लिए तम्बाकू छोड़ो नंबर (क्विट लाइन नंबर) पर कॉल कर सकते हैं।
    गौरतलब है कि विशेषज्ञ समिति की सिफारिश पर 15 अक्टूबर 2014 को केन्द्र सरकार ने सचित्र स्वास्थ्य चेतावनियों के नए सेट को अधिसूचित किया, जिसमें सभी तम्बाकू उत्पाद पैकेजों के प्रमुख प्रदर्शन क्षेत्र (सामने और पीछे) के 85 प्रतिशत को कवर किया गया था। संसद समितियों और तम्बाकू कंपनियों की सिफारिशों और कई उच्च न्यायालयों में पहले से इन चेतावनियों को चुनौती देने के कारण इसके कार्यान्वयन में देरी हुई। राजस्थान उच्च न्यायालय के माननीय उच्चतम न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद अंततः 85 प्रतिशत चेतावनियों का क्रियान्वयन हो पाया।
    सिगरेट, बीड़ी और चबाने वाले तंबाकू उत्पादों के पैकेटों पर दोनों तरफ की मौजूदा सचित्र चेतावनी छापने की अधिसूचना अप्रैल 2016 से राजस्थान उच्च न्यायालय और उसके बाद सर्वोच्च न्यायालय निर्देशो पर लागू किया गया था और यह लगभग दो साल से प्रभावी है।
    सर्वोच्च न्यायालय ने 4 मई, 2016 को तम्बाकू पैक पर 85 प्रतिशत चेतावनियों के कार्यान्वयन के निर्देशन देते हुए 85 प्रतिशत पैक चेतावनियों को चुनौती देने के सभी मामलों को कर्नाटक उच्च न्यायालय में स्थानांतरित कर दिया था। माननीय कर्नाटक उच्च न्यायालय ने 15.12.2017 को सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद (पैकेजिंग और लेबलिंग) संशोधन नियम, 2014 को रद्द कर दिया और वर्ष 2008 की स्वास्थ्य चेतावनी को बहार कर दिया। इसमें पैक के प्रमुख प्रदर्शन क्षेत्र की तरफ 40 प्रतिशत पर चेतावनी की छपाई आवश्यकता है।
    माननीय कर्नाटक उच्च न्यायालय के फैसले को केन्द्र सरकार और सिविल सोसाइटी द्वारा सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। इसके बाद 8 जनवरी 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक उच्च न्यायालय द्वारा पारित फैसले पर रेाक लगा दी।

  • दलितों को भड़काने वालों तक पहुंचे डंडे की मार

    दलितों को भड़काने वालों तक पहुंचे डंडे की मार

    देश की सर्वोच्च अदालत यानि सुप्रीम कोर्ट ने साफ कह दिया है कि वो अनुसूचित जाति के हित संरक्षण के लिए बने कानून के खिलाफ नहीं है। इस कानून के दुरुपयोग के संबंध में उसने जो संशोधन सुझाए हैं सरकार को उन्हें अमल में लाना चाहिए। काशीनाथ महाजन की याचिका पर दिए गए फैसले के संबंध में अन्य याचिकाओं को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने खुली अदालत में सरकार के पक्ष को सुनने के लिए समय भी दिया है। जाहिर है इस संबंध में फैली भ्रांतियों का निराकरण समय रहते ठीक प्रकार से हो चुका है। वैसे भी अदालत के फैसले को समझे बगैर जो लोग निजी स्वार्थों के लिए दलितों को भड़काने का प्रयास कर रहे थे उनकी भी कलई खुल गई है। इस फैसले के संबंध में जो अपीलें बाद में की गईं ये प्रक्रिया पहले भी अपनाई जा सकती थी। इसके विपरीत हिंसा का रास्ता चुनकर देश के विभिन्न इलाकों में जो विद्वेष की आग भड़काई गई उससे साफ प्रतीत होता है कि आजादी के इतने सालों के बाद भी देश का जनमानस परिपक्व नहीं हो पाया है। लोग ये समझने तैयार नहीं कि ये जनभावनाओं को सर्वोपरि मानकर चलने वाला देश है। आजादी का जो अर्थ लोगों के जेहन में जगाया गया है उससे देश का बहुत बड़ा वर्ग अराजकता को ही आजादी मानने लगा है। सबसे चिंताजनक बात तो ये है कि देश पर लंबे समय तक शासन करने वाली कांग्रेस पार्टी ही आजादी के नाम पर लोगों को बरगलाने का काम कर रही है।

    कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी ने भड़काए गए दलितों की आग में घी डालने के लिए ट्वीट करके हिंसा करने वालों को अपना सलाम भेजा। फैसला सुप्रीम कोर्ट का था जबकि राहुल गांधी ने लिखा कि दलितों को भारतीय समाज के सबसे निचले पायदान पर रखना आरएसएस और बीजेपी के डीएनए में है।जो इस सोच को चुनौती देता है वे उसे हिंसा से दबाते हैं। सरकार से अधिकारों की रक्षा करने की मांग करना लोगों का संवैधानिक हक है। सरकार ने उन्हीं हितों की रक्षा करते हुए सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की है।अदालत के बाहर इस मामले का कोई औचित्य नहीं है। इसके बावजूद देश भर में दलित संगठनों को हिंसा के लिए उकसाया गया। सुप्रीम कोर्ट ने यदि कोई राय व्यक्त की है तो वह कानून का रूप ले लेती है। जिसका पालन करवाना और करना सरकार और पुलिस का काम होता है। कानून के विरुद्ध लोगों को उकसाना निश्चित तौर पर आपराधिक कृत्य है। जाहिर है कि कानून का पालन करवाने के लिए पुलिस को वही करना चाहिए जो वह आम नागरिकों के साथ करती है। पुलिस का हवलदार यदि किसी आपराधिक तत्व के पिछवाड़े डंडा फटकारता है तो वह कानून के पालन करने का संदेश दे रहा होता है। राहुल गांधी बच्चे नहीं हैं। वे न इस देश के माईबाप हैं। उन्हें भी कानून का पालन उसी तरह करना होगा जैसे कि आम नागरिक करते हैं। सत्ता पर बैठने के फेर में यदि वे कानून को धता बताने की कोशिश करते हैं तो उन्हें राह पर लाना सरकार और पुलिस की जवाबदारी है। यदि कानून अपना काम नहीं करेगा तो फिर लोगों के बीच बढ़ती हिंसा की भावना को नियंत्रित कैसे किया जा सकेगा।

    आज दुनिया के कई देश सरकारों की असफलता के कारण ही मटियामेट हो गए हैं। समय रहते यदि वहां की सरकारों ने वहां के ज्वलंत विषयों पर कठोर फैसले लिए होते तो आज वे राष्ट्र सफलता के शिखरों को छू रहे होते। भारत में आजादी के बाद जाति, संप्रदाय, भाषा और क्षेत्रवाद को लेकर जो फैसले कांग्रेस की सरकारों ने लिए उनसे ये देश बुरी तरह विभाजित हो गया है। आज यदि कोई उस खाई को भरने का प्रयास करता है तो अलगाववादी ताकतें उसका विरोध करने के लिए एकजुट हो जाती हैं। आज जब देश पूंजीवादी रास्ते पर बहुत आगे निकल चुका है तब जाति, संप्रदाय, भाषा और क्षेत्रों पर आधारित मध्ययुगीन भावनाएं काफी पीछे छूट गईँ हैं।किसी भी कारोबार में क्या जाति के नाम पर अक्षम या अनुपयोगी लोगों को जगह दी जा सकती है। यदि कोई सवर्ण है तो क्या उसे केवल इसलिए नौकरी दी जानी चाहिए कि वह किसी सत्ताधीश का रिश्तेदार है। जब देश में नतीजे लाने वाला तंत्र विकसित किया जा रहा है तो जाति के आधार पर किसी को वंचित करना संभव ही नहीं है। मुक्त बाजार व्यवस्था में तो ये गैर बराबरी का बर्ताव संभव ही नहीं है। सत्ता की चाहत में लोगों को भड़काने वाली ताकतों पर सख्ती से अंकुश लगाना सरकार का काम है। उसे ऐसा करते नजर भी आना चाहिए। इस संबंध में देश भर की पुलिस ने जिन लोगों को दंगा भड़काने के आरोप में दबोचा है उनके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाना जरूरी है, ताकि भविष्य में कानून हाथ में लेने वालों को कानून के पालन के रास्ते पर लाया जा सके।

    अराजकता को रोकने के लिए ये कड़वी दवाई सरकार को सख्ती से पिलानी होगी। ये देश किसी राजनीतिक दल या परिवार की बपौती नहीं हैं। जो लोग क्षुद्र राजनीति के लिए समाज को खंडित करने का काम कर रहे हैं उन पर भी सख्त कार्रवाई करना होगी तभी देश के निचले स्तर तक कानून के राज का संदेश जा सकेगा।

  • हाईकोर्ट ने रोका नीलम शमी राव का तुगलकी फरमान

    हाईकोर्ट ने रोका नीलम शमी राव का तुगलकी फरमान

    केबिनेट मंत्री माया सिंह के बाजू में बैठी आईएएस,सुश्री नीलम शमी राव अपने फैसलों के कारण इन दिनों विवादों में हैं।

    भोपाल ( पीआईसीएमपीडॉटकॉम )। खाद्य विभाग के इंस्पेक्टरों को नापतौल विभाग में अतिरिक्त प्रभार देने वाली प्रमुख सचिव नीलम शमी राव के तुगलकी आदेश को गलत मानते हुए हाईकोर्ट ने फिलहाल स्थगित कर दिया है। गैरकानूनी आदेश पर अदालती रोक से बौखलाई श्रीमती राव ने अब खाद्य विभाग के कमिश्नर और कलेक्टरों पर अपने आदेश का पालन करने का दबाव बनाना शुरु कर दिया है। इस आदेश पर विभागीय मंत्री ने तो कोई गुरेज नहीं किया पर इसके विरोध में नापतौल विभाग के अफसरों ने जरूर मोर्चा खोल दिया है। इस मामले से शिवराज सिंह चौहान सरकार के कथित सुशासन की असलियत भी उजागर हो गई है।

    राज्यों के नापतौल विभाग भारत सरकार के विधिक माप विज्ञान,खाद्य एवं उपभोक्ता मामले के निदेशक से प्रत्यायोजित अधिकारों के माध्यम से काम करते हैं। भारत सरकार की अधिसूचना क्रमांक 576(अ) दिनांक 18.07.2012 से राज्यों को अंतर्राज्यीय व्यापार एवं वाणिज्य के संबंध में ये शक्तियां प्रदान की गईं हैं। ये अधिकार किसी अन्य को हस्तांतरित नहीं किये जा सकते हैं। इसके बावजूद 1992 बैच की आईएएस और इलेक्ट्रानिक्स में बीई करके प्रशासक बनी राज्य की प्रमुख सचिव इन कानूनों को धता बताने की सनक पाल बैठी हैं। वे इस संबंध में भारत सरकार से अधिकार विकेन्द्रीकृत करने का अनुरोध प्रक्रियागत रूप से कर सकतीं थीं लेकिन बिना कानूनी फेरबदल केवल धौंस डपट के सहारे वे फूड इंस्पेक्टरों को नापतौल इंस्पेक्टर बनाने में जुटी हुई हैं।

    उनके हाई प्रोफाईल व्यवहार की वजह कथित तौर पर उनकी आईएएस और आईपीएस सदस्यों वाली पारिवारिक पृष्ठभूमि बताई जा रही है। इस संबंध में जब उनसे पूछा गया कि पांच फूड इंस्पेक्टरों को नापतौल विभाग का अतिरिक्त प्रभार दिए जाने से विभाग की कार्यप्रणाली में क्या सुधार हुए तो उनका कहना था कि इतनी जल्दी आकलन करना संभव नहीं है। वे ऐसा क्यों चाहती हैं पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि शासन का फैसला है सबको मानना ही पड़ेगा। हालांकि इस संबंध में हाईकोर्ट के स्थगन पर वे अपने आदेश को सर्वोपरि ही बताती रहीं।

    गौरतलब है कि हाईकोर्ट की जबलपुर खंडपीठ की न्यायाधीश सुश्री वंदना कसरेकर ने याचिका क्रमांक ड्बल्यू पी 5545 दिनांक 15.03.2018 का निपटारा करते हुए फिलहाल इस गैरकानूनी आदेश पर स्थगन दे दिया है। इस स्थगन से बौखलाई प्रमुख सचिव महोदया ने मैराथन बैठकों के माध्यम से मंत्रालय और नापतौल विभाग के अफसरों को घंटों फटकारना शुरु कर दिया है। नियमों और कानूनों को रौंदने वाले इस मामले पर फिलहाल मध्यप्रदेश की सरकार और शासन के आला अफसर सभी चुप्पी साधे हुए हैं।

    मध्यप्रदेश विधिक माप विज्ञान अधिकारी एवं कर्मचारी संघ के महासचिव उमाशंकर तिवारी ने शासन को भेजे अपने प्रतिवेदन में कहा है कि खाद्य विभाग के पांच सहायक खाद्य आपूर्ति अधिकारियों को आदेश क्रमांक एफ 13-1। 2018। 29-2दिनांक 19.02.2018 के माध्यम से नापतौल विभाग में अतिरिक्त प्रभार देना गैरकानूनी और अव्यावहारिक है इसलिए इस आदेश को वापस लिया जाए। उनका कहना है कि विधिक माप विज्ञान अधिनियम 2009 की धारा 14(1) में राज्य सरकार को अधिसूचना के माध्यम से विधिक माप विज्ञान नियंत्रक , अपर नियंत्रक, उप नियंत्रक, सहायक नियंत्रक निरीक्षक आदि को नियुक्त करने का तो अधिकार है पर अतिरिक्त प्रभार देने की अनुमति नहीं है।

    विधिक माप विज्ञान नियम 2011 के नियम 28(3) से विधिक माप विज्ञान अधिकारी के पद पर नियुक्त व्यक्ति को पदस्थापना से पहले भारतीय विधिक माप विज्ञान संस्थान रांची से आधारभूत प्रशिक्षण पाठ्यक्रम पूरा करना अनिवार्य होता है। हालांकि इस संबंध में पहले भी भारत सरकार के उपभोक्ता मामले का मंत्रालय पत्र के माध्यम से कह चुका है कि खाद्य निरीक्षकों को विधिक माप विज्ञान निरीक्षक के पद पर नियुक्त करने की कोई गुंजाईश नहीं है।

    सबसे हास्यास्पद बात तो ये है कि खाद्य विभाग में कनिष्ठ आपूर्ति अधिकारी के चार सौ पद स्वीकृत हैं जिनमें से 188 पद खाली पड़े हैं। सहायक आपूर्ति अधिकारियों के 146 पद स्वीकृत हैं जिनमें से 31 पद खाली हैं। इसके बावजूद शासन ने फूड इंस्पेक्टरों को नापतौल विभाग का अतिरिक्त प्रभार देने की जिद ठान ली है। नापतौल विभाग में भी 34 पद खाली पड़े हैं जिन्हें भरने में शासन की कोई रुचि नहीं है लेकिन वह उन जिलों में फूड इंस्पेक्टरों को अतिरिक्त प्रभार दे रही है जहां पहले से नापतौल निरीक्षक पदस्थ हैं। जबकि उन स्थानों पर भी खाद्य विभाग अपना काम पूरा नहीं कर पा रहा है।

    नापतौल विभाग को चवन्नी छाप डिपार्टमेंट बोलने वाली प्रमुख सचिव नीलम शमी राव ने अपने आदेश से होशंगाबाद, बैतूल, मुरैना, गुना और उज्जैन में नापतौल निरीक्षकों का अतिरिक्त प्रभार छीनकर फूड इंस्पेक्टरों को देने का फरमान सुनाया था जिसे हाईकोर्ट ने रोक दिया है। उन्होंने संबंधित कलेक्टरों पर दबाव बनाकर फूड इंस्पेक्टरों को काम करने की छूट दिलाने का दबाव बनाया था। इसके जवाब में उमाशंकर तिवारी का कहना है कि जब इन फूड इंस्पेक्टरों का वेतन खाद्य विभाग से मिली उनकी पदस्थापना स्थल से निकलना है और वे नापतौल विभाग के अधीन हैं ही नहीं तो विभाग उनसे कैसे काम ले सकता है। उनका कहना है कि नापतौल विभाग न तो फूड इंस्पेक्टरों के कामकाज का आकलन करेगा और न ही वे प्रवर्तन संबंधी प्रकरणो में अभियोजन कार्रवाई कर सकते हैं। ऐसे में उन्हें प्रभार दिए जाने का क्या औचित्य है। ये प्रकरण छोटी अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक विचाराधीन रहते हैं जिसमें शासन भी एक पक्ष रहता है। शासन को यदि नापतौल विभाग का कामकाज सुधारने की इतनी ही चिंता है तो वह यहां खाली पड़े पदों को भरने की पहल क्यों नहीं करता है।

    नापतौल विभाग राज्य शासन से प्राप्त लगभग बीस करोड़ के बजट के एवज में लगभग पंद्रह करोड़ रुपए की आय भी देता है। मौजूदा वित्तीय वर्ष में वह फरवरी महीने तक लगभग साढ़े चौदह करोड़ की कमाई कर चुका था। पूरे प्रदेश में नापतौल विभाग के पास स्वयं के बनाए भवन हैं।वह राज्य सरकार के निर्देशों पर अपना कामकाज बखूबी कर रहा है। ऐसे में यदि अधिकारियों की कमी पूरी की जाती तो सरकार की आय भी बढ़ती और उपभोक्ताओं को ठगी धोखाघड़ी से भी बचाया जा सकता था।

    राज्य सरकार एक ओर तो प्रांत को –इज आफ डूइंग बिजिनेस — वाला राज्य बताकर उद्योगपतियों को कारोबार फैलाने का निमंत्रण दे रही है वहीं उसके आला अफसर कलेक्टरों के माध्यम से इंस्पेक्टर राज को फिर जीवित करके सरकार की मंशा को मटियामेट करने में जुटे हैं। नापतौल विभाग उपकरणों के पुनःसत्यापन, राजीनामा, पंजीयन, जैसे सामाजिक सुरक्षा के कामकाज की जवाबदारी संभालता है लेकिन गैरकानूनी और गैर जिम्मेदार व्यवस्था को बढ़ावा देकर सुशासन में पलीता लगाने वाले आला अफसरों को किसकी शह है ये तो विस्तृत खोजबीन के बाद ही पता लगाया जा सकता है।