Month: February 2018

  • घाटा देने वाली मिल खाक,छीने रोजगार

    घाटा देने वाली मिल खाक,छीने रोजगार


    भोपाल,25 फरवरी,(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)।चांदबड़ स्थित न्यू भोपाल टेक्सटाईल मिल की नई यूनिट भीषण आग के चलते राख हो गई है। अपनी स्थापना के साल 1937 से लगातार घाटा दे रही इस मिल को मुनाफे में लाने के लिए जुलाई 2013 में यहां नई यूनिट लगाई गई थी। इसके बावजूद नई और पुरानी दोनों यूनिटें लगातार घाटा देती जा रहीं थीं। सूत्र बताते हैं कि इसी के चलते मिल में कल रात रहस्यमयी आग से पूरी यूनिट स्वाहा हो गई और लगभग एक हजार परिवार बेरोजगार हो गए हैं।

    मिल के प्रबंधक अजय दीक्षित ने इस मुद्दे पर बात करने से इंकार कर दिया। इसके बावजूद फैक्टरी के सूत्रों ने बताया कि कल रात की पारी में करीबन ढाई बजे जब ब्लो रूम में श्रमिकों ने चिंगारियां देखीं तो उन्होंने उन्हें बुझाने के लिए फव्वारे चालू किए। तब वाटर लाईन में पानी ही नहीं था इसलिए आग मशीन के ऊपर पड़े यार्न के कचरे तक पहुंच गई। घबराए श्रमिकों ने जब फायर उपकरणों का प्रयोग करना चाहा तो वे खाली निकले। श्रमिकों को आपात स्थिति से निपटने का प्रशिक्षण भी नहीं दिया गया था। इसलिए आग भड़कने के बावजूद उन्होंने मशीनें बंद नहीं कीं। आपात कालीन स्थिति से निपटने में पूरी तरह नाकाम प्रबंधन भी वक्त पर मौजूद नहीं था। सुपरवाईजर तय नहीं कर पा रहे थे कि अब क्या किया जाए। मिल का अग्निशमन अमला जब तक घटना स्थल पर पहुंचता तब तक आग पूरी यूनिट तक पहुंच चुकी थी।
    घबराए प्रबंधन ने आग की सूचना फायर ब्रिगेड तक दी लेकिन तब तक पूरी नई यूनिट भीषण आग से घिर चुकी थी। आनन फानन में सेना तक को सूचना दी गई। बाद में जेसीबी मशीनों से मिल की दीवारें तोड़ी गईं तब आग पर पानी की बौछारें पहुंच सकीं। सुबह तक आग पर काबू नहीं पाया जा सका था। मिल प्रबंधन से श्रमिकों को सुबह की पारी में आने से रोक दिया और उन्हें आश्वासन दिया गया कि उनकी हाजिरी होगी और पारिश्रमिक भी दिया जाएगा।
    गौरतलब है कि कपड़ा मंत्रालय के हस्तक्षेप के बाद मिल में 107 करोड़ रुपए का निवेश किया गया था। पहली किस्त में 27 करोड़ और दूसरी किस्त में 81 करोड़ दिए गए थे। इस दौरान केवल यार्न का धागा बनाने की यूनिट लगाई गई थी। तत्कालीन कपड़ा मंत्री संबाशिवा राव ने दूसरे चरण की शुरुआत करते हुए कहा था कि मिल का उत्पादन दोगुना हो जाएगा और ये मुनाफा कमाने लगेगी।
    1937 में स्थापित इस मिल को औद्योगिक और वित्तीय पुननिर्माण बोर्ड (बीआईएफआर) ने घाटा पहुंचाने वाली मिल करार दिया था। मध्यप्रदेश की सात मिलों में से पांच को अव्यावहारिक इकाईयां बताकर बंद कर दिया गया था। इसके बाद बुरहानपुर की ताप्ती मिल और भोपाल की इस इकाई में सरकार ने और भी निवेश किया था। इसके बावजूद ये इकाईयां आत्मनिर्भर नहीं हो पाईं. नई सरकार ने इन मिलों के प्रबंधन से उनके कामकाज का ब्यौरा मांगा है जिसके चलते प्रबंधन अपनी गलतियां छुपाने का जतन कर रहा है। बताते हैं कि मिल प्रबंधन ने षड़यंत्र पूर्वक ऐसे हालात निर्मित कर दिए कि आग भड़की और उसे समय पर बुझाया भी नहीं गया।

  • सुप्रीम कोर्ट ने मुँह के कैंसर से बचाने दिया फैसला

    सुप्रीम कोर्ट ने मुँह के कैंसर से बचाने दिया फैसला


    विश्व कैंसर दिवस: 4 फरवरी पर विशेष

    भोपाल 3 जनवरी। देश में ओरल कैंसर जिस तरह से महामारी के रुप में फैल रहा है,यदि समय रहते उचित कदम नही उठाए गए तो अकेले भारत में अगले तीन साल में करीब 9 लाख जिंदगियां काल के ग्रास में समाहित हो जांएगी। यही नही ओरल कैंसर के जनक तंबाकू उत्पादों की बिक्री पर पूर्णतया प्रतिबंध नही लगा तो इन लाखेां लोगों की मौत के अलावा 17 लाख से अधिक लोगों को यह जानलेवा बीमारी जकड़ लेगी। इन सबको बचाया जा सकता है बशर्ते सर्वोच्च न्यायालय के 23 सितंबर-2016 के निर्णय की राज्य सरकारें सख्ती से पालना करें। इस वर्ल्ड कैंसर दिवस पर हम सबको सकारात्मक रुप से इसे पालना कराने की दिशा में कदम उठाने की जरुरत है, इसी से लाखों लोगों की जिंदगी को बचाया जा सकेगा।

    इंडियन कांउसिल मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के अनुसार साल 2020 तक 17.3 लाख लोगों को जानलेवा बीमारी कैंसर जकड़ लेगी। जिससे 8.8 लाख लोग कैंसर की वजह से अपनी जान गंवा चुके होंगे। इससे न केवल लाखों परिवार प्रभावित होंगे बल्कि देश की अर्थव्यवस्था पर भी प्रतिकूल असर पड़ेगा। यह हैरानीजनक तथ्य हाल में ब्रिक्स द्वारा जारी किए गए सर्वे रिपोर्ट में सामने आये हैं। इस सर्वे के मुताबिक वर्ष-2012 तक तम्बाकू जनित उत्पादों के सेवन से न केवल देश की अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई है बल्कि इसकी जीडीपी में भी गिरावट दर्ज की गई है। कैंसर के उपचार पर हुए भारी भरकम खर्च की वजह से 2012 में भारत ने कुल कार्यक्षमता में 6.7 बिलियन की कमी दर्ज की गई। जो कि हमारी आर्थिक विकास दर का 0.36 प्रतिशत है।

    दुनियांभर में एड्स, मलेरिया और टीबी से ज्यादा कैंसर पीडि़तो की मौत हो जाती है। वहीं मौत के दस प्रमुख कारणों में से कैंसर प्रमुख है। यह स्थिति पब्लिक हैल्थ के लिए एक बड़ी चुनौति उभरकर सामने आई है। इससे के लिए पूरी तरह से तंबाकू पर प्रतिबंध हो तभी कैंसर को रोका जा सकता है।

    सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की प्रभावी रूप से हो पालना

    गौरतलब है कि 23 सितंबर-2016 को माननीय सुप्रीम कोर्ट ने ट्विन्स पैंक में तम्बाकू जनित पदार्थों (गुटका, जर्दा, पान मसाला, खैनी इत्यादि) की बिक्री पर पूर्णतया प्रतिबंध लगा दिया था। साथ ही कोर्ट ने एफएसएसएआई की 2.3.4 के तहत खाद्य वस्तुओं के साथ तंबाकू और निकोटीन युक्त पादर्थों की बिक्री प्रतिबंध को पूर्णतया लागू करने के निर्देश दिए थे। इस आदेश की राज्य सरकारों ने अभी तक प्रभावी रूप से पालना नहीं की जिस कारण आज भी इनकी बिक्री खुलेआम हो रही है। इसी का दुष्परिणाम है कि देश में तम्बाकू जनित पदार्थों के सेवन से मुंह व गले के कैंसर रोगियों में निरंतर इजाफा हो रहा है। सर्वे के मुताबिक तम्बाकू जनित पदार्थों की वजह से ही 90 फीसदी लोग मुंह व गले के कैंसर रोग से ग्रसित हो रहे हैं। राज्य सरकारों को चाहिए कि देश में ही नहीं बल्कि विश्वभर में महामारी की तरह फैल रहे कैंसर रोग से बचाव के लिए सुप्रीम कोर्ट की निर्देशों की प्रभावी रूप से पालना करें।

    पांच ब्रिक्स देशों में गंभीर चितंन का विषय

    कैंसर के उपचार पर होने वाले भारी भरकम खर्च व बिगड़ती अर्थव्यवस्था को लेकर ब्रिक्स देशों की चिंताएं भी बढ़ गई हैं। इस सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक केवल इन पांच ब्रिक्स देशों (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, साउथ अफ्रीका) में विश्व की 40 फीसदी से अधिक जनसंख्या निवास करती है, जबकि इनका वैश्विक विकास दर का 25 फीसदी योगदान है। वहीं, 2012 में कैंसर से संबंधित मौतों के कारण इन पांचों देशों की अर्थव्यवस्था को बुरी तरह से प्रभावित कर दिया है जिसके तहत करीब 46.3 बिलियन डालर का आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा।

    वायॅस ऑफ टोबेको विक्टिम्स (वीओटीवी) के स्टेट पैट्रन एंव कैंसर रोग विशेषज्ञ डा.टी.पी.शाहू ने बताया कि तंबाकू के इस्तेमाल को कम करने के लिए राज्य सरकार को सुप्रीम कोर्ट के आदेश की सख्ती से पालना करवानी चाहिए। जब हमें पता है कि 90 प्रतिशत मंुह के कैंसर का कारक तंबाकू उत्पाद है, इस स्थिति में सुप्रीम कोर्ट के आदेश की पालना सुनिश्चिित कराने में क्या रोक है। प्रतिबंध की पालना सुनिश्चिित करनी चाहिए ताकि प्रतिवर्ष तंबाकू से होने वाली दस लाख मौतों को बचाया जा सके।

    इसके अलावा स्वस्थ जीवन शैली को अपनाने से भी कैंसर के खतरे को कम किया जा सकता है। ऐसा होने से कैंसर के ईलाज पर पर खर्च हो रहे भारी भरकम बजट के बोझ को कम कर देश की अर्थव्यवस्था को सुधारा जा सकता है।

    संबध हैल्थ फांउडेशन(एसएचएफ) के ट्रस्टी संजय सेठ ने कहा कि ग्लोबल एडल्ट टोबेको सर्वे (गेटस्) के अनुसार भारत में 26.7 करोड़ लेाग तंबाकू का उपभोग करते है। जबकि 5500 बच्चे प्रतिदिन तंबाकू उत्पादों का सेवन शुरु करतें है। इनमें से अधिकतर की मौत को तंबाकू पर प्रतिबंध करके बचाया जा सकता है।

    पूर्व रेल मंत्री व सांसद दिनेश त्रिवेदी ने बताया कि युवाअेा को अपने आत्मविश्वास को हमेशा साथ रखना चाहिए न कि किसी ब्रांडेड सिगरेट के पैकेट को। अधिकतर युवा सिगरेट इत्यादि का सेवन करतें है लेकिन आप अपने स्वस्थ जीवनशैली को चुने न कि कैंसर को।

  • अंधों की आड़ में राजनीतिक पाखंड

    अंधों की आड़ में राजनीतिक पाखंड

    देश में पूंजीवाद के दरवाजे खोलने वाली कांग्रेस कल्याणकारी राज्य का पाखंड छोड़ने तैयार नहीं है। भोपाल में अंधों की पिटाई के बाद भी कांग्रेस का इसी तरह का स्यापा सामने आया। वोट बैंक की राजनीति करते हुए कांग्रेसी आज भी देश को गुमराह करने की नीतियां जारी रखे हुए है। जबकि पीवी नरसिम्हाराव ने इसी कांग्रेस में रहते हुए भारत के नवनिर्माण में जो योगदान दिया है उसे कभी नहीं भुलाया जा सकता। सबसे बड़ी बात तो ये कि उन्होंने कांग्रेस की तमाम बदमाशियों के बीच देश को पूंजीवाद के रास्ते पर ले जाने का करिश्मा कर दिखाया था। आजादी के बाद से नेहरू इंदिरा की कांग्रेस देश पर कल्याणकारी राज्य का पाखंड थोपती रही है। गरीबी हटाओ का नारा देने वाली इंदिरा गांधी ने तो गरीबी हटाओ के पाखंड तले गरीब बचाओ अभियान चला दिया। यानि लोग गरीब ही बने रहें ताकि हम गरीबी हटाओ की राजनीति करते रहें। कांग्रेस के शासनकाल में देश से गरीबी कभी नहीं हटी बल्कि करोड़पति घरानों के हाथों में देश की दौलत सिमटती गई। आज जब मोदी जेटली की जोड़ी देश को आर्थिक सुधारों की दौड़ में शामिल करने में जुटे हैं तब उन पर लांछन लगाए जा रहे हैं। इसके लिए कांग्रेसी डाक्टर मनमोहन सिंह तक का इस्तेमाल करने में नहीं चूक रहे। जबकि डाक्टर मनमोहन सिंह ने ही वित्तमंत्री रहते हुए भारत में पूंजीवाद का ड्राफ्ट तैयार किया था। अपने प्रधानमंत्रित्व काल में भी उन्होंने आर्थिक सुधारों पर अमल करने का प्रयास किया। इसके बावजूद बीस सालों की कसरत के बाद भी वे देश को पूंजीवाद के रास्ते पर नहीं चला सके। क्योंकि हर बार धूर्त कांग्रेसियों की गेंग उनके रास्ते में रोड़े खड़े कर देती थी। ये गेंग चुनाव हारने का भय दिखाती रहती थी। इस दोहरी मानसिकता की सजा भी कांग्रेस को भोगनी पड़ी। कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई।देश में समानांतर अर्थव्यवस्था के पैरवीकोर भाजपाई भी यही भूमिका निभा रहे हैं। कांग्रेसियों का मोदी को गाली देना स्वाभाविक है लेकिन भाजपाई जिस तरह से मोदी जेटली को कोस रहे हैं वह देखसुनकर उनकी मूर्खता पर हंसी आना स्वाभाविक है। नौकरी मांगने की जिद पर बैठे उकसाए गए अंधों ने जब अपनी जिद नहीं छोड़ी तो शिवराज सिंह चौहान की पुलिस ने उन्हें पकड़कर घर पहुंचा दिया। ये एक सकारात्मक कदम था। इसके बावजूद कांग्रेसियों और विचारशून्य पत्रकारों ने इसे अंधों की पिटाई और पुलिस बर्बरता बताकर सरकार को खूब लानतें भेजीं। ये आज भी मानने तैयार नहीं हैं कि पूंजीवाद का मतलब आर्थिक सुशासन होता है। इसमें समाज की उत्पादक शक्तियों के अलावा किसी को भी उत्पादन की प्रक्रिया में जगह नहीं दी जा सकती है। जिन नौकरियों के लिए सामान्य लोग और पढ़े लिखे सक्षम युवा बेरोजगार घूम रहे हैं उन नौकरियों पर अंधों को कैसे भर्ती किया जा सकता है। क्या ये खैरात बांटने वाले किसी रजवाड़े का शासन है। पूंजीवाद में अंधे हों या अनाथ बच्चे,मंदबुद्धि बालक बालिकाएं हों या बुजर्ग सभी के लिए व्यवस्थित केम्प में रखने की व्यवस्था दी गई है। अनाथालय,वृद्धाश्रम को बाकायदा बैलेंसशीट में स्थान उपलब्ध है।मंदबुद्धि बच्चों के पालन के लिए केम्प चलाने वालों को टैक्स में छूट का प्रावधान है। इसके लिए मनमानी नहीं बल्कि सुविचारित प्रक्रिया है। यदि कोई युवा अंधा है तो उसे नौकरी पर भेजने की क्या जरूरत है। क्या समाज इतना नाकारा है कि उनका पालन भी नहीं कर सकता है। उनके लिए बाकायदा गुजारे भत्ते की व्यवस्था करना समाज की जवाबदारी है। इसके बावजूद कांग्रेस के साथी और कुछ नादान पत्रकार अंधों को नौकरी दिए जाने की वकालत करते देखे जाते हैं। इनमें वही लोग प्रमुख हैं जिन्होंने किसी न किसी षड़यंत्र के तहत आर्थिक आजादी पाई है। समाज की उत्पादकता बढ़ाने के बजाए वे अधिकारों की बात करते हैं। बेशक अंधों, अनाथों, बुजुर्गों को जीवित रहने का अधिकार है। पर इसके लिए जरूरी नहीं कि वे जब नौकरी करेंगे तभी उन्हें जीने का हक मिलेगा। समाज को अब ये समझ लेना चाहिए कि नौकरी की खैरात बांटने का दौर अब बीत चला है। अनुत्पादक सरकारी नौकरियां बांटकर कांग्रेस की सरकारों ने देश का भट्टा बिठाल दिया। भाजपा की सरकारें भी इस कुशासन को नहीं बदल पा रहीं हैं। शिवराज सिंह सरकार ने यदि अंधों को धरने से उठाकर घर भेजा है तो ये सकारात्मक संदेश है।निःशक्तजनों के लिए सरकार की कई योजनाएं हैं वे उनका लाभ उठाएं और सुख के गीत गुनगुनाएं। किन्हीं षड़यंत्रकारियों के बहकावे में आकर अधिकारों की बहसबाजी न करें। यह संदेश आंखों से विहीन लोगों के साथ साथ दिमाग की आंखों से वंचित लोगों तक भी पहुंच गया होगा हम यही उम्मीद करते हैं।