भोपाल 5 सितंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। मध्यप्रदेश सरकार ने सरकारी निकायों, निगमों, मंडलों, बोर्डों, उपक्रमों और विश्वविद्यालयों के पास उपलब्ध कोष के बैंकिंग विनियोजन की व्यवस्था में निजी क्षेत्र के बैंकों के लिए प्रतिस्पर्धा का दायरा बढ़ाया है। वित्त विभाग ने 1 सितंबर 2026 को आदेश क्रमांक I/1276235/2026 जारी कर वित्तीय वर्ष 2026-27 में कोष विनियोजन के लिए स्वीकार किए जाने योग्य निजी क्षेत्र के बैंकों की नई सूची जारी की है। इस सूची में स्पष्ट तौर पर इक्विटास स्मॉल फाइनेंस बैंक लिमिटेड को शामिल किया गया है।बैंक की कार्यप्रणाली की विश्वसनीयता के आधार पर ये फैसला लिया गया है।इक्विटास बैंक की दसवीं वर्षगांठ के अवसर पर सरकार ने उसे यह उपहार प्रदान किया है।
वित्त विभाग के आदेश में स्पष्ट किया गया है कि वित्त विभाग के पूर्व निर्देशों की कंडिका 9.2 के अनुसार निजी बैंकों की सूची प्रत्येक वित्तीय वर्ष की समाप्ति पर प्रकाशित आंकड़ों के आधार पर समय-समय पर अद्यतन की जाएगी। वित्तीय वर्ष 2025-26 के आंकड़ों के आधार पर 2026-27 में कोष विनियोजन के लिए स्वीकार किए गए निजी क्षेत्र के बैंकों की सूची इसी प्रक्रिया के तहत जारी की गई है। यानी बैंक का सूची में होना उसके पिछले वित्तीय प्रदर्शन और निर्धारित कसौटियों पर खरा उतरने से जुड़ा है।
इस सूची में कुल 12 निजी और स्मॉल फाइनेंस बैंक हैं।इसके अनुसार राज्य की संस्थाएं अब अपने उपलब्ध कोष का विनियोजन इक्विटास बैंक में कर सकेंगी। अब तक ये संस्थान ज्यादातर सरकारी बैंकों में अपना कोष विनियोजित करते थे। ये बैंक कम ब्याज दर की वजह से राज्य के घाटे की वजह बन रहे थे। बाजार में अच्छे विकल्प मौजूद होने के बाद भी सरकारी संस्थान घिसी पिटी परिभाषा के कारण घाटा अर्जित कर रहे थे। सरकार की नई सूची में इक्विटास बैंक के साथ एचडीएफसी बैंक, आईसीआईसीआई बैंक, एक्सिस बैंक, बंधन बैंक, एयू स्मॉल फाइनेंस बैंक, सिटी यूनियन बैंक, जना स्मॉल फाइनेंस बैंक, करूर वैश्य बैंक, ईएसएएफ स्मॉल फाइनेंस बैंक, कोटक महिंद्रा बैंक, जम्मू एंड कश्मीर बैंक भी शामिल हैं।

आदेश का एक और महत्वपूर्ण पक्ष सरकारी धन की सुरक्षा से जुड़ा है। वित्त विभाग ने कहा है कि ऐसे बैंक, जिनमें राज्य या राष्ट्रीय स्तर पर शासकीय खातों के संचालन में वित्तीय अनियमितता पाई गई है, उन्हें इस सूची में शामिल नहीं किया गया है। इसका अर्थ यह है कि सरकार ने केवल बैंक की ब्याज दर को आधार नहीं बनाया है। सरकारी खातों के संचालन का पिछला रिकॉर्ड भी पात्रता की कसौटी का हिस्सा है।इक्विटास बैंक रिजर्व बैंक के मानकों पर लगातार खरा उतर रहा है इसलिए देश के बैंकिंग क्षेत्र में तेजी से उभर रहा है।
भारत में बैंकिंग व्यवस्था लंबे समय तक सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के प्रभुत्व में रही। 1969 और 1980 में बड़े पैमाने पर बैंक राष्ट्रीयकृत किए गए। भारतीय रिजर्व बैंक के अपने ऐतिहासिक विवरण के अनुसार 1969 में 14 निजी बैंकों और 1980 में छह और निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ था। इसके बाद सरकारों का कामकाज केवल सरकारी बैंकों तक सीमित था और इस मोनोपाली के बावजूद सरकारी बैंक अपना कामकाज नहीं सुधार सके। रिजर्व बैंक ने जब बैंकिंग को अपनी कड़ी निगरानी में लिया तो सरकारी बैंक पिछड़ गए और निजी क्षेत्र के बैंक अपनी कार्यकुशलता की वजह से अर्थव्यवस्था के प्रमुख स्तंभ बनने लगे।
राष्ट्रीयकरण का उद्देश्य बैंकिंग संसाधनों को व्यापक सामाजिक और आर्थिक उद्देश्यों से जोड़ना था। समय के साथ भारतीय बैंकिंग नीति में एक दूसरा महत्वपूर्ण विचार मजबूत हुआ—बैंकिंग में प्रतिस्पर्धा। निजी बैंकों, नए बैंकिंग लाइसेंस, स्मॉल फाइनेंस बैंकों और तकनीक आधारित बैंकिंग ने सरकारी और निजी बैंकों के बीच सेवा, लागत, ब्याज दर और तकनीकी क्षमता की प्रतिस्पर्धा को बढ़ाया। आरबीआई आज सार्वजनिक क्षेत्र, निजी क्षेत्र और स्मॉल फाइनेंस बैंकों को अलग-अलग श्रेणियों में नियामकीय ढांचे के भीतर संचालित करता है।आरबीआई की ओर से बैंकिंग लाइसेंस, पूंजी पर्याप्तता, तरलता, जोखिम प्रबंधन और अन्य prudential requirements की निगरानी की जाती है।
मध्यप्रदेश के आदेश में यही फर्क महत्वपूर्ण है। सरकार ने निजी बैंकों के लिए अपना दरवाजा खोला है, लेकिन सूची को वित्तीय प्रदर्शन के आधार पर हर वित्तीय वर्ष में अपडेट करने की व्यवस्था भी रखी है। इसका परिणाम यह हो सकता है कि सरकारी कारोबार पाने के लिए बैंक केवल सरकारी स्वामित्व के आधार पर नहीं, बल्कि वित्तीय प्रदर्शन, सेवा गुणवत्ता, तकनीकी क्षमता, जोखिम प्रबंधन और प्रतिस्पर्धी दरों के आधार पर एक-दूसरे से मुकाबला करें।
इक्विटास स्मॉल फाइनेंस बैंक के लिए यह निर्णय इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बैंक मूल रूप से वित्तीय रूप से कम सेवा प्राप्त वर्गों तक बैंकिंग पहुंच बढ़ाने के उद्देश्य से विकसित हुए स्मॉल फाइनेंस बैंकिंग क्षेत्र का हिस्सा है। बैंक स्वयं अपनी पहचान ऐसे बैंक के रूप में करता है जो वित्तीय रूप से कम सेवा प्राप्त और वंचित वर्गों के लिए बैंकिंग समाधान उपलब्ध कराता है।श्रंगेरी पीठ के सहयोग से बैंक एक विशाल अस्पताल चलाता है और अपने मुनाफे का पांच फीसदी हिस्सा समाज सेवी कार्यों पर खर्च करता है।
सरकारी कारोबार में स्मॉल फाइनेंस बैंक की भागीदारी इस बैंकिंग मॉडल के विस्तार का संकेत भी है। सरकारी संस्थाओं के पास अक्सर ऐसी रकम होती है जिसे तत्काल खर्च नहीं किया जाना है। इस धन को बैंक में रखा जाता है तो ब्याज से अतिरिक्त आय हासिल की जा सकती है। ऐसे में बैंक के बीच प्रतिस्पर्धा सरकारी संस्थाओं को बेहतर दर और बेहतर सेवा हासिल करने की स्थिति में ला सकती है। इक्विटास बैंक को तमिलनाडू और महाराष्ट्र सरकार के साथ सरकारी कर्मचारियों के वेतन और पेंशन खातों के लिए empanelled किया जा चुका है। आरबीआई की मौजूदा बैंकिंग व्यवस्था में भी स्मॉल फाइनेंस बैंक एक मान्य बैंकिंग श्रेणी है। कई अन्य राज्यों ने भी इक्विटास बैंक को अपना साझेदार बनाकर राज्य के विकास की कहानी लिखी है।
मध्यप्रदेश के लिए इस निर्णय का सबसे व्यावहारिक पक्ष सरकारी धन के प्रबंधन में प्रतिस्पर्धा है। यदि कोई बैंक बेहतर ब्याज देता है, तकनीकी रूप से तेज सेवा उपलब्ध कराता है और सरकारी खातों के संचालन में बेहतर सुविधा देता है तो सरकारी संस्थाओं के पास उसके उपयोग का विकल्प होना वित्तीय प्रबंधन को अधिक बाजार आधारित बना सकता है। इससे सरकारी धन को केवल परंपरागत बैंकिंग संबंधों के आधार पर रखने की प्रवृत्ति कम हो सकती है।
बैंकिंग बाजार के लिए इसका दूसरा अर्थ है कि सरकारी कारोबार अब केवल सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिए सुरक्षित क्षेत्र नहीं माना जाएगा। आरबीआई की बैंकिंग व्यवस्था में निजी क्षेत्र और स्मॉल फाइनेंस बैंकों की मौजूदगी इसी प्रतिस्पर्धी ढांचे का हिस्सा है। आरबीआई के अनुसार बैंकिंग क्षेत्र का समग्र नियमन बैंकिंग रेगुलेशन अधिनियम के ढांचे में होता है और सार्वजनिक तथा निजी क्षेत्र के बैंक अलग स्वामित्व संरचनाओं के बावजूद नियामकीय व्यवस्था में काम करते हैं।
इसी नजरिए से मध्यप्रदेश का फैसला भारतीय बैंकिंग के उस संक्रमण से जुड़ता है जिसमें बैंकिंग का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होता कि बैंक सरकारी है या निजी। अब सवाल यह है कि बैंक कितना सुरक्षित है, कितनी कुशलता से काम करता है, ग्राहक और संस्थागत खातों को कितनी अच्छी सेवा देता है, तकनीक का कितना प्रभावी उपयोग करता है और धन पर कितना बेहतर प्रतिफल देता है।
इसका लाभ अंततः सरकार की आय और सार्वजनिक धन के बेहतर उपयोग में मिल सकता है। सरकारी कोष जनता का धन है। इसलिए उसे ऐसे बैंक में रखना जहां सुरक्षा के साथ बेहतर वित्तीय प्रतिफल और सेवा मिल सके, सार्वजनिक वित्त प्रबंधन का व्यावहारिक हिस्सा है। मध्यप्रदेश की नई सूची इसी सोच को आगे बढ़ाती दिखाई देती है।
यही इस फैसले की सबसे बड़ी विशेषता है। सरकार बैंक नहीं चुन रही, वह बैंकों को सरकार के धन के लिए प्रतिस्पर्धा करने का अवसर दे रही है। राष्ट्रीयकरण के दौर में बैंकिंग का उद्देश्य संसाधनों को सरकारी नियंत्रण में लाना था। आज की अर्थव्यवस्था में लक्ष्य यह है कि नियंत्रित और विनियमित प्रतिस्पर्धा के माध्यम से उन्हीं संसाधनों का अधिक कुशल उपयोग हो। मध्यप्रदेश का यह निर्णय इसी बदलती भारतीय बैंकिंग सोच की व्यावहारिक अभिव्यक्ति माना जा सकता है।






