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  • मोहन ने लगाया छन्ना तो उखड़ पड़े खैराती नगर सेठ

    मोहन ने लगाया छन्ना तो उखड़ पड़े खैराती नगर सेठ

    भले ही भारत की अर्थव्यवस्था वृद्धि दर के लिहाज़ से मजबूत मानी जा रही है, लेकिन देश पर बढ़ते कर्ज को कई विदेशी ताकतें भाजपा सरकारों की असफलता ठहराने का प्रयास कर रहीं हैं। केंद्र और राज्यों दोनों का कर्ज लगातार बढ़ रहा है और इसका प्रत्यक्ष असर राज्यीय अर्थव्यवस्थाओं पर भी दिख रहा है। मध्यप्रदेश भी इससे अछूता नहीं है। यहाँ सरकार लगातार बड़े बजट और जनकल्याण योजनाओं के साथ आर्थिक गतिविधियों को तेज़ करने का प्रयास कर रही है, लेकिन इन पहलों का वित्तीय भार राज्य की ऋण-प्रणाली को चुनौती देता बताया जा रहा है।ये सारा शोर कमोबेश वही लोग मचा रहे हैं जो अब तक शिवराज सिंह चौहान की सरकार के दौरान मलाई छानते रहे हैं।


    भारत में पिछले कुछ वर्षों में सरकारी एवं घरेलू—दोनों स्तरों पर कर्ज तेज़ी से बढ़ा है। कोविड के बाद पुनरुद्धार पैकेज, बुनियादी ढाँचे में निवेश, सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ और वैश्विक आर्थिक अस्थिरता ने सरकारी उधारी पर निर्भरता बढ़ाई है। राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते ऋण का सीधा असर राज्यों की उधारी सीमा, बाजार ब्याज दरों और उधार की लागत पर पड़ता है। केंद्र की उधारी बढ़ने से बाजार में बांडों की मांग प्रभावित होती है और राज्यों को ऊँचे ब्याज पर ऋण लेना पड़ता है। यही स्थिति आज मध्यप्रदेश समेत कई राज्यों के सामने है।


    विधानसभा के हालिया सत्र में अनुपूरक बजट प्रस्तावों पर चर्चा करते हुए प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता डाक्टर राजेन्द्र सिंह ने कहा कि सरकार पर कर्ज का बोझ लगभग चार लाख अस्सी हजार करोड़ से ज्यादा हो गया है। ये राज्य के कुल बजट से भी ज्यादा है। राज्य पर ब्याज का बोझ भी बढ़ता जा रहा है और सरकार की विकास योजनाएं प्रभावित हो रहीं हैं। मध्यप्रदेश का वार्षिक बजट जहाँ लगातार बढ़ा है, वहीं राज्य का कर्ज उससे भी तेज़ी से ऊपर गया है। 2025 तक उपलब्ध सरकारी आँकड़ों के अनुसार, राज्य पर बकाया ऋण लगभग 4.4–4.6 लाख करोड़ रुपयों तक पहुँच चुका है—जो राज्य के वार्षिक बजट (लगभग 4.21 लाख करोड़) से भी अधिक है।
    इसके अलावा, वर्ष 2025 के भीतर सरकार ने कई बार तात्कालिक उधारी (short-term borrowing) ली—जो यह संकेत देती है कि योजनाओं और भुगतान दायित्वों को पूरा रखने के लिए सरकार को बाजार से बार-बार धन जुटाना पड़ रहा है। राज्य की ऋण-से-GSDP अनुपात (Debt-to-GSDP Ratio) भी बढ़कर 31% के आसपास पहुँच गया है, जो आदर्श वित्तीय सीमा से अधिक माना जाता है।


    ऐसा कहा जा रहा है कि लाड़ली बहना योजना की वजह से सरकार झमेले में पड़ रही है। हालांकि ये योजना डाक्टर मोहन यादव को विरासत में मिली थी।वर्तमान सरकार ने महिलाओं को आर्थिक आधार देने के लिए ‘लाडली बहना’ योजना को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। उन्हें दी जाने वाली रकम भी बढ़ाई है। योजना की मासिक किश्तें और लगातार बढ़ती पात्रता संख्या के कारण राज्य को हर माह बड़ी राशि खर्च करनी पड़ती है। यह योजना सामाजिक रूप से अत्यंत प्रभावी है, लेकिन इसके लिए आवश्यक बजट का एक बड़ा हिस्सा उधार पर निर्भर है।


    सरकारी कर्मचारियों के वेतन-संशोधन, महंगाई भत्ते और पेंशन दायित्व बढ़े हैं, जिससे सरकार का नियमित राजस्व व्यय लगातार ऊपर जा रहा है। मेडिकल कॉलेज, नदी-लिंक, पर्यटन अवसंरचना और औद्योगिक इकाइयों पर बड़े निवेश की पहल की गई है। ये प्रोजेक्ट दीर्घकाल में लाभ देंगे, लेकिन शुरुआती वर्षों में इन पर भारी पूंजी खर्च की आवश्यकता होती है—जो उधारी के सहारे पूरी की जा रही है। सरकार ने मई से अक्टूबर 2025 के बीच कई बार 3,000–5,000 करोड़ रुपये के कर्ज लिए। यह नकदी-अभाव और बढ़ते भुगतान दायित्वों की ओर संकेत बताया जा रहा है। जबकि वित्तीय विशेषज्ञों का कहना है कि ये रकम देश की अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ाने में प्रयुक्त हो रही है इसलिए इस पर ज्यादा चिंतित होने की जरूरत नहीं है।


    डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में राज्य सरकार की प्राथमिकता जनकल्याण, महिलाओं का सशक्तिकरण, बड़े बुनियादी प्रोजेक्ट पर कार्य, औद्योगिक विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य पर नए निवेश के रूप में जारी है। इन सभी पहलों को जनता का समर्थन भी प्राप्त है। परंतु यह भी सच है कि इतनी व्यापक योजनाओं के लिए राज्य को सशक्त राजस्व आय की आवश्यकता है,जो अभी सीमित है। यही कारण है कि सरकार को बार-बार उधार लेकर नीतियों को गति देनी पड़ रही है। राजनीतिक दृष्टि से ये योजनाएँ मजबूत आधार बनाती हैं, लेकिन आर्थिक दृष्टि से ऋण-पोषित कल्याण मॉडल लंबे समय में चुनौती बन सकता है।


    वित्तीय तरलता घटने से कई कार्यक्रम गड़बड़ा जाते हैं। जब कर्ज बढ़ता है, तो बजट का बड़ा हिस्सा ब्याज भुगतान में जाता है। इससे शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढाँचे में निवेश कम पड़ने का खतरा होता है। उच्च ऋण/GSDP अनुपात से राज्य की क्रेडिट रेटिंग प्रभावित होती है, और आने वाले वर्षों में उधार लेना महंगा हो सकता है। कर्ज जितना बढ़ता जाएगा, नीति-निर्माताओं के पास नई योजनाओं के लिए वित्तीय गुंजाइश उतनी ही कम होती जाएगी।
    मुख्यमंत्री डाक्टर मोहन यादव ने आय बढ़ाने वाले विभागों पर तेजी से कार्य करने का फैसला लिया है। उसका प्रयास है कि राजस्व आय बढ़े,उद्योग और पर्यटन पर निवेश बढ़ाने की नई नीतियां लाई जाएं। जीएसटी की प्रक्रिया मजबूत हो और कर संग्रहण की स्थितियों में सुधार हो। राज्य के संसाधनों और संपत्तियों का इस तरह से पुर्ननियोजन किया जाए कि उनसे आय बढ़ाई जा सके और बर्बादी रोकी जा सके। कल्याण योजनाओं के लिए लाभार्थियों की नियमित समीक्षा कर खर्च की दक्षता बेहतर की जा सकती है। सरकारी खरीद और प्रशासनिक खर्च में कटौती कर कर्ज निर्भरता को कम किया जा सकता है। ऐसे प्रोजेक्ट जिनसे सीधे राजस्व आय बढ़ती है — कृषि वैल्यू चेन, पर्यटन, स्वास्थ्य सेवाएँ, स्टार्टअप इकॉनमी — इन्हें प्राथमिकता मिलनी चाहिए।


    मध्यप्रदेश आज दो राहे पर खड़ा है उसे अपनी जन हितकारी योजनाएं जारी रखनी हैं लेकिन उसे अपने कर्ज के निवेश से आय के नए संसाधन भी विकसित करने हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की नीतियाँ सकारात्मक सामाजिक बदलाव ला रही हैं, किंतु इन नीतियों की वित्तीय स्थिरता तभी सुनिश्चित हो पाएगी जब राज्य कर्ज-निर्भरता से निकलकर मजबूत राजस्व-आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ेगा। राज्य के लिए चुनौती यह नहीं कि योजनाएँ जारी रहें या नहीं—बल्कि यह है कि उन्हें वित्तीय दृष्टि से टिकाऊ कैसे बनाया जाए। यही वह बिंदु है जो आने वाले वर्षों में मध्यप्रदेश की आर्थिक सेहत और विकास गति दोनों तय करेगा।

  • संसाधन हड़पने वाले खलनायक को कौन कुचलेगा

    संसाधन हड़पने वाले खलनायक को कौन कुचलेगा


    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वाधीनता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से देश को जगाने का जो प्रयास किया है आज पूरा देश उस पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दे रहा है। प्रधानमंत्री ने आज कोई कलात्मक भाषण की झांकी न देकर जिन तथ्यों और योजनाओं से देश को अवगत कराया है वह भविष्य के हिंदुस्तान की एक रूपरेखा प्रस्तुत करते हैं। प्रधानमंत्री ने भ्रष्टाचार, परिवारवाद और तुष्टिकरण जैसी तीन बुराईयों को समाप्त करने का संकल्प खुलेआम दुहराया और कहा कि मेरा वादा है कि मैं जीवन भर इनसे लड़ता रहूंगा। प्रधानमंत्री ने कहा कि अगले साल भी मैं लाल किले पर आऊंगा और देश के सामर्थ्य और सफलता का गौरवगान करूंगा। उन्हें देश के प्रमुख विपक्षी दल की विचारधारा पर प्रहार करते हुए कहा कि आजादी के अमृत महोत्सव तक वे केवल बातें करते रहे जबकि हमने सरकार में आकर देश के संकल्पों को साकार कर दिखाया है। दरअसल कांग्रेस जिसे देश की विचारधारा कहती रही है वह एक परिवार के चंद सहयोगी परिवारों को पुष्ट करने का षड़यंत्र रहा है। देश के करोड़ों हाथों को काम देना कोई उपकार की बात नहीं बल्कि मानव बल का सदुपयोग करके उत्पादकता बढ़ाना है। जबकि सर्वाधिक सत्ता संभालने वाली कांग्रेस इसे देश पर उपकार गिनाते नहीं थकती।राजाओं, मुगलों, अंग्रेजों, जमींदारों, साहूकारों, जमाखोरों, मिलावटखोरों से लड़ने का काम देश की आम जनता आगे बढ़कर संभालती रही है लेकिन कांग्रेसी इसे अपना किया अहसान बताने में ही लगे रहते हैं। किसी भी कांग्रेसी से पूछिए वह यही दुहराता है हमने देश को आजादी दिलाई। जबकि हकीकत ये है कि करोड़ों हिंदुस्तानियों ने बलिदान देकर अंग्रेजों को देश से भागने पर विवश किया था। गांधी नेहरू की कांग्रेस ने तो अंग्रेजों को निकल भागने के लिए सुरक्षित पैसेज उपलब्ध कराया और उसका इनाम बटोरा। हिंदुओं और मुसलमानों के बीच वैमनस्य के बीज बोकर पाकिस्तान बंटवारा स्वीकार करना इसी गहरे षड़यंत्र का हिस्सा था। आजादी के बाद से लेकर जब तक कांग्रेस सत्ता में रही वह केवल फूट डालो राज करो की नीति पर ही अमल करती रही। आज भी देश में कांग्रेस को वोट देने वाला बड़ा तबका इसी तरह वैमनस्य की खेती करके अपना उल्लू सीधा करता है।केवल डेढ़ दो प्रतिशत लोगों को मंहगी सरकारी नौकरियां देकर शेष हिंदुस्तान के विरुद्ध षड़यंत्र की कलई तब खुल रही है जब भारतीय जनता पार्टी ने अंत्योदय के विचार पर अमल करके हर नागरिक को संसाधनों का बंटवारा करने की नीति पर अमल शुरु किया है। दरअसल हमेशा से यही समस्या रही है कि समाज के संसाधनों पर कुछ लोग कब्जा जमा लेते थे। कभी राजा,कभी मुगल, कभी अंग्रेज, कभी जमींदार,साहूकार और आज उन पर कब्जा बेतहाशा बढ़ते सरकारी तंत्र ने जमा लिया है। शोषण का ये कहर इतना अधिक बढ़ गया है कि लोग त्राहिमाम कर उठे हैं। जनता विद्रोह पर उतारू है। वह ये नहीं समझ पा रही है कि उसका असली खलनायक कौन है। कांग्रेस को अपना तारणहार मानने वाला तबका भाजपा को खलनायक बताने में जुटा है । भाजपा पर ये आरोप इसलिए चिपक रहा है क्योंकि लगभग दो दशक तक शासन करने के बाद भी भाजपा जनता के कंधे पर रखा ये जुआ नहीं उतार सकी है। सरकारी नौकरियों का वेतन लगातार बढ़ता जा रहा है और अमीरी गरीबी की खाई भी बढ़ती जा रही है।भाजपा ने अपने समर्थकों को सरकारी नौकरियों में भेज दिया तो शोषण का ये आंकड़ा और बढ़ गया। दिन भर में दो सौ रुपए की मजदूरी पाने वाला श्रमिक दाल,चावल,सब्जी उसी भाव पर खरीद रहा है जिस भाव पर ढाई तीन लाख रुपए मासिक वेतन पाने वाला अफसर खरीद रहा है। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पच्चीस लाख रुपए का पैकेज पाने वाले अमीर तबके से तय हो रहा है जबकि गरीब वर्ग बेवजह उसमें पिसा जा रहा है। मोदी जी जब मेरे प्यारे परिवारजन का संबोधन देते हैं को उन्हें और उनकी भाजपा को सोचना होगा कि वह अपने परिवारजनों के लिए मुखिया कैसे साबित हों। कहा गया है मुखिया मुख सो चाहिए, खान पान को एक, पाले पोसे सकल अंग तुलसी सहित विवेक । यदि मोदी जी और उनकी भाजपा कांग्रेस की छाया से बाहर नहीं निकल पाएगी और देश के संसाधनों का न्यायोचित बंटवारा नहीं कर पाएगी तो वह लाख बार कांग्रेस के परिवार वाद को गाली देती रहे जनता की समस्याओं का समाधान नहीं हो पाएगा। चंद परिवारों को जरूरत से ज्यादा संसाधन बांटने से उपभोक्ता सामग्री बनाने बेचने वाला कार्पोरेट सेक्टर तो मजबूत होता जा रहा है लेकिन वह सरकार और आम जनता दोनों का धन उलीचता जा रहा है। जनता इससे परेशान है और इससे अमीरी गरीबी के बीच खाई बढ़ती जा रही है। भाजपा ने हितग्राही मूलक योजनाओं से संसाधनों का बंटवारा आम जनता तक पहुंचाने की पहल तो की है लेकिन इसमें भी इतनी सारी शर्तें थोप दी गईं हैं कि वह संसाधन हर व्यक्ति को लाभ नहीं पहुंचा पा रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सामने खुली चुनौती है कि वे हर नागरिक तक देश के संसाधन पहुंचाना सुनिश्चित करें। मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान की भाजपा भी चीन्ह चीन्ह के रेवड़ी बांटने की शैली पर कार्य कर रही है। जाहिर है कि इससे जन आक्रोश बढ़ेगा और आने वाले विधानसभा चुनावों और लोकसभा चुनावों में भाजपा को इसकी मंहगी कीमत चुकानी पड़ेगी। संसाधन तो सीमित हैं। कर्ज लेकर बांटने की सीमा भी निश्चित है। जाहिर है कि सरकार को निष्पक्ष होकर शल्यक्रिया करनी होगी। संसाधन रिसकर आम जनता तक पहुंचाने वाला कांग्रेसी मॉडल उसे न केवल छोड़ना होगा बल्कि अंत्योदय की विचारधारा पर अमल की नाटकबाजी छोड़कर सख्ती से अमल शुरु करना होगा। अनुत्पादक सरकारी तंत्र को पालते रहने से वह भले ही चुनावी हेराफेरी करने में थोड़ी हद तक सफल हो जाए लेकिन जन आक्रोश का सैलाब उसे न घर का रहने देगा न घाट का ।

  • आर्थिक सुधारों के साथ चलें तो घर घर बरसेगी खुशहालीःजगदीश देवड़ा

    आर्थिक सुधारों के साथ चलें तो घर घर बरसेगी खुशहालीःजगदीश देवड़ा


    भोपाल,27 जुलाई(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। मध्यप्रदेश के वित्तमंत्री जगदीश देवड़ा ने प्रदेश के नागरिकों से कहा है कि भारत सरकार जो वित्तीय सुधार लागू कर रही है वे आजादी के बाद से अपेक्षित थे। जनता इन सुधारों के साथ कदमताल करेगी तो जल्दी ही घर घर में खुशहाली फैल जाएगी। कटनी दौरे से लौटने के बाद आज पत्रकारों से मुलाकात में उन्होंने प्रदेश के मजबूत होते वित्तीय ढांचे को लेकर कई संकेत दिए। उन्होंने कहा कि प्रदेश में जिस तरह आधारभूत ढांचे को विकसित किया गया है उसका लाभ प्रदेश की जनता भरपूर उठा रही है। लोगों की अपेक्षाएं बढ़ीं हैं और सरकार उन्हें पूरा करने का हर संभव प्रयास कर रही है।
    पत्रकारों के सवालों के जवाब में हरफन मौला वित्तमंत्री श्री देवड़ा ने कहा कि आर्थिक चुनौतियों के बीच जिन परिवारों की समरसता बिगड़ रही है उन्हें हमारी सांस्कृतिक विरासत से प्रेरणा लेनी चाहिए। हमारे देश में बचत की परंपरा बहुत मजबूत रही है अब हमें अपने आर्थिक संसाधनों को बढ़ाने के तरीके सीखना होंगे। भारत सरकार की वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने टैक्स में छूट की जो सीमा बढ़ाई है उससे काली अर्थव्यवस्था समाप्त होगी। भारत का विदेशी व्यापार संतुलन सुधरेगा और लोगों की आय बढ़ेगी।सबसे बड़ी बात है कि लोगों के जीवन में सुकून बढ़ेगा अब तक जिन छोटे और मध्यम आयवर्ग के लोगों को अपनी आय छिपानी पड़ती थी वे अब बेखौफ होकर अपना जीवनयापन कर पाएंगे।
    वित्तमंत्री ने कहा कि केन्द्र सरकार ने जिस तरह माईक्रोफाईनेंस और सूक्षम व लघु उद्योगों को अवसर दिए हैं, किसानों के लिए एफपीओ गठित किए हैं, सहकारिता के क्षेत्र को मजबूत बनाया है उससे जल्दी मुद्रा निर्माण बढ़ेगा और देश की क्षमताओं का उचित प्रतिफल हम जन जन तक पहुंचा पाएंगे। उन्होंने कहा कि लोग वित्तीय प्रबंधन की बारीकियां समझ रहे हैं और सरकार पर उनकी निर्भरता घट रही है। हमारा प्रयास है कि लोग लाचार न रहें और वे अपने हुनर का इस्तेमाल करके खूब समृद्धि हासिल करें।
    एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश सरकार कुशल वित्तीय प्रबंधन के माध्यम से जनता को लाभ पहुंचाने वाले वित्तीय संस्थानों की पहचान कर रही है और उन्हें भरपूर संरक्षण भी दे रही है। हम ढर्रे की सोच से बाहर निकलना चाहते हैं। प्रदेश की पुरानी परंपराओं के साथ हमने कई ऐसे नवाचार भी किए हैं जो आज जनता की समृद्धि के प्रकाश स्तंभ बनते जा रहे हैं।

  • नई अर्थव्यवस्था के लिए तय हो पुलिस की भूमिका

    नई अर्थव्यवस्था के लिए तय हो पुलिस की भूमिका



    मध्यप्रदेश, हिंदुस्तान के उन गिने चुने राज्यों में शामिल है जिन्होंने पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू करके भारतीय पुलिस अधिनियम 1861 के प्रावधानों को आज के संदर्भों में नया रूप देने का प्रयास किया है।केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह कहते रहे हैं कि आज हमें डंडे वाली नहीं बल्कि नॉलेज बेस्ड टेक्नोसेवी पुलिस की जरूरत है। अंग्रेजों ने 1857 की क्रांति को कुचलने के बाद जो पुलिस अधिनियम लागू किया था उसका मकसद आजादी की ललक को कुचलना था। आज की पुलिस के सामने अपराध नियंत्रण के साथ साथ देश के उद्यमियों को सुरक्षा प्रदान करने का भी लक्ष्य है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश के सामने 2024 तक पांच ट्रिलियन डॉलर(350 लाख करोड़ रुपए) की अर्थव्यवस्था बनाने का स्वप्न प्रस्तुत किया है। इसे साकार करने के लिए पुलिस की भूमिका को भी नए सिरे से परिभाषित किया जाना जरूरी है। ये पुलिस जाति, धर्म, संप्रदाय के आधार पर मुरौव्वत करने वाली नहीं बल्कि फोरेंसिक साईंस की कसौटी पर साईबर अपराधों को भी नियंत्रित करने वाली भी बनाई जा रही है।क्योंकि अर्थव्यवस्था उद्यमियों के हाथ हो चोरों के हाथ नहीं ये प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।
    मध्यप्रदेश के गृहमंत्री डॉ.नरोत्तम मिश्रा कहते हैं कि जिस तरह सरदार वल्लभ भाई पटेल ने रियासतों के एकीकरण से देश को अखंड भारत बनाने का भगीरथ किया था उसी तरह केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह पुलिस की भूमिका सार्थक बनाने का जतन कर रहे हैं। ये पुलिस अब ऐसे व्यक्तियों का निकाय बनती जा रही है जो कानूनों को लागू करने , संपत्तियों की रक्षा करने, संगठित अपराध पर अंकुश लगाने के साथ साथ देश के दीर्घ लक्ष्यों का भी समर्थन कर रही है। भोपाल और इंदौर में पुलिस कमिश्नर प्रणाली से पुलिस के जिम्मेदारी भरे बर्ताव की तस्वीर उभर रही है। अब पुलिस ऐसे सभी अपराधियों पर निगाह रख रही है जो समाज, धर्म या राजनीति की आड़ में आपराधिक गतिविधियों को अंजाम देते रहे हैं। सबसे बड़ी बात तो ये है कि ये निगरानी बाकायदा फोरेंसिक साक्ष्यों के आधार पर की जा रही है। पुलिस के कर्मठ सेवक जो जानकारियां जुटाते हैं उनसे अदालत में अपराध के तरीके को तफसील से प्रस्तुत करना संभव हो गया है। पुलिस के जुटाए साक्ष्य अपराधी को दंड की देहरी तक ले जा रहे हैं। ये संतोष की बात है।
    भारतीय साक्ष्य अधिनियम ने तथ्यों को संकलित करने और उसके आधार पर आरोपी का अपराध साबित करने की विधि हमें दी थी। अब तक पुलिस इसी अधिनियम के दायरे में अपराध को प्रमाणित करने का काम करती रही है। अब बढ़ते साईबर क्राईम ने पुलिस का काम बढ़ा दिया है। अब पुलिस को टेक्नोसेवी होना जरूरी है।अपराधी अब किसी दूसरे देश में बैठकर भी अपराध कारित कर देता है। प्रशिक्षण से पुलिस बल को शिक्षित करने का भरपूर प्रयास किया गया है लेकिन इसके बावजूद पुलिस बल की कार्यक्षमता में क्रांतिकारी बदलाव नहीं आया है। जो पुलिस कर्मी लंबे समय से पुलिस बल में काम कर रहे हैं उनके लिए आज अपराध की विवेचना दुरूह कार्य नजर आता है। पुलिस कर्मियों के चयन के मापदंड भी कुछ ऐसे रहे हैं जिनमें खिलाड़ी, पहलवान और तकनीकी पढ़ाई से विमुख कर्मचारियों की भरती की जाती रही है। यही वजह है कि पुलिस में दो तरह के कर्मचारी हैं। कुछ कंप्यूटर कक्ष में बैठकर कार्य कर रहे हैं तो कुछ को मैदानी दौड़ भाग में लगाया गया है। इनके बीच काम के असंतुलन को लेकर तकरार भी चलती रहती है। साथ में महिला पुलिस कर्मियों की बढ़ती संख्या ने भी पुलिस की कार्यप्रणाली में कई बदलाव किए हैं।
    इन सबके बावजूद पुलिस का चरित्र अभी नहीं बदला है। जब तक उच्च स्तर से अपने बल को बार बार संदेश नहीं दिया जाता कि उनकी भूमिका ठसके वाली थानेदारी करने की नहीं बल्कि ज्ञान आधारित शक्तिप्रदर्शन की हो गई है तब तक पुलिस को नवजीवन नहीं मिल सकता। कहा जाता है कि ज्ञान शेरनी के दूध की तरह होता है जो पिएगा वह दहाड़ेगा। इस सूत्रवाक्य को अपराधियों ने ज्यादा तेजी से अपनाया है। तकनीकों की आड़ लेकर वे तरह तरह के अपराध कर रहे हैं और पुलिस की निगाह से भी बचते रहते हैं। किसी चोरी की घटना में जब फरियादी पुलिस थाने पहुंचता है तो पुलिस का बर्ताव टालने वाला होता है। पुलिस वाले चाहते हैं कि फरियादी ही जांच करे, हमें साक्ष्य लाकर दे, साथ में सेवाशुल्क भी दे तब हम मुकदमा दर्ज करेंगे। हम अपने रजिस्टर में मुकदमों की संख्या क्यों बढ़ाएं।जबकि इन मुकदमों का खर्च सरकार स्वयं उठाती है। पुलिस का प्रयास रहता है कि मामले को दीवानी बताकर व्यक्ति को अदालत की ओर ठेल दे। क्षेत्राधिकार की पुरानी कहानी तो आज भी जस की तस है। अब यदि अपराधी की धरपकड़ किसी नागरिक को स्वयं करनी है तो फिर पुलिस की जरूरत क्या है। क्यों पुलिस वालों के लिए आवास, बजट और भरती की मांग की जाती है। आपराधिक मामले भी यदि व्यक्ति को स्वयं निपटाना है तो फिर बिहार की तरह निजी सेनाएं या बाऊंसर रखने की परिपाटी शुरु हो ही जाएगी।
    आज पुलिस बल के कई काम आऊटसोर्स किए जा रहे हैं। निर्माण, यातायात और अभियोजन के लिए वैसे भी पुलिस निजी एजेंसियों पर निर्भर रही है। क्या अब समय नहीं आ गया है कि जब राज्य की ओर से निजी एजेंसियों को भी पुलिस की तरह अधिकार दिए जाएं ताकि वे अनुसंधान करके अपराध नियंत्रण का काम संभाल सकें। जब पुलिस अपना दायित्व न निभा सके तो क्यों न इस विकल्प पर भी गौर किया जाए। अब यदि कोई किसान खेती करके अनाज का उत्पादन कर रहा है। मजदूरों को वेतन बांट रहा है। सरकारी मंडियों में शुल्क चुका रहा है। साबुन से लेकर खाद, कीटनाशक बीज ,वाहन आदि सभी पर टैक्स चुका रहा है। नगरीय या ग्रामीण निकायों का टैक्स भर रहा है और वो चोरी की शिकायत लेकर पुलिस के पास जाए तो पुलिस उससे कहे कि वह तो बड़ा आदमी है चोरी हो गई तो क्या फर्क पड़ता है। ऐसे में पुलिस की भूमिका पर एक बार फिर चिंतन क्यों न किया जाए। पुलिस यदि उद्यमियों के साथ न खड़ी हो और अपनी अक्षमता से अपराधियों को संरक्षण प्रदान करने का कारण बनने लगे तो उसकी भूमिका पर नए सिरे से विचार करना जरूरी हो जाता है।
    दरअसल नई सदी का भारत तेजी से करवट ले रहा है। जिस देश की अर्थव्यवस्था लगभग ढाई सौ सालों तक अंग्रेजों के षड़यंत्रों का शिकार रही हो, और वो अपनी तेज प्रगति से सारे मानदंड पीछे छोड़ रहा हो, उसे उपनिवेशिक मानसिकता वाली संस्थाओं से मुक्ति दिलानी ही होगी। शासकों और प्रशासकों को समय की इस मांग की पहचान करनी होगी। अपराध नियंत्रण का पुराना ढर्रा बदलना होगा तभी इन संस्थाओं का अस्तित्व बचा रह पाएगा। आज पुलिस कानूनों में बदलाव या सुधार की बात हो रही है कल पुलिस को ही बदलने की बात होने लगे तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के लक्ष्य के लिए यदि पुलिस का मौजूदा ढांचा होम करना पड़े तो भी ये सस्ता सौदा होगा।

  • केन्द्र का आर्थिक पैकेज संजीवनी साबित होगाःदेवड़ा

    केन्द्र का आर्थिक पैकेज संजीवनी साबित होगाःदेवड़ा

    भोपाल 29 जून (प्रेस इंफार्मेंशन सेंटर)

    वित्त मंत्री जगदीश देवड़ा ने कहा है कि केन्द्र सरकार द्वारा की अर्थ-व्यवस्था को गति देने के लिए 6.29 लाख करोड़ का प्रोत्साहन पैकेज देने से कोविड-19 प्रभावित भारत की अर्थ-व्यवस्था में नया मोड़ आयेगा। उन्होने प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को इस पहल के लिये धन्यवाद देते हुए कहा कि उनके नेतृत्व में केन्द्रीय वित्त मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण एवं वित्त राज्य मंत्री श्री अनुराग ठाकुर द्वारा घोषित किया गया आर्थिक पैकेज अर्थ-व्यवस्था के लिये संजीवनी साबित होगा और बूस्टर डोज का काम करेगा। श्री देवड़ा ने मध्यप्रदेश की अर्थ-व्यवस्था को पुनर्जीवित करने के लिये मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान का भी आभार व्यक्त करते हुए कहा कि केन्द्र सरकार के नये पैकेज से मध्यप्रदेश को भरपूर लाभ होगा।

    मंत्री श्री देवडा ने कहा कि यह राहत पैकेज स्वास्थ्य, एमएसएमई, पर्यटन, निर्यात एवं आत्म-निर्भर भारत रोजगार योजना सहित विभिन्न क्षेत्रों के लिये संजीवनी की तरह है। इन क्षेत्रों को फिर से जीवन मिलेगा। उन्होंने कहा कि यह प्रोत्साहन पैकेज समय की मांग के अनुसार है। उन्होंने कोरोना प्रभावित उघमियों को कम ब्याज दर पर 1.1 लाख करोड़ आर्थिक पैकेज देने की घोषणा का स्वागत करते हुए कहा कि प्रभावित क्षेत्रों को कोरोना महामारी से उपजे आर्थिक संकट से उबरने में मदद मिलेगी।

    छोटे उद्यमियों को बढ़ावा मिलेगा

    मंत्री श्री देवड़ा ने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा किए गए इन उपायों से निजी निवेश, निर्यात, कृषि उत्पादकता में वृद्धि को मदद मिलेगी तथा छोटे शहरों में भी स्वास्थ्य संबंधी ढाँचागत सुविधाएँ मजबूत होगी। अर्थ-व्यवस्था के पुर्नद्धार को गति मिलेगी और आर्थिक गतिविधियों में भी तेजी आएगी। यह राहत पैकेज अर्थ-व्यवस्था के लिए जीवन रक्षक साबित होगा। इन उपायों से उत्पादन भी बढ़ेगा और रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे। साथ ही छोटे उद्यमियों, व्यवसायियों और पर्यटन को बढावा मिलेगा। चिकित्सा क्षेत्र में निवेश बढ़ने से इस क्षेत्र में मजबूती मिलेगी। स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर किए गए प्रावधानों से पिछड़े क्षेत्रों में भी स्वास्थ्य सुविधाएँ बढ़ सकेंगी।

    मंत्री श्री देवड़ा ने कहा कि देश में 18 वर्ष से अधिक आयु के प्रत्येक नागरिक को फ्री वैक्सीन देने का क्रांतिकारी कदम उठा चुकी केंद्र सरकार ने अब इन आर्थिक उपायों से वित्तीय क्षेत्र को भी जरूरी वैक्सीन प्रदान कर दी है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना का लाभ नागरिकों को मिला है। अब इस योजना को नवंबर तक बढ़ाए जाने से गरीब लोगों को फायदा पहुँचेगा।

  • खजाने के लुटेरों पर लगे अंकुश

    खजाने के लुटेरों पर लगे अंकुश

    बजट सत्र का शुभारंभ करते हुए महामहिम राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने एक बार फिर भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का संकल्प दुहराया है। कल पेश होने जा रहे आम बजट से पहले आज वित्तमंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमन ने आर्थिक सर्वेक्षण पेश किया। इसमें दर्शाया गया है कि भारत का विदेशी मुद्रा भंडार आज 450 बिलियन डॉलर का ऐतिहासिक स्तर छू रहा है। देश में आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी बताते हुए शेयर बाजार ने ना नुकुर शुरु कर दी है। बजट को लेकर कार्पोरेट सेक्टर सरकार पर दबाव डालने का भरपूर प्रयास कर रहा है।इसके बावजूद नरेन्द्र मोदी की सरकार भारत की इकानामी को बढ़ाने के दावे पर अटल है। प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस लगातार देश में ये संदेश देने का प्रयास कर रहा है कि मानों देश डूब गया हो और उसकी अर्थव्यवस्था को मोदी सरकार ने मटियामेट कर दिया है। हकीकत इससे ठीक उलट है। जबसे देश में नोटबंदी हुई है तबसे कांग्रेस ये जताने की कोशिश करती रही है कि मोदी सरकार ने बगैर सोचे समझे एक गलत फैसला लिया था जिसकी वजह से देश के उद्योग धंधे और कारोबार तबाह हो गए थे। नोटबंदी से कई सच उजागर हुए हैं। आयकर विभाग ने देश के उन कारोबारियों को नोटिस दिए हैं जिन्होंने नोटबंदी के दौरान बड़ी रकम के पुराने नोट जमा किए थे। उनसे पूछा जा रहा है कि वे बैंकों में जमा कराए गए नोटों के स्रोत उजागर करें। रिजर्व बैंक भी ये जानने को बेताब है कि आखिर जितनी तादाद में उसने नोट छापे उससे भी ज्यादा संख्या में नोट बैंकों में जमा कैसे करा दिए गए। डुप्लीकेट नोटों की खेप कहां कहां से आई। वे कौन लोग थे जिन्होंने जाली नोटों की खेप जमा कर रखी थी। सरकार के इस कदम से बाजार में खलबली मच गई है। काला धन बैंको में जमा करने का अपराध कर चुके लोगों के लिए अब सामने अंधी गली नजर आ रही है। वे अपनी गलती अब सुधार नहीं सकते हैं। यही वजह है कि वे करवट लेते बाजार के कारण पिट रही कंपनियों की आड़ लेकर अर्थव्यवस्था की तबाही का रोना रो रहे हैं। रोने वाले राज्यों में वे सबसे आगे हैं जिन राज्यों में कांग्रेस सत्तासीन है। छत्तीसगढ़ की भूपेश बघेल सरकार ने तो वे तमाम योजनाएं बंद कर डाली हैं जिन्हें पिछली रमन सरकार चलाती रही थी। भाजपा पर विज्ञापनों की खैरात बांटने वाली कमलनाथ सरकार भी कटौतियों पर उतारू है। कमलनाथ ने तो भुगतानों पर रोक लगाने के बजाए बजट की ही कैपिंग कर दी है। निर्धारित बजट की मात्र साठ फीसदी राशि ही विभागों को दी जा रही है। राशि की कमी की वजह से भुगतान लंबित हैं और लोग इसी प्रत्याशा में धीरज बांधे हुए हैं कि जल्दी ही उन्हें भुगतान प्राप्त होगा। पूर्व वित्तमंत्री जयंत मलैया के उस बयान को कमलनाथ ने अपना सूत्र वाक्य बना रखा है कि प्रदेश का खजाना खाली है। जबकि हकीकत ये है कि दिग्विजय सिंह सरकार की नालायकियों के बाद से प्रदेश का वित्तीय प्रबंधन बहुत कारगर हो चुका है। उमा भारती के वित्तमंत्री रहे राघवजी भाई ने जिस तरह प्रदेश की आय बढ़ाने का प्रयास किया वह उल्लेखनीय रहा है। बाद के वर्षो में शिवराज सिंह चौहान की मैं हूं न वाली रट ने अनाप शनाप खर्चे चालू कर दिए थे। ठाकुर लाबी की शह पर सिंधिया महाराज को गाली देते शिवराज सिंह चौहान दिग्विजय सिंह की शतरंज के जाल में बुरी तरह उलझ गए थे। उन्होंने दिग्गी की उन सभी नीतियों का चुग्गा शान से चुगा जिनकी वजह से दिग्गी ने प्रदेश का बंटाढार किया था।मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों में पलीता लगाने में जुटे शिवराज को इसीलिए केन्द्र ने सलाह देना बंद कर दिया और गलत टिकिट वितरण ने भाजपा की लुटिया डुबो दी। अब कमलनाथ तो इससे भी आगे बढ़कर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं। उनकी निगाह में प्रदेश के सारे लोग अपराधी हैं। सारे लोग लुटेरे हैं। इतनी वैमनस्यता से भरी सरकार इसके पहले कभी नहीं देखी गई। जिन रेत के ठेकों में वे प्रदेश को बारहसौ करोड़ रुपए आय का लालीपाप थमा रहे हैं वह सिर्फ दिवा स्वप्न साबित होने जा रहा है। सीहोर, होशंगाबाद और भिंड में रेत खनन के लिए हैदराबाद की जिस पावर मेक प्रोजेक्ट्स लिमिटेड को ठेका दिया गया है वह बैंकों का कर्ज गड़पने के आरोपों से घिरी है।एमपी, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ में इस कंपनी के मालिकों ने हजारों लोगों को चूना लगाकर बैंकों के करोड़ों रुपए गड़प किए हैं। इसी तरह अन्य कई कंपनियां रेत के ठेकों की आ़ड़ में अपने घोटाले छुपा रहीं हैं। बेशक कमलनाथ सरकार कहे कि उनका वास्ता तो केवल रेत के ठेकों से आय बढ़ाने तक ही सीमित है लेकिन कंपनियों के आड़ में जिन्होंने देश का धन लूटा है उन्हें संरक्षण देना देश से गद्दारी करना है। कानून व्यवस्था भले ही राज्य का विषय हो लेकिन वित्तीय अनुशासन केन्द्र का सबसे प्रमुख अस्त्र है। भारत सरकार को उन कंपनियों के विरुद्ध भी कार्रवाई करनी चाहिए जिन्हें राजनैतिक वैमनस्य के जरिए कांग्रेस की राज्य सरकारें संरक्षण दे रहीं हैं। इन पर अंकुश लगाए बगैर पांच ट्रिलियन डालर की इकानामी का लक्ष्य नहीं पाया जा सकेगा।