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  • मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम बनने की यात्रा ही भारत का संस्कारः विधानसभा अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर

    मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम बनने की यात्रा ही भारत का संस्कारः विधानसभा अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर


    भोपाल,03 मार्च(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। त्रेता युग में राजा दशरथ के संकल्प को प्रसाद मानकर प्रभु श्रीराम अयोध्या से वन की ओर प्रस्थान कर रहे थे तब वे राजकुमार राम थे।जनमानस तब भी उनके साथ था और राजा दशरथ समेत कोई भी नागरिक नहीं चाहता था कि वे वन गमन करें। चौदह वर्ष बाद जब वे लंकापति रावण को परास्त करके अयोध्या वापस लौटे तब तक लोग उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के रूप में जानने लगे थे।आम व्यक्ति से मर्यादा पुरुषोत्तम बनने की यही यात्रा भारत का संस्कार है।अयोध्या में रामलला का भव्य मंदिर स्थापित होने से भारत के संस्कार और विकास के यही मानदंड एक बार फिर स्थापित हुए हैं। सागर में स्वर्गीय भुवन भूषण देवलिया ने पत्रकारिता की नर्सरी में जो संस्कार रोपे थे वे आज बहुमूल्य उपवन बनकर सबके सामने हैं। इसे उसी रामराज्य का मॉडल कहा जा सकता है जिसे हम समाज के बीच साकार कर रहे हैं।
    व्याख्यान माला और सम्मान समारोह में पहुंचे विधानसभा अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर के मार्गदर्शन में राजेन्द्र शर्मा ,विजयदत्त श्रीधर, श्रीमती कीर्ति देवलिया और अन्य अतिथियों ने दीप प्रज्वलन कर कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ किया।उन्होंने स्वर्गीय देवलिया जी के चित्र पर पुष्प अर्पित किए और ज्ञान की देवी मां सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया। मुख्यमंत्री के जनसंपर्क अधिकारी अशोक मनवानी ने विधानसभा अध्यक्ष को पुष्पगुच्छ और शाल पहनाकर उनका सम्मान किया। मुख्य वक्ता राजेन्द्र शर्मा को समिति की ओर से आलोक सिंघई ने पुष्पगुच्छ और अंगवस्त्र पहनाकर उनका अभिवादन किया। पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर को वरिष्ठ पत्रकार राजीव सोनी ने पुष्पगुच्छ भेंट करके और शाल ओढ़ाकर सम्मानित किया
    राजधानी के माधवराव सप्रे समाचार पत्र संग्रहालय एवम शोध संस्थान में आयोजित भुवन भूषण देवलिया स्मृति व्याख्यान के तेरहवें आयोजन में पहुंचे विधानसभा अध्यक्ष श्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने राम,राजनीति और पत्रकारिता विषय पर अपने संबोधन में देश के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य को ऊर्जा से ओतप्रोत बताया। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता के गुरु की याद में उनके शिष्य और परिजन ये आयोजन लगातार कर रहे हैं मुझे इसमें पहली बार शामिल होने का सौभाग्य मिला है। समिति ने शिवपुरी के वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद भार्गव को सम्मानित करके अपने संकल्पों के प्रति प्रतिबद्धता दुहराई है। मैं जब भारतीय जनता युवा मोर्चा में था और राजनीति की शुरुआत कर रहा था तब मुझे ग्वालियर चंबल अंचल के शिवपुरी जाने का अवसर मिलता था। तबसे पत्रकार वार्ताओं में मुझे श्री प्रमोद भार्गव जी को समझने का अवसर मिला। उनके मार्गदर्शन से मुझे अपनी राजनीतिक जीवनयात्रा को मजबूती देने में काफी मदद मिली। मैं जानता हूं कि राष्ट्वादी विचारों के माध्यम से कैसे समाज का भला किया जा सकता है।
    श्री तोमर ने कहा कि श्री राम मंदिर आंदोलन और अयोध्या के भव्य राम मंदिर में राम लला की मूर्ति की स्थापना ने भगवान श्री राम के व्यक्तित्व की स्थापना में सहयोग दिया है। इसी राममय राजनीति में देश की सारी समस्याओं का समाधान मौजूद है। प्रभु श्रीराम ने अपने चौदह वर्ष के वनवास के कालखंड में वही किया जो एक आम इंसान को करना चाहिए। महादेव पूजन में मुख्य पुरोहित के रूप में शत्रु रावण को बुलाना हो या मृत्यु शैया पर पड़े रावण से ज्ञान प्राप्त करने के लिए भ्राता लक्ष्मण का मार्गदर्शन करना सभी वे संस्कार हैं जो लोकतंत्र की पहली शर्त हैं। प्रतिकूल परिस्थितियों में वनवासियों की सेना बनाकर असत्य पर सत्य की विजय का परचम फहराना हर शासक के लिए आज भी समीचीन संदेश है। राम राजनीति और पत्रकारिता विषय पर विमर्श की जिज्ञासा सभी को होनी चाहिए तभी लोग समझ पाएंगे कि राजकुमार राम से मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम तक की यात्रा ही हमारे जीवन का लक्ष्य है। समिति की सचिव डा. अपर्णा एलिया ने विधानसभा अध्यक्ष श्री नरेन्द्र सिंह तोमर को स्मृति चिन्ह ,शॉल और तुलसी का पौधा भेंट कर सम्मानित किया।
    विषय का प्रवर्तन करते हुए वरिष्ठ पत्रकार शिवकुमार विवेक ने कहा कि राम हमारी चेतना से जुड़े हुए हैं। राम वास्तव में राजनीति का विषय नहीं हैं। जब तक वे व्यक्तिगत आस्था का विषय थे तब तक उनसे किसी को शिकायत नहीं थी। अब जबकि जब वे सामूहिक चेतना के प्रतीक बन गए हैं तो उनका मंदिर राजनीतिक विमर्श का केन्द्र बिंदु बन गया है। अखबारों ने भी इसे भारत की प्राण प्रतिष्ठा कहकर जनमानस की भावनाओं को रेखांकित किया है। लोकतंत्र की इसी नब्ज को टटोलकर हमारी पत्रकारिता अपना उद्देश्य पूरा कर रही है। इस अवसर पर प्रकाशित की गई स्मारिका का विमोचन भी किया गया।
    भुवन भूषण देवलिया व्याख्यानमाला समिति की ओर से सम्मानित किए गए शिवपुरी के वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद भार्गव ने कहा कि मैंने पत्रकारिता की अकादमिक शिक्षा कहीं नहीं ली लेकिन देश की राजनीतिक चेतना को समझकर मैंने अपना संवाद किया और हमेशा पूरे देश के मीडिया के साथ काम करने का अवसर मुझे मिलता रहा। उन्होंने कहा कि देश में लगभग तीन सौ रामायण हैं जिनमें अलग अलग आख्यान कहे गए हैं। फादर कामिल बुल्के ने इन रामायणों को पढ़कर रामकथा सार नामक ग्रंथ लिखा है। हमें देखना होगा कि भारतीयता कहां कहां है। भारत ऋषियों और मुनियों का देश रहा है। वे पूजा पाठ जैसे कर्मकांडों में नहीं लगे थे वे तो वैज्ञानिक आविष्कारों जुटे रहते थे। उन्हीं ऋषियों ने संदेश दिया था कि रावण उत्तर भारत की ओर बढ़ रहा है। यही कारण है कि उन्होंने राम को वन का राज सौंपने की राय दी थी। ऋषि मुनि तब वनवासियों को शिक्षित कर रहे थे। उनकी यज्ञशालाएं वास्तव में अग्नि शालाएं थीं। वहां हथियार बनाए जाते थे। श्री प्रमोद भार्गव ने कहा कि उन्होंने अपनी पत्रकारिता और पुस्तकों के माध्यम से देश की भावनाओं को सामने लाने के लिए काम किया है। उन्होंने कहा यही पत्रकारिता समाज में हितकारी संवाद स्थापित कर पाती है। व्याख्यान माला समिति की ओर से विधानसभा अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर ने श्री प्रमोद भार्गव को पुरस्कार राशि 11 हजार रूपए, शाल श्रीफल देकर सम्मानित किया।
    कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर ने कहा कि ये आयोजन हर साल मार्च महीने के पहले रविवार को होता है। इस बार संयोग है कि आज स्वर्गीय देवलिया जी का जन्मदिन भी है। मैं उनकी स्मृति को प्रणाम करता हूं। उन्होंने कहा कि अयोध्या में 1949 में रामलला की मूर्ति की स्थापना हुई थी। तब फैजाबाद की जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष ने अपने पत्र में लिखा कि यदि आज श्री राम लला की मूर्ति की स्थापना नहीं होगी तो हमने आजादी किसलिए हासिल की थी। अदालत के फैसले से अयोध्या में तो देश के जनमानस के मनोभावों की प्राण प्रतिष्ठा हो चुकी है। अभी काशी और मथुरा बाकी हैं। इरफान हबीब जैसे सुधारवादी मुस्लिमों का कहना है कि ये मसले आपसी बातचीत से सुलझा लिए जाने चाहिए। मीडिया इस पर राष्ट्रीय सहमति बनाने से चूक गया है। यदि अयोध्या की तरह इस पर देशव्यापी डिबेट हो जाए तो शांति का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। आयोजन समिति की ओर से डा. बालकृष्ण दुबे ने श्री विजयदत्त श्रीधर को स्मृति चिन्ह भेंटकर सम्मानित किया।
    राम,राजनीति और पत्रकारिता विषय पर व्याख्यान के मुख्य वक्ता राजेन्द्र शर्मा ने कहा कि इस भावमय कार्यक्रम से हमें ये समझने में मदद मिलती है कि स्वर्गीय भुवन भूषण देवलिया जी श्री राम के व्यक्तित्व के समान ही प्रेरणा के स्रोत बने हुए हैं। एक से बढ़कर एक पत्रकारों को तैयार करने में श्री देवलिया जी का योगदान अप्रतिम रहा है। हमें इस तरह के विमर्श से देश की नई पीढ़ी को प्रेरणा देते रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि आज भी देश में बाबरी मस्जिद ध्वंस पर छाती पीटने वालों की जमात मौजूद है जबकि बाबर केवल एक आक्रांता था। मुगल काल में हिदू धर्म के प्रतीक ध्वस्त किए गए थे लेकिन अंग्रेजों ने तो पूरे जन मानस को राम से विमुख करने का षड़यंत्र रचा। श्री शर्मा ने कहा कि राम मंदिर के माध्यम से देश की नई पीढ़ी आसानी से समझ पाएगी कि राम समन्वय के प्रतीक हैं। वे उस मां को भी पूरा सम्मान देते हैं जिसने उन्हें वनवास के लिए भेज दिया था। वे उस मारीच को भी अभय देते हैं जिसने उन्हें गुमराह किया था। उनके आदर्श जीवन को राजनीति का मंत्र मानने वाले राम को अपना प्रकाश स्तंभ मानते हैं लेकिन कुछ विरोधी अपना नाम सीताराम और जयराम रखने के बावजूद भगवान राम का विरोध करते देखे जाते हैं। पूरी दुनिया में रामव्रत के बगैर लोकतंत्र सफल नहीं हो सकता।
    श्री शर्मा ने कहा कि सीता माता के प्रति राम का अनुराग इतना गहरा था कि उन्होंने शक्तिशाली रावण तक का वध कर दिया लेकिन जब उनके राज्य के एक नागरिक ने सवाल उठाया तो उन्होंने अपने अनुराग का दमन करके सीता माता को त्यागने तक का फैसला कर लिया। लोकतंत्र के लिए व्यक्तिगत राग का त्याग करने का ऐसा उदाहरण कौन प्रस्तुत कर सकता है। विभीषण के प्रति अन्याय करने वाले रावण को दंडित करने के बाद वे लंका को हड़प सकते थे लेकिन उन्होंने विभीषण को वहां की सत्ता सौपकर जो त्याग का उदाहरण दिया वह लोकतांत्रिक सोच ही तो था लेकिन कुछ विरोधियों ने तो केवल राजनीतिक द्वेष की वजह से राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा आयोजन में शामिल होने से इंकार कर दिया। उन्होंने कहा कि श्री राम के व्यक्तित्व से प्रेरित केवल वही पत्रकारिता स्वागत योग्य होती है जो दूसरों की पीड़ा को दूर करने के लिए आगे आती है।
    उन्होंने कहा कि रावण तो छल विद्या का जानकार था वह रूप भी बदल लेता था लेकिन उसने अपने सलाहकारों से कहा कि मैं जब राम का वेश धरता हूं तो सीता मुझे माता नजर आने लगती हैं। ऐसे में मैं कोई अन्यायी कदम नहीं उठा पाता। राम नाम की राजनीति भी यही संस्कार देती है जिससे समाज का कल्याण सफलता पूर्वक किया जा सकता है। श्री शर्मा ने कहा कि जटायु जब प्राण त्याग रहे थे तब श्रीराम ने उनसे निवेदन किया कि वे स्वर्ग में जाकर राजा दशरथ को सीता हरण की कहानी न सुनाएं। मैं स्वयं रावण का वध करके उसे अपनी व्यथा सुनाने कुल समेत भेज रहा हूं। वनवासी राम ने अपनी सेना के सभी अंगों को शक्ति संपन्न किया। अपने आत्मविश्वास और निपुणता के बल पर रावण का वध भी किया। त्याग,पराक्रम के साथ दयालुता जैसी भावनाओं का जैसा समावेश राम की नीति में है वही सच्ची राजनीति कही जा सकती है। स्वर्गीय भुवन भूषण देवलिया की पुत्री श्रीमती अरुणा दुबे ने श्री राजेन्द्र शर्मा को स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया।
    विशिष्ट अतिथि माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो.के.जी. सुरेश ने कहा कि पत्रकारिता पर गहरा दायित्व है कि वह उन मुद्दों को खबर बनाए जिसके आधार पर लोकतंत्र की भावना मजबूत होती है। उन्होंने कहा कि जम्मू कश्मीर में जब हुर्रियत चुनावों का बहिष्कार कर रही थी तब कुछ देश भक्त चैनलों ने भय के माहौल के बीच मतदान करने वाले नागरिकों को शाबासी दी थी । उसी सकारात्मक भाव का नतीजा है कि आज जम्मू कश्मीर विकास के पथ पर अग्रसर है। उन्होंने कहा कि कुछ ही साल पहले राष्ट्रवादी सोच के पत्रकारों को गोदी मीडिया कहकर लांछित किया जाता था आज जब पूरी दुनिया भारत के साथ खड़ी है तब उन चैनलों के सुर भी बदल गए हैं। मुख्य धारा के मीडिया को समझ में आ गया है कि यदि वे जन भावनाओं को महत्व नहीं देंगे तो उनका मीडिया समाज से कट जाएगा। अब वे चैनल भीजनता की सोच के अनुकूल सामग्री ही दिखाते हैं। आज देश में समान नागरिक संहिता पर सकारात्मक चर्चा चल रही है। जनता और मीडिया सभी के सोच में स्पष्ट बदलाव साफ दिखाई देने लगा है। स्वर्गीय भुवन भूषण देवलिया के सुपुत्र डा. आशीष देवलिया ने प्रोफेसर के.जी.सुरेश को स्मृति चिन्ह भेंटकर सम्मानित किया।
    कार्यक्रम का औपचारिक आभार प्रदर्शन वरिष्ठ पत्रकार राजेश सिरोठिया ने किया। उन्होंने कहा कि राजनीति धर्म के बगैर नहीं की जा सकती। सनातनी भाव से ही लोकतंत्र मजबूत हो सकता है। राम और कृष्ण के देश में हमें शास्त्रों से नैतिकता की शिक्षा दी जाती है लेकिन वक्त आने पर धर्म की रक्षा के लिए शस्त्र उठाने का प्रशिक्षण भी दिया जाता है। उन्होंने सभी अतिथियों के प्रति आभार प्रदर्शित किया। मंच का संचालन वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक श्री लोकेन्द्र सिंह ने किया।

  • मीडिया के शोर में प्रेस की साख आज भी कायमःकुलपति केजी सुरेश

    मीडिया के शोर में प्रेस की साख आज भी कायमःकुलपति केजी सुरेश

    भोपाल,07 मार्च(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। सोशल मीडिया और डिजिटल क्रांति के दौर में पत्रकारों की समाज के प्रति संवेदनशीलता और लोक दायित्व का भाव ही प्रेस की पहचान है। प्रेस ने बड़ी हद तक अपनी इस साख को बचाकर रखा है। तकनीक और भाषा के सहारे चलने वाला दुष्प्रचार कभी लोकदायित्व से भरी प्रेस की जगह नहीं ले सकता।इसके बावजूद पत्रकारिता की मुख्य धारा यदि आज कहीं सवालों के घेरे में है तो उसे अपनी सार्थकता बनाए रखने के लिए खुद में बदलाव लाना होगा।प्रदेश के मूर्धन्य आंचलिक पत्रकार स्वर्गीय भुवन भूषण देवलिया की स्मृति में आयोजित व्याख्यान माला में पं. माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति के.जी. सुरेश ने प्रमुख वक्ता के रूप में ये विचार व्यक्त किए।

    पंडित माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय परिसर में आज रविवार को जूम एप और फेसबुक लाईव पर (पत्रकारिता का लोक दायित्व) विषय पर आयोजित व्याख्यानमाला में प्रोफेसर के.जी. सुरेश के अलावा अमर उजाला डिजिटल के संपादक जयदीप कार्णिक, भारतीय जन संचार संस्थान के महानिदेशक प्रो.संजय द्विवेदी, पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर, ने अपने विचार व्यक्त किए। लगातार दसवें वर्ष हुए इस आयोजन में विषय का प्रवर्तन वरिष्ठ पत्रकार शिव अनुराग पटैरिया ने किया। इसके अलावा वरिष्ठ पत्रकार राजेश सिरोठिया. और वरिष्ठ पत्रकार अजय त्रिपाठी ने श्री देवलिया जी के साथ जुड़ीं यादों के संस्मरण सुनाए।इस अवसर पर सागर के वरिष्ठ पत्रकार विनोद आर्य को स्वर्गीय भुवन भूषण देवलिया स्मृति अलंकरण से सम्मानित किया गया। इसमें आंचलिक पत्रकारों के लिए ग्यारह हजार रुपए नकद, शाल श्रीफल और स्मृति चिन्ह से सम्मानित किया जाता है। मंच संचालन युवा पत्रकार आदित्य श्रीवास्तव ने किया।

    प्रो.के.जी.सुरेश ने कहा कि कोई भी नागरिक अभिनंदन हमेशा प्रायोजित सम्मानों से ज्यादा मूल्यवान होता है। नागरिक अभिनंदन की कसौटी हमेशा ठोस होती है। मुझे स्वर्गीय देवलिया जी से मिलने का अवसर तो प्राप्त नहीं हुआ लेकिन उनके बारे में जो पढ़ा और उनके छात्रों में समाज के प्रति जो प्रतिबद्धता देखी उससे मालूम चलता है कि वे आंचलिक पत्रकारिता के पुरोधा रहे हैं। उन्होंने कहा कि आज एक शिक्षक के नाते मुझे लगता है कि पत्रकारों की चयन प्रक्रिया पर हमें विशेष गौर करना होगा। हम पत्रकारों को भाषा और तकनीक के आधार पर बेहतर बनाने का प्रयास करते हैं लेकिन उनकी समाज के प्रति संवेदनशीलता पर गौर नहीं करते।

    श्री केजी सुरेश ने कहा कि समाज के बीच जनसंचार कायम करने के लिए हमें सामुदायिक रेडियो को बढ़ावा देना होगा। आज बोलचाल की भाषा में कहा जाता है कि पत्रकार तो पक्षकार हो गए हैं जबकि उनका तो एक ही पक्ष होता है वो है जनपक्ष या लोकपक्ष। मैं स्वयं तीन दशकों तक पत्रकार रहा हूं इस आधार पर कह सकता हूं कि रोज शाम को टीवी की बहसें पत्रकारिता नहीं हैं। ये बात भी सही है कि टेबल टाप रिपोर्टिंग मीडिया की मजबूरी है लेकिन यदि वो जमीनी स्तर की सच्चाई उजागर नहीं करती तो उसका महत्व कुछ नहीं। मुख्यधारा का मीडिया यदि अपने भीतर बदलाव नहीं लाएगा तो आगे चलकर उसका महत्व ही समाप्त हो जाएगा। जमीनी स्तर पर मीडिया को लेकर कई प्रयोग चल रहे हैं। यदि उन मुद्दों को नहीं उठाया जाएगा तो पढ़ने देखने के प्रति लोगों का लगाव नहीं बढ़ाया जा सकेगा। आज ब्लॉगों और यू ट्यूब पर पाठकों और दर्शकों की रुचि की सामग्री बढ़ती जा रही है। पाठकों की ये बदलती अभिरुचियां प्रेस के लिए खतरे की घंटी बन गई है। उन्होंने कहा कि प्रेस की 70 फीसदी आय विज्ञापनों से होती है, ऐसे में लोक दायित्व के भाव को बचा पाना कठिन हो जाता है। जनता को भी इस मुद्दे पर गौर करना होगा कि वह ऐसे प्रेस को संबल दे जो केवल जनता के हित के लिए काम करता हो। प्रेस के हित में हमारा विश्वविद्यालय भुवन भूषण देवलिया स्मृति व्याख्यानमाला समिति के साथ काम करने के लिए तैयार है। आंचलिक पत्रकारिता को मजबूत करने के लिए यूनिसेफ के सहयोग से हम हर जिले में अच्छी पत्रकारिता को बढ़ावा देने का काम कर रहे हैं।

    भारतीय जनसंचार संस्थान,नईदिल्ली के महानिदेशक प्रो.संजय द्विवेदी ने कहा कि स्वर्गीय भुवन भूषण देवलिया का जीवन पत्रकारिता के लोक दायित्व का स्थापित उदाहरण है। लोकमंगल उनके संवाद का प्रमुख स्तंभ था। मीडिया की आलोचना करने से जनसंवाद का उद्देश्य पूरा नहीं होता। समाज के सभी स्तंभों में गिरावट देखी जाती है ऐसे में मीडिया अछूता नहीं रह सकता। पत्रकारिता विहीन समाज के बीच कभी भी लोक कल्याणकारी राज्य नहीं बनाया जा सकता। उन्होंने कहा कि कुछ लोग आंदोलनकारी बनकर खुद को पत्रकार बताने का प्रयास करते हैं ऐसा करके वे पत्रकारों की तपस्या पर पानी फेर देते हैं। पत्रकारिता के पीछे जनता का विश्वास प्रमुख होता है। पत्रकार तो कोई भी बन सकता है लेकिन पत्रकारिता करने वाले लोग अलग होते हैं। हमें ऐसे लोगों को संरक्षण देना होगा जो वास्तव में पत्रकारिता कर रहे हैं। इस तरह के आयोजन उन्हीं पत्रकारों को संबल देने में सहायक होते हैं। इस लिहाज से ये विमर्श बहुत मूल्यवान बन गया है।

    अमर उजाला डिजिटल के संपादक जयदीप कार्णिक ने कहा कि जैसे कोई भी सच्ची खबर छुप नहीं सकती उसी तरह पत्रकारिता की गंदगी भी छुपाई नहीं जा सकती। पत्रकारिता में आत्म अवलोकन का भाव हमेशा अच्छी पत्रकारिता को जिंदा रखता है। सोशल मीडिया पर तो लोग झूठ भी प्रचारित कर देते हैं लेकिन प्रेस का संपादक केवल तथ्यों को ही प्रस्तुत करता है। यही प्रेस का महत्व भी है। उन्होंने कहा कि आज वक्त आ गया है कि हम पत्रकारिता की अर्थव्यवस्था पर भी बात करें।

    पत्रकारिता का लोक दायित्व विषय पर आयोजित इस व्याख्यानमाला में विषय का प्रवर्तन करते हुए वरिष्ठ पत्रकार शिव अनुराग पटैरिया ने कहा कि बिल्डर माफिया और शराब के व्यापारियों ने जबसे अखबारों में घुसपैठ कर ली है तबसे समाज की जन पक्षधरता लड़खड़ाने लगी है। अच्छे अखबारों का समर्थक बाजार न होने की वजह से लोकदायित्व की लड़ाई पिछड़ जाती है। इस सबके बावजूद ये भी सच है कि यदि पत्रकार न झुकना चाहें तो कोई शक्ति उन्हें नहीं झुका सकती। आज भी पत्रकारों को थानेदार, कलेक्टर और मुख्यमंत्री को खुश करके चलना होता है, ऐसे में जो लोग समझौते नहीं करते वे पिछड़ जाते हैं। साधनों के अभाव में ये पत्रकारिता पिछड़ रही है।

    अध्यक्षीय भाषण में पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर ने कहा कि अच्छाई या बुराई हमारे ही कर्मों से निकलती हैं। हर दौर में अच्छी बुरी पत्रकारिता दोनों रहीं हैं। जो लोग किसी पार्टी के प्रवक्ता बन जाते हैं या फिर मुखबिरी करके लाभ उठाते हैं वे लोग ज्यादा खतरनाक हैं। बाजार तो हमेशा से समाज का हिस्सा रहा है,वह सहयोगी और सेवक रहे तब तक तो ठीक है लेकिन जब वह स्वामी बन जाता है तो प्रेस का लोक दायित्व भाव लड़खड़ा जाता है। उन्होंने कहा कि प्रेस काऊंसिल आज महत्वहीन हो चुकी है ऐसे में जरूरी है कि उसे समाप्त कर दिया जाए और प्रेस की स्थितियों पर नए सिरे से विचार करने के लिए तीसरे प्रेस आयोग का गठन किया जाए। प्रेस यदि साक्ष्य अधिनियम की तरह तथ्य आधारित संवाद करेगा तो उसकी विश्वसनीयता हमेशा कायम रहेगी। जनता की लोक मान्यताओं के आधार पर ही प्रेस को चौथे स्तंभ का दर्जा मिला हुआ है।

    आयोजन में दैनिक दोपहर मेट्रो के संपादक राजेश सिरोठिया और आईएनएच टीवी के ब्यूरो प्रमुख अजय त्रिपाठी ने भी स्वर्गीय देवलिया जी के संस्मरण सुनाए। आभार प्रदर्शन मुख्यमंत्री प्रकोष्ठ के जनसंपर्क अधिकारी अशोक मनवानी ने किया। आयोजन में स्वर्गीय देवलिया जी की धर्म पत्नी श्रीमती कीर्ति देवलिया और पुत्र आशीष देवलिया जी ने आनलाईन भागीदारी की। उनकी बेटियों सुश्री अरुणा और अपर्णा देवलिया भी आयोजन में शामिल थीं। समिति के पदाधिकारियों ने पुष्प गुच्छ भेंटकर अतिथियों का अभिनंदन किया। इनमें श्री राजेश सिरोठिया,राजीव सोनी,बृजेश राजपूत,ओपी दुबे,राकेश पाठक,आलोक-शैलजा सिंघई एवं अन्य पूर्व छात्र भी शामिल थे।