Tag: #balaji

  • घेरकर और घुसकर मारने वाला योद्धा बालाजी बाजीराव पेशवा

    घेरकर और घुसकर मारने वाला योद्धा बालाजी बाजीराव पेशवा

    बाजीराव मस्तानी फिल्म ने भारत के इस वीर योद्धा को एक बार फिर समझने का अवसर दिया है.

    -आलोक सिंघई-

    देश पर आक्रमण करने वाले लुटेरों से संग्राम का शंखनाद और उन पर फतह भारत भूमि के कण कण की विशेष पहचान है। इतिहास गवाह है कि जब जब विदेशी आक्रांताओं ने इसे हथियाने की जुर्रत की है उन्हें अंततः पराजित होकर भागना पड़ा है। अंग्रेजों, फ्रांसीसियों, पुर्तगालियों, मुगलों,अफगानों,यूनानियों के बीच से अनेक आक्रांता तरह तरह के रूप धरकर हिंदुस्तान आते रहे लेकिन हिंदुत्व की सहिष्णु परंपरा के बीच उन्हें या तो लौट जाना पड़ा या फिर यहीं की संस्कृति में ढलकर समाहित हो जाना पड़ा है। जब भारत की तरुणाई किसी शासक की असलियत जान जाती है तो फिर वह उसकी विदाई के लिए अपनी जान भी दांव पर लगा देती है। ऐसे ही एक बहादुर की कहानियां आज भी तरुणाई की रगों में चेतना का संचार कर देती है। वह वीर योद्धा था बालाजी बाजीराव प्रथम। बरसों तक इस वीर योद्धा की चेतना को षड़यंत्र पूर्वक मुगल शासकों की ऐतिहासिक गाथाओं के बीच दबाकर रखा गया। कोशिश की गई कि हिंदुत्व का तेज कहीं मुगल वंशजों को नाराज न कर दे।इसके पीछे वोट की वह राजनीति थी जो सत्ता पाने के लिए अनिवार्य मानी जाती थी। इसके बावजूद सूर्य का प्रताप, बादलों की ओट हमेशा के लिए तो नहीं ढांप सकती। अंततः इस वीर योद्धा की यशोगाथा एक बार फिर देश की चेतना को एकसूत्र में बांधने की सुरलहरियां लेकर सामने आ गई है।

    बालाजी बाजीराव पेशवा प्रथम को भले ही उनके ही परिजनों के आपसी द्वेष से जूझना पड़ा हो पर केवल बहादुरी और इंसानियत को अपना धर्म मानने वाले इस रणबांकुरे की सच्चाई अंततः सामने आ ही गई। उनकी बहादुर जीवन संगिनी यवन सुंदरी मस्तानी की प्रेमकथाओं ने आज की नई पीढ़ी को बेचैन कर दिया है। युवा मन ये सोचने को मजबूर है कि आखिर क्यों इस अविजित योद्धा को अपनी पारिवारिक कलह का दंश झेलना पडा।देश के वे क्या हालात थे जब इस तूफानी योद्धा की विजय यात्रा पर लू जैसे सामान्य रोग ने असमय ही विराम लगा दिया।

    हिंदुत्व की आधारशिला कहे जाने वाले ज्योतिष शास्त्र में ऐसे नक्षत्रों की जीवनयात्रा समझने के लिए भरपूर प्रकाश डाला गया है। इस पैमाने पर सहज ही समझा जा सकता है कि बालाजी बाजीराव पेशवा जैसे योद्धा को यदि अपने ही राजघराने या अपने ही देशज शासकों का सहयोग मिला होता तो भारत का इतिहास चीनी राजवंशों से कहीं बेहतर मुकाम छू चुका होता। अंग्रेजों ने भारत की चेतना को कुंठित करने का जो षड़यंत्र रचा आजादी के बाद के शासकों ने उसे जारी रखकर अंग्रेजों के नमक का कर्ज भरपूर चुकाया। अंग्रेजों की इसी रणनीति की वजह से पौंड की यात्रा तो बदस्तूर जारी रही लेकिन भारतीय रुपए की दुर्गति निरंतर जारी रही। आज जब नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा भारतीय मुद्रा के खिलाफ रचे गए जिन षड़यंत्रों को पलटने का प्रयास कर रही है तब बाजीराव बल्लाल जैसे योद्धा के संदेश को नए संदर्भों में तरोताजा करना जरूरी हो गया है।

    तेज दिमाग और कठोर कर्म की प्रतिमूर्ति बालाजी बाजीराव पेशवा दरअसल भारतीय प्रज्ञा की विशिष्ट पहचान रहे। जब दिसंबर 1737 में सिरोंज होते हुए भोपाल पहुंचे बाजीराव ने निजाम की मुगल सेना को चारों ओर से घेर लिया,उसकी रसद काट दी लगातार युद्धों से विशाल मुगल सेना को लाचार कर दिया तब 6 जनवरी 1738 को सीहोर के दोराहा में निजाम ने शाही मुहर लगाकर बाजीराव को मालवा,नर्मदा और चंबल तक का इलाका सौंपा और पचास लाख रुपए भेंट किए। इस युद्ध के बाद बाजीराव पेशवा का नाम पूरे हिंदुस्तान में स्थापित हो गया।समाजसेवी रवि चतुर्वेदी बताते हैं कई देशी विदेशी इतिहासकारों ने तब उन्हें लायन ऑफ इंडिया की उपाधि से विभूषित किया था। बाजीराव ने बीस वर्ष की उम्र में ये तय किया था कि जो विदेशी आक्रांता जहां से आए हैं उन्हें वापस वहीं तक खदेड़ना है। इस लक्ष्य को पाने में वे बड़ी हद तक सफल भी हुए। इसके बाद उन्होंने भारतीय संस्कृति के अनुरूप हिंदुस्तान गढ़ने का अभियान चलाया जो समय समय पर आज भी प्रकट होता रहता है।

    भारतीय स्वाधीनता संग्राम की कहानियों को ही भारतीय इतिहास साबित करने वाले षड़यंत्रकारियों ने 1720 से 1740 तक देश की अस्मिता स्थापित करने वाले पेशवा सरदार बाजीराव प्रथम के तेज को भुला देने की कोशिशें कीं। वामपंथी राजनेता जानते थे कि यदि हिंदुस्तान बाजीराव पेशवा की राह पर चल पड़ा तो विदेशी आक्रांताओं के उन वंशजों को हाड़तोड़ मेहनत करनी पड़ेगी जिन्हें लूटे हुए धन पर गुरछर्रे उड़ाने की लत लग चुकी है। यही वजह थी कि उन्होंने श्रीमती इंदिरा गांधी की मदद से धर्मनिरपेक्षता जैसे शब्द को संविधान में डलवा दिया। उनका प्रयास था कि सर्वधर्म समभाव जैसे संभ्रांत शब्द के सहारे वे अन्याय के खिलाफ उठने वाली हर आवाज को कुचलने में सफल हो सकते हैं। विशाल भारत की जनता अपने हक की आवाज बुलंद न कर सके इसके लिए उन्होंने गरीब नवाज की विचारधारा को कौमी सद्भाव की चाशनी में लपेटकर परोसा। वास्तव में ये गरीबी को संरक्षित करने का ऐसा षड़यंत्र था जिसने भारत को कर्ज आधारित इकानामी बना दिया। वो तो भला हो विश्व बैंक और एशियन डेवलपमेंट बैंक जैसी सूदखोर संस्थाओं का जिन्हें अपनी मूल राशि डूबती नजर आई और उसने आर्थिक सुधारों के नाम पर अपने प्रशिक्षित शासकों को सत्तासीन कराया। दस सालों तक डॉ.मनमोहन सिंह के रूप में देश को ऐसा शासक मिला जिसने कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को जमीनी दिशा दिखाई। इसके बावजूद खैराती लोकतंत्र को आत्मनिर्भर देश में बदलना उनके बस में नहीं था। कांग्रेसी तो आज तक इन आर्थिक सुधारों के खिलाफ जूते खोलकर पीछे पड़े हैं।

    नरेन्द्र मोदी के रूप में जब देश को ऐसा बेखौफ शासक मिला है जो विकास के नाम पर लूट के भौंडे षड़यंत्रों को बेनकाब करने में जुटा है तब बालाजी बाजीराव की चेतना एक नए रूप में उभरकर सामने आई है। मध्यभारत में बालाजी बाजीराव ने जिस सिंधिया परिवार को देश की पहचान स्थापित करने की जवाबदारी सौंपी थी उस परिवार के कुलदीपक ज्योतिरादित्य सिंधिया ने एक बार फिर देशविरोधी षड़यंत्रों के खिलाफ संघर्ष का शंखनाद किया है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए लूट की इबारत लिखने वाले कमलनाथ जैसे षड़यंत्रकारी को सत्ताच्युत करवाकर सिंधिया ने हिंदुत्व आधारित सशक्त भारत को बुलंद करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। कृषि में आर्थिक सुधारों के माध्यम से नरेन्द्र मोदी यदि भारत को आत्मनिर्भर बनाने का अभियान चलाए हुए हैं तो मध्यप्रदेश एक बार फिर बालाजी बाजीराव बल्लाल की पेशवाई का अधूरा स्वप्न साकार कर रहा है। इस अधूरे स्वप्न को साकार करके ही मजबूत भारत और सुखी भारत की स्थापना की जा सकेगी।

  • सिंधिया से ठलुए कांग्रेसी और बोगस भाजपाई दोनों खफा

    सिंधिया से ठलुए कांग्रेसी और बोगस भाजपाई दोनों खफा

    भोपाल,14 मार्च,(प्रेस सूचना केन्द्र)। मोदी अमित शाह की जोड़ी ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को राज्यसभा में भेजने का फैसला लेकर भारतीय राजनीति के परंपरावादी युग का अंत कर दिया है। इसके साथ ही चंद मुद्दों के इर्द गिर्द चकरघिन्नी बनी राजनीति की इबारतें भी वाशिंग मशीन के ड्रायर में रखे गीले कपड़ों के समान सींलन मुक्त होने लगीं हैं। इस एक अकेले मूव ने न केवल कांग्रेस बल्कि भारतीय जनता पार्टी के भी पिछलग्गू राजनेताओं को हतप्रभ कर दिया है। स्वर्गीय कुशाभाऊ ठाकरे ने कांग्रेसी राजनीति के शीर्ष दिनों में भी कर्मठ कार्यकर्ताओं की फौज जुटाकर जो संगठन खड़ा किया था वह आज सिफारिशी भाजपाईयों से भर गया है। चौदह सालों के शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में जो भाजपा चमचों की भी़ड़ बनकर रह गई थी वह सिंधिया के आगमन से उत्साहित तो है लेकिन उसमें भी भविष्य को लेकर संशय के स्वर उभर रहे हैं।

    लगभग बीस सालों तक कांग्रेस की राजनीति को शीर्ष मंच पर करीब से देखने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया का राजनीतिक प्रशिक्षण बहुत लंबा रहा है। बचपन से राजघराने में जन्म लेने के बाद आधुनिक राजनीति के पुरोधा स्वर्गीय माधवराव सिंधिया की सफल राजनीति को करीब से देखने वाले ज्योतिरादित्य को जनसेवा का पाठ अपने खानदान से मिला है। उनकी दादी स्वर्गीय विजयराजे सिंधिया ने जनसंघ से भारतीय जनता पार्टी में बदले एक नए राजनीतिक दल को अपने राजघराने की विरासत से पाला पोसा था। वीर शिवाजी जिस तरह आधुनिक महाराष्ट्र की राजनीति की पहचान रहे हैं। मध्यप्रदेश में यही पहचान आज भी बालाजी बाजीराव पेशवा द्वितीय की कर्मठता से है। परम प्रतापी राजा भोज द्वितीय के शासन की जो सुगंध मध्यप्रदेश के स्मृतिपटल पर आज भी अंकित है उसे चिरस्थायी बनाने का काम बालाजी बाजीराव पेशवा ने किया था। पेशवा ने ही ग्वालियर में सिंधिया वंशजों को सल्तनत सौंपी थी। इसके बाद सिंधिया घराने के कई राजाओं ने उस राजनीति को आगे बढ़ाया।

    राजमाता विजयाराजे सिंधिया इस राजनीतिक गौरव की मशाल लेकर ही राजनीति में आईं थीं। उनके ऐश्वर्य और विरासत से ईर्ष्या करने वाली श्रीमती इंदिरा गांधी ने सिंधिया राजघराने को मटियामेट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। लोकतंत्र और स्वाधीनता की दुहाई देकर अंग्रेजों की पिछलग्गू कांग्रेस का नेतृत्व करते हुए श्रीमती गांधी ने भारतीय राजनीति के तमाम ठिए ठिकानों को ध्वस्त करने का अभियान चलाया था। उनके कुछ सिपाहसालारों ने जिस तरह की कहानियां गढ़ीं उस पर अमल करते श्रीमती इंदिरागांधी ने सिंधिया सल्तनत को लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ी। एसपी बनाकर भेजे गए स्वर्गीय अयोध्यानाथ पाठक को लगातार सात गैलेन्ट्री अवार्ड इसी सोच का सबूत हैं। इस दमन चक्र का ही नतीजा था कि चंबल घाटी डकैतों के आतंक से थर्राती रही। श्रीमती विजयाराजे सिंधिया के निधन के बाद भी भारतीय जनता पार्टी ने चंबल में सामाजिक न्याय की बड़ी लड़ाई लड़ी। उमा भारती के नेतृत्व में बनी भाजपा की सरकार तक ये परंपरा जारी रही। शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली भाजपा ने डकैती उन्मूलन के नाम पर खेती को सिंचित करने का जो अभियान चलाया उससे न केवल चंबल बल्कि धार झाबुआ के आदिवासी अंचल में भी अपराधों का ग्राफ गिरा था।

    इस सबके बावजूद मध्यप्रदेश की राजनीति में आर्थिक विषयों के जानकार नेतृत्व की जरूरत महसूस की जाती रही है। ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपनी राजनीतिक पारी शुरु करने से पहले आधुनिक अर्थशास्त्र की जो तैयारी की वह अब तक चलती रही राजनीति में फिट नहीं बैठती है। कांग्रेस की राजनीति तो इसके लिए बिल्कुल ही बोगस है। कांग्रेस गरीबी को संरक्षित करने की जिस राजनीति के तहत समाज को बांटने की विचारधारा लेकर चलती है उससे मध्यप्रदेश कभी गुजरात जैसा या उससे भी आधुनिक राज्य नहीं बन सकता है। दिग्विजय सिंह का बंटाढ़ार शासनकाल रहा हो या फिर शिवराज सिंह चौहान का कर्ज लेकर खैरात बांटने वाला दीर्घ शासनकाल सभी में प्रदेश की जनता की भरपूर उपेक्षा की गई। योजनाओं के नाम पर खैरात बांटकर वोट खरीदने की इस शैली का अंत कभी न कभी तो होना ही था। ये पहल कौन करता। कमलनाथ को उद्योगपति के रूप में प्रचारित करने वाला वर्ग राजनीति की इसी पाठशाला से आता है। बैंकों से कर्ज लेकर घाटे के उद्योग स्थापित करने वाली फर्जी उद्योगपतियों की लाबी इस राजनीति की सूत्रधार है। इस राजनीति से देश को 5 ट्रिलियन डॉलर की इकानामी बना पाना किसी भी तरह संभव नहीं है।

    देश में धनाड्य राजनीति की इस उड़ान का पायलट कोई आर्थिक विषयों का जानकार ही हो सकता है। भाजपा के प्रवक्ता के रूप में काम करने वाले डायचे बैंक के पूर्व प्रबंध निदेशक जफर इस्लाम ने ज्योतिरादित्य सिंधिया में वे क्षमताएं देखीं और उन्हें भाजपा की राजनीति की तरफ मोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य किया। भाजपा को उनकी दादी राजमाता सिंधिया ने सिंधिया सल्तनत की बागडोर से सींचा था। उनकी बुआएं श्रीमती यशोधरा राजे सिंधिया और राजस्थान की मुख्यमंत्री रहीं वसुंधरा राजे सिंधिया ने इस विरासत को सहेजकर रखा था। यशोधरा जी जब मध्यप्रदेश की उद्योगमंत्री थीं तो उन्होंने विश्व भर में फैले औद्योगिक घरानों को प्रदेश से जोड़ने का सफल अभियान चलाया था। शिवराज सिंह चौहान को संरक्षण देने वाली लाबी को ये पसंद नहीं था और उन्होंने इस अभियान को धराशायी कर दिया।

    कांग्रेस हो या भाजपा दोनों में इंदिरागांधी के बैंकों के राष्ट्रीयकरण वाले अभियान से लूट करने वाले दलालों का वर्चस्व रहा है। इस लाबी को कमलनाथ अनुकूल लगते हैं लेकिन ज्योतिरादित्य खटकते हैं। कांग्रेस की सरकार बनाने में मध्यभारत से लगभग चौबीस विधायकों का साथ रहा है। ज्योतिरादित्य सिंधिया से जुड़े यही विधायक और पूर्व मंत्री आज कमलनाथ सरकार के पतन की वजह बन रहे हैं। मध्यप्रदेश को यदि देश की नई अर्थनीति के साथ कदमताल करना है तो उसे कमलनाथ सरकार से मुक्ति पाना ही होगा। कमलनाथ सरकार के पतन के बाद जो भी नेतृत्व उभरेगा उसमें सिंधिया का असर जरूर रहेगा। ज्योतिरादित्य सिंधिया को राज्यसभा में भेजने के बाद भाजपा चाहे नरेन्द्र सिंह तोमर को प्रदेश की कमान थमाए या फिर उमा भारती या कैलाश विजयवर्गीय को ,शिवराज, नरोत्तम मिश्रा या बीडी शर्मा कोई भी हो ये लीडरशिप प्रदेश में मोदी सरकार की नीतियों को लागू करने में सफल साबित होगी।

    जाहिर सी बात है कि कर्ज आधारित अर्थव्यवस्था की राजनीति की पैरवी करने वाले गमले में उगे राजनेता प्रदेश की साढ़े सात करोड़ जनता की अपेक्षाओं को अब तक पूरा नहीं कर पाए हैं। कमलनाथ तो छिंदवाड़ा के ही मुख्यमंत्री बनकर रह गए। उनके कार्यकाल में सरकारी क्षेत्र को जिस तरह लूट का अड़्डा बना दिया गया उससे जनता में भारी निराशा है। शिवराज सरकार की सारी कल्याणकारी योजनाओं को बंद करके कमलनाथ जिस सस्ती बिजली का ढिंडोरा पीट रहे हैं वह जनता के लिए मंहगा सौदा है। शिवराज सिंह चौहान की खैराती राजनीति की तरह ये भी मीठा जहर बनकर जनता को लुभा रहा है। जाहिर है कि ऐसे में आर्थिक विकास की मूलभूत राजनीति करने वालों का वर्चस्व बढ़ना इन ठलुओं और बोगस राजनेताओं को भला कैसे रुचेगा। वे भले ही खफा होते रहें लेकिन इतना तो तय है कि मध्यप्रदेश ने एक नई राजनीति की दिशा में अपने कदम बढ़ा लिये हैं। दिग्गी के चमचे इसे गद्दारी कहें या शिवराज विभीषण की उपमा दें लेकिन बदलाव की ये बयार फिलहाल थमने वाली नहीं है।

  • बाजीराव पेशवा ने आज जीता था नर्मदा से चंबल का राज्य

    बाजीराव पेशवा ने आज जीता था नर्मदा से चंबल का राज्य

    भारत के शेर ( द लॉयन आफ इंडिया) कहे जाने वाले बालाजी बाजीराव पेशवा की शूरवीरता के किस्से आज भी पूरी दुनिया में गूंजते रहते हैं। इसके बावजूद कम ही लोगों को मालूम होगा कि 7 जनवरी 1737 को सीहोर जिले के दोराहा में बाजीराव और निजाम के बीच संधि हुई थी। इसके साथ ही पेशवा को नर्मदा से चंबल तक का इलाका मिल गया था। दिल्ली से निजाम की अगुआई में मुगलों की विशाल सेना आई थी और दक्कन से बाजीराव की अगुआई में मराठा सेना निकली थी। दोनों सेनाएं भोपाल में मिलीं। 24 दिसंबर 1737 के दिन मराठा सेना ने मुगलों को जबरदस्त तरीके से हराया। निजाम ने अपनी जान बचाने के के लिए बाजीराव से संधि कर ली। इस बार 7 जनवरी 1738 को ये संधि दोराहा में हुई। मालवा, मराठों को सौंप दिया गया और मुगलों ने 50 लाख रुपए बतौर हर्जाना बाजीराव को सौंपे थे।

    दरअसल बाजीराव की सक्रियता इतनी अधिक थी कि उसकी फौज का मुकाबला करने से पहले ही विरोधियों को हार मान लेने में ही अपनी खैरियत नजर आती थी। बाजीराव ने दिल्ली पर जो आक्रमण किया और थोड़े ही समय में जो उत्पात मचाया उससे भयभीत होकर सभी मुगल सरदार दिल्ली में आ जुटे थे। मराठों को कैसे पूरी तरह नष्ट किया जाए इसी मुद्दे पर सभी रायशुमारी करते रहे। गरमागरम बहस के बीच सभी एक दूसरे को दोषी ठहराते रहे। तरह तरह के उपाय सुझाए गए अंत में तय हुआ कि ये काम निजाम को सौंपा जाए। जिस निजाम से सभी द्वेष रखते थे और उसे उखाड़ फेंकना चाहते थे उसी निजाम को आगे करके सभी ने दिल्ली में अपना दांव खेल दिया।

    जय सिंह को अपने पद से हटा दिया गया। निजाम के पुत्र गाजीउद्दीन को आगरा का सूबेदार नियुक्त किया गया। निजाम ने इस उत्तरदायित्व को सहर्ष स्वीकार किया। वह भी मराठों को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानता था और उन्हें नष्ट भी करना चाहता था। उसे एक तरह से दिल्ली के वजीर का ही पद थमाया जा रहा था। उसने सभी को आश्वासन दिया था कि वजीरी मिल जाने के साथ जब दिल्ली का खजाना भी उसकी पहुंच में होगा और विशाल सेना होगी तो वह बाजीराव को तो समाप्त कर ही देगा साथ में मराठों को भी धूल चटा देगा।

    निजाम ने अक्टूबर 1737को दिल्ली से प्रस्थान किया। उसके साथ तीस हजार की सेना थी जिसके पास बादशाही तोपखाना था। रास्ते में अनेक मुगल सरदार सेना के साथ उससे आ मिले। वह मालवा की ओर बढ़ने लगा। बाजीराव के गुप्तचर सभी ओर अपना काम बखूबी कर रहे थे। उन्हें दिल्ली की योजना का और निजाम की नियुक्ति का पूरा विवरण पता चल गया। उन्होंने भी अपनी व्यूह रचना बनाई और सैन्य तैयारियां कर लीं। महीना भर भी पूरा नहीं हो पाया था कि अक्टूबर के अंतिम सप्ताह में बाजीराव ने पुणे से रवानगी डाल दी। निजाम इस दौरान इटावा, कालपी, होता हुआ बुंदेलखंड पहुंच चुका था। वह धामौनी और सिरोंज होते हुए भोपाल पहुंच गया। उसने तय किया कि भोपाल में ही वह अपनी मुख्य छावनी रखेगा। यहां उसने सुरक्षित स्थान चुना जिसमें एक तरफ तालाब था और दूसरी ओर किला था।तीसरी तरफ छोटी सी नदी थी। बीच में विशाल मैदान था। यहां निजाम ने अपनी छावनी लगा ली। यहां बैठकर वह आसपास के इलाकों में छोटी बड़ी टुकड़ियां भेजना चाहता था। उसका प्रयास था कि वह मराठों को मालवा से बाहर निकाले ताकि उन्हें टुकड़ों में बांटकर हराया जा सके। उसकी ये रणनीति औंधे मुंह गिर पड़ी और मराठों ने ही उसे अपने व्यूह में फंसा लिया।

    निजाम ने अपने पुत्र नासिर जंग को नर्मदा के किनारे तैनात किया। किसी भी स्थान से बाजीराव नर्मदा न लांघ सके उसे ये जवाबदारी सौंपी गई थी। बाजीराव तो नए नए प्रयोगों का आदी था। उसने कब कहां से और कैसे नर्मदा नदी पार कर ली इसका अहसास नासिरजंग को नहीं हो पाया। वह हाथ मलते रह गया। आश्चर्य तो इस बात का था कि बाजीराव के पास हर बार की तरह इस बार छोटी सेना नहीं थी। इस समय पूरे अस्सी हजार सैनिक उसके साथ थे। बाजीराव होशंगाबाद होते हुए भोपाल पहुंचा। उसने निजाम की पूरी छावनी का नक्शा प्राप्त कर लिया था। अपनी व्यूह रचना में उसने तय किया कि निजाम की सेना को खाद्यान्न न मिल पाए।

    पूरी तरह आश्वस्त निजाम ने एक दो बार मराठों पर आक्रमण के लिए अपनी कुछ सेना भेजी। मराठे पूरी तरह सतर्क थे। उन्होंने आए दिन निजामी सेना को परास्त करना शुरु कर दिया। मराठों ने निजाम को चारों ओर से घेर लिया। सैनिकों को भोजन मिलना भी दुश्वार हो गया। सफदरजंग और कोटा नरेश ने निजाम को खाद्यान्न पहुंचाने का बहुत प्रयास किया लेकिन वे असफल रहे। जब वे अपनी सेना लेकर सहायता करने पहुंचे तो मल्हारराव होल्कर ने उन्हें बुरी तरह कुचल दिया। नासिरजंग ने भी अपनी विशाल सेना लेकर निजाम की सहायता का प्रयास किया लेकिन चिमाजी आप्पा न उसे हर जगह से मारकर भगा दिया। निजाम की सेना में धान्य मंहगा मिलने लगा। खाने के लाले पड़ने लगे। उसे लगा कि सेना विद्रोह न कर दे इसलिए उसने सेना को सिरोंज की ओर ले जाने की योजना बनाई। मराठों ने यह मार्ग भी घेर लिया और आक्रमण करके सेना को आगे बढ़ने से रोक दिया हालत ये हो गई कि सेना हर दिन युद्ध में ही उलझी रहती आगे की ओर नहीं बढ़ पाती। निजाम के पास पूरा तोपखाना था लेकिन मराठों की टुकड़ियां उसकी जद में ही नहीं आतीं थीं। तोपें नाकाम साबित हुईं और सेना उन्हें ढोने में ही लगी रही। यही वजह थी कि निजाम के सामने अंततः शरण में आने के सिवाय कोई उपाय बाकी नहीं बचा।

    दुराहा सराय के नजदीक निजाम ने बड़ा भारी शामियाना लगाया। यहां उसने बाजीराव और उसके सरदारों का सम्मान किया। दोनों पक्षों के बीच बातचीत हुई। तहनामा लिखा गया।नतीजतन बाजीराव को निजाम ने संपूर्ण मालवा बहाल कर दिया। उसके साथ साथ नर्मदा से लेकर चंबल के बीच का सारा इलाका बाजीराव के अधीन कर दिया गया। युद्ध के खर्चे की भरपाई करने के लिए निजाम ने आश्वासन दिया कि वह दिल्ली से पचास लाख रुपए दिला देगा।

    इस युद्ध में विभिन्न मराठा सरदारों ने अपना पराक्रम दिखाया। चिमाजी आप्पा ने नासिरजंग को खदेड़ा था। ठीक उसी प्रकार रघुजी ने शुजायत खान को धूल चटाई थी। यशवंतराव पंवार ने कोटा नरेश को दंड दिया और उससे दस लाख रुपए वसूले। शिंदे होल्कर,आवजी कवड़े, इन्होंने भी असाधारण शौर्य का परिचय दिया। बाजीराव ने उन्हें और अन्य सेनाधिकारियों का गौरव गान करके हरेक को पच्चीस हजार रुपए इनाम के तौर पर दिए। दिल्ली का बादशाह और अन्य सरदार निजाम को बहुत पराक्रमी मानते थे। वह स्वयं भी खुद को बहुत सफल सेना पति मानता था लेकिन भोपाल में उसे जिस तरह हार का मुंह देखना पड़ा उससे वह अंदर तक हिल गया और उसने मराठों से टकराने की अपनी शैली छोड़ दी।

    बालाजी बाजीराव पेशवा की ख्याति में चार चांद लग गए। देश विदेशों में उसके शौर्य धर्म की कहानियां सुनाई जाने लगीं। भारत भर के लोग बाजीराव को वीरों का मुकुटमणि मानने लगे। बाजीराव के परिवार में भी जो षड़यंत्र चलते रहते थे उनमें भी कमी आने लगी। षड़यंत्रकारियों को अब महसूस होने लगा कि बाजीराव के गुप्तचर कभी भी उनकी चालबाजियां धराशायी कर सकते हैं। इस तरह कई नजरियों से निजाम पर मराठों की ये विजय प्रशासनिक सफलताओं की वजह बन गई। इसी ने आगे चलकर मराठा साम्राज्य की वो इबारत लिखी जो लंबे समय तक क्षेत्र में शांति और विकास का अविरल झऱना साबित हुई।

    प्र.ग.सहस्त्रबुद्धे की पुस्तक बाजीराव महान से साभार