Category: आमुख आलेख

  • संघ को साकार करने वाला जाणता राजा

    संघ को साकार करने वाला जाणता राजा


    -आलोक सिंघई-
    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी स्थापना के कार्यकाल से ही समाज को संपूर्णता की ओर ले जाने का प्रयास करता रहा है। गद्दारी, परिवारवाद और अवसरवादिता ने उसे जितना बदनाम करने की कोशिश की वह दिन ब दिन निखरता चला गया। लाखों करोड़ों स्वयंस्वकों ने अपमान, कलंक और दुत्कार सहकर भी प्रखर राष्ट्रवाद की ज्वाला को लगातार जलाए रखा। ऐसे सैकड़ों स्वयंसेवकों को हम अपने आसपास देख सकते हैं जिन्होंने त्याग और तपस्या के उदाहरण प्रस्तुत किए और समाज के लिए जीते जागते मॉडल बन गए। स्व. अनिल माधव दवे उसी परंपरा के एक जाज्वल्यमान नक्षत्र रहे हैं। जीते जी उन्होंने जितने देशभक्तों को प्रेरित और प्रोत्साहित किया विदाई की बेला में वे उससे कई गुना अधिक चुंबकीय आकर्षण लेकर उपस्थित हुए। सौम्य व्यक्तित्व के धनी और प्रखर मेघा का तेज लिए हुए इस जाणता राजा के व्यक्तित्व को जितने नजरियों से तौला जाए उनके हिस्से वाला पलड़ा हर बार भारी साबित होता है।

    संघ से विदा लेकर जब वे राजनीति के क्षेत्र में उतरे तो उनसे मिलने वालों को हरदम यही आशा रही कि वे कभी मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री होंगे और प्रदेश को नई ऊंचाईयां प्रदान करेंगे। इसकी वजह भी थी कि वे कई बार मुख्यमंत्री बनाने का काम सहजता से कर चुके थे। जब प्रदेश में कांग्रेस के भ्रष्टतम शासनकाल की कालिख प्रदेश वासियों को बैचेन किए हुई थी तब भाजपा के थिंक टैंक जावली से ही दिग्विजय सिंह के लिए बंटाढार शब्द निकला। ये शब्द जनता की जुबान पर चढ़ गया और मतदाताओं को अपना फैसला करने में आसानी हुई। उस दौरान कांग्रेस की शासनशैली को इतनी बारीकियों से जनता के सामने प्रस्तुत किया गया कि लोगों ने समझ लिया कि कांग्रेस अपनी उम्र पूरी कर चुकी है।आज जब देश को कांग्रेस मुक्त करने की बात कही जाती है तो लोग इसे शेखचिल्ली का सपना कह देते हैं। उन्हें जरा भी भान नहीं कि उनकी सत्ता की चूलें उनके कुकर्मों ने किस तरह ढीली कर दीं हैं। देश की युवा पीढ़ी जब अराजकता फैलाने वालों की तुलना संघ के तपोनिष्ठ स्वयंसेवकों से करते हैं तो वे किसी प्रलोभन में आए बिना अपनी राह खुद चुन लेते हैं।

    स्व. अनिल दवे भाजपा के वे नगीने थे जिन्हें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बुलाकर मंत्री बनाया और अपने सहयोगी के रूप में उनका मार्गदर्शन प्राप्त किया। आज यदि देश में नदियों को विकास का इंजन बनाने का अभियान चल रहा है तो उसके पीछे स्व. अनिल दवे की ही सोच काम कर रही है। असम में नमामि ब्रह्मपुत्र अभियान, उत्तर प्रदेश में गंगा सफाई अभियान ऐसे ही उपक्रम हैं जो न केवल प्रदेशों को आत्मनिर्भर बना रहे हैं बल्कि पर्यावरण को संवारने में भी बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। मध्यप्रदेश में नमामि नर्मदे अभियान को फिजूलखर्ची बताने वाले कई ओछे राजनेता बदलाव की इस कुंजी को घूरा समझ रहे हैं जबकि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इसे बदलाव की बयार बना डाला है। अपने व्यस्ततम समय में बदलाव करके श्री चौहान ने न केवल नर्मदा के तटों पर फैली विशाल आबादी से सीधा संपर्क स्थापित किया बल्कि उन्होंने इस क्षेत्र में भारी निवेश को भी न्यौता दे डाला है। मध्यप्रदेश आज गेहूं के उत्पादन में तो सिरमौर हो ही चुका है, साथ में अब वह कृषि उत्पादों की विशाल श्रंखला का भी सरताज बनने जा रहा है। ये बदलाव न केवल नर्मदा के तटों से शुरु हो रहा है बल्कि प्रदेश की तमाम नदियों के किनारों पर भी पुष्पित हो रहा है। जो लोग नर्मदा घाटी की क्षमताओं से परिचित नहीं हैं वे इसे बहुत हल्के में ले रहे हैं लेकिन नर्मदा घाटी का करीब से अध्ययन कर चुके अनिल दवे काफी पहले यहां की परिस्थितिकी की क्षमता का आकलन कर चुके थे। आजादी के बाद उत्पादकता बढ़ाने के सैकड़ों प्रयोग हुए हैं। औद्योगिकीकरण की मंहगी लागत के बाद भी देश को उसका फल नहीं मिल सका है। इसकी तुलना में नदी घाटों को संवारने की सोच कितनी तेजी में अपना असर दिखा रही है ये कृषि जिन्सों की बढ़ती पैदावार से सहज की महसूस किया जा सकता है।

    आजादी के बाद कांग्रेस की अराजक राजनीति ने देश के लोगों को जितना गैरजिम्मेदार बनाया उसके चलते शासन करना किसी भी लोकतांत्रिक राजनेता के लिए बहुत कठिन हो गया था। कांग्रेस के शासक वे चाहे प्रधानमंत्री हों या मुख्यमंत्री सभी लुभावनी घोषणाओं का जाल फेंककर लोगों को कर्ज के दलदल में धकेलते रहे हैं। भाजपा के सामने भी यही चुनौती थी कि फोकटबाजी की अभ्यस्त जनता को वह कैसे सबल राष्ट्र बनाने की ओर ले जा सके। ये काम अचानक संभव नहीं था। आज जिस तरह नोटबंदी के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को आरोपों और चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है इतना प्रतिरोध कोई आम राजनेता झेल ही नहीं सकता था। स्व. अनिल दवे ये बात काफी पहले समझ चुके थे। इसलिए उन्होंने उन्हें मुख्यमंत्री बनाने वाली हर आवाज को नर्मदा के घर तक ही सीमित कर दिया। उन्होंने जब सुश्री उमा भारती की सरकार का हश्र देखा तो समझ लिया कि इतना गरिष्ठ पकवान खाने की आदत न तो प्रदेश के उद्योगपतियों को है और न ही प्रदेश का मीडिया इतना समझदार और सक्षम है कि वह ढर्रेबाजी को अनुशासित कर सके। इसलिए उन्होंने मध्यमार्ग पर चलने वाली शिवराज सरकार को ही भाजपा का चेहरा बनाए रखने का सूत्र दिया।

    शिवराज सिंह चौहान की भाजपा सरकार कांग्रेस की ही नीतियों पर चलने वाली सरकार साबित हुई और जिसने जनता के प्रतिरोध को बहुत हद तक शांत बनाए रखा। ये जादू शिवराज सिंह चौहान जैसा शांतचित्त और सेवा भावी राजनेता ही कर सकता था। भाजपा के भीतर से भी कई बार आवाजें उठीं कि ये सरकार भाजपा के बधियाकरण का प्रयास कर रही है। कांग्रेसियों को बेवजह स्पेस दिया जा रहा है। भाजपा की नीतियों को ताक पर धर दिया गया है। इस तरह की आवाजों के बीच शिवराज सिंह चौहान अनवरत जनता की योजनाओं को लागू करते चले गए। हालांकि कई बार चर्चा के दौरान अनिल दवे ने अपनी बैचेनी भी जाहिर की लेकिन उनका मानना था कि इससे बेहतर मार्ग फिलहाल कोई दूसरा नहीं हो सकता। जातियों और संप्रदायों की राजनीति के आदी हो चुके लोगों को पहले तो ये महसूस कराया जाए कि भाजपा सरकार उनके साथ भेदभाव नहीं करती है। कमोबेश उनका ये अनुमान सही भी साबित हुआ। आज शिवराज सिंह चौहान जिस तरह समाज के सभी तबकों में स्वीकार्य हैं ये अनिल दवे जैसे कुशल रणनीतिकार की ही देन थी। भाजपाईयों को कभी गांधी विरोधी और सांम्प्रदायिक होने का लेबल लगाकर बदनाम किया जाता था लेकिन गांधी मार्ग का अनुसरण करके अनिल दवे की रणनीति ने वो षड़यंत्रकारी लेबल उतार फेंका। वीर शिवाजी की छापामार शैली को लोकतांत्रिक राजनीति के मंच पर साकार करने वाले अनिल दवे आज हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनके सन्मार्ग पर चलकर टकराव टालने वाली सोच निश्चित तौर पर देश को एक मजबूत राष्ट्र की ओर ले जाएगी। उन्होंने अपनी पारी बखूबी खेली अब उनकी पगडंडी को राजमार्ग बनाना अगली पीढ़ी के नेताओं की जिम्मेदारी है।
    (लेखक जन न्याय दल के प्रदेश प्रवक्ता भी हैं)

  • सत्ता और सेक्युलर के नाते की अंतिम सांसें

    सत्ता और सेक्युलर के नाते की अंतिम सांसें

    (रा.स्व.सं, भाजसं से भाजपा तक)
    भरतचन्द्र नायक…

    ‘‘सूख हाड़ ले जात सठ स्वान, निरखि मृगराज’’ लंपटीय तासीर सत्ता लोलुपों का स्वभाव आदि काल से व्यवहार में देखा सुना गया। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से प्रेरित संगठन की प्रेरणा का यहीं जन्म होता है। अंगे्रजों ने बांटो और राज करो की मंषा से भारतीय समाज के विखंडन के बीज बोये। 1925 में राष्ट्र को एकता के सूत्र में गुंथित करने का अनुष्ठान आरंभ हुआ। समय ने करवट ली। भारत को आजादी मिली। लेकिन सत्ता में आने के साथ समाज को फिरकों में बांट कर तुष्टीकरण को परवान चढ़ाना सत्ता मठाधीशों ने मूल मंत्र अपना लिया। आवश्यकता ही अविष्कार की जननी होती है। राष्ट्रवादी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने सांस्कृतिक गतिविधियों के विस्तार के लिए संगठन का जब विस्तार किया, जाति विहीन, राष्ट्र को समर्पित युवा शक्ति को एकता के सूत्र में पिरोने का संगठित प्रयास सफलता की सीढ़ियां चढ़ने लगा। तत्कालीन मठाधीशों की भुकुटियां तन गयी। संगठन को कुचलने की चेतावनियां मिली। लेकिन राष्ट्रवाद के प्रसार में न साहस थका और न कदम पीछे रहे। जैसे-जैसे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पौधे को सींचा और उसका विस्तार हुआ इसकी छवि देशव्यापी बनती गयी और विदेशों में भी रा.स्व.सं. की चर्चा शुरू हो गयी। मजे की बात यह कि जैसे-जैसे संगठन का कलेवर विस्तृत हुआ, इसके विरूद्ध गलत अटकलबाजियां फैलाना सत्ता और सत्तोन्मुख तत्वों का शगल बन गया। संघ को शंका की दृष्टि से देखा जाने लगा। इसी का नतीजा था कि बार-बार सांस्कृतिक राष्ट्रवादी संगठन को कठघरे में में खड़ा किया गया। न्यायिक आयोग बने संगठन ने सामना किया और न्याय, नीति, नीयत की कसौटी पर संघ ने अपनी सांस्कृतिक धर्मिता की पवित्रता सिद्ध की। उसे क्लीनचिट मिली। लेकिन शंकालु होना सत्ता का स्वभाव है। यही सत्ता लोलुपता प्रपंच गढ़ती है। सांच को भी आंच पहुंचाती है। राजा इन्द्र ने इसी ईष्र्यावश कितने ऋषि मुनियों को लक्ष्य से भटकाने की कोशिश की। षड़यंत्र अतीत के साक्षी है। लेकिन स्वभावगत जो विफलता लगती है कि इन षड़यंत्रों की पोल खोलने का संघ ने प्रयत्न यदा कदा ही किया। जन भ्रम निवारण करने के लिए संघ ने जो खिड़की अब खोली है, उससे बहुत हद तक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को आहत करने वाले तत्वों के सिर से नकाब उतरा है।
    हाल के दौर में जब-जब सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का ज्वार आया तथाकथित सेकुलरवादियों ने शक्ति भर भ्रम फैलाया। सम्मान लौटाकर विरोध करने वालों की पोल तो हाल में खुल गयी, जब कांगे्रस ने जुमे की नमाज पढ़ने तक के लिए अवकाश की घोषणा कर ली। साम्प्रदायिकता के बीज बोकर सेकुलरवाद का जश्न मनाना आज एक राजनैतिक फैशन बन गया है। भारतीय समाज का यह दुर्भाग्य है कि कांगे्रस और उसके साथी संगी सेकुलरवाद की मनमाफिक परिभाषा गढ़ते, समाज को छलते और साम्प्रदायिकता का विस्तार करते है। इससे देश और समाज भले कमजोर हो, इनकी निगाह महज वोटों और सत्ता पर केन्द्रित होती है। लेकिन साम्प्रदायिक हथकंडा का मर्म अब अल्पसंख्यक भी समझ चुके है। सेकुलरवादी अल्पसंख्यकों के हमदर्द नहीं उनकी चातकी दृष्टि सिर्फ वोटों पर है। अल्पसंख्यक प्रेम उनके लिए समाज के संगठित होने, कौम की तरक्की का साधन नहीं केवल सत्ता के लिए साध्य है।

    बाबरी मजिस्द विवाद के मुख्य पक्षकार हासिम अंसारी उत्तर प्रदेश की राजनीति के ऐसे चेहरे रहे है जो आगे बढ़ते थे तो सियासी तूफान आता था। अपने जीवन के आखिरी पड़ाव में हासिम अंसारी साहब ने फरमाया कि देश को नरेन्द्र मोदी जैसे नेताओं की जरूरत है। आजादी के बाद नरेन्द्र मोदी पहला शख्स है जिसने साफ सपाट बात की। उन्होनें ही मुस्लिम समाज से गुजारिश की कि विकास और न्याय का ढिंढ़ौरा नहीं पीटता, लेकिन साथ लेकर चलता है। मजे की बात यह है कि हासिम अंसारी की राम मंदिर विवाद के महंत रामचन्द्र दास से गहरी दोस्ती थी। लेकिन दोस्ती में मंदिर-मजिस्द विवाद आड़े नहीं आया। मुसलमान कौम ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर भरोसा जताया है, साथ ही संघ परिवार की मुसलमानों के साथ की गयी पहल सराही गयी। क्योंकि यहां सब एक मन होकर मुल्क की खिदमत का पैगाम है, वोटों की मारा-मारी नहीं है। जिन अल्पसंख्यकों को खौंफजदा करके कांगे्रस सहित सहयोगी दल उनके वोटों से सत्ता हासिल करने में कामयाब होते रहे है। संघ परिवार से उनके जुड़ाव ने सेकुलरवादियों के ताजिये ठंडे कर दिये है। संघ के वरिष्ठ प्रचारक इंद्रेश कुमार ने अल्पसंख्यकों को भरोसे में लेते हुए कहा कि मुल्क के 25 करोड़ मुसलमानों के बिना भारतीयता अधूरी रहेगी। उन्होनें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इफ़्तार जलसा कर दुनिया के मुस्लिम नेताओं को दावत दे डाली। यथार्थ में देखा जाये तो भारतीय जनसंघ से लेकर भारतीय जनता पार्टी के विकास तक अल्पसंख्यकों से रिश्तों में न तो खटास और न तकरार हुई। यह भी एक यर्थाथ है कि तकरार करने का रसायन पं. नेहरू के वक्त ही तैयार हो गया था, जब उन्होनें बाबरी मजिस्द की ताली फेंक दी और राजीव गांधी ने ताला खुलवा दिया। वास्तव में मुसलमानों से राष्ट्रवादी समुदाय का मेलजोल 9 जुलाई 1966 को ही शुरू हो गया था, जब अटलजी ने दिल्ली शाहजहांनी जामा मजिस्द के सामने अवाम के संपादक अनवर देहलवी को अपना प्रत्याशी बनाया था। अनवर देहलवी जनसंघ के खुर्राट नेता हुए और आज भी जनसंघ के कारपोरेटर के रूप में उनकी सेवाएं याद की जाती है। जहां तक संघ, जनसंघ और भाजपा का ताल्लुक है, इमाम उमर इलियासी जो कि भारत की 5 लाख मस्जिदों की आॅल इंडिया इमाम आॅर्गेनाईजेशन के अध्यक्ष है, का कहना है कि नफरत के बीज बोकर कोई मिठास वाले फल की उम्मीद नहीं की जा सकती। यह इंसानियत का उसूल है गढ़े मुर्दे उखाड़कर सियासत हो सकती है, मुल्क अवाम की भलाई नहीं कर सकते। लोग कहते है कि गर केन्द्र में भाजपा आयी तो अल्पसंख्यक मुसीबत भोगेंगे। लेकिन आशंका को अटल जी ने तो झुठलाया, नरेन्द्र मोदी ने आगे बढ़कर टीम इंडिया कहकर सबको गले लगाया है। आरक्षण को लेकर सर संघचालक और प्रचार प्रमुख का मानना है कि कौम को विकास की मुख्यधारा में लाना है। आरक्षण कोई खैरात नहीं एक रास्ता है, जिसे कायम रहना है लेकिन यह भी सोचने की बात है कि यह फिरका परस्ती को जारी रखने में सहायक बनता है। जब तक जाति पांति अवसर का पेरामीटर रहेगा, जातिविहीन भेदभाव रहित एक रस समाज की कल्पना क्लिष्ट बनी रहेगी। हिन्दू होने के रस का आस्वादन भली प्रकार संभव नहीं होगा।

    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर भ्रांतियों का जाल फैलाने की मुहिम अब गड़रिया की टेर बनकर अनसुनी बन रही है। गड़रिया भेड़ें चराता है और मस्ती में गांव वालों को पुकारता कि शेर आ गया। गांव वाले परेशान हो गये। लेकिन जब शेर आया तो किसी ने गड़रिया का रूदन नहीं सुना। सत्ता और सेकुलकर का नाता अंतिम सांसे ले रहा है। सेकुलरिज्म का छद्म जनता समझ चुकी है। जन-जन समझता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा इंसानियत को जोड़ने वाली शक्ति है, इसका उद्देश्य समाज में सकारात्मकता लाना है, जिसे कोई भी नकारात्मक ताकत हानि नहीं पहुंचा सकती। यही कारण है कि शाखाओं का देश में ही नहीं विदेशों में भी विस्तार हो रहा है। युवाओं में संस्कृति, परंपरा, संस्कार, इतिहास, राष्ट्र भाव जगाने के केन्द्र के रूप में शाखा पुनीत गुरूकुल बनती जा रही है। इसमें उम्र का, जाति-पांति, सम्प्रदाय का कोई फर्क नहीं है। 18 वर्ष से कम आयु के लिए बाल भारती, बाल गोकुल संकुल है। विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों के युवकों के लिए शाखा बौद्धिक विकास, शारीरिक शौष्ठव के केन्द्र है। संघ द्वारा देश भर में 32 हजार 400 संस्थानों पर 50 हजार से अधिक शाखाएं लगायी जा रही है। 12 हजार 32 साप्ताहिक मिशन कार्यक्रम, 7233 मासिक मिशन कार्यक्रम चल रहे है। मजे की बात यह है कि एक मां ने जब बच्चे को संघ में जाकर राष्ट्रीय संस्कारों से संस्कृत होकर देखा तो राष्ट्र सेविका समिति की पे्ररणा मिली। आजादी के पूर्व ही राष्ट्र सेविका समिति को मौसी लक्ष्मीबाई केलकर ने जन्म दिया, जो पुष्पित फलित पल्लवित हो रही है, अपनी अस्सी वर्षीय यात्रा में संघ के संस्कारों का बीजारोपण कर नारीशक्ति का प्रस्फुटन किया है।

    जहां तक मुस्लिम बच्चों को संस्कारित करने का सवाल है, संघ के स्कूलों में 4700 मुस्लिम बच्चे संस्कारित हो रहे है। देशभर में 12364 विद्यालय बाल भारती के है, इनमें मुस्लिम बच्चे खुशी-खुशी प्रवेश पाते है। कश्मीर सहित सभी राज्यों में विद्या भारती के स्कूल है और इनमें 270 मुस्लिम आचार्य कार्यरत है। हिन्दुत्व के इन संस्कार केन्द्रों में एक सौ से अधिक ईसाई आचार्य भी है, जो हिन्दुत्व के संस्कारों को आगे बढ़ा रहे है। हिन्दू होने का एक अपना रस है, क्योंकि यहां इस्लाम का सम्मान करने की सुविधा है। कुरान और वाईविल को पवित्र कहने की सद्भावना विराजमान है। हिन्दू होने के कारण ही हम दुनिया की सारी आस्थाएं स्वीकार करके आल्हादित होते है। हिन्दु होकर आस्तिक रह सकते है और नास्तिक भी बने रह सकते है। ऐसा इसलिए है कि यहां नफरत हिंसा तुल्य मानते है। सहिष्णुता असीम है। हिन्दु होकर विवेक का इस्तेमाल कर सकते है। हिन्दु होने का एक आनंद यह भी है कि भौतिकवादी हो सकता है। आध्यात्मिक होने की छूट है, आस्तिकता से संतुष्ट होते है, इसलिए अंधविश्वास काफूर हो जाता है। अब विचारणीय प्रश्न यह है कि जो असहिष्णुता का इल्जाम लगाते है, वे कितने सहिष्णु है।

  • बाजारवाद ने बढ़ाई उपभोक्ता की चेतना

    बाजारवाद ने बढ़ाई उपभोक्ता की चेतना


    – भरतचन्द्र नायक
    इतिहास और परंपराओं में जीवन का सत्व छिपा होता है, यह सबक की चीज है। इसमें लोकनायक के नायकत्व का स्थान आचार, विचार, व्यवहार भविष्य के लिए सीख देता है। लेकिन जब लोकनायक का स्थान बाजारवाद महानायक का मुखौटा लगाकर ले लेता है तो सुधार, स्थिरता, परंपरा की प्रक्रिया स्थगित हो जाती है और हम महानायक के साथ कदम बढ़ाकर आत्ममुग्ध होकर बाजारवाद की गिरफ्त में आ जाते है। लोकनायक और महानायक की इस स्पर्धा में हमें महानायक भाता है। इसका फर्क समझने के लिए लोकनायक जयप्रकाश और महानायक अमिताभ बच्चन प्रतीक बन चुके है। दोनों परिवर्तन के संवाहक है। लेकिन चलन में आज महानायक है, जो उपभोक्ता वस्तुओं की छवि ढ़ो रहा है। चाहे फिल्मी अभिनेता होे, क्रीडागंन में खिलाड़ी हो, इनके नाम से उपभोक्ता ललचा जाता है और उपभोक्ता चाहे-अनचाहे उत्पाद अपनी झोली में भरता है, जेब खाली करता है। खाद्य पेय वस्तुओं के गुण-अवगुण का अनुसंधान करने के बजाय हम अपनी सेहत का सौदा कर रहे होते है। समाज में रोग व्याधि बढ़ने का आमंत्रण अनायास मिलता है।
    उपभोक्ता बाजारवाद की गिरफ्त में इस बात का भी विचार नहीं कर पा रहा है कि खाने-पीने की वस्तुएं तो सेहत को शिकार बना रही है, सौंदर्य प्रसाधन जो सामाजिक प्रतिष्ठा दिलाने के संसाधन बन चुके है, वे भी बीमारी को आमंत्रण दे रहे है। आॅनलाईन से जिस खरीद योजना की पूर्ति मिनटों में हो जाती है, उसमें यह जानने का भी वक्त नहीं है कि भोजन में मिलावट और प्रदूषक का कौन सा तत्व हमनें उदरस्थ करने का तामझाम जुटा लिया। मजे की बात यह है कि नववर्ष जैसे मांगलिक अवसर पर ही हम मिलावटी भोजन, पेय पदार्थों और प्रसाधन सौंदर्य के उत्पादों का सेवन कर प्रफुल्लित होने का स्वांग कर रहे होते है। सवेरे-सवेरे चाय की चुस्कियों का आनंद सभी लेते है, लेकिन वे अंजान है कि चाय कि पत्तियों के अर्क के साथ वे लौह कण भी निगल रहे है जो यदि परिमाण से अधिक हो गये तो उदर रोग होने की गारंटी देते है। पत्तियों को सूखाने के बाद चायपत्ती पर चलाने वाले रोलर से ये कण चाय में छूट जाते है, जो छन्नी द्वारा भी बाहर नहीं किये जा सकते। फलों को पकाने के लिए रसायन कार्बाईड कंपाउन्ड का इस्तेमाल प्रतिबंध के बाद भी धड़ल्ले से किया जा रहा है। प्रतिबंधित केल्शियम कार्बाईड में जब रासायनिक क्रिया होती है तो ऐसे तत्व तैयार होते है जो कैंसर रोग के लिए जमीन तैयार करते है। इसी तरह फल, सब्जी की अच्छी ग्रोथ लेने के लिए लालच में आक्सीटोसिन का उपयोग किया जाता है। इस तरह उत्पादित फल, सब्जी खाने से हृदय रोग, सिर दर्द, बांझपन पनपने के साथ याददाश्त भी क्षीण हो जाती है। चांदी के बर्क को मिठाई की शान माना जाता है। आकर्षक शोकेस में सजी मिठाईयां देखकर मुंह में पानी आ जाता है। लेकिन कोई नहीं जानता कि यह चांदी का बर्क पशु की आंत से बनी शीट पर रखकर कूटने के बाद बनता है। इस प्रक्रिया पर भी प्रतिबंध है, लेकिन प्रक्रिया रूकी नहीं है। दूसरी तरफ चांदी की जगह एल्युमीनियम का उपयोग करना हमारी वणिक बुद्धि में शुमार है। दूध तो भोजन में अमृत तुल्य है। लेकिन हमें नहीं मालूम कि इसमें क्या मटेरियल इस्तेमाल किया जा रहा है। कहीं यूरिया तो कहीं चाक का इस्तेमाल कर दूध बनाया जाता है, जो केवल स्वास्थ्य के लिए हानिप्रद ही नहीं होता अपितु संक्रमित होने से कई विकृतियों को जन्म देता है। लेकिन हम विज्ञापन पढ़ने के बाद उपयोग कर रहे दूध को कामधेनु उत्पाद मानकर मंुह मांगा दाम चुकाते और बीमारी खरीद रहे होते है।
    आर्गेनिक फूड एक सुरक्षित विकल्प होता है, लेकिन इस मंहगाई के दौर में आॅर्गेनिक फूड तक पहुंच पाना आम आदमी के लिए दिवा स्वप्न बन गया है। फिर हमारे हाट में शुद्धता, प्रामाणिकता मानव उपकार की वस्तु नहीं दाम बढ़ाने की पक्रिया में गिनी जाने लगी है। उपभोक्ता फोरम में कई मामले आते रहते है, लेकिन न तो इस प्रक्रिया में कहीं वास्तविक रोक लगी है और न ही इसके विरूद्ध कार्यवाही कोई निश्चित अंजाम तक पहंुची है। बाजारों में विज्ञापनों में महानायक की तकरीर को ही शुद्धता ओर स्वास्थ्य की कसौटी मानकर हम ठगे जाने को बेताब है। खाद्य पेय पदार्थों में खतरे जुटाना हमारी तरकीब बन चुकी है। इसी कारण अब भारत में कुपोषण सिर्फ गरीबों तक सीमित नहीं रहा है। भारत की गिनती दुनिया के सबसे कुपोषण ग्रस्त देशों में करने में हमने सारी शक्ति झौंक दी है। खेत-खलिहान से लेकर बाजार तक पहुंचानें में खाद्य पेय पदार्थों को प्रदूषित, मिलावटी बनानें में सहयोग करने का पूरा चक्र बन चुका है। मानव जीवन के साथ खिलवाड़ इस व्यापार में लगे लोगों का पुनीत कर्मकांड बन जाना वास्तव में राष्ट्रीय चेतना का मृत प्राय हो जाना है। इसमें कानून का लाचार होना, प्रवर्तन तंत्र का लालची होना और उपभोक्ता जागरूकता के अभाव में इस मिलीभगत के प्रति तदर्थवाद की प्रवृत्ति भी कम दोषी नहीं है। कभी-कभी और कहीं-कहीं जब ग्वाले की केन में से अतिरिक्त दूध खरीद लिया जाता है तो ग्वाला शरमाये बगैर ही उतना पानी उपभोक्ता के नल से भरकर अपनी केन में उड़ेल लेता है। उसे से तो बस कमाई से मतलब है। दूसरे के स्वास्थ्य का क्या होगा यह चेतना आजादी के बाद तो कमोवेश हमारी तासीर से जा चुकी है। कहने की बात तो यह है कि मिलावट की रोकथाम में सरकार की जिम्मेदारी है। उपभोक्ता मंच की भूमिका कम नहीं है, लेकिन जो कंपनियां प्रतिष्ठान है उनकी भी गंभीर जिम्मेदारी है। उपभोक्ता की सेहत का सौदा कर ये प्रतिष्ठान समाज में प्रतिष्ठा भी पाते है और दसवीर की सूची में अपना नाम दर्ज कराते है। अन्यथा क्या कारण है कि चंद दिनों में इनका एम्पायर खड़ा हो जाता है और राजनेता इनके इर्द-गिर्द मंडराने लगते है।
    मानव जीवन के प्रति संवेदना का घोर अभाव परिलक्षित हो रहा है। इससे बड़े आश्चर्य की बात यह है कि मानक ब्यूरों भी खाद्य पदार्थों, उनके कंटेनरों और बोतलों में विषैले रसायनों के प्रति सचेत नहीं है। हमारा जीवन प्लास्टिक युग में प्रवेश तो कर गया है लेकिन प्लास्टिक की गुणवत्ता और प्रामाणिकता के बारें में मानक ब्यूरों, उपभोक्ता मंच और जनता बेपरवाही का सबूत दे रही है। भारतीय सादे मिजाज के होने के कारण खाद्य पेय, सौंदर्य प्रसाधन बनाने वाली कंपनियों को उनके दायित्वों के प्रति विवश करने मंे अपने को समर्थ नहीं पाते। सिर्फ यह शिकायत करते है कि वे बीमारी से विकृति से ग्रस्त हो रहे है, जबकि उनका खान-पान स्तर का है। लेकिन वे इस बात को जानने की जेहमत नहीं उठाते कि पता लगाये कि उनके उपयोग में आ रहे उत्पाद शैम्पू, क्रीम, पाउडर, डियोडरेंट गुणवत्ता विहीन और नकली तो नहीं है। विज्ञापन बाजी देकर चकाचैंध में हम झूठी प्रतिष्ठा, झूठी शान में स्तरहीन, नकली उत्पादों का सेवन कर खुद रोग व्याधियों को निमंत्रण दे रहे है। उपभोक्ता मंचों की उपयोगिता पर यह एक प्रश्नचिन्ह है।

  • नीयत, नीति और नेता का नेकपन

    नीयत, नीति और नेता का नेकपन

    bharatchandra nayak
    भरतचन्द्र नायक….

    इतिहास बड़ा निर्दयी होता है। शासक और प्रशासक कितना भी महत्वाकांक्षी हो, लेकिन ऐसे शख्स कम ही अपवाद होते है जो समय, परिस्थिति से समझौता नहीं करते। उनके इरादे मजबूत होते है, और समाज-देश में आस्था उनका संबल होता है। आधुनिक काल के निर्माता और प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने गद्दी संभालते ही राजनैतिक, आर्थिक क्षेत्र में व्याप्त प्रदूषण को समाजवाद के रास्ते में रोढ़ा मारकर साफ-सुथरी सरकार देने का मंसूबा संजोया था। भारत में 1961 में आयकर कानून बनानें और बाद में सीबीआई के रूप मंे स्पेशल स्टेब्लिशमेंट एक्ट को परिष्कृत करने के पीछे उनका इरादा देश से भ्रष्टाचार के कदाचार को समाप्त करना था। देश में कालेधन के खिलाफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का अभियान जब वाद-विवाद और चर्चा का केन्द्र बना है, पं. नेहरू के जन्मदिन पर उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में एक सभा में उन्होनें जो कहा और पं. नेहरू का पुण्य स्मरण किया, उससे संकेत मिलता है कि नरेन्द्र मोदी इतिहास की समग्रता से पुनार्वृत्ति करनें के लिए कृत-संकल्प है। विपक्ष द्वारा उठाये जा रहे लेकिन, किन्तु, परन्तु से अविचलित रहकर उन्होनें आर्थिक क्षेत्र में जो स्ट्राईक किया है कालेधन की मुहिम नोट बंदी आर्थिक सर्जिकल स्ट्राईक के रूप में प्रशंसा और विपक्षी मंच पर आलोचना का विषय जरूर बन गयी है। लेकिन लंबी लाइन में पसीना बहाते नये नोटों के इंतजार मंे खड़ा देश का आम आदमी नरेन्द्र मोदी की प्रशंसा किये बिना नहीं रहता। लंबी लाइन में परेशान हो रहे उपभोक्ताओं की सेवा में ठंडा पानी, चाय परोसते युवक मानों इस मुहिम के सही प्रशंसक बन चुके है।

    बड़े नोटों के प्रचनल पर लगायी गयी रोक से आम जनता की परेशानी, बाजार में आयी घबराहट के बावजूद जनता में एक आत्मविश्वास जगता दिखायी दे रहा है और वह इस बात से कतई इत्तेफाक नहीं रखता कि नरेन्द्र मोदी ने देश पर आर्थिक आपातकाल थोप दिया है। नोट बंदी का नया आयाम सिर्फ सामाजिक आर्थिक सिस्टम का परिष्कार ही नहीं है अपितु राजनैतिक क्षेत्र में नयी सरंचना का संकेत भी है। आजादी के बाद चुनाव आयोग ने लंबी बहस की और चुनाव के खर्चीले होने पर सवाल भी उठाया। माना गया कि चुनाव में कालेधन के इस्तेमाल से निर्वाचन की शुचिता दाखिल हुई है। लेकिन मंचीय चिंता व्यक्त करने वाले राजनैतिक दलों की भूमिका एक तटस्थ मौन दर्शक से ज्यादा नहीं रही। शुचिता लाने के लिए उन्होनें कोई प्रयास नहीं किया। 500 और 1000 रू. के बड़े नोटों के प्रचलन पर लगी रोक से लाखों करोड़ रूपया रखने वाले कालाधन धारियों की चिंता का कोई ठिकाना नहीं रहा। राजनैतिक दलों ने आगामी विधानसभा चुनाव के लिए जो बड़े नोटों का अंबार बनाकर रखा था, उनकी सांसे थम गयी और उन्होनें नरेन्द्र मोदी पर निशाना तान दिया है। यहां तक कि देश के सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा भी खटखटा दिया। लेेकिन सर्वोच्च न्यायालय की खंडपीठ ने भी उन्हें निराश कर दिया और इस कदम की नेक नीयति पर अपनी मोहर लगा दी। अलबत्ता, न्यायालय ने सुझाया कि आम आदमी जो रोज कुआं खोदता है और पानी पीता है, उसे किल्लत न हो। इसका केन्द्र को ध्यान रखना होगा। पुराने बड़े नोटों, नकली मुद्रा के खारिज होने के बाद नये नोटों को प्रचलन में लाने का गंभीर दायित्व केन्द्र सरकार को सौंपा है। केन्द्र सरकार भी जनता के प्रति संवेदनशील है। 8-9 नवंबर 2016 की मध्यरात्रि से अचानक बड़े नोटों पर लगी पाबंदी से जनता हैरान है, लेकिन एनडीए सरकार का यह तर्क भी मायने रखता है कि यदि इसकी पूर्व सूचना दी जाती तो उद्देश्य ही पराजित हो जाता। इस आकस्मिक् नोट बंदी में जनता के सब्र का सबसे बड़ा कारण इस पाबंदी से आतंकवाद, तस्करी और भ्रष्टाचार का मेरूदंड झुक जाने से हुई सुखद अनुभूति है। मेहनत मशक्कत कर पेट पालने वाले दिन भर की मजदूरी खोकर अपनी गाढ़ी कमाई के नोट बदलने के लिए लंबी कतार में इंतजार करते हुए भी नरेन्द्र मोदी के साहसिक कदम के दीवाने हो गये है। उनका मानना है कि जहां नोटों का अंबार रद्दी में तब्दील हो गया है, वहीं अमीर और गरीब एक पंक्ति में आ गये है। नरेन्द्र मोदी ने 50 दिनों में स्थिति सामान्य होने की दिलासा दी है। भारतीय जनता पार्टी के नेता और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान का यह कथन मौजू है कि इस कदम ने श्री सत्यनारायण भगवान की कथा में आये किरदार वणिक व्यापारी जैसी हालत उन रईसों की कर दी है,

    जिन्होनें केन्द्र सरकार की तमाम चेतावनियों पर यह दर्शाया कि उनके पास कोई ब्लैक मनी (कालधन) नहीं है। नरेन्द्र मोदी ने जखीराबाजों को तथास्तु कहकर उसी अंजाम पर पहुंचा दिया। ब्लैकमनी का अंबार लतम्-पत्ताम् में नोटों का जखीरा बदल गया है। आर्थिक विशेषज्ञों की राय है कि कालाधन अर्थव्यवस्था में घुन बन रहा था। इससे जहां भ्रष्टाचार का पोषण होता था, आतंकवादियों के स्लीपर सेल पैदा होकर सरसब्ज हो रहे थे। वे धीरे-धीरे कुपोषण का शिकार होकर मृतपाय होंगे। नक्सलियों की कमर टूट चुकी है, क्योंकि वे तो धन एंेठकर जमीन में छिपाते आ रहे है। जरूरत पड़ने पर हथियार खरीद लेते थे। हवाला पर लगाम लगाने के साथ मादक द्रव्यों की तस्करी करने वाले भी हैरान है। उनका दावा है कि बड़े नोट तर्कसंगत कारणों पर बदले जाने और मौजूदा खातों में जमा होने से काली मुद्रा प्रचलन से बाहर हो रही है। और जो पूंजी सुप्त थी, वह बैंकों के माध्यम से विकास और उत्पादनशील प्रयोजनों के काम आयेगी। इससे असली मुद्रा का परिमाण प्रचलन में मर्यादित होने से ईएमआई (ब्याज दर) घटेगी। केन्द्र सरकार की पावंदी का अनुकूल प्रभाव देखने में आया है।

    अनुमान है कि 9 नवंबर से प्रथम चरण में चार दिनों में ही बैंको में एक लाख करोड़ रू0 से अधिक का ट्रांजेक्शन (लेन-देन) हुआ। इससे बैंको की लिक्विडिटी में इजाफा हुआ है, एटीएम में नोटों का आकार-प्रकार बदलने से उनकी क्षमता घटने से हो रही उपभोक्ता की परेशानी के प्रति सरकार की संवेदनशीलता का ही नतीजा है कि केन्द्र ने पोस्ट आॅफिस को भी इस काम में जुटा दिया है। ग्रामीण केन्द्र भी सक्रिय किये जा चुके है। निश्चित रूप से केन्द्र के इस बहुप्रतीक्षित कदम से जनता हलाकान हुई है, लेकिन जनता को भरोसा है कि इससे मुल्क को लगभग 3 लाख करोड़ रू. का लाभ हो सकता है। एक सर्वेक्षण के अनुसार देश में 1000 और 500 रू. की मुद्रा के रूप में 14 लाख करोड़ रू. के नोट है, जिसमें 20 प्रतिशत कालाधन है। यह राशि इस मुहिम में लौटने से रही। यह सरकारी खजाने की निधि में दर्ज हो जायेगी। आरबीआई द्वारा जारी हर नोट सरकार की लायबिलिटी होती है। उन नोटों की देयता स्वयं समाप्त हो जायेगी। राजनैतिक दल भले ही नोट बंदी का विरोध कर रहे हों, लेकिन उद्योग जगत और आम आदमी ने इसे आर्थिक क्षेत्र में सर्जिकल स्ट्राईक बताकर इस कदम का जोरदार स्वागत किया है। एक बात यह भी कि नकद के रूप में भारत में इसका जीडीपी में हिस्सा 12 प्रतिशत है यानि नकदी में लेन-देन चलता है। जबकि दूसरे देशों में नकदी का अंश 3 से 4 प्रतिशत ही रहता है। इस तरह प्रधानमंत्री ने बड़े नोट बंद करके जो आर्थिक शुद्धीकरण की क्रांति की है, उस पर 2014 के पहले भी तत्कालीन प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह सरकार ने विचार किया था। लेकिन न तो वे जनता के चुने हुए प्रधानमंत्री थे और न कांगे्रस ऐसा करने का साहस करने के लिए तैयार थी। कारण जो भी रहा हो।

    नोट बंदी के कई आयाम है। राष्ट्र हित में उन पर बहस की गंुजाईश है, लेकिन उस पर बहस करने के बजाय कुछ लोग अफवाहों को पंख देकर जनता को भ्रमित करनें में जुटे है। 100 रू. और 50 रू. के नोट बंद किये जाने की अफवाह को केन्द्र सरकार ने शरारतपूर्ण बताकर खारिज कर दिया है। विधि आयोग और चुनाव आयोग चुनाव में कालेधन के दुरूपयोग पर लंबे समय से चिंता व्यक्त करते आ रहे है। मंचों पर राजनैतिक दल भी इसकी पेरोकारी करनें में पीछे नहीं रहे। लेकिन इन दलों ने इस पर सहमति बनानें का साहस नहीं दिखाया। इनकी नीयत में हमेशा खोट देखी गयी है। लेकिन नोट बंदी ने देश में हो रहे उपचुनावों में इसका सबूत दे दिया है कि नोट बंदी से नकली नोटों का प्रचलन बंद होने से चुनाव में कालेधन पर रोक लगाने का भरोसा किया जा सकता है। नोट बंदी भ्रष्टाचारियों के लिए सबक है, लेकिन इस अभियान में गेहूं के साथ घुन पिस रहा है, यह एक मजबूरी सरकार के सामने आ रही है। अर्थव्यवस्था के शु़िद्धकरण के अनुष्ठान में आम आदमी को सजा भुगतना राष्ट्रीय अनुष्ठान में आम आदमी की सात्विक आहुति है। देश की उभरती अर्थव्यवस्था का इसे परीक्षाकाल भीमानकर संतोष करना पड़ेगा। इसके लिए यदि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रशंसा और एनडीए सरकार की सराहना की जाये तो यह न तो अतिश्योक्ति होगी और न इसे प्रशस्ति गान माना जाना चाहिए।

    शीतकालीन संसद सत्र में विपक्ष नोटबंदी को लेकर केन्द्र सरकार को घेरने के लिए एकजुटता का संदेश दे चुका है। बुद्धिजीवी भी चाहते है कि लोकतंत्र में विरोध हो और रचनात्मक विरोध और बहस से सिस्टम की कमियां दूर करनें मंे मदद मिलती है। लेकिन विरोध में भी संवेदना आवश्यक है। विपक्ष की आक्रामकता को देखते हुए जनता चकित है। लेकिन प्रधानमंत्री और एनडीए सरकार विपक्ष की लामबंदी पर हैरत में नहीं है। एनडीए ने कहा है कि उसकी नीति और नीयत साफ है। हर मुद्दे पर किसी भी दृष्टिकोण से बहस के लिए केन्द्र सरकार तैयार है। उसे खतरा इसलिए नहीं है कि क्योंकि वह बहुमत में है। इससे भी बड़ी बात यह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को आम आदमी के समर्थन का बल होने से उनका हौंसला बुलंद है।

  • जीएसटी एक क्रांतिकारी आर्थिक सुधार

    जीएसटी एक क्रांतिकारी आर्थिक सुधार

    bharatchandra nayak

    भरतचन्द्र नायक…..

    भारतीय संसद ने वस्तु एवं सेवा कर विधेयक (जीएसटी) पर अपनी मोहर लगाकर आर्थिक उदारीकरण के पश्चात् आजादी के बाद एक ऐतिहासिक आर्थिक सुधार किया है। यह वास्तव में भारतीय अर्थव्यवस्था में विकासोन्मुखी बदलाव लाकर गेम चेंजर सिद्ध होगा, जिसे चलतू भाषा में पाशा पलटना कहते है। इससे ‘वन इंडिया-वन मार्केट’ की कल्पना साकार होने के साथ ही घरेलू उत्पादन पर आयात की जो मार पड़ रही है, उससे भी मुक्ति मिलेगी। आर्थिक विश्लेषक छोटी कारें महंगी और विलासितापूर्ण मंहगी कारें सस्ती होने का जो फार्मूला बता रहे है, वह एक अंकगणितीय तथ्य अवश्य है, लेकिन सरकार की मंशा आम आमदी की दैनंदिन जीवन से जुड़ी वस्तुएं जीएसटी की परिधि से बाहर रखने से जीएसटी आम आदमी को उपभोक्ता सामान मंहगा पड़ने में चेक एंड बेलेंस का काम करेगी। कारों की कीमत के बारें में तो सीधी बात है कि जीएसटी की दर यदि 16 से 18 के बीच स्थिर होती है तो सस्ती कार पर लगने वाला 8 से 10 प्रतिशत का टैक्स बढ़ जायेगा और बड़े वाहनों पर 20 से 22 प्रतिशत टैक्स 18 प्रतिशत पर स्थित हो जायेगा। लेकिन इससे चुनिंदा खरीददार ही प्रभावित होंगे। आम आदमी प्रभावित होने वाला नहीं है। उदाहरण के तौर पर पिछड़ेपन से ग्रसित राज्य उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश उपभोक्ता राज्य है, इनकी अर्थव्यवस्था पर इससे अनुकूल असर पड़ेगा। उपभोक्ता राज्यों में कर संग्रह अधिक होगा। क्योंकि मौजूदा हाल में उपभोक्ता राज्य 20 से 30 प्रतिशत कर चुकाते है, वह घटकर 16 से 18 जो भी निर्धारित होगा रह जायेगा। कर का परिमाण निर्धारित करके का काम जीएसटी परिषद करेगी। जीएसटी के प्रभावी होने पर कराधान प्रशासन की मुश्किले आसान होने के साथ प्रामाणिकता और गुणवत्ता में अनुकूल बदलाव आयेगां जीएसटी की दोहरी माॅनीटरिंग, राज्य और केन्द्र द्वारा किये जाने पर जो चिंता जतायी जा रही है, वह निर्मूल साबित होगी। अलबत्ता, राज्य और केन्द्र के बीच एक स्वस्थ स्पर्धा आरंभ होगी।

    जीएसटी दर निर्धारित करते समय राजस्व संग्रह, टैक्स प्रशासन के सरलीकरण, टैक्स वसूली में प्रोत्साहन और मुद्रा स्फीति में वृद्धि न हो इस बात ऐहतियात बरता जाना है, जिससे भारत में लगने वाला जीएसटी अन्य देशों की तुलना में भारी न होकर न्याय संगत हो। सामाजिक दृष्टिकोण एवं आमजन की उपयोगिता को देखते हुए जीएसटी कव्हरेज में वस्तुओं को लाया जाना चाहिए। जीएसटी से मुक्ति वाले आइटमों का निर्धारण निहित स्वार्थ के बजाय सामाजिक उपयोगिता के आधार पर अपेक्षित होगा तथा गरीबों की आवश्यक वस्तुएं दायरें में आने से बरकायी जायेंगी। जीएसटी विधेयक को लोकसभा और राज्यसभा में पारित किये जाने में भारी विलंब हुआ है, लेकिन ‘अंत भला तो सब भला’। यह भारतीय लोकतंत्र की विजय है। न तो पूर्ववर्ती यूपीए सरकार को दोष दिया जाना चाहिए और न ही मौजूदा एनडीए सरकार को कठघरे में खड़ा किया जाना चाहिए। लेकिन इस विधेयक ने देश के राजनैतिक दलों को ‘सास भी कभी बहू थी’ की स्थिति से रूबरू जरूर करा दिया है। जो पहले विपक्ष में रहकर विरोध कर रहे थे, सत्ता में पहुंचनें के बाद जीएसटी के लाभ गिना रहे थे। जो प्रणव मुखर्जी और पी. चिदम्बरम पूर्व वित्त मंत्रियों की पेरोकारी पर मजाक उड़ा रहे थे, वे जीएसटी की प्रशस्ति करते दिखे और जो इसे ड्रीम सुधार बता रहे थे वही जीएसटी का मार्ग अवरूद्ध करते देखे गये। गोया देशहित में वक्त पर सुधार में सहमति की राय पर पार्टी हित भारी पड़ता जनता ने देखा और संसद के पावस सत्र में सहमति बनने पर वास्तविक प्रसन्नता व्यक्त की।

    मजे की बात यह है कि तमिल राजनीति जीएसटी के विरोध में थी। लेकिन उसने राष्ट्रहित में समर्थन देते हुए देखने के बजाय सदन से वाॅकआउट कर दिया, ‘सांप भी मर गया और लाठी भी नहीं टूटी’। यह भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता का एक नायाब सबूत है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संसद में जीएसटी विधेयक पारित होने पर सभी राजनैतिक दलों के सहयोग के लिए आभार व्यक्त करते हुए जो भरोसा सदन को दिया उसमें सबसे महत्वपूर्ण मंहगायी को 4 प्रतिशत पर स्थित करने का है, यह आम आदमी को प्रफुल्लित कर रहा है। जिस मंहगाई के सामने जाने-माने अर्थशास्त्री विश्व अर्थव्यवस्था की देन बता रहे थे उस पर काबू पाने में भारत की क्षमता वास्तव में सराहनीय मानी जायेगी। केन्द्रीय सरकार का दावा है कि आम आदमी, गरीब के इस्तेमाल की सभी वस्तुएं जीएसटी की परिधि में शामिल नहीं की जायेगी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जीएसटी को ‘ग्रेट स्टेप टूवर्ड ट्रांसफार्मेशन, स्टेप टूवर्ड ट्रांसपरेंसी, गे्रट स्टेप वाई टीम इंडिया’ घोषित करके राजनैतिक सहमति, राजनैतिक दलों के बीच सहयोगी संघवाद, टीम इंडिया की भावना को महिमा मंडित किया है। उपभोक्ता को बादशाह बताते हुए मोदी ने यह भी कहा कि इससे छोटे उत्पादक लाभांवित होंगे और उपभोक्ता को पारदर्शिता की गारंटी मिलेगी। सबसे बड़ी बात तो यह है कि इससे भारत की अर्थव्यवस्था को गति मिलने के साथ भारत दुनिया के कारोबारियों का स्वर्ग बन जायेगा। जब देश में फाईव-एम (मेन, मटेरियल, मशीन, मनी और मेथड) का अधिकतम उपयोग होगा, तब देश में रोजगार के अवसरों का स्वमेव सृजन होगा। एकीकृत कर लगने से राज्यों की आय बढ़ेगी, जिससे विकास का चक्र तेजी से घूमेगा और गरीबी उन्मूलन का अभियान तीव्र गति से आगे बढ़ेगा। आज हम कर वसूली में ही सारा समय गंवा रहे है। मालवाहक वाहन तीसों दिन अधिकांश समय बेरियरों पर खड़े रहकर समय गंवाते है और उनकी गति अवरूद्ध रहने से देश को क्षति होती है। उससे मुक्ति मिलने के साथ जो मेनपाॅवर नाकों पर तैनात रहकर जुगाड़ में लगा रहता है, उसे दीगर उत्पादनशील कार्यों में जुटाया जा सकेगा।

    गरीबों के काम आने वाली औषधियों को जीएसटी से बाहर रखने का केन्द्र का इरादा जनोन्मुखी सोच उजागर करता है। जीएसटी संग्रह में टेक्नाॅलोजी का भरपूर उपयोग होने से कारोबार में शुचिता सुनिश्चित करनें में मदद मिलेगी। देश में एनडीए सरकार ने सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू करके कर्मचारी-अधिकारियों की मुराद तो पूरी की है, अब उन्हें नयी कार्य संस्कृति का सबूत देना है। कामचोरी, भ्रष्टाचार देश की प्रगति में सबसे बड़ी बाधा है। जीएसटी जहां कर संग्रह के रूप में देश को प्रचुर धनराशि सुनिश्चित करेगी वहीं नया दिशा बोध भी विकसित करने मंे सहायक होगा। आर्थिक विश्लेषकों का दावा है कि जीएसटी व्यवस्था के तहत जीएसटी का संग्रह आपूर्तिकर्ता उत्पादकों और सेवा प्रदाता द्वारा कर का भुगतान प्रारंभिक बिन्दु पर किया जायेगा। इससे कर संग्रह की लागत कम होगी। जीएसटी प्रभावी होने के बाद जिस राज्य में सामान बेचा जायेगा, उसी राज्य को टैक्स मिलेगा। इससे मध्यप्रदेश जैसे उपभोक्ता राज्यों के पौ-बारह होंगे। मौजूदा अर्थव्यवस्था विकसित राज्यों के पक्ष में है। यह क्रम बदलेगा। गुजरात, महाराष्ट्र, दक्षिणी राज्य तमिलनाडू, कनार्टक जो औद्योगिक रूप से समृद्ध है, उन्हें होने वाला लाभ अब उपभोक्ता राज्यों को मिलने जा रहा है। उनकी तकदीर और तस्वीर बदलने जा रही है। असम राज्य ने संसद में विधेयक पारित होते ही विधानसभा में विधेयक पर मोहर लगा दी। मध्यप्रदेश ने भी 24 अगस्त को सदन का विशेष सत्र बुलाकर जीएसटी की उपयोगिता को रेखांकित कर दिया है। 30 दिन में कमोवेश 15 राज्य विधेयक पर मोहर लगा चुकेंगे। जिससे इसे राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलना आसान हो जायेगा। जीएसटी लागू होने पर निर्मित वस्तुओं के दामों में कमी होगी। लेकिन कितना आर्थिक लाभ होगा यह समय ही बतायेगा। जीएसटी लागू होते ही कई लागू कानून रद्द हो जायेंगे। यदि परिस्थिति ने राज्य को अतिरिक्त कराधान के लिए विवश किया तो राज्य को इसके लिए जीएसटी कौंसिल की शरण लेना पड़ेगी, जिसका सृजन होना फिलहाल शेष है।

    एमआरपी लूट का जरिया न बनें

    जीएसटी से करों के मकड़जाल में उलझे उद्योगों को राहत मिलेगी। खाद्यान्न, दलहन, शक्कर शून्य दर में रहने से राहत, प्र्रसंस्कृत वस्तुएं मंहगायी का शिकार बन सकती है। दस लाख रू. से कम टर्नओवर दायरे से बाहर होगा। लेकिन जोर का झटका धीरे से कालेधन पर अवश्य लगेगा। सर्राफा में संगठित क्षेत्र सरसब्ज होगा। पुराने स्वर्णाभूषण पर इनपुट कम होगा। जिन 53-54 वस्तुओं पर जीएसटी छूट होगी, उनमें तीन दर्जन से अधिक वस्तुओं के मूल्य कम होंगे। सवाल मौजू है कि एमआरपी अब तक लूट का जरिया बना है, इसका ऐसा फार्मूला तय हो कि उपभोक्ता जान सकें कि इसमें कितना मूल्य कच्चे माल का, कितना मूल्य उत्पादन व्यय और कितना मुनाफा शामिल है। इससे जीएसटी सार्थक होगा और पारदर्शिता सुनिश्चित होगी।

  • सुविधाजनक बने प्रदेश के शहर

    सुविधाजनक बने प्रदेश के शहर

    chavi

    भोपाल (पीआईसीएमपीडॉटकॉम)।
    राज्य सरकार ने नगरीय क्षेत्र के विकास की सुनियोजित योजनाएँ बनायी हैं। अधोसंरचना हो या बुनियादी नागरिक सुविधाएँ, नागरिकों को उपलब्ध करवाने के लिये गुणवत्तापूर्ण काम सभी नगरीय क्षेत्र में किये गये हैं। मेट्रो रेल की परिकल्पना हो या लोक परिवहन का मामला, स्वच्छता की बात हो या ई-गवर्नेंस, शहरी गरीबों को आवास सुविधा या उनके लिये पेयजल उपलब्ध करवाना, इन सभी बुनियादी सुविधाओं के लिये नगरीय विकास एवं पर्यावरण विभाग के जरिये निरंतर काम किया जा रहा है।

    प्रदेश की 2 करोड़ 59 हजार की आबादी वाले नगरीय क्षेत्रों में नगरीय सुविधाओ के लिये हुए कामों ने शहरी अधोसंरचना की तस्वीर बदल दी है। इस उद्देश्य के लिये वर्ष 2015-16 में 7812 करोड़ 98 लाख रुपये का बजट था। वर्ष 2002-03 में यह बजट मात्र 738 करोड़ था। वर्ष 2005 से प्रदेश के 4 बड़े शहर- भोपाल, इंदौर, जबलपुर और उज्जैन में 2679 करोड़ की 28 परियोजना स्वीकृत की गयी हैं। अन्य छोटे तथा मझौले शहरों में 114 निकाय की 181 परियोजना स्वीकृत की गयी हैं। बारहवीं पंचवर्षीय योजना में 1500 करोड़ में से 288 नगरीय निकाय को 1403 करोड़ 15 लाख रुपये के कामों के लिये स्वीकृति दे दी गयी है।

    भोपाल एवं इंदौर के लिये देश का प्रथम लाइट मेट्रो सिस्टम प्रक्रिया में है। प्रदेश के शहरी क्षेत्रों में स्थित हेरीटेज स्मारकों/स्थलों/भवनों के संरक्षण एवं संवर्धन के लिये वर्ष 2013-14 में शहरी विरासत संरक्षण एवं संवर्धन योजना शुरू की गयी है। स्वर्ण जयंती शहरी स्व-रोजगार योजना में वर्ष 2013-14 तक 2 लाख 14 हजार 76 हितग्राही तथा प्रशिक्षण कार्यक्रम में 4 लाख 18 हजार 411 हितग्राही को प्रशिक्षण दिया गया। अक्टूबर, 2013 में इस योजना के स्थान पर राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन शुरू किया गया है।

    मध्यप्रदेश अर्बन डेव्हलपमेन्ट कम्पनी

    नगरीय निकायों की वर्तमान क्षमता तथा मानव प्रबंधन में कमी के कारण परियोजनाओं को समय से पूरा करने में आ रही कठिनाइयों को दूर करने और अधोसंरचना के काम समय-सीमा में क्रियान्वित करने के लिये मध्यप्रदेश अर्बन डेव्हलपमेंट कम्पनी बनायी गयी है। कम्पनी द्वारा निकायों को तकनीकी तथा वित्तीय सहायता उपलब्ध करवाने के साथ निकाय-स्तर पर स्वीकृत परियोजनाओं का क्रियान्वयन भी किया जायेगा।

    स्मार्ट-सिटी

    भारत सरकार की स्मार्ट-सिटी योजना में पहले चरण में प्रदेश के 3 शहर भोपाल, इंदौर और जबलपुर का चयन किया गया है। स्मार्ट-सिटी योजना में प्रदेश के नागरिकों को मुख्य बुनियादी सुविधाएँ, स्वच्छ और टिकाऊ पर्यावरण, जीने के लिए उच्च-स्तरीय गुणवत्ता और स्मार्ट समाधान प्राप्त होगा। राज्य शासन स्तर पर अन्य शहरों को स्मार्ट-सिटी बनाने की कार्य-योजना भी तैयार की जा रही है।

    शहरी गरीबों को आवास

    शहरों में गरीबों के लिये आवास उपलब्ध करवाने के लिये ‘सबके लिए आवास” योजना बनाई गयी है। प्रधानमंत्री आवास योजना में भारत सरकार द्वारा ग्वालियर शहर के एक्शन प्लान को देश के सभी राज्य में मॉडल के रूप में मान्य किया गया है। वर्ष 2018 तक शहरी गरीबों के लिये 5 लाख घरों के निर्माण का लक्ष्य रखा गया है। एक हजार करोड़ रुपये की लागत से 50 हजार शहरी गरीब आवासों का निर्माण किया जायेगा।

    अटल मिशन फॉर रिज्युवेनेशन एण्ड अर्बन ट्रान्सफार्मेशन

    मध्यप्रदेश ने भारत सरकार की अटल मिशन फॉर रिज्युवेनेशन एण्ड अर्बन ट्रान्सफार्मेशन योजना में प्रथम स्थान प्राप्त किया है। योजना में स्वच्छ पेयजल, सीवरेज कनेक्शन, वर्षा जल के निकासी, हरित क्षेत्रों में विकसित एवं शहरी परिवहन को सुनिश्चित किये जाने के उद्देश्य से एक लाख से अधिक जनसंख्या वाले प्रदेश के 34 शहर का चयन किया गया है।

    प्रदेश के 10 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में केन्द्र शासन से 33 प्रतिशत, राज्य शासन से 50 प्रतिशत एवं नगरीय निकायों द्वारा 17 प्रतिशत अंशदान के साथ योजनाओं का क्रियान्वयन किया जा रहा है एवं प्रदेश के 10 लाख तक की आबादी वाले शहरों में केन्द्र शासन से 50 प्रतिशत, राज्य शासन से 40 एवं नगरीय निकायों के 10 प्रतिशत अंशदान के साथ योजनाओं का क्रियान्वयन किया जा रहा है।

    मुख्यमंत्री शहरी स्वच्छता मिशन एवं स्वच्छ भारत अभियान

    स्वच्छ भारत मिशन में आगामी 5 वर्ष के लिये 5209 करोड़ 14 लाख रुपये की स्वच्छता कार्य-योजना में व्यक्तिगत शौचालय, सामुदायिक/सार्वजनिक शौचालय का निर्माण, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन जैसे काम करवाये जा रहे हैं। दिसम्बर-2015 तक 50 लाख घरों में शौचालय की सुविधा उपलब्ध करवायी जा चुकी है। सभी 52 हजार गाँव को खुले में शौच से मुक्त करने का लक्ष्य है। अभी 1500 से अधिक गाँव को खुले में शौच से मुक्त किया जा चुका है।

    राज्य सरकार ने शहरों की स्वच्छता के लिये मुख्यमंत्री शहरी स्वच्छता मिशन प्रारंभ किया था जिसे भारत सरकार द्वारा सर्वोच्च प्राथमिकता के स्वच्छ भारत मिशन में शामिल किया गया है। संपूर्ण राज्य में व्यक्तिगत शौचालयों का निर्माण तेजी से चल रहा है। चार लाख से अधिक शौचालयों को स्वीकृत कर डेढ़ लाख से अधिक शौचालयों का निर्माण कर मध्यप्रदेश पूरे देश में दूसरे स्थान पर है। सामुदायिक शौचालयों में 5068 से अधिक सीट्स का निर्माण करवाया जा चुका है।

    सार्वजनिक क्षेत्रों में स्वच्छता बनाये रखने के लिये 637 से अधिक सामुदायिक/सार्वजनिक शौचालयों की स्वीकृति दी गई है। इसमें से 208 से अधिक सामुदायिक/सार्वजनिक शौचालयों का निर्माण करवाया जा चुका है।

    नगरीय ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के लिये सफाई उपकरण जैसे- छोटा कचरा वाहन, बेलिंग मशीन, काम्पेक्टर एवं मड पम्प आदि के लिये नगरीय निकायों को आर्थिक सहायता दी गई है। प्रदेश के निकायों के क्लस्टर बनाकर ठोस अपशिष्ट प्रबंधन जन-निजी भागीदारी के माध्यम से किया जा रहा है।

    योजना में घर-घर से कचरा एकत्रित कर क्षेत्रीय लेण्डफिल साईट तक ले जाकर वैज्ञानिक तरीके से उसका डिस्पोजल किया जायेगा। इससे पर्यावरण का संरक्षण होगा।

    घर-घर से कचरा एकत्रित करने की कार्यवाही प्रारंभ की जाकर वर्ष 2016-17 में 100 प्रतिशत लक्ष्य प्राप्ति का उद्देश्य है। स्वच्छता व्यवहार में परिवर्तन के लिये सूचना शिक्षा संप्रेषण के माध्यम से जन-जागरूकता का काम भी किया जा रहा है। स्वच्छ भारत मिशन भारत सरकार एवं राज्य सरकार के 50:50 प्रतिशत अंशदान के अनुपात में क्रियान्वित किया जा रहा है।

    मेट्रो रेल परियोजना

    राज्य शासन द्वारा प्रदेश के नागरिकों को उच्च स्तरीय लोक परिवहन सुविधा प्रदान करने तथा प्रदेश को विश्व परिवहन मानचित्र पर स्थान प्रदाय करने भोपाल एवं इंदौर शहरों में स्टेट-ऑफ-आर्ट मेट्रो परियोजना वर्ष 2021-2022 तक क्रियान्वित करने का निर्णय लिया गया है। जबलपुर एवं ग्वालियर के लिये भी मेट्रो रेल परियोजना के लिये डीपीआर प्रक्रिया में है।

    मेट्रो रेल परियोजना के क्रियान्वयन के लिये मध्यप्रदेश मेट्रो रेल कंपनी का गठन किया जा चुका है। योजना में भोपाल एवं इंदौर में मेट्रो के लिये प्रस्तावित नेटवर्क की कुल लंबाई क्रमशः 95 किलोमीटर एंव 103 किलोमीटर है। प्रथम चरण में भोपाल में 28 किलोमीटर और इंदौर में 31 किलोमीटर लागत 14 हजार करोड़ रुपये से निर्माण काम प्रस्तावित है।

    शहरी लोक परिवहन

    भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर एवं उज्जैन नगर के लिये पार्किंग, लोक परिवहन एवं ट्रांजिट ओरिएन्टेड डेव्हलपमेंट मास्टर-प्लान की तैयारी की जा रही है।

    शहरों में बढ़ते शहरीकरण से वाहनों की संख्या में हो रही बढ़ोत्तरी से शहरी यातायात बेतरतीब हो रहा है तथा पर्यावरण भी प्रदूषित होता है। ऐसी स्थिति में शहरी लोक परिवहन अत्यंत महत्वपूर्ण काम है। इस कार्य को प्राथमिकता देते हुए इसे दृष्टि पत्र 2018 में मिशन के रूप में रखा गया है।

    सुरक्षित एवं सुगम यातायात के लिये प्रदेश के प्रमुख शहरों में यातायात सूचना प्रबंधन एवं नियंत्रण केन्द्र की स्थापना के लिये परियोजना प्रतिवेदन तैयार करवाया जा रहा है। भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर एवं उज्जैन नगरों के लिये पार्किंग, लोक परिवहन, विज्ञापन एवं ट्रान्जिट ओरिएन्टेड डेव्हलपमेंट के मास्टर प्लान तैयार करवाये जा रहे हैं।

    प्रदेश के चार शहर- भोपाल में 225, इन्दौर में 175, जबलपुर में 119 एवं उज्जैन में 89 आधुनिक एवं आरामदायक बसों के माध्यम से लोक परिवहन बस सेवा संचालित है। प्रदेश के 21 शहर के लिये कम्प्रेहेन्सिव मोबेलिटी प्लान तैयार करवाये जा रहे हैं।

    प्रदेश के शहरों में लोक परिवहन व्यवस्था को सुदृढ़ किये जाने के लिये राज्य-स्तरीय डेडीकेटेड अर्बन ट्रांसपोर्ट फण्ड एवं शहर स्तरीय डेडीकेटेड अर्बन ट्रांसपोर्ट फण्ड का गठन किया गया है। इन दोनों फण्ड के लिये इस वित्त वर्ष में 48 करोड़ का बजट प्रावधान है।

    प्रदेश के 20 नगरीय निकायों में लोक परिवहन के लिये प्रस्ताव भारत सरकार को अमृत योजना में स्वीकृत की जा चुकी हैं।

    ई-गवर्नेंस एवं शहरी सुधार योजना

    बढ़ते शहरीकरण को देखते हुए नगरीय निकायों की कार्य-प्रणाली में सुधार की जरूरत है। शहरी सुधार कार्यक्रम में वित्तीय सुधार, प्रशासकीय सुधार, ई-गवर्नेंस, सम्पत्ति कर एवं उपभोक्ता प्रभार में सुधार इत्यादि शामिल है। इसके लिए वर्ष 2013-14 से ”शहरी सुधार कार्यक्रम” योजना शुरू की गयी है।

    नगरीय निकायों की कार्य-प्रणाली में पारदर्शिता तथा नागरिकों की सुविधा के लिये राज्य-स्तर से अनुदान देकर ”ई-नगरपालिका परियोजना” शुरू की गई है। प्रधानमंत्री की महत्वाकांक्षी डिजिटल इंडिया योजना को देखते हुए प्रदेश के सभी नगरीय निकायों में ई-गवर्नेंस रिफार्म का क्रियान्वयन किया जा रहा है।

    प्रदेश के सभी नगर निगमों में भवन अनुज्ञा की प्रक्रिया को सुगम बनाते हुए ऑटोमेटेड बिल्डिंग प्लान अप्रूवल सिस्टम लागू किया गया है। इस प्रक्रिया में ऑनलाईन भुगतान की व्यवस्था लागू की गई है। इस परियोजना में मैदानी जाँच के लिये भी मोबाईल ऐप की सुविधा भी उपलब्ध करवायी गयी है। नागरिकों को ”फायर एनओसी” ऑनलाईन देने का काम भी शुरू किया गया है।

    नगरीय निकायों में राजस्व वृद्धि के उद्देश्य से जियोग्राफिकल इन्फार्मेशन सिस्टम द्वारा आधुनिक सेटेलाईट नक्शे के माध्यम से घर-घर सर्वे का काम शुरू करवाया गया है। 44 निकायों में यह काम पूरा कर लिया गया है, 79 नगरीय निकायों में काम प्रगति पर है। कई निकायों में सम्पत्ति कर की वसूली में 50 से 60 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है।

    सूचना प्रौद्योगिकी उन्नयन

    सूचना प्रौद्योगिकी उन्नयन योजना में जी.आई.एस. तकनीक पर तैयार किये गये खसरावार भूमि उपयोग मानचित्र की जानकारी के लिये 4 नगरों को आनलाईन किया जा चुका हैं।

    राज्य नगर नियोजन संस्थान द्वारा 4 नगरों की वेबबेस्ड जी.आई.एस. एप्लीकेशन तैयार करवाये जाने की कार्यवाही प्रचलन में हैं।

    मुख्यमंत्री शहरी पेयजल योजना

    प्रदेश के ऐसे नगरीय निकाय जहाँ भारत सरकार की अमृत योजना और बाह्य पोषित योजना में पेयजल योजनाएँ प्रस्तावित नहीं है, ऐसे नगरीय निकाय को मुख्यमंत्री शहरी पेयजल योजना में शामिल किया गया है। योजना की शुरूआत वर्ष 2012-13 में की गई। कुल 135 नगरीय निकाय में योजना का क्रियान्वयन किया जा रहा है। इस वित्त वर्ष में इस योजना में 122 करोड़ से ज्यादा का बजट प्रावधान है। दृष्टि-पत्र 2018 के अनुसार प्रदेश के सभी नगरों में सतही तथा स्थाई जल-स्त्रोतों से 135 लीटर प्रति व्यक्ति प्रतिदिन पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित की जाना है।

    नगरों में पेयजल उपलब्ध करवाने के लिये यूआईडीएसएसएमटी योजना में 114 शहर में 179 परियोजनाएँ क्रियान्वित की जा रही हैं। अपूर्ण योजनाओं को पूर्ण करने के लिये भी 322 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।

    सिंहस्थ-2016

    राज्य सरकार ने प्रदेश में 12 वर्ष के अन्तराल पर होने वाले महापर्व सिंहस्थ का सफल आयोजन करवाया। महापर्व की तैयारी नगरीय विकास एवं पर्यावरण विभाग ने अन्य सहयोगी विभाग के माध्यम से वर्ष 2011 से ही शुरू कर दी थी। इस अन्तर्राष्ट्रीय आयोजन को भव्य और चिरस्मरणीय बनाने के लिये श्रेष्ठ व्यवस्थाएँ और आवश्यक अधोसंरचना का निर्माण करवाया गया। श्रद्धालुओं को सुगमता के लिये उज्जैन, इंदौर, देवास, ओंकारेश्वर, मंदसौर शहर में रेलवे ओव्हर-ब्रिज, पुल, सीमेन्ट-कांक्रीट सड़क के साथ क्षिप्रा नदी को प्रवाहमान बनाने के लिये नर्मदा-क्षिप्रा लिंक परियोजना का निर्माण किया गया।