Category: राजनीति

  • बाजीराव पेशवा से दोराहा में आज ही हारा था निजाम

    बाजीराव पेशवा से दोराहा में आज ही हारा था निजाम

    7 जनवरी विजय दिवस पर विशेष

    बाजीराव मस्तानी फिल्म ने भारत के गौरव की धूलधूसरित हो रही गौरवगाथाओं को एक बार फिर जीवंत कर दिया है। आज युवा पीढ़ी के लड़के लड़कियां इतिहास को खंगाल रहे हैं और तब उन्हें आश्चर्य हो रहा है कि उनके बीच ऐसा कमाल का योद्धा भी हुआ है जो कभी हारा ही नहीं। बाजीराव बल्लाल भट्ट ने शिवाजी का अधूरा सपना पूरा करने में हमेशा बहादुरी की नई मिसालें पेश कीं। दरअसल जब औरंगजेब के दरबार में अपमानित हुए वीर शिवाजी आगरा में उसकी कैद से बचकर भागे तो उन्होंने सोचा था कि न जाने वो दिन कब आएगा जब वे पूरी मुगल सल्तनत को देश के कदमों में झुका सकेंगे। वे मराठा ताकत का अहसास पूरे हिंदुस्तान को करवाना चाहते थे।अटक से कटक तक केसरिया परचम फहराने का नारा यहीं से जन्म लिया।इस सपने को पूरा करने का साहस बाजीराव पेशवा प्रथम ने किया।उसने साम्राज्य छीने नहीं बल्कि उन्हें अपने शौर्य का लोहा मानने पर मजबूर कर दिया। उन्नीस-बीस साल के उस युवा ने तीन दिन तक दिल्ली को बंधक बनाकर रखा। मुगल बादशाह की लाल किले से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं हुई। यहां तक कि 12वां मुगल बादशाह और औरंगजेब का नाती दिल्ली से बाहर भागने ही वाला था कि बाजीराव मुगलों को अपनी ताकत दिखाकर वापस लौट गया।

    बाजीराव अकेला ऐसा योद्धा था, जिसने 41 लड़ाइयां लड़ीं और एक भी नहीं हारी, जबकि शिवाजी जैसे शूरवीरों को भी कई बार अपने कदम पीछे हटाने पड़े । द्वितीय विश्वयुद्ध में ब्रिटिश आर्मी के कमांडर रहे मशहूर सेनापति जनरल मांटगोमरी ने भी अपनी किताब ‘हिस्ट्री ऑफ वॉरफेयर’ में बाजीराव की बिजली की गति से तेज आक्रमण शैली की जमकर तारीफ की है और लिखा है कि बाजीराव कभी हारा नहीं। आज वो किताब ब्रिटेन में डिफेंस स्टडीज के कोर्स में पढ़ाई जाती है। बाद में यही आक्रमण शैली सेकंड वर्ल्ड वॉर में अपनाई गई, जिसे ‘ब्लिट्जक्रिग’ बोला गया।

    बाजीराव पहला ऐसा योद्धा था, जिसके समय में 70 से 80 फीसदी भारत पर उसका सिक्का चलता था। वो अकेला ऐसा राजा था जिसने मुगल ताकत को दिल्ली और उसके आसपास तक समेट दिया था। पूना शहर को कस्बे से महानगर में तब्दील करने वाला बाजीराव बल्लाल भट्ट था, सतारा से लाकर कई अमीर परिवार वहां बसाए गए। निजाम, बंगश से लेकर मुगलों और पुर्तगालियों तक को कई कई बार बाजीराव ने धूल चटाई। शिवाजी के नाती शाहूजी महाराज को गद्दी पर बैठाकर बाजीराव ने उनकी ताकत का लोहा पूरे देश से मनवाया। देश में पहली बार हिंदू पद पादशाही का सिद्धांत भी बाजीराव प्रथम ने दिया था। हर हिंदू राजा के लिए वे आधी रात मदद करने को तैयार रहते थे। पूरे देश का बादशाह एक हिंदू हो ये तो उसके जीवन का लक्ष्य था, लेकिन जनता किसी भी धर्म को मानती हो वह उसके साथ न्याय करता था। उसकी अपनी फौज में कई अहम पदों पर मुस्लिम सिपहसालार थे, लेकिन वो युद्ध से पहले हर हर महादेव का नारा भी लगाना नहीं भूलता था। उसमें व्यक्ति की योग्यता को पहचानने की क्षमता थी। यही वजह थी कि उसके सिपहसालार बाद में मराठा इतिहास की बड़ी ताकतों के रूप में उभरे। चाहे होल्कर हों या सिंधिया, पवार हों या शिंदे, गायकवाड़ सभी पेशवा बाजीराव बल्लाल की कसौटी पर ही परखे गए थे।

    ग्वालियर, इंदौर, पूना और बड़ौदा जैसी ताकतवर रियासतें बाजीराव के चलते ही अस्तित्व में आईं। बुंदेलखंड की रियासत बाजीराव की शूरवीरता पर ही खुद को बचा सकी। महाराजा छत्रसाल की मौत के बाद उसका तिहाई हिस्सा भी बाजीराव को मिला। बनारस में बाजीराव ने 1735 में उनके नाम का एक घाट बनवाया था।दिल्ली के बिरला मंदिर में जाएंगे लगी बाजीराव की मूर्ति उनकी वीरता की कहानी कहती है। कच्छ में उन्होंने आईना महल बनवाया तो पूना में मस्तानी महल और शनिवार बाड़ा। अकबर की तरह बाजीराव को वक्त नहीं मिला, वह कम उम्र में ही चल बसा। उसके बाद आए शासकों और उनके परिजनों ने कई कारणों से उनके योगदान को प्रचारित करने में रुचि नहीं ली। देखा जाए तो अकबर के अलावा कोई और मुगल बादशाह नहीं था, जिससे उनकी तुलना बतौर योद्धा, न्यायप्रिय राजा और बेहतर प्रशासक के तौर पर की जा सके।

    दिल्ली पर आक्रमण उसका सबसे बड़ा साहसिक कदम था, वो अक्सर शिवाजी के नाती छत्रपति शाहू से कहता था कि मुगल साम्राज्य की जड़ों यानी दिल्ली पर आक्रमण किए बिना मराठों की ताकत को बुलंदी पर पहुंचाना मुमकिन नहीं, और दिल्ली को तो मैं कभी भी कदमों पर झुका दूंगा। छत्रपति शाहू सात साल की उम्र से 25 साल की उम्र तक मुगलों की कैद में रहे थे, वो मुगलों की ताकत को बखूबी जानते थे, लेकिन बाजीराव का जोश उस पर भारी पड़ जाता था। धीरे धीरे उसने महाराष्ट्र को ही नहीं पूरे पश्चिम भारत को मुगल आधिपत्य से मुक्त कर दिया। फिर उसने दक्षिण का रुख किया, निजाम जो मुगल बादशाह से बगावत कर चुका था, एक बड़ी ताकत था। कम सेना होने के बावजूद बाजीराव ने उसे कई युद्धों में हराया और कई शर्तें थोपने के साथ उसे अपने प्रभाव में लिया।

    इधर उसने बुंदेलखंड में मुगल सिपाहसालार मोहम्मद बंगश को हराया। मुगल असहाय थे, कई बार पेशवा से मात खा चुके थे, पेशवा का हौसला इससे बढ़ता गया। 1728 से 1735 के बीच पेशवा ने कई जंगें लड़ीं, पूरा मालवा और गुजरात उसके कब्जे में आ गया। बंगश, निजाम जैसे कई बड़े सिपहसालार पस्त हो चुके थे।

    इधर दिल्ली का दरबार ताकतवर सैयद बंधुओं को ठिकाने लगा चुका था, निजाम पहले ही विद्रोही हो चुका था। उस पर औरंगजेब के वंशज और 12 वें मुगल बादशाह मोहम्मद शाह को रंगीला कहा जाता था, जो कवियों जैसी तबियत का था। जंग लड़ने की उसकी आदत में जंग लगा हुआ था। कई मुगल सिपाहसालार विद्रोह कर रहे थे। उसने बंगश को हटाकर जय सिंह को भेजा, जिसने बाजीराव से हारने के बाद उसको मालवा से चौथ वसूलने का अधिकार दिलवा दिया। मुगल बादशाह ने बाजीराव को डिप्टी गर्वनर भी बनवा दिया। लेकिन बाजीराव का बचपन का सपना मुगल बादशाह को अपनी ताकत का परिचय करवाने का था, वो एक प्रांत का डिप्टी गर्वनर बनके या बंगश और निजाम जैसे सिपहसालारों को हराने से कैसे पूरा होता।

    उसने 12 नवंबर 1736 को पुणे से दिल्ली मार्च शुरू किया। मुगल बादशाह ने आगरा के गर्वनर सादात खां को उससे निपटने का जिम्मा सौंपा। मल्हार राव होल्कर और पिलाजी जाधव की सेना यमुना पार कर के दोआब में आ गई। मराठों से खौफ को देखते हुए सादात खां ने डेढ़ लाख की सेना जुटा ली थी। मराठों के पास तो कभी भी एक मोर्चे पर इतनी सेना नहीं रही थी। लेकिन उनकी रणनीति बहुत दिलचस्प थी। इधर मल्हार राव होल्कर ने रणनीति पर अमल किया और मैदान छोड़ दिया। सादात खां ने डींगें मारते हुआ अपनी जीत का सारा विवरण मुगल बादशाह को पहुंचा दिया और खुद मथुरा की तरफ चला गया।

    बाजीराव को पता था कि इतिहास बड़ी सफलताओं को गिनता है। उसने सादात खां और मुगल दरबार को सबक सिखाने की सोची। उस वक्त देश में कोई भी ऐसी ताकत नहीं थी, जो सीधे दिल्ली पर आक्रमण करने का ख्वाब भी दिल में ला सके। मुगलों का और खासकर दिल्ली दरबार का खौफ सबके सिर चढ़ कर बोलता था। लेकिन बाजीराव को पता था कि ये खौफ तभी हटेगा जब मुगलों की जड़ यानी दिल्ली पर हमला होगा। सारी मुगल सेना आगरा मथुरा में अटक गई और बाजीराव दिल्ली पर चढ़ बैठा। आज जहां तालकटोरा स्टेडियम है, वहां बाजीराव ने डेरा डाल दिया। दस दिन की दूरी बाजीराव ने केवल पांच सौ घोड़ों के साथ 48 घंटे में पूरी की, बिना रुके, बिना थके। देश के इतिहास में ये अब तक दो आक्रमण ही सबसे तेज माने गए हैं, एक अकबर का फतेहपुर से गुजरात के विद्रोह को दबाने के लिए नौ दिन के अंदर वापस गुजरात जाकर हमला करना और दूसरा बाजीराव का दिल्ली पर हमला।

    बाजीराव ने तालकटोरा में अपनी सेना का कैंप डाल दिया, केवल पांच सौ घोड़े थे उसके पास। मुगल बादशाह मौहम्मद शाह रंगीला बाजीराव को लाल किले के इतना करीब देखकर घबरा गया। उसने खुद को लाल किले के सुरक्षित इलाके में कैद कर लिया और मीर हसन कोका की अगुआई में आठ से दस हजार सैनिकों की टोली बाजीराव से निपटने के लिए भेजी। बाजीराव के पांच सौ लड़ाकों ने उस सेना को बुरी तरह शिकस्त दी। ये 28 मार्च 1737 का दिन था, मराठा ताकत के लिए सबसे बड़ा दिन। कितना आसान था बाजीराव के लिए, लाल किले में घुसकर दिल्ली पर कब्जा कर लेना। लेकिन बाजीराव को पता था कि शासन का फिजूल विस्तार बोझिल हो जाता है। इसलिए उसने लड़ाई को बढ़ाने के बजाए वापस लौटना उचित समझा।

    वो तीन दिन तक वहीं रुका, एक बार तो मुगल बादशाह ने योजना बना ली कि लाल किले के गुप्त रास्ते से भागकर अवध चला जाए। लेकिन बाजीराव बस मुगलों को अपनी ताकत का अहसास दिलाना चाहता था। वो तीन दिन तक वहीं डेरा डाले रहा, पूरी दिल्ली एक तरह से मराठों के रहमोकरम पर थी। उसके बाद बाजीराव वापस लौट गया। बुरी तरह बेइज्जत हुआ मुगल बादशाह रंगीला ने निजाम से मदद मांगी, वो पुराना मुगल वफादार था, मुगल हुकूमत की इज्जत को बिखरते नहीं देख पाया। वो दक्कन से निकल पड़ा। इधर से बाजीराव और उधर से निजाम दोनों मध्यप्रदेश के सिरोंज में मिले। लेकिन कई बार बाजीराव से पिट चुके निजाम ने उसको केवल इतना बताया कि वो मुगल बादशाह से मिलने जा रहा है।

    निजाम दिल्ली आया, कई मुगल सिपहसालारों ने हाथ मिलाया और बाजीराव को बेइज्जती करने का दंड देने का संकल्प लिया और कूच कर दिया। लेकिन बाजीराव बल्लाल भट्ट से बड़ा कोई दूरदर्शी योद्धा उस काल खंड में पैदा नहीं हुआ था। ये बात सही साबित हुई, बाजीराव खतरा भांप चुका था। अपने भाई चिमना जी अप्पा के साथ दस हजार सैनिकों को दक्कन की सुरक्षा का भार देकर वो अस्सी हजार सैनिकों के साथ फिर दिल्ली की तरफ निकल पड़ा। इस बार मुगलों को निर्णायक युद्ध में हराने का इरादा था, ताकि फिर सिर ना उठा सकें।

    दिल्ली से निजाम के अगुआई में मुगलों की विशाल सेना और दक्कन से बाजीराव की अगुआई में मराठा सेना निकल पड़ी। दोनों सेनाएं भोपाल में मिलीं, 24 दिसंबर 1737 का दिन मराठा सेना ने मुगलों को जबरदस्त तरीके से हराया। निजाम की समस्या ये थी कि वो अपनी जान बचाने के चक्कर में जल्द संधि करने के लिए तैयार हो जाता था। इस बार 7 जनवरी 1738 को ये संधि दोराहा में हुई। मालवा मराठों को सौंप दिया गया और मुगलों ने पचास लाख रुपये बतौर हर्जाना बाजीराव को सौंपे। चूंकि निजाम हर बार संधि तोड़ता था, सो बाजीराव ने इस बार निजाम को मजबूर किया कि वो कुरान की कसम खाकर संधि की शर्तें दोहराए।

    ये मुगलों की अब तक की सबसे बड़ी हार थी और मराठों की सबसे बड़ी जीत। पेशवा बाजीराव बल्लाल भट्ट यहीं नहीं रुका, अगला अभियान उसका पुर्तगालियों के खिलाफ था। कई युद्दों में उन्हें हराकर उनको अपनी सत्ता मानने पर उसने मजबूर किया। अगर पेशवा कम उम्र में ना चल बसता, तो ना अहमद शाह अब्दाली या नादिर शाह हावी हो पाते और ना ही अंग्रेज और पुर्तगालियों जैसी पश्चिमी ताकतें। बाजीराव का केवल चालीस साल की उम्र में इस दुनिया से चले जाना मराठों के लिए ही नहीं देश की बाकी पीढ़ियों के लिए भी दर्दनाक भविष्य लेकर आया। अगले दो सौ साल गुलामी की जंजीरों में जकड़े रहा भारत और कोई भी ऐसा योद्धा नहीं हुआ, जो पूरे देश को एक सूत्र में बांध पाता। भारत के इस गौरवशाली इतिहास को आजादी के बाद की सरकारों ने भुलाने का भरसक प्रयास किया लेकिन आज यही स्वर्णिम इतिहास एक बार फिर भारत को सुशासन का नायाब नमूना बनाने चल पड़ा है।(इतिहास की विभिन्न किताबों से पुनःप्रस्तुत)

  • लोकतंत्र की आड़ में छद्म प्रेम का स्वांग रचती राहुल कांग्रेस

    लोकतंत्र की आड़ में छद्म प्रेम का स्वांग रचती राहुल कांग्रेस

    नमन नमन में भेद है बहुत नमें नादान।
    दगा बाज दुणा नमैं चीता चोर कमान।।

    भावार्थ- अलग-अलग व्यक्ति अलग-अलग ढंग से नमन करते हैं। अतः सबके नमन करने में भिन्नता होती है, धोखेबाज , चोर और कमान और भी ज्यादा झुकते हैं। किन्तु इन सबका झुकना किसके लिए लाभकारी होता है।चीते का, चोर का और कमान का झुकना अनर्थ से खाली नहीं होता है । चीता हमला करने के लिए झुककर कूदता है । चोर मीठा वचन बोलता है, तो विश्वासघात करने के लिए । कमान (धनुष) झुकने पर ही तीर चलाती है ।

    रहीम के दोहे जिन्होंने पढ़े हैं या सुने हैं वे अच्छी तरह जानते हैं कि कड़वा सच बोलने वाला भले ही लोगों को पसंद नहीं होता लेकिन वो हमें कुछ न कुछ सिखा जरूर देता है। जबकि मीठा बोलकर पीठ में छुरी घोंपने वाला हमेशा दुखदायी होता है। गुजरात में युवा पीढ़ी को बहकाने में सफल राहुल कांग्रेस और उनके सहयोगी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर हल्की टिप्पणियां करने का आरोप लगा रहे हैं। उनका कहना है कि प्रधानमंत्री को राज्य के चुनाव में आकर हस्तक्षेप करना शोभा नहीं देता। आज तक के इतिहास में किसी प्रधानमंत्री ने इस तरह राज्य के चुनावों में हस्तक्षेप नहीं किया। वे देश का संचालन करते तो ज्यादा अच्छा होता।

    ये ज्ञान वे ही बांट रहे हैं जो जानते हैं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कारण ही गुजरात में उनकी घुसपैठ का प्रयास असफल हुआ है। गुजरात के बहाने कांग्रेस और भाजपा विरोधी राजनीतिक दल देश में एक बार फिर अराजकता भरा कुशासन देने का प्रयास कर रहे थे। उन्हें मालूम है कि भाजपा की सरकारों ने आधारभूत संरचनाओं के विकास के साथ भारत के विकास का रोडमेप तैयार कर लिया है। जो काम आजादी के बाद से देश में होना था उसकी शुरुआत पिछले एक दशक में हुई है। अब जबकि देश विकासपथ पर गतिमान होने को अग्रसर है तब कांग्रेसियों का प्रयास है कि सरकार की कमान छीन ली जाए । कांग्रेस और उसकी आड़ में देश पर लूट का साम्राज्य स्थापित करने वाली ताकतों ने आजादी के बाद से देश में धर्मनिरपेक्षता की आड़ में जो साम्प्रदायिकता के विष बीज बोए उसके चलते आज हिंदुस्तान कई समस्याओं से घिर गया है। जातिवाद को देश की सच्चाई बताने वाले बुद्धिजीवियों ने इसी आड़ में जातिवादी राजनीति के कई दांव खेले। जबकि वे विकास की आंधी से जातिवाद की इस सच्चाई की तस्वीर बदल सकते थे।

    दलित राजनीति की आड़ में देश के संसाधनों पर कब्जा करने वाले षड़यंत्रकारियों ने लूटमार का जो माहौल बनाया है उससे पूरी दुनिया के बीच हिंदुस्तान एक मूर्खतापूर्ण कवायद में घिरा देश बनकर रह गया है। ये भारत ही है जिसमें दलित होने के कारण कोई व्यक्ति योग्य व्यक्ति से आगे निकल सकता है। यदि दलितों पर इतिहास में अत्याचार हुए तो क्या दलित होने पर किसी को अत्याचार करने की छूट दी जा सकती है। ये परिपाटी कांग्रेस ने ही देश में शुरु की। आज ये विषबेल इतनी फैल गई है कि जो इसमें काटछांट करने का प्रयास करे वही सत्ता से वंचित कर दिया जाए। गुजरात में पाटीदारों का आंदोलन इसकी मिसाल है। जो पाटीदार आर्थिक रूप से समृद्ध हैं वे आरक्षण की मांग लेकर सड़कों पर निकल पड़ें इससे ज्यादा बड़ी समस्या क्या हो सकती है। वो भी ये जानते हुए कि माननीय सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद देश में पचास फीसदी से अधिक आरक्षण नहीं दिया जा सकता है। देश के सरकारी पदों पर पचास फीसदी लोग केवल इसलिए काबिज कर दिए जाएं कि वो दलित हैं इससे ज्यादा बेहूदा फैसला कौन सा हो सकता है। ये तो संतोष की बात है कि केन्द्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली ने चुनाव से पहले साफ कह दिया था कि पाटीदारों को संविधान के दायरे में आरक्षण नहीं दिया जा सकता। जबकि सत्ता पर काबिज होने के फेर में झूठ बोलते हुए कांग्रेस हार्दिक पटेल और उनके सहयोगियों के साथ खड़ी रही। ये बेशर्मी नहीं तो क्या है।

    कांग्रेस ने जिग्नेश मेवाणी, अल्पेश राठौर और हार्दिक पटेल के माध्यम से बेरोजगारों के बीच जो जातिवादी कार्ड खेला उसे अनुभवहीन युवाओं के बीच भरपूर समर्थन भी मिला। अब इस बात पर यदि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कहते हैं कि गुजरात को हम बड़ी मुश्किलों से जातिवादी दायरे से बाहर निकाल सके हैं, कृपया विकास के इस माहौल को पटरी से न उतारें तो इसमें कौन सी गाली छिपी है। सख्त सरकार से नाराज मीडिया इसे यदि प्रधानमंत्री की असहिष्णुता या बदमिजाजी बताने जुट जाए तो फिर जनता को हक है कि वो इस मीडिया को दौड़ा दौड़ाकर सुधारे।

    गुजरात में कांग्रेस और भाजपा विरोधियों ने सत्ता संधान का जो मार्ग चुना वो अनैतिकता की गली से गुजरकर जाता है। कांग्रेस को पूरा हक है कि वो जनता के बीच सेवाकार्य करके विश्वास अर्जित करे और फिर सत्ता के लिए खुद को विकल्प के रूप में प्रस्तुत करे। लेकिन कांग्रेस ने ये नहीं किया। उसने संगठन को आऊटसोर्स करके खरीदा और फिर विद्रोह भड़काकर चोर दरवाजे से सत्ता पाने की चालें चलीं। इसे कानून की भाषा में राजद्रोह कहा जाता है। राजतंत्रों में इस करतूत की सजा मौत होती है। लोकतंत्र के नाम पर झूठी पैरवी करने की इजाजत किसी को नहीं दी जा सकती। विरोधी दलों को जनता की वाजिब समस्याओं को लेकर संघर्ष करने की इजाजत है पर फ्रेब्रीकेटेड समस्याओं के आधार पर देश को गुमराह करने की छूट किसी को नहीं दी जा सकती।

    भाजपा ने खुद अब तक जो विकास की जो राह चुनी उसमें कांग्रेस की बदइंतजामियों भरी नीतियों को जारी रखा है। इसलिए वो खुलकर कांग्रेस का विरोध नहीं कर पा रही है। भाजपा कांग्रेस को बंद करने की जो सोच रखती है इसके लिए उसे भी आगे बढ़कर कांग्रेस की विनाशकारी नीतियों को कुचलना होगा। तभी जाकर वो एक नए भारत का विकास कर सकती है। भाजपा के सलाहकारों को इस पर गौर करना होगा। देश की जनता ने भाजपा को अपनी समस्याओं का निराकरण करने के लिए सत्ता में भेजा है। भाजपा यदि वो बदलाव नहीं करती है तो फिर जनता का प्रयास कारगर नहीं हो सकेगा। जाहिर है कि जनता इस बैचेनी का हल कांग्रेस में ढूंढ़ेगी जो एक नई मुसीबत को ही जन्म देगी।

  • कांग्रेस का नया राहुल सोच पुरानी

    कांग्रेस का नया राहुल सोच पुरानी


    चौदह साल के इंतजार के बाद आखिर राहुल गांधी ने कांग्रेस की बागडोर संभाल ही ली। वंशवादी परंपरा के अधीन चलने वाली कांग्रेस एक बार फिर अपने ब्रितानी चहेतों को खुश करने चल पड़ी है। राहुल गांधी ने इसलिए पार्टी का कार्यभार संभालते समय अंग्रेजी में भाषण दिया। हालांकि समर्थकों को बांधे रखने के लिए उन्होंने हिंदी में भी वही भावनाएं व्यक्त कीं। उनके भाषणों का बिंदु प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी भारतीय जनता पार्टी ही थी। राहुल गांधी ने कहा कि हम प्रेम फैलाते हैं। भाजपा लोगों को बांटती है। हम धर्म निरपेक्ष हैं और दूसरी पार्टियां साम्प्रदायिक हैं.भाजपा आग लगाती है हम बुझाते हैं। बरसों से कांग्रेस इसी घिसी पिटी सोच पर चलती रही है। कांग्रेस की स्थापना ही भारत में अंग्रेजी राज को बचाने के लिए की गई थी। कोशिश थी कि भारतीयों की राजनीतिक पार्टी के माध्यम से अंग्रेज जनता की आवाज को समझ सकेंगे और उनके अनुसार अपनी नीतियां बदल सकेंगे। बहुत सालों तक यही चलता रहा। बाद में जब सुभाष चंद्र बोस और अन्य क्रांतिकारियों ने गली कूंचों में अंग्रेजों को मारना पीटना शुरु कर दिया तब अंग्रेजों ने कांग्रेस के नेतृत्व को आगे रखकर सत्ता का हस्तांतरण कर दिया। जिसे कांग्रेस ने आजादी का नाम दिया। इसी आजादी का सेहरा गांधीजी के सिर बांध दिया गया। कवि प्रदीप ने इस पर गीत लिखा, दे दी हमें आजादी बिना खडग़ बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल। कांग्रेस के इसी पाखंड से नाराज होकर नाथूराम गोडसे ने गांधी को गोली मार दी। गोडसे के एक आतंकी कृत्य ने आजादी के संग्राम की हकीकत पर जो पर्दा डाला उससे कांग्रेस देश में सात दशकों तक शासन करती रही। उस कांग्रेस को न गांधी से वास्ता था और न ही वो गांधीवादी मूल्यों से कोई सरोकार रखती थी। उसने जाति और धर्म के आधार पर देश को बांटने की नीतियां बनाईँ। दलितों को बांटा, युवाओं को बांटा, महिलाओं को बांटा, हिंदुओं को बांटा मुसलमानों को बांटा। इस तरह खंड खंड में बंटा हिंदुस्तान आज आपसी वैमनस्य के जाल में ही उलझा पड़ा है। जब भी कांग्रेस के इस चरित्र पर बात की जाती है तो तथाकथित बुद्धिजीवी असहिष्णु होने का आरोप लगा देते हैं। कांग्रेस अपने इस परखे हुए फार्मूले को छोडऩा ही नहीं चाहती है। वह शैतान पर कंकर मारने की अपनी नीति को ही अपना तारणहार मानती है। इसीलिए उसने गुजरात में युवाओं को भरमाने की रणनीति अपनाई। हालिया चुनाव में जब भाजपा ने देखा कि बाईस साल के युवाओं ने जिन्होंने कांग्रेस का शासन कभी देखा नहीं वे ही भ्रमित हो चले हैं तो उसने अपनी पुरानी रणनीति को सामने रखकर कांग्रेस की कलई खोलना शुरु कर दी। इसीलिए आज राहुल गांधी की ताजपोशी के वक्त सोचा जा रहा था कि वे किन्हीं अलग मुद्दों पर अपनी बात कहेंगे। लेकिन उन्होंने वही रटी रटाई लीक को ही पीटा। बार बार वे कहते रहे कि भाजपा लोगों को लड़ाती है। हमारी नीति प्रेम फैलाना है। जितनी बार वे ये शब्द दुहराते थे उतनी बार कांग्रेस और गांधी परिवार का खोखला देश प्रेम उजागर होता जाता था। सोनिया गांधी ने कहा कि बीस साल पहले आपने मेरे पति की हत्या के बाद मुझे पार्टी संभालने की जवाबदारी सौंपी थी। तबसे हमने देश की जनता की बेहतरी के लिए कई सफल योजनाएं बनाई हैं। देश की जनता को ज्यादा पारदर्शिता वाला शासन मिला। इसके बावजूद वे ये नहीं बोलीं कि हमने देश की अर्थव्यवस्था में क्या तब्दीली लाई। दरअसल पीवी नरसिम्हाराव की सरकार ने वित्तमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह के माध्यम से विश्व बैंक की नीतियों को लागू किया था। मुक्त बाजार की अर्थव्यवस्था की नीति वर्ष 1991 में लागू कर दी गई थी। इसके बावजूद कांग्रेस की किसी सरकार में दम नहीं था कि वो खुलकर कह सके कि अब तक की कांग्रेस की नीतियों ने देश को गरीबी के दलदल में धकेला है। आज भी वे ये नहीं कह रहे कि बैंकों का धन उलीचने में उनकी पार्टी ने क्या आपराधिक काम किया। बैंकों पर दबाव डालकर फर्जी कंपनियों को करोड़ों रुपयों के लोन दिला दिए । जनता का धन लूटकर विजय माल्या जैसे लोग ब्रिटेन जाकर बस गए। अपनी बचत के लिए उन्होंने भाजपा भी ज्वाईन की लेकिन उनकी पोल अंतत: खुल ही गई। आज भी कांग्रेस खुलकर नहीं कह रही है कि वो देश की पार्टी नहीं है। उसने ऐसा छद्म आवरण ओढ़ रखा है कि वो खुद को देश का माईबाप बताने से नहीं चूकती। उसका स्थान लेने वाली भाजपा भी उसका खुलकर विरोध नहीं करती क्योंकि वो भी उन्हीं नीतियों पर चलती रही है जिनसे कांग्रेस अपनी कुर्सी बचाती रही । आज एक बार फिर जब नोटबंदी और जीएसटी जैसे आर्थिक सुधारों के कारण भाजपा को जनता की नाराजगी झेलना पड़ रही है तब भाजपा को कांग्रेस की लोकप्रियता वादी नीतियों की जरूरत महसूस हो रही है। शायद यही कारण है कि भाजपा की सरकारों ने धड़ाधड़ कर्ज लेकर जनता को खुश करने वाली नीतियों पर अमल शुरु कर दिया है। अब वो भी सरकारी नौकरियां बांटने चल पड़ी है,जबकि सरकारीकरण देश पर अभिशाप साबित हो चुका है। मुनाफे वाली कंपनियों को खुश करने के लिए काल्पनिक योजनाओं पर अमल शुरु कर रही है। उसे सत्ता में बने रहने के लिए लगातार चुनाव जीतना हैं। इसके लिए वो तमाम फार्मूलों को आजमा रही है। जाहिर है कि कांग्रेस और भाजपा की नीतियों में टकराव के कारण आने वाले समय में जनता को ठगने वाली नीतियां ही अधिक बनेंगी। जिसका पाप राहुल गांधी के सिर ही बंधेगा।

  • लुटेरों की सोहबत से उकताने लगे कांग्रेसी

    लुटेरों की सोहबत से उकताने लगे कांग्रेसी


    मध्यप्रदेश के कांग्रेसजन इन दिनों चकित हैं। वे भौचक्के होकर देख रहे हैं कि उनकी पार्टी आखिर लुटेरों, ठगों और धूर्त लोगों के इर्द गिर्द क्यों सिमटती जा रही है। स्वाधीनता संग्राम सेनानियों के जो वंशज कभी पार्टी को अपना परिवार और सांसें समझते थे वह आज उन्हें पहचानने से भी इंकार क्यों कर रही है। दरअसल वे समझने तैयार ही नहीं कि उनकी कांग्रेस ने चोला बदल लिया है। कभी वह चोरी छुपे समाजविरोधी लोगों को प्रश्रय देती थी अब वह खुलेआम सत्ता के दलालों की बाहें थामे घूम रही है। इसकी वजह शायद ये कि वह अपने अंत की तस्वीर देखकर भयाक्रांत है।

    बरसों से घरों पर खाट तोड़ रहे जो कार्यकर्ता इस उम्मीद में प्रदेश कार्यालय पहुंचे कि उनके आलाकमान ने नया प्रदेश प्रतिनिधि भेजा है पर उनके हाथ निराशा ही लगी। इंजीनियर दीपक बावरिया से उन्हें उम्मीद थी कि वे पार्टी संगठन का विस्तार करके एक बार फिर बुलंद कांग्रेस खड़ी कर देंगे। जब पार्टी दफ्तर में उन्हें प्रदेश से हकाले गए नेता के बेटे के चंगुल में घिरा देखा तो वे चकित रह गए। शाम होते होते उनके धैर्य का बांध टूट गया और कमलनाथ जिंदाबाद के नारे लगाते हुए उन्होंने बावरिया को भागने पर मजबूर कर दिया। कांग्रेसियों के बीच ये बात फैल चुकी है कि बावरिया को भाजपा से सीटों का समझौता करने भेजा गया है। जबकि अब तक कमलनाथ प्रदेश भर में विजय का जाल बिछा रहे थे। बावरिया के आने से कमलनाथ के अलावा प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव, अजय सिंह, मुकेश नायक, सुरेश पचौरी जैसे वरिष्ठ नेता भी हलाकान हैं। उनके समर्थकों को वे कहां एडजस्ट करें ये नहीं समझ आ रहा है। क्योंकि बावरिया तो पहले से बनी बनाई सूची लेकर बैठे हैं। ज्यादातर कांग्रेसियों का कहना है कि आलाकमान को बरसों से कहते रहने के बावजूद प्रदेश में नेतृत्व को लेकर पार्टी ने संशय का माहौल बना रखा है। खुद राहुल गांधी चेहरा देखकर फैसले करते हैं। उन्होंने ही अरुण यादव को प्रदेश में पार्टी की कमान सौंप रखी है जबकि वे अब तक न कार्यकर्ताओं को एकजुट कर पाए हैं और न ही शीर्ष नेताओं का विश्वास पा सके हैं।

    इस बीच कांग्रेसियों ने अपनी ही पुरानी सरकार के खिलाफ बोलना शुरु कर दिया है। उनका कहना है कि जो सरकार बाकायदा श्वेत पत्र निकालकर दुनिया को ये बताती हो कि उसका दिवाला निकल चुका है उस सरकार के नेता को अब तक पार्टी ने क्यों गले में लटका रखा है। गौरतलब है कि पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार ने जनवरी 2003 में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना पर श्वेत पत्र निकाला था। जिसमें बताया गया कि भारत शासन ने 2000 से 2002 तक 1201 सड़कें बनाने की स्वीकृति प्रदान की है। इस दौरान 5853किमी. सड़कें बनाना है। इसके बावजूद तत्कालीन राज्य सरकार उन योजनाओं को साकार नहीं कर सकी क्योंकि उसने हर निविदा में ठेकेदारों से भारी धनराशि वसूलने की अड़ीबाजी की थी। कांग्रेस की सरकार जाने के बाद ठेकेदारों ने उन सभी सड़कों को धड़ाधड़ बना दिया क्योंकि नई सरकार बिजली , सड़क और पानी की सुविधाएं मुहैया कराने के नाम पर ही शासन में भेजी गई थी। जाहिर है कि कांग्रेस के मुख्यमंत्री ने प्रदेश हित और पार्टी हित को ताक पर धरकर स्वहित को सर्वोपरि माना था।

    इसी तरह जून 2003 में सरकार ने ऊर्जा के हालात पर श्वेत पत्र प्रकाशित किया और कहा कि छत्तीसगढ़ राज्य बन जाने के कारण हमारा बिजली उत्पादन प्रभावित हुआ है। हमारा वार्षिक घाटा बढ़कर 2100 करोड़ रुपए हो गया है। इसके बावजूद हमने सिंचाई पंपों को अस्थायी कनेक्शन और मुफ्त बिजली दी है। हालांकि सरकार के दावों की पोल गली चौबारों में खुल रही थी। लोग आंदोलन कर रहे थे। मध्यप्रदेश विद्युत मंडल के दफ्तरों को आग के हवाले किया जा रहा था। इस बीच सरकार ने 22 निजी बिजली उत्पादकों से अनुबंध किए। वे सभी अनुबंध फेल हो गए। जब जनता बिजली को लेकर भड़क गई तो सरकार ने कहा कि हमने मुफ्त बिजली देने का कार्यक्रम शुरु किया था इसलिए प्रदेश में बिजली की मांग बढ़ गई। बिजली चोरी भी बढ़ गई इसलिए बिजली की कमी हो गई। इसके बाद सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र की बिजली इकाईयों पर निवेश शुरु कर दिया। बिरिसिंहपुर, अमरकंटक, मडी़खेड़ा जल विद्युत परियोजना, बाणसागर जल विद्युत परियोजना, पीथमपुर ,इंदिरासागर, महेश्वर जैसी परियोजनाओं का भरोसा भी जनता को दिलाया। इसके बावजूद सरकार की नाकामियों पर भड़की जनता एक भी बात सुनने तैयार नहीं थी।

    वास्तव में पीव्हीनरसिंम्हाराव की केन्द्र सरकार में वित्तमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह ने मुक्त बाजार व्यवस्था की नीति पर चलने की घोषणा तो कर दी थी लेकिन उनकी ही कांग्रेसी सरकारें इस दिशा में चलने को तैयार नहीं थीं। मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह अपनी पार्टी को इसके लिए तैयार करने में बुरी तरह असफल रहे। उनकी ही पार्टी ने अपनी सरकार को घेरना शुरु कर दिया । इस बीच दिग्विजय सिंह ने अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए अपने समर्थकों को आगे बढ़ाने के लिए पार्टी के पुराने नेताओं को पीछे धकेलना शुरु कर दिया। उन पर झूठे मुकदमे बनाए गए। उन्हें तरह तरह के लांछन लगाकर बदनाम किया गया। पार्टी की जवाबदारियों से हटाया गया। नतीजतन कांग्रेस पार्टी के भीतर ही विद्रोह फैल गया। आज हाल ये हैं कि जैसे ही लोगों को मालूम पड़ा कि दीपक बावरिया दिग्विजय के इशारे पर काम कर रहे हैं और एक बार फिर वही दमन चक्र शुरु करने की तैयारी कर रहे हैं तो पार्टी के कार्यकर्ता भड़क गए। उन्होंने पार्टी के प्रदेश कार्यालय में ही बावरिया का ढोल बजा दिया।

    जबकि भाजपा की नई सरकार ने आते ही बिजली सुधारों पर तेजी के अमल करना शुरु कर दिया। नतीजतन तेरह सालों बाद आज बिजली की सप्लाई 125 फीसदी बढ़ गईहै। 2003 में जो बिजली सप्लाई 2899 मिलियन यूनिट थी वो साल भर के भीतर 30625 मिलियन यूनिट हो गई। आज प्रदेश में 64374 मिलियन यूनिट बिजली सप्लाई हो रही है। प्रदेश बिजली के मामले में आत्मनिर्भर है और वह गाहे बगाहे अपनी अतिरिक्त बिजली अन्य राज्यों को भी बेच लेता है। इसकी वजह ये है कि प्रदेश में बिजली का उत्पादन 2003 की तुलना में 243 फीसदी बढ़ गया है। मांग और आपूर्ति के बीच 129 फीसदी का इजाफा हुआ है। ट्रांसमिशन क्षमता में तेरह सालों में 236 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है। अति उच्च दाब लाईनों भी बिछाई गईं और ये लगभग 82 फीसदी बढ़ गईं हैं। ये बिजली सप्लाई सुचारू रहे इसके लिए अति उच्च दाब केन्द्र 162 से बढ़कर 331 हो गए हैं। ट्रांसफार्मरों की उपलब्धता भी बढ़ी है, तेरह सालों में ये क्षमता 174 फीसदी ज्यादा हो गई है। बिजली के क्षेत्र में आर्थिक संकट दूर करने के लिए जो प्रयास किए गए उनसे पिछले पांच सालों में नकद राजस्व बढ़कर 17838 करोड़ रुपए हो गया है। इस तरह एक बीमारू राज्य को काफी प्रयासों के बावजूद विकसित राज्य बनाया गया है। इसके बावजूद कांग्रेस आलाकमान जनता के अपराधी और असफल नेता को सेवामुक्त करने में हिचक रही है। इसकी सबसे बड़ी वजह ये बताई जा रही है कि सत्ता में रहते हुए उसने हाईकमान को मुद्रा सप्लाई में कमी नहीं की थी। भले ही प्रदेश के लोग हलाकान थे लेकिन आलाकमान मध्यप्रदेश के चंदे पर गुलछर्रे उड़ा रहा था।

    यही नहीं पंचायती राज का ढिंढोरा पीट रही तत्कालीन दिग्गी सरकार ने प्रदेश को कंगाली के दलदल में धकेल दिया था। प्रदेश की आर्थिक स्थिति का आकलन करने के लिए फरवरी 2004 में जो श्वेत पत्र निकाला गया उसमें कहा गया कि पूर्ववर्ती सरकार ने जो ऋण लिया उसका उपयोग विकास कार्यों में नहीं किया। बल्कि उसे गैर विकास कार्यों में ही खर्च कर दिया।शुद्ध लोक ऋण 7 हजार करोड़ से बढ़कर 31 हजार करोड़ तक पहुंच गया। हर व्यक्ति पर कर्ज बढ़कर 5183 हजार रुपए हो गया। सरकार ने 1999-2000 में शुद्ध ऋण का मात्र 24 फीसदी ही पूंजीगत विकास में खर्च किया गया। जबकि शेष राशि राजस्व व्यय के नाम पर उड़ा दी।सरकार को अपने कर्ज पर आय का 23 फीसदी ब्याज देना पड़ रहा था। हालात ये हो गए कि वित्तीय संस्थानों ने भी मध्यप्रदेश को कर्ज देने से मना कर दिया। कुशासन और कुप्रबंधन की इससे बडी़ मिसाल शायद ही कहीं देखने मिले। इसके बावजूद कांग्रेस आलाकमान अपनी राजनीतिक मौत सन्निकट देखकर प्रदेश में कंजर संस्कृति अपनाने पर उतर आया है।

    तत्कालीन लोकायुक्त जस्टिस फैजानुद्दीन ने कांग्रेस की सरकार के मुख्यमंत्री और मंत्रियों को अलीबाबा और चालीस चोर की उपमा दी थी। उनके कार्यकाल में लोकायुक्त संगठन ने कड़ी सिफारिशें भी की थीं जिन्हें तत्कालीन सरकार ने कचरे के डिब्बे में डाल दिया था। अब अपने विधायक बेटे को पार्टी पर थोपने के अभियान में उन्होंने नई नवेली बहू को भी शरीक कर लिया है। जाहिर है कि जिस पीढ़ी के युवाओं ने दिग्गी की भ्रष्ट सरकार के कारनामे नहीं देखे हैं वे इस यात्रा से कुछ अमृत निकलने की उम्मीद लगाए बैठे हैं। इसके बावजूद उन्हें अहसास नहीं कि उनकी ही पार्टी के दिग्गज ये ख्याली पुलाव कभी साकार नहीं होने देंगे।

  • बौद्धिक संपदा अधिकार की अनुमति से विकिरण रहित संचार क्रांति संभवःसंजर

    बौद्धिक संपदा अधिकार की अनुमति से विकिरण रहित संचार क्रांति संभवःसंजर

    भोपाल(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)। सांसद आलोक संजर का कहना है कि बौद्धिक संपदा अधिकार प्राप्त होने के बाद होने वाले अनुसंधानों से क्वाण्टम गणित की गणनाएं ज्यादा सुग्राही तरीके से की जा सकती हैं। आज की संचार क्रांति में इसका एक उपयोग नई पीढ़ी का जीवन सरल बना देगा।इस नई तकनीक से विकसित उपकरणों से विकिरण भी नहीं फैलेगा और हमारे संचार उपकरण ज्यादा सटीकता से कार्य कर सकेंगे। इस अकेली तकनीक का पेटेंट हमारे पास होने से देश को भारी विदेशी मुद्रा भी प्राप्त होगी। भारत सरकार इस विषय पर गंभीर चिंतन कर रही है। निकट भविष्य में सरकार के ये प्रयास भारत को विश्व गुरु बनाने में सहयोगी साबित होंगे।

    आज क्वाण्टम गणित के क्षेत्र में बौद्धिक संपदा अधिकार की लड़ाई लड़ने के लिए भोपाल में एक कार्यशाला का आयोजन किया गया। जिसमें वक्ताओं ने विश्व व्यापार संगठन के नियमों का लाभ उठाने के लिए गणित कापीराईट सोसाईटी को पंजीकृत करने की आवश्यकता बताई। समिति अधिनियम की धारा 33 और नियम 12 के अंतर्गत इस तरह की समिति को पंजीकृत करवाने की पहल भारत सरकार को करनी है।

    सांसद आलोक संजर ने कहा कि मैं इस मुद्दे को दो बार संसद में भी उठा चुका हूं। भारत सरकार गणितीय समिति के पंजीयन की दिशा में गंभीरता से विचार कर रही है। भविष्य की गणनाओं पर भारत के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए उन्होंने विश्व प्रसिद्ध गणितज्ञ श्याम सिंह ठाकुर को शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि श्री ठाकुर भारत की धरोहर हैं। कुछ साल पहले उन्होंने वाईटूके समस्या को हल करके दुनिया में अपनी बौद्धिक दक्षता का डंका बजाया था। उन्होने भगवान विश्वकर्मा जयंती पर श्री ठाकुर को उनके अनुसंधान कार्यों के लिए सफलता की शुभकामनाएं भी दीं। श्री संजर ने कहा कि जिस तरह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश को नई दिशा में ले जाने लिए अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर रहे हैं उसी तरह श्री ठाकुर भी अपने मकसद में अवश्य सफल होंगे।
    अक्षर प्रभात ट्रस्ट के प्रतिनिधि राम निवास गोलस ने बौद्धिक संपदा अधिकार के लिए गणितीय सोसाईटी की अनिवार्यता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारत सरकार ने 1995 में बौद्धिक संपदा अधिकार अनुबंध पर हस्ताक्षर किए थे। इसे 2005 में लागू भी कर दिया गया। इसके बाद12 मई 2016 को सरकार ने बौद्धिक संपदा अधिकार नीति घोषित भी कर दी। इसके अगले चरण के रूप में अनुबंध कापीराईट आदेश 1999 के अनुच्छेद 9.2और 10 को लागू किया जाना था। ये अभी तक लागू नहीं किया गया है। इससे आईपीआर नीति पर अमल नहीं हो पा रहा है और भारत को विश्व के सर्वोत्तम विश्वविद्यालय का दर्जा नहीं मिल पा रहा है।

    भारत की सरकारों की अनदेखी के चलते दुनिया के कई देश इसे मनमाने ढंग से लागू कर रहे हैं। नासा और यूरोप की स्पेस एजेंसियों ने इसे थ्योरी आफ एवरीथिंग नाम से लागू किया है। नेशनल जियोग्राफी के अक्टूबर 1999 के अंक में पेज क्रमांक 25 से 30 तक मेपिंग द यूनिवर्स शीर्षक से एक लेख प्रकाशित किया गया है जिसमें बताया गया है कि जापान के टोकियो विश्वविद्यालय ने अर्थमेट्री ज्योमेट्री के नाम से इसे 16 से 20 फरवरी 2004 को शिक्षा में लागू भी कर दिया है। जबकि इसे लागू करने से पहले दुनिया के तमाम देशों को भारत की गणितीय सोसाईटी से अनुमति लेना आवश्यक है।

    उन्होंने कहा कि भारत के कंप्यूटर इंजीनियरों को प्रोफेशनल घोषित करने के लिए भारत सरकार को क्वाण्टम गणित रेगुलेटरी अथार्टी बनाना होगी। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति ने भारत के उच्च शिक्षा संस्थानों में टी-4 आदेश लागू किया है। इसके बाद प्रोफेसर बनने के लिए आईपीआर का पेटेंट अनिवार्य हो गया है। तकनीकी रूप से दक्ष प्रोफेसर उपलब्ध न होने के कारण संस्थानों में प्रोफेसरों की नियुक्तियां नहीं हो पा रही है और वे पद खाली पड़े हैं।

    श्री गोलस ने कहा कि विश्व का एकमात्र बौद्धिक संपदा अधिकार प्राप्त करने वाले डॉ.श्याम सिंह ठाकुर पिछले 15 सालों से भारत सरकार से पत्र व्यवहार कर रहे हैं। सरकार में बैठे तकनीकी विशेषज्ञ इसकी गंभीरता को नहीं समझ पा रहे हैं। चीन ने क्वाण्टम गणित के सहारे विश्व का सर्वोत्तम कंप्यूटर बना लिया है। सरकार पहल करे तो कापीराईट क्रमांक एल। 18402 । 99 दिनांक 24.06.1999 के अनुच्छेद 9.2 और 10 को लागू करके भारत भी तकनीकी के आकाश में ऊंची छलांग लगा सकता है।

    श्री गोलस ने कहा कि पेटेंट न होने के कारण भारत बेरोजगारी के दौर से गुजर रहा है। जबकि भारत का नाम इंडिया करने वालों ने विश्व की निगाह में भारत की साख खंडित कर दी है। उन्होंने कहा कि इंडिया का अर्थ बिकने वाला गुलाम होता है। जबकि बौद्धिक संपदा अधिकार को लागू करके भारत में औद्योगिक निवेश की राह सरल हो जाएगी।

    इस अवसर पर दिव्य विश्वेश्वर पंचांग के संपादक पं. बृजेन्द्र कुमार तिवारी ने कहा कि भारत में तकनीकी एकरूपता न होने के कारण अनेकानेक प्रकार के पंचांग प्रकाशित हो रहे हैं। जिनकी गणनाओं में काफी अंतर है। क्वाण्टम तकनीक पर आधारित समिति के गठन के बाद पंचांग बनाने वालों की गणनाएं ज्यादा सटीक और एकरूप हो जाएंगी। जटिल ज्योतिषीय गणनाओं का सटीक आकलन होने के कारण भारत की तकनीक और व्यापार सभी सफल बनाए जा सकेंगे। उन्होंने विशेषज्ञों से सरकार को इस दिशा में कार्य करने की सलाह देने का आव्हान किया।

    बौद्धिक संपदा अधिकार के क्षेत्र में अनुसंधान कर रहीं श्रीमती ऋचा गोलस ने भी इस अवसर पर अपने विचार प्रस्तुत किए। आयोजनकर्ता श्री रामगोपाल बंसल, और प्रदेश के कई जाने माने बुद्धिजीवियों ने इस अवसर पर अपनी जिज्ञासाओं का शमन किया। अक्षर प्रभात ट्रस्ट की ओर से श्री रामनिवास गोलस ने सभी अतिथियों का आभार माना।

  • गौरी लंकेश की हत्या की आड़ में गंदी राजनीति

    गौरी लंकेश की हत्या की आड़ में गंदी राजनीति


    -आलोक सिंघई-
    बैंगलुरु की पत्रकार गौरी लंकेश की हत्यारे अभी पुलिस गिरफ्त में नहीं आए हैं। आरएसएस के क्षेत्रीय प्रचारक वी नागराज इस नृशंस हत्या पर अपना विरोध जता रहे हैं। इसके बावजूद कांग्रेस और वामपंथियों के समर्थक इसे विचारधारा की हत्या बताने में जुट गए हैं। विरोध का बाजार गर्म देखकर भाजपा के विरोध की पत्रकारिता करने वाले मीडिया कर्मी भी मैदान में कूद पड़े हैं। उन्हें गौरी लंकेश की हत्या से इतनी बैचेनी नहीं है जितना उन्हें देश में भाजपा के प्रति बढ़ते जन समर्थन ने परेशान कर दिया है। इसलिए वे इसे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के उस अभियान से जोड़कर दिखा रहे हैं जिसमें उन्होंने कार्यकर्ताओं के सामने 350 से अधिक सीट जीतने का लक्ष्य रखा है। गौरी लंकेश के माध्यम से वे कह रहे हैं कि भाजपा अपने विरोधी विचारधारा को कुचलने के लिए अब पत्रकारों की हत्याएं तक कराने लगी है।

    इसमें कोई शक नहीं कि भाजपा अपनी राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए आक्रामक रणनीति अपना रही है। वह खुद के विस्तार के साथ साथ कांग्रेस मुक्त भारत की बात भी खुलेआम कहती है। इसके बावजूद गांधी की हत्या के बाद से लगातार कलंक का भार ढोती रही भाजपा हर कदम फूंक फूंककर रख रही है। भले ही गांधी वध करने वाले नाथूराम गोड़से ने वैचारिक प्रतिबद्धता को साकार करने के लिए अतिवादी कदम उठाया हो लेकिन तबसे लेकर आज तक कभी आरएसएस या भाजपा ने गांधी के वध का समर्थन नहीं किया है। गांधी का वध कभी आरएएस के एजेंडे में भी नहीं रहा।आजादी के बाद से देश में कांग्रेस की सरकारें रहीं हैं इसके बावजूद कभी ये साबित नहीं हो पाया कि गांधी का वध आरएएस की रणनीति का हिस्सा था। ये सब जानते बूझते सत्ता पर बैठी कांग्रेस की चरण वंदना करने के लिए ढेरों कथित बुद्धिजीवी भाजपा और आरएसएस को दक्षिणपंथी और गांधी के हत्यारे बताते रहे हैं।

    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी स्वयं गांधी के गुजरात से आते हैं। वे बरसों से कांग्रेस के इस दुष्प्रचार के वार झेलते रहे हैं। इसके बावजूद गुजरात की जनता ने उन्हें अपने कंधों पर बिठाकर देश के शीर्ष तक पहुंचाया है। खुद गुजरात दंगों पर आरोप लगाने वाले आज तक मोदी को हत्यारा बताने में नहीं चूकते। जबकि अदालतों में कई बार साबित हो चुका है कि गुजरात दंगों के लिए मोदी दोषी नहीं हैं। तीस्ता सीतलवाड़ जैसी कथित समाजसेविका जिसे वामपंथ की आड़ में कांग्रेस पोषित करती रही है उसे भी भाजपा ने आज तक नहीं मारा। जबकि उसके खिलाफ अमेरिकी फोर्ड फाऊंडेशन से चंदा लेने और लोगों से धन जुटाने के आरोप लगे हैं। कांग्रेस की सरकारें लंबे समय से उसके एनजीओ को फंडिंग करती रहीं हैं। उनका एकमात्र लक्ष्य भाजपा के प्रति दुष्प्रचार अभियान चलाना है। कहने को तो तीस्ता सीतलवाड़ भी पत्रकार हैं लेकिन उनकी सुपारीखोर पत्रकारिता को देश की मुख्यधारा की पत्रकारिता ने कभी खबर से आगे नहीं स्वीकार किया है।

    ऐसा ही कुछ कर्नाटक की स्वर्गीय गौरी लंकेश कर रहीं थीं। उनके पिता पी. के लंकेश ने लंकेश पत्रिका नाम से टेब्लायड अखबार शुरु किया था जिसे अब गौरी प्रकाशित करती थीं। इस अखबार की आय पचास लोगों के संगठन पर आधारित थी। इन पचास लोगों में जाहिर है ज्यादातर भाजपा विरोधी ही थे। इस तरह गौरी लंकेश की पत्रकारिता सामाजिक संवाद पर आधारित नहीं बल्कि संघ और भाजपा के विरोध पर आधारित थी। जाहिर है जब आप किसी एक विचारधारा के मुखपत्र बन जाते हैं तो अपने विचार को ज्यादा सफेद बताने के लिए आप सच को तोड़ मरोड़कर प्रस्तुत करने लगते हैं। यही वजह थी कि 2008 में लिखे गए उनके एक आलेख को भाजपा के सांसद प्रहलाद जोशी ने अदालत में चुनौती दी। अपने आलेख को गौरी अदालत में सच साबित नहीं कर पाईं और उन्हें छह महीने की जेल और जुर्माने की सजा सुनाई गई। हालांकि वे जमानत पर रिहा भी हो गईं पर इस मामले की लंबी कानूनी लड़ाई लड़ते हुए वे संघ भाजपा के खिलाफ कुछ ज्यादा ही तीखा लिखने लगीं थीं।

    उनके संपादकीय का हिंदी में अनुवाद करके देश भर में विचारधारा की हत्या का शोर मचाने वाले पत्रकारों ने निहायत ही गैर जिम्मेदारी भरा रवैया अपनाया है। ये बात सही है कि गौरी लंकेश यदि किसी खास विचारधारा की पैरवीकोर थीं तो ये उनका निजी मामला था। जो उनके विचारों से सहमत नहीं थे वे उस विचारधारा को दरकिनार कर ही तो रहे थे। ये भी संभव है कि उनके तीखे लेखों की धार से आहत होकर किसी सिरफिरे ने हत्याकांड जैसा कदम उठाने की रणनीति अख्तियार कर ली हो। लेकिन अभी सिर्फ अनुमानों के आधार पर फतवे जारी करने लगना किसी भी तरह से उचित नहीं माना जा सकता।कौआ कान ले गया की आवाज सुनकर धरने प्रदर्शन करने चल पड़े पत्रकारों की समझ भी इस घटना से कटघरे में आ रही है।भोपाल में तो इस गौरी की हत्या का विरोध करने वाले ज्यादातर पत्रकार सरकार की निगाह में आने के लिए मैदान में उतरे।

    कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने पुलिस आयुक्त टी सुनील कुमार को साफ निर्देश दिये हैं कि इस मामले की जांच करके दोषियों को दंडित कराया जाए। खुद गौरी के भाई इंद्रजीत ने मामले की जांच सीबीआई से कराए जाने की मांग की है।कर्नाटक की पुलिस देश के चुस्त संगठन के लिए जानी जाती है। देर अबेर हत्यारे जरूर पकड़े जाएंगे और उन्हें दंडित भी किया जाएगा। तब इस हत्या पर से पर्दा उठेगा।

    केरल में तो आरएसएस के कार्यकर्ताओं की हत्याएं बाकायदा चेतावनी देकर की जाती रहीं हैं। इसके बावजूद वहां की वामपंथी सरकारें इस पाप को लगातार छुपा रहीं हैं। खुद भाजपा शासित राज्यों में विरोधियों की हत्याएं जैसे प्रसंग अब तक सामने नहीं आए हैं। विरोधियों को निपटाने के लिए छापे डालना और मुकदमों में फंसाना जैसी रणनीति तो देश की राजनीतिक पार्टियां कांग्रेस से सीख चुकी हैं पर विरोधियों की हत्याएं कराना जैसे ओछे हथकंडे कोई राजनीतिक दल नहीं अपनाता है। भाजपा को जब दक्षिण के राज्यों में अपने पैर पसारने हैं तब वह दिल जीतने के अभियान में पत्रकार की हत्या कराने जैसा कलंकित कदम कैसे उठा सकती है। जाहिर है इस विषय कपोल कल्पनाओं के आधार पर किसी निष्कर्ष पर पहुंच जाना जल्दबाजी होगी।कम से कम इसे पत्रकारिता तो नहीं ही कहा जाएगा।

  • जन ज्वार का नट सम्राट अमितशाह

    जन ज्वार का नट सम्राट अमितशाह

    भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने आज भोपाल में मुख्यमंत्री मेधावी योजना का शुभारंभ किया।

    - भरतचन्द्र नायक
    भारतीय जनता पार्टी ने राजनीति के विशिष्ठ पड़ाव पर ऐसे समय जब तीन दशकों से केन्द्र में स्पष्ट बहुमत मिलना लगभग असंभव मान लिया गया 16 वी लोकसभा के चुनाव 2014 में प्रचार अभियान की कमान दूसरी पीढ़ी को सौंपी। संघ और पार्टी ने लीक से हटकर कमान सौंपी तब सभी विस्मित थे। चुनाव अभियान की कमान नरेन्द्र मोदी ने संभाली और पार्टी तथा मतदाताओं के बीच विश्वास का सेतु बनाने में सफलता पायी। लोकसभा चुनावों में पार्टी ने जीत का गणित लगाया नरेन्द्र मोदी ने उसे आसानी से पूरा कर प्रचंड बहुमत के साथ ऐसे राज्यों तक में पहुंच बनायी जहां जीत का आधार जाति और सम्प्रदाय था। इससे पार्टी के साम्प्रदायिक होने का जो ठप्पा सियासी दल लगाते थे नरेन्द्र मोदी ने उसे तोड़ डाला और वाराणसी और स्वयं लखनऊ से चुनाव जीतकर सभी को आश्चर्य चकित कर दिया। उन्होंने 26 मई 2014 को प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के समय अपने विश्वस्त साथी अमित शाह को केन्द्रीय मंत्री परिषद में शामिल होने की दावत दी लेकिन अमित शाह ने गुजरात में विधायक बने रहकर संगठन के कार्य में रूचि लेना बेहतर समझा। किंग बनने के बजाए उन्हें किंग मेकर की भूमिका में पाकर भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष का ताज संगठन ने सौंपा। काम चुनौतीपूर्ण था, लेकिन 52 वर्षीय अमित शाह ने संगठन के अपने साथियों को नई तकनीक और प्रौद्योगिकी को आत्मसात कर संगठन के विस्तार में जुटने का आव्हान किया। महासदस्यता अभियान में मोबाइल से सदस्यता की शुरूआत का कौशल अपनाकर देश में 11 करोड़ से अधिक सदस्य बनाकर भारतीय जनता पार्टी को देश ही नहीं दुनिया का सबसे बड़ा राजनैतिक दल होने का गौरव हासिल करा दिया। हिन्दी भाषी राज्यों से लेकर पूर्वोत्तर, पश्चिमोत्तर राजयों और दक्षिण के सुदूरवर्ती राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की पहचान बना दी।

    राष्ट्रवाद को समर्पित भारतीय जनता पार्टी को दुनिया का सबसे बडा राजनैतिक दल होने का गौरव हासिल कर चीन की वामपंथी पार्टी का दावा काफूूर कर दिया। हिन्दी भाषी सूबों से लेकर पूर्वोत्तर, पश्चिमोत्तर राज्यों और दक्षिण के सुदूरवर्ती राज्यों में भारतीय जनता पार्टी का संगठन गढ़ दिया। नए सदस्यों को वैचारिक रूप से परिपक्व बनाने के लिए पं. दीनदयाल प्रशिक्षण महाअभियान के अंचल मे लाने का महत्वकांक्षी कार्यक्रम आरंभ हुआ और उसमें सफलता भी मिली।

    भारतीय राजनीति में ऐसा दुर्लभ संयोग ही होता है जब शीर्ष पर वैचारिक साम्य बन पाता है। कांग्रेस में भी प्रथम राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री एक ही दल के थे लेकिन वैचारिक आधार पर सोमनाथ मंदिर के निर्माण को लेकर परस्पर विरूद्ध ध्रुवों पर थे लेकिन भाजपा के दो प्रमुख प्रधानमंत्री और पार्टी के राष्टीय अध्यक्ष अमित शाह की केमिस्ट्री ऐसी बनी कि परस्पर अटल विश्वास के धनी साबित हुए। अमित शाह के राज्यसभा चुनाव में जीत हासिल करने के बाद उन्हें केन्द्रीय मंत्रिमंडल में शामिल कर रक्षा मंत्रालय दिए जाने का सुझाव जोरदारी के साथ आया लेकिन अमित शाह की संगठन में असीमित रूचि और मिशन 2019 को ध्यान में रखकर अमित शाह ने स्वयं केन्द्रीय मंत्रीमंडल में शामिल होने से इंकार करके आज की युवा पीढी और सत्ता लोलुप राजनेताओं के समक्ष एक अनुकरणीय आदर्श उपस्थित हुआ है।

    दरअसल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राष्टीय अध्यक्ष अमित शाह के वैचारिक साम्य का ही नतीजा है कि संगठन और सरकार के निर्णय समय पर होते है जिनसे राजनैतिक दल और कार्यकर्ता भी चैक जाते है। इसलिए इनके निर्णय के प्रति सदा कोतुहल बना रहता है और दोनों के बीच हुए निर्णय को संगठन आम सामूहिक स्वीकृति मानकर आत्मसात करता है। कमोवेश राष्टपति के चुनाव में प्रत्याशी को लेकर जब रामनाथ कोविंद की घोषणा की गयी उसकी उपयुक्तता को लेकर हर्ष मिश्रित आश्चर्य जनक प्रतिक्रिया देखी गयी। सत्ता और संगठन में नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के बीच जो सहमति बनती है वहीं संगठन का अंतिम फैसला माना जाता है। किसी तीसरे की भूमिका नगण्य होती है। अलबत्ता सत्ता और संगठन के स्तर पर जो फैसला लिया जाता है उसकी जानकारी सरसंघचालक डाॅ मोहन भागवत को चर्चा के रूप में होती है। निर्णय लेने में उनकी भी भूमिका नहीं होती है। इससे हर फैसले में अंत तक गोपनीयता का निर्वाह किया जाता है। फैसले के अमल में कठिनाई अथवा अन्यथा कोई परिस्थिति पैदा होने पर वे जवाबदेही की सहर्ष स्वीकार करते है। इस तरह जवाबदेही का भाव बने रहने के साथ कठिनाई का स्पष्टीकरण भी देते है और बता देते है निर्णय दूरदर्शितापूर्ण और कठोर है। प्रसव पीडा तो होगी लेकिन नतीजा राष्ट के व्यापक हित में होगा। नोटबंदी होने पर चैतरफा हमले झेले लेकिन जो भरोसा उन्होंने जनता को दिया कि कालेधन पर चोट भ्रष्टाचार पर अंकुश और आतंकवाद में कमी आयेगी। ऐसा होता देखकर देश की जनता ने कष्टों को गंवारा किया और सत्ता और संगठन की नीयत पर भरोसा किया। गुजरात में विधायक बने रहते 2012 में बहन आनंदी बेन पटेल के मुख्यमंत्री बनने पर उनके कार्यकलाप से अमित शाह संतुष्ट नहीं थे, लेकिन आनंदी बेन पटेल की गुजरात के मुख्यमंत्री पद पर उन्होंने कोई रूचि नहीं दिखायी क्योंकि उन्हें तो भाजपा संगठन का विस्तार और देश में भगवा परचम फहराना उनकी प्रतिबद्धता बन चुकी थी। इस मायने में यदि अमित शाह को चुनावी दांवपैच में माहिर होने, अपनी गुरूवात्कर्षण शक्ति से दूसरे दलों को समीप लाने में महारत होने के कारण उन्हें चुनाव जीतने का तंत्र मंत्र साधक कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। उनका कार्यकाल यह प्रमाणित भी करता है कि जिस राजनैतिक दल को साम्प्रदायिक कहकर कथित सेकुलरवादी राजनैतिक अस्पृष्य बना चुके थे आज उसका परचम डेढ दर्जन राज्यों भारत के 70 प्रतिशत भूभाग पर फहरा रहा है।

    वाकया 8 अगस्त का था। राजनैतिक प्रेक्षकों ने देखा कि गुजरात में अमित शाह और केन्द्रीय मंत्री स्मृति ईरानी की जीत प्रत्याषित थी ही लेकिन जिस कांग्रेस के पास सदन में 50 सदस्य थे और सोनिया गांधी के राजनैतिक सलाहकार अहमद भाई पटेल का जीतना आसान था कांग्रेस अपना घर संभालने में विवश दिखी। उसे अपने झुंड को सुरक्षित रखने के लिए कांग्रेस शासित कर्नाटक सरकार का संरक्षण लेना पडा। कहने की गरज ये कि अमित शाह ने नरेन्द्र मोदी के लक्ष्य कांग्रेस मुक्त भारत को पूरा करने में सारी शक्ति केन्द्रित कर दी है। अमित शाह के राज्यसभा में पहुंचने के साथ लोगों का सोचना है कि वे संसद भवन में प्रधानमंत्री के सबसे निकटतम और सबसे विश्वस्त व्यक्ति होंगे। ऐेसे लोंगों का यह सोच भी है कि उन्हें केन्द्र में रक्षामंत्री बनाकर संगठन की बागडोर केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री को सौंपी जा सकती है। लेकिन अमित शाह को आने वाले दिनों में गुजरात में होने वाले विधानसभा चुनाव अहम होंगे और वे शायद ही संगठन से निकलकर सत्ता की पगडंडी पर कदम बढायेंगे। गुजरात के चुनाव में प्रधानमंत्री और राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की साख पर गंभीर चुनौती होगी जिसे देखते हुए प्रधानमंत्री और संगठन शायद ही अमित शाह के प्रभार में परिवर्तन करे।

    इतिहास पर नजर दौडाए तो 1925 में राष्ट्र निर्माण के अनुष्ठान के रूप में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का सपना देखा था। उसे पूरा करने के लिए उपयुक्त तंत्र भी आवश्यक और अपेक्षित था। उपयुक्त तंत्र विकसित करने के लिए अटलजी और आडवाणी के करिश्मायी व्यक्तित्व को नहीं भुलाया जा सकता लेकिन उनकी सफलता आंशिक थी। नरेन्द्र मोदी और अमित शाह को इसका श्रेय मिलना ही चाहिए कि भारतीय गणतंत्र में आज सर्वोच्च पद पर राष्ट्रपति के रूप में रामनाथ कोविद, उपराष्ट्रपति वैंकेया नायडू और प्रधानमंत्री के पद पर नरेन्द्र मोदी विराजमान है। लोकसभा अध्यक्ष पद पर सुमित्रा महाजन है। इस पद पर रहकर वे पहले ही दलीय संबंध तोड चुकी है। लेकिन यह एक सुखद संयोग और कोतुहल जनक परिघटना है कि चारों राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की उपज है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के स्वयंसेवक है। भारतीय राजनीति में न तो इनकी परंपरागत पहचान है और न इनका कोई गाॅडफादर रहा है। स्वयंसेवक की पहचान और राष्ट्र को वैभव के चरम शिखर पर पहुंचाना इनकी प्रतिबद्धता जरूर रही है। इन्हें राष्ट्र ने जो गंभीर दायित्व सौपा है वह फूलों की सेज नहीं कांटो का ताज है। एक करोड पच्चीस लाख लोगों की निगाहे इनके हर कदम पर गढी हुई हैै। यह इनके लिए यहां स्वर्णिम अवसर है वहीं गंभीर चुनौती भी है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की चर्चा विश्व पटल पर हो रही है, जिसे कथित सेकुलरवादी साम्प्रदायिक बताते हुए अस्तांचल की ओर बढ रहे है।

  • लोकप्रियता के समुंदर से सार्थकता के रत्न ढूंढती भाजपा

    लोकप्रियता के समुंदर से सार्थकता के रत्न ढूंढती भाजपा

    -आलोक सिंघई-
    भारत के चुनाव आयुक्त और मध्यप्रदेश कैडर के 1977 बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी रहे ओ.पी.रावत ने दो टूक लहजे में कहा है कि राजनीतिक पार्टियां केवल चुनाव जीतने का लक्ष्य लेकर चल रहीं हैं। इसमें नैतिकता को ताक पर धर दिया जा रहा है। लोकतंत्र तभी सार्थक है जब निष्पक्षता और पारदर्शिता को बनाए रखा जाए। उन्होंने ये सलाह गुजरात राज्यसभा चुनाव में दो कांग्रेस विधायकों की क्रास वोटिंग के मुद्दे पर दी है। ये सलाह भी तब आई है जब भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह मध्यप्रदेश के दौरे पर आए हैं। श्री रावत स्वयं मध्यप्रदेश कैडर के आईएएस अधिकारी हैं। वे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के राजनीतिक गुरु सुंदरलाल पटवा के भी करीबी रहे हैं। जाहिर है उनके इस बयान के कई अर्थ लगाए जाने लगे हैं। कांग्रेस और खासतौर पर राज्य सभा सदस्य अहमद पटेल आरोप लगाते रहे हैं कि अमित शाह उनके विधायकों को खरीदकर उनकी पार्टी में विद्रोह फैलाना चाहते थे। हालांकि ये बातें करना कांग्रेस और उसके किसी भी नेता को शोभा नहीं देता क्योंकि कांग्रेस का इतिहास ही तोड़ फोड़ और अवसरवादिता पर टिका है। उसने हमेशा अपने विरोधियों की सरकारें गिरवाईं और जोड़ तोड़ से सत्ता हासिल की है।इसके बावजूद इस पर चिंतन तो होना ही चाहिए कि लोकतंत्र को मजबूती कैसे मिल सकती है।

    राजनीति हमेशा सत्ता का लक्ष्य लेकर की जाती है। जाहिर है कि सत्ता के लिए आवश्यक गठबंधन करना कई बार राजनेताओं की मजबूरी भी होती है। इसमें किसी नौकरशाह की सलाह का कोई अर्थ नहीं है। दरअसल नौकरशाह को इसकी सलाह भी नहीं देनी चाहिए। उसका काम तो सिर्फ कानून की कसौटी लागू करना है। भारतीय जनता पार्टी पर वामपंथी विचारकों ने दक्षिणपंथी होने का ठप्पा लगा रखा था। आज भी वे भाजपा को फासीवादी नीतियों पर चलने वाली, तानाशाही शैली अपनाने वाली और आरएसएस की कठपुतली पार्टी बताते हैं। वे ये मानने तैयार ही नहीं हैं कि भाजपा ने उनकी ही चौपड़ पर उन्हें मात दे दी है। उसने भी वही चाल चली जो कभी कांग्रेस और उनके वामपंथी सहयोगी चलते रहे हैं। जाहिर है आज कांग्रेस यदि भाजपा की राजनीतिक शैली की आलोचना करती है तो ये उसकी खीज के अलावा कुछ नहीं है।

    मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जबसे सत्ता पर काबिज हुए हैं तभी से कांग्रेस और उसके सहयोगी खुसर पुसर करते रहे हैं कि शिवराज जी की कुर्सी तो बस कुछ दिनों की ही है। उनकी कनबतियों पर गौर करके कुछ पत्रकार बंधु भी शिवराज जी की विदाई की खबरें बनाते रहते हैं। अमित शाह ने सबसे पहले इसी चर्चा पर ये कहते हुए विराम लगा दिया कि अगला चुनाव तो मध्यप्रदेश में शिवराज जी के नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा। उनके इस बयान से शिवराज जी के प्रतिद्वंदियों में खलबली मच गई है। उन्हें अपनी आशाओं और मनोकामनाओं पर तुषारापात होता नजर आ रहा है। दरअसल उनके कई प्रतिद्वंदियों की चापलूसों की फौज बार बार माहौल बनाती रहती है कि बस अगले मुख्यमंत्री आप बनने जा रहे हैं।

    भारत की भाग्यविधाता बन चुकी भारतीय जनता पार्टी इन दिनों कुछ खास फार्मूलों पर चल रही है। कांग्रेस के परिवारवादी नेतृत्व ने व्यक्तिवाद की जो लहर चलाई उसने कांग्रेस के सार्वजनिक मंच को खेमों में बदल दिया है। परिवार सर्वोपरि की अवधारणा ने कांग्रेस में इतना ठहराव ला दिया कि उसकी राजनीति बदलाव को नकारने वाली बनकर रह गई है। इसके विपरीत भारतीय जनता पार्टी राष्ट्र्रवाद की अवधारणा पर चल रही है। उसने चेहरों का गणित भी नहीं छोड़ा है लेकिन वह एक कार्पोरेट कल्चर में भी काम कर रही है। जाहिर है कि इस प्रक्रिया में चेहरों का ज्यादा महत्व नहीं बचा है। इसलिए मध्यप्रदेश में शिवराज जी सत्ता का चेहरा रहें या नरोत्तम मिश्रा, कैलाश विजयवर्गीय या नरेन्द्र सिंह तोमर को सत्ता सौंप दी जाए कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है।
    फिर सबसे बड़ी बात तो ये भी है कि सत्ता पर बार बार फेरबदल राजनीतिक दल के सहयोगियों के लिए भी असुविधाजनक होता है। शिवराज जी के नेतृत्व में भाजपा की यात्रा समतावादी नजरिए से चल रही है। इसमें हर वो व्यक्ति लाभान्वित हो रहा है जिसने लाभ पाने का प्रयास किया। फिर चाहे वो भाजपा से जुड़ा हो या कांग्रेस से या किसी और अन्य दल से कोई फर्क नहीं पड़ता। यही वजह है कि प्रदेश में राजनीतिक बदलाव की आवाज बुलंद नहीं हो सकी है। कांग्रेस के दिग्गज नेता कमलनाथ हों या दिग्विजय सिंह, अजय सिंह हों या मुकेश नायक सभी सत्ता की सुराही का मयपान कर रहे हैं। हालत ये है कि इनकी राह में आने वाले कट्टर भाजपाई भी राह से हटा दिए जाते हैं। अब इन हालात में शिवराज जी का विरोध केवल दिखावा ही बनकर रह गया है। शिवराज जी ने अपने सलाहकार के रूप में प्रमोटी आईएएस अधिकारी एस.के.मिश्रा को तैनात कर रखा है। वे मुकेश नायक जी के रिश्तेदार हैं। अब हालत ये है कि किसी प्राचार्य की नियुक्ति के लिए भी जब मुकेश नायक अनुरोध करते हैं तो विभाग के मंत्री न केवल उनके आदेश का पालन करते हैं बल्कि फोन करके उन्हें जताते भी हैं। इसी तरह नर्मदा विकास प्राधिकरण में उपाध्यक्ष पद पर पिछले सत्रह सालों से पदस्थ आईएएस रजनीश वैश को सत्ता और विपक्ष सभी के नेता अपना संरक्षक मानते रहे हैं। नर्मदा आंदोलन की नेत्री मेधा पाटकर भी सतही विरोधों से आगे नहीं बढ़ सकी हैं। जाहिर है कि संतुलन की राजनीति के चलते मध्यप्रदेश में बदलाव की बड़ी बयार अब तक जन्म नहीं ले सकी है।

    इस सबसे ऊपर वो राजनीतिक लाबी है जो देश के बड़े औद्योगिक घरानों के इशारों पर काम करती है। मध्यप्रदेश में रिलायंस ने अपना टेलीकाम नेटवर्क फैलाने का जो बड़ा अभियान चला रखा है उसे भाजपा और कांग्रेस दोनों के नेताओं का समर्थन प्राप्त है। यदि मध्यप्रदेश के राजनेता इन घरानों से पूरा शुल्क वसूली करना ठान लें तो उसके समेत अन्य टेलीकाम कंपनियों के बोरिया बिस्तर बंध जाएं। ये जानते बूझते सरकार चुप है और कंपनी के साथ साथ सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेताओं को मनमानी की छूट दे रही है। इसी तरह बिजली कंपनियों, सड़क कंपनियों, पानी(सिंचाई और पेयजल योजनाओं) से जुड़ी कंपनियों के लिए भी मध्यप्रदेश स्वर्ग के समान राज्य बन चुका है। जनता के नाम कर्ज लेना और आधारभूत ढांचे के विकास के नाम पर बड़े बजट के कार्य कराने में मध्यप्रदेश का कोई सानी नहीं है। जो भी राजनेता इस यथा स्थिति को तोड़ने की कोशिश करता है उसके खिलाफ मीडिया के सहारे दुष्प्रचार अभियान छेड़ा जाता है और उसे धराशायी होने में देर नहीं लगती है।

    जाहिर है कि मध्यप्रदेश की भाजपा सरकार फिलहाल चुनौती विहीन नजर आ रही है। नगरीय निकायों के हालिया चुनावों ने भी इस अवधारणा को मजबूती दी है। इसके बावजूद अमित शाह की भाजपा को कई मूलभूत मुद्दों पर विचार करना जरूरी होगा। बर्मा के तेल भंडारों की ओर बढ़ते चीन की चुनौती और भारत की बेरोजगारी ने भाजपा सरकारों की मुसीबतें बढ़ाई हैं। इन सरकारों पर आर्थिक हितों के लिए जो दबाव डाले जा रहे हैं उसने उसके सुशासन के दावों को धूल धूसरित कर दिया है। मध्यप्रदेश में तो शिवराज सिंह चौहान की सरकार इस अराजकता को रोकने में बार बार असफल साबित हो रही है। सत्ता को निचोड़ने के उसके अभियानों से प्रेरित होकर माफिया ताकतें बार बार नियमों और कानूनों की धज्जियां उड़ाती रहती हैं। चाहे वो खदान माफिया हो या शराब माफिया, अनाज माफिया हो या तेल माफिया सभी संसाधनों का दोहन मनमर्जी से कर रहे हैं। इन हालात में नतीजे देने का लक्ष्य पाने में भाजपा सरकार की गति बहुत धीमी है।
    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जिन लक्ष्यों का सुनहरा कल दिखाकर देश को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं उनकी पूर्ति में शिवराज सिंह चौहान सरकार कई बार ना नुकुर करती दिखाई पड़ जाती है। जाहिर है कि वो उन नीतियों के अनुकूल गति पकड़ने में पीछे छूट गई है। नौकरशाही की मनमानी और भाजपा के नेताओं की उथली समझ सभी इसके लिए जिम्मेदार हैं। भाजपा का संगठन इतना विशाल आकार ग्रहण कर चुका है कि उसे चुनाव जीतने में ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती है। लोकप्रियता के पांसे फेंकने में शिवराज सिंह सरकार को महारथ हासिल है लेकिन इक्कीसवीं सदी के भारत के निर्माण में ये फार्मूले किसी भी तरह सहयोगी साबित नहीं हो सकते हैं। भाजपा के सामने भविष्य में चुनाव जीतने की चुनौती तो है ही लेकिन उसे बदलाव लाने वाले प्रयास भी करना होंगे। उसके तेरह सालों के कार्यकाल के बाद जनता का धैर्य जवाब देने लगा है। इसलिए भाजपा को अब अपने प्रयास ठोस धरातल पर लाने के प्रयासों पर जोर देना होगा। अमित शाह यदि अपने मध्यप्रदेश दौरे के बाद पार्टी की नीति में ये कुछ मामूली फेरबदल कर सके तो उनका दौरा सार्थक कहा जा सकेगा।

  • जलने वाले भी देखें आसियान देशों की दोस्ती:अनुपम खेर

    जलने वाले भी देखें आसियान देशों की दोस्ती:अनुपम खेर

    भोपाल,14 अगस्त(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)। फिल्म अभिनेता अनुपम खेर का कहना है कि आसियान संगठन से जुड़े देश भारत की परस्परोपग्रहो जीवानाम वाली संस्कृति की मिसाल हैं। इन देशों के बीच पिछले हजार सालों से सह अस्तित्व का भाव रहा है। ये सभी देश आपस में मिलजुलकर आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं। इसके बावजूद कुछ देशों को भारत की प्रगति से ईर्ष्या होती है। वे आतंकवाद, युद्ध और दुष्प्रचार से अपना भी समय और संसाधन बर्बाद करते हैं और हमारी प्रगति की राह में भी रोड़े खड़े करते रहते हैं। इसके बावजूद भारत आगे बढ़ता रहेगा और अपने पड़ौसियों की प्रगति के लिए भी प्रयास करता रहेगा।

    राजधानी में छह दिनों तक चलने वाले आसियान देशों के सम्मेलन में शामिल प्रतिभागियों से प्रेरक संवाद करने पहुंचे फिल्म अभिनेता अनुपम खेर ने आज समाज, देश और दुनिया के सभी मुद्दों पर खुलकर बातचीत की। उन्होंने कहा कि विकासशील देशों के सामने अपने नागरिकों को अच्छी जिंदगी देने की चुनौतियां हैं। भारत लगातार इस लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार शौचालय जैसी मूलभूत जरूरतों को पूरा करने से लेकर देश को मंगल ग्रह तक की ऊंचाईयों पर पहुंचाने का प्रयास कर रही है। हिंदुस्तान और पड़ौस के देशों को भी इस अभियान में शरीक होना चाहिए और इस बेहतरीन माहौल का लाभ उठाना चाहिए। चीन और पाकिस्तान के रवैये पर पूछे गए सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि इन देशों से जुड़ी विघटनकारी ताकतें भारत के खिलाफ दुष्प्रचार कर रहीं हैं। इन देशों के युवाओं को भी आसियान देशों के युवाओं की तरह करीब लाया जाए तो पड़ौसी मुल्कों के साझा प्रयास दुनिया को सफल बनाने में बड़ी भूमिका निभाएंगे।

    देश के लोगों को सत्तरवें स्वाधीनता दिवस की शुभकामनाएं देते हुए उन्होंने कहा कि ये देश मुझसे आठ साल बड़ा है। इसे मैं अपना बड़ा भाई, पिता, मां और बहन सभी मानता हूं। इस देश ने मुझ जैसे आम परिवार में जन्म लिए व्यक्ति के लिए भरपूर सम्मान दिया है और मैं इसके प्रति आजीवन कृतज्ञ रहूंगा। पूर्व राष्ट्रपति हामिद अंसारी के मुस्लिमों के बारे में दिए गए वक्तव्य के बारे में उन्होंने कहा कि इस देश में सभी जातियों के लोग बहुत प्रेम और सद्भाव से रहते हैं। इतने बड़े पद पर आसीन रहने वालों को हल्की टिप्पणियां नहीं करनी चाहिए। इससे देश के सद्भाव को ठेस पहुंचती है। देश को सभी जातियों के लोगों ने मिलजुलकर संवारा है और हमें इस देश के सभी नागरिकों पर गर्व है।

    उत्तरप्रदेश में मदरसों में स्वाधीनता दिवस पर आयोजित समारोहों की वीडियोग्राफी कराए जाने के फरमान पर उन्होंने कहा कि इस तरह का दबाव किसी पर नहीं है। यदि कोई झंडा नहीं फहराएगा तो क्या उसे दंडित नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि हमें स्वाधीनता की वर्षगांठ पर गर्व है और इसके बारे में सभी को अपने अपने तरीकों से अभिव्यक्ति करने की आजादी भी है। सबके प्रेम करने का ढंग अलग अलग होता है। ये नहीं कहा जा सकता कि अमुक व्यक्ति के प्रेम करने का ढंग सबसे अच्छा है या बुरा है। हम सभी देश से प्रेम करते हैं इसलिए स्वाधीनता दिवस भी हम उत्साह से मनाते हैं।

    कश्मीर में धारा 370 और अनुच्छेद 35 ए पर पूछे गए सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि कुछ चंद लोग ये तय नहीं कर सकते कि उन्हें कोई विशेष अधिकार मिलें। पूरे देश में धारा 370 हटाने पर सहमति है। कश्मीर से विस्थापित पंडितों को दुबारा वहां बसाने को लेकर भी लोग एकमत हैं। वक्त बदल गया है इसलिए संविधान की धारा 370 को हटा दिया जाना चाहिए। जिससे कश्मीर और देश के अन्य राज्यों के बीच बराबरी के संबंध बन सकेंगे।

    फिल्म सेंसर बोर्ड में लेखक प्रसून जोशी की नियुक्ति पर सवाल पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि वे जाने माने लेखक हैं। वे विचारों के प्रवाह को और उनके महत्व को अच्छी तरह समझते हैं। फिल्म सेंसर बोर्ड में उनकी नियुक्ति निश्चित रूप से भारतीय फिल्मों को ज्यादा सफल बनाने में सहयोगी साबित होगी। निवृत्तमान फिल्म सेंसर बोर्ड के निदेशक पहलाज निहलानी के बारे में उन्होंने कहा कि उनका कार्यकाल समाप्त हो गया था। इसी तरह मैं भी कभी फिल्म सेंसर बोर्ड में रहा हूं ।

    टायलेट एक प्रेमकथा फिल्म के बारे में उन्होंने कहा कि इस फिल्म की कहानी बरसों से हमारे बीच थी। बालीवुड की प्रचलित कहानियों से हटकर कोई भी इस फिल्म को बनाने का जोखिम लेने तैयार नहीं था। इस फिल्म की कहानी जन जन से जुड़ी है और जनता इस फिल्म से अपना जुड़ाव महसूस करेगी। अक्षय कुमार और फिल्म के सभी बड़े बड़े कलाकारों ने पूरी तन्मयता से इस फिल्म का निर्माण किया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह परंपराओं से हटकर पहली बार लाल किले से देश की शौचालय समस्या का उल्लेख किया था उसे पूरे देश ने गंभीरता से सुना। इसी तरह ये फिल्म भी देश से बेहतर संवाद का माध्यम बनेगी।

  • राष्ट्रवादी साज पर मेहबूबा का बेसुरा राग

    राष्ट्रवादी साज पर मेहबूबा का बेसुरा राग

    – भरतचन्द्र नायक
    क्षेत्रीय दल यदि आज की सियासत में अपनी प्रासंगिकता खो रहे है और उनकी क्षरित विश्वसनीयता से जनता में अलोकप्रियता के चरम पर पहुंच रहे है तो इसके लिए उनकी वैचारिक संकीर्णता और अवसरवादिता को ही खोट दिया जा सकता है। सीमावर्ती राज्य जम्मू कश्मीर में हुए विधानसभा चुनाव में जब किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला भारतीय जनता पार्टी ने व्यापक राष्ट्रीय हित में तत्कालीन पीडीपी अध्यक्ष मुफ्ती मोहम्मद सईद से गठबंधन स्वीकार कर लिया। दो विपरीत ध्रुवों के मिलन पर सियासतदार हैरत में तो पड़ गए लेकिन उम्मीद थी कि मुफ्ती के नेतृत्व में पीडीपी संस्कारित होगी। पीडीपी के कार्यकर्ताओं पर लगाम भी कसी गयी लेकिन फिर भी उनकी अलगाववादियों से मोहब्बत तो जारी रही। अकस्मात मुफ्ती मोहम्मद सईद खुदा को प्यारे होने पर फिर भाजपा पीडीपी सरकार पर संकट आया लेकिन उनकी पुत्री मेहबूबा ने अपने वालिद की गद्दी संभाली और मुख्यमंत्री पद से गठबंधन की सियासत जारी रखी। भाजपा जैसे कट्टर राष्ट्रवादी दल का पीडीपी से साथ केर बेर का मिलन था लेकिन आजादी के बाद से ही जिस तरह सूबे में अलगाववाद को शेख अब्दुल्ला के समय से समय समय पर हवा दी गयी उस प्रभाव को डायलूट करने का प्रयास, जम्मू के साथ हो रहे पक्षपात को समाप्त करने, विस्थापित कश्मीरी पंडितों की पुनर्वास को ध्यान में रखकर भारतीय जनता पार्टी ने कड़वी दवा स्वीकार की। गंभीर मर्ज में अक्सर कड़वी दवा को सेवन करना कभी कभी अपरिहार्य हो जाता है। जम्मू कश्मीर में पाकिस्तान पोषित आतंकवाद का दौर जारी रहने पर भी जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री मेहबूबा ने कई अवसरों पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रशास्ति में कहा कि देश को नरेन्द्र मोदी का नेतृत्व दुर्लभ अवसर है और वे जम्मू कश्मीर समस्या का समाधान करने में कामयाब होंगे। इसी दरम्यान मोस्ट वांटेड आतंकवादी बुरहानवानी को मुठभेड़ में समाप्त कर सुरक्षा बलों ने कामयाबी हासिल की और पाकिस्तान की शह और हुर्रियत नेताओं के संरक्षण में बुरहानवानी का महिमा मंडन शुरू हो गया। सुरक्षा बलों को पत्थरबाजी का निशाना बनाना आरंभ हो गया। अलगाववाद की गूंज का नेशनल कांफ्रेस के नेता उमर अब्दुल्ला ने अलगाववादियों के सुर में सुर मिलाकर एक मुख्यमंत्री जैसे संवैधानिक पद की शपथ के बाद भी भारतीय अखण्डता को दरकिनार रखा और पाकिस्तान के सुर में सुर मिलाकर बेहयायी से वतन परस्ती को लज्जित कर दिया। दरअसल अब्दुल्ला परिवार की इससे बड़ी अहसान फरामोशी भी दूसरी नहीं हो सकती। फिर उमर अब्दुल्ला को दोष देना इसलिए फिजूल है क्योंकि उनके वालिद डाॅ. फारूख अब्दुल्ला तो पाकिस्तान की भाषा बोलने लगे। वे भूल गए कि उन्होंने केन्द्रीय मुख्यमंत्री के रूप में भी संविधान की शपथ ली है। इतने चुनावों में जम्मू कश्मीर की जनता संविधान को सर्वोच्च रखा है और जम्मू कश्मीर के अंतिम रूप से भारत में विलय को स्वीकार किया है लेकिन ताज्जुब की बात यह हुई कि अलगाव और आतंक में जूझ रहे भारत की बुद्धिजीवी जनता ने जब 370 के अनुच्छेद 35 ए की प्रासंगिकता पर सवाल उठाया तो मेहबूबा मुफ्ती ने भी वही राग अलापाते हुए कह दिया कि इस अनुच्छेद 35 ए को हटाने पर सूबे में तिरंगा झंडा साधने वाला नहीं मिलेगा। वे भूल गयी कि कभी शेख अब्दुल्ला ने इससे कम लेकिन मिलते जुलते अलफाज बोलने की खता की थी और उन्हें जेल की हवा खाना पडी थी। इसके पीछे का मनोविज्ञान समझना कठिन नहीं है। वास्तविकता यही है कि पीडीपी के कार्यकर्ता शुरू से ही अलगाववाद की रस्मों में रचे पचे थे। मुफ्ती मोहम्मद सईद की जानते थे लेकिन वे उन्हें सुधरने का मौका देते थे और उनकी गुस्ताखी गंवारा करते थे। आज उन्हीं कार्यकर्ताओं को राष्ट्रवाद से जुडा आदर्श बेमानी है क्योंकि वे इसे वोटों की दृष्टि से पीडीपी के हित में घातक मानते है। उनके रिश्ते पहले भी अलगाववादियों के साथ थे और आज भी उन्हें अलगाववादियों के विरूद्ध की जा रही केन्द्र सरकार की कार्यवाही रास नहीं आ रही है। उनका न तो राष्ट्रवाद से कोई प्रेम है और न गठबंधन में साथ भाजपा के प्रति मोहब्बत का रिश्ता है। अलबत्ता उन्होंने मुफ्ती मोहम्मद सईद भी जीते जी साथ दिया और खुली बगावत नहीं की लेकिन अब उनका हौसला बढा है। इसी का नतीजा है कि मुख्यमंत्री मेहबूबा के सुर बदल गए और उन्हें अलगाववादियों के समर्थन की चिंता सताने लगी।

    राजनैतिक अवसरवादिता इसी को कहते है कि जिसका सबूत पीडीपी और उसकी नेत्री मेहबूबा ने दे दिया है। अब उन्हें भरोसा हो गया है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जम्मू कश्मीर में यथास्थितिवाद ज्यादा दिन बर्दाश्त नहीं करेंगे। यदि राष्ट्रवाद के ज्वार ने जोर पकड़ा तो पीडीपी का वोट बैंक तहस नहस हो जायेगा। वे भूलती है कि देश में आतंकवाद का विस्मिल्ला पहली बार उनकी बहन के अपहरण के रूप में मुफ्ती परिवार ने ही भुगता है, लेकिन कुर्सी की बलिहारी समय बदला और मुफ्ती परिवार की बेटी मेहबूबा के तेवर और तासीर बदल गयी।
    राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि नरेन्द्र मोदी सरकार ने सूबों के साथ इंसाफी दिखाते हुए उम्मीद जतायी है कि विकास के लिए मिलने वाली सहायता राशि विकास में लगे। इस प्रयास का असर यह हुआ कि सरकार और बिचैलियों के गठजोड़ पर आंच आयी है। केन्द्र की पूर्ववर्ती सरकारे जम्मू कश्मीर की सल्तनत की मंुह मांगी मुराद पूरी करती रही है और कभी हिसाब किताब नहीं पूछा गया। नतीजा सूबे में जनता की बदहाली, बिचैलियों ने विदेशों में जागीरे खड़ी कर ली। लोकधन बर्बादी पर मोदी सरकार की कड़ाई जम्मू कश्मीर के राजनैतिक दलों और सियासतदारों पर भारी पडी है। अलगावादी नेताओं को जिस तरह सीधे सीधे पाक परस्त साबित किया गया और उनकी अवाम के शोषण की कहानियां बाहर आयी है जम्मू कश्मीर की सियासत में भूकंप के झटके आ रहे है। अलगाववादियों की दुकाने उठना और विकास के धन की जांच पड़ताल सूबे की सियासत को ऐसा दंश है कि वे सहन नहीं कर पा रहे है। जिस पर नरेन्द्र मोदी को अवाम की बधाई मिलना थी उसको सियासतदार उल्टा प्रचारित कर अलगाववाद को हवा पानी परोस रहे है। हाल के दिनों में वित्तीय प्रबंधन की लगाम कसी जाने पर सियासी ठेकेदारों और नेताओं पर अचूकवार होने से तिलमिला गए है। उन्हें अपनी गांठ खाली होने की फिक्र है। मुल्क, सूबे की खुशहाली की नहीं।
    नरेन्द्र मोदी को भारत और पाकिस्तान के बीच दोस्ताना ताल्लुक बढ़ने की कितनी अभिलाषा है इसका संकेत इसी बात से मिलता है कि प्रधानमंत्री मोदी विदेशी दौरा के अंतिम पड़ाव में पाकिस्तान पहुंचे और नवाज शरीफ के मेहमान बने। उनकी माताजी को साड़ी भेंट दी और पाकिस्तान को मोहब्बत का पैगाम दिया। लेकिन पाकिस्तान ने रोग नेशन का सबूत दिया। बातचीत के चलते सीमा का उल्लंघन भी किया और आतंकवाद को विदेश नीति बनाकर सारी दुनिया में जग हंसाई करायी। ऐसे में मोदी ने स्पष्ट कहा कि आतंकवाद और दोस्ती, भारत को दहशत का दंश और सियासी चर्चा साथ साथ नहीं चल सकती है लेकिन उमर अब्दुल्ला और मेहबूबा मुफ्ती को चिंता राष्ट्र की नहीं चंद वोटों और कुसी की है। ये अलगावाद परस्ती दिखाकर राष्ट्रीय सुरक्षा में छेदकर रहे है और जो बात पाकिस्तान कहने का साहस नहीं कर सकता उसके स्वर भी निकाल रहे है। मोदी का यह स्टेंड एक दम सही है। द्विपक्षीय मामले में न तो कोई बिचैलिया होगा और न तीसरा पक्ष होगा। आतंकवाद को समाप्त करने के लिए पहली बार एनडीए सरकार ने सुरक्षा बलों को छूट दी। अलगाववादियों को मिलने वाली सहायता के स्त्रोत बंद कर दिए है। यह एक सुनामी है जिससे विदेशी धन पर गुलछर्रे उड़ाने वाले बिचैलिया और राजनेता अचेत होकर प्रलाप कर रहे है। गिलानी परिवार पर कसी गयी मुस्कें बहुतों को नागवार गुजरी है। इसके बाद मेहबूबा मुफ्ती ने जिस तरह अपने डूबते सियासी जहाज के भविष्य से आहत होकर टिप्पणी की है उससे केन्द्र सरकार को भी समझ लेनी चाहिए कि मेहबूबा मुफ्ती और उनके साथ गठबंधन का भविष्य का द्वार बंद हो चुका है। पीडीपी की डगर कठिन है। मोदी का बहुआयामी अजेंडा स्थाई समाधान सिद्ध होगा।

    – भरतचन्द्र नायक
    एलआईजी ए 58, ई 6 अरेरा कालोनी, भोपाल

  • आजादी की कहानियों में आसरा तलाशती कांग्रेस

    आजादी की कहानियों में आसरा तलाशती कांग्रेस

    सल्तनत चली गई है लेकिन लोग अभी भी खुद को सुल्तान समझ रहे हैं। यह कहकर जयराम रमेश ने आज की कांग्रेस को नसीहत देने की कोशिश की है। गुजरात में अहमद पटेल का राज्यसभा चुनाव में जीत जाने पर जश्न मना रहे कांग्रेसी ये सोचने तैयार नहीं हैं कि उनकी नाव में छेद हो चुका है। इस जीत को भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की असफलता बता रहे समाचार माध्यम भी घटना का केवल एक पक्ष देख रहे हैं। जो मारे सो मीर के सोच में ढले चैनलों के सूत्रधार कांग्रेस की आतिशबाजी की चमक में अहमद पटेल के दरकते किले की झिरी नहीं देख पा रहे हैं। कांग्रेस के पास अपने 57 विधायक थे। एक राकांपा, एक जदयू और निर्दलीय समर्थन के साथ उसके पास 61 मतों का समर्थन था। इसके बावजूद पटेल को मात्र 44 वोट मिले। लगभग डेढ़ मतों से उनकी नाक बची। अहमद पटेल ने जब नामांकन भरा तो छह विधायकों ने इस्तीफा दे दिया था। गुजरात में कांग्रेस 33 सालों से सत्ता से बाहर है। अंतिम बार 1985 में उसकी सरकार बनी थी। इस बार अहमद पटेल की मनमानी के चलते ही गुजरात के दिग्गज नेता शंकर सिंह वाघेला ने पार्टी छोड़कर तटस्थ रुख अपना लिया था। जाहिर है कि पटेल ने सीट जरूर बचा ली है पर उनकी कुर्सी के पाए दरक गए हैं। इसलिए ये नहीं कहा जा सकता कि अमित शाह के प्रयास निष्फल हो गए हैं।गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने तो कहा भी है कि कांग्रेस भले ही जीत गई हो पर उसकी जीत नमक की तरह खारी है।अमित शाह को फर्जी मुठभेड़ कांड में फंसाने का षड़यंत्र अहमद पटेल का ही था जाहिर है कि इस चुनाव ने उनकी सत्ता की चूलें हिला दी हैं।इससे अहमद पटेल का काले धन का साम्राज्य धराशायी होने की भी शुरुआत हो गई है। इस चुनाव को भी भाजपा सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने जा रही है। कांग्रेस के नेतागण आज भी हिंदुस्तान के बादशाह की तरह बर्ताव कर रहे हैं। वे भ्रष्टाचार और परिवारवाद के दागों से मुक्त होने का जतन नहीं कर रहे हैं। कांग्रेस के धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय के फार्मूले आऊटडेटेड साबित हो चुके हैं। डॉ.मनमोहन सिंह के उदारीकरण लागू करने के पूंजीवादी सिद्धांत ने पार्टी के पुराने ढांचे को धराशायी कर दिया है। यही वजह है कि उसके नेतागण अपने अतीत को मुकुट बनाकर जीत का ख्वाब देखने लगे हैं।

    मध्यप्रदेश में नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ये हिसाब बताने तैयार नहीं कि उन्होंने भाजपा की सरकार को किस तरह कहां कहां घेरा और क्या सफलता पाई। इसकी तुलना में वे आजादी के संग्राम की शान बघार रहे हैं।कांग्रेस के नेतागण बार बार कहते नहीं अघाते कि उनकी पार्टी और महात्मा गांधी ने आजादी दिलाई है। जबकि हकीकत ये है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद उपनिवेश वादी व्यवस्था भंग होनी शुरु हो चुकी थी,और आर्थिक साम्राज्यवाद का दौर शुरू हो गया था। इसी हवा में भारत के साथ म्यांमार को भी आजादी मिली। जबकि चीन तो दो साल बाद पीपुल्स रिपब्लिक आफ चाईना बना। लेकिन आज भारत की अर्थव्यवस्था दो ट्रिलियन डालर की है और चीन की नौ ट्रिलियन डालर की । चीन ने 1981 से 2013 के बीच 63 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकाल लिया था। जबकि भारत में आज भी जन विद्रोह रोकने के लिए सब्सिडी आधारित हितग्राही मूलक योजनाएं चल रहीं हैं। जो कांग्रेसी बार बार अहसान जताते फिरते हैं कि आजादी के वक्त सुई भी देश में नहीं बनती थी उन्हें गौर करना चाहिए कि राजीव गांधी के तकनीक आयात करने के फैसले ने देश को कर्ज के दलदल में धकेल दिया । तकनीक खरीदने की होड़ ने देश की आत्मनिर्भरता की प्रक्रिया को लकवाग्रस्त बना दिया।

    कांग्रेसी नीतियों के पाप की गठरी चीन से तुलना करते वक्त एक झटके में खुल जाती है। चीन के यीवु शहर में उत्पादन की ढेरों इकाईयां लगाईं गईं हैं। यीवु शहर की इन इकाईयों में 2013 तक तीन लाख साठ हजार भारतीय व्यवसायियों ने अपना पूंजी निवेश किया और वहां माल बनाकर भारत भिजवाया। मोदी सरकार तो इसके बाद 26 मई 2014 को सत्ता में आई।इसके बावजूद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मेक इन इंडिया नारे ने इन उद्योगपतियों की नींद उड़ा दी है। यही वजह है कि चीन का मीडिया डोकलाम के बहाने नरेन्द्र मोदी पर निशाना साध रहा है। आज यीवु दुनिया का सबसे बड़ा थोक बाजार है। यहां करीब आठ लाख दूकानें हैं। चीनी कोई भी सौदा नहीं छोड़ते। वे सस्ता भी माल बनाते हैं और मंहगा भी। चीन ने पहले माल बनाया फिर उसकी मार्केटिंग की भी व्यवस्था की। आज वहां इंपोर्टरों और फैक्टरी मालिकों को खरीदार ढूंढने का काम बहुत सरल है। चीन ने जो स्पेशल इकानामिक जोन बनाए वे उसके विकास में मील का पत्थर बन गए। विकास के प्रस्ताव न तो भारत की संसद की तरह अटके न ही भूमि अधिग्रहण की समस्या आड़े आई। वहां उजाड़े गए लोगों के पुनर्वास की भी चिंता नहीं की जाती है। विकास की राह में विरोध और बहस की कोई गुंजाईश नहीं है। आर्थिक निवेश को विचारधारा और राजनीति के चश्मे से नहीं देखा जाता है। चीन ने अपने सबसे बड़े बांध का निर्माण मात्र अठारह साल में पूरा कर लिया और उससे बिजली भी बनाने लगा। जबकि भारत में नर्मदा बांध परियोजना 27 साल बाद पूरी हुई पर अभी तक उसे पुनर्वास के नाम पर अड़ंगों का सामना करना पड़ रहा है। जो लागत बढ़ी और घाटा सहना पड़ा उसका तो कोई हिसाब ही नहीं।

    चीन के विकास में महिलाओं की भागीदारी 75 फीसदी है जबकि भारत में केवल 34 फीसदी महिलाओं को हम काम दे पाए हैं। पुरुष युवाओं की बेरोजगारी ही हमारे लिए बड़ा सिरदर्द बनी हुई है। ये सब कांग्रेस की नीतियों की असफलता की कहानियां कहते हैं। मोदी सरकार के पहले तक भाजपा की सरकारें भी कांग्रेस की इन्हीं नीतियों की पिछलग्गू बनी रहीं हैं। मध्यप्रदेश की कांग्रेस यहां की भाजपा को इसलिए कोस रही है कि उसने 9 अगस्त को आयोजित ….. युवा संवाद… कार्यक्रम के पोस्टरों में भारत छोड़ो का नारा देने वाले महात्मा गांधी की तस्वीर नहीं छपवाई। जबकि ये आयोजन मध्यप्रदेश सरकार का था भारतीय जनता पार्टी का नहीं। ये बात सही है कि जब द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इंग्लैंड भारत से अपने हाथ खींच रहा था तब उसने अपने मन माफिक सहयोगियों को कांग्रेस में तलाशा था। कांग्रेस के नेताओं की दरियादिली की वजह से ही अंग्रेजों ने यहां के कमाऊ उद्योगों में निवेश किया और आज तक बहुराष्ट्रीय कंपनियों की आड़ में यहां से दौलत उलीच रहे हैं।

    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तो आजादी के समय शैशव अवस्था में था और देश के लोगों के बीच अपना जनाधार तलाश रहा था। कांग्रेस की मौकापरस्त राजनीति के जूझते हुए आरएसएस के समर्थन वाली भाजपा को लगभग सत्तर साल लग गए और आज भी वह कांग्रेस के नेताओं की ओर से लगाए जाने वाले लांछनों का सामना कर रही है।ये बात सही है कि भाजपा के भीतर एक बड़ा धड़ा कांग्रेस परस्त नीतियों की पूंछ पकड़कर चल रहा है।इसके बावजूद देश के स्तर पर भाजपा ने राजनीतिक दिशा बदलने में बड़ी भूमिका निभाई है और संतोष की बात ये है कि देश का युवा उसके साथ खड़ा है। कांग्रेस के नेता यदि वर्तमान में जीने के बजाए यूं ही अतीत को टटोलते रहेंगे तो जाहिर है वे अपनी पार्टी को अजायबघर ले जाएंगे। इन हालात में भाजपा विकास की नई दिशा का कितना लक्ष्य पा सकेगी कहा नहीं जा सकता।

  • जेबी लोकतंत्र की विरासत अब धराशायी

    जेबी लोकतंत्र की विरासत अब धराशायी


    - भरतचन्द्र नायक
    भारतीय लोकतंत्र की महिमा निराली है। यहां दशकों तक एक राजनैतिक दल ने आजादी के जंग में कामयाबी का श्रेय भी लूटा और राजनैतिक एकाधिकार भी जमाया। तब निर्वाचित सरकारे लोकतंत्र के नाम पर भंग भी की जाती रही और समय आने पर आया राम गया राम का खेल भी गुजरात और हरियाणा में खेलते हुए राजनैतिक कुशलता का ढोल भी पीटा गया। दिवंगत नेता भजनलाल का उल्लेख खूब हुआ और एक शब्दावली भी गढ़ी गयी लेकिन बलिहारी देश के मतदाताओं की जिन्होंने मुफलिस और मजलूम माने जाने पर भी करिश्मा कर दिखाया। उक्त पार्टी के एकाधिकार का दंभ खंडित किया। विकल्प भी पैदा किया। लोकशाही का मर्म सिखाते हुए फकीरों को बादशाह का रूतबा बख्श दिया। अब वही एकाधिकार वाले बादशाह तोहमत लगा रहे कि उनकी विरासत छीन कर बेइन्साफी की गयी है। जिस निजाम पर पक्षधरता का इल्जाम चस्पा होता रहा। वे ही अब चीख रहे है। उनका आरोप है कि लोकतंत्र को सरेआम लूटा जा रहा है।

    चारों तरफ नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की जुगलबंदी के चर्चे है। राज्यसभा के चुनाव की सरगर्मी जारी है। उसके 6 माह बाद गुजरात के चुनाव है। इसी दरम्यान बिहार में जनता दल यू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतिश कुमार ने महागठबंधन से दूरी बनाकर एनडीए का साथ पकड़ लिया। चारों तरफ कोहराम मचा। राहुल गांधी ने इसे महागठबंधन के साथ विश्वासघात बताया वहीं लालूप्रसाद यादव ने कहा कि यह जनता दल यू और कांग्रेस को मिले जनादेश का अपमान है। उपरी तौर पर उनकी आपत्ति सही भी लगती है, लेकिन नीतिश कुमार समर्थकों का यह कहना कि जनादेश जरूर जनता दल यू और कांग्रेस को ही मिला था और इस पर कायम रहना नैतिक जिम्मेदारी बनती थी लेकिन जनादेश के साथ बिहार के अवाम में यह भावना भी थी कि नीतिश कुमार की सरकार साफ सुथरा प्रशासन देगी और उनकी गठबंधन सरकार भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टाॅलरेंस की प्रतिबद्धता पर खरी उतरेगी। लिहाजा जब नीतिश बाबू ने देखा कि न तो लालू परिवार भ्रष्टाचार का स्पष्टीकरण देना चाहता है और न भ्रष्टाचार पर प्रायश्चित करने का साहस दिखा रहा है तो वे भ्रष्टचारी शासन को ढोते रहकर कलंक के भागी क्यों बनतें लेकिन लालू प्रसाद यादव ने सत्ता पलट बर्दाश्त करने के बजाए नीतिश कुमार के खिलाफ अभिलेखागार से एक आरोप भी खोद निकाला और लेकर घूमते फिर रहे है।

    बात यही समाप्त नहीं होती बौखलाहट में नित नए आरोप लगाकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को घेरने की जुर्रत की जा रही है लेकिन राहुल बाबा और गुलाम नवी आजाद इस बात को गंवारा करने को तैयार नही है कि यदि राज्यसभा चुनाव की बेला में विधायक पाला बदल रहे है तो पूरी सरकार के दल बदल करने का शिल्प तो कांग्रेस की ही देन है जिसने आया राम गया राम को शह देकर सरकारे पलटी और एकाधिकार को मजबूत किया। फिर आमजन चुनाव की आहट में विधायक आ जा रहे है तो स्यापा की क्या बात है। विधायकों के इस्तीफा देकर दूसरे दल में शामिल होने के पीछे पार्षदों द्वारा अपनी विफलता, संगठन की अप्रासंगिकता पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। मां बेटा की पार्टी ने तो राज्यों के संगठन पर गौर करना छोड़ दिया। वरिष्ठ नेता बेकद्री से संगठन से विरक्त हो गए। जो डूबते जहाज से निकलकर राजनैतिक वैतरणी पार करना चाहते है वे ठौर देख रहे है। इसमें प्रधानमंत्री को लपेटना अमित शाह को घसीटने के बजाए कांग्रेस का श्रेष्ठ वर्ग आत्म परीक्षण करने का साहस क्यों नहीं दिखाता। चूक सरासर कांग्रेस की है जो प्रांतीय संगठनों को कबीलाई जंग में जाता देखकर भी तटस्थ दर्शक बनकर रह गया है। इसी तरह उत्तर प्रदेश में यदि राजनैतिक दलों से पलायन हो रहा है तो दलीय विफलता के अलावा क्या कहा जा सकता है, लेकिन मजे की बात है कि किं कत्र्तव्यं विमूढ़ समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव इस पलायन को भाजपा का राजनैतिक भ्रष्टाचार और बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख वहन मायावती इसे सत्ता की भूख बताकर हकीकत से मुंह मोड़ रही है।

    आज हकीकत को अवसरवादिता के पैमाने पर देखना राजनैतिक दलों की फितरत बन गयी है। यदि ऐसा न होता तो कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी पं. बंगाल में हो रही जातीय हिंसा और केरल की वामपंथी सरकार की शह पर राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं के कत्ल के मामलों पर गौर करते और निंदा करते लेकिन उनका नजरिया वास्तविकता से भिन्न है और वे मोदी सरकार पर असहिष्णुता का इल्जाम लगा रहे है। आखिर वे जनता की आंखों में धूल झौंककर दलीय समर्थन खोने पर क्यों आमादा बने हुए है। ऐसे में एक विद्वान का यह कथन मौंजू है कि कल्पना शक्ति नाॅलेज से अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि नालेज की तो सीमा होती है लेकिन कल्पना असीम है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष इसके धनी है और राजनीति की घिसी पिटी फितरते छोड़कर कल्पनाशीलता से जनता का मन मोह रहे है। कल्पना में विश्व समाया हुआ है। इसी के बल पर नरेन्द्र मोदी ने हताश मुल्क में सकारात्मक पर्यावरण रचा, उसे अमली जामा पहनाने का प्रयास किया। जनता का भरोसा जीता और भगवा परचम लहराया है। विपक्ष अरण्यरोदन करता फिर रहा है।

    इस परिप्रेक्ष्य में जनता दल यू के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ नेता शरद यादव भी नीतिश कुमार से अप्रसन्न चल रहे है। वास्तव में उनकी नाराजगी के चर्चा उनकी प्रासंगिकता को नया रूप देने में सहायक हो सकती है और पुनर्वास का सिलसिला आगे बढ़ सकता है। राजनीति में तनिक भी रूचि लेने वालें इस बात पर अकस्मात दांतों तले अंगुली तो दबा लेते है कि एक जहाज का पंछी असुरक्षा के कारण दूसरे जहाज पर जा रहा है इसमें कोई अनुचित अवैध गोरखधंधा हो सकता है लेकिन जब वह याद करता है कि यह गोरखधंधा न तो नया और न इसकी अवैधता से आज विपक्ष अछूता है। उन्होंने सत्ता में रहकर कभी गौर नहीं किया है। अलबत्ता पूरी सरकार के पाला बदल लेने पर अपनी पीठ थपथपायी है। घोड़ा की मंडी का रिवाज तो उन्होंने ही आरंभ किया जो आज इस पर टीका टिप्पणी करते हुए यथार्थ से मुंह चुरा रहे है।

    जिस तरह से उत्तर प्रदेश में विधान परिषद के सदस्यों ने पलायन किया और गुजरात में विधायकों ने कांग्रेस से किनारा किया है उससे अगस्त में होने जा रहे राज्यसभा के चुनाव के परिणाम अप्रत्याशित हो सकते है और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अहमद पटेल की राज्यसभा पहंुचने का रास्ता कंटकाकीर्ण बन सकता है। जहां तक राज्यसभा में एनडीए के वर्चस्व बढ़ने का सवाल है उसे 123 सदस्यों की गिनती पूरी करना है जिसके समीप पहंुचकर उसने अल्पमत की लक्ष्मण रेखा को पार करने का कौशल दिखा दिया है। बुजुर्गो का कहना है कि संकट अकेला नहीं आता उसके साथ कई परेशानियां भी आती है। कमोवेश यही हालात देश में सबसे बड़े राजनैतिक दल कांग्रेस और उन क्षेत्रीय दलों की है जो वंश परंपरा और अपनी पारिवारिक विरासत के मत से नहीं उबर पाए है। इसमें कोई शक नहीं कि गुजरात जहां विधानसभा चुनाव सन्निकट है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का गृह प्रदेश है, इसलिए गुजरात के चुनाव उनकी प्रतिष्ठा से जुड़े है। कांग्रेस में कद्दावर नेता रहे और वरिष्ठता का दर्जा हासिल करने वाले शंकर सिंह वाघेला का कांग्रेस से इस्तीफा और प्रदेश कांग्रेस संगठन में बिखराव कांग्रेस की विफलता है वही भाजपा के लिए वरदान साबित भी है। हर विफलता के पीछे सबब खोजना जरूरी समझा जाता है लेकिन सियासी दलों को यह मंजूर नहीं कि साहसपूर्वक कहे कि जनता ने उन्हें ठुकरा दिया। इसलिए वह ठीकरा तो फोड़ता है और जनता क्षणिक भ्रमित हो जाती है।

  • कैसे भुला दें मुखर्जी का बलिदान

    कैसे भुला दें मुखर्जी का बलिदान

    (6 जुलाई जन्मदिवस)
    …..- भरतचन्द्र नायक
    लम्हों ने खता की है सदियों ने सजा पायी। आजादी के बाद देश में गठित पहली राष्ट्रीय सरकार के अंतद्र्वंद का ही दुष्परिणाम है कि आज कश्मीर की मनोरमवादियां रक्तरंजित हो रही है। काश राष्ट्रीय सरकार में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के आव्हान पर शामिल होने वाले उस दूरदर्शी, दार्शनिक राजनेता डाॅ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी की चेतावनी पर तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. नेहरू ने ध्यान दिया होता किंतु सेकुलरवाद के पुरोधा बनने की चाहत में जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा और धारा 370 ईजाद करके न केवल भारत को लहुलुहान करने का साजो सामान दीर्घजीवी बना दिया अपितु भारत के अभिन्न अंग जम्मू कश्मीर में अलगाववाद के बीज बो दिए गए। पं. नेहरू से मतभेद उभरने और मंत्रिपद से इस्तीफा देने का वाजिब कारण यही था कि डाॅ. मुखर्जी ने कहा था कि पाकिस्तान से विस्थापित शरणार्थी जितनी भूमि छोड़कर आए है उतनी भूमि पाकिस्तान से ली जाए। तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल सहमत थे लेकिन पं. नेहरू ने बात अनसुनी कर दी। डाॅ. मुखर्जी की पहल पर आधा पंजाब ओर आधा बंगाल बच गया। डाॅ. मुखर्जी ने विभाजित भारत के पाकिस्तान से इतना भूभाग बचा कर सच्चे राष्ट्रवाद का सबूत दिया। उनके इस्तीफा का आगाज उन्होंने संसद में देकर किया और जनसंघ गठित कर धर्म, जाति, नस्ल का विचार किए बिना सभी के लिए जनसंघ के द्वार खोलकर राष्ट्रवादियों पर साम्प्रदायिकता का आरोप लगाने वालों के लिए माकूल जवाब दिया।

    डाॅ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने जम्मू-कश्मीर को भारत की मुख्यधारा में जोड़ने के लिये अनुच्छेद 370 का प्रखर विरोध किया। जम्मू-कश्मीर में प्रवेश के लिये परमिट प्रणाली को डाॅ मुखर्जी ने देश की अखंडता में बाधक बताया और इसके विरोध में जब बिना प्रवेश परमिट के जम्मू-कश्मीर में प्रवेश करने का आन्दोलन किया तत्कालीन प्रधानमंत्री पं.नेहरू तब के जम्मू कश्मीर के प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला के तुष्टीकरण पर आत्म मुग्ध थे। इस साजिश में शेख अब्दुल्ला को किसकी शह थी यह बताना अब व्यर्थ है। लेकिन इस बात में कोई संदेह नहीं कि उन्हें जानबूझकर ऐसी जगह हिरासत में लिया गया जहाॅं भारतीय संविधान, सर्वोच्च न्यायालय, देश का संवैधानिक हस्तक्षेप बेअसर था। देश की अखंडता के लिए प्रतिबद्धता के लिए रात में डाॅ- मुखर्जी के प्राण चले गये। तब न तो डाॅ.मुखर्जी को उपचार की सुविधा हासिल हुई और न न्यायिक समीक्षा का अवसर मिला। डाॅ.मुखर्जी की मौत ने भारतीय उपमहाद्वीप को झकझोर दिया। पं नेहरू ने अपने संवदेना संदेश में डाॅ मुखर्जी की माताजी योग माया देवी से उनकी इच्छा के बारे में पूछताछ की तो उन्होंने डाॅ मुखर्जी की मेडीकल हत्या पर दुख व्यक्त करते हुए न्यायिक जांच की मांग की थी। जो कभी पूरी नहीं हुई। कुछ ही हफ्तों में डाॅ.मुखर्जी के बलिदान के बाद जम्मू-कश्मीर में प्रवेश परमिट की प्रणाली को समाप्त कर दिया गया। वहाॅं अलग संविधान, अलग निशान और अलग प्रधान की व्यवस्था को बदल दिया गया। फिर भी डाॅ.मुखर्जी की धारा 370 को समाप्त किये जाने की माग को तुष्टीकरण की बलिबेदी पर चढ़ा दिया गया।

    जम्मू-कश्मीर को लहूलुहान करने में धर्म निरपेक्षता के छदम् ने कम नुकसान नहीं पहुंचाया है। कांग्रेस जिस रास्ते पर चली वह वास्तव में डाॅ.मुखर्जी के बलिदान का अपमान है। पूर्व प्रधानमंत्री डाॅ.मनमोहन सिंह जम्मू-कश्मीर को स्वायत्तता देने की बात कह कर भारत की सवा अरब जनता के हितों के साथ खिलवाड़ किया। सरहदों के बाहर बुने ये जाल में फंसना हमारी नियति बनी है। आजादी के बाद पाकिस्तान के फौजियों ने कबालियों के वेश में जम्मू-कश्मीर पर आक्रमण किया उसके पहले जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरी सिंह अपनी रियासत का भारत में विलय कर चुके थे। इसी तरह की अन्य रियासतों को पाकिस्तान में विलय की आजादी मिली थी। फिर पाकिस्तान किस आधार पर जम्मू-कश्मीर के विलय पर प्रश्न उठाता है। इस मर्म की हमने अनदेखी की। उसका खामियाजा आज तक भुगतने के लिये भारत अभिषप्त है। कबायलियों के हमले का भारतीय फौज ने माकूल जबाव दिया। पाकिस्तान के फौजियों को खदेड़ा और छटी का दूध याद दिलाया। लेकिन हम तुष्टीकरण के अलंवरदार जम्मू कश्मीर को शेख अब्दुल्ला के मन के माफिक जीती हुई जमीन छोड़ते चले गये। जो कसर बाकी थी वह उनके कुल दीपक डाॅ फारूख अब्दुल्ला ने स्वायत्तता दिये जाने का बिल लाकरपूरी कर दी। कांग्रेस इस बिल पर अपनी पुष्टि की मोहर लगाकर विश्व को अपनी धर्म निरपेक्षता का सबूत देने की खातिर देश का मुकुट भारत विरोधी देश को तश्तरी में भेंट करने के लिये आतुर रही थी। जो जनविरोध के कारण नहीं हो सका।

    कांग्रेस जम्मू कश्मीर में पीडीपी की कठपुतली बनकर आतंकवादियों के प्रति नरमी बरती रही। जिस स्वायत्तता को पूर्व प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह भरोसा परोस रहे थे। उसकी शकल क्या होती? यह जानकर सिइस पैदा हो जाती है। वे 1953 की उस व्यवस्था को बहाल करना चाहते थे, जिसके लिये डाॅ. मुखर्जी ने प्राण गवाएं। हजारों लोगांे ने अपना खून बहाया और लाखों कश्मीरी अपने घर छोड़कर अपने ही देश में शरणार्थी बनकर नारकीय जिन्दगी बसर कर रहे हैं। आटोनामी दिये जाने की कमेटी मेें कर्णसिंह की अपनी भूमिका रही है। उन्हें आज देश को समझाना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर को स्वायत्तता दिये जाने से देश की अखंडता का कौन सा लक्ष्य पूरा होना था। पहले ही दो बटे पांच धरती पाक अधिकृत कश्मीर के नाम पर हमसे छिन चुकी है। उसे पाक अधिकृत कश्मीर कहा जाता है। जम्मू-कश्मीर रिसेटिलमेन्ट एक्ट को जीवित करके विभाजन के समय जम्मू-कश्मीर से पाकिस्तान जा चुके लोगों को पुनः जम्मू-कश्मीर लौटने की दावत तत्कालीन पीडीपी सरकार ने दी थी। कश्मीर घाटी से आतंकवादी हमलों से परेशान होकर पलायन कर चुके दो लाख कश्मीरी पंडित अपने ही देश में शरणार्थी बन चुके हैं। उनके लौटकर अपने घरों मंे आबाद करने में किसी ने कोई उत्सुकता दिखायी। भारतीय जनसंघ की मांग पर गौर नहीं किया गया। अलबत्ता पूर्व प्रधानमंत्री ने अलगाववादियों के बीच धर्म निरपेक्ष छवि चमकाने के लिये स्वायत्तता देने का राग अलापा। देश की अखंड़ता, जम्मू-कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बनाने के लिये अपने प्राण न्यौछावर करने वालों के बलिदान का मजाक उड़ाया गया है। त्रिशंकु विधानसभा का गठन होने पर भाजपा ने पीडीपी से हाथ मिलाकर जम्मू कश्मीर में लोकतंत्र को कायम रखा है। जम्मू कश्मीर के बीच भेदभाव को समाप्त करने का प्रयास किया है। राज्य सरकार ने अलगाववाद से युवा पीढी को आगाह किया है। युवकों को सुरक्षा बल में प्रवेश देकर रोजगार दिया जा रहा है। कश्मीरी नवजवानों को सेवा में प्राथमिकता दी जा रही है।

    वोटो के लिये जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देने वालों की मंशा को बेनकाब किये जाने की जरूरत हैै। यही डाॅ. मुखर्जी के लिये सच्ची श्रद्धाजंलि होगी। धर्म निरपेक्षता के छदम की अब देश को कितनी कीमत चुकाना पडेगी इसका अंदाजा तो स्वायत्तता की मांग उठाने वाली पीडीपी, नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस को लग जाना चाहिए था। यदि जम्मू-कश्मीर को स्वायत्तता दी गयी होती तो 1953 की स्थिति बहाल हो जाती। अनुच्छेद 370 तो स्थायी हो जाता। स्वायत्तता दिए जाने से भारत का कोई नागरिक जम्मू-कश्मीर का नागरिक कभी नहीं हो सकेगा। एक तरह से जम्मू-कश्मीर में भारत सरकार का नियंत्रण एक दम समाप्त हो जाता यहाॅं तक कि यदि कभी विदेशी आक्रमण जम्मू-कश्मीर की सरहदों पर होता है तो केन्द्र सरकार वहाॅं आपात काल तक घोषित करने में सक्षम नहीं होती। सैद्धांतिक रूप से सुरक्षा, दूरसंचार विदेशी मामलों में भारत का दखल रहेगा, लेकिन नियंत्रण नहीं होगा। सर्वोच्च न्यायालय, निर्वाचन आयोग, नियंत्रक महालेखा परीक्षक की भूमिका जम्मू-कश्मीर में समाप्त हो जायेगी। जिस प्रवेश परमिट प्रणाली को समाप्त करने के लिये डाॅ.श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने प्राणों की आहुति दी उसकी बहाली स्वायत्तता दिये जाने का खास मकसद रहा है। कांग्रेस हमेशा यह कहती रही कि साम्प्रदायिक आधार पर देश का विखंडन नहीं होने देगे, लेकिन देश का बटवारा साम्प्रदायिक आधार पर कराया। जम्मू-कश्मीर को स्वायत्तता का मतलब समझकर इस खतरे से आवाम को आगाह करना ही उस महामना डाॅ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। जम्मू कश्मीर की जनता ने जान हथेली पर रखकर विधानसभा और लोकसभा के चुनावों का सामना किया। अलगाववादियों को अप्रासंगिक बना दिया।

    आज जो अशांति है वह चंद जिलों तक सीमित है, लेकिन वोटों की खातिर अपने को सेकुलरवादी बताने के चक्कर में राजनैतिक दल देश की अखंडता के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। पीडीपी के साथ गठबंधन करने के पीछे एक बड़ा लक्ष्य रहा है कि जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों की सरकार का गठन कर सीमांत प्रदेश का सांस्कृतिक वैभव लौटाया जाए। अपने घरों से बेघर हुए लाखों कश्मीरी पंडितों की घर वापसी हो, लेकिन इसे विफल करने के पीछे पाकिस्तान का नापाक इरादा है और प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने पाकिस्तान के इरादे को विश्व बिरादरी में बेनकाब करने में सफलता पायी है। जम्मू कश्मीर से आतंकवाद और अलगाववाद दफन हो। जम्मू कश्मीर के उस अवाम को सुकून मिले जिसने भारत में विलय के बाद लोकसभा और विधानसभा चुनाव में भाग लेकर लोकशाही को बरकरार रखा है। डाॅ. मुखर्जी ने जीवन पर्यन्त इसके लिए संघर्ष किया। उनके बलिदान के कारण ही जम्मू कश्मीर आज भारत का अभिन्न अंग है। मुठ्ठी भर अलगाववादी जिसे आजादी का संघर्ष बता रहे है उसे दुनिया समझ गयी है। पाकिस्तान का अलग थलग पड़ जाना इसका सबूत है।

  • कांग्रेस के गुलाम की फ्री स्पीच

    कांग्रेस के गुलाम की फ्री स्पीच


    कांग्रेस के शासनकाल में एनडीटीवी को जिस दरियादिली से बढ़ावा दिया गया उसके चलते यह चैनल खुलकर एकपक्षीय समाचारों का प्रवक्ता बन गया था। उस दिन तो हद हो गई जब उसकी एक बदतमीज टीवी एंकर ने आमंत्रित अतिथि के रूप में बुलाए गए भाजपा के प्रवक्ता के ऊपर टीवी स्क्रीन पर ही शो छोड़कर चले जाने का दबाव बनाया। बदतमीजी की इस पराकाष्ठा की रोकथाम को अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला बताया जाने लगता इसलिए सरकार खामोश रही। वो तो भला हो सीबीआई का जिसने आर्थिक अनियमितता को उजागर करते हुए चैनल की असलियत जनता के सामने ला दी।अब चैनल के पत्रकार इसे मीडिया पर हमला बता रहे हैं । देश के खिलाफ गद्दारी करने वाले राजनेताओं और पत्रकारों को सावधान हो जाना चाहिए अब वे मुगालते में न रहें, उनकी आवारागर्दी पर भी अंकुश लगाया जा सकता है। प्रस्तुत है इण्डिया टीवी चैनल के पत्रकार अभिषेक उपाध्याय की रपट–

    लो हो गया फ्री स्पीच पर अब तक का सबसे बड़ा हमला।एनडीटीवी के खिलाफ सीबीआई ने एफआईआर दर्ज कर ली। हालांकि शिकायतकर्ता सरकार नही है। कोई सरकारी एजेंसी भी नही है। एनडीटीवी का ही एक शेयरहोल्डर है। एनडीटीवी ने आईसीआईसीआई बैंक से 350 करोड़ का लोन लिया था। उस वक़्त एनडीटीवी के पास महज 74 करोड़ की सम्पत्ति थी। मगर कांग्रेस राज में फ्री स्पीच के इस सबसे बड़े कथित मसीहा की धमक का आलम ये था कि 74 करोड़ की सम्पत्ति की कीमत पर 350 करोड़ का लोन हासिल कर लिया गया। वो भी तब जब एनडीटीवी के शेयर औंधे मुंह गिर चुके थे। उनका भाव 438 रुपया प्रति शेयर से गिरकर 156 रुपये प्रति शेयर पर आ चुका था। ऐसी कंपनी को इतना भारी भरकम लोन! फिर इस लोन का एक बड़ा हिस्सा प्रणव रॉय और राधिका रॉय के पर्सनल खातों में डाइवर्ट कर दिया गया। ये एक और बड़ा कारनामा किया इन फ्री स्पीच वालों ने। इस लोन के एवज में ब्याज की 48 करोड़ की रकम बनती थी। मामला इस बात का है कि एनडीटीवी इसे भी पी गया। इसी मामले में सीबीआई की बैंकिंग फ्रॉड डिवीज़न ने एनडीटीवी के मालिक प्रणव रॉय, उनकी पत्नी राधिका रॉय और होल्डिंग कंपनी आरआरपीआर प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली है।

    हालांकि सीबीआई की बैंकिंग फ्रॉड डिवीज़न ने इसके पहले भी ब्याज की रकम हड़प कर जाने के न जाने कितने मामलों में एफआईआर दर्ज की है। मगर “फ्री स्पीच” पर कभी भी इस तरह का कोई हमला नही हुआ। यहां तक कि बैंकों के करोड़ों हड़प कर जाने वाले माल्या ने भी फ्री स्पीच पर हमले का आरोप नही लगाया। ट्विटर के प्लेटफार्म से ही सही, माल्या की फ्री स्पीच दनादन जारी है। दिक्कत ये है कि एनडीटीवी ने अपनी ईमानदारी का कथित सर्टिफिकेट खुद ही जारी किया हुआ है। और इसके चारों कोनों पर वामपंथ की गली हुई प्लास्टिक से बाइंडिंग भी कर दी है। इस सर्टिफिकेट के चारों ओर ‘सेकुलरिज्म’ के नंगे तार झूलते रहते हैं। छूने की सोचना भी मत। चेतावनी अलिखित है, मगर बिल्कुल स्पष्ट है। लालू यादव भी चारा घोटाले से लेकर हज़ार करोड़ की बेनामी सम्पत्ति के मामले में सेकुलरिज्म के ऐसे ही कवच का इस्तेमाल कर चुके हैं और करे जा रहे हैं।

    इसी एनडीटीवी के रवीश पांडेय (सिगरेट के पैकेट पर लिखी चेतावनी वाले रूल के मुताबिक-रवीश कुमार) के सगे बड़े भाई एक दलित लड़की को प्रताड़ित करने और सेक्स रैकेट चलाने के मामले में महीनों से फरार चल रहे हैं। मगर इस फ्री स्पीच और अभिव्यक्ति की आज़ादी को तब काठ मार गया था जब इसी चैनल पर ब्रजेश पांडेय की खबर बिना ताबूत के ही दफन कर दी गई। देश के तमाम चैनलों और अखबारों में बिहार कांग्रेस के उपाध्यक्ष रहे ब्रजेश पांडेय (रवीश पांडेय के भाई) की खबरें प्रमुखता से चलीं और छपीं मगर अभिव्यक्ति की आज़ादी के इस सबसे बड़े कथित झंडाबरदार ने उस पीड़ित दलित लड़की की आवाज़ कुचल दी। भाई का मामला जो था। दिल्ली की किस मार्किट में बिकते हैं, इतने मजबूत मुखौटे? टेंडर भर निकल जाए तो ठेकेदारों में होड़ लग जाएगी! रवीश पांडेय को शायद पता होगा इस मार्केट का?

    अब एनडीटीवी पर एक और मामला जांच में सामने आया है। विदेशों में 33 ‘पेपर कंपनियां’ बनाई। 1100 करोड़ रुपए उगाहे और फिर सारी कंपनियां dissolve कर दीं। पेपर कंपनियां यानि वे जो सिर्फ कागजों पर चलती हैं। ये 1100 करोड़ रुपए भी उन अज्ञात लोगों ने दिए जो ब्रिटिश वर्जिनिया आइलैंड और केमन आइलैंड जैसे टैक्स हैवेन देशों या यूं कह लें कि काली कमाई के अड्डों से तालुक रखते हैं। ये सारी जानकारी घरेलू एजेंसियों से छुपा ली गई। न इनकम टैक्स को खबर हुई और न ही कॉरपोरेट अफेयर्स मिनिस्ट्री को। हो गए चुपचाप करोड़ों पार।

    सिलसिला है ये। एक दो नही कई-कई मामले। हिंदुस्तान टाइम्स में छपी रिपोर्ट पर यकीन करें तो एयरसेल मैक्सिस डील से लेकर एयरइंडिया की प्लेन खरीद तक। हर जगह एनडीटीवी। मलाईदार कमाई के हर रास्ते पर। मुहर दर मुहर।

    मगर नही। मामला फ्री स्पीच का है। मामला कथित ईमानदार पत्रकारिता के इकलौते ठेकेदार का है। मामला सेक्युलर और वामपंथी सोच के झण्डाबरदार का है। सो सारे गुनाह माफ। सारी एजेंसियां “संघी”। खिलाफ आवाज़ उठाने वाले सारे लोग “कम्युनल”। देश का लोकतंत्र “खतरे” में। फ्री स्पीच “कोमा” में। उफ़, शाम के 7.30 हो गए। अब यहीं खत्म करता हूँ। कुछ ज़रूरी काम निपटा लूं। कुछ देर बाद “काली स्क्रीन” भी देखनी होगी 😊

    साभार पोस्ट अभिषेक उपाध्याय इण्डिया टीवी चैनल
    Abhishek Upadhyay