विपक्ष की गोद चढ़ी तेल लाबी पर भारी पड़ा स्वदेशी इथेनाल


देश में ई-20 (20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल) को लेकर पिछले कुछ दिनों से भ्रम और विवाद का वातावरण बना हुआ है। सोशल मीडिया पर ऐसे दावे किए जा रहे हैं कि इससे वाहनों के इंजन खराब हो जाएंगे, माइलेज में भारी गिरावट आएगी और उपभोक्ताओं को नुकसान होगा। इन आशंकाओं के बीच केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यदि कोई यह सिद्ध कर दे कि ई-20 से किसी वाहन का इंजन खराब हुआ है तो सरकार जवाब देने को तैयार है। उन्होंने इसे देश की ऊर्जा सुरक्षा, किसानों की आय और विदेशी मुद्रा बचत से जुड़ा राष्ट्रीय कार्यक्रम बताया है।

वास्तव में ई-20 केवल ईंधन परिवर्तन का कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह भारत की आर्थिक, कृषि और ऊर्जा नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। भारत अपनी पेट्रोलियम आवश्यकताओं का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। इस आयात पर हर वर्ष लाखों करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा खर्च होती है। ऐसे में यदि पेट्रोल में घरेलू स्तर पर उत्पादित इथेनॉल मिलाया जाता है तो आयातित पेट्रोल की आवश्यकता घटती है और विदेशी मुद्रा की बड़ी बचत होती है। केंद्र सरकार का अनुमान है कि इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम से देश को प्रतिवर्ष लगभग दो लाख करोड़ रुपये तक की बचत का दीर्घकालिक लाभ मिल सकता है।
गडकरी बार-बार कह चुके हैं कि भारत का भविष्य केवल पेट्रोल पर आधारित नहीं रहेगा। उनका जोर—
इथेनॉल,
बायो-सीएनजी,
हरित हाइड्रोजन,
इलेक्ट्रिक वाहन,
फ्लेक्स-फ्यूल इंजन,
और जैव ऊर्जा
पर है।
वर्ष 2014 में भारत में पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण केवल लगभग 1.5 प्रतिशत था । लगातार नीति सुधार, चीनी मिलों को प्रोत्साहन और जैव ईंधन कार्यक्रम के विस्तार के कारण यह स्तर बढ़ते-बढ़ते वर्ष 2025 में 20 प्रतिशत तक पहुँच गया। यह लक्ष्य मूल रूप से वर्ष 2030 तक प्राप्त किया जाना था, लेकिन भारत ने इसे पाँच वर्ष पहले ही हासिल कर लिया।

इथेनाल का उत्पादन वर्ष 2014 लगभग अड़तीस करोड़ लीटर होता था। 2025 तक यह बढ़कर 661 करोड़ लीटर से अधिक होने लगा। आज देश भर के लगभग पंद्ह हजार से अधिक पेट्रोल पंपों पर ई-20 पेट्रोल उपलब्ध कराया जाने लगा है।

ई-20 को लेकर सबसे बड़ा भ्रम यही फैलाया गया कि इससे वाहन खराब हो जाएंगे। सरकार, पेट्रोलियम मंत्रालय और प्रमुख वाहन निर्माता कंपनियों का कहना है कि वर्षों के परीक्षण के बाद ही ई-20 लागू किया गया है। आधुनिक वाहनों को ई-20 के अनुरूप तैयार किया जा चुका है। पुराने वाहनों में भी व्यापक स्तर पर इंजन क्षति का कोई प्रमाण सामने नहीं आया है। हाँ, कुछ पुराने मॉडलों में 3 से 5 प्रतिशत तक माइलेज में कमी आ सकती है, क्योंकि इथेनॉल की ऊर्जा घनत्व पेट्रोल से कुछ कम होती है। लेकिन इसके बदले उच्च ऑक्टेन संख्या, कम प्रदूषण और आयात में कमी जैसे लाभ प्राप्त होते हैं। इससे इंजन की टूटफूट कम होती है और निकलने वाला धुआं कम विषैला होता है। विदेशी मुद्रा में बचत तो सबसे बड़ा लाभ है ही।

इथेनॉल कार्यक्रम का सबसे बड़ा लाभ किसानों को मिला है। पहले चीनी मिलों में अधिशेष चीनी का संकट बना रहता था। अब गन्ने के रस, बी-हैवी शीरे तथा अन्य कृषि उत्पादों से इथेनॉल बनने लगा है। इससे चीनी मिलों की आय बढ़ी और किसानों के बकाया भुगतान में भी सुधार आया। भविष्य में मक्का तथा अन्य अनाज आधारित इथेनॉल उत्पादन बढ़ने से फसल विविधीकरण को भी प्रोत्साहन मिलेगा।

भारत में पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता एक दिन में नहीं बढ़ी। कई दशकों तक ऊर्जा सुरक्षा की बजाय आयात-आधारित व्यवस्था पर अधिक भरोसा किया गया। पेट्रोलियम विपणन, रिफाइनिंग और वितरण के विस्तार के साथ देश में ईंधन उपभोग तेजी से बढ़ा, जबकि वैकल्पिक जैव ईंधनों के विकास पर अपेक्षित गति से काम नहीं हुआ। परिणामस्वरूप पेट्रोलियम आयात का बोझ लगातार बढ़ता गया और अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर देश के बजट और चालू खाते पर पड़ता रहा।बढ़ती गाड़ियों की संख्या की वजह से ये खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है। वर्तमान सरकार ने इसी निर्भरता को कम करने के लिए इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम को प्राथमिकता दी है।

इथेनॉल एक नवीकरणीय जैव ईंधन है। इसके उपयोग से कार्बन उत्सर्जन में कमी आती है तथा पेट्रोल की तुलना में यह अधिक स्वच्छ ईंधन माना जाता है। भारत ने वर्ष 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य निर्धारित किया है। ई-20 उस दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

ई-20 पर विवाद का एक कारण यह भी है कि देश में करोड़ों पुराने वाहन अभी भी चल रहे हैं। कुछ उपभोक्ताओं ने माइलेज में कमी की शिकायत की है। वहीं सोशल मीडिया पर अपुष्ट वीडियो और संदेशों ने आशंकाओं को बढ़ाया। हाल के दिनों में सरकार को औपचारिक स्पष्टीकरण जारी करना पड़ा कि ई-20 नीति वर्षों के परीक्षण के बाद लागू की गई है और इसे लेकर फैलाई जा रही अनेक बातें तथ्यात्मक नहीं हैं।

भारत ऊर्जा आयात पर निर्भर देश है। यदि घरेलू स्तर पर उत्पादित इथेनॉल से विदेशी मुद्रा की बचत होती है, किसानों को नया बाजार मिलता है, प्रदूषण घटता है और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होती है, तो यह केवल ईंधन नीति नहीं बल्कि आर्थिक आत्मनिर्भरता की रणनीति भी है। स्वाभाविक है कि इतने बड़े परिवर्तन के साथ तकनीकी प्रश्न और उपभोक्ताओं की शंकाएँ भी सामने आएँगी। सरकार की जिम्मेदारी है कि वह पारदर्शी वैज्ञानिक जानकारी उपलब्ध कराए और जहाँ आवश्यक हो वहाँ पुराने वाहनों के लिए व्यावहारिक समाधान भी दे।

ई-20 पर बहस होनी चाहिए, लेकिन उसका आधार वैज्ञानिक तथ्य और प्रमाण हों, अफवाहें नहीं। यदि भारत को आयातित तेल पर निर्भरता कम करनी है और विदेशी मुद्रा की बचत के साथ किसानों की आय बढ़ानी है, तो इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम आने वाले वर्षों में देश की ऊर्जा नीति का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ बन सकता है।

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