Month: July 2026

  • भाजपा की धुलाई का अंदाज समझिए नेताजी

    भाजपा की धुलाई का अंदाज समझिए नेताजी

    भारतीय जनता पार्टी के फैसलों को देखकर आज लोग हतप्रभ हैं। नरोत्तम मिश्रा जैसे दिग्गज की पतंग कटने से भाजपा के कार्यकर्ता और नेता सभी बौखलाए घूम रहे हैं। उन कार्यकर्ताओं की पूरी जमीन दरक गई है जिन्होंने नरोत्तम के लंबी दौड़ का घोड़ा मानकर अपनी पूरी जायदाद दांव पर लगा दी थी। भाजपा की राजनीति को जिन्होंने भी करीब से देखा है उन्होंने नरोत्तम की दबंगई से बैचेनी भी महसूस की है। ब्राह्मण राजनीति का संबल पाकर नरोत्तम सत्ता के जिस सत्रहवें आसमान पर पहुंच गए थे उसे देखकर कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि पार्टी कभी उनका टिकिट काटने का फैसला भी ले सकती है। खुद को केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह का करीबी होने का अहसास भरने वाले नरोत्तम भी इस तरह की कोई उम्मीद नहीं कर रहे थे. उन्होंने अपनी चुनावी तैयारी पूरे आत्म विश्वास से चालू कर दी थी।

    भाजपा बार बार अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को संदेश देने का प्रयास कर रही है कि वे समय की मांग को देखते हुए अपने तौर तरीके बदलें। कांग्रेस के जमाने की राजनीतिक शैली की पूंछ पकड़कर चलने की कुनबे वाली राजनीति छोड़ें पर गमले में उगे हुए नेता ये समझने को राजी नहीं हैं। विधानसभा अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर, पीडब्ल्यूडी मंत्री राकेश सिंह, पंचायत मंत्री प्रहलाद पटेल जैसे नेताओं को मध्यप्रदेश भेजकर भाजपा हाईकमान ने पार्टी की लाईन और लैंथ बदलने की कोशिश की लेकिन वह असफल रही। उमा भारती जैसी कद्दावर नेता को विदा करके संदेश देने का प्रयास किया कि भारत की राजनीतिक जरूरतें कुछ अलग हैं लेकिन कार्यकर्ता पुराना ढर्रा छोड़ने को तैयार नहीं हैं। गोपाल भार्गव , भूपेन्द्र सिंह, जयंत मलैया, हिम्मत कोठारी जैसे दिग्गजों को दर्शक दीर्घा में बिठाकर पार्टी ने अन्य नेताओं को नई राजनीति करने का संदेश दिया पर वे कांग्रेस के दिग्विजय सिंह की दगाबाजी को अपना माडल बनाकर चलने लगे। शिवराज सिंह चौहान को केन्द्र भेजकर पार्टी ने चाहा था मध्यप्रदेश में वह भाजपा को कांग्रेस की छत्रछाया बनकर चलने वाली पिछलग्गू छवि से मुक्त कर पाएगी। इसके बाद भी लगभग पांच लाख करोड़ रुपए डकारकर बैठे नेताओं के मुंह लगा खून उन्हें आदमखोर बनने से नहीं रोक पा रहा है। नरोत्तम के टिकिट कटने के बाद उनके समर्थकों ने जिस तरह भाजपा कार्यालय को बंधक बनाया, शहर के बाजार बंद कराने का प्रयास करके सरकार को ठेंगा दिखाया उससे लगता है कि नरोत्तम अपने पतन की नई इबारत लिख रहे हैं।

    आज भाजपा के सामने चुनौती है कि वह कांग्रेस के छोड़े गए पापों को भी ढोए और वैश्विक परिस्थितियों जन्य मंहगाई से भी जनता को बचाए। ऐसे में वह दंभी नेताओं की स्वयं का घर भरने वाली राजनीति को बर्दाश्त कैसे कर सकती है। जिन नेताओं को उसने घर बिठाया है वे सभी अरबों की जायदाद खड़ी करके किनारे किए जाने के बाद स्वयं को सहानुभूति का पात्र बताने का प्रयास कर रहे हैं। वे अपने स्थान पर अपनी औलादों को राजगद्दी दिलाने का पुरजोर प्रयास भी कर रहे हैं। भाजपा हाईकमान ने कई बार स्पष्ट कर दिया है कि वह कांग्रेस की तरह परिवारवादी पार्टी नहीं है। किसी कार्यकर्ता को केवल इसलिए सत्ता में नहीं उतारा जा सकता कि वह फलां राजनेता का बेटा या बेटी है। इसके बावजूद पार्टी के नेतागण चंद उदाहरणों का हवाला देकर अपनी नई पीढ़ी को अवसर दिए जाने की वकालत कर रहे हैं।

    मध्यप्रदेश भाजपा की प्रयोगशाला रही है। यहीं से भाजपा का संगठन परवान चढ़ा है। इसके बावजूद कुशाभाऊ ठाकरे,राजमाता विजयाराजे सिंधिया, वीरेन्द्र कुमार सखलेचा,प्यारेलाल खंडेलवाल,  कैलाश जोशी,सत्यनारायण जटिया, राघवजी भाई,जैसे अनेकानेक नेताओं ने जो भाजपा खडी की थी वह धीरे धीरे कांग्रेस में तब्दील हो गई। सुंदरलाल पटवा ने उस भाजपा को अर्जुनसिंह कांग्रेस की बी टीम बनाकर यहां केन्द्र विरोधी राजनीति की नींव रखी थी। कैलाश नारायण सारंग, बाबूलाल गौर, जैसे नेताओं को खड़ा करके कांग्रेस ने भाजपा को अपने अनुकूल बनाकर उपयोग किया। आज वह भाजपा कांग्रेस की लूटो और भागो की संस्कृति की वाहक बन गई है। दिग्विजय सिंह ने अपने गुरु अर्जुनसिंह की तरह शतरंज की चाल चलते हुए भाजपा को सत्ता में आने का अवसर देकर सोचा था कि समय आने पर हम इसे पटवा सरकार की तरह गिराकर दुबारा गद्दी संभाल लेंगें।उनका ये दांव वक्त की आंधी में धराशायी हो गया। अपने राजनीतिक जीवनकाल में उन्होंने भाजपा में कई नेता खड़े कर लिए थे जो हमेशा उनके हुकुम के गुलाम बने रहे। कैलाश विजयवर्गीय जैसे नेता तो खुलकर आज भी दिग्विजय सिंह का गुणगान करते नहीं थकते।

    भाजपा की इसी दुहरे मुंह वाली राजनीति देखकर हाईकमान के चिंतक और विचारक बैचेन हो गए हैं। मध्यप्रदेश की धीमी राजनीतिक विकास यात्रा, किसान कर्मण्य अवार्ड जीतकर फर्जी विकास के दावे करने वाली राजनीति की पोल राज्य की बैलेंसशीट बार बार खोल रही है। इसके बावजूद भ्रष्टाचार करके माफिया सरगना बन चुके दंभी नेताओं की धमकियों के सामने हाईकमान कई बार खुद को लाचार पाता रहा है। भाजपा संगठन की कमान युवा नेता विष्णुदत्त शर्मा को सौंपकर भाजपा ने सोचा था कि वे नई पीढ़ी के योग्य युवाओं को आगे लाएंगे पर वे ब्राह्रणवादी राजनीति के मोहपाश में इस कदर उलझे कि राजनीति के परिदृश्य में अलग थलग हो गए।

    भाजपा ने महाकाल लोक का निर्माण करके धर्म की राजनीति को सत्ता का सहायक बनाने का प्रयास किया है पर नरोत्तम मिश्रा दतिया में नवगृह मंदिर बनाकर राजनीति को धर्म का चेला बनाने चल निकले। आखिर कब तक भाजपा हाईकमान इस ब्लैकमेलिंग को बर्दाश्त कर सकता था। अपनी बारी आने पर उसने टिकिट काटकर संदेश देने का प्रयास किया है कि कार्यकर्ता यदि मालिक बनने का प्रयास करेगा तो फिर उसे उसकी भूमिका याद जरूर दिलाई जाएगी। शिवराज सिंह चौहान  की पिलपिली सरकार में मलखंभ पर चढ़कर राजनीति करने वाले नरोत्तम ये भूल गए हैं कि भाजपा आज विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है। उसके सामने चुनौती है कि वह भारत को विश्व की महाशक्ति बनाकर दिखलाए। किसी छुटभैये नेता की जयजयकार कराने के लिए भाजपा का मंच आज सीढ़ी नहीं बन सकता।हाईकमान ने पार्टी संगठन से कई नजरियों से छानबीन कराई और उसके बाद टिकिट काटने का फैसला लिया । जाहिर है कि कार्यकर्ताओं को इस फैसले का सम्मान करना पड़ेगा। आखिर कैप्टन को ये अधिकार तो होना ही चाहिए कि वह किस वक्त पर किस खिलाड़ी को कहां उतारे।

  • विपक्ष की गोद चढ़ी तेल लाबी पर भारी पड़ा स्वदेशी इथेनाल

    विपक्ष की गोद चढ़ी तेल लाबी पर भारी पड़ा स्वदेशी इथेनाल


    देश में ई-20 (20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल) को लेकर पिछले कुछ दिनों से भ्रम और विवाद का वातावरण बना हुआ है। सोशल मीडिया पर ऐसे दावे किए जा रहे हैं कि इससे वाहनों के इंजन खराब हो जाएंगे, माइलेज में भारी गिरावट आएगी और उपभोक्ताओं को नुकसान होगा। इन आशंकाओं के बीच केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यदि कोई यह सिद्ध कर दे कि ई-20 से किसी वाहन का इंजन खराब हुआ है तो सरकार जवाब देने को तैयार है। उन्होंने इसे देश की ऊर्जा सुरक्षा, किसानों की आय और विदेशी मुद्रा बचत से जुड़ा राष्ट्रीय कार्यक्रम बताया है।

    वास्तव में ई-20 केवल ईंधन परिवर्तन का कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह भारत की आर्थिक, कृषि और ऊर्जा नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। भारत अपनी पेट्रोलियम आवश्यकताओं का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। इस आयात पर हर वर्ष लाखों करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा खर्च होती है। ऐसे में यदि पेट्रोल में घरेलू स्तर पर उत्पादित इथेनॉल मिलाया जाता है तो आयातित पेट्रोल की आवश्यकता घटती है और विदेशी मुद्रा की बड़ी बचत होती है। केंद्र सरकार का अनुमान है कि इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम से देश को प्रतिवर्ष लगभग दो लाख करोड़ रुपये तक की बचत का दीर्घकालिक लाभ मिल सकता है।
    गडकरी बार-बार कह चुके हैं कि भारत का भविष्य केवल पेट्रोल पर आधारित नहीं रहेगा। उनका जोर—
    इथेनॉल,
    बायो-सीएनजी,
    हरित हाइड्रोजन,
    इलेक्ट्रिक वाहन,
    फ्लेक्स-फ्यूल इंजन,
    और जैव ऊर्जा
    पर है।
    वर्ष 2014 में भारत में पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण केवल लगभग 1.5 प्रतिशत था । लगातार नीति सुधार, चीनी मिलों को प्रोत्साहन और जैव ईंधन कार्यक्रम के विस्तार के कारण यह स्तर बढ़ते-बढ़ते वर्ष 2025 में 20 प्रतिशत तक पहुँच गया। यह लक्ष्य मूल रूप से वर्ष 2030 तक प्राप्त किया जाना था, लेकिन भारत ने इसे पाँच वर्ष पहले ही हासिल कर लिया।

    इथेनाल का उत्पादन वर्ष 2014 लगभग अड़तीस करोड़ लीटर होता था। 2025 तक यह बढ़कर 661 करोड़ लीटर से अधिक होने लगा। आज देश भर के लगभग पंद्ह हजार से अधिक पेट्रोल पंपों पर ई-20 पेट्रोल उपलब्ध कराया जाने लगा है।

    ई-20 को लेकर सबसे बड़ा भ्रम यही फैलाया गया कि इससे वाहन खराब हो जाएंगे। सरकार, पेट्रोलियम मंत्रालय और प्रमुख वाहन निर्माता कंपनियों का कहना है कि वर्षों के परीक्षण के बाद ही ई-20 लागू किया गया है। आधुनिक वाहनों को ई-20 के अनुरूप तैयार किया जा चुका है। पुराने वाहनों में भी व्यापक स्तर पर इंजन क्षति का कोई प्रमाण सामने नहीं आया है। हाँ, कुछ पुराने मॉडलों में 3 से 5 प्रतिशत तक माइलेज में कमी आ सकती है, क्योंकि इथेनॉल की ऊर्जा घनत्व पेट्रोल से कुछ कम होती है। लेकिन इसके बदले उच्च ऑक्टेन संख्या, कम प्रदूषण और आयात में कमी जैसे लाभ प्राप्त होते हैं। इससे इंजन की टूटफूट कम होती है और निकलने वाला धुआं कम विषैला होता है। विदेशी मुद्रा में बचत तो सबसे बड़ा लाभ है ही।

    इथेनॉल कार्यक्रम का सबसे बड़ा लाभ किसानों को मिला है। पहले चीनी मिलों में अधिशेष चीनी का संकट बना रहता था। अब गन्ने के रस, बी-हैवी शीरे तथा अन्य कृषि उत्पादों से इथेनॉल बनने लगा है। इससे चीनी मिलों की आय बढ़ी और किसानों के बकाया भुगतान में भी सुधार आया। भविष्य में मक्का तथा अन्य अनाज आधारित इथेनॉल उत्पादन बढ़ने से फसल विविधीकरण को भी प्रोत्साहन मिलेगा।

    भारत में पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता एक दिन में नहीं बढ़ी। कई दशकों तक ऊर्जा सुरक्षा की बजाय आयात-आधारित व्यवस्था पर अधिक भरोसा किया गया। पेट्रोलियम विपणन, रिफाइनिंग और वितरण के विस्तार के साथ देश में ईंधन उपभोग तेजी से बढ़ा, जबकि वैकल्पिक जैव ईंधनों के विकास पर अपेक्षित गति से काम नहीं हुआ। परिणामस्वरूप पेट्रोलियम आयात का बोझ लगातार बढ़ता गया और अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर देश के बजट और चालू खाते पर पड़ता रहा।बढ़ती गाड़ियों की संख्या की वजह से ये खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है। वर्तमान सरकार ने इसी निर्भरता को कम करने के लिए इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम को प्राथमिकता दी है।

    इथेनॉल एक नवीकरणीय जैव ईंधन है। इसके उपयोग से कार्बन उत्सर्जन में कमी आती है तथा पेट्रोल की तुलना में यह अधिक स्वच्छ ईंधन माना जाता है। भारत ने वर्ष 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य निर्धारित किया है। ई-20 उस दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

    ई-20 पर विवाद का एक कारण यह भी है कि देश में करोड़ों पुराने वाहन अभी भी चल रहे हैं। कुछ उपभोक्ताओं ने माइलेज में कमी की शिकायत की है। वहीं सोशल मीडिया पर अपुष्ट वीडियो और संदेशों ने आशंकाओं को बढ़ाया। हाल के दिनों में सरकार को औपचारिक स्पष्टीकरण जारी करना पड़ा कि ई-20 नीति वर्षों के परीक्षण के बाद लागू की गई है और इसे लेकर फैलाई जा रही अनेक बातें तथ्यात्मक नहीं हैं।

    भारत ऊर्जा आयात पर निर्भर देश है। यदि घरेलू स्तर पर उत्पादित इथेनॉल से विदेशी मुद्रा की बचत होती है, किसानों को नया बाजार मिलता है, प्रदूषण घटता है और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होती है, तो यह केवल ईंधन नीति नहीं बल्कि आर्थिक आत्मनिर्भरता की रणनीति भी है। स्वाभाविक है कि इतने बड़े परिवर्तन के साथ तकनीकी प्रश्न और उपभोक्ताओं की शंकाएँ भी सामने आएँगी। सरकार की जिम्मेदारी है कि वह पारदर्शी वैज्ञानिक जानकारी उपलब्ध कराए और जहाँ आवश्यक हो वहाँ पुराने वाहनों के लिए व्यावहारिक समाधान भी दे।

    ई-20 पर बहस होनी चाहिए, लेकिन उसका आधार वैज्ञानिक तथ्य और प्रमाण हों, अफवाहें नहीं। यदि भारत को आयातित तेल पर निर्भरता कम करनी है और विदेशी मुद्रा की बचत के साथ किसानों की आय बढ़ानी है, तो इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम आने वाले वर्षों में देश की ऊर्जा नीति का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ बन सकता है।

  • भाजपा के सफल विकासवाद का उद्घोष करता नर्मदा समझौता

    भाजपा के सफल विकासवाद का उद्घोष करता नर्मदा समझौता

    मुख्यमंत्री डाक्टर मोहन यादव के नेतृत्व में भाजपा सरकार ने मध्यप्रदेश के स्वर्णिम आकाश में एक जबर्दस्त छलांग लगाकर दिखाई है। विकास की अवधारणा को लेकर दशकों तक शोर मचाते आंदोलनकारी आज भी समझने को राजी नहीं हैं कि विकास की बयार किसी भी जड़ता से मीलों आगे निकल जाती है। यही नहीं देश के बड़े अखबारों के माध्यम से इन बुद्धिजीवियों ने एक बार फिर भ्रम फैलाने का खटराग शुरु कर दिया है। जबकि पूंजी को चलायमान करने वाली भाजपा की विचारधारा ने इस समझौते के माध्यम से ये संदेश देने का प्रयास किया है कि विकास की धारा को किसी कीमत पर थमने नहीं दिया जाएगा। वास्तव में नर्मदा घाटी परियोजना स्वतंत्र भारत की सबसे बड़ी बहुउद्देशीय नदी परियोजनाओं में गिनी जाती है। सरदार सरोवर परियोजना से जुड़े वित्तीय दायित्वों, डूब क्षेत्र, पुनर्वास और मुआवजे को लेकर मध्यप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के बीच वर्षों से विवाद चलता रहा। जुलाई 2026 में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की उपस्थिति में चारों राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने लंबित वित्तीय दावों और नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण (NWDT) के पुरस्कार से जुड़े मुद्दों के समाधान के लिए एक ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते पर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने भी हस्ताक्षर किए। केंद्र सरकार के अनुसार इसका उद्देश्य दशकों से लंबित भुगतान, लागत साझेदारी तथा पुनर्वास संबंधी विवादों का स्थायी समाधान करना रहा है।

    मध्यप्रदेश के दृष्टिकोण से देखें तो इस समझौते का सबसे बड़ा लाभ यह है कि लंबे समय से अटके वित्तीय दावे और भुगतान का रास्ता साफ हुआ है। पिछले कुछ वर्षों से मध्यप्रदेश सरकार का दावा रहा था कि सरदार सरोवर परियोजना के कारण राज्य की बड़ी मात्रा में राजस्व भूमि, वन भूमि तथा अन्य सरकारी संपत्तियाँ डूब क्षेत्र में चली गईं, जिनका समुचित प्रतिपूर्ति मूल्य अभी तक प्राप्त नहीं हुआ था। इस विवाद के कारण हजारों करोड़ रुपये की राशि वर्षों से लंबित थी। समझौते के बाद एकमुश्त समाधान (One-Time Settlement) की दिशा में सहमति बनने से मध्यप्रदेश की वित्तीय स्थिति को लाभ मिलने की संभावना है। डैमिंग द नर्मदा किताब लिखने वाले नर्मदा आंदोलनकारी रमेश बिल्लौरे जब गांव गांव जाकर बांध के विरोध में अलख जगाने की कोशिश कर रहे थे तब भी बांध प्रभावित बांध के विरोध में नहीं थे। उनका डर था कि उनकी संपत्तियों का मुआवजा मिलेगा भी या नहीं। तब कांग्रेस की डिफाल्टर सरकारें हुआ करती थीं और किसी को ये विश्वास नहीं था कि सरकार मुआवजा कैसे दे पाएगी।

    इस बहुपक्षीय समझौते से प्रभावित हितधारकों की सूची बहुत बड़ी है। सबसे पहले प्रभावित होंगे वे हजारों परिवार जो नर्मदा घाटी में विस्थापित हुए। यदि समझौते के अनुरूप लंबित भुगतान और पुनर्वास संबंधी दायित्वों का समयबद्ध क्रियान्वयन होता रहेगा, तो उन्हें वर्षों से लंबित राहत मिल सकती है। दूसरा बड़ा वर्ग मध्यप्रदेश सरकार का है, जिसे लंबित वित्तीय दावों के समाधान से राजकोषीय राहत मिलेगी। तीसरा लाभार्थी कृषि और सिंचाई क्षेत्र है, क्योंकि अंतरराज्यीय विवाद समाप्त होने से परियोजना के संचालन और भविष्य के जल प्रबंधन में अधिक स्थिरता आएगी। चौथा लाभ उद्योग और ऊर्जा क्षेत्र को होगा, क्योंकि परियोजना से जुड़ी बिजली उत्पादन और जल प्रबंधन योजनाओं में समन्वय बढ़ेगा।

    पुनर्वास और मुआवजे का प्रश्न नर्मदा परियोजना का सबसे संवेदनशील पक्ष रहा है। नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण ने विस्थापित परिवारों के पुनर्वास के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश दिए थे। बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने भी विभिन्न मामलों में यह स्पष्ट किया कि पुनर्वास परियोजना का अभिन्न हिस्सा है और इसके बिना निर्माण कार्य आगे नहीं बढ़ सकता। समय के साथ भूमि के बदले भूमि, नकद मुआवजा, आवासीय भूखंड, आधारभूत सुविधाएँ तथा पुनर्वास स्थलों का विकास जैसी व्यवस्थाएँ लागू की गईं। हालिया समझौते का उद्देश्य इन्हीं लंबित वित्तीय दायित्वों और भुगतान संबंधी विवादों का अंतिम निपटारा करना है, जिससे प्रभावित परिवारों और राज्यों के बीच शेष विवाद समाप्त हो सकें।

    नर्मदा आंदोलन का नेतृत्व करने वालों का कहना था कि बिना पर्याप्त पुनर्वास के बड़े बांध का निर्माण मानवाधिकारों का उल्लंघन होगा। उनके प्रयासों के कारण पुनर्वास नीति पर राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर बहस हुई और सरकारों को पुनर्वास मानकों में कई बार सुधार करना पड़ा।इससे जहां प्रभावितों को मुआवजा मिलना सुनिश्चित हुआ वहीं परियोजना में विलंब से देश को एक मंहगी कीमत भी चुकानी पड़ी। बांध विरोध की लड़ाई यदि परियोजना स्थापना के वक्त लड़ी गई होती तो परियोजना का रूप कुछ और हो सकता था। बाद के वर्षों में खड़ा किया गया जन असंतोष विकास के मार्ग में बड़ा अवरोध बन गया। विकास के कथित गांधीवादी मॉडल की आड़ लेकर विकास विरोधियों ने प्रदेश और देश की तरुणाई को गुमराह किया जो आज भी एक चुनौती बना हुआ है।

    सरकारों तथा परियोजना समर्थकों का मत रहा कि लगातार न्यायालयी लड़ाइयों, धरना-प्रदर्शनों और पर्यावरणीय आपत्तियों के कारण परियोजना वर्षों तक विलंबित हुई, जिससे सिंचाई, पेयजल और विद्युत उत्पादन के अपेक्षित लाभ देर से मिले तथा लागत में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय पर परियोजना को आगे बढ़ाने की अनुमति दी, साथ ही पुनर्वास संबंधी शर्तों के पालन पर भी बल दिया। इसलिए यह कहना अधिक संतुलित होगा कि आंदोलन ने परियोजना को पूरी तरह रोक नहीं दिया, बल्कि उसके क्रियान्वयन की गति और पुनर्वास नीति—दोनों को प्रभावित किया।

    मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की भूमिका इस समझौते में राजनीतिक और प्रशासनिक—दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण रही। उन्होंने मध्यप्रदेश की ओर से समझौते पर हस्ताक्षर कर यह संकेत दिया कि राज्य अब दशकों पुराने विवादों को समाप्त कर विकास परियोजनाओं को गति देना चाहता है। राज्य सरकार लगातार यह तर्क देती रही है कि नर्मदा परियोजना से सिंचाई, पेयजल और बिजली उत्पादन के व्यापक लाभ प्राप्त हुए हैं तथा शेष वित्तीय विवादों का समाधान विकास की गति बढ़ाएगा। समझौते में उनकी भागीदारी इस राजनीतिक प्रतिबद्धता का संकेत मानी जा रही है।
    राज्य के मुख्य सचिव अनुराग जैन ने राज्य के वित्तीय सुधारों को लागू करते हुए प्रशासनिक दक्षता का युक्तियुक्त समाधान प्रस्तुत किया। नर्मदा घाटी विकास विभाग को वे तमाम अनुमतियां दी गईं जिनसे राज्यों के बीच ये समझौता आकार ले सका। ऐसे अंतरराज्यीय समझौतों में वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों का कार्य राज्यों के दावों का परीक्षण, वित्तीय देयताओं का मिलान, कानूनी बिंदुओं का समन्वय तथा अंतिम मसौदे की तैयारी करना होता है। उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी से यह स्पष्ट है कि मध्यप्रदेश के अधिकारियों ने गुजरात तथा अन्य राज्यों के अधिकारियों के साथ लंबे समय तक तकनीकी और वित्तीय स्तर पर बातचीत की, जिसके बाद राजनीतिक स्तर पर अंतिम समझौता संभव हो सका। हालांकि सार्वजनिक स्रोतों में प्रत्येक वार्ता चरण में व्यक्तिगत अधिकारियों की विस्तृत भूमिका का आधिकारिक विवरण उपलब्ध नहीं है।

    समग्र रूप से देखें तो यह समझौता केवल वित्तीय विवाद का समाधान नहीं है, बल्कि सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) का एक महत्वपूर्ण उदाहरण भी है। यदि लंबित भुगतान वास्तव में समय पर हो जाते हैं, पुनर्वास के शेष मामलों का न्यायसंगत निपटारा होता है और परियोजना से जुड़े सभी राज्यों के बीच समन्वय बना रहता है, तो मध्यप्रदेश को वित्तीय, कृषि, ऊर्जा तथा जल प्रबंधन—चारों क्षेत्रों में दीर्घकालिक लाभ मिल सकते हैं। वहीं यह भी उतना ही आवश्यक होगा कि विकास के साथ विस्थापित परिवारों के अधिकारों की अनदेखी न हो। किसी भी बड़ी नदी परियोजना की सफलता केवल बांध बनने से नहीं, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि उससे प्रभावित अंतिम व्यक्ति को भी न्याय मिला या नहीं। यही इस ऐतिहासिक समझौते की वास्तविक कसौटी होगी।नर्मदा समग्र के सूत्रधार अनिल माधव दवे के प्रयासों को इस समझौते ने सच्ची श्रद्धांजलि दी है जिन्होंने नर्मदा और इस जैसी माता समान नदियों के विकास को लेकर पूरी अवधारणा प्रस्तुत की थी।