Month: July 2026

  • किसानों में आशा जगाई तो फिर खरीदो मूंग

    किसानों में आशा जगाई तो फिर खरीदो मूंग

    होशंगाबाद और राज्य के कई अन्य स्थानों से आए कथित किसानों ने आज दिन भर भोपाल की सड़कों पर तांडव मचाया। यातायात व्यवस्था गड़बड़ा गई। स्कूलों की छुट्टी कर दी गई। सरकार के मंत्रियों से लेकर आला अफसरों तक सभी तनावग्रस्त रहे। दिल्ली में काकरोच जनता पार्टी के धरने से बचाव की मुद्रा में आई भाजपा के लिए ये मुद्दा नया तनाव का कारण बन गया। काकरोच जनता पार्टी के कुछ लड़के भी इस आंदोलन में शामिल हो गए और उन्होंने भाजपा सरकार को घेरने का प्रयास किया। आंदोलन को सफल बनाने के लिए किसानों ने केन्द्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के घर का घेराव करके सरकार को ज्ञापन दिया। मुख्यमंत्री डाक्टर मोहन यादव राजधानी में नहीं थे इसलिए सरकार ने किसानों के प्रतिनिधियों को मंत्रालय बुलाया और उनकी समस्याओं पर चर्चा की।

    दरअसल इस समस्या की वजह वाहवाही लूटने में सिद्धहस्त शिवराज सिंह चौहान सरकार रही है। उनके तत्कालीन कृषि मंत्री कमल पटेल ने गर्मियों में खाली पड़े खेतों में मूंग की साठ दिनों में पकने वाली फसलों की बुआई की प्रेरणा देकर कृषि उत्पादन बढ़ाने का प्रयास किया था। किसानों की वाहवाही लूटने के लिए शिवराज सिंह ने किसानों की मूंग समर्थन मूल्य पर खरीदने और बोनस देने की घोषणा भी की थी। कुछ समय तो ये खरीदी होती रही लेकिन बाद में सरकार एक  नई समस्या में घिर गई। शिवराज सिंह सरकार ने जिस तरह कर्ज लेकर नई नई योजनाएं चालू कीं उससे उनकी सरकार को वाहवाही तो खूब मिली पर कर्ज के पहाड़ ने सरकार की कमर तोड़ दी। मूंग खरीदना सरकार के लिए सिरदर्द बन गया। एक ओर तो वह रबी की फसलों का गेहूं और चना खरीदकर पहले ही कर्ज के जाल में फंसी हुई थी। मूंग खरीदी ने उसे कर्ज के दलदल में गहरे तक पहुंचा दिया। सबसे बड़ी बात तो ये कि मूंग के खरीददार ही नहीं थे। घरों में अरहर की दाल खाई जाती है जबकि मूंग की खपत लगभग न के बराबर होती है। सरकार ने इसे अपनी राशन की दुकानों से भी आम लोगों को उपलब्ध कराना शुरु कर दिया इसके बावजूद उसे लेवाल नहीं मिले। गोदामों सड़ रही मूंग को सुरक्षित रखने के लिए सरकार को आज भी गोदामों पर भारी रकम खर्च करनी पड़ रही है। हालत ये हो गई है कि सरकार पर गोदामों का किराया बढ़ता जा रहा है और वह उसे चुकाने में भी अक्षम है।

    न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर मूंग खरीदी और अन्य मांगों को लेकर किए जा रहे किसान आंदोलन को लेकर सरकार ने चार मंत्रियों की एक उच्च स्तरीय समिति गठित की है। खुद मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि उनकी सरकार किसानों के हितों की रक्षा करने के लिए संकल्पबद्ध है। इसके बावजूद किसानों की मांगों का निराकरण आनन फानन में किया जाना संभव नहीं है। किसान कह रहे हैं कि सरकार गर्मियों मे उत्पादित शत प्रतिशत मूंग खरीदे। एक चौथाई माल खरीदने का फार्मूला उन्हें मंजूर नहीं है। खरीदी के लिए किसान की बायोमेट्रिक जांच की अनिवार्यता भी समाप्त की जाए। खाद वितरण की ई टोकन वाली व्यवस्था बंद की जाए। हर मौसम में दस घंटे बिजली दी जाए। किसानों की इन मांगों को लेकर कृषि मंत्री एदल सिंह कंसाना ने केन्द्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान को पत्र लिखकर मूंग खरीदी का लक्ष्य 4.54 लाख टन से बढ़ाकर 8.06 लाख टन करने का अनुरोध किया है। राज्य सरकार की ओर से गठित मंत्रियों की समिति में शामिल कृषि मंत्री एदल सिंह कंसाना, सहकारिता मंत्री विश्वास सारंग, पी डब्ल्यूडी मंत्री राकेश सिंह, और कृष्णा गौर लगातार किसान प्रतिनिधियों से चर्चा कर रहे हैं पर अभी तक कोई फार्मूला नहीं निकल पाया है। किसानों की इस खरीदी के लिए सरकार को खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग के माध्यम से कर्ज लेना पड़ेगा ।खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री गोविंद राजपूत किसानों का सामना करने के लिए तैयार नहीं हैं। इसकी वजह ये है कि उनके कार्यकाल में किसानों को फसल खरीदी ,खाद बीज वितरण और तमाम व्यवस्थाओं को लेकर चुनौतियों का सामना करना पड़ा है।कृषि मंत्री एदल सिंह कंसाना और खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री गोविंद राजपूत दोनों कांग्रेस से भाजपा में आए थे और अभी तक राज्य के किसानों से संवाद स्थापित नहीं कर पाए हैं।  मध्य प्रदेश राज्य नागरिक आपूर्ति निगम (NAN) पर पहले से ही लगभग 62,944.71 करोड़ (करीब 63,000 करोड़ रुपये) का भारी-भरकम बैंक कर्ज है। विधानसभा में दी गई जानकारी के अनुसार इस कर्ज पर सरकार को प्रतिदिन करोड़ों रुपये का ब्याज भी चुकाना पड़ रहा है।  हाल ही में सामने आई CAG (नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक) की रिपोर्ट के अनुसार, खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग से जुड़े करीब 2,181 करोड़ के उपयोगिता प्रमाण-पत्र (Utilization Certificates) भी लंबित/बकाया हैं। ऐसे में सरकार को नया कर्ज मिलना एक बड़ी चुनौती है। राज्य पर पहले से ही लगभग पांच लाख करोड़ रुपओं का भारी भरकम कर्ज है और उसे हर महीने अपने कर्मचारियों के वेतन भुगतान पर भी कर्ज लेना पड़ रहा है। यही वजह है कि किसान आंदोलन के चलते सरकार को अपने वादे पूरे करने और प्रशासनिक आय व्यय को संतुलित करने की नई चुनौती सामने आ गई है।

    यह आंदोलन केवल फसल बेचने का विवाद नहीं है। इसके पीछे किसानों की आय, सरकारी खरीद व्यवस्था, कृषि विपणन, वित्तीय अनुशासन और राजनीतिक विश्वास जैसे कई प्रश्न जुड़े हुए हैं। दूसरी ओर सरकार भी यह तर्क दे रही है कि खरीद प्रक्रिया नियमों के अनुसार संचालित होती है, संसाधनों की सीमाएं हैं और समाधान के लिए केंद्र सरकार से भी समन्वय आवश्यक है। ऐसे में यह विवाद किसान और सरकार के बीच संवाद तथा भरोसे की परीक्षा बन गया है।

    मध्यप्रदेश देश के प्रमुख दलहन उत्पादक राज्यों में शामिल है। राज्य के अनेक जिलों में किसानों ने इस वर्ष बड़े पैमाने पर मूंग की खेती की। किसानों को विश्वास था कि न्यूनतम समर्थन मूल्य पर पर्याप्त खरीदी होगी और उन्हें अपनी उपज का उचित मूल्य मिलेगा। लेकिन खरीद की मात्रा, पंजीकरण, स्लॉट, गुणवत्ता परीक्षण तथा सीमित खरीद जैसे मुद्दों को लेकर असंतोष बढ़ता गया। किसानों का कहना है कि यदि सरकार घोषित समर्थन मूल्य पर पूरी खरीद नहीं करेगी तो उन्हें खुले बाजार में कम कीमत पर उपज बेचनी पड़ेगी, जिससे उनकी लागत भी नहीं निकल पाएगी।

    इसी असंतोष ने धीरे-धीरे आंदोलन का रूप ले लिया। विभिन्न किसान संगठनों ने प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों से भोपाल कूच किया। राजधानी में प्रदर्शन, धरना और मुख्यमंत्री निवास की ओर मार्च की कोशिश ने पूरे घटनाक्रम को राजनीतिक महत्व दे दिया। प्रशासन ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए बैरिकेडिंग, पुलिस बल और यातायात प्रतिबंधों का सहारा लिया। इससे एक ओर आम नागरिकों को असुविधा हुई तो दूसरी ओर आंदोलन को व्यापक मीडिया कवरेज मिला।

    सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल आंदोलन को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि किसानों के विश्वास को बनाए रखना है। पिछले कुछ वर्षों में मध्यप्रदेश सरकार ने कृषि क्षेत्र में अनेक योजनाओं का विस्तार किया है। सिंचाई, फसल बीमा, कृषि यंत्रीकरण, प्राकृतिक खेती और समर्थन मूल्य पर खरीदी जैसे विषयों पर सरकार लगातार अपनी उपलब्धियां गिनाती रही है। ऐसे में यदि मूंग उत्पादक किसान ही असंतुष्ट दिखाई देते हैं तो विपक्ष को सरकार पर हमला करने का अवसर मिलना स्वाभाविक है।

    इस पूरे विवाद का एक प्रशासनिक पक्ष भी है। समर्थन मूल्य पर खरीद केवल राज्य सरकार का विषय नहीं है। कई मामलों में केंद्र सरकार की नीतियां, खरीद की स्वीकृत मात्रा, भंडारण क्षमता, बजटीय प्रावधान और विपणन संस्थाओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। इसलिए समाधान के लिए राज्य और केंद्र के बीच समन्वय आवश्यक होता है। यदि खरीद लक्ष्य सीमित है तो किसानों को उसकी जानकारी समय पर मिलनी चाहिए और यदि लक्ष्य बढ़ाने की आवश्यकता है तो उसके लिए शीघ्र निर्णय होना चाहिए।

    आर्थिक दृष्टि से भी यह मुद्दा अत्यंत संवेदनशील है। किसान अपनी उपज बेचकर ही अगली फसल की तैयारी करता है। यदि भुगतान में देरी हो या समर्थन मूल्य पर बिक्री न हो सके तो उसके सामने बीज, उर्वरक, सिंचाई और श्रम की व्यवस्था करना कठिन हो जाता है। नकदी की कमी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित करती है। इसलिए मूंग खरीदी का प्रश्न केवल एक फसल तक सीमित नहीं है, बल्कि आने वाले कृषि चक्र पर भी उसका प्रभाव पड़ सकता है।

    हालांकि सरकार का पक्ष भी पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। राज्य सरकार का कहना है कि वह किसान प्रतिनिधियों से लगातार चर्चा कर रही है, अधिकारियों को आवश्यक निर्देश दिए गए हैं और केंद्र सरकार से भी खरीद की सीमा बढ़ाने का आग्रह किया गया है। सरकार का दावा है कि उसका उद्देश्य किसानों को अधिकतम राहत देना है, लेकिन प्रशासनिक और वित्तीय प्रक्रियाओं का पालन भी आवश्यक है। यदि यह दावा व्यवहार में प्रभावी ढंग से दिखाई देता है तो आंदोलन की तीव्रता स्वतः कम हो सकती है।

    यह भी ध्यान रखना होगा कि कृषि बाजार केवल सरकारी खरीद पर निर्भर नहीं रह सकता। दीर्घकाल में दलहन प्रसंस्करण उद्योग, निर्यात, भंडारण, किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) और निजी बाजार की प्रतिस्पर्धा को मजबूत किए बिना ऐसी समस्याएं बार-बार सामने आती रहेंगी। यदि किसानों को सरकारी खरीद के अतिरिक्त मजबूत बाजार विकल्प मिलें तो समर्थन मूल्य पर दबाव भी कम होगा और आय के नए अवसर भी बनेंगे।

    अंततः मूंग खरीदी का यह विवाद केवल एक मौसमी आंदोलन नहीं है। यह मध्यप्रदेश की कृषि व्यवस्था, सरकारी खरीद प्रणाली और किसानों के भरोसे की कसौटी बन गया है। सरकार के लिए यह अवसर भी है कि वह प्रभावी संवाद, पारदर्शी खरीद व्यवस्था और त्वरित निर्णय क्षमता का परिचय देकर किसानों का विश्वास और मजबूत करे। दूसरी ओर किसान संगठनों के लिए भी यह आवश्यक है कि वे अपनी मांगों को तथ्यपरक और रचनात्मक संवाद के माध्यम से आगे बढ़ाएं।

    यदि इस पूरे घटनाक्रम से कोई सबसे बड़ा संदेश निकलता है तो वह यही है कि कृषि केवल उत्पादन का विषय नहीं है, बल्कि विश्वास का भी विषय है। जब किसान को अपनी उपज का उचित मूल्य समय पर मिलता है, तभी सरकार की कृषि नीति सफल मानी जाती है। इसलिए मूंग खरीदी पर उत्पन्न यह विवाद जितनी जल्दी संवाद और सहमति से सुलझेगा, उतना ही प्रदेश की कृषि अर्थव्यवस्था और राजनीतिक स्थिरता के लिए बेहतर होगा।

  • भारत में विष घोलने में जुटे दुनिया के बड़े सूदखोर

    भारत में विष घोलने में जुटे दुनिया के बड़े सूदखोर

    भारत पिछले एक दशक में दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल रहा है। डिजिटल भुगतान, आधार आधारित सेवा वितरण, जीएसटी, दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी), प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, विनिर्माण को बढ़ावा देने वाली योजनाएँ, बुनियादी ढाँचे में निवेश और रक्षा उत्पादन जैसे क्षेत्रों में हुए परिवर्तन को सरकार अपनी आर्थिक उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत करती है। दूसरी ओर, इन नीतियों और अन्य सरकारी निर्णयों का विभिन्न राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों, किसान समूहों, छात्र संगठनों और नागरिक मंचों पर विरोध भी किया गया है।यहीं से एक महत्वपूर्ण प्रश्न जन्म लेता है—क्या ये विरोध केवल लोकतांत्रिक असहमति हैं, या इनका व्यापक आर्थिक प्रभाव भी पड़ता है? इस प्रश्न का उत्तर सरल नहीं है और इसे तथ्यों के आधार पर समझना आवश्यक है।

    इतिहास बताता है कि बड़े आर्थिक सुधार लगभग हर लोकतंत्र में विवाद का विषय बने हैं। भारत में भी जीएसटी, कृषि कानून, श्रम सुधार, निजीकरण, भूमि अधिग्रहण, भर्ती परीक्षाओं की व्यवस्था, पर्यावरणीय स्वीकृतियाँ तथा शिक्षा संबंधी निर्णयों पर समय-समय पर व्यापक विरोध हुए हैं। इन आंदोलनों के पीछे अलग-अलग कारण रहे हैं—कहीं आजीविका की चिंता, कहीं प्रक्रियागत पारदर्शिता की मांग, तो कहीं राजनीतिक मतभेद।

    साथ ही यह भी सत्य है कि लंबे समय तक चलने वाले आंदोलन, अनिश्चितता और राजनीतिक टकराव का आर्थिक गतिविधियों पर प्रभाव पड़ सकता है। उद्योग जगत प्रायः नीति की स्थिरता, कानून-व्यवस्था और पूर्वानुमेय वातावरण को निवेश के लिए महत्वपूर्ण मानता है। जब किसी बड़े सुधार के विरुद्ध लंबा गतिरोध पैदा होता है, तो परियोजनाओं में विलंब, निवेश संबंधी निर्णयों में सावधानी और बाज़ार में अनिश्चितता देखी जा सकती है। इसका अर्थ यह नहीं कि हर विरोध विकास-विरोधी होता है, बल्कि यह कि लंबे समय तक बनी अनिश्चितता आर्थिक लागत उत्पन्न कर सकती है।

    इसी संदर्भ में कुछ राजनीतिक विश्लेषक यह तर्क देते हैं कि भारत के तेज़ आर्थिक उभार से वैश्विक शक्ति-संतुलन प्रभावित हो रहा है। उनका कहना है कि विश्व अर्थव्यवस्था में प्रतिस्पर्धा केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहती; तकनीक, पूँजी, आपूर्ति शृंखलाएँ, मुद्रा, ऊर्जा और भू-राजनीतिक प्रभाव भी इसमें शामिल होते हैं। इसलिए बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक है।

    ऐसा पहली बार हुआ है कि अमेरिका जैसा विकसित देश खुलेआम भारत को चुनौतियां देता नजर आ रहा है। अब तक उसके नेता लुक छुपकर अपनी बातें कहते रहे हैं,ऐसा पहली बार हुआ है जब अमेरिका ने भारतीय युवाओं को अपने देश से खदेड़ना शुरु किया। दरअसल अप्रवासी भारतीय मोदी सरकार के लिए एक कमजोर कड़ी साबित हो रहे हैं। भारत सरकार खुलकर अमेरिका का विरोध नहीं कर पा रही है जबकि वह ईरान में भारतीय निवेश वाले बंदरगाह पर बम बरसाकर दादागिरी करता जा रहा है।भारत ने जिस तरह एशिया के आर्थिक एकीकरण की पहल की है उससे दुनिया की  स्थापित अर्थव्यवस्थाएं घबरा गईं हैं। उन्हें लगता है कि भारत ,चीन, रूस और ईरान जैसे देश यदि मिलकर आगे बढ़ने लगेंगे तो डालर की सत्ता धराशायी हो जाएगी। पहली बार दुनिया में जिस तरह सीआईए के शोषणकारी नेटवर्क के विरुद्ध दुनिया के देश लामबंद हो रहे हैं उससे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बौखला गए हैं। उनके नेतृत्व वाली सरकार जिस तरह खुलेआम गुंडागर्दी कर रही है उसे देखकर स्वयं अमेरिका के बुद्धिजीवी भी बेचैन हो गए हैं और अपनी ही सरकार को ट्रोल कर रहे हैं।

    वैश्विक वित्तीय संस्थाएँ, निवेशक, रेटिंग एजेंसियाँ और बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ किसी भी बड़े देश की आर्थिक नीतियों पर नज़र रखती हैं। ब्याज दरों, पूँजी प्रवाह, विदेशी निवेश, मुद्रा विनिमय दर और ऋण बाज़ार के माध्यम से वैश्विक वित्त का प्रभाव सभी उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ता है। इसी प्रकार अंतरराष्ट्रीय मीडिया, थिंक टैंक और निवेशक भी किसी देश की राजनीतिक स्थिरता और नीतिगत वातावरण का विश्लेषण करते हैं। लेकिन यह प्रभाव और किसी घरेलू आंदोलन को नियंत्रित करने का दावा दो अलग-अलग बातें हैं।

    भारत में विरोध प्रदर्शनों की राजनीति को समझने के लिए घरेलू कारकों की भी उपेक्षा नहीं की जा सकती। विपक्ष का दायित्व सरकार की आलोचना करना है, जबकि सरकार का दायित्व अपने निर्णयों का औचित्य सिद्ध करना और जनता का विश्वास बनाए रखना है। लोकतंत्र में यह स्वाभाविक प्रक्रिया है। किंतु जब किसी भी पक्ष द्वारा अपुष्ट सूचनाएँ, भ्रामक प्रचार या भावनात्मक ध्रुवीकरण का सहारा लिया जाता है, तब सामाजिक विश्वास और आर्थिक वातावरण दोनों प्रभावित हो सकते हैं।

    आर्थिक विकास और लोकतांत्रिक अधिकारों के बीच संतुलन किसी भी आधुनिक राष्ट्र की सबसे बड़ी परीक्षा है। यदि विकास परियोजनाएँ बिना पर्याप्त संवाद के आगे बढ़ेंगी, तो विरोध की संभावना बढ़ेगी। वहीं यदि प्रत्येक बड़े सुधार को केवल राजनीतिक संघर्ष का माध्यम बना दिया जाएगा, तो नीतिगत स्थिरता प्रभावित हो सकती है।

    भारत की दीर्घकालिक आर्थिक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह एक ओर निवेश, नवाचार और औद्योगिक विकास को गति दे, तो दूसरी ओर संस्थागत पारदर्शिता, न्यायसंगत निर्णय-प्रक्रिया और शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक संवाद को भी समान महत्व दे। यही संतुलन देश को स्थायी आर्थिक प्रगति की दिशा में आगे ले जा सकता है।

    इसलिए बहस का वास्तविक प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि हर विरोध राष्ट्रहित में है या राष्ट्रविरोधी। अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या विरोध तथ्यों पर आधारित है, क्या सरकार संवाद के लिए तैयार है, क्या सुधारों की प्रक्रिया पारदर्शी है, और क्या राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच देश की दीर्घकालिक आर्थिक क्षमता को सुरक्षित रखा जा रहा है। फिलहाल जिस तरह सोनम वांगचुक से हुए संवाद के बाद समाधान की राह प्रशस्त हुई है उसे देखकर सरकार की सकारात्मक सोच की पुष्टि हो रही है।

  • नीट माफिया की अड़ीबाजी फेल

    नीट माफिया की अड़ीबाजी फेल

    नीट का प्रश्नपत्र लीक होना देश की परीक्षा व्यवस्था पर एक गंभीर माना जाना चाहिए। करोड़ों विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़ी इस परीक्षा में यदि कहीं भी संगठित अपराध ने सेंध लगाई है तो उसके दोषियों के प्रति कोई नरमी नहीं हो सकती। इस मामले में केंद्र सरकार ने जांच सीबीआई को सौंपी, अनेक राज्यों में छापेमारी हुई, गिरफ्तारियां हुईं, आरोपपत्र दायर हुए और परीक्षा सुरक्षा व्यवस्था में सुधार की प्रक्रिया प्रारंभ की गई। इसके साथ ही लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024 जैसे कठोर कानून को लागू करने की दिशा में भी कदम बढ़ाए गए। इन कार्रवाइयों का उद्देश्य केवल इस प्रकरण का समाधान नहीं, बल्कि वर्षों से पनप रहे परीक्षा माफिया को संदेश देना था कि अब उनके लिए पहले जैसी परिस्थितियां नहीं रहेंगी।

    लेकिन जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, यह मुद्दा केवल परीक्षा की निष्पक्षता का प्रश्न नहीं रहा। वह शीघ्र ही राष्ट्रीय राजनीति का विषय बन गया। संसद से लेकर सड़क तक विरोध प्रदर्शन शुरू हुए। दिल्ली में धरने हुए, संसद मार्ग पर प्रदर्शन हुए और कई स्थानों पर पुलिस तथा प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव भी देखने को मिला। यह लोकतंत्र का स्वाभाविक दृश्य हो सकता है, परंतु प्रश्न यह है कि क्या आंदोलन का पूरा केंद्र विद्यार्थियों का भविष्य था, या उसके साथ-साथ राजनीतिक लाभ-हानि का गणित भी जुड़ गया था? आखिर राजनीतिक दलों के वो कौन लोग थे जो अपने बच्चों (ग्राहकों) को देश की प्रतिष्ठित नौकरियों में प्रवेश करवाने के लिए अड़ीबाजी पर उतर आए ।

    यह स्वीकार करना होगा कि जिन विद्यार्थियों ने वर्षों की मेहनत के बाद परीक्षा दी थी, उनके मन में संदेह पैदा होना स्वाभाविक था। यदि कहीं प्रश्नपत्र लीक हुआ है तो वे निष्पक्ष जांच और पारदर्शी कार्रवाई की अपेक्षा करेंगे। इसलिए छात्रों की चिंता और उनकी आवाज को लोकतांत्रिक अधिकार के रूप में देखा जाना चाहिए। किंतु जब किसी भी आंदोलन में राजनीतिक दल, उनके छात्र संगठन और वैचारिक मंच सक्रिय हो जाते हैं, तब आंदोलन का स्वरूप व्यापक राजनीतिक संघर्ष का रूप भी ले लेता है। नीट विवाद में भी यही हुआ।

    सरकार का पक्ष था कि उपलब्ध जांच और न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत सामग्री यह सिद्ध नहीं करती कि पूरे देश की परीक्षा प्रभावित हुई थी। इसी आधार पर सरकार ने संपूर्ण परीक्षा रद्द करने का विरोध किया। बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने भी उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर पूरे देश में पुनर्परीक्षा का आदेश नहीं दिया। न्यायालय ने यह अवश्य कहा कि जहां अपराध हुआ है वहां दोषियों पर कठोर कार्रवाई होनी चाहिए, किंतु पूरे देश के लाखों ईमानदार अभ्यर्थियों को बिना पर्याप्त आधार के पुनः परीक्षा के लिए बाध्य करना उचित नहीं होगा।

    यहीं से राजनीतिक बहस और तेज हुई। विपक्ष ने इसे सरकार की प्रशासनिक विफलता बताया। सरकार समर्थकों का तर्क था कि पहली बार संगठित परीक्षा माफिया पर राष्ट्रीय स्तर पर इतनी व्यापक कार्रवाई हो रही है, इसलिए जिन नेटवर्कों के हित प्रभावित हुए हैं, वे भी इस विवाद को राजनीतिक रूप देने का प्रयास कर रहे हैं। यह एक राजनीतिक तर्क है, परंतु इसका निर्णायक निष्कर्ष तभी निकाला जा सकता है जब जांच पूरी हो और उसके आधार पर ठोस प्रमाण सामने आएं।

    दिल्ली में हुए प्रदर्शनों के दौरान पुलिस द्वारा बल प्रयोग भी चर्चा का विषय बना। पुलिस का कहना था कि निषेधाज्ञा वाले क्षेत्रों में प्रवेश रोकना और कानून-व्यवस्था बनाए रखना उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी थी। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि उनकी लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति पर अंकुश लगाया गया। लोकतंत्र में दोनों पक्षों की जिम्मेदारियां हैं—प्रशासन की भी और आंदोलनकारियों की भी। यदि प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहे तो बल प्रयोग की आवश्यकता नहीं पड़ती, और यदि प्रतिबंधित क्षेत्रों में टकराव की स्थिति बने तो पुलिस भी निष्क्रिय नहीं रह सकती।

    इस पूरे विवाद का एक और महत्वपूर्ण पक्ष है, जिस पर अपेक्षाकृत कम चर्चा हुई। भारत में प्रतियोगी परीक्षाओं के साथ जुड़े संगठित गिरोह कोई नई घटना नहीं हैं। विभिन्न राज्यों में, अलग-अलग सरकारों के समय, भर्ती परीक्षाओं और प्रवेश परीक्षाओं में पेपर लीक के अनेक मामले सामने आ चुके हैं। इसका अर्थ है कि समस्या किसी एक सरकार तक सीमित नहीं, बल्कि एक लंबे समय से विकसित हुए अपराध तंत्र की है। यदि इस तंत्र को वास्तव में समाप्त करना है तो केवल राजनीतिक आरोपों से नहीं, बल्कि तकनीकी सुरक्षा, संस्थागत सुधार, त्वरित न्याय और कठोर दंड से समाधान निकलेगा।

    नीट विवाद ने यह भी स्पष्ट किया कि परीक्षा प्रणाली पर जनता का विश्वास बनाए रखना सरकार की सर्वोच्च जिम्मेदारी है। जांच की गति तेज हो, मुकदमे समयबद्ध हों, दोषियों को दंड मिले और परीक्षा एजेंसियों में पारदर्शिता बढ़े—यही वह रास्ता है जिससे विद्यार्थियों का भरोसा लौटेगा। दूसरी ओर, विपक्ष की भूमिका भी केवल विरोध तक सीमित न होकर रचनात्मक सुधारों के सुझाव देने की होनी चाहिए।

    इस पूरे घटनाक्रम से सबसे बड़ा सबक यही मिलता है कि परीक्षा व्यवस्था को राजनीतिक संघर्ष का स्थायी मैदान बनाने से सबसे अधिक नुकसान विद्यार्थियों का होता है। परीक्षा माफिया के विरुद्ध कार्रवाई और छात्रों के हित—इन दोनों उद्देश्यों में कोई टकराव नहीं है। टकराव तब पैदा होता है जब राजनीतिक विमर्श तथ्यों की जगह धारणाओं पर आधारित होने लगता है।

    अंततः किसी भी लोकतांत्रिक समाज की कसौटी यही है कि वह अपराधियों को कठोर दंड दे, निर्दोष विद्यार्थियों के हितों की रक्षा करे और संस्थाओं में जनता का विश्वास बनाए रखे। नीट विवाद का वास्तविक निष्कर्ष भी इसी कसौटी पर तय होगा—न कि केवल इस आधार पर कि किसने कितने प्रदर्शन किए या किसने कितने आरोप लगाए।

  • भाजपा की धुलाई का अंदाज समझिए नेताजी

    भाजपा की धुलाई का अंदाज समझिए नेताजी

    भारतीय जनता पार्टी के फैसलों को देखकर आज लोग हतप्रभ हैं। नरोत्तम मिश्रा जैसे दिग्गज की पतंग कटने से भाजपा के कार्यकर्ता और नेता सभी बौखलाए घूम रहे हैं। उन कार्यकर्ताओं की पूरी जमीन दरक गई है जिन्होंने नरोत्तम के लंबी दौड़ का घोड़ा मानकर अपनी पूरी जायदाद दांव पर लगा दी थी। भाजपा की राजनीति को जिन्होंने भी करीब से देखा है उन्होंने नरोत्तम की दबंगई से बैचेनी भी महसूस की है। ब्राह्मण राजनीति का संबल पाकर नरोत्तम सत्ता के जिस सत्रहवें आसमान पर पहुंच गए थे उसे देखकर कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि पार्टी कभी उनका टिकिट काटने का फैसला भी ले सकती है। खुद को केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह का करीबी होने का अहसास भरने वाले नरोत्तम भी इस तरह की कोई उम्मीद नहीं कर रहे थे. उन्होंने अपनी चुनावी तैयारी पूरे आत्म विश्वास से चालू कर दी थी।

    भाजपा बार बार अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को संदेश देने का प्रयास कर रही है कि वे समय की मांग को देखते हुए अपने तौर तरीके बदलें। कांग्रेस के जमाने की राजनीतिक शैली की पूंछ पकड़कर चलने की कुनबे वाली राजनीति छोड़ें पर गमले में उगे हुए नेता ये समझने को राजी नहीं हैं। विधानसभा अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर, पीडब्ल्यूडी मंत्री राकेश सिंह, पंचायत मंत्री प्रहलाद पटेल जैसे नेताओं को मध्यप्रदेश भेजकर भाजपा हाईकमान ने पार्टी की लाईन और लैंथ बदलने की कोशिश की लेकिन वह असफल रही। उमा भारती जैसी कद्दावर नेता को विदा करके संदेश देने का प्रयास किया कि भारत की राजनीतिक जरूरतें कुछ अलग हैं लेकिन कार्यकर्ता पुराना ढर्रा छोड़ने को तैयार नहीं हैं। गोपाल भार्गव , भूपेन्द्र सिंह, जयंत मलैया, हिम्मत कोठारी जैसे दिग्गजों को दर्शक दीर्घा में बिठाकर पार्टी ने अन्य नेताओं को नई राजनीति करने का संदेश दिया पर वे कांग्रेस के दिग्विजय सिंह की दगाबाजी को अपना माडल बनाकर चलने लगे। शिवराज सिंह चौहान को केन्द्र भेजकर पार्टी ने चाहा था मध्यप्रदेश में वह भाजपा को कांग्रेस की छत्रछाया बनकर चलने वाली पिछलग्गू छवि से मुक्त कर पाएगी। इसके बाद भी लगभग पांच लाख करोड़ रुपए डकारकर बैठे नेताओं के मुंह लगा खून उन्हें आदमखोर बनने से नहीं रोक पा रहा है। नरोत्तम के टिकिट कटने के बाद उनके समर्थकों ने जिस तरह भाजपा कार्यालय को बंधक बनाया, शहर के बाजार बंद कराने का प्रयास करके सरकार को ठेंगा दिखाया उससे लगता है कि नरोत्तम अपने पतन की नई इबारत लिख रहे हैं।

    आज भाजपा के सामने चुनौती है कि वह कांग्रेस के छोड़े गए पापों को भी ढोए और वैश्विक परिस्थितियों जन्य मंहगाई से भी जनता को बचाए। ऐसे में वह दंभी नेताओं की स्वयं का घर भरने वाली राजनीति को बर्दाश्त कैसे कर सकती है। जिन नेताओं को उसने घर बिठाया है वे सभी अरबों की जायदाद खड़ी करके किनारे किए जाने के बाद स्वयं को सहानुभूति का पात्र बताने का प्रयास कर रहे हैं। वे अपने स्थान पर अपनी औलादों को राजगद्दी दिलाने का पुरजोर प्रयास भी कर रहे हैं। भाजपा हाईकमान ने कई बार स्पष्ट कर दिया है कि वह कांग्रेस की तरह परिवारवादी पार्टी नहीं है। किसी कार्यकर्ता को केवल इसलिए सत्ता में नहीं उतारा जा सकता कि वह फलां राजनेता का बेटा या बेटी है। इसके बावजूद पार्टी के नेतागण चंद उदाहरणों का हवाला देकर अपनी नई पीढ़ी को अवसर दिए जाने की वकालत कर रहे हैं।

    मध्यप्रदेश भाजपा की प्रयोगशाला रही है। यहीं से भाजपा का संगठन परवान चढ़ा है। इसके बावजूद कुशाभाऊ ठाकरे,राजमाता विजयाराजे सिंधिया, वीरेन्द्र कुमार सखलेचा,प्यारेलाल खंडेलवाल,  कैलाश जोशी,सत्यनारायण जटिया, राघवजी भाई,जैसे अनेकानेक नेताओं ने जो भाजपा खडी की थी वह धीरे धीरे कांग्रेस में तब्दील हो गई। सुंदरलाल पटवा ने उस भाजपा को अर्जुनसिंह कांग्रेस की बी टीम बनाकर यहां केन्द्र विरोधी राजनीति की नींव रखी थी। कैलाश नारायण सारंग, बाबूलाल गौर, जैसे नेताओं को खड़ा करके कांग्रेस ने भाजपा को अपने अनुकूल बनाकर उपयोग किया। आज वह भाजपा कांग्रेस की लूटो और भागो की संस्कृति की वाहक बन गई है। दिग्विजय सिंह ने अपने गुरु अर्जुनसिंह की तरह शतरंज की चाल चलते हुए भाजपा को सत्ता में आने का अवसर देकर सोचा था कि समय आने पर हम इसे पटवा सरकार की तरह गिराकर दुबारा गद्दी संभाल लेंगें।उनका ये दांव वक्त की आंधी में धराशायी हो गया। अपने राजनीतिक जीवनकाल में उन्होंने भाजपा में कई नेता खड़े कर लिए थे जो हमेशा उनके हुकुम के गुलाम बने रहे। कैलाश विजयवर्गीय जैसे नेता तो खुलकर आज भी दिग्विजय सिंह का गुणगान करते नहीं थकते।

    भाजपा की इसी दुहरे मुंह वाली राजनीति देखकर हाईकमान के चिंतक और विचारक बैचेन हो गए हैं। मध्यप्रदेश की धीमी राजनीतिक विकास यात्रा, किसान कर्मण्य अवार्ड जीतकर फर्जी विकास के दावे करने वाली राजनीति की पोल राज्य की बैलेंसशीट बार बार खोल रही है। इसके बावजूद भ्रष्टाचार करके माफिया सरगना बन चुके दंभी नेताओं की धमकियों के सामने हाईकमान कई बार खुद को लाचार पाता रहा है। भाजपा संगठन की कमान युवा नेता विष्णुदत्त शर्मा को सौंपकर भाजपा ने सोचा था कि वे नई पीढ़ी के योग्य युवाओं को आगे लाएंगे पर वे ब्राह्रणवादी राजनीति के मोहपाश में इस कदर उलझे कि राजनीति के परिदृश्य में अलग थलग हो गए।

    भाजपा ने महाकाल लोक का निर्माण करके धर्म की राजनीति को सत्ता का सहायक बनाने का प्रयास किया है पर नरोत्तम मिश्रा दतिया में नवगृह मंदिर बनाकर राजनीति को धर्म का चेला बनाने चल निकले। आखिर कब तक भाजपा हाईकमान इस ब्लैकमेलिंग को बर्दाश्त कर सकता था। अपनी बारी आने पर उसने टिकिट काटकर संदेश देने का प्रयास किया है कि कार्यकर्ता यदि मालिक बनने का प्रयास करेगा तो फिर उसे उसकी भूमिका याद जरूर दिलाई जाएगी। शिवराज सिंह चौहान  की पिलपिली सरकार में मलखंभ पर चढ़कर राजनीति करने वाले नरोत्तम ये भूल गए हैं कि भाजपा आज विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है। उसके सामने चुनौती है कि वह भारत को विश्व की महाशक्ति बनाकर दिखलाए। किसी छुटभैये नेता की जयजयकार कराने के लिए भाजपा का मंच आज सीढ़ी नहीं बन सकता।हाईकमान ने पार्टी संगठन से कई नजरियों से छानबीन कराई और उसके बाद टिकिट काटने का फैसला लिया । जाहिर है कि कार्यकर्ताओं को इस फैसले का सम्मान करना पड़ेगा। आखिर कैप्टन को ये अधिकार तो होना ही चाहिए कि वह किस वक्त पर किस खिलाड़ी को कहां उतारे।

  • विपक्ष की गोद चढ़ी तेल लाबी पर भारी पड़ा स्वदेशी इथेनाल

    विपक्ष की गोद चढ़ी तेल लाबी पर भारी पड़ा स्वदेशी इथेनाल


    देश में ई-20 (20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल) को लेकर पिछले कुछ दिनों से भ्रम और विवाद का वातावरण बना हुआ है। सोशल मीडिया पर ऐसे दावे किए जा रहे हैं कि इससे वाहनों के इंजन खराब हो जाएंगे, माइलेज में भारी गिरावट आएगी और उपभोक्ताओं को नुकसान होगा। इन आशंकाओं के बीच केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यदि कोई यह सिद्ध कर दे कि ई-20 से किसी वाहन का इंजन खराब हुआ है तो सरकार जवाब देने को तैयार है। उन्होंने इसे देश की ऊर्जा सुरक्षा, किसानों की आय और विदेशी मुद्रा बचत से जुड़ा राष्ट्रीय कार्यक्रम बताया है।

    वास्तव में ई-20 केवल ईंधन परिवर्तन का कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह भारत की आर्थिक, कृषि और ऊर्जा नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। भारत अपनी पेट्रोलियम आवश्यकताओं का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। इस आयात पर हर वर्ष लाखों करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा खर्च होती है। ऐसे में यदि पेट्रोल में घरेलू स्तर पर उत्पादित इथेनॉल मिलाया जाता है तो आयातित पेट्रोल की आवश्यकता घटती है और विदेशी मुद्रा की बड़ी बचत होती है। केंद्र सरकार का अनुमान है कि इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम से देश को प्रतिवर्ष लगभग दो लाख करोड़ रुपये तक की बचत का दीर्घकालिक लाभ मिल सकता है।
    गडकरी बार-बार कह चुके हैं कि भारत का भविष्य केवल पेट्रोल पर आधारित नहीं रहेगा। उनका जोर—
    इथेनॉल,
    बायो-सीएनजी,
    हरित हाइड्रोजन,
    इलेक्ट्रिक वाहन,
    फ्लेक्स-फ्यूल इंजन,
    और जैव ऊर्जा
    पर है।
    वर्ष 2014 में भारत में पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण केवल लगभग 1.5 प्रतिशत था । लगातार नीति सुधार, चीनी मिलों को प्रोत्साहन और जैव ईंधन कार्यक्रम के विस्तार के कारण यह स्तर बढ़ते-बढ़ते वर्ष 2025 में 20 प्रतिशत तक पहुँच गया। यह लक्ष्य मूल रूप से वर्ष 2030 तक प्राप्त किया जाना था, लेकिन भारत ने इसे पाँच वर्ष पहले ही हासिल कर लिया।

    इथेनाल का उत्पादन वर्ष 2014 लगभग अड़तीस करोड़ लीटर होता था। 2025 तक यह बढ़कर 661 करोड़ लीटर से अधिक होने लगा। आज देश भर के लगभग पंद्ह हजार से अधिक पेट्रोल पंपों पर ई-20 पेट्रोल उपलब्ध कराया जाने लगा है।

    ई-20 को लेकर सबसे बड़ा भ्रम यही फैलाया गया कि इससे वाहन खराब हो जाएंगे। सरकार, पेट्रोलियम मंत्रालय और प्रमुख वाहन निर्माता कंपनियों का कहना है कि वर्षों के परीक्षण के बाद ही ई-20 लागू किया गया है। आधुनिक वाहनों को ई-20 के अनुरूप तैयार किया जा चुका है। पुराने वाहनों में भी व्यापक स्तर पर इंजन क्षति का कोई प्रमाण सामने नहीं आया है। हाँ, कुछ पुराने मॉडलों में 3 से 5 प्रतिशत तक माइलेज में कमी आ सकती है, क्योंकि इथेनॉल की ऊर्जा घनत्व पेट्रोल से कुछ कम होती है। लेकिन इसके बदले उच्च ऑक्टेन संख्या, कम प्रदूषण और आयात में कमी जैसे लाभ प्राप्त होते हैं। इससे इंजन की टूटफूट कम होती है और निकलने वाला धुआं कम विषैला होता है। विदेशी मुद्रा में बचत तो सबसे बड़ा लाभ है ही।

    इथेनॉल कार्यक्रम का सबसे बड़ा लाभ किसानों को मिला है। पहले चीनी मिलों में अधिशेष चीनी का संकट बना रहता था। अब गन्ने के रस, बी-हैवी शीरे तथा अन्य कृषि उत्पादों से इथेनॉल बनने लगा है। इससे चीनी मिलों की आय बढ़ी और किसानों के बकाया भुगतान में भी सुधार आया। भविष्य में मक्का तथा अन्य अनाज आधारित इथेनॉल उत्पादन बढ़ने से फसल विविधीकरण को भी प्रोत्साहन मिलेगा।

    भारत में पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता एक दिन में नहीं बढ़ी। कई दशकों तक ऊर्जा सुरक्षा की बजाय आयात-आधारित व्यवस्था पर अधिक भरोसा किया गया। पेट्रोलियम विपणन, रिफाइनिंग और वितरण के विस्तार के साथ देश में ईंधन उपभोग तेजी से बढ़ा, जबकि वैकल्पिक जैव ईंधनों के विकास पर अपेक्षित गति से काम नहीं हुआ। परिणामस्वरूप पेट्रोलियम आयात का बोझ लगातार बढ़ता गया और अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर देश के बजट और चालू खाते पर पड़ता रहा।बढ़ती गाड़ियों की संख्या की वजह से ये खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है। वर्तमान सरकार ने इसी निर्भरता को कम करने के लिए इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम को प्राथमिकता दी है।

    इथेनॉल एक नवीकरणीय जैव ईंधन है। इसके उपयोग से कार्बन उत्सर्जन में कमी आती है तथा पेट्रोल की तुलना में यह अधिक स्वच्छ ईंधन माना जाता है। भारत ने वर्ष 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य निर्धारित किया है। ई-20 उस दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

    ई-20 पर विवाद का एक कारण यह भी है कि देश में करोड़ों पुराने वाहन अभी भी चल रहे हैं। कुछ उपभोक्ताओं ने माइलेज में कमी की शिकायत की है। वहीं सोशल मीडिया पर अपुष्ट वीडियो और संदेशों ने आशंकाओं को बढ़ाया। हाल के दिनों में सरकार को औपचारिक स्पष्टीकरण जारी करना पड़ा कि ई-20 नीति वर्षों के परीक्षण के बाद लागू की गई है और इसे लेकर फैलाई जा रही अनेक बातें तथ्यात्मक नहीं हैं।

    भारत ऊर्जा आयात पर निर्भर देश है। यदि घरेलू स्तर पर उत्पादित इथेनॉल से विदेशी मुद्रा की बचत होती है, किसानों को नया बाजार मिलता है, प्रदूषण घटता है और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होती है, तो यह केवल ईंधन नीति नहीं बल्कि आर्थिक आत्मनिर्भरता की रणनीति भी है। स्वाभाविक है कि इतने बड़े परिवर्तन के साथ तकनीकी प्रश्न और उपभोक्ताओं की शंकाएँ भी सामने आएँगी। सरकार की जिम्मेदारी है कि वह पारदर्शी वैज्ञानिक जानकारी उपलब्ध कराए और जहाँ आवश्यक हो वहाँ पुराने वाहनों के लिए व्यावहारिक समाधान भी दे।

    ई-20 पर बहस होनी चाहिए, लेकिन उसका आधार वैज्ञानिक तथ्य और प्रमाण हों, अफवाहें नहीं। यदि भारत को आयातित तेल पर निर्भरता कम करनी है और विदेशी मुद्रा की बचत के साथ किसानों की आय बढ़ानी है, तो इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम आने वाले वर्षों में देश की ऊर्जा नीति का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ बन सकता है।

  • भाजपा के सफल विकासवाद का उद्घोष करता नर्मदा समझौता

    भाजपा के सफल विकासवाद का उद्घोष करता नर्मदा समझौता

    मुख्यमंत्री डाक्टर मोहन यादव के नेतृत्व में भाजपा सरकार ने मध्यप्रदेश के स्वर्णिम आकाश में एक जबर्दस्त छलांग लगाकर दिखाई है। विकास की अवधारणा को लेकर दशकों तक शोर मचाते आंदोलनकारी आज भी समझने को राजी नहीं हैं कि विकास की बयार किसी भी जड़ता से मीलों आगे निकल जाती है। यही नहीं देश के बड़े अखबारों के माध्यम से इन बुद्धिजीवियों ने एक बार फिर भ्रम फैलाने का खटराग शुरु कर दिया है। जबकि पूंजी को चलायमान करने वाली भाजपा की विचारधारा ने इस समझौते के माध्यम से ये संदेश देने का प्रयास किया है कि विकास की धारा को किसी कीमत पर थमने नहीं दिया जाएगा। वास्तव में नर्मदा घाटी परियोजना स्वतंत्र भारत की सबसे बड़ी बहुउद्देशीय नदी परियोजनाओं में गिनी जाती है। सरदार सरोवर परियोजना से जुड़े वित्तीय दायित्वों, डूब क्षेत्र, पुनर्वास और मुआवजे को लेकर मध्यप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के बीच वर्षों से विवाद चलता रहा। जुलाई 2026 में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की उपस्थिति में चारों राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने लंबित वित्तीय दावों और नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण (NWDT) के पुरस्कार से जुड़े मुद्दों के समाधान के लिए एक ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते पर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने भी हस्ताक्षर किए। केंद्र सरकार के अनुसार इसका उद्देश्य दशकों से लंबित भुगतान, लागत साझेदारी तथा पुनर्वास संबंधी विवादों का स्थायी समाधान करना रहा है।

    मध्यप्रदेश के दृष्टिकोण से देखें तो इस समझौते का सबसे बड़ा लाभ यह है कि लंबे समय से अटके वित्तीय दावे और भुगतान का रास्ता साफ हुआ है। पिछले कुछ वर्षों से मध्यप्रदेश सरकार का दावा रहा था कि सरदार सरोवर परियोजना के कारण राज्य की बड़ी मात्रा में राजस्व भूमि, वन भूमि तथा अन्य सरकारी संपत्तियाँ डूब क्षेत्र में चली गईं, जिनका समुचित प्रतिपूर्ति मूल्य अभी तक प्राप्त नहीं हुआ था। इस विवाद के कारण हजारों करोड़ रुपये की राशि वर्षों से लंबित थी। समझौते के बाद एकमुश्त समाधान (One-Time Settlement) की दिशा में सहमति बनने से मध्यप्रदेश की वित्तीय स्थिति को लाभ मिलने की संभावना है। डैमिंग द नर्मदा किताब लिखने वाले नर्मदा आंदोलनकारी रमेश बिल्लौरे जब गांव गांव जाकर बांध के विरोध में अलख जगाने की कोशिश कर रहे थे तब भी बांध प्रभावित बांध के विरोध में नहीं थे। उनका डर था कि उनकी संपत्तियों का मुआवजा मिलेगा भी या नहीं। तब कांग्रेस की डिफाल्टर सरकारें हुआ करती थीं और किसी को ये विश्वास नहीं था कि सरकार मुआवजा कैसे दे पाएगी।

    इस बहुपक्षीय समझौते से प्रभावित हितधारकों की सूची बहुत बड़ी है। सबसे पहले प्रभावित होंगे वे हजारों परिवार जो नर्मदा घाटी में विस्थापित हुए। यदि समझौते के अनुरूप लंबित भुगतान और पुनर्वास संबंधी दायित्वों का समयबद्ध क्रियान्वयन होता रहेगा, तो उन्हें वर्षों से लंबित राहत मिल सकती है। दूसरा बड़ा वर्ग मध्यप्रदेश सरकार का है, जिसे लंबित वित्तीय दावों के समाधान से राजकोषीय राहत मिलेगी। तीसरा लाभार्थी कृषि और सिंचाई क्षेत्र है, क्योंकि अंतरराज्यीय विवाद समाप्त होने से परियोजना के संचालन और भविष्य के जल प्रबंधन में अधिक स्थिरता आएगी। चौथा लाभ उद्योग और ऊर्जा क्षेत्र को होगा, क्योंकि परियोजना से जुड़ी बिजली उत्पादन और जल प्रबंधन योजनाओं में समन्वय बढ़ेगा।

    पुनर्वास और मुआवजे का प्रश्न नर्मदा परियोजना का सबसे संवेदनशील पक्ष रहा है। नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण ने विस्थापित परिवारों के पुनर्वास के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश दिए थे। बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने भी विभिन्न मामलों में यह स्पष्ट किया कि पुनर्वास परियोजना का अभिन्न हिस्सा है और इसके बिना निर्माण कार्य आगे नहीं बढ़ सकता। समय के साथ भूमि के बदले भूमि, नकद मुआवजा, आवासीय भूखंड, आधारभूत सुविधाएँ तथा पुनर्वास स्थलों का विकास जैसी व्यवस्थाएँ लागू की गईं। हालिया समझौते का उद्देश्य इन्हीं लंबित वित्तीय दायित्वों और भुगतान संबंधी विवादों का अंतिम निपटारा करना है, जिससे प्रभावित परिवारों और राज्यों के बीच शेष विवाद समाप्त हो सकें।

    नर्मदा आंदोलन का नेतृत्व करने वालों का कहना था कि बिना पर्याप्त पुनर्वास के बड़े बांध का निर्माण मानवाधिकारों का उल्लंघन होगा। उनके प्रयासों के कारण पुनर्वास नीति पर राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर बहस हुई और सरकारों को पुनर्वास मानकों में कई बार सुधार करना पड़ा।इससे जहां प्रभावितों को मुआवजा मिलना सुनिश्चित हुआ वहीं परियोजना में विलंब से देश को एक मंहगी कीमत भी चुकानी पड़ी। बांध विरोध की लड़ाई यदि परियोजना स्थापना के वक्त लड़ी गई होती तो परियोजना का रूप कुछ और हो सकता था। बाद के वर्षों में खड़ा किया गया जन असंतोष विकास के मार्ग में बड़ा अवरोध बन गया। विकास के कथित गांधीवादी मॉडल की आड़ लेकर विकास विरोधियों ने प्रदेश और देश की तरुणाई को गुमराह किया जो आज भी एक चुनौती बना हुआ है।

    सरकारों तथा परियोजना समर्थकों का मत रहा कि लगातार न्यायालयी लड़ाइयों, धरना-प्रदर्शनों और पर्यावरणीय आपत्तियों के कारण परियोजना वर्षों तक विलंबित हुई, जिससे सिंचाई, पेयजल और विद्युत उत्पादन के अपेक्षित लाभ देर से मिले तथा लागत में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय पर परियोजना को आगे बढ़ाने की अनुमति दी, साथ ही पुनर्वास संबंधी शर्तों के पालन पर भी बल दिया। इसलिए यह कहना अधिक संतुलित होगा कि आंदोलन ने परियोजना को पूरी तरह रोक नहीं दिया, बल्कि उसके क्रियान्वयन की गति और पुनर्वास नीति—दोनों को प्रभावित किया।

    मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की भूमिका इस समझौते में राजनीतिक और प्रशासनिक—दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण रही। उन्होंने मध्यप्रदेश की ओर से समझौते पर हस्ताक्षर कर यह संकेत दिया कि राज्य अब दशकों पुराने विवादों को समाप्त कर विकास परियोजनाओं को गति देना चाहता है। राज्य सरकार लगातार यह तर्क देती रही है कि नर्मदा परियोजना से सिंचाई, पेयजल और बिजली उत्पादन के व्यापक लाभ प्राप्त हुए हैं तथा शेष वित्तीय विवादों का समाधान विकास की गति बढ़ाएगा। समझौते में उनकी भागीदारी इस राजनीतिक प्रतिबद्धता का संकेत मानी जा रही है।
    राज्य के मुख्य सचिव अनुराग जैन ने राज्य के वित्तीय सुधारों को लागू करते हुए प्रशासनिक दक्षता का युक्तियुक्त समाधान प्रस्तुत किया। नर्मदा घाटी विकास विभाग को वे तमाम अनुमतियां दी गईं जिनसे राज्यों के बीच ये समझौता आकार ले सका। ऐसे अंतरराज्यीय समझौतों में वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों का कार्य राज्यों के दावों का परीक्षण, वित्तीय देयताओं का मिलान, कानूनी बिंदुओं का समन्वय तथा अंतिम मसौदे की तैयारी करना होता है। उपलब्ध सार्वजनिक जानकारी से यह स्पष्ट है कि मध्यप्रदेश के अधिकारियों ने गुजरात तथा अन्य राज्यों के अधिकारियों के साथ लंबे समय तक तकनीकी और वित्तीय स्तर पर बातचीत की, जिसके बाद राजनीतिक स्तर पर अंतिम समझौता संभव हो सका। हालांकि सार्वजनिक स्रोतों में प्रत्येक वार्ता चरण में व्यक्तिगत अधिकारियों की विस्तृत भूमिका का आधिकारिक विवरण उपलब्ध नहीं है।

    समग्र रूप से देखें तो यह समझौता केवल वित्तीय विवाद का समाधान नहीं है, बल्कि सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) का एक महत्वपूर्ण उदाहरण भी है। यदि लंबित भुगतान वास्तव में समय पर हो जाते हैं, पुनर्वास के शेष मामलों का न्यायसंगत निपटारा होता है और परियोजना से जुड़े सभी राज्यों के बीच समन्वय बना रहता है, तो मध्यप्रदेश को वित्तीय, कृषि, ऊर्जा तथा जल प्रबंधन—चारों क्षेत्रों में दीर्घकालिक लाभ मिल सकते हैं। वहीं यह भी उतना ही आवश्यक होगा कि विकास के साथ विस्थापित परिवारों के अधिकारों की अनदेखी न हो। किसी भी बड़ी नदी परियोजना की सफलता केवल बांध बनने से नहीं, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि उससे प्रभावित अंतिम व्यक्ति को भी न्याय मिला या नहीं। यही इस ऐतिहासिक समझौते की वास्तविक कसौटी होगी।नर्मदा समग्र के सूत्रधार अनिल माधव दवे के प्रयासों को इस समझौते ने सच्ची श्रद्धांजलि दी है जिन्होंने नर्मदा और इस जैसी माता समान नदियों के विकास को लेकर पूरी अवधारणा प्रस्तुत की थी।