कांग्रेस की हांडी चढ़े भी तो कैसे


भारत की जनता अब कांग्रेस के नेताओं और प्रवक्ताओं की बदजुबानी झेलने तैयार नहीं है। कांग्रेस कुमार राहुल गांधी ने जिस अंदाज में ऊल जलूल बयानबाजी शुरु की उसी रौ को उनके कार्यकर्ताओं ने भी अपना लिया। शिव खेड़ा के बयान के बाद असम पुलिस ने जो छापामारी की उससे चिचियाते कांग्रेस नेताओं ने इसे राजनैतिक विद्वेष से की गई कार्रवाई बताना शुरु कर दिया था। इसी को लेकर शिव खेड़ा सुप्रीम कोर्ट भी दौड़े पर वहां उन्हें निराशा हाथ लगी।


इस मामले में जब विषय सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, तो अदालत ने प्रथम दृष्टया पुलिस की कार्रवाई को गलत नहीं माना। इसका सीधा अर्थ यह नहीं है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित कर दिया गया है, बल्कि यह कि संविधान के तहत दी गई स्वतंत्रता पूर्णतः निरंकुश नहीं है। अनुच्छेद 19(1)(a) के साथ-साथ अनुच्छेद 19(2) भी लागू होते हैं, जो राज्य को सार्वजनिक व्यवस्था, शिष्टता और राष्ट्रीय एकता के हित में सीमाएं तय करने का अधिकार देते हैं।


यहां मध्यप्रदेश में कांग्रेस के प्रवक्ता के.के.मिश्रा ने भी राजस्व विभाग के प्रमुख सचिव के फैसले को निशाना बनाकर पत्रकारों को उकसाने का प्रयास किया। सरकार ने तो इस विषय पर असम की तरह कोई प्रतिक्रिया नहीं दी लेकिन पत्रकारों ने इस दांव को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया। इसकी वजह साफ थी कि मंत्रालय के गलियारों में घूमने वाले पत्रकार आला अफसर की सख्त और नियमों का पालन करने वाली शैली से पहले ही अवगत थे। उन्हें मालूम था कि राजस्व जैसे जिम्मेदार महकमे को संभालते हुए लिए वे प्रदेश हित को हमेशा सर्वोपरि रखते रहे हैं। कोई लाग लपेट, प्रलोभन या चमचागिरी उन्हें प्रभावित नहीं करती है।


यही वजह है कि लगभग दो हफ्ते पहले जब कांग्रेस प्रवक्ता के.के.मिश्रा ने सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा कि पीएस महोदय ने लावारिस लाशों के अंतिम संस्कार के नाम पर एनजीओ चलाने वाले पत्रकार को धक्के मारकर अपने कमरे से बाहर निकाल दिया। इस पर कुछेक पत्रकारों को लगा कि ये तो पत्रकारों का अपमान हुआ है। के.के.मिश्रा की कांग्रेस से सहानुभूति रखने वाले कतिपय पत्रकारों ने भी सुर में सुर मिलाकर कहा कि हम ईंट से ईंट बजा देंगे।उस वक्त कांग्रेस के सेनानियों को लगा कि शायद अब पत्रकार भड़क उठेंगे और पीएस महोदय के विरुद्ध हमला बोल देंगे। आज लगभग दो हफ्ते बीत जाने के बाद भी कहीं कोई सुगबुगाहट सुनाई नहीं दी है। सरकार ने तो इस घटना को लगभग अनसुना कर दिया। प्रशासनिक तबके ने इसे खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे जानकर मुंह फेर लिया। पत्रकारों ने आपस में पूछताछ की और उन्हीं पत्रकार महोदय को दर किनार कर दिया।


पत्रकारों ने जब तहकीकात की तो पता चला कि एनजीओ चलाने वालों ने जेल पहाड़ी की बेशकीमती जमीन पर अतिक्रमण करके बड़ा भवन बना लिया है। इस पूरी तरह अवैध निर्माण को दिखाकर कई बैंकों ,सांसद,नेताओं और अफसरों से अच्छा खासा चंदा वसूला जाता है। लगभग चार एंबुलेंस जुटा ली हैं जो समाजसेवा का वजन बढ़ाने में इस्तेमाल होती हैं। हालांकि उनका इस्तेमाल लगभग न के बराबर होता है। इसकी वजह है कि नगर निगम भोपाल ने अपनी निःशुल्क शव वाहन सेवा चला रखी है। कई अन्य धार्मिक संस्थाएं भी शव वाहन उपलब्ध कराती हैं। फोन लगाकर बुलाई जाने वाली एंबुलेंस सेवा भी उपलब्ध है । राजधानी में आपातकालीन सेवाएं इतनी ज्यादा हो गईं हैं कि इन गाड़ियों की जरूरत ही नहीं पड़ती है।

शवों की चीरफाड़ करने वाले कंपाऊंडर से भेलकर्मी बनकर रिटायर हुए इन समाजसेवी महोदय की वरिष्ठता को देखकर और अंतिम संस्कारों की कहानियों को सुनकर जनसंपर्क महकमा भी उनकी सेवा कर देता है। उन्हें श्रद्धानिधि के रूप में पेंशन भी मिलती है और एनजीओ के विशेषांक के नाम पर विज्ञापन भी मिलता है। कई अन्य अखबारों और संस्थाओं के नाम पर भी वे चंदा और विज्ञापन वसूल लेते हैं। उनके बेटे नामी बिल्डर हैं और अफसरों नेताओं के साथ मिलकर बेशकीमती जमीनों की खरीद फरोख्त भी करते रहते हैं। कुछ पत्रकारों को खुश करके वे अपनी समाजसेवा की शान में वाहवाही भी लिखवा लेते हैं।


बरसों से चलती आ रही इस व्यवस्था की मजबूती देखकर उन्होंने जिला प्रशासन से जमीन आबंटन की फाईल भी चलवा ली। कलेक्टर और संभागायुक्त कार्यालय से भी फाईल चली जो मंत्रालय पहुंच गई। फाईल जब प्रमुख सचिव महोदय के कमरे में पहुंची तो पीछे से आदरणीय भी पहुंच गए। उन्होंने नाराजगी भरे लहजे में कहा कि इतना लंबा समय हो गया है और मेरी जमीन का आबंटन नहीं हो पाया है। इस पर आला अफसर ने ये कहते हुए फाईल लौटा दी कि वह करोड़ों रुपये मूल्य वाली बेशकीमती जमीन किसी अन्य शासकीय सेवा के लिए आरक्षित है । समाज की गैर जिम्मेदारियों और आपराधिक वारदातों की वजह से कथित तौर पर लावारिस लाशें मिलती हैं। हम इसे संस्थागत रूप देकर सामाजिक स्वीकृति नहीं दे सकते। ये आपराधिक षड़यंत्र है और इसका सख्ती से इलाज होना चाहिए। शासन इसके लिए मुफ्त में जमीन क्यों देगा।लाशों के अंतिम संस्कार के लिए कई प्रकल्प मौजूद हैं। सरकार भी इस पर खासी राशि खर्च करती है ।


साहब का तमतमाया रुख देखकर एनजीओ संचालक के होश उड़ गए। तब उन्होंने पैंतरा बदला कि आप मेरी उम्र का तक लिहाज नहीं कर रहे हैं। इस पर अफसर महोदय ने कहा कि आप आदर से बैठिए हम अभी चाय भी पिलाते हैं। वहां से तो चाय पीकर वे वापस आ गए पर अपनी नाराजगी उन्होंने कई जगह साझा की। उन्होंने कहना शुरु कर दिया कि अफसर महोदय ने तो उनकी फाईल फेंक दी और कहा कि लावारिस लाशों के लिए सरकार जमीन थोड़ी बांटती फिरेगी।
इस घटना की गूंज उन सभी लोगों के बीच हुई जिनके प्रस्ताव शासन से रिजेक्ट होकर वापस लौट चुके हैं। उनमें से कुछ लोगों ने कांग्रेस के खेमें में जाकर ये कहानी सुनाई। सत्ता पक्ष में घुसपैठ जमाए बैठे भू माफिया ने भी इस कहानी में नमक मिर्च लगाकर हवा दी। नतीजा के.के.मिश्रा के बयान के रूप में सामने आया।


मध्यप्रदेश के इतिहास में लंबे समय बाद ऐसा कार्यकाल आया है जब प्रशासनिक मशीनरी को खैराती प्रदेश की छवि से बाहर निकलकर आत्म निर्भर प्रदेश के रूप में खड़ा करने के लिए निर्देशित किया गया है। खुद मुख्यमंत्री डाक्टर मोहन यादव अपनी राजनीतिक जरूरतों के लिए अफसरों को टोकने और प्रभावित करने से बचते हैं। भाजपा के लंबे शासनकाल के बावजूद मध्यप्रदेश की आर्थिक स्थिति कई चुनौतियों से घिर गई है। उमा भारती की भाजपा तो पंच ज जैसे आत्मनिर्भर सिद्धांत को लेकर सत्ता में आई थी। ये विचार चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय की प्रयोगशाला से निकला हुआ था। उनके बाद आए बाबूलाल गौर हों या शिवराज सिंह चौहान दोनों ने विकास की चमक दमक को जमीन पर उतारने के लिए भरपूर कर्ज लिया। बीच में आई कांग्रेस की कमलनाथ सरकार इंस्पेक्टर राज वापस ले आई और उस दौरान प्रशासन इतना बेलगाम हो गया कि हर सरकारी पद मंहगी कीमतों में बिकने लगा।


अब जबकि प्रदेश लगभग साढ़े चार लाख करोड़ के कर्ज में डूबा हुआ है तब सरकार और शासन सभी को अनियंत्रित अर्थव्यवस्था की आहट सुनाई देने लगी है। वैश्विक चुनौतियों ने इन हालात को और गंभीर बना दिया है। सरकारी कर्मचारियों के मन में भी संदेह के बादल इस तरह घुमड़ रहे हैं कि वे पूछते हैं कि आगे हम लोगों का वेतन भी मिल पाएगा या नहीं ।ऐसे हालात में एक आला अफसर की सख्ती को निशाना बनाकर कांग्रेस के नेतागण अपनी खोखली और गैर जिम्मेदार सोच को ही उजागर कर रहे हैं। कांग्रेस के नेतागण अपनी हताशा में कभी प्रेस पर गोदी मीडिया का लेबल चिपकाने का प्रयास करते हैं कभी पत्रकारिता की आड़ में पल रहे भू माफिया को आगे करके सरकार और शासन को बदनाम करने की कोशिशें करते हैं। अपनी असफलताओं के लंबे दौर के बाद भी कांग्रेस के नेतागण ये मानने राजी नहीं हैं कि काठ की हांडी बार बार नहीं चढ़ती।

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