अब आधी आबादी को मिलेगा फैसले लेने का हक

नारी शक्ति वंदन अधिनियम:

मध्यप्रदेश विधानसभा में नारी शक्ति वंदन अधिनियम को पारित कर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की सरकार ने केवल एक विधायी पहल नहीं की, बल्कि उस व्यापक राष्ट्रीय एजेंडे को मजबूती दी है जिसमें भारत की आधी आबादी को आर्थिक और राजनीतिक रूप से निर्णायक भूमिका में लाने की परिकल्पना की गई है। यह अधिनियम महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित करने का प्रावधान रखता है और लोकतंत्र की संरचना में एक ऐसा बदलाव प्रस्तावित करता है, जो आने वाले समय में सत्ता और समाज दोनों के चरित्र को प्रभावित कर सकता है।


भारतीय सामाजिक ढांचे की एक पुरानी सच्चाई यह रही है कि एक व्यक्ति कमाता है और कई लोग उसी आय पर निर्भर रहते हैं। इस व्यवस्था ने न केवल परिवारों की आर्थिक क्षमता को सीमित किया, बल्कि देश की उत्पादकता पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाला। यदि महिलाओं को बड़े पैमाने पर कार्यबल और निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया में शामिल किया जाता है, तो यह केवल सामाजिक न्याय नहीं बल्कि आर्थिक विकास का भी प्रश्न बन जाता है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम इसी सोच को संस्थागत रूप देने का प्रयास करता है।


मध्यप्रदेश और कई अन्य राज्यों में पहले ही लाड़ली बहना सरीखी योजनाएं लाकर भारतीय जनता पार्टी ने महिलाओं को विकास की मुख्य धारा में लाने का प्रयास किया था। ये योजनाएं सफलता पूर्वक चलती जा रही हैं। मुख्यमंत्री डाक्टर मोहन यादव ने सदन में भी संकल्प दुहराया है कि उनकी सरकार महिलाओं को दी जाने वाली राशि बढ़ाकर छह हजार रुपए तक कर देगी। जबकि राज्य सरकार के पास आर्थिक संसाधन पर्याप्त नहीं हैं। जाहिर है कि सरकार अपनी इस निर्णय प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी भी बढ़ाना चाहती है जो वस्तुस्थिति स्वयं देखकर फैसला कर पाएंगी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केन्द्र की भाजपा सरकार ने इस विधेयक का जो हश्र ऊंचे सदनों में देखा उसके बाद अब उनकी पार्टी ने राज्यों से एक तरह जन जागरण का ही प्रयास शुरु कर दिया है। सदन में प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ने परिसीमन को मुद्दा बनाकर बहिर्गमन कर दिया और प्रस्ताव पारित नहीं किया इससे ये संदेश निचले स्तर तक चला गया है कि कांग्रेस आजादी के बाद से महिलाओं को सत्ता में संवैधानिक भागीदारी देने में अडंगा लगाती रही है। छुटपुट महिला नेतृत्व को अपनी उपलब्धियां बताते हुए कांग्रेस ने जो बात सदन में रखी उसका खमियाजा उसे आगामी चुनावी राजनीति में उठाना पड़ सकता है।
स्थानीय निकायों—पंचायतों और नगरपालिकाओं—में महिलाओं को आरक्षण का अनुभव पहले ही सकारात्मक संकेत दे चुका है। अनेक महिला जनप्रतिनिधियों ने प्रशासनिक दक्षता और जनसरोकारों के प्रति संवेदनशीलता का परिचय दिया है। लेकिन विधायिका के उच्च स्तर पर उनकी भागीदारी अब तक सीमित रही है। ऐसे में यह अधिनियम महिलाओं को नीति-निर्माण की अग्रिम पंक्ति में लाने का अवसर प्रदान करता है, जिससे शासन की प्राथमिकताओं में भी संतुलन आने की उम्मीद की जा सकती है।


राजनीतिक दृष्टि से यह कदम सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के लिए भी महत्वपूर्ण है, जो लंबे समय से महिला सशक्तिकरण को अपने प्रमुख एजेंडे के रूप में प्रस्तुत करती रही है। यह पहल महिला मतदाताओं के बीच उसकी पकड़ को मजबूत कर सकती है। हालांकि, विपक्ष—विशेषकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस—इसे राजनीतिक लाभ के नजरिए से देखता है और इसके क्रियान्वयन को लेकर गंभीर सवाल उठा रहा है।


यहीं से इस अधिनियम की सबसे जटिल और विवादास्पद परत सामने आती है—परिसीमन का प्रावधान। सरकार ने महिला आरक्षण को आगामी जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन से जोड़ दिया है। इसका सीधा अर्थ यह है कि आरक्षण तत्काल लागू नहीं होगा, बल्कि निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण के बाद ही प्रभावी होगा। यही कारण है कि यह नीति जितनी ऐतिहासिक कही जा रही है, उतनी ही राजनीतिक बहस का केंद्र भी बन गई है।


कांग्रेस का तर्क है कि महिलाओं को उनका अधिकार देने के लिए परिसीमन का इंतजार करना अनावश्यक है। यदि सरकार की मंशा स्पष्ट है, तो वर्तमान सीटों पर ही 33 प्रतिशत आरक्षण लागू किया जा सकता है। विपक्ष इसे “विलंबित न्याय” के रूप में देखता है और आशंका जताता है कि यह प्रावधान महिलाओं को तत्काल लाभ से वंचित कर सकता है।


इसके विपरीत, भाजपा इस निर्णय को दीर्घकालिक और रणनीतिक दृष्टि से उचित ठहराती है। उसका कहना है कि परिसीमन के बाद संसद और विधानसभाओं की सीटों में वृद्धि संभावित है। ऐसे में यदि आरक्षण उस समय लागू किया जाता है, तो महिलाओं को न केवल प्रतिशत के आधार पर बल्कि वास्तविक संख्या में भी अधिक प्रतिनिधित्व मिलेगा। यह तर्क अधिनियम को केवल प्रतीकात्मक न रखकर व्यापक प्रभाव वाला बनाने की कोशिश के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।


हालांकि, इस पूरे विमर्श में सबसे बड़ा प्रश्न समय-सीमा का है। भारत में आखिरी परिसीमन 2002 में हुआ था और उसके बाद 2026 तक इस पर रोक रही है। यदि नई जनगणना और परिसीमन में देरी होती है, तो महिला आरक्षण भी स्वतः टलता जाएगा। ऐसे में यह आशंका निराधार नहीं है कि यह ऐतिहासिक पहल कागजों तक सीमित रह सकती है, जब तक कि इसे समयबद्ध तरीके से लागू न किया जाए।
परिसीमन का एक और आयाम क्षेत्रीय संतुलन से जुड़ा है। नई जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण कुछ राज्यों को अधिक प्रतिनिधित्व देगा, तो कुछ को अपेक्षाकृत कम। ऐसे में महिला आरक्षण इस व्यापक राजनीतिक पुनर्संरचना का हिस्सा बन जाएगा, जहां लैंगिक समानता के साथ-साथ संघीय संतुलन का प्रश्न भी जुड़ जाएगा।


इन तमाम बहसों के बीच यह भी स्वीकार करना होगा कि केवल आरक्षण ही महिलाओं के वास्तविक सशक्तिकरण की गारंटी नहीं है। शिक्षा, राजनीतिक प्रशिक्षण और सामाजिक स्वीकृति जैसे कारक भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। कई बार ‘प्रॉक्सी प्रतिनिधित्व’ की समस्या सामने आती है, जिसे दूर किए बिना इस पहल के उद्देश्य अधूरे रह सकते हैं।


अंततः, नारी शक्ति वंदन अधिनियम को भारत की विकास यात्रा के एक महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में देखा जाना चाहिए। यह आधी आबादी को केवल अधिकार देने की नहीं, बल्कि उन्हें देश की आर्थिक और राजनीतिक शक्ति का सक्रिय भागीदार बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है। अब यह सरकार और व्यवस्था पर निर्भर करेगा कि वह परिसीमन जैसी प्रक्रियाओं को कितनी गंभीरता और गति से पूरा करती है, ताकि यह ऐतिहासिक पहल अपने वास्तविक उद्देश्य को प्राप्त कर सके और भारतीय लोकतंत्र को अधिक समावेशी बना सके।

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