एकात्म मानवतावाद का पूंजीवादी मॉडल ही कर पाएगा अंत्योदय


-आलोक सिंघई –
भारतीय जनता पार्टी (BJP) के स्थापना दिवस पर जब पार्टी दिग्गजों के भाषणों में पंडित दीनदयाल उपाध्याय के ‘एकात्म मानवतावाद’ और ‘अंत्योदय’ की गूंज सुनाई देती है, तब देश का आम नागरिक विकास के नए प्रतिमानों के बीच एक अजीब सा विरोधाभास भी महसूस करता है। भाजपा का स्थापना दिवस महज एक औपचारिकता नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का अवसर होना चाहिए कि क्या आज का आर्थिक ढांचा सचमुच एकात्म मानववाद की कसौटी पर खरा उतर रहा है? यह बात अब छिपी नहीं है कि पार्टी की ओर से प्रचारित ‘विकास मॉडल’ पूंजीवाद का ही एक देशी स्वरूप है—जिसे अक्सर ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ या ‘मित्र पूंजीवाद’ के चश्मे से देखा जा रहा है। जब हम न्यू वर्ल्ड ऑर्डर की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं, तो एकात्म मानवतावाद का सैद्धांतिक चोला उतारकर भारतीय पूंजीवाद को नए सिरे से परिभाषित करना होगा।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने एकात्म मानवतावाद के माध्यम से एक ऐसे समाज की कल्पना की थी, जहाँ व्यक्ति और समाज के बीच सामंजस्य हो, और विकास की अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति (अंत्योदय) को उसका हक मिले। उनका दर्शन व्यक्तिवाद और समाजवाद दोनों के बीच का एक वैकल्पिक मार्ग था। लेकिन, पिछले एक दशक में जिस तरह के आर्थिक सुधार हुए हैं, वे पूंजी के केंद्रीकरण को बढ़ावा देते प्रतीत होते हैं। सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) का निजीकरण, कॉर्पोरेट घरानों को दी जा रही रियायतें, और असंगठित क्षेत्र की दुर्दशा, यह दर्शाती है कि ‘अंत्योदय’ अब केवल एक राजनीतिक नारा बनकर रह गया है, जबकि ‘अमीरोदय’ वास्तविक एजेंडा बन चुका है। यह एकात्म मानवतावाद की मूल भावना के विपरीत है, जो शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा के एकीकृत कार्यक्रम की बात करती है।
भारतीय जनता पार्टी का दावा रहा है कि वह पश्चिमी अवधारणाओं से इतर एक विशुद्ध भारतीय आर्थिक मॉडल अपनाएगी। लेकिन वास्तविकता यह है कि आज का भारतीय पूंजीवाद वैश्वीकरण के उन दोषों को अपना चुका है, जिससे बचने की सलाह दीनदयाल जी ने दी थी। यह सच है कि 2014 के बाद देश में आधारभूत संरचना (Infrastructure) का अभूतपूर्व विकास हुआ है, डिजिटल इंडिया ने क्रांति ला दी है, लेकिन इस चमक-धमक के पीछे लघु, सूक्ष्म और मध्यम उद्यमों (MSME) की खामोश मौत भी छिपी है। जब देश की अर्थव्यवस्था में चंद बड़े कॉर्पोरेट समूह का एकाधिकार बढ़ता है, तो वह अंत्योदय की अवधारणा को सीधे चुनौती देता है। कई मायनों में पूंजी के उत्पादन के लिए ये मॉडल बेजोड़ है। इससे उत्पादित पूंजी ही समाज के अंतिम व्यक्ति के जीवन में खुशियों की दीपावली ला सकती है। ऐसे में केवल चुनावी जीत के लिए हम सच्चाई को स्वीकार करने का साहस न करें ये उचित नहीं है।
न्यू वर्ल्ड ऑर्डर के इस दौर में, जहाँ तकनीकी वर्चस्व और संसाधन-आधारित युद्ध (Resource War) आम बात हो गई है, भारत को एक ऐसे आर्थिक मॉडल की आवश्यकता है जो समावेशी (Inclusive) हो। भाजपा के दिग्गजों को यह विचार करना होगा कि जब तक छोटे उद्यमी, किसान और मजदूर आर्थिक विकास के केंद्र में नहीं होंगे, तब तक विकसित भारत का सपना अधूरा रहेगा। यदि हम वास्तव में एकात्म मानवतावाद के प्रति प्रतिबद्ध हैं, तो पूंजीवाद के देशी संस्करण—’मित्र पूंजीवाद’—से बाहर निकलकर ऐसे मॉडल को अपनाना होगा, जो आर्थिक असमानता को कम करे, न कि बढ़ाए। आजादी के लगभग आठ दशकों बाद भी हमारे लोग यदि गैस सिलेंडर,पेट्रोल डीजल की कतार में लगने को मजबूर हैं तो क्या हमें अपने विकास मॉडल पर पुर्नविचार नहीं करना चाहिए।
अब समय आ गया है कि बीजेपी अपनी विचारधारा को नए सिरे से अपडेट करे। 1980 के दशक के चश्मे से 2026 की आर्थिक चुनौतियों का सामना नहीं किया जा सकता। विचारधारा को वैचारिक जकड़न से निकालकर युगानुकूल (समय के अनुरूप) बनाना होगा। इसका मतलब यह नहीं है कि हम पूंजी निर्माण को रोक दें, बल्कि इसका अर्थ यह है कि पूंजी का उपयोग जन-कल्याण के लिए हो, न कि केवल कुछ हाथों में उसे केंद्रित करने के लिए। अंत्योदय का अर्थ है- समाज के अंतिम व्यक्ति को सशक्त बनाना, न कि उसे सरकार या कॉर्पोरेट की दया पर छोड़ देना।
अंततः, भाजपा को यह तय करना होगा कि वह दीनदयाल उपाध्याय की वैचारिक विरासत को केवल प्रतीकों (Symbols) के रूप में याद रखेगी या उसे आर्थिक नीतियों (Policies) में उतारेगी। यदि न्यू वर्ल्ड ऑर्डर में भारत को एक महाशक्ति के रूप में स्थापित होना है, तो उसे ‘भारतीय पूंजीवाद’ को ‘मानवीय पूंजीवाद’ में बदलना होगा। एकात्म मानवतावाद का चोला उतारकर जब हम वास्तविकता की ज़मीन पर ‘समावेशी विकास’ का नया प्रतिमान गढ़ेंगे, तभी सही मायने में अंत्योदय का संकल्प पूरा होगा।

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