
आलोक सिंघई
आम चुनाव 2024 के नतीजों के बाद भाजपा की आलोचना करने वालों के हौसले बुलंद हो गए हैं। तमाम विपक्षी दल एक सुर में चिचिया र हे हैं कि भाजपा की नीतियों को जनता ने नकार दिया है। इस कथित हार के कारणों की समीक्षा भी की जा रही है। बताया जा रहा है कि ये समीक्षा भाजपा और आरएसएस कर रहे हैं। चर्चाएं जरूर हैं पर भाजपा संगठन ने औपचारिक तौर पर ऐसा कोई कदम नहीं उठाया है। अलग अलग धड़े हार का ठीकरा फोड़ने के लिए खोपड़ी ढूंढ़ रहे हैं। जबकि कम सीटें आने के बावजूद सत्ता में लौटी मोदी सरकार जोर शोर से अपनी नीतियों का क्रियान्वयन करने में जुट गई है। जो भाजपाई और विपक्षी कांग्रेसी व अन्य राजनीतिक दल भाजपा की कथित हार की समीक्षा कर रहे हैं वे केवल बाहर से खड़े होकर कयास लगा रहे हैं। भाजपा की अंदरूनी स्थितियों की समीक्षा नहीं हो पा रही है।
भाजपा और संघ को जो लोग करीब से देखते रहे हैं वे जानते है कि भाजपा का संगठन ऊपर से जितना सर्वव्यापी दिखता है भीतर से उतना ठोस नहीं है। इसकी वजह देश का वो संविधान है जिसने अन्य राजनीतिक दलों की वजह से समाज को खंड खंड देखने की परंपरा पाई है। कांग्रेस का फार्मूला तो देश को विभाजित करके राजनीति करने के लिए ही बनाया गया था। कांग्रेस ने अपने पूरे शासनकाल में समाज को खंड खंड बांटने का प्रयास किया और फिर उनमें राजनीतिक नेतृत्व खड़ा करने का प्रयास किया । ये स्वाभाविक नेतृत्व हो सकता था लेकिन कांग्रेस को जिस तरह एक ही परिवार के इर्द गिर्द खड़ा करने का प्रयास किया गया उसने जनता के बीच से स्वाभाविक नेतृत्व उभरने की प्रक्रिया को कुचल दिया। नतीजतन परिवारवाद, बाहुबल, धन बल, बंदूक बल,बलात्कार, चमड़े की नाव सभी कुटैवों ने कांग्रेस को जनता का मुकुट बनने से रोक दिया। अब उसकी जगह भरने के लिए भाजपा ने जिस तरह विकल्प बननेका प्रयास किया उससे वह अपनी स्वाभाविक पहचान ही गंवा बैठी है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ , जनसंघ, जनता पार्टी और भारतीय जनता पार्टी जैसे कई पड़ाव पार करने के बाद जो विचारधारा सत्ता में आगे बढ़ी उसे पुष्पित और पल्लवित करने में कई पीढ़ियां खप गईं। त्याग और तपस्या के अटूट परिश्रम ने भाजपा को सत्ता के नजदीक तक तो पहुंचाया लेकिन वह सत्ता में नहीं पहुंच पा रही थी। तब कांग्रेस के भीतर से ही खुद को असहाय महसूस कर रहे नेताओं ने भाजपा को मध्यम मार्ग अपनाने की सलाह दी। जो भाजपा कुशा भाऊ ठाकरे, बलराज माधोक, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, विजया राजे सिंधिया, जैसे नेताओं के आगोश में पल रही थी वह अचानक कांग्रेस बनने निकल पड़ी। भाजपा के इस बधियाकरण में पुरानी पीढ़ी के कई नेता पीछे छूट गए। अवसर वादी नेताओं की पौध तैयार हो गई जो सत्ता के शीर्ष पर झंडा फहराने लगी। इस लीडर शिप के मन में चोरी का भाव था इसलिए वह खुलकर संवाद तो कर नहीं सकती थी। जिन्हें सत्ता से दूर धकेला गया वे क्षोभवश खुद अपने दायरे में सिमट गए।
आज यूपी में भाजपा की कथित हार की समीक्षा हो रही है लेकिन मध्यप्रदेश में भाजपा की कथित जीत की समीक्षा करने कोई तैयार नहीं है। एमपी की भाजपा भी देश के अन्य राज्यों की तरह अपने ही बोझ तले दबी हुई है। जोर जोर से दावे करके दंभोक्तिपूर्ण भाषण देने वाले भाजपा के नेताओं को लगता है कि उनके प्रयासों से ही भाजपा ने अपना शत प्रतिशत परफार्मेंस दिखाया है जबकि ये अर्धसत्य ही है। एमपी की भाजपा को उसके कार्यकर्ताओं के साथ कांग्रेस के दिग्गजों ने भी आगे बढ़ कर सत्ता में पहुंचाया है। एमपी की कांग्रेस तो जान रही थी कि भाजपा को एक बार फुल मेजोरिटी देना अनिवार्य है। क्योंकि ऐसा किए बगैर देश को नई दिशा में नहीं ले जाया जा सकता। भारत माता के पैरों में पड़ी बेड़ियां भी नहीं काटी जा सकतीं। इस रहस्य को भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व नहीं समझ पाया। उसे लग रहा था कि उसकी बेहतरीन योजनाएं जनमन को प्रभावित कर चुकीं हैं और उसे अब केवल सत्ता का मुकुट अपने सिर पर सजाना मात्र है।
यूपी में जिन राजनीतिक पंडितों को लगता है कि चार सौ पार और संविधान बदल देने के भय ने भाजपा को सत्ता से दूर किया है उन्हें अपने आकलन पर एक बार फिर विचार कर लेना चाहिए। बेशक भाजपा की हार में टिकिट वितरण और सत्ता विरोधी लहर ने अपना असर दिखाया है लेकिन इससे ज्यादा भाजपा का बोझ ही उसे कुचलने में सबसे बड़ा कारण रहा है। आरएसएस के नाम पर जिस तरह से सत्ता की लूट की गई और दंभोक्ति भरे दावे किये गए उससे भाजपा का संगठन बुरी तरह चकनाचूर हो गया है। एमपी में भी कमोबेश यही हालत है लेकिन यहां कांग्रेस की मजबूत लाबी राहुल गांधी के बोगस नेतृत्व को दरकिनार करने के लिए लामबंद हो गई थी। जीतू पटवारी जैसे ओछे और दंभी व्यक्ति की मौजूदगी ने कांग्रेसियों को अपने अपने दायरे में सिमट जाने के लिए जमीन तैयार कर दी। नतीजतन इसा लाभ भाजपा को मिला। कमलनाथ के भाजपा में जाने की अफवाह और उनके समर्थकों का भाजपा में जाने की कवायद ने जो संदेश दिया उससे जनता ने भी भाजपा को ही वोट देने में अपनी भलाई समझी और कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया।
डाक्टर मोहन यादव की सरकार को आए हुए आधा साल हो गया लेकिन अब तक सरकार अपनी स्वाभाविक गति नहीं पकड़ पाई है। आम चुनावों की अपरिहार्यता और आर्थिक चुनौतियों ने सरकार के हाथ बांध रखे हैं। भाजपा के नेताओं को खुद समझ नहीं आ रहा है कि वे कैसे प्रदेश सरकार की गाड़ी को पटरी पर लाएं। भाजपा को अपने संगठन की कमियों पर निश्चित रुप से आत्म चिंतन करना चाहिए। किसी भीजीवित संगठन में ये सबसे महत्वपूर्ण शक्ति होती है लेकिन संगठन और सरकार दोनों को अपने भीतर पल रहे पाखंडियों से निजात पानी जरूरी है। चाहे वे भाजपा के मूल कार्यकर्ता रहे हों या सिंधिया के संग कांग्रेस से आए नेतागण सभी को अपना लक्ष्य हासिल करने के लिए आगे बढ़ना होगा। सबसे बड़ी बात तो ये कि डींगें हांकने वाले संगठन के स्वंभू नेताओं से भी दूरी बनानी होगी तभी भाजपा देश को बुलंदियों पर ले जाने के अपने उस स्वप्न को साकार कर पाएगी जिसा सपना उसके पूर्वजों ने कभी देखा था। लौह प्रतिमाओं का बोझ भाजपा को रसातल में पहुंचा देगा।
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