Month: October 2022

  • पुरानी पेंशन बहाली बनी राजनैतिक हथकंडा

    पुरानी पेंशन बहाली बनी राजनैतिक हथकंडा

    डॉ.अजय खेमरिया

    सत्ता के लिए राष्ट्र के दीर्धकालिक हित क्या वाकई महत्वहीन होते हैं।वस्तुतः संसदीय राजनीति का चरित्र कुछ ऐसा ही ढलता जा रहा है।इस समय देश में सरकारी कार्मिकों के लिए पुरानी पेंशन का मुद्दा खूब छाया हुआ है।गले तक कर्ज में डूबे पंजाब ने अपने 1.60 लाख कार्मिकों के लिए एनपीएस के स्थान पर पुरानी पेंशन बहाली के लिए कदम बढ़ाएं हैं।राजस्थान,छत्तीसगढ़ ,झारखंड पहले ही एनपीएस को अपने यहां बंद कर 1972 की पेंशन योजना को बहाल करने की घोषणा कर चुके है।मप्र में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने वित्त विभाग को इस मामले का परीक्षण करने के लिये कहा है और देर सबेर मप्र भी अगले कुछ महीनों में अपने 4.5 लाख कर्मचारियों को पुरानी पेंशन बहाल करने वाला राज्य होगा।गुजरात में कांग्रेस एवं आप भी अपने वादों में इसे दोहरा रहे हैं।स्पष्ट है पुरानी पेंशन मुद्दा एक चुनावी हथकंडा बन गया है और इसकी बहाली में राजनीतिक दल सत्ता की चाबी अंतर्निहित मान चुके हैं।यह जानते समझते हुए भी कि सरकारी कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन देना सही मायनों में आर्थिक रूप से एक जोखिमपूर्ण नीति है।यह भी एक तरह से रेवड़ी संस्कृति ही है जिसका सामाजिक न्याय या सुरक्षा के साथ कोई तार्किक औऱ युक्तियुक्त संबंध नही है।2004 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने 1972 के पेंशन उपबन्धों के स्थान पर भागीदारी केंद्रित एनपीएस योजना को आकार दिया था जिसे बाद में यूपीए सरकार ने भी परिवर्धित रूप से सशक्त बनाया।बंगाल को छोड़कर सभी राज्यों ने इसे अपने यहां लागू किया और आज भी सभी राज्यों एवं केंद्र के कार्मिकों के लिए यह लागू ही है।पुरानी पेंशन असल में 70 के दशक की सामाजिक आर्थिक परिस्थितियों की मांग पर निर्भर थी।यह रिटायरमेंट के समय अंतिम वेतन पर 50 फीसदी रकम को पेंशन के रूप में निर्धारित करती थी और कर्मचारी की मृत्यु उपरांत कुछ अंतर के बाद परिवार पेंशन में यानी पत्नी के नाम हो जाती हैं। यह वह दौर था जब वेतन आज की तरह ऊंचे नही थे।औसत आयु भी कम थी।इसमें कर्मचारियों को सीधे कुछ भी नही देना होता था जबकि एनपीएस में उन्हें 10 फीसद का अंशदान देना होता है।सरकार भी अपनी ओर से 14 फीसद जमा कर पेंशन फंड में अपना योगदान देतीं हैं।इस एनपीएस के स्थान पर कर्मचारियों द्वारा पुरानी पेंशन को बहाल करने के लिए संगठित रूप से देश भर में दबाव बनाया जा रहा है।सरकार में बैठे और बाहर सत्ता में आने को आतुर राजनीतिक दलों को लगता है कि कर्मचारियों के थोक वोट बैंक से उनकी किस्मत खुल सकती है, इसलिए वे इस योजना के पुराने एवं पश्चावर्ती दुष्परिणामों से वाकिफ होने के बाबजूद आगे बढ़ रहे है।ऐसा इसलिए क्योंकि हर दल को लगता है कि उसकी घोषणा से उस राज्य में तत्काल आर्थिक संकट खड़ा नही होगा इस स्थिति में 10 से 15 साल लगेंगे। इसलिए सत्ता के लिए 15 साल की कड़वी सच्चाई को आज क्यों स्वीकृति दी जाए।वस्तुतः पुरानी पेंशन उस समाजवादी सोच की उपज रही है जिसने राज्य की अवधारणा में नागरिकों को राज्य पर आश्रित बनाकर रखना चाहा है।आज भारत समाजवाद से आगे वैशविक आर्थिक शक्ति के रूप में अपनी जगह बना रहा है।1991 के बाद से जिन आर्थिक नीतियों पर देश आगे बढ़ा है वहां पुरानी पेंशन जैसे प्रकल्प स्वीकार नही हैं।सवाल यह भी कि 2004में इस पुरानी पेंशन को एनपीएस में बदलने की आवश्यकता ही क्यों पड़ी?असल मे 1990 तक आते आते केंद्र एवं राज्यों की अधिकतर सरकार अपने कार्मिकों को समय पर वेतन एवं पेंशन देनें की स्थिति में नही रह गई थीं।58 साल में रिटायरमेंट की आयु 60 फिर कुछ मामलों में 62 औऱ 65 तक कर दी गई। और यह भी तथ्य है कि आज औसतन आयु के मामले में भी 15 से 20 बर्ष का इजाफा हुआ है।ऐसे में पुरानी पेंशन का बोझ करदाताओं के साथ अन्याय तो है ही साथ ही लोकधन के समावेशी वितरण पर भी सवाल उठाता है।

    सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के मुताबिक राज्यों के अपने राजस्व में पेंशन खर्च का हिस्सा तेजी से बढ़ रहा है। यह 1990 तक 8.7 फीसद था और 2020-21 तक बढ़कर करीब 26 फीसद पर आ चुका था। चुनावी लिहाज से अगर राज्य पुरानी पेंशन पर वापिस आते हैं तो परिणाम बहुत खतरनाक हो सकते हैं। यह राज्यों की खस्ताहाल वित्तीय स्थिति को और जर्जर कर देगा।

    एसबीआई रिसर्च के आंकड़ों को देखे तो अधिकतर राज्य अपने कुल राजस्व संग्रहन का अधिकांश हिस्सा अपने कार्मिकों के वेतन,भत्ते,पेंशन पर खर्च कर रहे हैं। बिहार 58.9%उत्तराखंड 58.3%झारखंड 31.5%पश्चिम बंगाल 32.8% कुल राजस्व का खर्च सरकारी कार्मिकों पर खर्च हो रहा है।जिस राजस्थान ने एनपीएस को खत्म करने का निर्णय लिया है वहां हालात यह है कि कुल राजस्व के 58 हजार करोड़ में से 48 हजार करोड़ वेतन भत्तों औऱ 19 हजार करोड़ पेंशन पर खर्च करने पड़ते रहे हैं।उत्तरप्रदेश में कुल 6 लाख करोड़ के बजट में से 55 फीसद अपने कर्मचारियों के वेतन,पेंशन पर जा रहा है।पंजाब में पिछले पांच साल में 44 फीसद कर्ज बढ़ा है और वह अपने डेढ़ लाख करोड़ के बजट में से करीब 61 हजार करोड़ कर्मचारियों के वेतन पेंशन पर खर्च कर रही है।मप्र में भी करीब 52फीसद बजट की राशि इसी मद में व्यय की जा रही है।कुल मिलाकर सभी राज्यों की कहानी एक सी ही है।

    बुनियादी सवाल यह है कि क्या यह आर्थिक सामाजिक न्याय के नजरिये से उचित है? देश मे करीब 12 करोड़ लोग 60 साल से ऊपर है जिनमें से 90 फीसद को किसी प्रकार की संस्थागत पेंशन नही मिलती है।साढ़े पांच करोड़ विधवा महिलाएं इस देश मे है जो अफ्रीका औऱ तंजानिया की कुल आबादी से अधिक हैं।इनमें से अधिकतर आर्थिक सुरक्षा कवच से बाहर है।दुरूह सरकारी तंत्र की दया पर इनमें से कुछ को ही 300 से 600 रुपए मासिक पेंशन मिलती है।देश मे करीब 3 करोड़ दिव्यांग भी है जिन्हें कमोबेश इसी राशि के समतुल्य पेंशन नसीब होती है।31 मार्च 2022 तक एनपीएस में केंद्र सरकार के 2283671 एवं बंगाल छोड़कर राज्यों के मिलाकर कुल 7860657 सरकारी कर्मचारी पंजीबद्ध हैं।यह संख्या 2004 के बाद सरकारी सेवा में आने वालों की है शेष इस तिथि से पहले के भी कार्यरत है जिन्हें पुरानी पेंशन योजना 1972 के तहत लाभ मिलने हैं।एनपीएस में कारपोरेट के 140492,असंगठित क्षेत के 2291660,स्वावलंबन क्षेत्र के 4186943 लोग भी शामिल हैं।अकेले सरकारी कार्मिकों का 7860657 करोड़ एनपीएस में जमा है।जो जीडीपी का करीब 2.4 फीसद है।चुनावी मुहाने पर खड़े राज्यों को लगता है कि वे इस मामले से चुनाव जीत सकते है लेकिन ताजा उत्तरप्रदेश ,उत्तराखंड के उदाहरण सामने है जहां भाजपा को विपक्षी दल इस वादे के बाबजूद हरा नही पाए हैं।बेहतर होगा केंद्र सरकार की तरह सभी राज्य सरकारे भी इस मांग को राष्ट्रीय हितों के साथ विश्लेषित करने का साहस दिखाएं।ऐसा नही होना चाहिये कि विपक्षी दल भाजपा के विरुद्ध इसे एक चुनावी हथियार के रूप में प्रयुक्त करें।राज्यों को यह भी सोचना होगा कि उन्होंने 2004 में इस एनपीएस को अपनाया ही क्यों था?देश में वास्तविक जरूरतमंदों को सामाजिक आर्थिक सुरक्षा का कवच कैसे उपलब्ध हो इस दिशा में चुनावी नही एक सर्वस्पर्शी औऱ समावेशी दृष्टि की आवश्यकता है।एक बार एनपीएस के दायरे में शामिल कुल कर्मचारियों की संख्या और वास्तविक जरूरतमंदों की संख्या का तुलनात्मक अध्ययन भी किया जाना चाहिए।

  • भूमाफिया से सुपारी लेने लगी इंदौर की पुलिस

    भूमाफिया से सुपारी लेने लगी इंदौर की पुलिस


    भोपाल,16 अक्टूबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। पुलिस भी भू माफिया का गुर्गा बन सकती है ये पुलिस कमिश्नर प्रणाली के किसी पैरवीकोर ने कभी सोचा नहीं होगा। इंदौर की एक टाऊनशिप के नागरिक इन दिनों पुलिस की भूमिका को लेकर सशंकित हैं और उसकी माफियागिरी का तांडव झेल रहे हैं। माना ये जाता था कि राजस्व अधिकारी अक्सर दबाव में आकर माफिया की काली करतूतों के सामने सरेंडर कर देते हैं तो इन हालात से निपटने में पुलिस प्रभावी हो सकती है। इंदौर पुलिस की वर्तमान कारगुजारियों ने इन कयासों को धूल धूसरित कर दिया है।
    मामला सिल्वर स्प्रिंग्स, बायपास रोड, नायता मुंडला स्थित, सैकड़ों एकड़ में विस्तृत एकीकृत टाउनशिप का है। भूमाफिया ने इस पर अपना आधिपत्य बनाए रखने के लिए उसे अनेक टुकड़ों में बांट दिया है । टाऊनशिप के फेज़ 1 में हाल ही में उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ से मिले आदेश के बाद चुनाव हुए और बिल्डर का विधिवत सफाया हो गया ।टाऊनशिप के फेज़ 2 में रखरखाव के लिए गठित बिल्डर की कंपनी के सहयोगी संगठन की विशेष आमसभा में एकीकृत टाऊनशिप की संघर्ष समिति के वर्तमान अध्यक्ष आलोक जैन और एक अन्य रहवासी सुबोध गुप्ता के बीच मामूली धक्का मुक्की के बाद (1) हीरालाल जोशी (2) सुबोध गुप्ता,(3) अभय कटारे (4) विकास मल्होत्रा (5) सत्यम राठौर (6) ऋषभ विश्वकर्मा व अन्य बाहरी अनधिकृत व्यक्तियों (7) परमजीत सिंह (8) जीतू सोलंकी (9) देवेश्वर द्विवेदी (10) प्रयास द्विवेदी (11) नरेंद्र पाटीदार ने एक तयशुदा रणनीति बनाकर आलोक जैन के ऊपर घातक जानलेवा हमला कर दिया । इस घटना के बाद इन सभी लोगों ने पुलिस थाने में झूठे बयान देकर श्री जैन के ही विरुद्ध शिकायत जमा करा दी। विवाद टालने के लिए आलोक जैन ने समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए। उन्होंने इस मामले को समाप्त समझ लिया। इस समझौते के बाद बिल्डर के गुर्गों ने श्री जैन को निष्कासित करने के लिए जाल बिछाना शुरु कर दिया । इस टाऊनशिप के बिल्डर डेवलपर के कंपनी सचिव नीलेश गुप्ता (12) ने एक पत्र के माध्यम ये कहना शुरु कर दिया कि आलोक जैन को निष्कासित कर दिया गया है। सुबोध गुप्ता की ओर से समिति अध्यक्ष श्री जैन को सोसायटी से बाहर करने संबंधी आवेदन कार्यालय में जमा कराया गया । तभी से ये सभी लोग श्री जैन को डराने धमकाने के निरंतर प्रयास कर रहे हैं।
    मालूम हो कि सैकड़ों एकड़ में विस्तृत सिल्वर स्प्रिंग्स टाउनशिप के निदेशक अभिषेक झवेरी (13) और मुकेश झवेरी (14) ने सैकड़ों करोड़ रुपयों की शासकीय / रहवासियों की साझा धन संपत्ति पर अवैध कब्जा कर लिया है । रहवासियों के सभागार पर कब्ज़ा कर वहां चलाए जा रहे अवैध शराबखाने व अन्य संदिग्ध गतिविधियों को पुलिस की पहल पर ही बंद किया गया था । हालांकि बताया जाता है कि अभी भी खाली मकानों से बिल्डर और उसके सहयोगी (विपक्षी क्रमांक 1 से 11) अवैध अनैतिक गतिविधियों का संचालन कर रहे हैं । एकीकृत टाउनशिप के बहुसंख्यक रहवासियों की एकमात्र प्रतिनिधि संगठन यह संघर्ष समिति शासन प्रशासन न्यायालय के हर स्तर पर बिल्डर डेवलपर की अनियमितताओं / गबन / घोटालों को चुनौती दे रही है ।
    WP 5586/2021 उच्च न्यायालय, इंदौर
    CC/114/2022 उपभोक्ता आयोग, इंदौर
    इसी से क्षुब्ध होकर बिल्डर व उसके नियमित कर्मचारियों / प्रायोजित प्रतिनिधियों (विपक्षी क्रमांक 1 से 14) द्वारा समिति के अध्यक्ष पर यह सुनियोजित-निर्धारित जानलेवा हमला किया गया । अन्य उपस्थित रहवासियों के हस्तक्षेप से कोई अनहोनी तो नहीं हो सकी,लेकिन विपक्षी क्रमांक 1 से 14 तक के लोगों से प्रार्थी समिति के अध्यक्ष श्री आलोक जैन व उनके परिवार को जानमाल का खतरा निरंतर बना हुआ है ।
    ज्ञातव्य है कि विपक्षी क्रमांक 3 अभय कटारे के विरुद्ध पहले ही अनेक आपराधिक प्रकरण विचाराधीन हैं. इस टाऊनशिप में भी यह व्यक्ति बिल्डर की ओर से कब्जा जमाने,अतिक्रमण करने, गबन करने और अवैध वसूली करने का काम संभालता है।इसके इशारे पर विपक्षी क्रमांक 1 हीरालाल (पप्पू) जोशी ने सरेआम श्री जैन को जान से मारने की धमकी भी दी है।वर्तमान में टाऊनशिप के सर्वेसर्वा सूत्रधार होने के कारण इन्हीं के पास पूरे घटनाक्रम के आडियो और वीडियो साक्ष्य सुरक्षित हैं । जो दो अन्य वीडियो पक्ष विपक्ष की ओर से प्रस्तुत किए गए वह सुश्री शीतल राय के मोबाइल से बनाए गए, जिसमें से बीच का गंभीर मारपीट / बलवा वाला हिस्सा संपादित कर छुपा दिया गया है ।ये वीडियो दिखाकर बिल्डर के गुर्गे पुलिस को गुमराह कर रहे हैं।

  • प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा महाकाल लोक भारत के सांस्कृतिक वैभव की पुर्नस्थापना का उद्घोष

    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा महाकाल लोक भारत के सांस्कृतिक वैभव की पुर्नस्थापना का उद्घोष

    शिवराज और उनकी सरकार का हृदय से अभिनन्दन


    प्रधानमंत्री ने “श्री महाकाल लोक’’ के लोकार्पण के बाद जन समारोह को किया सम्बोधित


    उज्जैन 11 अक्टूबर (प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा है कि भारत के सांस्कृतिक वैभव की पुर्नस्थापना का लाभ न केवल भारत को अपितु पूरे विश्व एवं समूची मानवता को मिलेगा। उज्जैन में ‘श्री महाकाल लोक’ की स्थापना इसी की कड़ी है। यह काल के कपाल पर कालातीत अस्तित्व का शिलालेख है। उज्जैन आज भारत की सांस्कृतिक अमरता की घोषणा और नये कालखण्ड का उद्घोष कर रहा है। हमारे लिये धर्म का अर्थ कर्त्तव्यों का सामूहिक संकल्प, विश्व का कल्याण एवं मानव मात्र की सेवा है। हमने आजादी के पहले जो खोया था, उसकी आज पुनर्स्थापना हो रही है। प्रधानमंत्री श्री मोदी आज उज्जैन में ‘श्री महाकाल लोक’ के लोकार्पण के बाद जन समारोह को सम्बोधित कर रहे थे।
    प्रधानमंत्री श्री मोदी ने कहा कि ‘श्री महाकाल लोक’ दिव्य है। यहाँ सब कुछ अलौकिक, अविस्मरणीय एवं अविश्वसनीय है। महाकाल की आराधना अन्त से अनन्त की यात्रा है, आनन्द की यात्रा है, इससे काल की रेखाएँ भी मिट जाती हैं। महाकाल लोक आने वाली कई पीढ़ियों को अलौकिक दिव्यता और सांस्कृतिक ऊर्जा की चेतना प्रदान करेगा। इस अदभुत कार्य के लिये मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान, उनकी सरकार और मन्दिर समिति का मैं हृदय से अभिनन्दन करता हूँ, जिन्होंने निरन्तर पूरे समर्पण से सेवा-यज्ञ किया है।
    प्रधानमंत्री श्री मोदी ने कहा कि भगवान महाकाल की नगरी उज्जैन वह नगरी है, जो प्रलय के प्रहार से भी मुक्त है। “प्रलयो न बाध्यते, तत् महाकाल पूज्यते”। उज्जैन न केवल काल गणना एवं ज्योतिषिय गणना का केन्द्र है, अपितु यह भारत की आत्मा का केन्द्र भी है। यह पवित्र सात पुरियों में एक है। यहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने शिक्षा ग्रहण की। विक्रमादित्य के प्रताप से भारत के स्वर्णकाल की शुरूआत हुई। विक्रम संवत महाकाल की भूमि से ही शुरू हुआ।
    प्रधानमंत्री श्री मोदी ने कहा कि उज्जैन के क्षण-क्षण में इतिहास, कण-कण में आध्यात्म और कोने-कोने में ईश्वरीय ऊर्जा है। यहाँ कालचक्र के चौरासी कल्पों के प्रतीक चौरासी महादेव, चार महावीर, छह विनायक, आठ भैरव, अष्टमातृका, नौ ग्रह, दस विष्णु, ग्यारह रूद्र, बारह आदित्य, चौबीस देवियाँ एवं 88 तीर्थ हैं। इन सबके केन्द्र में कालाधिराज महाराज विराजमान हैं। पूरे ब्रह्माण्ड की ऊर्जा को ऋषियों ने प्रतीक रूप में समाहित किया। उज्जैन ने एक हजार वर्षों तक भारत की सभ्यता, संस्कृति, ज्ञान, गरिमा, साहित्य, कला का नेतृत्व किया। कालिदास एवं बाणभट्ट की रचनाओं में यहाँ की सभ्यता, संस्कृति, शिल्प और वैभव का वर्णन मिलता है।
    प्रधानमंत्री श्री मोदी ने कहा कि किसी राष्ट्र का सांस्कृतिक वैभव, उसकी पहचान उसकी सफलता की सबसे बड़ी निशानी है। भारत में हमारे धार्मिक एवं सांस्कृतिक केन्द्र का निरन्तर विकास किया जा रहा है। उज्जैन सहित सोमनाथ, केदारनाथ, बद्रीनाथ आदि केन्द्रों का समुचित विकास किया जा रहा है। चारधाम प्रोजेक्ट में ऑल वेदर रोड बनाये जा रहे हैं। हमने स्वदेश दर्शन एवं प्रसाद योजनाएँ चलाई हैं। हमारे धार्मिक एवं आध्यात्मिक केन्द्रों का गौरव पुनर्स्थापित हो रहा है। महाकाल लोक आज अतीत के गौरव के साथ भविष्य के स्वागत के लिये तैयार हो चुका है।
    प्रधानमंत्री श्री मोदी ने कहा कि हमारे प्राचीन मन्दिरों की दिव्यता, भव्यता, वास्तु और कला हमें आश्चर्यचकित करती है। कोणार्क का सूर्य मन्दिर, एलोरा का कैलाश मन्दिर, मोढेरा का सूर्य मन्दिर, तंजौर का ब्रह्मदेवेश्वर मन्दिर, कांचीपुरम का तिरूमल मन्दिर, रामेश्वरम मन्दिर, मीनाक्षी मन्दिर और श्रीनगर का शंकराचार्य मन्दिर बेजोड़ है। हमारे मन्दिरों का आध्यात्मिक सन्देश आज भी स्पष्ट रूप से सुनाई देता है। पीढ़ियाँ इसे देखती हैं, सुनती हैं। ये हमारी निरन्तरता और परम्परा के वाहक हैं।
    प्रधानमंत्री श्री मोदी ने कहा कि महाकाल लोक में हमारी सांस्कृतिक परम्परा को कला एवं शिल्प के रूप में उकेरा गया है। यहाँ शिव पुराण की कथाओं पर आधारित कलाकृतियाँ बनाई गई हैं। उन्होंने देशवासियों से अपील की कि वे यहाँ अवश्य आयें। यहाँ भगवान शिव के दर्शन के साथ ही उनकी महिमा और महत्व के दर्शन भी होंगे। यहाँ निर्मित पंचमुखी शिव, डमरू, अर्धचंद्र, सप्तऋषि मण्डल अद्वितीय हैं। शिव ही ज्ञान है। शिव दर्शन ब्रह्माण्ड दर्शन है। ज्योतिर्लिंगों का विकास भारत की आध्यात्मिक ज्योति ज्ञान एवं दर्शन का विकास है। भारत आज विश्व के मार्गदर्शन के लिये फिर तैयार है।
    प्रधानमंत्री श्री मोदी ने कहा कि श्री महाकालेश्वर में की जाने वाली भस्म आरती अवसान से पुनर्जीवन और अन्त से अनन्त की यात्रा का प्रतीक है। जहाँ महाकाल हैं, वहाँ विष भी कुंदन होता है। यह भारत की जीवटता और अपराजेय अस्तित्व की प्रतीक है। भारत सदियों से अजर-अमर है। हमारी सभ्यता, परम्परा, आत्मा-जागृत है। श्री महाकालेश्वर विश्व में एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है। मन्दिर हमारी आस्था के प्रमाणित केन्द्र हैं। इनके माध्यम से भारत पुनर्जीवित हो रहा है।
    प्रधानमंत्री श्री मोदी ने कहा कि भारत में हजारों वर्षों से कुंभ मेले की परम्परा है। हर बारह वर्ष में हम अमृत मंथन करते हैं और उसमें निकलने वाले अमृत पथ पर चलते हैं। पिछले कुंभ मेले में मैं उज्जैन आया था। उस समय मेरे मन में श्री महाकाल लोक सम्बन्धी संकल्प आया, जिसे आज संकल्प के रूप में मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने चरितार्थ किया है, मैं उन्हें धन्यवाद देता हूँ।
    आज प्राचीन मूल्यों पर नया भारत खड़ा हो रहा है। हमारी विज्ञान और शोध की परम्पराएँ जीवित हैं। खगोल विद्या के क्षेत्र में चंद्र यान, गगन यान मिशन महत्वपूर्ण सफलताएँ हैं। रक्षा के क्षेत्र में हम आत्म-निर्भर हैं। हमारे युवा स्किल, स्पोर्ट्स, स्टार्टअप्स के क्षेत्र में विश्व में भारत का डंका बजा रहे हैं।
    मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि भारत में ही सभ्यता के सूर्य का उदय हुआ। हमारी संस्कृति वसुधैव कुटुंबकम् एवं सर्वे भवन्तु सुखिन: भी है। हमारा सन्देश विश्व कल्याण का है। भारत के इसी सन्देश को स्वामी विवेकानन्द ने सारी दुनिया को दिया। एक नरेन्द्र ने जो किया दूसरा नरेन्द्र आज उसे पूरा कर रहा है। हमारा योग, उपनिषद, गीता-ज्ञान, आयुष वे दुनिया में लेकर गये। आज श्री नरेन्द्र मोदी गौरवशाली, वैभवशाली, शक्तिशाली भारत का निर्माण कर रहे हैं।
    श्री चौहान ने कहा कि 2016 के सिंहस्थ में विचार महाकुंभ भी हुआ था, जिसमें प्रधानमंत्री श्री मोदी आये थे। विचार महाकुंभ में 51 अमृत बिन्दु निकले, जिनमें से एक श्री महाकाल लोक की स्थापना का कार्य भी था। प्रधानमंत्री श्री मोदी की प्रेरणा से इस कार्य की शुरूआत की गई। वर्ष 2018 में केबिनेट ने इसे स्वीकृति दी, वर्ष 2019-20 में यह कार्य मंद हो गया, लेकिन वर्ष 2020 के बाद तेजी से हुआ। आज इसका लोकार्पण हो रहा है। भगवान शिव सबका कल्याण करने वाले हैं, थोड़ी-सी पूजा से वे प्रसन्न हो जाते हैं, जिसे दुनिया ठुकराती है, उसे अपनाते हैं। उन्होंने पूरी दुनिया को अमृत दिया और स्वयं जहर पिया।
    मुख्यमंत्री श्री चौहान ने कहा कि आज भौतिकता से दग्ध मानवता को शाश्वत शान्ति का अदभुत दर्शन प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत करायेगा। हम सभी भारत के नवनिर्माण में अपना सर्वश्रेष्ठ दें। मुख्यमंत्री श्री चौहान ने उपस्थित सभी को विश्व एवं प्राणीमात्र के कल्याण का संकल्प दिलाया।
    प्रारम्भ में प्रधानमंत्री श्री मोदी को राज्यपाल श्री मंगुभाई पटेल एवं मुख्यमंत्री श्री चौहान ने नन्दी द्वार की प्रतिकृति भेंट की। श्री मोदी का मुख्यमंत्री श्री चौहान ने रूद्राक्ष की माला, अंग वस्त्र एवं पगड़ी पहना कर स्वागत किया। प्रसिद्ध भजन गायक श्री कैलाश खेर ने सुमधुर शिव-स्तुति प्रस्तुत की। समूचा वातावरण शिवभक्ति से ओत-प्रोत हो गया।
    उल्लेखनीय है कि श्री महाकाल लोक के लोकार्पण अवसर पर महाकाल मन्दिर सहित पूरे प्रदेश के प्रमुख मन्दिरों एवं देवस्थलों पर रोशनी की गई और स्थानीय लोगों ने स्क्रीन पर लोकार्पण समारेाह को देखा। मन्दिरों में भजन-कीर्तन सहित शिव आरती भी हुई। मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान के प्रयासों से न केवल मध्य प्रदेश के 52 जिले, बल्कि पूरे भारत सहित 40 से अधिक देश इस अदभुत समारोह के साक्षी बने। चारों ओर शिव महिमा की गूँज सुनाई दी। सभी लोग श्री महाकाल लोक के लोकार्पण से आनन्दित और भक्तिमय हो गये।
    धार्मिक और आध्यात्मिक रूप में विकसित किये गये श्री महाकाल लोक को देख कर भारत सहित अन्य देश के लोग भी मंत्रमुग्ध हो उठे। बनारस कॉरिडोर की तर्ज पर बने इस लोक के आकर्षण से कोई भी अछूता नहीं रहा। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने भी श्री महाकाल लोक को देख कर मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान के प्रयासों पर प्रसन्नता जाहिर की।
    लोकार्पण समारोह में छत्तीसगढ़ की राज्यपाल सुश्री अनुसुइया उइके, झारखंड के राज्यपाल रमेश बैस, केन्द्रीय कृषि एवं कल्याण मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर, नागरिक उड्डयन एवं इस्पात मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया, केन्द्रीय सामाजिक न्याय एवं अध्यिाकारिता मंत्री वीरेंद्र कुमार खटीक, इस्पात राज्य मंत्री फग्गन सिंह कुलस्ते, केन्द्रीय जलशक्ति एवं खाद्य प्र-संस्करण उद्योग राज्य मंत्री प्रहलाद पटेल सहित मध्य प्रदेश के मंत्रीगण एवं बड़ी संख्या में साधु-सन्त, श्रद्धालु और नागरिक उपस्थित थे।

  • रामराज को अब महाकाल का भी आशीर्वाद

    रामराज को अब महाकाल का भी आशीर्वाद


    क्रांतिदीप अलूने
    शिव सर्वगत अचल आत्मा है, शिव की आराधना शक्ति की आराधना है। शिव अव्यक्त है, उनके सहस्त्रों रूप है। भारत की विशिष्ट सांस्कृतिक विरासत को “श्री महाकाल लोक” में जिस सुंदर ढंग से प्रदर्शित किया गया है वह अतुलनीय है। यहाँ शांति और निश्चिन्तता के साकार रूप शिव ही शिव है। “श्री महाकाल लोक” सनातन संस्कृति की पौराणिकता,ऐतिहासिकता और गौरवशाली परम्परा का अद्भुत संगम और अद्वितीय नूतन रूप है। इसे जिस भव्यता और सुंदरता से प्रदर्शित किया गया है, वह चमत्कृत कर देता है।

    दरअसल प्राचीन पुण्य सलिला माँ क्षिप्रा के तट पर बसी प्राचीनतम नगरी उज्जैन का “श्री महाकाल लोक” भगवान शिव के भक्तों के स्वागत के लिए तैयार है। महाकाल मंदिर के नवनिर्मित कॉरिडोर को 108 स्तंभ पर बनाया गया है, 910 मीटर का ये पूरा महाकाल मंदिर इन स्तंभों पर टिका होगा। महाकवि कालिदास के महाकाव्य मेघदूत में महाकाल वन की परिकल्पना को जिस सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया गया था, सैकड़ों वर्षों के बाद उसे साकार रूप दे दिया गया है। दुनिया भर से उज्जैन आने वाले शिव भक्तों के लिए यह शिव महिमा का सम्पूर्ण अनुभव देने का अनूठा और अद्भुत प्रयास है।

    “श्री महाकाल लोक” आधुनिक व्यवस्थाओं और संसाधनों से भी परिपूर्ण बनाया गया है। इसकी व्यवस्था इतनी उत्कृष्ट है कि भक्तों और पर्यटकों को अभिभूत कर देगी। मंदिरों के साथ ही पूजा सामग्री और हार-फूल की दुकानों को भी विशिष्ट तरीके से लाल पत्थर से बनाया गया है,जिन पर सुंदर नक्काशी की गई है। “श्री महाकाल लोक” के निर्माण से भगवान शिव की जिन कथाओं का महाभारत, वेदों तथा स्कंद पुराण के अवंती खंड में उल्लेख है, उनका जीवंत अनुभव शिव भक्त धर्मनगरी उज्जैन में कर पाएंगे। महाकाल ज्योतिर्लिंग एक मात्र ज्योतिर्लिंग है जो दक्षिणमुखी है। सनातन धर्म में महाकाल के दर्शन जीवन का एक महत्वपूर्ण और आवश्यक भाग माना जाता है, जिससे शांति मिलती है। इसलिए लाखों भक्त नित्य इस देव स्थान पर आते हैं। “श्री महाकाल लोक” के जरिए शिव के सभी स्वरूप एक स्थान पर लाना मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार का ऐसा दुर्लभ कार्य है जिसकी और कोई मिसाल नहीं हो सकती।

    शिव मंगल, शुभ और सौभाग्यसूचक देव है, वे सदाशिव है, जो ब्रह्मा से सृष्टि रचवाते है, विष्णु से उसका पालन करवाते है तथा रूद्र से उसका नाश करवाते है। “श्री महाकाल लोक” में शिव, शम्भू, शशिशेखर के सहस्त्रों रूप और उनकी महिमा को सुंदर ढंग से उकेरा गया है। शिवलिंग सार्वभौमिक रूप से सृजन का प्रतीक है और “श्री महाकाल लोक” भारतीय सांस्कृतिक विरासत को साक्षात् प्रतिबिम्बित कर रहा है। यहाँ शिव का मृत्युंजय रूप भी है, जिसकी उपासना से मृत्यु को भी मात दी जा सकती है। यहाँ महादेव भी है जिसकी उपासना से हर ग्रह नियंत्रित रहता है।

    मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान स्वयं शिव भक्त है, वे सावन माह की शाही सवारी में कई वर्षों से शामिल होते रहे है। उनके कार्यकाल में वर्ष 2016 में उज्जैन में ऐतिहासिक सिंहस्थ सम्पन्न हुआ था। व्यवस्थाओं और संसाधनों की दृष्टि से इसे भारत का अब तक का सबसे सफलतम धार्मिक आयोजन माना जाता है। वे उज्जैन को धार्मिक पर्यटन नगरी के रूप में उभारने को लेकर प्रतिबद्ध रहे और इसी के दृष्टिगत सिंहस्थ के ठीक बाद वर्ष 2017 में “श्री महाकाल लोक” की योजना बनी। यह करोड़ों भारतीयों का सौभाग्य है कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी भी शिव भक्त है और उनके नेतृत्व में देश भर में आध्यात्मिक और धार्मिक स्थानों का निरंतर कायाकल्प हो रहा है। इस प्रकार प्रधानमंत्री की दूरदर्शिता तथा मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान की कार्यकुशलता से ही “श्री महाकाल लोक” का सपना साकार हो सका है।

    हम सभी जानते हैं कि महाकाल दर्शन का बड़ा धार्मिक महत्व है। इसे मोक्ष प्रदान करने वाला स्थल माना जाता है। स्कंदपुराण के अनुसार इसे मंगल ग्रह की उत्पत्ति का स्थान माना जाता है। उज्जैन का इतिहास अनादि काल से माना जाता है और राजनीतिक, आध्यात्मिक और साहित्यिक दृष्टि से भी इसे उत्कृष्ट स्थान माना जाता है। भारत की पौराणिक और धार्मिक महत्व की सात प्रसिद्ध पुरियों या नगरियों में उज्जैन प्रमुख स्थान रखता है बल्कि यहाँ साक्षात दैवीय शक्तियों का आज भी वास है। उज्जयिनी को विशाला, प्रतिकल्पा, कुमुदवती, स्वर्णश्रंगा और अमरावती के नाम से भी जाना जाता है तथा यहाँ स्थित महाकालेश्वर मंदिर भारत के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। पुराणों, महाभारत और कालिदास जैसे महाकवियों की रचनाओं में इस मंदिर का मनोहर वर्णन मिलता है।

    उज्जैन में “श्री महाकाल लोक” के निर्माण का फायदा न केवल शिव भक्तों को मिलेगा बल्कि रोजगार और पर्यटन की दृष्टि से भी यह फलदायी होगा। “श्री महाकाल लोक” में लाखों लोग एक साथ भ्रमण कर सकते हैं और रुकने की दृष्टि से भी इसे सर्व सुविधायुक्त बनाया गया है। अब शिव भक्त यहाँ महाकाल के दर्शन के लिए आएंगे भी और आराम से वे रुक भी सकेंगे। ऐसे में रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। उज्जैन के पास मंदसौर का प्रसिद्ध पशुपतिनाथ का मंदिर, मांडू और ओंकारेश्वर भी है। अत: मध्य प्रदेश में मालवा का यह सम्पूर्ण क्षेत्र धार्मिक कॉरिडोर के रूप में पहचान बनाने में निश्चित ही सफल होगा। मालवा के क्षेत्र को शांत और मौसम के लिहाज से उत्कृष्ट माना जाता है, अब “श्री महाकाल लोक” की लोकप्रियता और आकर्षण से इस क्षेत्र में नये-नये उद्योग भी बढ़ेंगे। बहरहाल उज्जैन में नवनिर्मित “श्री महाकाल लोक” भारत के धार्मिक और आध्यात्मिक स्थानों के लिए उत्कृष्ट उदाहरण बनने जा रहा है। सांस्कृतिक विरासत,रोजगार और पर्यटन के अदभुत केंद्र के रूप में दुनिया भर में अपना विशिष्ट स्थान बनाने में यह सफल होगा, इसकी स्वर्णिम संभावनाएं है।