Month: September 2022

  • पीएफआई पर प्रतिबंध पर्याप्त नहीं

    पीएफआई पर प्रतिबंध पर्याप्त नहीं


    पापुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) के ठिकानों पर राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण(एनआईए) के छापों ने देश में राजनैतिक रूप से गुमराह तबके की असलियत को उजागर कर दिया है। ये कड़वी सच्चाई है कि लगभग एक सौ तीस करोड़ की आबादी के विशाल हिंदुस्तान में बड़ा तबका आज भी मूलभूत जरूरतों के लिए जद्दोजहद कर रहा है। केन्द्रीय मंत्री और भाजपा के पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी ने भी स्वीकार किया है कि भारत धनवान देश है लेकिन यहां की जनता गरीब है, लोग बेरोजगारी और भुखमरी से जूझ रहे हैं। यहां आज भी जातिवाद, अस्पृश्यता और मंहगाई ने लोगों का जीवन दूभर कर रखा है। उनकी इस स्वीकारोक्ति के बावजूद ये भी सच्चाई है कि देश की अधिसंख्य आबादी अपना जीवनस्तर सुधारने की हरसंभव कोशिशें कर रही है। इसके विपरीत कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अपना जीवन संवारने के लिए आतंक से आधिपत्य का रास्ता चुनने का ख्वाब देख रहे हैं। इन पर प्रहार समय की मांग है। एनआईए और तमाम सुरक्षा एजेंसियों ने बड़ी कुशलता से पीएफआई के अड्डों पर छापों में और स्लीपर सेल से जुड़े लोगों को गिरफ्तार किया है। पीएफआई के सहयोगी संगठनों और राजनैतिक विंग सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी आफ इंडिया (एसडीपीआई) में भी सक्रिय लोगों की गिरफ्तारियां हुईं हैं। लंबी छानबीन के बाद सुरक्षा एजेंसियों ने जो तथ्य जुटाए हैं उनकी वजह से छापों की अहमियत बढ़ गई है। ये भी तय है कि सबूतों के आधार पर पकड़े गए लोगों की सजा अभी से मुकर्रर हो गई है। साक्ष्य इतने अकाट्य हैं कि आतंक और विद्रोह का जाल फैलाने वालों का शेष जीवन अब जेलों में ही कटेगा। इन तथ्यों की जानकारी अभी देश के लोगों को नहीं है यही वजह है कि एनआईए के छापों को लोग राजनीति से प्रेरित बता रहे हैं। न केवल मुसलमानों बल्कि उन्हें अपना वोट बैंक मानने वाले लालू प्रसाद यादव और मायावती जैसे नेताओं ने भी छापों पर नाराजगी जताना शुरु कर दिया है। मुस्लिम समुदाय के ज्यादातर व्यक्ति यही कहते सुने जा रहे हैं कि भाजपा और खासतौर पर आरएसएस के इशारे पर ये कार्रवाई अपने विरोधियों को कुचलने के लिए की गई है। जबकि हकीकत ये है कि विदेशों से करोड़ों रुपयों का धन गरीबों के कल्याण के नाम पर लाया जा रहा था और उसका इस्तेमाल आतंकी वारदातों को अंजाम देने के लिए किया जा रहा था। ये कहा जाता था कि अरब देशों की तेल समृद्धि का बड़ा हिस्सा जकात के नाम पर देश को मिलता है। धर्म के प्रचार प्रसार के लिए भी अरब देशों से जो धन आता है उससे गरीब मुस्लिम आबादी का कल्याण किया जा रहा है। ये बात ऊपरी तौर पर सही भी नजर आती है। देश भर में खुले मदरसों के माध्यम से जो धार्मिक शिक्षा दी जाती है उससे कई प्रतिभाशाली बच्चे भी सामने आते हैं लेकिन वे तो तब भी उभरते जब उन्हें देश के सरकारी स्कूलों में शिक्षा मिली होती। ईसाईयों ने भी शिक्षा में जो निवेश किया है उससे भी दुनिया के लिए अच्छे पेशेवर मिले हैं। इसका मतलब ये तो नहीं कि वे आतंक की नर्सरी भी बन गए। एनआईए को मदरसों और जकात की आड़ में आतंकियों को फंडिंग किए जाने के जितने स्पष्ट सबूत मिले हैं उससे साफ जाहिर होता है कि भारत जैसे विशाल बाजार पर अपना नियंत्रण स्थापित करने के लिए दुनिया की कई शक्तियां किस तरह देश को गृह युद्ध की ओर धकेल रहीं हैं। इस्लामिक स्टेट ऑफ़ इराक एंड सीरिया यानी आईएसआईएस जैसे आतंकी संगठन देश की तरुणाई को गुमराह करने के लिए क्या क्या हथकंडे अपना रहे हैं इसके भी सबूत एनआईए के हाथ लगे हैं। स्कूल, कालेजों के परिसरों में कैंपस फ्रंट आफ इंडिया( सीएफआई) और नेशनल वीमेंस फ्रंट( एनडब्ल्यूएफ) के माध्यम से कैसे बच्चों को साफ्ट टारगेट के रूप में गुमराह किया जाता है ये भी चिंताजनक है। यही वजह है कि सबूतों को देखते हुए मुस्लिम आबादी का बड़ा हिस्सा अपनी नाराजगी तो जता रहा है लेकिन उसने इस कार्रवाई में कोई व्यवधान नहीं डाला है। भारत के मुसलमान प्रगतिशील माने जाते हैं। यही वजह है कि दुनिया के आतंकी संगठन भारत के मुसलमानों पर भरोसा नहीं करते हैं। मुस्लिम आतंकियों के निशाने पर रहने वाले आरएसएस को भी भारत के मुसलमान अब तिरछी निगाह से नहीं देखते हैं। उन्हें ये तो पता है कि आरएसएस हिंदुत्व की विचारधारा का समर्थन करता है लेकिन वे ये भी जानते हैं कि हिंदुत्व की विचारधारा सर्वपंथ समभाव के घोषित विचार पर कार्य करती है। आरएसएस ने कभी मुस्लिम धर्म को न तो नकारा है न ही उस पर कोई प्रहार किया है। भारत में मुसलमान आज भी अपनी योग्यता के बल पर ऊंचाईयां छू सकता है। यही वजह है कि भारत में आतंक के पर फैलाने का प्रयास टांय टांय फिस्स हो गया है। अब सरकार को सोचना होगा कि आखिर वे क्या वजहें थीं जिसके चलते लोग भारत की साम्प्रदायिक एकता में सेंध लगाने की जुर्रत भी करते हैं। मोदी सरकार ने कई मूलभूत समस्याओं पर प्रहार किया है। इसके बावजूद सरकार के आंख,नाक, कान ,हाथ और पैर जिस तंत्र पर टिके हैं उनकी कार्यक्षमता लगभग शून्य है। मध्यप्रदेश के कृषि मंत्री कमल पटेल ने तो सार्वजनिक तौर पर कहा है कि हम दो लाख करोड़ की अर्थव्यवस्था में से साठ हजार करोड़ रुपए केवल तनख्वाह बांटते हैं इसके बावजूद सरकारी तंत्र जन समस्यायों के निराकरण की जवाबदारी नहीं निभा पा रहा है। सरकार ने जो हितग्राही मूलक योजनाएं बनाई हैं उनका लाभ भी जनता को नहीं मिल पा रहा है। लगभग अठारह साल से काम कर रही शिवराज सिंह चौहान सरकार अब तक इसी सरकारी तंत्र के सहारे अपने राजनैतिक उद्देश्य पाने का प्रयास करती रही है। उसके मंत्री विधायक और कार्यकर्ता बार बार चेताते रहे हैं कि सरकारी अफसर जनता की योजनाओं को लागू नहीं कर रहे हैं लेकिन इस तंत्र ने पार्टी के कार्यकर्ताओं और नेताओं को योजनाओं की रिश्वत देकर खामोश कर दिया। आज जब चुनाव की बेला आ रही है तब भाजपा के नेतागण अपनी अक्षमता और असफलता का ठीकरा अफसरशाही पर थोप रहे हैं। इससे जनता की समस्याओं का समाधान कैसे हो सकेगा। मोदी सरकार भी यदि यही शैली अपना ले तो जाहिर है कि जनता को अपनी जरूरतों के लिए अन्य साधनों की ओर रुख करना होगा। आतंकी साजिशों ने भारत की इसी कमजोरी का फायदा उठाने की चेष्ठा की है। इसका अर्थ ये भी हुआ कि सरकार भले ही अपनी सुरक्षा एजेंसियों के सहारे आतंक के साजिशकर्ताओं को पकड़कर जेलों में ठूंस दे लेकिन दहशत फैलाने की ये परंपरा बंद नहीं होगी। भारत की अर्थव्यवस्था में बड़ी हिस्सेदारी डॉलर के आयात पर निर्भर होती है। सरकार का प्रयास भी होता है कि किसी भी बहाने डॉलर देश में आते रहें । यही कारण है कि कल्याणकारी गतिविधियों के लिए विदेशों से धन लाने वालों को सरकार टैक्स में भी राहत देती है। अब यदि उस धन का इस्तेमाल आतंकियों गतिविधियों के लिए किया जाने लगे तो भारत की विकास प्रक्रिया षड़यंत्रों की भेंट चढ़ जाएगी। इसे रोकने के लिए एनआईए ने जो कार्रवाई की है उसका समर्थन किया जाना चाहिए। इसके साथ साथ ये भी जरूरी है कि सरकार पूरी पारदर्शिता से अपनी विकास प्रक्रियाएं चलाए जिससे असंतोष को जड़ें जमाने का अवसर न मिले। आरएसएस और भाजपा को अपने कार्यकर्ताओं का भी प्रशिक्षण इस तरह से करना चाहिए ताकि वे अपनी भड़काऊ बयानबाजियों से लोगों को विद्रोह का मार्ग अपनाने के लिए मजबूर न करें। पीएफआई पर प्रतिबंध पर्याप्त नहीं है इससे आगे बढ़कर हमें एक ऐसी विचारधारा का सूत्रपात करना होगा जो न केवल भारत बल्कि विश्व में भी मानवता के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करे।

  • फूट डालने के नए प्रयासों पर प्रहार जरूरी

    फूट डालने के नए प्रयासों पर प्रहार जरूरी


    खेतों में किसान जो बीज बोता है धरती उसे कई गुना बढ़ाकर लौटा देती है। बात जब जीवित इंसानों की हो तो ये फलन कल्पनातीत होता है। एक व्यक्ति का सकारात्मक विचार पूरी मानवता को ऊंचाईयों के नए धरातल तक पहुंचा देता है ।इसके विपरीत एक नकारात्मक विचार करोड़ों लोगों के लिए जीवन मृत्यु का सबब भी बन जाता है। ये जानते बूझते भी कई विचारधाराएं अभिमान की पूर्ति के लिए स्वयं को संशोधित करने को तैयार नहीं हैं। भारत में अप्रासंगिक हो चली कांग्रेस भी अपनी गलतियों से सबक लेने को तैयार नहीं है। उसके नेता और कार्यकर्ता सभी अपने इतिहास से चिपटे हुए हैं और पार्टी को रसातल में जाते देख रहे हैं। कई समझदार समाजसेवी तो वक्त पर जाग गए और वैकल्पिक उपकरणों की ओर चले गए पर जड़ सलाहकारों की वजह से आज भी ढेरों कांग्रेसी पुराने ढर्रे पर ही चलते जा रहे हैं। उन्हें ये सब करने की पूरी आजादी है पर समस्या ये है कि वे अपनी नकारात्मकता भरा वोट बैंक बढ़ाने के लिए कई चिरपरिचित उपायों का सहारा ले रहे हैं। देश के जनमत को संवारने का कोई बड़ा प्रकल्प न होने की वजह से वे अपने उद्देश्यों में थोड़े बहुत सफल भी होते दिख रहे हैं। इस नकारात्मक अभियान से देश की तरुणाई का बहुमूल्य वक्त जरूर बर्बाद हो रहा है।
    इसे समझने के लिए हमें इतिहास की कुछ घटनाओं का विश्लेषण करना होगा। श्रीलंका में एक सिंहली सिपाही ने परेड का निरीक्षण करते समय राजीव गांधी के सिर पर अपनी बंदूक के बट से प्रहार किया था । सिंहलियों को लगता था कि तमिलनाडू में तमिलों के वोट कबाड़ने के लिए भारत की कांग्रेसी सरकार लिट्टे को हथियार और पैसा देकर उनके देश में अशांति फैला रही है। लिबरेशन टाईगर्स आफ तमिल ईलम ने राजीव गांधी को केवल इसलिए बम से उड़ा दिया था क्योंकि उसका मानना था कि उन्होंने सिंहलियों और तमिलों के बीच जारी संघर्ष में तमिलों की पीठ में छुरा घोंपा है। श्रीमती इंदिरा गांधी को उनके अंगरक्षक ने इसलिए गोली मार दी थी क्योंकि सिखों को लगता था कि श्रीमती गांधी ने अपने पैदा किए भस्मासुर जनरैल सिंह भिंडरावाला की आड़ में सिखों की आस्थाओं के केन्द्र स्वर्ण मंदिर को नेस्तनाबूत किया था। आपरेशन ब्लूस्टार के घावों ने सिखों की आत्मा को छलनी कर दिया था। जब श्रीमती गांधी की हत्या उनके ही अंगरक्षक सिख ने कर दी तो देश भर में हजारों सिखों को घरों से निकालकर जिंदा जला दिया गया । इस तरह की प्रतिक्रियावादी घटनाओं से देश का इतिहास भरा पड़ा है। महात्मा गांधी को एक सिरफिरे नाथूराम गोडसे ने केवल इसलिए गोलियां मार दीं थीं क्योंकि उसे लगता था कि महात्मा गांधी भारत विभाजन और लाखों हिंदुओं के कत्लेआम के दोषी हैं।
    ऐसी ढेरों घटनाएं कांग्रेस की कार्यशैली के स्याह पक्ष को दस्तावेजी प्रमाण के साथ प्रस्तुत करती हैं। इसके बावजूद आज की सोनिया राहुल कांग्रेस 137 साल पहले बनी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के स्थापित उद्देश्यों का वारिस होने का ढोंग छोड़ने तैयार नहीं है। तब सर ए ओ ह्यूम ने तत्कालीन ब्रिटिश शासकों को जन आक्रोश से बचाने के लिए 72 भारतीयों का एक जत्था तैयार किया था जिसकी आड़ में वे अपनी काली करतूतों पर पर्दा डालने का काम करते थे। समय बीतते ये जत्था इतना सफल हुआ कि दि्वतीय विश्वयुद्ध के बाद जब अंग्रेज अपने नियंत्रण वाले देशों को आजादी देने लगे तो उन्हें अपनी बनाई कांग्रेस ही सबसे अनुकूल नजर आई। आज की कांग्रेस अंग्रेजों के प्रभाव से इसलिए मुक्त नहीं होना चाहती क्योंकि केरल के समुद्री तटों से पुर्तगाल ,जिब्राल्टर, स्पेन और फिर इंग्लैंड होते हुए पौंड खरीदने के बड़े मार्ग पर वो अपना नियंत्रण नहीं खोना चाहती। जाहिर है इसीलिए इन दिनों चल रही राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा कश्मीर से कन्याकुमारी नहीं बल्कि केरल से दिल्ली की ओर चल रही है।
    कांग्रेस के इस सत्ता अनुष्ठान की अघोषित प्रायोजक पीएफआई यानि पापुलर फ्रंट आफ इंडिया को बताया जा रहा है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानि एनआईए के छापों और प्रवर्तन निदेशालय की जांच में पाया गया है कि पीएफआई कई आतंकवादी गतिविधियों से भी जुड़ा है। प्रवर्तन निदेशालय यानि ईडी को अब तक की जांच में पीएफआई के खातों से लगभग साठ करोड़ रुपयों के गैर कानूनी लेनदेन के सबूत मिले हैं। खाड़ी देशों में काम करने वाले मजदूरों के खातों का इस्तेमाल करके भारत जो रकम बुलाई जाती थी उसका उपयोग आतंकवादी गतिविधियों और राजनीति में खुद को मजबूत बनाने के लिए किया जाता था। पीएफआई के विभिन्न कैडर इस राशि का इस्तेमाल करके युवाओं को बम बनाने का प्रशिक्षण देते थे और युवाओं को बरगलाकर उन्हें आईएसआईएस जैसे आतंकी संगठनों में भर्ती करवाते थे।अब इस तरह की अलगाववादी कार्यशैली को कथित संरक्षण देने वाली राहुल गांधी कांग्रेस यदि देश को जोड़ने का नारा दे रही है तो आसानी से समझा जा सकता है कि वह देश के कैसे लोगों को और क्यों जोड़ने का ख्वाब देख रही है।

    राष्ट्र संत श्री श्री रविशंकर जी ने श्रीलंका में भेदभाव के शिकार तमिलों और सत्ता पर इठलाते सिंहलियों के बीच सद्भाव कायम करने के लिए लगभग दस सालों तक जोखिम भरा अभियान चलाया था। उनके योग प्रशिक्षण कार्यक्रम द आर्ट आफ लिविंग को सिंहली सरकार और तमिलों दोनों का समर्थन मिलता था। श्रीलंका के तत्कालीन राष्ट्रपति महिंद्रा राजपक्षे ने सद्भाव कायम करने की पहल करते हुए अपने हैलीकाप्टर से श्री श्री रविशंकर जी को लिट्टे प्रमुख वेलुपिल्लई प्रभाकरन से चर्चा करने भेजा था। टूटा टाईगर पुस्तक के लेखक स्वामी विरुपाक्ष लिखते हैं कि हमारे प्रयास निष्पक्ष और पवित्र थे हम शांति की इबारत लिखने जा रहे थे। इसके विपरीत अशांति चाहने वालों ने लिट्टे के खुफिया विभाग को षड़यंत्र पूर्वक संदेश पहुंचाया कि जब प्रभाकरन गुरुदेव से मिलेगा, तब भारत उसकी लोकेशन मालूम कर लेगा और उस पर बमबारी करके श्रींलंका की मदद करेगा।इस तरह शांति वार्ता में खलल डालने का ये प्रयास भारत की तत्कालीन कांग्रेस सरकार के उन्हीं लोगों ने किया था जो नहीं चाहते थे कि श्रीलंका में कभी शांति स्थापित हो। कांग्रेस को लगता था कि समुद्री सीमाओं और अपेक्षाकृत मुक्त सोच की वजह से सोने की लंका बन गई तो भारत के विकास की तस्वीर धुंधली पड़ सकती है।
    कांग्रेस की तत्कालीन सरकारें सिंहलियों और तमिलों को आपसी झगड़े में उलझाने के लिए लिट्टे को गुपचुप हथियार और धन मुहैया कराती थीं वहीं वे सिंहलियों को भी कारोबार में मदद करती थीं। जब 1987 में राजीव गांधी ने भारतीय शांति सेना को श्रीलंका भेजा तो घोषित रूप से उसे दोनों समुदायों के बीच शांति स्थापित करनी थी लेकिन निर्देशों की घुटन के बीच भारत की सेना सिंहलियों की पैरवीकोर बन गई और गौरिल्ला युद्ध लड़ रहे तमिलों का संहार करने लगी। इससे नाराज लिट्टे ने भारतीय शांति सेना पर हमले शुरु कर दिए। नतीजतन भारत की सेना को लगभग बारह सौ जवानों की शहादत झेलनी पड़ी। 1990 में वीपीसिंह की सरकार ने शांति सेना के मिशन को असफल करार दिया और सेना को वापस बुला लिया। श्रीलंका की सरकार, लिट्टे और भारत के बीच हुई संधि की वजह से लिट्टे को अपने समर्पित सैनिकों की भारी क्षति उठानी पड़ी थी। तब लिट्टे की ओर से अलग राष्ट्र की मांग की जा रही थी और उसे वैश्विक समर्थन भी मिल रहा था। लिट्टे को लगता था कि यदि राजीव गांधी दुबारा सत्ता में लौट आएंगे तो वे उसके पृथक राष्ट्र के अभियान में बाधक बन सकते हैं। यही वजह थी कि लिट्टे ने 1991 में श्रीपेरंबुदूर में राजीव गांधी को आत्मघाती बम हमले से उडा दिया।
    राजीव गांधी की हत्या के बाद भले ही देश में कांग्रेस की सरकार आ गई थी लेकिन हत्या का षड़यंत्र उजागर हो जाने के बावजूद पार्टी ने दुबारा भारतीय सेना का इस्तेमाल नहीं किया। इधर श्रीमती सोनिया गांधी ने भी घोषित रूप से भले ही राजीव गांधी के हमलावरों को माफ करने की बात कही पर उनके चीनी सलाहकारों ने श्रीलंका में दखल शुरु कर दिया। चीनी हथियारों, प्रशिक्षण और गोलाबारूद के सहारे सिंहली सेना ने वर्ष 2009 में लिट्टे प्रमुख वी प्रभाकरन को घात लगाकर उड़ा दिया। तबसे श्रीलंका में चीन का जो सैन्य हस्तक्षेप शुरु हुआ वह आज भारत के लिए सामरिक दृष्टि से चुनौती बन गया है।
    समुदायों ,जातियों में फूट डालकर उन्हें लड़ाने और राज करने की नीति कांग्रेस ने अंग्रेजों से सीखी है। इस बार वह कथित तौर पर पीएफआई के माध्यम से भारत में तख्ता पलट की रणनीति पर काम कर रही थी। ये तो गनीमत है कि चौकन्ने भारतीय सुरक्षा तंत्र ने समय से पहले आतंक की आहट को महसूस कर लिया और भांडा फूट गया। भारत में मुसलमानों और हिंदुओं में फूट डालकर अंग्रेजों ने जो खाई खोदी थी उसे कांग्रेस की तुष्टिकरण की नीतियां अब तक सींचती रहीं हैं। हिंदू एकता को खंडित करने के लिए जाति के नाम पर आरक्षण की विषबेल भी भारत में अंग्रेजों के अघोषित हस्तक्षेप से पुष्पित और पल्लवित हुई है। बैलेंस शीट पर 2.66 लाख करोड़(ट्रिलियन डॉलर) के सकल घरेलू उत्पाद(जीडीपी) वाला भारत आज 13.6 लाख करोड़ के सकल घरेलू उत्पाद वाले चीन से बहुत पीछे है।जबकि चीन की विकास यात्रा भारत से दो साल बाद शुरु हुई थी। कांग्रेस की पीव्ही नरसिम्हाराव सरकार ने जो फैसले लिए उन्हें कांग्रेसी आज तक स्वीकार नहीं कर पाए हैं। जाति और धर्म के नाम पर लड़ाने की चालें भारत को लगातार नाकाम बनाती रहीं हैं। जाहिर है इस बार देश जागरूक है और सुरक्षा एजेंसियों की कार्रवाई को देशव्यापी जनसमर्थन मिल रहा है। फूट डालने के इन प्रयासों पर प्रहार समय की मांग भी है। एकजुट होते आतंक का अंत करने के लिए देश पहले से ही हाथों में हाथ डालकर साथ खड़ा है।

  • अफसरशाही की गर्राहट

    अफसरशाही की गर्राहट


    आदिवासियों को कुत्ता कहकर उनकी औकात बताने वाले एसपी अरविंद तिवारी को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने हड़बड़ाहट में हटा दिया है। झाबुआ के कलेक्टर सोमेश मिश्रा को भी हटाया गया है। उन पर आरोप था कि वे सरकारी योजनाओं की डिलीवरी नहीं कर पा रहे थे। पिछले विधानसभा चुनावों में आदिवासियों की नाराजगी से भाजपा अपनी सरकार खोने का दंश झेल चुकी है। इस बार भी भाजपा चिंतित है। यदि आदिवासियों के आक्रोश को न थामा गया तो उसे इस बार भी सरकार बनाना कठिन हो जाएगा। आदिवासी ही नहीं भाजपा के सबसे बड़े जनाधार पिछड़ा वर्ग की बेचैनी भी भाजपा के लिए चिंता का सबब बनी हुई है। पिछले चुनाव में ब्राह्रण मतदाताओं ने जिस तरह अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए भाजपा से विद्रोह किया वह भी भाजपा के लिए भय की एक वजह बनी हुई है। यही कारण था कि भाजपा ने ब्राह्मण अफसरों ,नेताओं और ठेकेदारों को भरपूर लूट की छूट दी। अब भाजपा इस मुहाने पर आ गई है जहां सभी तबके उसे ब्लैकमेल कर रहे हैं। कमलनाथ कांग्रेस विद्रोह की इस खेती को करने में पूरी शिद्दत से जुटी हुई है।हालत ये है कि कमलनाथ राहुल गांधी की पदयात्रा और विधानसभा जैसे मौकों में भी उलझने से बच रहे हैं। भाजपा की स्थिति भई गति सांप छछूंदर जैसी हो गई है। तमाम हितग्राही मूलक योजनाएं बनाने और कांग्रेस से जनता की सहज नफरत के बावजूद भाजपा को चुनावी दौड़ में हांफी आ रही है।मध्यप्रदेश के शासकों की अकुशलता इसकी सबसे बड़ी वजह रही है।शिवराज सरकार को लगभग अठारह साल काम करने का मौका मिला। अथाह बहुमत ने उन्हें भरपूर आजादी दी। इसके बावजूद उनकी सरकार अब तक जनता की कसौटी पर खरी नहीं उतर पाई है। दिग्विजय सिंह की भ्रष्ट सरकार 2003 में सत्ताच्युत हुई थी। उन्होंने पंचायती राज के माध्यम से सत्ता के समानांतर तंत्र खड़ा करने का असफल प्रयास किया था। वह प्रयास बुरी तरह औंधे मुंह गिरा। इसकी पृष्ठभूमि में पंचायतों और प्रतिनिधियों का भ्रष्टाचार प्रमुख वजह रही थी। अफसरशाही को उन्होंने जिस तरह गली का कुत्ता बनाया उससे अफसरशाही ने भाजपा के प्रतिनिधि बनकर उमा भारती की सरकार को रिकार्डतोड़ सफलता दिलाई थी। उमा भारती ने तो अफसरशाही को उत्पादकता के लिए कसा लेकिन उनके बाद बाबूलाल गौर और फिर शिवराज दोनों ने अफसरशाही के इस अहसानों के बदले में सत्ता की बागडोर उसे ही थमा दी। शुरु से भाजपा के नेता और मंत्री बोलते रहे हैं कि अफसर उनकी नहीं सुनते। वे जो प्रस्ताव अफसरों के पास बनाकर देते हैं उन्हें वे रद्दी की टोकरी में फेंक देते हैं। भाजपा के नेताओं का ये दर्द सही था और आज भी बरकरार है। अफसरशाही ने शिवराज के कार्यकाल में जो मलाई कूटी है उसे अफसरों पर पड़े छापों और रंगे हाथों पकड़े गए अफसरों की संख्या देखकर आसानी से समझा जा सकता है। भाजपा ने खुद अफसरशाही की गोदी में बैठकर हितग्राही मूलक योजनाओं का भरपूर लाभ उठाया है। अपने कार्यकर्ताओं को दोनों हाथों में लड्डू थमाए। संघ के नाम पर तो चिरकुटों तक ने सरकारी खजाने को मनचाहे ढंग से उलीचा। अफसरशाही और भाजपा की इस लूट में जनता उपेक्षित होती रही। यदा कदा जनता के बीच भी योजनाओं का लाभ पहुंचा जिससे असंतोष अब तक हिंसक विद्रोह का रूप नहीं ले सका है।लोगों को अब भी लगता है कि शायद कभी उनकी भी लाटरी लग जाए, जो अब संभव नहीं है। कमलनाथ इसी असंतोष को उभारने का जतन कर रहे हैं। दिल्ली के बाद पंजाब में आप पार्टी ने भाजपा की धन बटोरने वाली शैली को मुफ्त बिजली के वादे से धराशायी किया है। राहुल गांधी भी अपनी यात्रा में भाजपा को अडानी अंबानी की सरकार कह रहे हैं।कांग्रेस वैसे भी पूंजीपतियों को शैतान बताकर उन पर कंकर फेंककर तालियां बजवाती रही है। कांग्रेस का ये पुराना तरीका उसे एक बार फिर जीवन दे रहा है। भाजपा के नेतागण असहाय हैं वे अपने लिए धन जुटाने वाले अफसरों उद्योगपतियों और ठेकेदारों पर आखिर कैसे प्रहार कर सकते हैं। झाबुआ के कलेक्टर एसपी को हटाकर शिवराज सिंह ने आदिवासियों को खुश करने का फौरी प्रयास किया है। भाजपा के मुख्यमंत्री जिनमें शिवराज सिंह चौहान सबसे अव्वल हैं वे चोरी छिपे मोदी सरकार की नीतियों को जन असंतोष की वजह बताते रहे हैं। ये बात बहुत हद तक सही भी है। मोदी सरकार ने टैक्स वसूलने और सब्सिडी बंद करने में जो तेजी दिखाई है उससे जनता में असंतोष फैला है। इसके बावजूद शिवराज सिंह चौहान और अन्य राज्यों की सरकारें जनता को इन बदली परिस्थितियों के बीच जिंदा रहने की कला नहीं सिखा पाई हैं। कांग्रेस की मुफ्तखोरी वाली राजनीति को बंद कभी न कभी तो होना ही था लेकिन भाजपा ने अधूरे प्रहार किए हैं। वह न तो मुफ्तखोरी की नीतियां पूरी तरह बंद कर पाई है और न ही जनता को धन बनाने की कला सिखा पाई है। जाहिर है इससे असंतोष बढ़ रहा है। उस पर झाबुआ एसपी अरविंद तिवारी की नशे में धुत्त बदतमीजी और प्रशासनिक अकुशलता की वजह से कलेक्टर सोमेश मिश्र ने आदिवासियों के असंतोष को हवा दे दी है। जाहिर है मुख्यमंत्री ने मजबूरी में उन्हें हटाया है। सोमेश मिश्र ने कलेक्टरी से पहले आयुष्मान मिशन के सीईओ की जवाबदारी संभाली थी। कलेक्टरी भी उन्हें इनाम के तौर पर मिली थी। जब भाजपा की शिवराज सरकार अफसरों की मैदानी पोस्टिंग उपकृत करने के अंदाज में करती रही है तो फिर अफसर मैदान में जाकर अपना करिश्मा आखिर क्यों न दिखाएंगे। जाहिर है मध्यप्रदेश में भाजपा की सरकार को अपने किए कर्मों का फल मिलना शुरु हो गया है। भाजपा की अकुशलता कांग्रेस के लिए भाग्य से छींका टूटने वाली साबित हो रही है। पिछले चुनाव में भी कांग्रेस के भाग्य से छींका टूटा था उसने सत्ता में आकर यही लूट का दौर चलाया था। अब यदि जनता भाजपा से नाराज होती है तो उसे एक बार फिर कमलनाथ जैसा नागनाथ सौगात में मिलेगा।अफसरशाही तो मदमस्त है ही।

  • गायों को लंपी से बचाने में मिथिलीन ब्लू दवाई कारगर

    गायों को लंपी से बचाने में मिथिलीन ब्लू दवाई कारगर

    प्रभावी एंटीवायरल ड्रग  मिथिलीन ब्लू भारत सरकार के एल एस डी (लंपी) ट्रीटमेंट गाइडलाइन में शामिल

    वर्ष 1907 में  एम बी के सिंथेटिक  स्वरूप के आविष्कारक सर पौल  एलरिच को  एम बी के आविष्कार के लिए नोबल पुरस्कार दिया गया था.

    एम बी आय बी , ओरल , टॉपिकल सभी प्रकार से गोवंश के एल एस डी में   प्रभावी

    स्वास्थ्य गोवंश  के  एल एस डी से बचाव के लिए प्रोफिलेक्टिक डोज वायरस से बचाव में प्रभावी

    एमबी   टीम के ग्रामीण कार्यकर्ताओं ने 50000 गो वंश को 1 लाख लीटर एम बी वितरित की

    भारत के नागरिकों से वेटनरी डाक्टरों को एम बी दवाई दान में देने जी अपील की

     एम बी  टीम में राजस्थान यूपी गुजरात महाराष्ट्र हिमाचल के डॉक्टर और गौपालक शामिल

      भोपाल 19 सितंबर (प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। कुख्यात लंपी रोग से हो रही गौवंश की मौतों के बीच राजधानी की सामाजिक कार्यकर्ता सुश्री साधना कार्णिक प्रधान ने इन दिनों व्यापक अभियान चलाया है। वे (लंपी रोग)  एल एस डी के लिए एम बी   टीम की राष्ट्रीय संयोजक भी हैं।  एल एस डी के लिए टीम एम बी के डॉक्टर जगदीप काकड़िया डॉक्टर  दीपक गोलवलकर अश्विन पटेल तथा राजस्थान के वेट  डाक्टरों व गौपालकों की टीम के साथ उनके कठिन प्रयास के बाद केंद्र सरकार ने  लंपी वायरस के लिए जारी मेडिकल ट्रीटमेंट गाइडलाइन में  मीथेलीन ब्लू  (एम बी) नामक एंटीवायरल दवा को   शामिल कर लिया है। एम बी  टीम  वेट डाक्टरों के साथ राजस्थान के कुछ जिलों में एम बी ट्रीटमेंट  के एल एस डी पर प्रभाव का अध्ययन कर  डाक्टरों को इलाज हेतु एम बी डोनेट भी करा रही है

    राजधानी भोपाल की सामाजिक कार्यकर्ता सुश्री साधना कार्णिक प्रधान, संयोजक,राष्ट्रीय एम बी टीम,
    मोबाइल 9425008021, sadhnakarnik@gmail.com, sadhna_karnik@yahoo.co.in

     सुश्री साधना कार्णिक प्रधान ने बताया कि एम बी टीम  ने  केंद्र सरकार मांग की है कि पिछले 2 वर्ष से भारत के अनेक राज्यो में फैली लपी स्किन डिजीज ( एल एस डी) को राष्ट्रीय महामारी घोषित किया जाए। इसके साथ ही भारत भर के अस्पतालो में गौवंश को एल एस डी का फ्री इलाज दिया जाए. उन्होंने बताया कि मिथेलीन ब्लू  एम बी   एक एंटी वायरल एंटी बायोटिक एंटीफंगल एंटी ऑक्सिडेंट एंटी इन्फ्लेमेटरी आदि     बहुउपयोगी दवा है जिसका उपयोग पिछले 40 वर्षी से  विभिन्न प्रकार के वायरस  के इलाज में गुजरात के डॉक्टर दीपक गोलवलकर करते आ रहे है

     एम बी टीम की संयोजक साधना कर्णीक प्रधान ने  बताया कि एल एस डी पर केंद्र सरकार की राष्ट्रीय ट्रीटमेंट गाइडलाइन में आने के बावजूद आज तक  देश की किसी  भी राज्य सरकार ने एल एस डी  महामारी से  पीड़ित तड़पते गोवंश  के इलाज के लिए एम बी  दवाई या ड्रग अभी तक डाक्टरों को उपलब्ध नहीं कराई है.जबकि एम बी इलाज  के एक  कोर्स से एक गाय का 5 दिन के इलाज खर्च मात्र 25 रुपए मासिक खर्च केवल  150 रुपए है

    टीम के विशेषज्ञों ने  बताया कि एम बी  बॉडी का चार्जर है एवम् वायरस के संक्रमण को समाप्त करती है। मजिक बुलेट्स यानी एम बी बॉडी का चार्जर है. यह शरीर के केवल टैरोरिस्ट ( आतंकवादी) सेल्स को  इलेक्ट्रॉन बंबार्डमेंट  से नष्ट करती है. जबकि शरीर की  स्वस्थ्य कोशिकाओं को एक्स्ट्रा इलेक्ट्रॉन की शक्ति प्रदान करती है. ब्रेन को भी चार्ज करती है.एम बी का कोई मेटाबॉलिज्म नहीं है यह  6 घंटे में शरीर से  पेशाब के द्वारा निकल जाती है.

    वर्तमान में लैब में प्रयुक्त किया जाने वाली मिथाईलीन ब्लू से पशुओं का इलाज चल रहा है.

    वर्तमान में एम बी  केवल दान दाताओं के माध्यम से डाक्टरों को उपलब्ध हो रही है।  उनकी  एम बी   टीम की ओएम बी की ओर से एम बी केवल  दानदाताओं के माध्यम से कई राज्यों  राजस्थान ,  जम्मू  , हिमाचल ,  महाराष्ट्र छत्तीसगढ़  के वेट डाक्टरों को एल एस डी के इलाज के लिए उपलब्ध कराई  जा रही है. जिसकी मात्रा बहुत कम है.सरकारी खरीद में अब तक इस दवाई को शामिल नहीं किया गया है।

    दुनिया भर के रिसर्च परिणाम के अनुसार

    एम बी आय बी एवम् ओरल डोज मात्रा

    एम बी आय वी डोज मात्रा……

     एम बी आय वी ( 8  से 15 एम जी/ केजी बॉडी वेट)

    धीमी आय वी  बोलस ( bolus)1% इंजेक्शन सीधे दिए जा सकते है  या 500 एम एल नॉर्मल सलाइन  के द्वारा ड्रीप के द्वारा

     ऊपरी उच्चतम डोज  ( 12 घंटे में )15 एम जी / केजी बॉडी वेट है

    एम बी ओरल डोज मात्रा……

    3 एम जी / के जी बॉडी वेट दिन में तीन बार ( प्रति 8 घंटे में)  कम से कम की मात्रा

    दुनियाभर की रिसर्च के अनुसार 8 से 15 एम जी /केजी बॉडी वेट

    उच्चतम सुरक्षित डोज 4500 एम एल.12 घंटे में

    टीम एम बी की द्वारा एल एस डी पर   एम बी ट्रीटमेंट के अध्ययन का प्रभाव……..

    साधना कर्णिक ने पत्रकारों से बातचीत में   बताया कि  उनकी एम बी टीम ने राजस्थान में  गंभीर रूप से लंपी पीड़ित जालोर व सचौर में  ग्रामीणों  व वेट डाक्टरों  के साथ  मिलकर करीब  2500 लंपी पीड़ित   पशुओं पर  मिथेलिन ब्लू  के 0.1% घनत्व के घोल  पर प्रयोग किया. जिसमे  से 500 गोवंश   अती गंभीर बीमार गम्भीर बीमार और  कम बीमार कैटेगरी के थे. जबकि  2000 से ज्यादा  स्वास्थ्य गोवंश को सावधानी के तौर  वायरस से बचाव हेतु सुरक्षात्मक डोज दिया गया. विभिन्न कैटेगरी में गोवंश की बीमारी की गंभीरता के आधार पर उनको डोज की मात्रा  दी गई. परिणाम के अनुसार एम बी ट्रीटमेंट से गंभीर रूप से प्रभावित  पीड़ित  पशुओं  पर यह इलाज  75% सफल रहा  कम प्रभावित पशुओं पर एम बी ट्रीटमेंट 85%प्रभावी रहा  अति गंभीर रूप से  बीमार पशुओं पर  एम बी ट्रीटमेंट  50% सफल रहा.  स्वस्थ्य पशु को एम बी ट्रीटमेंट  का डोज सावधानी के त्तौर पर देने के कारण उनका वायरस से  90% बचाव हुआ. वायरस से गौवंश  त्वचा पर होने वाले घावों पर भी एमबी ट्रीटमेंट 80 फीसदी प्रभावी पाया गया है। यह भी पाया गया कि एंटी बैक्टिरियल प्रभाव होने के कारण एम बी का  1% घनत्व का  इंजेक्शन  सबकट एल एस डी पीड़ित गायो के  स्किन  घावों को भरने की भी बहुत प्रभावी है .एम बी 1% से 2% घनत्व का  घोल भी एम बी के घाव भरने में  प्रभावी है.

    भावनगर में  डॉक्टर काकड़िया द्वारा अध्ययन…..

    डॉक्टर काकड़िया ने गुजरात भाव नगर में सामाजिक कार्यकर्ता अश्विन पटेल के साथ मिलकर 35 लंपी पीड़ित गायो पर एम बी के प्रभाव का  ट्रायल किया  जिसमे  एम बी ट्रीटमेंट देने के बाद प्रभावित गोवंश का तपमान 5 दिन मे 106 डिग्री से 101 डिग्री तक काम हुआ

    पॉक्स वायरस पर एम बी के प्रभाव का दुनिया भर मै रिसर्च. परिणाम……….

    एल एस डी  केप्री पॉक्स वेरायटी का वायरस है

    एम बी को  वर्ष 2006 में  पॉक्स वायरस ( लैंपी जैसा वायरस) के लिए पेटेंट भी  किया गया है

    अमेरिकी आविष्कारक क्रिस्टोफर वुल्फ और नेगी हेबिक ने 2006 में अपनी कंपनी बायो  एन  वीजन एंकॉर्पोरीशन के माध्यम से अपने एम बी से पॉक्स वायरस के इलाज का  आविष्कार का पेटेंट कराया कि एमबी पॉक्स वायरस पर काम करता है.

    संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन  FAO  एफएओ जो संयुक्त राष्ट्र का एक हिस्सा है और पशुपालन पर WHO की तरह काम करता है उसने 1988 से प्रकाशित अपनी वेबसाइट पर बताया  कि  पशुओं को को उनकी आनुवंशिक बीमारी में MB  जीवन भर   IV खुराक में दिया जा सकता है.

    सभी  सरकारें पशुओं के इलाज के लिए एमबी दवाई को तत्काल उपलब्ध कराए…….

    साधना कार्णिक ने देश के सभी राज्यो से गोवंश को बचाने के लिए एम बी को  इमरजेंसी स्तर पर तत्काल खरीदकर देश के सभी डाक्टरों को उपलब्ध कराने की मांग की है.

     देश  के नागरिकों से  अपने राज्य में एम बी सेंटर बनाकर एम बी देने की अपील…..

     साधना कार्णिक ने विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा एम बी उपलब्ध कराने  तक देशवासियों से इसे अपने  राज्य व जिलों  में एम बी सेंटर बनाकर वेट डाक्टरों को तड़पती हुई बेजुबान गायो  का प्रभावी इलाज करने के लिए लैब ग्रेड एम बी  पाउडर दन करने की अपील की है.

    एम बी का संक्षिप्त इतिहास…….

    एम बी याने नीली दवा मिथेलीन ब्लू
    यह एक सैकड़ों साल पुरानी दवा है जो आयुर्वेद में बुखार इंफेक्शन के लिए भारत सहित कई एशिया के कई देशों में इस्तेमाल की जाती थी
    यह नील के पौधों के रस से बनाई जाती थी.परन्तु इस खेती से जमीन बंजर हो जाती है इसलिए गांधी जी अंग्रेजो के समय नील।आंदोलन किया. तब अंग्रेजो ने इसका सिथेंटिक रूप एम बी बनाया.
    लम्पी वायरस पर एमबी अनुसंधान का विश्वव्यापी शोध
    विभिन्न शोध प्रकाशनों से यह पाया गया है उसका संक्षिप्त में शोध परिणाम
    एम बी पॉक्स वायरस पर काम करता है
    एम बी गायो मवेशियों और कुत्तों पर भी काम करता है
    एम बी गायो मवेशियों कुत्तों को जीवन भर दिया जा सकता है
    एम बी आय वी सीधे खून में नस द्वारा भी दिया जा सकता है
    8 से 15 मिलीग्राम प्रति किलो शरीर का वजन मवेशियों में एमबी की सुरक्षित मात्रा है
    गायो मवेशियों कुत्तों पर एम बी के इलाज का को विवरण गूगल पर मिला
    क्या एमबी पॉक्स वायरस पर काम कर सकता है?
    इस सवाल का जवाब सेंटर ऑफ डिजीज कंट्रोल अमेरिका की रिसर्च हेड सुश्री ललिता प्रियंवदा ने दिया है
    उनके शोध के अनुसार। प्रकाशित पत्रिका में उन्होंने कहा है कि एमबी पॉक्स वायरस पर काम करता है
    क्या गायों में एमबी का इलाज काम करता है ?
    इस प्रश्न का उत्तर आविष्कारक क्रिस्टोफर वुल्फ और नेगी हेबिक ने 2006 में दिया था
    2006 में अपनी कंपनी बायो एन वीजन एंकॉर्पोरीशन के माध्यम से इन दो आविष्कारकों ने अपने आविष्कार का पेटेंट कराया कि एमबी पॉक्स वायरस पर काम करता है
    तो ये दो अमेरिकी आविष्कारक 16 साल पहले जानते थे कि एमबी पॉक्स वायरस पर काम कर सकता है
    क्या एमबी जानवरों पर काम कर सकता है?
    47 सेकेंड में गूगल करने पर करीब 30 लाख 30 हजार रिसर्च रेफ पेपर्स और पब्लिकेशन दिखा रहे हैं जो कहते हैं कि एमबी गायो जानवरों कुत्तों में काम कर सकता है ?
    क्या जानवरों को गायों को IV MB लंबी अवधि दी जा सकती है?
    क्या एम बी गायो मवेशियों में यूरिया खाद के कारण हुई नाइट्रेट पॉयजन में काम करता है
    संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन FAO एफएओ जो संयुक्त राष्ट्र का एक हिस्सा है और पशुपालन पर WHO की तरह काम करता है
    1988 से प्रकाशित अपनी वेबसाइट पर बताया
    कि कुत्तों को उनकी आनुवंशिक Mythhemenoglobimia में MB की जीवन भर LIFELONG की IV खुराक दी जा सकती है
    जिसके बिना कुत्ते जीवित नहीं रह सकते.
    तो यह स्पष्ट करता है कि आवश्यकता पड़ने पर पशुओं या गायों में IV MB जीवनभर दिया जा सकता है
    क्या गायों में एमबी दी जा सकती है ?
    गूगल पर 1 लाख 59 हजार शोध प्रकाशन हैं कि गायों में नाइट्रेट विषाक्तता जो यूरिया खाद पत्तो घास के द्वारा गायो के पेट में जाने से हो सकता है में एमबी प्रभावी है
    एमबी के लिए सुझाई गई सुरक्षित खुराक 8 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम शरीर के वजन है
    क्या मवेशियों को एमबी दी जा सकती है ?
    अमेरिका में न्यू मैक्सिको स्टेट यूनिवर्सिटी कृषि विभाग अनुसंधान प्रकाशन का कहना है कि मवेशियों में नाइट्रेट विषाक्तता में
    2 से 4% एमबी 4 से 5 मिलीग्राम प्रति किलो मवेशियों के शरीर के वजन के हिसाब से दिया जा सकता है
    गायों मवेशियों में एम बी की सुरक्षित मात्रा
    सभी शोध कहते हैं कि 8 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम शरीर का वजन सुरक्षित है
    मवेशियों के लिए मर्क कंपनी का मानक औषध पशु चिकित्सा मैनुअल (एमएसडी)
    गायों और पशुधन की नाइट्रेट विषाक्तता
    एमबी नाइट्रेट विषाक्तता को कम करने वाला एजेंट है और मेथेमोग्लोबिन को हीमोग्लोबिन में बदल देता है जिससे गायो के शरीर में ऑक्सीजन की आपूर्ति बहाल हो जाती है
    धीमी गति से IV 1 to2% MB
    4 से 15 मिली प्रति किलो बॉडीवेट एमबी डोज की ऊपरी सुरक्षित सीमा है
    यह एक पुख्ता सबूत है कि एमबी बड़ी खुराक में गायों और मवेशियों को दिया जा सकता है
    एम बी जीवनभर देने के लिए सुरक्षित डोज है
    दुनिया भर में विभिन्न शोधों और प्रकाशनों के अनुसार
    15 एमएल प्रति किलो शरीर का वजन
    एक 300 से 500 किलो गाय में 24 घंटे में 4500 एमएल ऊपरी सुरक्षित सीमा है
    वजन के हिसाब से बछड़े को आधा या कम डोज दिया जा सकता है

  • नई अर्थव्यवस्था के लिए तय हो पुलिस की भूमिका

    नई अर्थव्यवस्था के लिए तय हो पुलिस की भूमिका



    मध्यप्रदेश, हिंदुस्तान के उन गिने चुने राज्यों में शामिल है जिन्होंने पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू करके भारतीय पुलिस अधिनियम 1861 के प्रावधानों को आज के संदर्भों में नया रूप देने का प्रयास किया है।केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह कहते रहे हैं कि आज हमें डंडे वाली नहीं बल्कि नॉलेज बेस्ड टेक्नोसेवी पुलिस की जरूरत है। अंग्रेजों ने 1857 की क्रांति को कुचलने के बाद जो पुलिस अधिनियम लागू किया था उसका मकसद आजादी की ललक को कुचलना था। आज की पुलिस के सामने अपराध नियंत्रण के साथ साथ देश के उद्यमियों को सुरक्षा प्रदान करने का भी लक्ष्य है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश के सामने 2024 तक पांच ट्रिलियन डॉलर(350 लाख करोड़ रुपए) की अर्थव्यवस्था बनाने का स्वप्न प्रस्तुत किया है। इसे साकार करने के लिए पुलिस की भूमिका को भी नए सिरे से परिभाषित किया जाना जरूरी है। ये पुलिस जाति, धर्म, संप्रदाय के आधार पर मुरौव्वत करने वाली नहीं बल्कि फोरेंसिक साईंस की कसौटी पर साईबर अपराधों को भी नियंत्रित करने वाली भी बनाई जा रही है।क्योंकि अर्थव्यवस्था उद्यमियों के हाथ हो चोरों के हाथ नहीं ये प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।
    मध्यप्रदेश के गृहमंत्री डॉ.नरोत्तम मिश्रा कहते हैं कि जिस तरह सरदार वल्लभ भाई पटेल ने रियासतों के एकीकरण से देश को अखंड भारत बनाने का भगीरथ किया था उसी तरह केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह पुलिस की भूमिका सार्थक बनाने का जतन कर रहे हैं। ये पुलिस अब ऐसे व्यक्तियों का निकाय बनती जा रही है जो कानूनों को लागू करने , संपत्तियों की रक्षा करने, संगठित अपराध पर अंकुश लगाने के साथ साथ देश के दीर्घ लक्ष्यों का भी समर्थन कर रही है। भोपाल और इंदौर में पुलिस कमिश्नर प्रणाली से पुलिस के जिम्मेदारी भरे बर्ताव की तस्वीर उभर रही है। अब पुलिस ऐसे सभी अपराधियों पर निगाह रख रही है जो समाज, धर्म या राजनीति की आड़ में आपराधिक गतिविधियों को अंजाम देते रहे हैं। सबसे बड़ी बात तो ये है कि ये निगरानी बाकायदा फोरेंसिक साक्ष्यों के आधार पर की जा रही है। पुलिस के कर्मठ सेवक जो जानकारियां जुटाते हैं उनसे अदालत में अपराध के तरीके को तफसील से प्रस्तुत करना संभव हो गया है। पुलिस के जुटाए साक्ष्य अपराधी को दंड की देहरी तक ले जा रहे हैं। ये संतोष की बात है।
    भारतीय साक्ष्य अधिनियम ने तथ्यों को संकलित करने और उसके आधार पर आरोपी का अपराध साबित करने की विधि हमें दी थी। अब तक पुलिस इसी अधिनियम के दायरे में अपराध को प्रमाणित करने का काम करती रही है। अब बढ़ते साईबर क्राईम ने पुलिस का काम बढ़ा दिया है। अब पुलिस को टेक्नोसेवी होना जरूरी है।अपराधी अब किसी दूसरे देश में बैठकर भी अपराध कारित कर देता है। प्रशिक्षण से पुलिस बल को शिक्षित करने का भरपूर प्रयास किया गया है लेकिन इसके बावजूद पुलिस बल की कार्यक्षमता में क्रांतिकारी बदलाव नहीं आया है। जो पुलिस कर्मी लंबे समय से पुलिस बल में काम कर रहे हैं उनके लिए आज अपराध की विवेचना दुरूह कार्य नजर आता है। पुलिस कर्मियों के चयन के मापदंड भी कुछ ऐसे रहे हैं जिनमें खिलाड़ी, पहलवान और तकनीकी पढ़ाई से विमुख कर्मचारियों की भरती की जाती रही है। यही वजह है कि पुलिस में दो तरह के कर्मचारी हैं। कुछ कंप्यूटर कक्ष में बैठकर कार्य कर रहे हैं तो कुछ को मैदानी दौड़ भाग में लगाया गया है। इनके बीच काम के असंतुलन को लेकर तकरार भी चलती रहती है। साथ में महिला पुलिस कर्मियों की बढ़ती संख्या ने भी पुलिस की कार्यप्रणाली में कई बदलाव किए हैं।
    इन सबके बावजूद पुलिस का चरित्र अभी नहीं बदला है। जब तक उच्च स्तर से अपने बल को बार बार संदेश नहीं दिया जाता कि उनकी भूमिका ठसके वाली थानेदारी करने की नहीं बल्कि ज्ञान आधारित शक्तिप्रदर्शन की हो गई है तब तक पुलिस को नवजीवन नहीं मिल सकता। कहा जाता है कि ज्ञान शेरनी के दूध की तरह होता है जो पिएगा वह दहाड़ेगा। इस सूत्रवाक्य को अपराधियों ने ज्यादा तेजी से अपनाया है। तकनीकों की आड़ लेकर वे तरह तरह के अपराध कर रहे हैं और पुलिस की निगाह से भी बचते रहते हैं। किसी चोरी की घटना में जब फरियादी पुलिस थाने पहुंचता है तो पुलिस का बर्ताव टालने वाला होता है। पुलिस वाले चाहते हैं कि फरियादी ही जांच करे, हमें साक्ष्य लाकर दे, साथ में सेवाशुल्क भी दे तब हम मुकदमा दर्ज करेंगे। हम अपने रजिस्टर में मुकदमों की संख्या क्यों बढ़ाएं।जबकि इन मुकदमों का खर्च सरकार स्वयं उठाती है। पुलिस का प्रयास रहता है कि मामले को दीवानी बताकर व्यक्ति को अदालत की ओर ठेल दे। क्षेत्राधिकार की पुरानी कहानी तो आज भी जस की तस है। अब यदि अपराधी की धरपकड़ किसी नागरिक को स्वयं करनी है तो फिर पुलिस की जरूरत क्या है। क्यों पुलिस वालों के लिए आवास, बजट और भरती की मांग की जाती है। आपराधिक मामले भी यदि व्यक्ति को स्वयं निपटाना है तो फिर बिहार की तरह निजी सेनाएं या बाऊंसर रखने की परिपाटी शुरु हो ही जाएगी।
    आज पुलिस बल के कई काम आऊटसोर्स किए जा रहे हैं। निर्माण, यातायात और अभियोजन के लिए वैसे भी पुलिस निजी एजेंसियों पर निर्भर रही है। क्या अब समय नहीं आ गया है कि जब राज्य की ओर से निजी एजेंसियों को भी पुलिस की तरह अधिकार दिए जाएं ताकि वे अनुसंधान करके अपराध नियंत्रण का काम संभाल सकें। जब पुलिस अपना दायित्व न निभा सके तो क्यों न इस विकल्प पर भी गौर किया जाए। अब यदि कोई किसान खेती करके अनाज का उत्पादन कर रहा है। मजदूरों को वेतन बांट रहा है। सरकारी मंडियों में शुल्क चुका रहा है। साबुन से लेकर खाद, कीटनाशक बीज ,वाहन आदि सभी पर टैक्स चुका रहा है। नगरीय या ग्रामीण निकायों का टैक्स भर रहा है और वो चोरी की शिकायत लेकर पुलिस के पास जाए तो पुलिस उससे कहे कि वह तो बड़ा आदमी है चोरी हो गई तो क्या फर्क पड़ता है। ऐसे में पुलिस की भूमिका पर एक बार फिर चिंतन क्यों न किया जाए। पुलिस यदि उद्यमियों के साथ न खड़ी हो और अपनी अक्षमता से अपराधियों को संरक्षण प्रदान करने का कारण बनने लगे तो उसकी भूमिका पर नए सिरे से विचार करना जरूरी हो जाता है।
    दरअसल नई सदी का भारत तेजी से करवट ले रहा है। जिस देश की अर्थव्यवस्था लगभग ढाई सौ सालों तक अंग्रेजों के षड़यंत्रों का शिकार रही हो, और वो अपनी तेज प्रगति से सारे मानदंड पीछे छोड़ रहा हो, उसे उपनिवेशिक मानसिकता वाली संस्थाओं से मुक्ति दिलानी ही होगी। शासकों और प्रशासकों को समय की इस मांग की पहचान करनी होगी। अपराध नियंत्रण का पुराना ढर्रा बदलना होगा तभी इन संस्थाओं का अस्तित्व बचा रह पाएगा। आज पुलिस कानूनों में बदलाव या सुधार की बात हो रही है कल पुलिस को ही बदलने की बात होने लगे तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के लक्ष्य के लिए यदि पुलिस का मौजूदा ढांचा होम करना पड़े तो भी ये सस्ता सौदा होगा।

  • नगर निगम के कमर्शियल टैक्स के विरोध में होटल संचालकों ने महापौर को दिया ज्ञापन

    नगर निगम के कमर्शियल टैक्स के विरोध में होटल संचालकों ने महापौर को दिया ज्ञापन


    भोपाल,1 सितंबर। नगर पालिक निगम की ओर से लगाए गए व्यावसायिक कर के विरोध में आज महाराणा प्रताप नगर के होटल संचालकों ने महापौर मालती राय को ज्ञापन दिया। जिसमें उन्होंने इस नए टैक्स को अव्यावहारिक और शोषणकारी बताया है। इस टैक्स को लेकर व्यापारियों ने पहले भी आपत्ति दर्ज कराई थी लेकिन टैक्स भरने की अंतिम समय सीमा 31 अगस्त बीत जाने की वजह से मिलने वाली छूट की समयावधि भी बीत गई है। व्यापारियों ने यह टैक्स हटाकर टैक्स भरने की तिथि एक बार बढ़ाने की मांग भी की है।

    नगर निगम की फिजूलखर्ची और स्मार्ट सिटी के कर्ज का बोझ व्यापारियों पर डालने से वे आंदोलित हैं.


    महापौर श्रीमती मालती राय से मुलाकात करने पहुंचे एमपीनगर भोपाल होटल एंड रेस्टोरेंट एसोसिएशन ने व्यावसायिक लाईसेंस की प्रक्रिया बदलने को असंगत और बोझ बताया है। एसोसिएशन के अध्यक्ष और होटल आर्च मैन्योर के प्रोप्राईटर एस.एन.माहेश्वरी ने बताया कि इस नए टैक्स से सारे व्यापारी परेशान हैं। कोरोना काल की मंदी की वजह से न तो कारोबार है और न ही व्यापारी अब तक घाटे से उबर पाए हैं। इसके बावजूद निगम ने एक नया टैक्स लाद दिया है। उन्होने महापौर को बताया कि ये टैक्स संपत्तिकर, पानी बिजली और कचरा कर के अलावा वसूला जा रहा है। इस टैक्स में सभी व्यावसायिक संपत्तियों के क्षेत्रफल के आधार पर टैक्स की गणना की गई है। ये अव्यावहारिक है और इतना ज्यादा है कि आम व्यापारी इसे चुकाने में सक्षम नहीं है। ऐसे में इस टैक्स को पूरी तरह हटाया जाए और जो लोग ये टैक्स जमा कर चुके हैं उस राशि को अगले साल के टैक्स में समायोजित किया जाए।
    श्री माहेश्वरी ने बताया कि पहले नगर निगम होटल के कमरों के आधार पर आय की गणना करता था और उस पर कर लगाया जाता था। नई व्यवस्था में होटल के खुले क्षेत्र और बाथरूम, बरामदे आदि को भी टैक्स के दायरे में लिया गया है जबकि इन स्थानों से आय नहीं होती है। व्यापारियों ने इस टैक्स का विरोध तभी से करना शुरु कर दिया था जब नगर निगम के राजस्व अमले ने उन्हें मांग पत्र सौंपे थे। व्यापारियों की आपत्ति पर निगम ने कोई फैसला नहीं लिया और कर भरने की समय सीमा भी निकल गई।
    व्यापारियों ने कहा कि ये टैक्स नगर निगम कमिश्नर श्री वीएस चौधरी कोलसानी ने तब मंजूर कराया था जब नगर निगम की चुनी हुई परिषद भंग की जा चुकी थी। इस फैसले में आम नागरिकों के बीच रायशुमारी नहीं की गई थी। हैदराबाद की तर्ज पर लागू की गई इस व्यवस्था को तब लागू किया गया है जब भीषण मंदी का दौर चल रहा है। ऐसे में चुनी हुई परिषद को इस फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए।
    ज्ञापन देने वालों में भोपाल
    हॉस्टल एसोसिएशन के अध्यक्ष एमपी नगर कोचिंग एसोसिएशन के अध्यक्ष संजय तिवारी एवं कई पदाधिकारी शामिल थे।
    महापौर श्रीमती मालती राज ने संघ के पदाधिकारियों को आश्वासन दिया है कि उनकी मांगों को दो-तीन दिन के अंदर कुछ ना कुछ निराकरण अवश्य करेंगे।
    संघ के कुछ पदाधिकारियों का कहना है कि अगर निर्णय उनके पक्ष में नहीं जाता तो वह उच्च न्यायालय की शरण में जाने के लिए तैयारी कर रहे हैं