Month: August 2020

  • सोनिया-कांग्रेस का पुरसा हाल !

    सोनिया-कांग्रेस का पुरसा हाल !

    के. विक्रम राव

    पत्रकार सब शायद वांगमय में भ्रमित हो गए, अथवा वर्तनी की त्रुटि कर बैठे! कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने असल में अपने बयान (23 अगस्त) में कहा होगा : “जाऊँगी, नहीं रहूंगी|” सब एडिटर ने अल्पविराम को खिसका कर ‘नहीं’ के बाद लगा दिया| मायने ही बदल गए| दो दिनों के दैनिक देख लीजिये| भला सोचिये राजपाट, खजाना, वैभव और ये ऐश तज दिया तो फिर कहाँ? तेईस तीसमार खान बड़े शेखी बघार रहे थे कि 135-वर्ष पुरानी पार्टी को पूरा बदल डालेंगे| संभवतः जैसा होता आया है वे सब मायाजाल पकड़ नहीं पाए| क्या “जी हुजूरिये” लोग कभी “न” बोल सकते हैं ? फिर बात हो उस प्रतीक्षारत प्रधान मंत्री पर? अब तो वे बावन पार गए और फिर भी युवा समझते हैं ! टट्टू का कभी अरबी घोड़ों से मुकाबला संभव है? मगर लोग हैं कि लगे रहे| समझे नहीं कि ठूंठ पर हरियाली नहीं आती| बहत्तर साल के कपिल सिब्बल और उनसे बस एक साल छोटे नबी भाई, जो गुलाम भी हैं, पर लिखते हैं आजाद, वे तक तलवार भांज रहे थे| दिन ढला, उनके तेवर भी ढीले हो गए| सूरमाओं की शेखी होती है, पर दिखी नहीं|सोनिया गाँधी चली थीं पोखरण तृतीय करने| बड़ा विस्फोट तो उनकी सासू माँ ने 1974 में किया था| इस बार हुआ नहीं| बस इतना हुआ कि दो दिन अखबार तथा टीवी पर से नरेंद्र मोदी को सोनिया ने बाहर कर दिया| तीसरे ही दिन सब सामान्य हो गया| सारा एक फूहड़ मजाक था! यूं भी इंदिरा गाँधी के पुराने वीडियो और समाचार की कतरनों के आधार पर सोनिया गाँधी काफी जानती, सीखती रहती हैं| उन्हें याद रहा उनके भारतीय बहू बनने वाले वर्ष (25 फ़रवरी 1968) के समय ही कांग्रेस विभाजन की कगार तक पहुंच रही थी| पार्टी अध्यक्ष एस. निजलिंगप्पा प्रधानमंत्री को पार्टी से निष्कासित करने का निर्णय ले चुके थे| कुछ महीनों बाद पार्टी प्रत्याशी नीलम संजीव रेड्डी के वोट काटकर इंदिरा गाँधी ने अपने निर्दलीय प्रत्याशी वी.वी. गिरि को राष्ट्रीय पद पर जिताने की तैयारी कर ली थी| उसी दौर में निजी बैंकों के राष्ट्रीयकरण का निर्णय हो गया था| आमजन को आभास हो रहा था कि ऐतिहासिक जनक्रांति हो रही थी| अंततः कांग्रेस टूटी, साल भर में दो कांग्रेस पैदा हो गई| मगर इंदिरा गाँधी का दांव चतुराई का था| उन्होंने दलित (जगजीवन राम) और मुस्लिम (फकरुद्दीन अहमद) को अपना मोहरा बनाया| वोटरों के दो बड़े तबके उनकी पार्टी के समर्थक बन गए| डेढ़ साल बाद “गरीबी हटाओ” के लुभावने नारे पर इंदिरा कांग्रेस सत्ता पर सवार हो गयी| विरोधी दफ़न हो गए| आज सोनिया गाँधी उसी पुराने (1971) सीन को दुबारा मंचित करना चाहती थीं| वे भूल गयीं कि 1970 के दौर के कोई भी नेता नरेंद्र मोदी के बाल बांका करने लायक भी नहीं थे| दूसरा उस समय कोई इंदिरा गाँधी का सानी नहीं था| इसी तरह आज भी सोनिया गाँधी तो सास की साया तक नहीं बन पायीं| इसी आधार पर गौर करें कि आज की चुनौती पर यह तिगड्डा (माँ, बेटा, बेटी) कितना जंगजू हो सकता है ? मान भी लें कि धनबल के आधार पर हो भी जाये, तो पाता क्या ? ये सब पुरोधा वही हैं जो आम चुनाव जीत न पाए| तब 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी रिटायर्ड और टायर्ड दिख रहे थे| सोनिया अपने सितारों की चाल से जीती| वर्ना सरदार मनमोहन सिंह दिल्ली से ही लोकसभा चुनाव बुरी तरह हार चुके थे| फिलहाल बटेर हाथ लग ही गयी| वे प्रधानमंत्री बन ही गए | मगर तब तारीफ के पुल बंधे सोनिया के| इस पूरे परिवेश में इस मौजूदा दो-दिवसीय (23-24 अगस्त) मैच पर गौर करें तो स्पष्टतयः आभास होता है कि यह फिक्स्ड था| कौन खिलाड़ी कब किस ओर से गेंद फेंकेगा ? कौन किस दिशा में हिट लगाएगा ? फिर कौन, कब आउट होगा ? सब तय होता है| दोनों “बागी” नेता जानते थे|मगर दुःख इस बात का रहेगा कि खुर्राट रणबांकुरों जैसे कपिल सिब्बल और गुलाम नबी आजाद अपनी पारी ठीक से खेल नहीं पाए| आजाद को तो भान हो गया होगा कि शीघ्र ही वे काबीना मंत्री के समकक्ष वाली सुविधाओं से मरहूम हो जायेंगे| अब राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड्गे होने वाले हैं| वे पिछले दिनों कर्णाटक से राज्यसभा में आये हैं| लोकसभा चुनाव हार गये थे|राज्यसभा में विपक्ष का नेता महत्वपूर्ण होता है, अतः दलित होने के कारण खड्गे का हक़ बनता है| उधर कपिल सिब्बल की राज्यसभा अवधि भी अब साल भर शेष है| इस बार उत्तर प्रदेश से कई प्रत्याशी होंगे| कांग्रेस के पास इतने विधायकों कि संख्या नहीं है की वे सिब्बल को दुबारा जिता पायें|इन सियासी तथ्यों पर गौर करें तो इस कथित विद्रोह के समस्त कारण समझ में आ जाते हैं| दबाव की राजनीति है| फ़िलहाल सोनिया से राहुल दो दशक तक, फिर राहुल से सोनिया तक का दौर| क्रम चलता रहेगा और तब पधारेंगी प्रियंका वाड्रा| अर्थात कांग्रेस में वंशावली चलती रहेगा| कुतुब्बुद्दीन ऐबक वाला गुलाम वंश फिर चालू हो जायेगा | अतः लब्बो लुआब यही है कि अब सीधी, सामान्य सियासी मांग है कि कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष वोट द्वारा मतपेटियों से निर्वाचित हो, नामित होने की परम्परा ख़त्म हो| कई वर्ष हो गए कांग्रेसियों ने पार्टी संगठन के निर्वाचन में मतपत्र ही नहीं देखा| सोनिया गाँधी ने तो करिश्मा ही कर दिखाया था, जब उन्होंने सीताराम केसरी को सशरीर पार्टी कार्यालय से फिकवा दिया था| स्वयं अध्यक्ष बन बैठीं| न नामांकन, न मतदान, न परिणाम| लेकिन अब कांग्रेस तभी बचेगी जब मतपत्र का पुनः दीदार होगा| वर्ना संग्रहालय में पार्टी का स्थान आरक्षित है|K Vikram RaoMobile : 9415000909E-mail : k.vikramrao@gmail.com

  • डीजीपी जौहरी बोले तो बेखौफ अपराधियों पर बरसी एमपी पुलिस

    डीजीपी जौहरी बोले तो बेखौफ अपराधियों पर बरसी एमपी पुलिस

    दो माह में 733 चिन्हित गुण्‍डों पर कार्यवाही, चार हजार से अधिक ईनामी बदमाशों की गिरफ्तारी

    भोपाल। पुलिस महानिदेशक विवेक जौहरी के नेतृत्‍व में विगत दो माह जून-जुलाई में प्रदेश की पुलिस ने गुण्‍डों-माफियाओं और आपराधिक तत्‍वों के विरूद्ध कठोर कार्यवाही की है। डीजीपी ने अपने मैदानी अफसरों को निर्देश दिए थे कि शासन की मंशा के अनुरूप प्रदेश में आपराधिक तत्‍वों का समूल सफाया करें और प्रदेश को अपराध मुक्‍त बनाने के लिये कार्य करें। समाज विरोधी गैर कानूनी गतिविधियों को अंजाम देने वाला व्‍यक्ति चाहे कितना भी रसूखदार हो, उसके विरूद्ध कानूनी कार्यवाही करें। संगठित अपराध करने वाले आपराधिक लोगों का सिंडीकेट तहस-नहस कर दें।

    कोविड- 19 अनलॉक की प्रक्रिया प्रारम्भ होने के बाद म.प्र. पुलिस द्वारा आधारभूत पुलिसिंग पर कार्य करना प्रारम्भ किया गया है। अपराध एवं अपराधियों पर नियंत्रण करने के उद्देश्य से पुलिस महानिदेशक जौहरी ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग करके ये विशेष अभियान चलाने के निर्देश दिए थे। अभियान के दौरान प्रत्येक जिले में शीर्ष आपराधिक तत्वों को सूचीबद्ध कर उनके विरूद्ध उचित वैधानिक कार्यवाही करने के निर्देशों के फलस्वरूप 733 आपराधिक तत्वों को चिन्हित कर उनके विरुद्ध 133 एनएसए, 350 जिला बदर एवं 140 धारा 110 द.प्र.सं. के प्रकरण पंजीबद्ध कर न्यायालय में प्रस्तुत किये गये।

    माह जून-2020 में चलाए गए विशेष अभियान में 1980 नई हिस्ट्रीशीट फाईल एवं 88 नई गैंग हिस्ट्रीशीटर फाईल तैयार की गई। माह जून-2020 में चलाए गए विशेष अभियान में 137 पैरोल पर छूटे अपराधियों की पैरोल निरस्त कराने की कार्यवाही की गई। माह जून-2020 में चलाए गए विशेष अभियान में संपत्ति संबंधी अपराधों के 2564 स्थाई वारंटी एवं 375 गिरफ्तारी वारंट तामील कराये गये। इसी प्रकार माह जुलाई में 3914 स्थाई वारण्ट एवं 477 गिरफ्तारी वारण्ट तामील कराने गये।

    विगत माहों में कुल 4386 ईनामी बदमाशों को गिरफ्तार करने में सफलता प्राप्त हुई। पोर्टल के माध्यम से वाहन चैकिंग एवं थानों में रखे वाहनों की सर्चिंग के दौरान माह जुलाई में 3,45,182 वाहनों को सर्च किया गया। जिसमें 228 अपराधियों से 251 चोरी के वाहन जप्त करने में सफलता प्राप्त की।

    गुम बालक/बालिकाओं की दस्तयाबी के लिए माह जुलाई में 1,628 बालक/बालिकाओं को दस्तयाब करने में सफलता प्राप्त की है। चिटफण्ड कंपनियों के विरूद्ध शिविर लगाकर शिकायतें प्राप्त कर निराकरण कराने के निर्देश दिये गये थे 275 प्रकरण कायम किये जाकर शिकायतों का निराकरण कराया जा रहा है। जिला रतलाम, कटनी, इंदौर एवं नीमच में निवेशकों के रूपये वापस कराने की अच्छी कार्यवाही की गई है। करोड़ों रुपये आवेदकों को दिलाए गए। बदमाशों द्वारा अवैध तरीके से अर्जित की गई सम्पत्ति एवं शासकीय जमीनों पर अतिक्रमण करने के मामलों में इन सम्‍पत्तियों को नष्ट करना एवं शासकीय जमीनों को अतिक्रमण मुक्त कराया गया। इसी तरह जिला इंदौर, भोपाल में भू-माफियाओं के विरुद्ध भी प्रभावी कार्यवाही की गई है।

  • भावनाओं के सूर्य भगवान गणेश

    भावनाओं के सूर्य भगवान गणेश

    के. विक्रम राव

    अगर इतिहासकार अलबरूनी की बात स्वीकारें तो श्रेष्ठतम सम्पादक हैं गणेश। इसे वेदव्यास ने भी प्रमाणित किया था। वर्तनी, लेखनी, प्रवाह और त्रुटिहीनता की कसौटी पर गणेश खरे उतरते है। इस पूरी गणेशकथा में हम श्रमजीवी पत्रकारों के लिये रूचिकर वाकया यह है कि गणेश सर्वप्रथम लेखक और उपसम्पादक हैं। यूं तो देवर्षि नारद को प्रथम घुमन्तू संवाददाता और संजय को सर्वप्रथम टीवी एंकर कहा जा सकता है, मगर गणेश का रिपोर्ताज में योगदान अनूठा है। मध्येशियाई इतिहासकार, गणितज्ञ, चिन्तक और लेखक अल बरूनी ने एक हजार वर्ष पूर्व लिखा था कि वेद व्यास ने ब्रह्मा से आग्रह किया था कि किसी को तलाशे जो उनसे महाभारत का इमला ले सके। ब्रह्मा ने हाथीमुखवाले गणेश को नियुक्त किया। वेदव्यास की शर्त यह थी कि गणेश लिखते वक्त रुकेंगे नहीं और वही लिखेंगेगे जो वे समझ पायेंगे। इससे गणेश सोचते हुए, समझते हुये लिखते रहे और व्यास भी बीच-बीच में विश्राम करते रहे। (एडवार्ड सी.सचान, अलबरूनीज इंडिया, मुद्रक एस. चान्द, दिल्ली, 1964, भाग एक, पृष्ट 134)।अब एक आधुनिक पहलू पर गौर करें। एडोल्फ हिटलर ने अपनी नेशनल सोशलिस्ट (नाजी) पार्टी का निशान (1930) स्वस्तिक बनाया था, तो प्राच्य के मनीषियों का व्यग्र होना सहज था। ओमकार स्वरूप गणेश के इस सौर प्रतीकवाले शुभ संकेत को उसने वीभत्स बना डाला था। हिटलर ने अपने अमांगलिक और अमानुषिक कार्ययोजना में इस वैदिक प्रतीक का जुगुप्सित प्रयोग किया था। स्वस्तिक को गणेश पुराण के अनुसार गजानन का स्वरूप तथा हर कार्यों में मांगलिक स्थापना हेतु शुरूआत को मानते हैं। श्रीगणेशाय नमः के उच्चारण के पूर्व स्वस्तिक चिन्ह बनाकर ”स्वस्ति न इन्द्रो बुद्धश्रवाः“ स्वस्तिवचन करने का विधान है। अपने स्वराष्ट्रवासी प्राच्यशास्त्री मेक्सम्यूलर को पढ़कर इस जर्मन नाजी तानाशाह ने अपने पैशाचिक अभीष्ट को हासिल करने हेतु स्वस्तिक को अपनाया था। लेकिन हिटलर का वही हश्र हुआ जो सूर्यपुत्र अहंतासुर का हुआ जिसका भगवान गजानन ने धूम्रवर्ण के अवतार में जगद् कल्याणार्थ वध किया। ब्रह्मा द्वारा कर्माध्यक्ष पद पाकर सूर्य को अहंकार हो गया था और तभी उनके नथुनों के वायु से अहंतासुर का जन्म हुआ था। वह भी अभिमानी होकर समस्त ब्रह्माण्ड का शासक, अमर तथा अजेय होना चाहता था। दैत्यगुरू शुक्राचार्य से गणेश मंत्र की दीक्षा प्राप्त कर अहन्तासुर राक्षस ने पार्वतीपुत्र की घोर उपासना की। भोले बाबा के आत्मज ने इस दैत्य को तथास्तु कहकर वर दे डाला। फिर वही हुआ जो हर दैत्य करता आया है। वही जो हिटलर ने गत सदी में किया था। पापाचार, नरसंहार, तबाही आदि। लाचार, निरीह देवताओं तथा मानवों ने गणेश की उपासना की। अपने भक्तों की रक्षा में गजानन ने उग्रपाश फेंक कर सभी असुरों का वध कर दिया। घमण्ड तजकर अहंतासुर गणेश का शरणागत हो गया। उसे आदेश मिला कि जहां गणेश की आराधना न होती हो वहीं जा कर वास करे।राजनीतिक रूप में गणेश का राष्ट्रवादी तथा जनकल्याणकारी उपयोग स्वाधीनता सेनानी, महाराष्ट्र केसरी लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने हिटलर के आविर्भाव के पैंतीस वर्ष पूर्व पुणे में सर्वप्रथम किया था। अंग्रेजी साम्राज्यवादियों ने अपने भारतीय उपनिवेश में हर प्रकार की सार्वजनिक क्रियाशीलता पर प्रतिबंध लगा दिया था। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (1857) कुचल दिया गया था। शासकों ने भारतीयों को जाति तथा मजहब के आधार पर विभाजित कर दिया था। महाराष्ट्र के पेशवा शासक 1893 के पूर्व तक गणेश चतुर्थी भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मनाते थे। लोकमान्य तिलक ने इस धार्मिक उत्सव के जनवादी पहलू को पहचाना। उसे जनान्दोलन बनाया। तभी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना मुम्बई में हुये आठ वर्ष हो चुके थे। मगर सार्वजनिक आयोजन पर रोक बरकरार थी। हिन्दू चेतना को तिलक ने जगाया और जनपदीय स्तर से उठाकर गणेश चतुर्थी को राष्ट्रीय रूप दिया। चूंकि अन्य ईश्वरों की तुलना में गणेश किसी जाति या वर्ग विशेष के नहीं थे, अतः सर्वजन के इष्ट बन गये। गणेशोत्सव में सभी हिन्दू शरीक हो गये। उन्हीं दिनों तिलक के उग्र संपादकीय (समाचारपत्र मराठा तथा केसरी में) छपते थे जिनसे साम्राज्यवाद-विरोधी भावना को बल मिलता था। उनका सिंहनाद कि ”स्वतंत्रता मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है, मैं इसे लेकर रहूंगा“ काफी ख्यात हुआ। गणेश चतुर्थी को तिलक ने जनविरोध का माध्यम बनाया। बौद्धिक चर्चायें, नुक्कड़ नाटक, कविता पाठ, संगीत आदि माध्यम अपना कर गणेश चतुर्थी को मात्र लोकरंजन ही नहीं लोकराज के संघर्ष का मंच भी बनाया गया। स्वतंत्रता के बाद तो गणेश चतुर्थी को राष्ट्रीय पर्व की मान्यता मिल गई।गणेश के गृहस्थ होने की बात विवादित है। दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु में, उन्हें ब्रह्मचारी मानते हैं। उत्तर भारत में प्रसंग भिन्न है। यह जानीमानी घटना है कि दोनों भ्राताओं (कार्तिकेय) में प्रतिस्पर्धा हुई कि पहले किसका पाणिग्रहण हो। दुनिया की परिक्रमा की शर्त रखी थी माता-पिता ने तो गणेश ने शार्टकट का रास्ता अपनाया और शिवपार्वती की परिक्रमा कर अपना दावा पुख्ता कर लिया। नाराज होकर देवताओं के सेनापति कार्तिकेय दक्षिण भारत में बस गये और अविवाहित रहे। गणेश की दो भार्या थीः ऋद्धि और सिद्धि तथा दो सन्ताने हुई क्षेम और लाभ जिसकी वणिकवर्ग और श्रेष्ठिजन पूजा करते हैं।यूं शिव ने देवताओं के शुभकार्य हेतु गणेश की सृष्टि की मगर अन्य गमनीय विभूतियां और विलक्षणतायें भी गणेश में हैं। शिव के रौद्ररूप की धार कम करना हो तो गणेशोपासना कीजिए। निर्विघ्नता, कर्मनाश और धर्मप्रवर्तन के अलावा गणेश ललित कलाओं और संस्कृति के संरक्षक हैं। एक बार वे मृदंग बजा रहे थे कुपित शिव ने उसे त्रिशूल से तोड़ दिया। तबला की उत्पत्ति तभी से हुई। जटिलता को सुगम बनाने में उन्हें महारत है जैसे भारीभरकम हाथीवाला शरीर नन्हे चूहे पर टिके, यह भौतिक संतुलन मुमकिन कर दिखाया।चूहे का ही प्रसंग है। एक बार सांप दिख गया था तो चूहा भागा और गड़बडा कर गणेश जी घराशायी हो गये। इस नजारे पर चन्द्रमा हंस पड़े। गणेश ने शाप दे दिया कि उसका आकार घटता बढ़ता रहेगा। तभी से चन्द्रमा के लिए बालेन्दु से पूर्णचन्द्र और फिर प्रतिपदा से अमावस तक का दौर चलता है। तो उस महान सम्पादक व लेखक वक्रतुण्ड, एकदन्त, गजवक्त्र, लम्बोदर, विकट, विघ्नराज, धूम्रवर्ण, भालचन्द्र, विनायक, गणपति, गजानन को उनके जन्मोत्सव पर हमारा सादर नमन।K Vikram RaoMobile :9415000909E-mail: k.vikramrao@gmail.com

  • मध्यभारत में सिंधिया ने फहराया भगवा परचम

    मध्यभारत में सिंधिया ने फहराया भगवा परचम

    ज्योतिरादित्य बोले कांग्रेस भ्रष्टाचार में डूबी इसलिए छोड़ा

    भोपाल,22 अगस्त( प्रेस सूचना केन्द्र)। मध्यप्रदेश के ग्वालियर विधानसभा क्षेत्र के पांच हजार से अधिक कांग्रेस कार्यकर्ता शनिवार को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और वरिष्ठ नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया समेत अन्य वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल हो गए।

    कार्यक्रम को संबोधित करते हुए ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस पर जमकर हमला बोला। उन्होंने कहा कि राज्य में 15 माह के शासन के दौरान कमलनाथ कांग्रेस ने जनता के हित में कदम नहीं उठाए। भ्रष्टाचार किया गया। उस समय मुख्यमंत्री भी दो हुआ करते थे। एक आगे और दूसरे पर्दे के पीछे। उन्होंने कमलनाथ और दिग्विजय सिंह का नाम लेते हुए कहा कि पूर्ववर्ती सरकार में जनता की सेवा की बजाए निहित स्वार्थों को प्राथमिकता दी गई।

    सिंधिया ने कहा कि उन्होंने और उनके परिवार ने सदैव जनता के हितों की बात की है। जनता की प्रतिष्ठा पर आंच आने पर भी परिवार ने सदैव आगे आकर विरोध किया है। उन्होंने कहा कि ऐसा ही उनकी दादी राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने तत्कालीन मुख्यमंत्री डी पी मिश्रा के समय किया था। उनके पिता माधवराव सिंधिया ने विकास कांग्रेस के नाम से नया दल बनाया था। वे भी जनता के हितों पर आंच आने पर झंडा और डंडा उठाकर सड़क पर उतरने तैयार रहते हैं।

    सिंधिया ने मुख्यमंत्री चौहान के प्रति धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि उन्होंने कुर्सी संभालते ही सभी से कार्यों के बारे में पूछकर कार्य किए। इसके अलावा ग्वालियर चंबल अंचल की चंबल प्रोग्रेस वे परियोजना पर भी तेजी से कार्य किया जा रहा है। साढ़े सात हजार करोड़ रुपयों की इस योजना से इस संपूर्ण अंचल का विकास होगा।

    आगामी समय में राज्य में 27 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होने हैं। इसमें से अधिकांश सीट ग्वालियर चंबल अंचल की है। ग्वालियर विधानसभा सीट पर भी उपचुनाव होना है। इस सीट से वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव में प्रद्युमन सिंह तोमर कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीते थे। इसी वर्ष मार्च के राजनीतिक घटनाक्रमों के चलते उन्होंने विधायक पद से त्यागपत्र दे दिया और भाजपा में शामिल हो गए। माना जा रहा है कि अब वे ग्वालियर विधानसभा उपचुनाव में भाजपा के टिकट पर उम्मीदवार होंगे।

    विधानसभा उपचुनाव के लिए कार्यक्रम जारी नहीं हुआ है, लेकिन भाजपा की तैयारियां तेजी से चल रही हैं। भाजपा के वरिष्ठ नेता शनिवार, रविवार और सोमवार को यहां विभिन्न आयोजनों में सक्रिय रहेंगे, इस दौरान ग्वालियर चंबल अंचल के विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों के हजारों कार्यकर्ता भाजपा में शामिल होंगे।