Month: June 2018

  • खेती को उद्योग बनाने की दिशा में कई फैसले

    खेती को उद्योग बनाने की दिशा में कई फैसले

    खेती में निवेश की राह में रोड़े बने कानूनों की समीक्षा के बाद राजस्व मंत्री उमाशंकर गुप्ता ने प्रस्ताव कैबिनेट में प्रस्तुत किया।

    भोपाल(पीआईसी)। मध्यप्रदेश सरकार ने खेती को उद्योग की तरह लाभकारी बनाने की दिशा में कई नियमों में फेरबदल किए हैं। हालांकि अभी खेती को उद्योग का दर्जा नहीं दिया जा रहा है पर इन बदलावों से खेती पर निवेश बढ़ाने में मदद मिलेगी। केबिनेट ने फैसला लिया है कि लगातार तीन साल किराए की जमीन पर लगातार खेती करने से मिलने वाला भू-स्वामी का अधिकार अब नहीं मिलेगा। इसके लिए भू-राजस्व संहिता के मौरूषी के अधिकार को विलोपित किया जाएगा। इस प्रावधान के चलते लोग अपनी जमीन किराए पर नहीं देते थे और ये खाली पड़ी रहती थी। इससे कृषि विकास दर के साथ उत्पादन भी प्रभावित होता था।

    सरकार विधानसभा के मानसून सत्र में भू-राजस्व संहिता 1959 में व्यापक बदलाव का विधेयक लाएगी। शहरी क्षेत्रों में भूखंड को फ्री-होल्ड कराने के बाद भी भू-स्वामी का अधिकार नहीं मिल पाता था, वो समस्या भी अब दूर हो जाएगी। शहरी क्षेत्रों में भूमि प्रबंधन की व्यवस्था बनाई जाएगी। आबादी की जगह नक्शे में अब भू-स्वामी को दर्शाया जाएगा। इसके बाकायदा पत्र भी दिए जाएंगे। बैठक में इसके अलावा पेटलावद मोहर्रम जुलूस विवाद संबंधी न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट को मंजूरी दी गई। यह रिपोर्ट विधानसभा के पटल पर रखी जाएगी। इसमें आरएसएस कार्यकर्ताओं को क्लीचचिट दी गई है।

    कैबिनेट बैठक के बाद जनसंपर्क मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा और राजस्व मंत्री उमाशंकर गुप्ता ने बताया कि भू-राजस्व संहिता की 122 धाराओं में बदलाव किए गए हैं। संहिता को किसान के साथ जन उपयोगी बनाया गया है। राजस्व मंडल से राजस्व न्यायालयों के नियम बनाने की शक्ति वापस ले ली गई है। नामांतरण आदेश पारित होने के बाद जब तक इसकी नि:शुल्क प्रति संबंधित व्यक्ति को नहीं मिल जाएगी, तब तक प्रक्रिया को पूरा नहीं माना जाएगा। सीमांकन के लिए निजी एजेंसियों को लाइसेंस दिए जाएंगे।

    सीमांकन में विवाद होने पर तहसीलदार सुनवाई करके आदेश देंगे। इसकी अपील अनुविभागीय अधिकारी के पास होगी और उसका फैसला अंतिम होगा। मामूली बातों पर अपील खारिज करने के प्रावधान को समाप्त कर दिया गया है। डायवर्सन के लिए अब व्यक्ति को भटकना नहीं पड़ेगा। मास्टर प्लान में जो लैंडयूज दिया गया है, वैसा ही भूमि का उपयोग करने पर तय शुल्क चुकाकर जो रसीद मिलेगी उसे ही प्रमाण मान लिया जाएगा।

    बंदोबस्त की समस्याओं का निराकरण अब कलेक्टर स्वयं कर सकेंगे। अब तक ये 30 साल में एक बार होता था, यह व्यवस्था खत्म करके कलेक्टरों को अधिकार दिया गया है वे जहां जरूरी समझें तो बंदोबस्त करा सकते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के पटवारी हलके की तरह शहरी क्षेत्रों में सेक्टर और ब्लॉक की व्यवस्था होगी। सार्वजनिक उपयोग के लिए जमीन आरक्षित करने का अधिकार कलेक्टर को होगा।

  • गरीब को सेठ बनाने की दिशा में बड़ा कदम रही नोटबंदी

    गरीब को सेठ बनाने की दिशा में बड़ा कदम रही नोटबंदी

    भोपाल,12 जून(पीआईसी)। सत्ता के गलियारों में उद्योगपतियों को इंतजार करते देखने का दौर अब बीत चला है। मोदी सरकार ने नोटबंदी करके समानांतर अर्थव्यवस्था पर जो चोट की है उसके चलते अब उद्योगपतियों को सत्ताधीशों के दरवाजे हाजिरी देना जरूरी नहीं रहा है। नतीजा ये है कि आर्थिक विकास में लगे कार्पोरेट घटाने आसानी से अपना कारोबार बढ़ा रहे हैं। छोटे स्तर पर जिन समूहों ने नोटबंदी के बाद जीएसटी की व्यवस्था को समझ लिया था उन्होंने भी अपने कारोबार में सुधार किया है। नतीजतन देश अर्थव्यवस्था में तेजी आई है।

    वित्तमंत्री अरुण जेटली का विश्वास है कि यदि आप देश के लिए पैसा बना रहे हैं तो आपको हमारे दरवाजे पर सिर झुकाने की जरूरत नहीं है। नियमों में बदलाव की इस नई परंपरा से शेयर बाजार तेजी की ओर अग्रसर हो रहा है। जीएसटी को लागू करने और आर्थिक सुधारों को लागू करने की दिशा में देश के औद्योगिक घराने सरकार के साथ इसलिए खड़े नजर आ रहे हैं क्योंकि इससे उनके संसाधनों की बर्बादी रुकी है। वित्तीय प्रबंधन के छिद्र बंद हुए हैं, जिससे मुनाफे की बर्बादी रुकी है।

    चार साल पहले अर्थव्यवस्था कमजोर रुपए, छीजते विदेशी मुद्रा भंडार, राजकोषीय और चालू खाते के ऊंचे घाटे और दहाई में महंगाई से जद्दोजहद कर रही थी.इस बार2018 में वृहत अर्थव्यवस्था के संकेतकों में खासा सुधार आया है—क्रिसिल के एक विश्लेषण के मुताबिक, खुदरा कीमतों की महंगाई 2015-2018 में औसतन 4.7 फीसदी रही है, जबकि इससे पहले के पांच साल में यह औसतन 10.2 फीसदी रही थी; चालू खाते का घाटा बीते चार साल में घटकर आधा रह गया है और विदेशी मुद्रा भंडार में अच्छा-खासा इजाफा हुआ है. रुपए का अवमूल्यन पहले के पांच साल के 5.5 फीसदी के मुकाबले घटकर 1.7 फीसदी पर आ गया है.

    जीएसटी और दिवालिया तथा शोधन अक्षमता संहिता (आइबीसी) जैसे सुधार कारोबार करने के उसूलों में आमूलचूल बदलाव लाने का भरोसा बंधा रहे हैं. आइबीसी ने असरदार ढंग से बता दिया है कि कर्ज लेकर उसे न चुकाने का बेलगाम और बेशर्म तरीका अब और काम नहीं आएगा.

    सरकार ने कर अनुपालन को बढ़ाने और नोटबंदी के साथ आमदनी की घोषणा योजना के जरिए और ज्यादा लोगों को औपचारिक अर्थव्यवस्था के दायरे में लाने की एकजुट कोशिशें की हैं. जिससे प्रत्यक्ष करों की वसूली में तेज बढ़ोतरी हुई है, बावजूद इसके कि जीडीपी की ग्रोथ पिछले दो वित्तीय साल में धीमी पड़ी है. शुरुआती गड़बडिय़ों के बावजूद हिंदुस्तान के अप्रत्यक्ष कर आधार में जीएसटी के लागू होने के बाद 50 फीसदी से ज्यादा का इजाफा हुआ है.

    कर और जीडीपी का अनुपात 2014 के वित्तीय साल के 5.7 फीसदी से बढ़कर 2018 के वित्तीय साल में 6 फीसदी पर पहुंच गया. प्रत्यक्ष कर संग्रह वित्तीय साल 2016 के 0.6 फीसदी से बढ़कर 2018 के वित्तीय साल में 1.9 फीसदी पर पहुंच गया.

    हालांकि नोटबंदी के अंतिम नतीजों पर अभी फैसला होना बाकी है और कुछ अर्थशास्त्री कह रहे हैं कि इससे जीडीपी की ग्रोथ में 1-2 फीसदी की सेंध लग सकती है, पर इसका असर प्रत्यक्ष कर (खासकर आयकर) के बढ़े हुए अनुपालन में साफ दिखाई देता है.

    इसके बावजूद देखा जा रहा है कि नौकरियां 7.4 फीसदी की वृद्धि दर के साथ कदमताल करते हुए नहीं बढ़ी हैं और कारोबार करने में आसानी की फेहरिस्त में हिंदुस्तान की ऊंची छलांग के बाद भी निजी निवेश परवान नहीं चढ़ सके हैं.

    सामान्य मॉनसून और बंपर फसल के बावजूद 2018 में ग्रामीण अर्थव्यवस्था मुश्किलों से घिरी रही. कृषि की असल जीडीपी ग्रोथ वित्तीय साल 2010-14 के 4.3 फीसदी से तकरीबन आधी घटकर 2015-18 के वित्तीय साल में 2.4 फीसदी पर आ गई. बड़ी तादाद में नौकरियां देने वाले निर्माण क्षेत्र को नोटबंदी और जीएसटी की मार सहनी पड़ी है.

    ईंधन की बढ़ती कीमतों ने एक बार फिर अर्थव्यवस्था के सामने चुनौतियां खड़ी कर दीं हैं। इससे चालू खाते के घाटे पर सीधा असर पड़ेगा और यह महंगाई की आग में घी का काम कर सकती है. पेट्रोल-डीजल के दाम ऐतिहासिक ऊंचाई पर पहुंच रहे हैं और ऐसे में खुदरा तेल पर केंद्र और राज्य सरकारों के शुल्कों को कम करने की मांग तेज हो रही है.

    अगले साल सरकार को चुनाव की चुनौती से जूझना है। इस बीच कई राज्यों के बीच भी चुनाव की तैयारियां शुरु हो चुकी हैं। जाहिर है कि सरकार को जीएसटी और नोटबंदी जैसे मुद्दों पर जनता के बीच सभी तथ्य सिलसिलेबार रखने होंगे उसे बताना होगा कि किस तरह नोटबंदी करके देश ने एक बड़ा लक्ष्य हासिल किया है तभी वो जनता की नाराजगी से बच पाएगी।

  • जेनेटिक बीमारियों के छलावे से सावधान

    जेनेटिक बीमारियों के छलावे से सावधान

    -डॉक्टर अरविन्द जैन भोपाल

    आज कल वैसे भी नव दम्पत्ति बच्चे के जन्म के प्रति बहुत जागरूक होते हैं और कोई कोई तो इस झंझट में नहीं पड़ना चाहते .कारण महिलाये अधिकांश अपने सौंदर्य या फिगर के पीछे बच्चा पैदा नहीं करना चाहती .दूसरा आजकल अपने कैरियर की दीवानगी के कारण बच्चे न हो इससे निजात चाहती हैं .तीसरा आजकल डॉक्टरों के अलावा महिलाएं ऑपेरशन से प्रसव कराने में प्राथमिकता देती हैं .इसके अलावा आजकल जन्मजात विकृत बच्चों के जन्म होने के भय से भी बचते हैं .आर्थिक सम्पन्नता और भविष्य के प्रति निश्चिंतता के कारण महानगरों में कुछ नर्सिंग होम्स और उनमे पदस्थ शिशु रोग विशेषज्ञ और जेनेटिक बीमारियों के डर से मनोवैज्ञानिक अज्ञात भयग्रस्त करते हैं .और आर्थिक सम्पन्नता के कारण और भविष्य की चिंता से मुक्त होने के कारण जेनेटिक बीमारियों से बचने यह रास्ता अपनाते हैं जो कितना शोषण का सरल मार्ग निकाला गया हैं .

    इन दिनों बच्चे के जन्म से पहले ज्यादातर पैरंट्स को प्राइवेट डॉक्टर्स यह समझाते हैं कि अगर बच्चे को कोई जेनेटिक बीमारी हो जाती है तो बच्चे का अम्ब्लिकल कॉर्ड ब्लड यूज कर बच्चे का इलाज किया जा सकता है और यही वजह से बड़ी संख्या में माता-पिता हजारों-लाखों रूपये खर्च कर अपने बच्चे के कॉर्ड ब्लड को प्राइवेट कॉर्ड ब्लड बैंक में सुरक्षित रखवाते हैं। हालांकि इंडियन अकैडमी ऑफ पीडिऐट्रिक्स IAP की मानें तो कॉर्ड ब्लड का बेहद सीमित इस्तेमाल हो सकता है। IAP की ओर से जारी एक स्टेटमेंट में प्राइवेट कॉर्ड बैंकिंग इंडस्ट्री की आलोचना करते हुए कहा गया है कि ये लोग झूठी बातों का प्रचार कर अपने प्रॉफिट और बिजनस के लिए आम लोगों का शोषण कर रहे हैं

    भ्रामक होते हैं कॉर्ड ब्लड बैंक के विज्ञापन
    IAP ने कहा, ‘कॉर्ड ब्लड के मामले में माता-पिता की अपने बच्चे के प्रति दायित्व की भावना का गलत तरीके से इस्तेमाल किया जा रहा है। ज्यादातर प्राइवेट कॉर्ड ब्लड बैंक भविष्य में होने वाली बीमारियों के इलाज के लिए कॉर्ड ब्लड को राम-बाण की तरह पेश करते हैं जबकि हकीकत यह है कि बच्चे के लिए कॉर्ड ब्लड का इस्तेमाल बेहद सीमित है। साथ ही प्राइवेट कॉर्ड ब्लड बैंक्स के विज्ञापन अक्सर भ्रामक होते हैं और उन्हें इस तरह से पेश किया जाता है मानो कॉर्ड ब्लड एक तरह का बायलॉजिकल इंश्योरेंस हो।’

    कॉर्ड ब्लड से फायदे की गुंजाइश सिर्फ 0.04%
    अमेरिकन सोसायटी फॉर ब्लड ऐंड मैरो ट्रांसप्लांटेशन के मुताबिक, बच्चे का अपने ही कॉर्ड ब्लड से फायदा पहुंचने की संभावना महज 0.04 प्रतिशत से 0.0005 प्रतिशत ही है। जेनेटिक बीमारियों के इलाज में अपने ही कॉर्ड ब्लड सेल्स का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता क्योंकि उनका म्युटेशन (तबदीली) भी सेम वैसी ही होगा। IAP की मानें तो कॉर्ड ब्लड सेल्स का इस्तेमाल हाई रिस्क सॉलिड ट्यूमर जैसी बीमारियों में ही हो सकता है।

    पब्लिक कॉर्ड ब्लड बैंक विकसित करने की जरूरत
    IAP का कहना है कि प्राइवेट कॉर्ड ब्लड बैंक की जगह पब्लिक कॉर्ड ब्लड बैंक विकसित किया जाना चाहिए जिसमें अलग-अलग डोनर्स के डिफरेंट जेनेटिक बनावट के कॉर्ड ब्लड को जमा कर रखा जा सकेगा जो कई अलग-अलग तरह की बीमारियों में काम आ सकता है। साथ ही इस तरह के ब्लड बैंक के लिए डोनर को किसी तरह का पैसा नहीं देना होगा।

    60 प्रतिशत डॉक्टरों को नहीं है सही जानकारी
    IAP के जर्नल इंडियन पीडियाट्रिक्स में प्रकाशित स्टेटमेंट में डॉक्टरों के बीच करवाया गया एक सर्वे भी शामिल था। इस सर्वे के मुताबिक करीब 60 प्रतिशत डॉक्टर्स इस बात से अनजान थे कि वे कौन सी बीमारियां हैं जिसका इलाज कॉर्ड ब्लड सेल ट्रांसप्लांटेशन से किया जा सकता है। करीब 90 प्रतिशत डॉक्टरों का मानना था कि बच्चे के अपने अम्ब्लिकल कॉर्ड का इस्तेमाल थैलसीमिया के इलाज में किया जा सकता है जो पूरी तरह से गलत है

    भारत में प्राइवेट कॉर्ड ब्लड बैकिंग इंडिस्ट्री करीब 300 करोड़ की है। एक बच्चे का अम्ब्लिकल कॉर्ड 20 साल तक सुरक्षित रखने में 50 हजार से 1 लाख रुपये तक का खर्च आता है।

    यहाँ यह उल्लेख करना आवश्यक हैं की भविष्य के प्रति हमें जागरूक रहना चाहिए पर इस प्रकार के भ्रामक प्रचार से ,गुमराह कर लाखों रूपया लूटना क्या यह मानवीयता हैं ?यदि कोई इस जाल में फंस गया हैं तो भविष्य के क्या करना चाहिए ?इस पर चर्चा कर निरयण लिया जाएगा पर यह एक खुला धोखा या छलावा हैं .

    पैसों के पीछे कितना ,,कैसे कैसे शोषण के हथकंडे अपनाये जा रहे हैं .सावधान .

    डॉक्टर अरविन्द जैन संस्थापक शाकाहार परिषद् भोपाल 09425006753

  • किसानों तक पहुंच गया देश का कृषि बाजार

    किसानों तक पहुंच गया देश का कृषि बाजार

    राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना से जुड़ीं मध्यप्रदेश की 58 कृषि उपज मण्डियाँ

    भोपाल,4 जून(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)।देश के अन्नदाता का सोना बिचौलियों के हाथों पड़ने के कारण अब तक खेती किसानी का जीवन एक अबूझ पहेली बना हुआ है। शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने इस दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए अब सभी कृषि उपज मंडियों को राष्ट्रीय कृषि बाजार से जोड़ दिया है। कृषि बाजार (ई-नाम) एक पैन-इण्डिया इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग पोर्टल है। यह कृषि उपजों के लिये एकीकृत राष्ट्रीय बाजार का निर्माण करने का सशक्त माध्यम है। कृषि उपज मण्डी से संबंधित सभी सूचनाओं और सेवाओं के लिये यह ई-नाम पोर्टल सिंगल विण्डो सेवा प्रदान कर रहा है। इस पोर्टल में उपज के आगमन और कीमतों तथा उपज को खरीदने और बेचने के व्यापारिक प्रस्तावों के प्रावधान को शामिल किया गया है। प्रदेश में ई-नाम पोर्टल के माध्यम से अभी तक 58 कृषि उपज मण्डियों को राष्ट्रीय कृषि बाजार से जोड़ा जा चुका है।

    http://www.enam.gov.in/NAM/home/index.html

    इस अभिनव पहल से प्रदेश की 58 कृषि उपज मण्डियाँ राष्ट्रीय कृषि बाजार से जुड़ गईं हैं। 13 कपास मण्डियों को भी राष्ट्रीय कृषि बाजार से जोड़ा जा रहा है।ई-नाम पोर्टल पर 49 लाख क्विंटल कृषि जिन्सों का व्यापार भी हो चुका है।

    प्रदेश में ई-नाम पोर्टल की शुरूआत भोपाल की पण्डित लक्ष्मीनारायण शर्मा कृषि उपज मण्डी करोंद से की गई। योजना के पहले चरण में प्रदेश की 19 चयनित कृषि उपज मण्डियों को इस पोर्टल से जोड़ा गया। ई-नाम पोर्टल से जुड़ी कृषि उपज मण्डियों में 6 जिन्सों पर ऑनलाईन ट्रेडिंग की जा रही है। योजना के दूसरे चरण में 30 और तीसरे चरण में 8 कृषि उपज मण्डियों को राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना में शामिल किया गया है। अब तक प्रदेश की 58 कृषि उपज मण्डियों को राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना से जोड़ा जा चुका है।

    इसके साथ ही, 13 कपास मण्डियों को राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना से जोड़ने का कार्य तेजी से पूर्ण किया जा रहा है। प्रदेश में राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना में अब तक करीब 12 लाख किसानों से 19 हजार लायसेंस धारी व्यापारियों ने ई-प्लेटफार्म के माध्यम से करीब 49 लाख क्विंटल कृषि जिन्सों का व्यापार किया है। प्रदेश में ई-नाम पोर्टल की सभी 58 मण्डियों में कृषि उपज के गुणवत्ता परीक्षण के लिये वृहद एसेइंग एण्ड ग्रेडिंग लैब स्थापित करने की कार्यवाही की जा रही है। ई-नाम पोर्टल में देश के 18 राज्यों में मध्यप्रदेश की स्थिति गेट एन्ट्री और एसेइंग में प्रथम तथा बिड क्रिएशन और सेल ऐग्रीमेंट में तृतीय रही है। ज्ञातव्य है‍कि देश में अप्रैल 2016 से प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने ऑनलाइन राष्ट्रीय कृषि बाजार योजना की शुरूआत की थी। इसका मकसद किसानों को उनकी उपज का राष्ट्रीय स्तर पर सही दाम दिलवाना है।