

भारत की राजनीति में वोट कबाड़ने वाले मुद्दे सदैव छा जाते हैं। कांग्रेस ने जिस दलित वोट बैंक को अपने फायदे के लिए उकसाया था वो एक समय बेलगाम हो गया। कांसीराम ने इस वोट बैंक का महत्व समझा और देश की राजनीति में एक नई इबारत लिखी। अब जबकि दलितों के अधिकारों का मुद्दा समयातीत हो चला है तब उसे एक बार फिर गरमाने का प्रयास किया जा रहा है। भीमा कोरेगांव में दो सौ साल पहले जो अंग्रेज पेशवा भिड़ंत हुई थी उसमें पेशवाओं की फौज की टुकड़ी पीछे हट गई थी। ये युद्ध वास्तव में पेशवाओं की 28000 सेना से नहीं बल्कि अरब सैनिकों वाली 2000 की टुकड़ी से हुआ था। जब अंग्रेज पेशवाओं, होल्करों,सिंधियाओं, गायकवाड़ों को संधियों के माध्यम से तोड़ चुके थे और भारतीय दलितों और मुसलमानों को फौज में शामिल करके अपनी फौजें मजबूत बना चुके थे तब ये स्थितियां निर्मित हुईं थीं। ये जीवन भर अविजित रहने वाले बाजीराव पेशवा नहीं बल्कि उसके बाद पेशवा द्वितीय के दौर की घटना है।
ये भारत में अंग्रेजी राज की स्थापना के दौरान हुए संघर्षों की भी कहानी है, जिसके बाद अंग्रेजी हुकूमत ने देश में मजबूती से अपने कदम जमाए थे। इसीलिए दलित राजनीति करके भारत में फूट की इबारत लिखी गई।भारतीय समाज वैसे भी चार हिस्सों में बंटा था। इसलिए बाद में कांसीराम के नेतृ्त्व में एकत्रित दलित इसे मनुवादी व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष का ऐलान कहते रहे। कांग्रेस ने भी अंग्रेजों की तरह फूट के इस गणित को समझा और भारत में अंग्रेजी राज के नए संस्करण की नींव रखी।तबसे वह हर बार यही प्रयास करती रही है कि दलित एजेंडा चलाकर फूट के बीज बोए। आज भारत में पेशवाओं की तरह पतन की दहलीज पर पहुंच चुकी कांग्रेस अपने जीवन का संघर्ष कर रही है। इसलिए वह जिग्नेश मेवाणी या उमर खालिद जैसे समाज को बांटने वाले नेताओं के सहारे दलितों को समाज की मुख्यधारा से काटने की कोशिश कर रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी यदि सबका साथ सबका विकास के नारे का उद्घोष करते हैं तो कांग्रेस उमर खालिद जैसे नेताओं को संरक्षण देने की वकालत करती है जो भारत तेरे टुकड़े होंगे ईंशाअल्लाह जैसे नारे लगाते रहे हैं।
भारत में दलित राजनीति का दौर बीत चला है, क्योंकि समाज में दलितों को लेकर कोई भेदभाव नहीं बचा है। इसके बावजूद नौकरियों और प्रमोशन में आरक्षण जैसे मुद्दों पर लूट का चक्र चलाने वाले दलितों को उकसाकर कांग्रेस अपना उल्लू सीधा करना चाह रही है। कांग्रेस को अपना भाग्य संवारने या बिगाड़ने का पूरा हक है। इसके बावजूद भाजपा को किसने रोका कि वह अपने ऐेजेंडे पर चलकर भारत का संपूर्ण विकास न करे। भाजपा ने अपने वास्तविक नेताओं के बीच से जिन फर्जी और कागजी नेताओं को सत्ता की बागडोर सौंपी है उनके चलते आज तक वैमनस्य की ये राजनीति समाप्त नहीं हो सकी है। भाजपा का शीर्ष नेतृत्व सबके विकास की बात तो करता है पर वो विकास उसी तबके का कर रहा है जो पहले से समृद्ध हैं। रिश्वतें दे सकने में सक्षम हैं। जिसके चलते विकास की दौड़ में पहले से पिछड़े लोग आज भी पिछड़ते जा रहे हैं। कांग्रेस ने सरकारी नौकरियों में जिन्हें जगह दी थी वही आज भी नौकरियां कब्जा रहे हैं। दलितों के नाम पर जिन फर्जी दलितों को नौकरियां दी गईं हैं वे अपने संसाधनों का वितरण सहधर्मी बंधुओं में नहीं कर रहे हैं। जाहिर है कि भेदभाव और असमानता का वही दौर आज भी जारी है जो कांग्रेस विरासत में छोड़ गई है। दलितों के सत्तासीन होने से भी ये हालात नहीं बदले। बल्कि शोषकों का एक नया तबका मैदान पर खड़ा हो गया जिसने संसाधनों का पूरा वितरण सोख लिया। देश में जिन जिन राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं वहां उनके शासकों ने कांग्रेस की नीतियों में कोई बड़ा फेरबदल नहीं किया। ज्यादातर राज्यों में भाजपा ने कांग्रेस के पूर्व सत्ताधीशों से गलबहियां कर लीं और संसाधनों की लूट शुरु कर दी। महाराष्ट्र में भी यही सब हुआ है।शिवसेना को पछाड़ने के चक्कर में भाजपा ने दलितों के प्रति नरम रवैया अपनाना शुरु कर दिया। पर वे ये भूल गए कि दलित कभी हमारा या तुम्हारा नहीं होता। जब आप उसे दलित कह देते हैं तो वह केवल दलितों का ही होता है। भाजपा ने कांग्रेस को परास्त करने के लिए जो कांग्रेस की सोच को अपनाया है वही इस मौजूदा दंगों की वजह बन गयी है। अब उसे इन दंगाईयों से सख्ती से निपटना होगा। यदि भाजपा के नेता इन दंगों को कुचलने में कायमाब नहीं होते हैं और चोरी छुपे चलाए जा रहे दलित एजेंडे को पंचर नहीं करते हैं तो ये आग इसी तरह नए नए रूप में भड़कती रहेगी। देश ने भाजपा को विकास के लिए चुना है। जातिगत राजनीति को चलते रहने देने के लिए नहीं। मध्यप्रदेश में भी दंगे के इस गणित को फलित करने के प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन यहां उसके लायक खाद पानी नहीं है।
भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को चाहिए कि वो समय रहते अपनी गलती सुधारे। उसे देश को जाति धर्म के आधार पर बांटकर देखने वाली नीति पर सख्त प्रतिबंध लगाना होगा। आने वाले चुनावों के चक्कर में वो समाज को बांटने वाली जिन नीतियों को छूना भी नहीं चाहती उनके समानांतर उसे तीव्र विकास की जंग छेड़नी होगी। तभी वह कांग्रेस की बोई खरपतवार का उन्मूलन कर सकती है। वैसे भाजपा का जन्म जिस फार्मूले पर हुआ था उस पर न चलकर वह पहले ही कांग्रेस की पूंछ पकड़ चुकी है। जाहिर है कि ऐसे में उसे कोई अवतारी नेतृत्व ही शुभ मार्ग पर ला सकता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आर्थिक सुधारों पर जो ध्यान लगाया है उसे असफल करने में जुटे व्यापारी और शोषक तबके को गियर में लिए बगैर सरकार इन घटनाओं को नहीं रोक सकती। उसे अपनी राज्य सरकारों के कान उमेंठने होंगे तभी वह सबको साथ लेकर देश की तस्वीर बदल सकेगी।
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