आज से अड़सठ साल पहले भारत ने अपना संविधान लिखा और संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न गणतंत्रात्मक राज्य की अवधारणा को फलीभूत किया था। तब ये लगा था कि आजाद हिंदुस्तान तमाम सुधारों के साथ जन जन की आकांक्षाओं को पूरा कर सकेगा।इस दिशा में बहुत सारे प्रयास भी हुए। उनमें सफलता भी मिली। इसके बावजूद आज तक इस लोकतंत्र को वैश्विक कसौटियों पर खरा नहीं साबित किया जा सका है। इसकी सबसे बड़ी वजह थी समानांतर अर्थव्यवस्था। अंग्रेजों से सत्ता हस्तांतरण के बाद जो अंग्रेजपरस्त कांग्रेसी सरकारें आईं उन्होंने चोरी की अर्थव्यवस्था को ही बढ़ावा दिया। इसकी वजह उनकी वे अनैतिक संधियां थीं जो उन्होंने अंग्रेजों को खुश करने और कथित आजादी की जल्दबाजी में कीं थीं। इन संधियों में सबसे बड़ी भूमिका पं. जवाहर लाल नेहरू और उनके वकीलों के गिरोह ने निभाई थी। ये गिरोह सत्ता पाने की इतनी हड़बड़ी में था कि उसने पाकिस्तान विभाजन भी स्वीकार किया और जम्मू कश्मीर जैसे तमाम विवादों को भी अनसुलझा बनाए रखा। देश आज तक उन नासूरों को झेल रहा है। सत्ता हस्तांतरण के दस्तावेजों में जो शर्ते लिखीं गईं उनमें देश के आर्थिक संसाधनों पर ब्रिटेन का कब्जा बरकरार था। टाटा बिड़ला जैसी भारतीय कंपनियों में निवेश करके अंग्रेजों ने अपनी आय का स्रोत बनाए रखा। आगे चलकर बैंकों का राष्ट्रीयकरण भी इसलिए किया गया ताकि यहां से कर्ज लेकर डूबत खातों की राशि बटोरकर लोग ब्रिटेन में जाकर बस सकें। ब्रिटिश पार्क आज भारत में समृद्धि की मिसाल माना जाता है जबकि वो यहां का धन लूटने वालों की बस्ती है। गणतंत्र के नाम पर अंग्रेजों से की गईं संधियों के संरक्षण का काम भी बखूबी किया गया। लोकतंत्र के नाम पर कांग्रेसियों ने अपने चपरासियों, हरवाहों को लोकतंत्र के शीर्ष पर बिठा दिया। बरसों तक देश यही छल झेलता रहा। जिसने चूं चपट की उसकी फाईल न्यायपालिका में बैठे अंकल जजों ने निपटा दी। लूट का कारोबार कार्यपालिका संभालती रही। आजादी के साढ़े छह दशक बीत जाने के बाद अब पहली बार महसूस हो रहा है कि देश एक नई दिशा में अग्रसर हो रहा है। वैसे तो आर्थिक सुधारों पर पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव की सरकार ने जो इबारत लिखी वो मील का पत्थर थी। इसके बावजूद कांग्रेसियों ने पच्चीस सालों तक उन सुधारों को लागू नहीं होने दिया। दस सालों तक प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहनसिंह ने कई मूलभूत सुधारों को लागू किया लेकिन समानांतर अर्थव्यवस्था के खिलाड़ियों ने उनकी सरकार को घोटालों की सरकार बना दिया। सत्ता में आने के बाद भारतीय जनता पार्टी की सरकार को भी लगातार धमकियां दी जा रहीं हैं। नोटबंदी और जीएसटी से हलाकान वे तमाम चोर व्यापारी भी आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को गरिया रहे हैं जिनकी चोरी की आदत अब उन्हें झमेले में डाल रही है। ऐसे चोर कांग्रेस में खूब फले फूले अब वे भाजपा में भी प्रमुख बने हुए हैं। आर्थिक सुधारों ने उनकी भी जान सांसत में फंसा रखी है। नोटबंदी यदि आपदा थी तो आरएसएस को उन तमाम आपदाओं के समान सेवा कार्य की तरह आर्थिक विकास की दिशा का मार्गदर्शन करना था। लेकिन समस्या ये थी कि आरएसएस के पास भी ऐसे स्वयंसेवक नहीं थे जो नए आर्थिक माहौल को समझ सकते और उसके अनुकूल मार्गदर्शन करते। यही वजह है कि तमाम प्रयासों के बावजूद देश की आय और रुपये की समृद्धि नहीं बढ़ पा रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सत्ता संभालते वक्त कहा था कि वे देश के तमाम गैर उपयोगी कानूनों को हटा देना चाहते हैं। उनके कहने के बावजूद देश में वे तमाम कानून आज तक लागू हैं जिनके माध्यम से भारत की जड़ता को संरक्षित किया जाता रहा है। नियंत्रित अर्थव्यवस्था के दौर में बने तमाम कानून आज अप्रासंगिक हो चले हैं। देश मुक्त बाजार और उपभोक्तावादी अर्थव्यवस्था की पटरी पर दौड़ रहा है। ऐसे में भारत को नए कानूनों की जरूरत है। नए विचारस्रोतों की जरूरत है। इसलिए अड़सठवें गणतंत्र के अवसर पर सबसे जरूरी प्रयास उन तमाम कानूनों को बदल डालने की है जो भारतीय गणतंत्र के पैरों की बेड़ियां बन गए हैं। अरबों के कर्ज पर सांसें ले रही अर्थव्यवस्था को यदि ब्याजमुक्त बनाना है तो देश को नई करवट लेनी होगी। कानूनों का जाल काटना होगा। सरल फार्मूलों से देश को पूंजी उत्पादक बनाना होगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दुनिया भर में भारत को व्यापारिक देश की छवि से रंगने का प्रयास कर रहे हैं। ये क्रांतिकारी दौर है।पर ये तभी सफल हो सकता है जब भारत में जातिवाद, संप्रदायवाद, नियंत्रणवाद और तमाम किस्म की बदमाशियों को धूल धूसरित कर दिया जाए। जब तक देश समाजवाद, साम्यवाद, उदारवाद जैसे मूर्खतापूर्ण विचारों के बीच झूलता रहेगा तब तक देश में आर्थिक मजबूती का लक्ष्य पूरा नहीं हो सकेगा। लोकतंत्र के इस महापर्व पर भारत की जड़ता तोड़ने के ये प्रयास होंगे तो सत्ता की मौजूदा पीढ़ी का स्वप्न जल्दी पूरा हो सकेगा।
Month: January 2018
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देश के स्वास्थ्य पर भी सर्जिकल स्ट्राईक की जरूरतःडॉ.पारे
भोपाल,23 जनवरी,(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)। भारत की मौजूदा स्वास्थ्य व्यवस्थाएं एक महान देश को लाचार बना रहीं हैं। मोदी सरकार को इन पर सर्जिकल स्ट्राईक करके इसमें आमूल चूल बदलाव करना होगा। इस मुद्दे पर चुप्पी देश को भारी मंहगी पड़ रही है। युवाओं का देश भारत आज बीमार है और इसे स्वस्थ बनाने के लिए हम जो संसाधन झोंक रहे हैं उनसे हमारी प्रगति प्रभावित हो रही है। ये विचार एलोपैथिक और प्राकृतिक चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ.अंबर पारे ने व्यक्त किए।
राजधानी के स्वराज भवन सभागार में अक्षर प्रभात जीव संरक्षण की ओर से आयोजित व्याख्यान माला में उन्होंने ये विचार व्यक्त किए। नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती पर आयोजित इस कार्यक्रम में अक्षर प्रभात ट्रस्ट के रामगोपाल बंसल, रामनिवास गोलस और आनंद मार्ग संप्रदाय के कई गणमान्य व्यक्ति भी उपस्थित थे। इस अवसर पर शाकाहार को प्रोत्साहित करने वाली पुस्तक (हम भी पशु हैं क्या) का विमोचन किया गया।
लाईलाज बीमारियों के इलाज के लिए लगभग 150 गांवों में मेडिकल कैंप लगाने वाले डॉ.अंबर पारे ने कहा कि देश के बीमार स्वास्थ्य ढांचे से निपटने के लिए हमें एलोपैथी, आयुर्वेद, होम्योपैथी और नेचुरोपैथी सभी का मिला जुला प्रयोग करना होगा। उन्होंने कहा कि भारत में हर व्यक्ति घरेलू दवाओं की जानकारी रखता है लेकिन उसे इतना ज्यादा डरा दिया जाता है कि वो जड़ी बूटियों और चूरन चटनी को खलनायक मानने लगता है। बाजारू सोच ने आम नागरिकों की जीवनशैली को इतना अधिक प्रदूषित कर दिया है कि लोगों की जीवन शक्ति घट गई है। नए नए प्रकार के रोग बढ़ रहे हैं। इसके लिए देश में व्यापक जन जागरण अभियान चलाना होगा। मौजूदा स्वास्थ्य ढांचे की गड़बड़ियों को उजागर करने के का जिम्मा सरकार को अपने हाथों में लेना होगा और इस क्षेत्र में उसी तरह सर्जिकल स्ट्राईक करनी होगी जैसे पाकिस्तान के खिलाफ की गई थी। खासतौर पर ह्दय रोगियों को तरह तरह से भयाक्रांत किया जा रहा है और उनसे भारी रकम वसूल की जा रही है।
आज भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा रोगी देश है। यहां दवाओं और इलाजों पर हर साल पांच लाख करोड़ से भी ज्यादा धन खर्च होता है। भारत को ठंडे देशों के लिए बनी दवाईयों की प्रयोगशाला बना दिया गया है। जबकि वे दवाईयां हमारी प्रकृति, खानपान और मनोदशाओं के लिए दुश्मन साबित हो रहीं हैं। उन्होंने कहा कि साईंटिफिक क्वांटम कन्शसनेस, सुपर कान्शियस एवं सब कांन्शियस, साईंस बियांड साईंस, योग एंड साईंटिफिक हीलिंग थैरेपी, स्पीरीचुअल साईंटिफिक हीलिंग पर अनुसंधान करके जो तरीके विकसित किए गए हैं उनसे असाध्य बीमारियों का भी इलाज संभव है।
उन्होंने कहा कि 99 फीसदी चिकित्सक और मरीज इंसान के शरीर के लक्षणों के आधार पर इलाज करते हैं। जबकि इसकी जड़ हमारे प्राण शरीर में छुपी होती है। इसके लक्षण साल भर या छह महीने पहले ही नजर आने लगते हैं। इसके बावजूद डाक्टर पैथालाजी रिपोर्ट के आधार पर मरीज को क्लीन चिट दे देते हैं। बाद में रोग को असाध्य घोषित कर दिया जाता है। डॉ.पारे ने कहा कि हम प्राकृतिक चिकित्सा से शरीर के रोग हटाने पर जोर देते हैं जिससे मरीज का स्थाई इलाज होता है। व्याख्यानमाला के दौरान सफल इलाज पाने वाले पूजा, सोनल और कई अन्य रोगियों के अनुभव भी साझा किए गए। अंत में रामनिवास गोलस ने सभी आगंतुकों के प्रति आभार व्यक्त किया।
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भाजपा चाहे सत्ता की समानांतर धुरी

मध्यप्रदेश में चुनावी बुखार शुरु हो गया है। कांग्रेस के चुनावी मोड में आते ही भाजपा ने अपनी सतत संगठित होने की प्रक्रिया को भांजना शुरु कर दिया है। फिलहाल भाजपा के दिग्गजों की चिंता यही है कि चौदह साल से सत्ता पर आसीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भाजपा के लिए कहीं दिग्विजय न साबित हों। जिस तरह दिग्विजय सिंह ने जान बूझकर कांग्रेस का बंटाढार किया उसी तरह शिवराज भी भाजपा के लिए भस्मासुर न साबित हो जाएं। उनके बयानों ने और ताजा राजनीतिक यात्राओं ने भाजपा के दिग्गजों के कान खड़े कर दिये हैं। इसके चलते भाजपा अब मध्यप्रदेश में कोई नया राजनीतिक फेरबदल कर सकती है। कम से कम मुख्यमंत्री की गतिविधियों पर निगाह रखने के लिए वह किसी नेता को उप मुख्यमंत्री बना सकती है। इसके अलावा फिलहाल राज्यपाल की कुर्सी भी लगभग खाली है। इसलिए भाजपा इस पद का भी इस्तेमाल कर सकती है। फिलहाल नई राज्यपाल के रूप में गुजरात की पूर्व मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल की नियुक्ती की घोषणा ने भाजपा के दिग्गजों की चूलें हिला दी हैं। -

अब तो मिटा दीजिए धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद
-संदीप कोरी-
बदलते वक्त ने भारत की कई व्यवस्थाओं को अप्रासंगिक कर दिया है। इसके बावजूद ढर्रे पर चलने वाली सरकारों ने उन्हें छोड़ने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई है। देश पर आपातकाल थोपने वाली इँदिरागांधी के कई फैसले वक्त की कसौटी पर देश से गद्दारी साबित हो रहे हैं। इसके बावजूद सत्ता की सुविधा को देखते हुए उन फैसलों पर सरकारें खामोश बनी हुईं हैं। अब तक की कांग्रेसी सरकारों से तो उन फैसलों को बदलने की कोई उम्मीद नहीं की जा सकती थी लेकिन इसके बाद आई गैर कांग्रेसी सरकारों ने भी उन फैसलों पर चुप्पी साधे रखी। संविधान में किया गया 42 वां संशोधन इसी तरह का एक विवादास्पद हस्तक्षेप था जिसे अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार इसलिए नहीं बदलना चाहती क्योंकि इससे मतों का ध्रुवीकरण होता है और वो सत्ताधीश के लिए फायदेमंद महसूस होता है। हालांकि ये संशोधन भारतीय गणराज्य को एकजुट रखने की दिशा में सबसे बड़ा व्यवधान बना हुआ है।
इंदिरा गांधी ने आपातकाल के दौरान कानून में जो संशोधन किए उनके बाद उसे अंग्रेजी में ‘कंस्टीट्यूशन ऑफ इंडिया’ की जगह ‘कंस्टीट्यूशन ऑफ इंदिरा’ कहा जाने लगा था. इस दौर में संविधान में जो बदलाव किए गए उनके क्या नतीजे निकले और बाद में जनता पार्टी सरकार ने 44 वें संशोधन के माध्यम से जो बदलाव किए क्या वे भी कारगर कहे जा सकते हैं।संविधान से खिलवाड़ का ये दौर इंदिरागांधी की तानाशाही भरी सोच से उपजी थी। जिसने पूर्ववर्ती सरकारों के वायदों को धूल धूसरित कर दिया था।
19 मार्च 1975 को इंदिरा गांधी को चुनाव याचिका की सुनवाई के लिए न्यायालय में गवाही के लिए आना पड़ा था।इसी वक्त जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में लाखों लोगों की भीड़ दिल्ली की सडकों पर इंदिरा गांधी के खिलाफ नारे लगा रही थी। दिल्ली की सड़कों पर सिंहासन खाली करो कि जनता आती है और जनता का दिल बोल रहा है इंदिरा का शासन डोल रहा है के नारे लगाए जा रहे थे।
इंदिरा गांधी ने तब अपनी सरकार का बचाव करते हुए कहा कि कुछ विदेशी ताकतें भारत में अस्थिरता लाना चाहती हैं। इसलिए आपातकाल समय की जरूरत है। इसके लिए उन्होंने कई संविधान संशोधन किए। 40 वें और 41 वें संशोधन के बाद उन्होंने 42 वां संशोधन पास करवाया जिसमें समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता जैसे लुभावन शब्दों की आड़ में पूर्ववर्ती सरकारों के कई वायदे तोड़ दिए गए।
कुछ ही दिनों बाद 12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में इंदिरा गांधी के चुनाव को गलत बताते हुए रद्द कर दिया। इसी महीने 25 जून को देश में आपातकाल घोषित कर दिया गया. इसके बाद संविधान में कई संशोधन किए गए और जनता के हाथों दी गईं शक्तियां छीनकर शासक के हाथों में सौंप दी गईं.
आपातकाल में हुए संशोधनों में सबसे पहला था भारतीय संविधान का 38वां संशोधन. 22 जुलाई 1975 को पास हुए इस संशोधन के द्वारा न्यायपालिका से आपातकाल की न्यायिक समीक्षा करने का अधिकार छीन लिया गया. इसके लगभग दो महीने बाद ही संविधान का 39वां संशोधन लाया गया. यह संविधान संशोधन इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री पद को बनाए रखने के लिए किया गया था. इलाहाबाद उच्च न्यायालय इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द कर चुका था. लेकिन इस संशोधन ने न्यायपालिका से प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त व्यक्ति के चुनाव की जांच करने का अधिकार ही छीन लिया. इस संशोधन के अनुसार प्रधानमंत्री के चुनाव की जांच सिर्फ संसद द्वारा गठित की गई समिति ही कर सकती थी. आपातकाल को समय की जरूरत बताते हुए इंदिरा गांधी ने उस दौर में लगातार कई संविधान संशोधन किये. 40वें और 41वें संशोधन के जरिये संविधान के कई प्रावधानों को बदलने के बाद 42वां संशोधन पास किया गया. इसी संशोधन के कारण संविधान को ‘कंस्टीट्यूशन ऑफ इंदिरा’ कहा जाने लगा था. इसके जरिये भारतीय संविधान की प्रस्तावना तक में बदलाव कर दिए गए थे.
42वें संशोधन के सबसे विवादास्पद प्रावधानों में से एक था – मौलिक अधिकारों की तुलना में राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों को वरीयता देना. इस प्रावधान के कारण किसी भी व्यक्ति को उसके मौलिक अधिकारों तक से वंचित किया जा सकता था. इसके साथ ही इस संशोधन ने न्यायपालिका को पूरी तरह से बौना कर दिया था. वहीँ विधायिका को अपार शक्तियां दे दी गई थी. अब केंद्र सरकार को यह भी शक्ति थी कि वह किसी भी राज्य में कानून व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर कभी भी सैन्य या पुलिस बल भेज सकती थी. साथ ही राज्यों के कई अधिकारों को केंद्र के अधिकार क्षेत्र में डाल दिया गया.
42वें संशोधन का एक और कुख्यात प्रावधान ‘संविधान में संशोधन’ के सम्बंध में भी था. हालांकि आपातकाल से कुछ साल पहले सर्वोच्च न्यायालय ने केशवानंद भारती मामले में ऐतिहासिक फैसला देते हुए संविधान में संशोधन करने के पैमाने तय कर दिए थे. लेकिन 42वें संशोधन ने इन पैमानों को भी दरकिनार कर दिया. इस संशोधन के बाद विधायिका द्वारा किए गए ‘संविधान-संशोधनों’ को किसी भी आधार पर न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती थी. साथ ही सांसदों एवं विधायकों की सदस्यता को भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती थी. किसी विवाद की स्थिति में उनकी सदस्यता पर फैसला लेने का अधिकार सिर्फ राष्ट्रपति को दे दिया गया और संसद का कार्यकाल भी पांच वर्ष से बढाकर छह वर्ष कर दिया गया.
आपातकाल के दौरान भारतीय संविधान में कुछ संशोधन ऐसे भी हुए जिन्हें उस वक्त सकारात्म नजरिए से देखा गया। संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवाद’, ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘अखंडता’ जैसे शब्दों को जोड़ दिया गया।कहा गया कि ये हमारा मौलिक कर्तव्य भी है। जबकि आज समाजवाद पूरे विश्व से तिरोहित हो चला है। धर्मनिरपेक्षता ने समाज को बांटकर रख दिया है। इससे जहां मुस्लिम तुष्टिकरण को बढ़ावा देकर कांग्रेस की सरकारों ने वोट बैंक पालिटिक्स खेली वहीं आगे चलकर ये ध्रुवीकरण भाजपा के सत्तासीन होने की प्रमुख सीढ़ी भी बना।आज जो लोग भारत तेरे टुकड़े होंगे जैसे नारे लगाते हैं उसके पीछे इस संशोधन से जबरिया पैदा किया दबाव भी शामिल है। जब वैश्विक उपभोक्तावाद ने प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दिया है तब ये संशोधन जबरन मारें रोवन न देय के हालात पैदा कर रहा है।
आपातकाल के बाद हुए चुनावों में इंदिरा गांधी बुरी तरह चुनाव हारीं। 1977 में पहली बार भारत में एक गैर-कांग्रेसी सरकार बनी. मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली जनता पार्टी की सरकार ने आते ही संविधान के बदलावों को सुधारने का काम किया। इसकी जवाबदारी तत्कालीन कानून मंत्री शांति भूषण को दी गई। जनता पार्टी ने सबसे पहले 43वें संशोधन के जरिये सर्वोच्च एवं उच्च न्यायालयों को उनके अधिकार वापस दिलाए। इसके बाद संविधान में44वां संशोधन किया गया। सर्वोच्च न्यायालय ने भी 42वें संशोधन के कई प्रावधानों को असंवैधानिक बताते हुए संविधान को उसका मूल स्वरुप लौटाया।
न्यायपालिका को दोबारा मजबूती देकर और 42वें संशोधन के दोषों को दूर करने के साथ ही 44वें संशोधन ने संविधान को पहले से भी ज्यादा मजबूत करने का काम भी किया है. इस संशोधन ने संविधान में कई ऐसे बदलाव किये जिससे 1975 के आपातकाल जैसी स्थिति दोबारा उत्पन्न न हो. आपातकाल सम्बन्धी प्रावधानों में ‘आतंरिक अशांति’ के स्थान पर ‘सशस्त्र विद्रोह’ शब्द जोड़ा गया. इसके साथ ही इस संशोधन ने मौलिक अधिकारों को भी मजबूती दी।हालांकि कांग्रेस की सरकारों ने षड़यंत्र इसके बाद भी खत्म नहीं किए। जब मनमोहन सिंह की सरकार के खिलाफ आंदोलन शुरु हुए तो अफवाह फैलाई गई कि सेना की एक सशस्त्र टुकड़ी दिल्ली की ओर कूच कर गई है। सजग सेनाध्यक्ष ने तब इस अफवाह का खंडन किया और आपातकाल लगाने का कांग्रेस का षड़यंत्र फिर फेल हो गया।
जनता पार्टी की सरकार अपने आंतरिक विरोधों की वजह से ज्यादा नहीं चल सकी। कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा जोड़कर बनाई गई सरकार के घटक आपसी खींचतान में उलझ गए और उन्होंने सरकार को बिखेर दिया। कांग्रेस की सरकारों की रीढ़ तोड़कर भले ही जनता पार्टी की सरकार ने देश में लोकतंत्र की बहाली की इबारत लिखी हो लेकिन वह एक नए देश के निर्माण का वादा पूरा नहीं कर सकी। इसके बाद आई गैर कांग्रेसी सरकारों ने भी काफी काम किया लेकिन वे इंदिरा गांधी के सत्ता को केन्द्रित करने वाले फैसलों को नहीं बदल सकीं। मौजूदा मोदी सरकार समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता जैसे शब्दों को बदलकर अपना दायित्व निभा सकती है क्योंकि इन शब्दों को लेकर आरएसएस और भाजपा ने ही देश को आशा की नई किरण दिखलाई थी।
(लेखक जन न्याय दल के भ्रष्टाचार मुक्त भारत,जनांदोलन के राष्ट्रीय संयोजक हैं)
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संविधान से समाजवाद और धर्मनिरपेक्ष शब्द हटाएं – जन न्याय दल
सागर,8 जनवरी(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)। जन न्याय दल ने राष्ट्रपति महामहिम रामनाथ कोविंद को ज्ञापन भेजकर मांग की है कि सर्वधर्म समभाव स्थापित करने के लिए संविधान से समाजवाद और धर्मनिरपेक्ष शब्द हटाने के निर्देश दें। ये शब्द पूर्व वर्ती कांग्रेस सरकार ने 42 वें संविधान संशोधन के माध्यम से जोड़े थे। ज्ञापन में कहा गया है कि इन शब्दों के मनमाने अर्थ निकालकर कांग्रेस ने सेक्युलरिज्म के नाम पर मुस्लिम वोट कबाड़ने के लिए तुष्टिकरण की नीति अपनाई थी। इसके साथ साथ भाजपा ने भी प्रतिक्रिया स्वरूप हिंदू वोट कबाड़े। ज्ञापन की प्रतियां सभी सांसदों को भी भेजी गईं हैं।
सागर में आयोजित पत्रकार वार्ता में जन-न्याय दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष एडवोकेट बृजबिहारी चैरसिया ने कहा कि इन शब्दों के कारण देश की समरसता दूषित हो रही है। उन्होंने कहा कि आर.एस.एस. की हिन्दुत्व व राष्ट्रवादी वैचारिक सोच देश की एकता और अखण्डता के लिए मील का पत्थर है। एक सवाल के जबाब में उन्होंने कहा कि आर.एस.एस. ने जो जन संवाद किया उसके कारण ही आज कांग्रेस मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति त्यागकर हिन्दुत्व की राह पर चलने को मजबूर हुई है। उन्होंने बताया कि उनकी पार्टी सुप्रीम कोर्ट से रिटायर्ड जस्टिस के.टी. थॉमस के उस बयान का स्वागत करती है जिसमें उन्होंने कहा है कि संविधान और सेनाओं के बाद आर.एस.एस. ने भारत के लोगों को सुरक्षित रखा।
उन्होंने भाजपा पर आरोप लगाया कि भले ही वह आर.एस.एस. के वैचारिक सोच का राजनैतिक मुखौटा बनकर सत्तासीन हो गई है मगर अब उस सोच के विपरीत वह कांग्रेस की कार्बन कापी बनकर रह गई है। उन्होंने कहा कि राममंदिर, गौरक्षा कानून, समान नागरिक संहिता, धारा 370, स्वदेशी जैसे मूलभूत मुद्दों पर भाजपा की कथनी और करनी अब जनता के सामने उजागर हो चुकी है।
जातिवाद पर पूछे गये सवाल पर उन्होंने कहा कि जाति भारतीय समाज की सच्चाई है। उन्होंने राजनैतिक पार्टियों पर आरोप लगाया कि वे अपने राजनैतिक नफा-नुकसान के आधार पर जातिवाद को परिभाषित कर रहीं हैं। उन्होंने एस.सी.,एस.टी. और ओ.बी.सी. वर्गो के संवैधानिक गठन का आधार सिर्फ जाति को बताते हुये देश के संसाधनों व अवसरों के वितरण को इन्हीं वर्गो की जनसंख्या के आधार पर करने की वकालत की।
उन्होंने प्रदेश की भाजपा सरकार पर आरोप लगाया कि शराब की बुराई को स्वीकार करने के बाद भी भाजपा प्रदेश में कानूनन शराबबंदी की दिशा में पहल न करके जन-अपराध कर रही है। उन्होंने मुख्यमंत्री से आग्रह किया है कि वे शराबबंदी ना कर पाने की अपनी लाचारी जनता के सामने रखें और कारण बतायें। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के जो नेता शराबबंदी की बात करते हैं उन्हें पहले अपनी पार्टी के भीतर इस मुद्दे पर नीतिगत निर्णय करवाना चाहिए।
श्री चौरसिया ने कहा कि महिलाओं पर अत्याचार और कानून व्यवस्था के मामले में पिछले कुछ समय से मध्यप्रदेश में हालात काफी बिगड़े हैं। ऐसे में पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने पुलिस जन-संवाद कार्यक्रम के माध्यम से अगले तीन महीनो में थाना स्तर पर जनता से जुड़ने का जो अभियान चलाया है वो एक बेहतर कदम साबित हो सकता है।
एक सवाल के जवाब में श्री चौरसिया ने कहा कि उनकी पार्टी मतदाताओं को वोट बैंक नहीं मानती इसलिए केवल ऊर्जावान प्रत्याशियों को ही चुनाव मैदान में उतारेगी। जातिगत तुष्टिकरण के चलते किसी भी मुसलमान को टिकिट नहीं देगी। उन्होंने कहा कि भारत और पाकिस्तान का विभाजन धर्म के आधार पर हुआ था। मुसलमानों के लिए पाकिस्तान बना था। इस लिहाज से यदि भारत का मुसलमान धर्म की बात करता है तो उसे पाकिस्तान जाना होगा। भारत के मुसलमानों ने धर्म के बजाए देश चुना था इसलिए उनके सामने धर्म को लेकर कोई दुविधा नहीं होनी चाहिए।
उन्होंने बताया कि उनकी पार्टी वर्ष 2018 के प्रदेश विधानसभा चुनाव में हिस्सा लेकर अपनी लोकतांत्रिक भूमिका का निर्वहन करेगी। पार्टी की कार्यसमिति ने शिवराज सिंह ठाकुर को प्रभारी बनाकर छत्तीस सदस्यीय प्रदेश चुनाव संचालन समिति गठित कर दी है। उन्होंने बताया कि पार्टी अपनी चुनावी तैयारी विधानसभावार कर रही है। उनकी पार्टी चुनाव प्रचार के साथ ही विधानसभावार संसद से कानून बनाकर राम मंदिर व गौ हत्या रोकने के कानून बनाने और मध्यप्रदेश में कानूनन शराबबंदी के लिये जनता को संकल्पित करेगी जिसके लिये पार्टी ‘‘संकल्प-अभियान’’ जारी करने जा रही है। पत्रकार वार्ता में पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता आलोक सिंघई, इंजी.संदीप कोरी और अनूप चौकसे भी उपस्थित थे।
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बाजीराव पेशवा से दोराहा में आज ही हारा था निजाम
7 जनवरी विजय दिवस पर विशेष

बाजीराव मस्तानी फिल्म ने भारत के गौरव की धूलधूसरित हो रही गौरवगाथाओं को एक बार फिर जीवंत कर दिया है। आज युवा पीढ़ी के लड़के लड़कियां इतिहास को खंगाल रहे हैं और तब उन्हें आश्चर्य हो रहा है कि उनके बीच ऐसा कमाल का योद्धा भी हुआ है जो कभी हारा ही नहीं। बाजीराव बल्लाल भट्ट ने शिवाजी का अधूरा सपना पूरा करने में हमेशा बहादुरी की नई मिसालें पेश कीं। दरअसल जब औरंगजेब के दरबार में अपमानित हुए वीर शिवाजी आगरा में उसकी कैद से बचकर भागे तो उन्होंने सोचा था कि न जाने वो दिन कब आएगा जब वे पूरी मुगल सल्तनत को देश के कदमों में झुका सकेंगे। वे मराठा ताकत का अहसास पूरे हिंदुस्तान को करवाना चाहते थे।अटक से कटक तक केसरिया परचम फहराने का नारा यहीं से जन्म लिया।इस सपने को पूरा करने का साहस बाजीराव पेशवा प्रथम ने किया।उसने साम्राज्य छीने नहीं बल्कि उन्हें अपने शौर्य का लोहा मानने पर मजबूर कर दिया। उन्नीस-बीस साल के उस युवा ने तीन दिन तक दिल्ली को बंधक बनाकर रखा। मुगल बादशाह की लाल किले से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं हुई। यहां तक कि 12वां मुगल बादशाह और औरंगजेब का नाती दिल्ली से बाहर भागने ही वाला था कि बाजीराव मुगलों को अपनी ताकत दिखाकर वापस लौट गया।बाजीराव अकेला ऐसा योद्धा था, जिसने 41 लड़ाइयां लड़ीं और एक भी नहीं हारी, जबकि शिवाजी जैसे शूरवीरों को भी कई बार अपने कदम पीछे हटाने पड़े । द्वितीय विश्वयुद्ध में ब्रिटिश आर्मी के कमांडर रहे मशहूर सेनापति जनरल मांटगोमरी ने भी अपनी किताब ‘हिस्ट्री ऑफ वॉरफेयर’ में बाजीराव की बिजली की गति से तेज आक्रमण शैली की जमकर तारीफ की है और लिखा है कि बाजीराव कभी हारा नहीं। आज वो किताब ब्रिटेन में डिफेंस स्टडीज के कोर्स में पढ़ाई जाती है। बाद में यही आक्रमण शैली सेकंड वर्ल्ड वॉर में अपनाई गई, जिसे ‘ब्लिट्जक्रिग’ बोला गया।
बाजीराव पहला ऐसा योद्धा था, जिसके समय में 70 से 80 फीसदी भारत पर उसका सिक्का चलता था। वो अकेला ऐसा राजा था जिसने मुगल ताकत को दिल्ली और उसके आसपास तक समेट दिया था। पूना शहर को कस्बे से महानगर में तब्दील करने वाला बाजीराव बल्लाल भट्ट था, सतारा से लाकर कई अमीर परिवार वहां बसाए गए। निजाम, बंगश से लेकर मुगलों और पुर्तगालियों तक को कई कई बार बाजीराव ने धूल चटाई। शिवाजी के नाती शाहूजी महाराज को गद्दी पर बैठाकर बाजीराव ने उनकी ताकत का लोहा पूरे देश से मनवाया। देश में पहली बार हिंदू पद पादशाही का सिद्धांत भी बाजीराव प्रथम ने दिया था। हर हिंदू राजा के लिए वे आधी रात मदद करने को तैयार रहते थे। पूरे देश का बादशाह एक हिंदू हो ये तो उसके जीवन का लक्ष्य था, लेकिन जनता किसी भी धर्म को मानती हो वह उसके साथ न्याय करता था। उसकी अपनी फौज में कई अहम पदों पर मुस्लिम सिपहसालार थे, लेकिन वो युद्ध से पहले हर हर महादेव का नारा भी लगाना नहीं भूलता था। उसमें व्यक्ति की योग्यता को पहचानने की क्षमता थी। यही वजह थी कि उसके सिपहसालार बाद में मराठा इतिहास की बड़ी ताकतों के रूप में उभरे। चाहे होल्कर हों या सिंधिया, पवार हों या शिंदे, गायकवाड़ सभी पेशवा बाजीराव बल्लाल की कसौटी पर ही परखे गए थे।
ग्वालियर, इंदौर, पूना और बड़ौदा जैसी ताकतवर रियासतें बाजीराव के चलते ही अस्तित्व में आईं। बुंदेलखंड की रियासत बाजीराव की शूरवीरता पर ही खुद को बचा सकी। महाराजा छत्रसाल की मौत के बाद उसका तिहाई हिस्सा भी बाजीराव को मिला। बनारस में बाजीराव ने 1735 में उनके नाम का एक घाट बनवाया था।दिल्ली के बिरला मंदिर में जाएंगे लगी बाजीराव की मूर्ति उनकी वीरता की कहानी कहती है। कच्छ में उन्होंने आईना महल बनवाया तो पूना में मस्तानी महल और शनिवार बाड़ा। अकबर की तरह बाजीराव को वक्त नहीं मिला, वह कम उम्र में ही चल बसा। उसके बाद आए शासकों और उनके परिजनों ने कई कारणों से उनके योगदान को प्रचारित करने में रुचि नहीं ली। देखा जाए तो अकबर के अलावा कोई और मुगल बादशाह नहीं था, जिससे उनकी तुलना बतौर योद्धा, न्यायप्रिय राजा और बेहतर प्रशासक के तौर पर की जा सके।
दिल्ली पर आक्रमण उसका सबसे बड़ा साहसिक कदम था, वो अक्सर शिवाजी के नाती छत्रपति शाहू से कहता था कि मुगल साम्राज्य की जड़ों यानी दिल्ली पर आक्रमण किए बिना मराठों की ताकत को बुलंदी पर पहुंचाना मुमकिन नहीं, और दिल्ली को तो मैं कभी भी कदमों पर झुका दूंगा। छत्रपति शाहू सात साल की उम्र से 25 साल की उम्र तक मुगलों की कैद में रहे थे, वो मुगलों की ताकत को बखूबी जानते थे, लेकिन बाजीराव का जोश उस पर भारी पड़ जाता था। धीरे धीरे उसने महाराष्ट्र को ही नहीं पूरे पश्चिम भारत को मुगल आधिपत्य से मुक्त कर दिया। फिर उसने दक्षिण का रुख किया, निजाम जो मुगल बादशाह से बगावत कर चुका था, एक बड़ी ताकत था। कम सेना होने के बावजूद बाजीराव ने उसे कई युद्धों में हराया और कई शर्तें थोपने के साथ उसे अपने प्रभाव में लिया।
इधर उसने बुंदेलखंड में मुगल सिपाहसालार मोहम्मद बंगश को हराया। मुगल असहाय थे, कई बार पेशवा से मात खा चुके थे, पेशवा का हौसला इससे बढ़ता गया। 1728 से 1735 के बीच पेशवा ने कई जंगें लड़ीं, पूरा मालवा और गुजरात उसके कब्जे में आ गया। बंगश, निजाम जैसे कई बड़े सिपहसालार पस्त हो चुके थे।
इधर दिल्ली का दरबार ताकतवर सैयद बंधुओं को ठिकाने लगा चुका था, निजाम पहले ही विद्रोही हो चुका था। उस पर औरंगजेब के वंशज और 12 वें मुगल बादशाह मोहम्मद शाह को रंगीला कहा जाता था, जो कवियों जैसी तबियत का था। जंग लड़ने की उसकी आदत में जंग लगा हुआ था। कई मुगल सिपाहसालार विद्रोह कर रहे थे। उसने बंगश को हटाकर जय सिंह को भेजा, जिसने बाजीराव से हारने के बाद उसको मालवा से चौथ वसूलने का अधिकार दिलवा दिया। मुगल बादशाह ने बाजीराव को डिप्टी गर्वनर भी बनवा दिया। लेकिन बाजीराव का बचपन का सपना मुगल बादशाह को अपनी ताकत का परिचय करवाने का था, वो एक प्रांत का डिप्टी गर्वनर बनके या बंगश और निजाम जैसे सिपहसालारों को हराने से कैसे पूरा होता।
उसने 12 नवंबर 1736 को पुणे से दिल्ली मार्च शुरू किया। मुगल बादशाह ने आगरा के गर्वनर सादात खां को उससे निपटने का जिम्मा सौंपा। मल्हार राव होल्कर और पिलाजी जाधव की सेना यमुना पार कर के दोआब में आ गई। मराठों से खौफ को देखते हुए सादात खां ने डेढ़ लाख की सेना जुटा ली थी। मराठों के पास तो कभी भी एक मोर्चे पर इतनी सेना नहीं रही थी। लेकिन उनकी रणनीति बहुत दिलचस्प थी। इधर मल्हार राव होल्कर ने रणनीति पर अमल किया और मैदान छोड़ दिया। सादात खां ने डींगें मारते हुआ अपनी जीत का सारा विवरण मुगल बादशाह को पहुंचा दिया और खुद मथुरा की तरफ चला गया।
बाजीराव को पता था कि इतिहास बड़ी सफलताओं को गिनता है। उसने सादात खां और मुगल दरबार को सबक सिखाने की सोची। उस वक्त देश में कोई भी ऐसी ताकत नहीं थी, जो सीधे दिल्ली पर आक्रमण करने का ख्वाब भी दिल में ला सके। मुगलों का और खासकर दिल्ली दरबार का खौफ सबके सिर चढ़ कर बोलता था। लेकिन बाजीराव को पता था कि ये खौफ तभी हटेगा जब मुगलों की जड़ यानी दिल्ली पर हमला होगा। सारी मुगल सेना आगरा मथुरा में अटक गई और बाजीराव दिल्ली पर चढ़ बैठा। आज जहां तालकटोरा स्टेडियम है, वहां बाजीराव ने डेरा डाल दिया। दस दिन की दूरी बाजीराव ने केवल पांच सौ घोड़ों के साथ 48 घंटे में पूरी की, बिना रुके, बिना थके। देश के इतिहास में ये अब तक दो आक्रमण ही सबसे तेज माने गए हैं, एक अकबर का फतेहपुर से गुजरात के विद्रोह को दबाने के लिए नौ दिन के अंदर वापस गुजरात जाकर हमला करना और दूसरा बाजीराव का दिल्ली पर हमला।
बाजीराव ने तालकटोरा में अपनी सेना का कैंप डाल दिया, केवल पांच सौ घोड़े थे उसके पास। मुगल बादशाह मौहम्मद शाह रंगीला बाजीराव को लाल किले के इतना करीब देखकर घबरा गया। उसने खुद को लाल किले के सुरक्षित इलाके में कैद कर लिया और मीर हसन कोका की अगुआई में आठ से दस हजार सैनिकों की टोली बाजीराव से निपटने के लिए भेजी। बाजीराव के पांच सौ लड़ाकों ने उस सेना को बुरी तरह शिकस्त दी। ये 28 मार्च 1737 का दिन था, मराठा ताकत के लिए सबसे बड़ा दिन। कितना आसान था बाजीराव के लिए, लाल किले में घुसकर दिल्ली पर कब्जा कर लेना। लेकिन बाजीराव को पता था कि शासन का फिजूल विस्तार बोझिल हो जाता है। इसलिए उसने लड़ाई को बढ़ाने के बजाए वापस लौटना उचित समझा।
वो तीन दिन तक वहीं रुका, एक बार तो मुगल बादशाह ने योजना बना ली कि लाल किले के गुप्त रास्ते से भागकर अवध चला जाए। लेकिन बाजीराव बस मुगलों को अपनी ताकत का अहसास दिलाना चाहता था। वो तीन दिन तक वहीं डेरा डाले रहा, पूरी दिल्ली एक तरह से मराठों के रहमोकरम पर थी। उसके बाद बाजीराव वापस लौट गया। बुरी तरह बेइज्जत हुआ मुगल बादशाह रंगीला ने निजाम से मदद मांगी, वो पुराना मुगल वफादार था, मुगल हुकूमत की इज्जत को बिखरते नहीं देख पाया। वो दक्कन से निकल पड़ा। इधर से बाजीराव और उधर से निजाम दोनों मध्यप्रदेश के सिरोंज में मिले। लेकिन कई बार बाजीराव से पिट चुके निजाम ने उसको केवल इतना बताया कि वो मुगल बादशाह से मिलने जा रहा है।
निजाम दिल्ली आया, कई मुगल सिपहसालारों ने हाथ मिलाया और बाजीराव को बेइज्जती करने का दंड देने का संकल्प लिया और कूच कर दिया। लेकिन बाजीराव बल्लाल भट्ट से बड़ा कोई दूरदर्शी योद्धा उस काल खंड में पैदा नहीं हुआ था। ये बात सही साबित हुई, बाजीराव खतरा भांप चुका था। अपने भाई चिमना जी अप्पा के साथ दस हजार सैनिकों को दक्कन की सुरक्षा का भार देकर वो अस्सी हजार सैनिकों के साथ फिर दिल्ली की तरफ निकल पड़ा। इस बार मुगलों को निर्णायक युद्ध में हराने का इरादा था, ताकि फिर सिर ना उठा सकें।
दिल्ली से निजाम के अगुआई में मुगलों की विशाल सेना और दक्कन से बाजीराव की अगुआई में मराठा सेना निकल पड़ी। दोनों सेनाएं भोपाल में मिलीं, 24 दिसंबर 1737 का दिन मराठा सेना ने मुगलों को जबरदस्त तरीके से हराया। निजाम की समस्या ये थी कि वो अपनी जान बचाने के चक्कर में जल्द संधि करने के लिए तैयार हो जाता था। इस बार 7 जनवरी 1738 को ये संधि दोराहा में हुई। मालवा मराठों को सौंप दिया गया और मुगलों ने पचास लाख रुपये बतौर हर्जाना बाजीराव को सौंपे। चूंकि निजाम हर बार संधि तोड़ता था, सो बाजीराव ने इस बार निजाम को मजबूर किया कि वो कुरान की कसम खाकर संधि की शर्तें दोहराए।
ये मुगलों की अब तक की सबसे बड़ी हार थी और मराठों की सबसे बड़ी जीत। पेशवा बाजीराव बल्लाल भट्ट यहीं नहीं रुका, अगला अभियान उसका पुर्तगालियों के खिलाफ था। कई युद्दों में उन्हें हराकर उनको अपनी सत्ता मानने पर उसने मजबूर किया। अगर पेशवा कम उम्र में ना चल बसता, तो ना अहमद शाह अब्दाली या नादिर शाह हावी हो पाते और ना ही अंग्रेज और पुर्तगालियों जैसी पश्चिमी ताकतें। बाजीराव का केवल चालीस साल की उम्र में इस दुनिया से चले जाना मराठों के लिए ही नहीं देश की बाकी पीढ़ियों के लिए भी दर्दनाक भविष्य लेकर आया। अगले दो सौ साल गुलामी की जंजीरों में जकड़े रहा भारत और कोई भी ऐसा योद्धा नहीं हुआ, जो पूरे देश को एक सूत्र में बांध पाता। भारत के इस गौरवशाली इतिहास को आजादी के बाद की सरकारों ने भुलाने का भरसक प्रयास किया लेकिन आज यही स्वर्णिम इतिहास एक बार फिर भारत को सुशासन का नायाब नमूना बनाने चल पड़ा है।(इतिहास की विभिन्न किताबों से पुनःप्रस्तुत)
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भीमा कोरेगांव की आड़ में दलित एजेंडा

PTI1_2_2018_000159B भारत की राजनीति में वोट कबाड़ने वाले मुद्दे सदैव छा जाते हैं। कांग्रेस ने जिस दलित वोट बैंक को अपने फायदे के लिए उकसाया था वो एक समय बेलगाम हो गया। कांसीराम ने इस वोट बैंक का महत्व समझा और देश की राजनीति में एक नई इबारत लिखी। अब जबकि दलितों के अधिकारों का मुद्दा समयातीत हो चला है तब उसे एक बार फिर गरमाने का प्रयास किया जा रहा है। भीमा कोरेगांव में दो सौ साल पहले जो अंग्रेज पेशवा भिड़ंत हुई थी उसमें पेशवाओं की फौज की टुकड़ी पीछे हट गई थी। ये युद्ध वास्तव में पेशवाओं की 28000 सेना से नहीं बल्कि अरब सैनिकों वाली 2000 की टुकड़ी से हुआ था। जब अंग्रेज पेशवाओं, होल्करों,सिंधियाओं, गायकवाड़ों को संधियों के माध्यम से तोड़ चुके थे और भारतीय दलितों और मुसलमानों को फौज में शामिल करके अपनी फौजें मजबूत बना चुके थे तब ये स्थितियां निर्मित हुईं थीं। ये जीवन भर अविजित रहने वाले बाजीराव पेशवा नहीं बल्कि उसके बाद पेशवा द्वितीय के दौर की घटना है।
ये भारत में अंग्रेजी राज की स्थापना के दौरान हुए संघर्षों की भी कहानी है, जिसके बाद अंग्रेजी हुकूमत ने देश में मजबूती से अपने कदम जमाए थे। इसीलिए दलित राजनीति करके भारत में फूट की इबारत लिखी गई।भारतीय समाज वैसे भी चार हिस्सों में बंटा था। इसलिए बाद में कांसीराम के नेतृ्त्व में एकत्रित दलित इसे मनुवादी व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष का ऐलान कहते रहे। कांग्रेस ने भी अंग्रेजों की तरह फूट के इस गणित को समझा और भारत में अंग्रेजी राज के नए संस्करण की नींव रखी।तबसे वह हर बार यही प्रयास करती रही है कि दलित एजेंडा चलाकर फूट के बीज बोए। आज भारत में पेशवाओं की तरह पतन की दहलीज पर पहुंच चुकी कांग्रेस अपने जीवन का संघर्ष कर रही है। इसलिए वह जिग्नेश मेवाणी या उमर खालिद जैसे समाज को बांटने वाले नेताओं के सहारे दलितों को समाज की मुख्यधारा से काटने की कोशिश कर रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी यदि सबका साथ सबका विकास के नारे का उद्घोष करते हैं तो कांग्रेस उमर खालिद जैसे नेताओं को संरक्षण देने की वकालत करती है जो भारत तेरे टुकड़े होंगे ईंशाअल्लाह जैसे नारे लगाते रहे हैं।
भारत में दलित राजनीति का दौर बीत चला है, क्योंकि समाज में दलितों को लेकर कोई भेदभाव नहीं बचा है। इसके बावजूद नौकरियों और प्रमोशन में आरक्षण जैसे मुद्दों पर लूट का चक्र चलाने वाले दलितों को उकसाकर कांग्रेस अपना उल्लू सीधा करना चाह रही है। कांग्रेस को अपना भाग्य संवारने या बिगाड़ने का पूरा हक है। इसके बावजूद भाजपा को किसने रोका कि वह अपने ऐेजेंडे पर चलकर भारत का संपूर्ण विकास न करे। भाजपा ने अपने वास्तविक नेताओं के बीच से जिन फर्जी और कागजी नेताओं को सत्ता की बागडोर सौंपी है उनके चलते आज तक वैमनस्य की ये राजनीति समाप्त नहीं हो सकी है। भाजपा का शीर्ष नेतृत्व सबके विकास की बात तो करता है पर वो विकास उसी तबके का कर रहा है जो पहले से समृद्ध हैं। रिश्वतें दे सकने में सक्षम हैं। जिसके चलते विकास की दौड़ में पहले से पिछड़े लोग आज भी पिछड़ते जा रहे हैं। कांग्रेस ने सरकारी नौकरियों में जिन्हें जगह दी थी वही आज भी नौकरियां कब्जा रहे हैं। दलितों के नाम पर जिन फर्जी दलितों को नौकरियां दी गईं हैं वे अपने संसाधनों का वितरण सहधर्मी बंधुओं में नहीं कर रहे हैं। जाहिर है कि भेदभाव और असमानता का वही दौर आज भी जारी है जो कांग्रेस विरासत में छोड़ गई है। दलितों के सत्तासीन होने से भी ये हालात नहीं बदले। बल्कि शोषकों का एक नया तबका मैदान पर खड़ा हो गया जिसने संसाधनों का पूरा वितरण सोख लिया। देश में जिन जिन राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं वहां उनके शासकों ने कांग्रेस की नीतियों में कोई बड़ा फेरबदल नहीं किया। ज्यादातर राज्यों में भाजपा ने कांग्रेस के पूर्व सत्ताधीशों से गलबहियां कर लीं और संसाधनों की लूट शुरु कर दी। महाराष्ट्र में भी यही सब हुआ है।शिवसेना को पछाड़ने के चक्कर में भाजपा ने दलितों के प्रति नरम रवैया अपनाना शुरु कर दिया। पर वे ये भूल गए कि दलित कभी हमारा या तुम्हारा नहीं होता। जब आप उसे दलित कह देते हैं तो वह केवल दलितों का ही होता है। भाजपा ने कांग्रेस को परास्त करने के लिए जो कांग्रेस की सोच को अपनाया है वही इस मौजूदा दंगों की वजह बन गयी है। अब उसे इन दंगाईयों से सख्ती से निपटना होगा। यदि भाजपा के नेता इन दंगों को कुचलने में कायमाब नहीं होते हैं और चोरी छुपे चलाए जा रहे दलित एजेंडे को पंचर नहीं करते हैं तो ये आग इसी तरह नए नए रूप में भड़कती रहेगी। देश ने भाजपा को विकास के लिए चुना है। जातिगत राजनीति को चलते रहने देने के लिए नहीं। मध्यप्रदेश में भी दंगे के इस गणित को फलित करने के प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन यहां उसके लायक खाद पानी नहीं है।
भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को चाहिए कि वो समय रहते अपनी गलती सुधारे। उसे देश को जाति धर्म के आधार पर बांटकर देखने वाली नीति पर सख्त प्रतिबंध लगाना होगा। आने वाले चुनावों के चक्कर में वो समाज को बांटने वाली जिन नीतियों को छूना भी नहीं चाहती उनके समानांतर उसे तीव्र विकास की जंग छेड़नी होगी। तभी वह कांग्रेस की बोई खरपतवार का उन्मूलन कर सकती है। वैसे भाजपा का जन्म जिस फार्मूले पर हुआ था उस पर न चलकर वह पहले ही कांग्रेस की पूंछ पकड़ चुकी है। जाहिर है कि ऐसे में उसे कोई अवतारी नेतृत्व ही शुभ मार्ग पर ला सकता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आर्थिक सुधारों पर जो ध्यान लगाया है उसे असफल करने में जुटे व्यापारी और शोषक तबके को गियर में लिए बगैर सरकार इन घटनाओं को नहीं रोक सकती। उसे अपनी राज्य सरकारों के कान उमेंठने होंगे तभी वह सबको साथ लेकर देश की तस्वीर बदल सकेगी।





