Month: July 2017

  • शिवलिंग के बाद अब छात्राओं की फैशन परेड

    शिवलिंग के बाद अब छात्राओं की फैशन परेड

    प्राचार्या ने पत्रकार का कैमरा छुड़ाया,बोलीं मंत्रियों से करीबी नाता
    भोपाल(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)।राजधानी के सरकारी स्कूल में छात्राओं से मिट्टी के शिवलिंग बनवाने वाली प्राचार्या निशा कामरानी का कहना है कि उन्होंने इस आयोजन की जानकारी वरिष्ठ अधिकारियों को वाट्सएप पर भेज दी थी। इसके लिए उनकी अनुमति की क्या जरूरत। इसी श्रंखला में अब एक क्रीम कंपनी के सहयोग से मिस इंडिया को स्कूल में बुलाया जा रहा है। छात्राएं उनके साथ फैशन परेड करेंगी और इससे लड़कियों को बाजार की जरूरतें समझाई जाएंगी। छात्राओं ने शिवलिंग के अलावा जो भी शिल्प बनाए हैं उनसे उनके सौंदर्यबोध की झलक मिलती है।उनके इस बयान का मोबाईल वीडियो बनाने वाले पत्रकार का फोन प्राचार्या के निर्देश पर जब्त कर लिया गया। धमकाते हुए कहा कि मेरे कई मंत्रियों से निकट के संबंध हैं और इसीलिए मैंने ज्यादातर अखबारों में खबर नहीं छपने दी है।

    सरकारी नौकरी में शामिल होने के बाद लगातार विवादों में रहीं भोपाल के शासकीय कमला नेहरू कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय टीटीनगर की प्राचार्या निशा कामरानी ने महीने भर के भीतर सरकार के लिए नया बखेड़ा खड़ा कर दिया है। माननीय उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस राजेन्द्र मेनन ने Nisha kamRani Vs. State of Madhya Pradesh & Others के निपटारे के दौरान Writ Petition No : 11004/2012 को यह कहते हुए खारिज किया था कि निशा कामरानी का अपने स्कूल के शिक्षकों पर कोई नियंत्रण नहीं था। उनका तबादला जांच कमेटी की रिपोर्ट के बाद किया गया इसलिए उनका आरोप बेबुनियाद है कि पक्षपात के चलते उनके लगातार तबादले किए जाते हैं। इसके बावजूद अपने राजनीतिक संबंधों के प्रभाव से उन्होंने राजधानी के इस प्रमुख स्कूल में प्राचार्या का पद हथिया लिया। जबकि इससे पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पदाधिकारियों की शिकायत पर उन्हें तूमड़ा के स्कूल में ट्रांसफर किया गया था।

    शिक्षा विभाग के सूत्रों का कहना है कि प्राचार्या महोदया को जींस और टॉप पहिनकर आने के कारण पूर्व शिक्षा मंत्री श्रीमती अर्चना चिटनिस ने हटाया था। शिक्षा राज्यमंत्री दीपक जोशी के नाम की दुहाई देने वाली श्रीमती कामरानी कई बार मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के बारे में भी तरह तरह की डींगें हांकती हैं जिसकी आडियो रिकार्डिंग सोशल मीडिया पर भी उपलब्ध है। सिक्किम नवोदय विद्यालय से लेकर शिवलिंग बनवाने तक ढेरों किस्से हैं जिन्हें शिक्षा जगत से जुड़े लोग चटखारे लेकर सुनाते हैं। छात्राओं से पैर पड़वाना और गुरु दक्षिणा लेना उनका प्रिय शगल है।अपने संकुल से जुड़े स्कूलों के चंदा जुटाकर वे इस तरह के आयोजन करती हैं। इसी तरह की एक शिकायत की विभागीय जांच लोक शिक्षण संचालनालय में लंबित है जिसे नस्तीबद्ध करवाने के लिए उन्होंने कई राजनेताओं से कमिश्नर को फोन भी करवाए हैं।

    सूत्रों का कहना है कि स्कूल में बगैर अनुमति शिवलिंग बनाने का आयोजन करने के मसले पर आज एसडीएम दिशा नागवंशी ने प्राचार्या महोदया से पूछताछ की है। इस जांच में पता चला है कि किसी शिक्षिका के रिटायरमेंट आयोजन के लिए 200 -200 रुपए भंडारे के नाम पर चंदे के रूप में जुटाए गए थे । कई छात्राओं ने भी चंदा दिया, जबकि स्कूल की छात्राओं को अपने टिफिन का भोजन खाकर ही संतोष करना पड़ा।

    उनसे जब पूछा गया कि हिंदू तुष्टिकरण के इस आयोजन का ये गैर कानूनी कार्य उन्होंने क्यों किया तो उन्होंने कहा कि मैंने कुछ गलत नहीं किया है। कुछ लोग मेरे खिलाफ षड़यंत्र कर रहे हैं इसलिए वे पत्रकारों को रिश्वत देकर मेरे खिलाफ समाचार प्रकाशित करवा रहे हैं। वे लोग कौन हैं और ऐसा कैसे कर सकते हैं तो इसके बारे में उन्होंने कहा कि मेरे पास सबूत हैं जिन्हें मैं जल्दी ही उजागर करूंगी। हालांकि उन्होंने इस विवाद के उजागर होने के बाद स्कूल की मुस्लिम लड़कियों से पत्र लिखवाए हैं जिनमें लिखवाया गया है कि शिवलिंग बनवाने के फैसले से उन्हें कोई आपत्ति नहीं है। उन्होंने तो इस आयोजन का प्रसाद भी खाया था। प्राचार्या महोदया ने कहा कि जल्दी ही वे ईद मिलन का आयोजन भी करने जा रहीं हैं जिससे लोगों को धार्मिक सौहार्द्र का संदेश दिया जाएगा।

    सामान्य घरों से आने वाली नाबालिग छात्राओं को बहकाकर निशा कामरानी जिस तरह उन्हें अपने समर्थन में लामबंद कर रहीं हैं इस पर शिक्षा विभाग के आला अधिकारी कुछ बोलने तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कि प्राचार्या महोदया अपने राजनीतिक संबंधों के चलते किसी पर भी कीचड़ उछाल सकती हैं। शिक्षा विभाग के ही कई अधिकारी कर्मचारी आज भी उनकी शिकायतों का खमियाजा भुगत रहे हैं। इसलिए अब सरकार ही कोई उचित फैसला ले सकती है।

  • मुस्लिम छात्राओं ने शिवलिंग बनाने से किया इंकार

    मुस्लिम छात्राओं ने शिवलिंग बनाने से किया इंकार

    प्राचार्या बोलीं शिवलिंग बनाओ पास हो जाओगी,अच्छी नौकरी मिलेगी

    भोपाल(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)। मध्यप्रदेश की शिवराज सिंह चौहान सरकार युवाओं को रोजगार देने के पैमाने पर फिसड्डी साबित हुई है। जनता के धन पर उद्योगपतियों को निमंत्रण देते फिरे मुख्यमंत्री खुद इस बात से हैरान हैं कि आखिर उद्योगपति मध्यप्रदेश क्यों नहीं आना चाहते। रोजगार के मापदंडों पर सरकार को लगातार मिल रही असफलता से परेशान लोगों ने अब सरकार के बजाए ईश्वर के भरोसे ही रहना शुरु कर दिया है। राजधानी के सरकारी स्कूल में तो प्रिंसिपल महोदया ने अन्य शिक्षिकाओं के साथ मिलकर छात्राओं से मिट्टी के शिवलिंग बनवाए । सावन के महीने में किए गए इस आयोजन में प्राचार्या महोदया ने छात्राओं के कहा कि उन्हें अच्छे नंबरों में पास होना है और अच्छी नौकरी पानी है तो पूरी भक्ति के साथ शिवलिंग बनाएं।हालांकि कुछ मुस्लिम छात्राओं ने जब शिवलिंग बनाने से इंकार कर दिया तो उन्हें स्कूल से छुट्टी दे दी गई।

    भगवान भरोसे चल रही भाजपा की शिवराज सिंह चौहान सरकार को आयोजन वाली सरकार कहा जाता है। ये सरकार साल भर तरह तरह के आयोजन करती रहती है। इन आयोजनों में जनता का धन फूंक दिया जाता है पर समस्याओं के स्थायी समाधान नहीं तलाशे जाते हैं। यही वजह है कि मध्यप्रदेश में बेरोजगारी चरम पर है। हालत ये है कि बेरोजगारी के चलते स्कूली बच्चों का भी शिक्षा से मोह भंग होने लगा है।

    राजधानी के ह्दय स्थल तात्याटोपे नगर में स्थित शासकीय कमला नेहरू कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में आज मिट्टी के शिवलिंग बनाने का आयोजन किया गया। प्राचार्या निशा कामरानी ने बाल सभा आयोजन के अंतर्गत शिवलिंग निर्माण का ये आयोजन रखा था। उन्होंने पिछले माह ही इस स्कूल में प्राचार्या के रूप में कार्यभार संभाला है। इसके पहले वे लोक शिक्षण संचालनालय में वर्चुअल क्लास का कामकाज देखतीं थीं। अपने राजनीतिक संबंधों के चलते उन्होंने यहां पदस्थ पूर्व प्राचार्य आर.एन.शर्मा को तूमड़ा पहुंचवा दिया और राजधानी के इस प्रमुख स्कूल की कुर्सी संभाल ली। बताते हैं आते ही उन्होंने शिक्षिकाओं को समझा दिया कि अब इस स्कूल में वही होगा जो सरकार चाहेगी। सूत्र बताते हैं कि स्कूल शिक्षा मंत्री विजय शाह की पहल पर उन्हें इस स्कूल की जवाबदारी थमाई गई है।

    मिट्टी के शिवलिंग निर्माण के इस आयोजन के बाद लड़कियों के नाम पर भंडारा भी खिलाया गया। इस आयोजन में शिक्षा विभाग के अधिकारियों और स्थानीय राजनेताओं को भी आमंत्रित किया गया था।जबकि लड़कियों को इसमें शामिल नहीं किया गया। मंच पर जब पंडितजी पूजा करवा रहे थे तब प्रचार्या महोदया माईक संभालें थीं। वे लड़कियों से कह रहीं थीं कि पूरे मनोयोग से शिवलिंग बनाओ। उनका अभिषेक करो। इस पूजा का फल मिलेगा। तुम सभी अच्छे नंबरों से पास हो जाओगी और अच्छी नौकरी मिलेगी।

    नाम न छापने की शर्त पर स्कूल की ही कुछ शिक्षिकाओं ने कहा कि सरकारी स्कूलों में इस तरह के आयोजन गलत हैं। धर्म विशेष के आयोजनों से अन्य समाजों की छात्राओं को तकलीफ भी हुई है पर इसके संबंध में आयोजन कर्ता ही कुछ बता सकते हैं। प्राचार्य महोदया की संदिग्ध गतिविधियों से शिक्षिकाओं और शिक्षा विभाग के जानकारों में असंतोष है पर सरकार के रवैये को देखते हुए वे फिलहाल खामोश हैं।

  • चर्चा से भी पीछे नहीं हटेगा हिंदुस्तान

    चर्चा से भी पीछे नहीं हटेगा हिंदुस्तान

    – भरतचन्द्र नायक
    अपने हितों की हिफाजत की प्रतिबद्धता सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का बोध करती है। चीनी आक्रमण का दौर, साठ के दशक में जब संसद में चीन द्वारा उत्तरी सीमा में किये गये अतिक्रमण की चिन्ता व्यक्त की गई, तपाक से तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. नेहरू ने कहा कि हिमालय का बर्फीला पठार है जहाॅ घास तक पैदा नहीं होती। कांग्रेस का लोकसभा और राज्यसभा में अंकबल भारी होने से बात आई-गई हो गई। लौह पुरूष तत्कालीन स्वराष्ट्र मंत्री सरदार पटैल ने इस पर गंभीर चिन्ता जताने के लिये पं. नेहरू को पत्र लिखा और चीन द्वारा विश्वासघात किये जाने की आशंका व्यक्त की उसे भी अनसुना कर दिया गया। हितों की हिफाजत की बात पर गौर करें कि अमेरिका और सोबियत रूस चाहते थे कि भारत जैसा लोकतांत्रिक देश संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद का सदस्य बने। तत्कालीन अमेरिकी विदेश सचिव दिल्ली आये और प्रस्ताव पर गौर करने को कहा लेकिन इंटरनेशनल फेम और लीडरशिप के नशे में पं. नेहरू ने कहा कि चीन को ही सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बना दिया जाये। न चाहते हुए भी विश्व शक्तियां बेमन से चीन के सिर पर सेहरा बांधने को विवश हो गयी। इतिहास का दौर बदला और चीन आज विश्व मंच पर भारत के हर प्रस्ताव को वीटो करके कूड़ादान में फेकने की हिमाकत कर रहा है। यह बात सच है कि राजनीति में रीटेक नहीं होता, सिनेमा में होता है। लम्हों ने खता की और सदियों ने सजा पाई हमारी नियति बनी।

    विडंबना यह है कि आज जब दुनिया के भारत सहित चौदह देश चीन की विस्तारवादी नीति से परेशान हैं और भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने सीना तान कर कहा कि चीन के विस्तारवाद को बर्दाश्त नहीं किया जायेगा, भूटान की सीमा की सुरक्षा में भारतीय फौज आख से आख मिलाकर मुंहतोड़ जवाब दे रही है। पं. नेहरू की वंश परम्परा, विरासत के उत्तराधिकारी कांग्रेस उपाध्यक्ष श्री राहुल गांधी लुके-छिपे ढंग से चीन के दिल्ली स्थित दूतावास से गोपनीय चर्चा करते हैं। आखिर ऐसे नाजुक दौर में इस मुलाकात को कांग्रेस की कौन सी सियासत कहा जायेगा। पं. नेहरू ने भारत के हितों के विपरीत जो नासमझी की भारत, तिब्बत और भूटान की मुश्किलें बढ़ाई क्या राहुल जी उसके लिये ही चीन के राजदूत को बधाई देने पहुंचे थे। यह वास्तव में राष्ट्रीय चिन्ता का विषय है। कांग्रेस से इसकी कैफियत लेने का हर राष्ट्रवादी नागरिक को हक है।

    राष्ट्रीय अखण्डता के हित में भारत के रक्षामंत्री श्री अरूण जेटली ने चीन के भूटान क्षेत्र के डोकलाम से हटने की भारत को दी गई चेतावनी का माकूल जवाब दिया है कि यह 2017 का भारत है। 1962 के भारत की त्रासद याद दिलाने की जरूरत नहीं है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने दृढ़तापूर्वक मौन स्वीकृति से सेना को मोर्चें पर स्वतंत्रतापूर्वक राष्ट्र रक्षा में हर कदम बढ़ाने की स्वायत्तता देकर देश प्रहरियों का मनोबल बढ़ाया है। हथियारों की नली नीची है लेकिन बंदूकों की नली ऊंची करना परिस्थिति पर निर्भर है। दिल्ली से आदेश की जरूरत नहीं है। किसी मुल्क का यह जज्बा उसकी रक्षा करने और आत्मसम्मान बढ़ाने का सबसे बड़ा प्रोत्साहन है। जीत सत्य की और हौसले की होती है। आज विश्व जनमत भारत के पीछे चट्टान की तरह खड़ा है और समझ चुका है कि जिस मुल्क की विदेश नीति ही विस्तारवाद बन चुकी है उसके सामने आत्मसम्मान के साथ अड़ जाना ही नैतिकता और विकल्प है।

    पूर्व विदेश मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता यशवन्त सिन्हा जो 2003 में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटलजी के साथ बीजिंग गये थे, बताते हैं कि सीमा विवाद पर हुई चर्चा में तय हुआ था कि सेटिल्ड पाॅपुलेशन को विस्थापित नहीं किया जायेगा और वहां चीन अपना दावा नहीं करेगा। लेकिन चीन के लिए समझौता और संधियां तभी तक मान्य होती हैं जब तक कि उनके माफिक बैठती हैं। कमोवेश यहीं दुष्प्रवृत्ति पाकित्सान ने दिखाई है। ये बात अलग है कि जिस तरह विश्व जनमत पर पाकिस्तान द्वारा जम्मूकश्मीर विवाद का पाकिस्तान द्वारा किये गये अंतर्राष्ट्रीयकरण का कोई प्रभाव नहीं रह गया है उसी तरह चीन के दावों की कलई खुलते दुनिया ने देख लिया है और भारत के डोकलाम में अड़ जाने और बार-बार चीन केा अतीत के समझौते की याद दिलाने पर विश्व जनमत भरोसा कर भारत की सच्चाई के पक्ष में स्वर मुखरित करने लगा है। बीजिंग सरकार, चीनी मीडिया ने अलग आक्रामक खबरें प्लांट करने का अनवरत सिलसिला अख्तियार किया है, लेकिन भारत टस से मस नहीं हुआ है। कदाचित आजादी के बाद इतना फोलादी तेवर श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने पहली बार दिखाया जो चीन के लिए अप्रत्याशित है। उसने महसूस किया होगा कि भारत साॅॅफ्ट टारगेट नहीं रह गया है। सामरिक तैयारी में भारत का इरादा स्पष्ट है, लेकिन भारत के तेवरों में वह आक्रामकता नहीं है। उल्टे चीन युद्धोन्माद दिखाने में चरम पर है। भारत ने चीन की सेना की बढ़ती संख्या को देखते हुए सैनिकों की संख्या बढ़ायी है लेकिन स्पष्ट रूप से बंदूकों की नली नीची है क्योंकि चीन की उकसाउ कार्यवाही के बाद भी भारत शांति और मैत्री का पक्षधर है।

    भारत के राजनयिक मानते हैं कि डोकलाम की सुरक्षा भारत की प्रतिबद्धता है जो उसे इतना सख्त कदम उठाने के लिए विवश करती है। डोकलाम, भूटान का क्षेत्र है और भारत उसकी सुरक्षा के लिए नैतिक और भारत भूटान के बीच संधि के पालन के लिए बाध्य है।

    इस मामले में दो बाते उभर कर आती हैं कि चीन भरोसे मंद देश नहीं है। उसका अतीत का इतिहास इस बात की पुष्टि करता है। फिर भी आज जैसी संवेदनशील, विस्फोटक स्थिति केसे उत्पन्न हुई इसका कारण खोजने पर तथ्य उभरकर आते हैं कि पूर्ववर्ती सरकारें चीन के प्रपंच की शिकार हुईं और दूरदर्शिता के अभाव में चीन के छल का शिकार हुई। चीन और भारत के बीच तिब्बत एक स्वायत्तशासी देश तिब्बत बफर स्टेट का काम करता था, लेकिन चीन की नजर थी और चीन ने तिब्बत को हड़पने का हथकंडा अपनाया। तिब्बत की भारत से जो अपेक्षा थी उसके विपरीत तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. नेहरू चीन के पंचशील सिद्धांतों पर फिदा रहे और उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय दायित्व का निर्वाह करने से परहेज किया। चीन को शह मिली जबकि लौह पुरूष सरदार पटैल ने बार-बार इस गलत कदम के प्रति पं. नेहरू को आगाह किया।

    यदि ऐतिहासिक तथ्यों पर भरोसा करें तो तिब्बत का भी चीन के अधिकांश भाग पर प्रभुत्व था। बाद में चीन ने शक्ति प्रयोग कर अल्पकाल के लिए तिब्बत के मुख्य भाग पर कब्जा कर लिया था लेकिन बाद में तिब्बतियों ने आजादी हासिल कर ली थी। समय ने करवट ली 1949 में चीन ने तिब्बत को अपने अधीन करने की जब कोशिश की थी चीन इतना सशक्त नहीं था और भारत तिब्बतियों की गुहार पर ध्यान देता, सहयोग करता तो यह नौबत नहीं आती। भारत और चीन के बीच बफर स्टेट रहने से सीमा इस तरह विवाद का विषय नहीं बनती। लेकिन चीन को बेलगाम करके पं. नेहरू ने संकट की नींव डाल दी। पंचशील पर मुग्ध बने रहे। 1962 में चीन के हाथों भारत की पराजय भारत के इतिहास में ऐसी त्रासद घटना बनी कि भारत का साहस चूक गया चीन मनमानी करता रहा और हालत यह हुई कि उसका दावा भारत के पूर्वोत्तर में अरूणाचल प्रदेश और पश्चिमोत्तर में लद्दाख तक पसर गया।

    प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने पहली बार चीन के नहले पर सीमा सुरक्षा की दृढ़ता बताकर दहला मारा है। तिब्बत के धर्मगुरू दलाई लामा को अरूणाचल प्रदेश के तवांगसक जाने की अनुमति देकर चीन को ठेंगा बता दिया है। चीन की धमकियों के बावजूद एनडीए सरकार ने बता दिया है कि चीन जिस तरह सीमा की मनमानी व्याख्या करता है बर्दाश्त नहीं है। दोनों देशों के बीच समझौंता है। उसका पालन करना होगा। बात मेज पर बैठकर तय की जा सकती है। भारत की विदेश नीति पहली बार पं. नेहरू द्वारा प्रवत्र्तित नीति की छाया से मुक्त हुई है। देश के जनमत ने भारत के इस प्रत्याशित और दृढ़तापूर्व अख्तियार किये गये साहसिक रूख की सराहना की है और सभी वर्गों, राजनैतिक दलों ने समर्थन किया है। मजे की बात यह है कि चीनी मीडिया जहाॅ वार भांगरिक करता है वहीं चीन का थिक टेंक चीनी रणनीतिकारों को भारत के बढ़ते प्रगतिशील कदमों से आगाह भी करता है और बताता है कि भारत एक उभरती हुई शक्ति है। कदाचित चीन भारत की बढ़ती शक्ति को पचा नहीं पा रहा है। एक ओर चीन ने पाक अधिकृत कश्मीर में बन बेल्ट, वन रूट कारीडोर बना कर पाकिसतान केा शह देकर भारत को चुनौती दी और आतंकवादियों की नकेल कसने के भारत के कदमों को थामने की कोशिश की है, वहीं भारत को उलझाए रखना चाहता है। बावजूद इसके कि चीन समझता है कि भारत उसके लिए प्रमुख बाजार है। चीन की अर्थव्यवस्था भारत से चार-पांच गुना समृद्ध है। लेकिन चीन में विकास के कदम थम गये हैं। उत्पादन चरम पर पहुंच गया है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या चीन भारत जैसा बाजार के दरवाजे बंद करने का जोखिम उठा सकता है। दूसरी बात यह है कि हाल के समुद्री अभ्यास में भारत के अमेरिका और जापान ने भाग लेकर चीन की ईर्ष्या की आग में घी डालने का काम किया है। चीन समझ गया है भारत ने श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में मुल्क की हिफाजत करना सीख लिया है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की भावना ही राष्ट्र की हिफाजत करने की प्रतिबद्धता देती है। जज्बा, जुनून और हिम्मत उपहार में नहीं मिलती यह स्वयं स्फूर्ति पैदा होती है। पं. नेहरू ने तो चीनी सेना द्वारा भारतीय भूमि पर अतिक्रमण को उसर जमीन कहकर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रति अपनी लाचारी व्यक्त कर दी थी लेकिन श्री नरेंद्र मोदी सरकार ने एक साथ दो फैसले लिये हैं। आकस्मिकता से निपटने के लिए जहाॅ फौज को स्वायत्तता दे दी है, वहीं समझौता का दरवाजा खुला रखने के लिए राजनयिक रास्ता भी खुला रखा है। चीन के रक्षा मंत्री की उकसाऊ चेतावनी पर न चीन को धमकियाॅ दी हैं और चीन के आक्रामक तेवरों के सामने घुटने टेके हैं। तथापि भारत हर हाल में परिस्थिति और चुनौती से निपटने के लिए दृढ़ता से मौके की नजाकत पर नजर रखे है।

  • चीन से संवाद सुधारे भारत का मीडिया

    चीन से संवाद सुधारे भारत का मीडिया

    Indian army soldiers are seen after a snowfall at the India-China trade route at Nathu-La, 55 km (34 miles) north of Gangtok, capital of India’s northeastern state of Sikkim, January 17, 2009. The Nathu-La mountain pass, known as the old silk route, lies at an altitude of 14,200 ft. bordering between India and China and is covered with snow throughout the year. Picture taken January 17, 2009. REUTERS/Rupak De Chowdhuri (INDIA) – RTR23J4L

    भारतीय सीमा पर चीन की अमर्यादित और आक्रामक गतिविधियां नयी नहीं हैं, लेकिन सिक्किम सेक्टर में हाल की घटना चौकानेवाली है. पिछले कई वर्षों से चीन भारतीय सीमा में घुसपैठ करता रहा है. अरुणाचल प्रदेश, (जिसे चीन दक्षिण तिब्बत का नाम देता रहा है), के अलावा लद्दाख और हाल ही में उत्तरांचल में भी उसने घुसपैठ की कोशिश की है. सिक्किम से लगी भारत-चीन सीमा पर इस हरकत से चीन का चरित्र और चाल दोनों साफ हो गये है.

    बीते 16 जून को चीन की सेना पीपल्स लिबरेशन आर्मी भूटान के डोकलम एरिया में घुस आयी और उसने वहां एक रोड बनाने की कोशिश की. भूटान की शाही सेना ने चीनी सैनिकों को रोकने की कोशिश की, परंतु उसे भारी मुश्किलों का सामना करना पडा. सीमा के पास तैनात भारतीय सैनिकों ने भी उन्हें रोकने की कोशिश की. 20 जून को भूटान ने अपने नयी दिल्ली स्थित दूतवास से चीन को आधिकारिक तौर पर अपनी नाराजगी जाहिर कर दी. भूटान ने पहले ही साफ कर दिया है कि चीन ने उसकी सीमा में घुसपैठ कर के 1988 और 1998 में दोनों देशों के बीच हुए समझौते का उल्लंघन किया है. गौरतलब है कि चीन और भूटान में कूटनीतिक संबंध नहीं है, लेकिन दोनों देश सीमा विवाद सुलझाने के प्रयास में लगे हैं.

    उधर उल्टा चोर कोतवाल को डांटे कि कहावत को चरितार्थ करते हुए चीन के विदेश मंत्रालय ने भारत पर ही आरोप जड़ दिया कि भारतीय सेना ने सिक्किम सेक्टर पर सीमा का उल्लंघन कर चीन में घुसपैठ की. जवाब में भारतीय विदेश मंत्रालय ने आधिकारिक वक्तव्य में साफ तौर पर कहा कि चीनी सेना की इन गतिविधियों से वह चिंतित है और रोड बनाने की चीनी मंश से यथापूर्वस्थिति में बड़ा परिवर्तन आयेगा, जिससे भारत की सुरक्षा पर गंभीर और दूरगामी परिणाम होंगे. इस मसले पर भारत और चीन के विदेश मंत्रालयों के बीच बातचीत जारी है. 20 जून को नाथू-ला में हुई बॉर्डर मीटिंग में भी इस बारे में बातचीत हुई थी.

    यहां एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि 2012 में भारत और चीन के बीच यह सहमति हुई थी कि दोनों देशों की सीमा के वे छोर, जो किसी तीसरे देश से भी लगे हैं (त्रिबंधीय छोर), उन पर किसी भी तरह का यथापूर्वस्थिति को बदलने का समझौता या कोई अन्य गतिविधि तीनों देशों के बीच बहस-मुबाहिसे के बाद ही होगी. जाहिर है, चीन ने इस समझौते का उल्लंघन किया है.

    सीमा पर की गयी इन गतिविधियों से यह साफ हो गया है कि भारत के जापान और अमेरिका से घनिष्ठ होते संबंधों से चीन घबरा रहा है. प्रधानमंत्री मोदी की अमेरिका यात्रा और उसकी सफलता ने चीन को और अधीर कर दिया है. गौरतलब है कि चीन के वन बेल्ट वन रोड प्रोग्राम पर श्रीलंका और जर्मनी तथा जापान ने भी भारत का समर्थन किया है. वन बेल्ट वन रोड पकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से गुजरेगा, जो कि भारत की संप्रभुता का हनन है. भारत इसका पुरजोर विरोध करता रहा है. इसीलिए मई में हुई बेल्ट रोड फोरम मीटिंग में भी भारत ने शिरकत नहीं की थी.

    आज भारत की बढ़ती शक्ति, तेजी से विकास करती अर्थ्व्यवस्था, और जापान, अमेरिका, जर्मनी, नीदरलैंड, फ्रांस, दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों और अफ्रीका से भारत की बढ़ती नजदीकियां चीन के लिए परेशानी का सबब हैं. परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) में भारत क विरोध, संयुक्त राष्ट्र में आतंकवाद विरोधी मसौदे का विरोध, चीन-पकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीइसी) सभी इस ओर इशारा करते हैं कि चीन भारत को दक्षिण एशिया में रोक कर रखने की नीति पर अभी भी काम कर रहा है और भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठने नहीं देना चाहता.
    यह दीगर बात है कि चीन के पाकिस्तान को छोड़ कर हर देश के साथ सीमा विवाद और आक्रामक रवैये ने जापान और वियतनाम जैसे कई देशों को भारत की समस्या समझने, और भारत का साथ देने को प्रेरित किया है.

    हैरान कर देनेवाले एक वक्तव्य में चीन के विदेश मंत्रालय ने सीमा विवाद पर भारत को 1962 को सबक के तौर पर याद करने का मशविरा भी दे डाला. हालांकि, भारत की तरफ से कहा गया कि 1962 का भारत और 2017 के भारत में जमीन आसमान का अंतर है, लेकिन चीन के इस कथन और उसकी सीमा पर हरकतें एक बड़े सवाल की और इशारा करती है: क्या भारत चीन की सीमा पर दी गयी चुनौती का मुकाबला कर सकता है?

    भारत अब भी चीन से सैन्य तैयारी और साजो-सामान के मामले में पीछे है, और इन दोनों ही मसलों पर तुरंत और बड़े पैमाने पर काम करने की जरूरत है. दूसरी बड़ी चुनौती है पाकिस्तान-चीन के सामरिक संबंधों को टक्कर कैसे दी जाये? इन दोनों चुनौतियों को मद्देनजर रखते हुए, भारत को अपने रक्षा और सामरिक संबंधों का विस्तार करना होगा. साथ ही, रक्षा संबंधी नयी और उम्दा तक्नीक की जल्द ही खरीद भी करनी होगी.

    डाॅ राहुल मिश्र
    सामरिक मामलों के जानकार

  • कैसे भुला दें मुखर्जी का बलिदान

    कैसे भुला दें मुखर्जी का बलिदान

    (6 जुलाई जन्मदिवस)
    …..- भरतचन्द्र नायक
    लम्हों ने खता की है सदियों ने सजा पायी। आजादी के बाद देश में गठित पहली राष्ट्रीय सरकार के अंतद्र्वंद का ही दुष्परिणाम है कि आज कश्मीर की मनोरमवादियां रक्तरंजित हो रही है। काश राष्ट्रीय सरकार में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के आव्हान पर शामिल होने वाले उस दूरदर्शी, दार्शनिक राजनेता डाॅ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी की चेतावनी पर तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. नेहरू ने ध्यान दिया होता किंतु सेकुलरवाद के पुरोधा बनने की चाहत में जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा और धारा 370 ईजाद करके न केवल भारत को लहुलुहान करने का साजो सामान दीर्घजीवी बना दिया अपितु भारत के अभिन्न अंग जम्मू कश्मीर में अलगाववाद के बीज बो दिए गए। पं. नेहरू से मतभेद उभरने और मंत्रिपद से इस्तीफा देने का वाजिब कारण यही था कि डाॅ. मुखर्जी ने कहा था कि पाकिस्तान से विस्थापित शरणार्थी जितनी भूमि छोड़कर आए है उतनी भूमि पाकिस्तान से ली जाए। तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल सहमत थे लेकिन पं. नेहरू ने बात अनसुनी कर दी। डाॅ. मुखर्जी की पहल पर आधा पंजाब ओर आधा बंगाल बच गया। डाॅ. मुखर्जी ने विभाजित भारत के पाकिस्तान से इतना भूभाग बचा कर सच्चे राष्ट्रवाद का सबूत दिया। उनके इस्तीफा का आगाज उन्होंने संसद में देकर किया और जनसंघ गठित कर धर्म, जाति, नस्ल का विचार किए बिना सभी के लिए जनसंघ के द्वार खोलकर राष्ट्रवादियों पर साम्प्रदायिकता का आरोप लगाने वालों के लिए माकूल जवाब दिया।

    डाॅ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने जम्मू-कश्मीर को भारत की मुख्यधारा में जोड़ने के लिये अनुच्छेद 370 का प्रखर विरोध किया। जम्मू-कश्मीर में प्रवेश के लिये परमिट प्रणाली को डाॅ मुखर्जी ने देश की अखंडता में बाधक बताया और इसके विरोध में जब बिना प्रवेश परमिट के जम्मू-कश्मीर में प्रवेश करने का आन्दोलन किया तत्कालीन प्रधानमंत्री पं.नेहरू तब के जम्मू कश्मीर के प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला के तुष्टीकरण पर आत्म मुग्ध थे। इस साजिश में शेख अब्दुल्ला को किसकी शह थी यह बताना अब व्यर्थ है। लेकिन इस बात में कोई संदेह नहीं कि उन्हें जानबूझकर ऐसी जगह हिरासत में लिया गया जहाॅं भारतीय संविधान, सर्वोच्च न्यायालय, देश का संवैधानिक हस्तक्षेप बेअसर था। देश की अखंडता के लिए प्रतिबद्धता के लिए रात में डाॅ- मुखर्जी के प्राण चले गये। तब न तो डाॅ.मुखर्जी को उपचार की सुविधा हासिल हुई और न न्यायिक समीक्षा का अवसर मिला। डाॅ.मुखर्जी की मौत ने भारतीय उपमहाद्वीप को झकझोर दिया। पं नेहरू ने अपने संवदेना संदेश में डाॅ मुखर्जी की माताजी योग माया देवी से उनकी इच्छा के बारे में पूछताछ की तो उन्होंने डाॅ मुखर्जी की मेडीकल हत्या पर दुख व्यक्त करते हुए न्यायिक जांच की मांग की थी। जो कभी पूरी नहीं हुई। कुछ ही हफ्तों में डाॅ.मुखर्जी के बलिदान के बाद जम्मू-कश्मीर में प्रवेश परमिट की प्रणाली को समाप्त कर दिया गया। वहाॅं अलग संविधान, अलग निशान और अलग प्रधान की व्यवस्था को बदल दिया गया। फिर भी डाॅ.मुखर्जी की धारा 370 को समाप्त किये जाने की माग को तुष्टीकरण की बलिबेदी पर चढ़ा दिया गया।

    जम्मू-कश्मीर को लहूलुहान करने में धर्म निरपेक्षता के छदम् ने कम नुकसान नहीं पहुंचाया है। कांग्रेस जिस रास्ते पर चली वह वास्तव में डाॅ.मुखर्जी के बलिदान का अपमान है। पूर्व प्रधानमंत्री डाॅ.मनमोहन सिंह जम्मू-कश्मीर को स्वायत्तता देने की बात कह कर भारत की सवा अरब जनता के हितों के साथ खिलवाड़ किया। सरहदों के बाहर बुने ये जाल में फंसना हमारी नियति बनी है। आजादी के बाद पाकिस्तान के फौजियों ने कबालियों के वेश में जम्मू-कश्मीर पर आक्रमण किया उसके पहले जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरी सिंह अपनी रियासत का भारत में विलय कर चुके थे। इसी तरह की अन्य रियासतों को पाकिस्तान में विलय की आजादी मिली थी। फिर पाकिस्तान किस आधार पर जम्मू-कश्मीर के विलय पर प्रश्न उठाता है। इस मर्म की हमने अनदेखी की। उसका खामियाजा आज तक भुगतने के लिये भारत अभिषप्त है। कबायलियों के हमले का भारतीय फौज ने माकूल जबाव दिया। पाकिस्तान के फौजियों को खदेड़ा और छटी का दूध याद दिलाया। लेकिन हम तुष्टीकरण के अलंवरदार जम्मू कश्मीर को शेख अब्दुल्ला के मन के माफिक जीती हुई जमीन छोड़ते चले गये। जो कसर बाकी थी वह उनके कुल दीपक डाॅ फारूख अब्दुल्ला ने स्वायत्तता दिये जाने का बिल लाकरपूरी कर दी। कांग्रेस इस बिल पर अपनी पुष्टि की मोहर लगाकर विश्व को अपनी धर्म निरपेक्षता का सबूत देने की खातिर देश का मुकुट भारत विरोधी देश को तश्तरी में भेंट करने के लिये आतुर रही थी। जो जनविरोध के कारण नहीं हो सका।

    कांग्रेस जम्मू कश्मीर में पीडीपी की कठपुतली बनकर आतंकवादियों के प्रति नरमी बरती रही। जिस स्वायत्तता को पूर्व प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह भरोसा परोस रहे थे। उसकी शकल क्या होती? यह जानकर सिइस पैदा हो जाती है। वे 1953 की उस व्यवस्था को बहाल करना चाहते थे, जिसके लिये डाॅ. मुखर्जी ने प्राण गवाएं। हजारों लोगांे ने अपना खून बहाया और लाखों कश्मीरी अपने घर छोड़कर अपने ही देश में शरणार्थी बनकर नारकीय जिन्दगी बसर कर रहे हैं। आटोनामी दिये जाने की कमेटी मेें कर्णसिंह की अपनी भूमिका रही है। उन्हें आज देश को समझाना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर को स्वायत्तता दिये जाने से देश की अखंडता का कौन सा लक्ष्य पूरा होना था। पहले ही दो बटे पांच धरती पाक अधिकृत कश्मीर के नाम पर हमसे छिन चुकी है। उसे पाक अधिकृत कश्मीर कहा जाता है। जम्मू-कश्मीर रिसेटिलमेन्ट एक्ट को जीवित करके विभाजन के समय जम्मू-कश्मीर से पाकिस्तान जा चुके लोगों को पुनः जम्मू-कश्मीर लौटने की दावत तत्कालीन पीडीपी सरकार ने दी थी। कश्मीर घाटी से आतंकवादी हमलों से परेशान होकर पलायन कर चुके दो लाख कश्मीरी पंडित अपने ही देश में शरणार्थी बन चुके हैं। उनके लौटकर अपने घरों मंे आबाद करने में किसी ने कोई उत्सुकता दिखायी। भारतीय जनसंघ की मांग पर गौर नहीं किया गया। अलबत्ता पूर्व प्रधानमंत्री ने अलगाववादियों के बीच धर्म निरपेक्ष छवि चमकाने के लिये स्वायत्तता देने का राग अलापा। देश की अखंड़ता, जम्मू-कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बनाने के लिये अपने प्राण न्यौछावर करने वालों के बलिदान का मजाक उड़ाया गया है। त्रिशंकु विधानसभा का गठन होने पर भाजपा ने पीडीपी से हाथ मिलाकर जम्मू कश्मीर में लोकतंत्र को कायम रखा है। जम्मू कश्मीर के बीच भेदभाव को समाप्त करने का प्रयास किया है। राज्य सरकार ने अलगाववाद से युवा पीढी को आगाह किया है। युवकों को सुरक्षा बल में प्रवेश देकर रोजगार दिया जा रहा है। कश्मीरी नवजवानों को सेवा में प्राथमिकता दी जा रही है।

    वोटो के लिये जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देने वालों की मंशा को बेनकाब किये जाने की जरूरत हैै। यही डाॅ. मुखर्जी के लिये सच्ची श्रद्धाजंलि होगी। धर्म निरपेक्षता के छदम की अब देश को कितनी कीमत चुकाना पडेगी इसका अंदाजा तो स्वायत्तता की मांग उठाने वाली पीडीपी, नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस को लग जाना चाहिए था। यदि जम्मू-कश्मीर को स्वायत्तता दी गयी होती तो 1953 की स्थिति बहाल हो जाती। अनुच्छेद 370 तो स्थायी हो जाता। स्वायत्तता दिए जाने से भारत का कोई नागरिक जम्मू-कश्मीर का नागरिक कभी नहीं हो सकेगा। एक तरह से जम्मू-कश्मीर में भारत सरकार का नियंत्रण एक दम समाप्त हो जाता यहाॅं तक कि यदि कभी विदेशी आक्रमण जम्मू-कश्मीर की सरहदों पर होता है तो केन्द्र सरकार वहाॅं आपात काल तक घोषित करने में सक्षम नहीं होती। सैद्धांतिक रूप से सुरक्षा, दूरसंचार विदेशी मामलों में भारत का दखल रहेगा, लेकिन नियंत्रण नहीं होगा। सर्वोच्च न्यायालय, निर्वाचन आयोग, नियंत्रक महालेखा परीक्षक की भूमिका जम्मू-कश्मीर में समाप्त हो जायेगी। जिस प्रवेश परमिट प्रणाली को समाप्त करने के लिये डाॅ.श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने प्राणों की आहुति दी उसकी बहाली स्वायत्तता दिये जाने का खास मकसद रहा है। कांग्रेस हमेशा यह कहती रही कि साम्प्रदायिक आधार पर देश का विखंडन नहीं होने देगे, लेकिन देश का बटवारा साम्प्रदायिक आधार पर कराया। जम्मू-कश्मीर को स्वायत्तता का मतलब समझकर इस खतरे से आवाम को आगाह करना ही उस महामना डाॅ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। जम्मू कश्मीर की जनता ने जान हथेली पर रखकर विधानसभा और लोकसभा के चुनावों का सामना किया। अलगाववादियों को अप्रासंगिक बना दिया।

    आज जो अशांति है वह चंद जिलों तक सीमित है, लेकिन वोटों की खातिर अपने को सेकुलरवादी बताने के चक्कर में राजनैतिक दल देश की अखंडता के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। पीडीपी के साथ गठबंधन करने के पीछे एक बड़ा लक्ष्य रहा है कि जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों की सरकार का गठन कर सीमांत प्रदेश का सांस्कृतिक वैभव लौटाया जाए। अपने घरों से बेघर हुए लाखों कश्मीरी पंडितों की घर वापसी हो, लेकिन इसे विफल करने के पीछे पाकिस्तान का नापाक इरादा है और प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने पाकिस्तान के इरादे को विश्व बिरादरी में बेनकाब करने में सफलता पायी है। जम्मू कश्मीर से आतंकवाद और अलगाववाद दफन हो। जम्मू कश्मीर के उस अवाम को सुकून मिले जिसने भारत में विलय के बाद लोकसभा और विधानसभा चुनाव में भाग लेकर लोकशाही को बरकरार रखा है। डाॅ. मुखर्जी ने जीवन पर्यन्त इसके लिए संघर्ष किया। उनके बलिदान के कारण ही जम्मू कश्मीर आज भारत का अभिन्न अंग है। मुठ्ठी भर अलगाववादी जिसे आजादी का संघर्ष बता रहे है उसे दुनिया समझ गयी है। पाकिस्तान का अलग थलग पड़ जाना इसका सबूत है।

  • सफेदपोशों के अपराध

    सफेदपोशों के अपराध

    पुस्तक समीक्षा

    हमारे दिमाग में जमाने से चली आ रही अपराधों की परिकल्पना में चोरी, डकैती, हत्या, आक्रमण, सेंधमारी, यौन उत्पीड़न आदि का ही समावेश हो पाता है।…

    डॉ. हनुमंत यादव
    हमारे दिमाग में जमाने से चली आ रही अपराधों की परिकल्पना में चोरी, डकैती, हत्या, आक्रमण, सेंधमारी, यौन उत्पीड़न आदि का ही समावेश हो पाता है। ये अपराध आमतौर पर निम्न आय वर्ग तथा गरीबी से जुड़े रहते हैं। इसके अलावा गरीबी से जुड़ी मनोविकृतियां भी अपराध को जन्म देती हैं। यह मान्यता पुरानी हो गई है कि अपराध मजबूरी में किए जाते हैं तथा भगवान ने जिसको सब कुछ दिया है उसको अपराध करने की जरूरत नहीं पड़ती। आधुनिक पूंजीवाद के उदय के साथ ही अपराध के चरित्र और स्वरूप में परिवर्तन हुआ तथा नए प्रकार के आर्थिक अपराधों का तेजी से विस्तार हो रहा है। नए प्रकार का अपराध सफेदपोश अपराध अपने विविध रूपों में सामने आया। अर्थशास्त्री डॉ. गिरीश मिश्र और राजनीतिशास्त्री डॉ. ब्रजकुमार पांडेय द्वारा लिखित प्रस्तुत पुस्तक इन्हीं धनाढयों और प्रभावशाली लोगों के अपराध के विषय पर केन्द्रित है।
    सफेदपोश अपराधी, सुशिक्षित सौम्य और सुसंस्कृत है, लिहाजा उनको समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त है। इन लोगों के अपराध के विषय में अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन और अन्यत्र स्थानों के समाजविज्ञानियों द्वारा शोध करके काफी कुछ लिखा गया है। किन्तु अपने देश में इस ओर विशेष ध्यान नहीं दिया गया था। इस रिक्तता को महसूसकर डॉ. गिरीश मिश्र और राजनीतिशास्त्री डॉ. ब्रजकुमार पांडेय ने सफेदपोश अपराध पर शोध कार्य प्रारंभ किया। उनकी सोच थी कि जब तक देश में सफेदपोश अपराध की जड़ों में नहीं जाएंगे और भ्रष्टाचार के स्वरूप और फैलाव को समझने का प्रयास नहीं करेंगे तब तक जड से उन्मूलन संभव नहीं है। इसलिए उन्होंने अन्यत्र देशों के समाजविज्ञानियों के शोधग्रंथों के अध्ययन कर भारत में सफेदपोश अपराध के विभिन्न पहलुओं का समग्र शोध करके अंग्रेजी में ”व्हाइट कॉलर क्राइम्स” नामक पुस्तक अंग्रेजी में लिखी जो 1998 में प्रकाशित हुई। हिन्दी के जागरूक पाठकों को अपेक्षा थी कि कुछ ही वर्षों में उक्त पुस्तक का हिन्दी संस्करण का भी प्रकाशन हो जाएगा। किन्तु ऐसा नहीं हो पाया तथा अंग्रेजी न जानने वाले हिन्दी भाषी पाठक उक्त पुस्तक को पढ़ने से वंचित रहे। अंतत: हिन्दी पाठकों की भावनाओं को ध्यान में रखकर एवं जागरूक मित्रों के अनुरोध पर लेखकद्वय ने अद्यतन सामग्री शामिल करते हुए हिन्दी में ”सफेदपोशों के अपराध” पुस्तक लिखी, जो अभी हाल में दानिश बुक्स द्वारा प्रकाशित की गई है। इस पुस्तक के प्रकाशन के लिए लेखकद्वय डॉ. गिरीश मिश्र और डॉ. ब्रजकुमार पांडेय धन्यवाद के पात्र हैं।
    पुस्तक की प्रस्तावना में सफेदपोश अपराध का अर्थ समझाते हुए आम अपराध एवं सफेदपोश अपराध में उदाहरणों सहित अंतर समझाया गया है। इसके साथ ही दोनों प्रकार के अपराधियों के प्रति हमारे समाज का नजरिया भी बताया गया है। सफेदपोशों के अपराध को समाजशास्त्री अल्बर्ट मौरिस ने ”अभिजात्य वर्गीय अपराध” का नाम दिया है। ऊंचे लोगों का गुनाह व्यक्ति और समाज में दोमुंहेपन का सूचक है। यह सफेदपोश अपराधी की कथनी और करनी का अंतर है तो दूसरी ओर अभिजात्य वर्ग के अपराधों को समाज की अनदेखी करनी व मौन स्वीकृति की प्रवृत्ति का भी द्योतक है। उद्योग-व्यवसाय में कारपोरेट क्षेत्र के बढ़ते प्रभाव के साथ ही कारपोरेट अर्थात् संगठित क्षेत्र की सफेदपोश अपराधों की भागीदारी भी लगातार तेजी से बढ़ती जा रही है। कारपोरेट जगत के अपराध को विश्वास हनन के अपराध की संज्ञा दी जा सकती है।
    लेखकद्वय के अनुसार धंधे-पेशों के विस्तार के साथ हर क्षेत्र में सफेदपोश अपराध फैल रहा है। चोरी को प्राचीनतम अपराध माना जाता है। गुपचुप तरीके से बिना किसी धमकी या हिंसा को सहारा लिए व्यक्तिगत व सार्वजनिक धन-सम्पत्ति हड़पना चोरी की श्रेणी में आता है। हेराफेरी, भ्रष्टाचार, गबन, घोटाले, सार्वजनिक सम्पत्ति का निजी उपयोग व दुरूपयोग आदि चोरी के विभिन्न स्वरूप हैं। वर्तमान भूमंडलीकरण के दौर में सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तनों के फलस्वरूप गैर-परम्परागत चोरी के आयामों का विस्तार हुआ है। पुस्तक में मीडिया की दुनिया, शिक्षा जगत, प्रशासन तंत्र और राजनीति में भ्रष्टाचार अध्यायों के पड़ने से पता लगता है कि सफेदपोश अपराध हमारे देश में हर क्षेत्र में प्रवेश कर गया है, कोई क्षेत्र अछूता नहीं बचा है। धार्मिक पाखंडी लोगों की धार्मिक आस्था व श्रध्दा का फायदा उठाकर देवता का बाना पहन कर शैतान के रूप में कारगुजारियां कर रहे हैं। आश्चर्य है कि पढ़े-लिखे समझदार बड़े लोग भी इनके चंगुल में स्वेच्छा से फंस जाते हैं।
    धमकी व हिंसा माफिया की कार्यशैली के अंग होते हैं। जिस संदर्भ में माफिया शब्द का प्रयोग आज किया जाता है उस का उद्भव इटली में हुआ तो कालान्तर में अनेक देशों में फैला। भूमंडलीकरण ने माफिया के राष्ट्रीय सीमाओं से निकलकर विरूव के पैमाने पर अपनी गतिविधियां चलाने को अनुकूल परिस्थितियां पैदा कीं। अब तो यह दूसरे विश्व में फैल चुका है। भारत भी इससे अछूता नहीं रहा है। पुस्तक के अंतिम चार अध्यायों में माफिया के उद्भव, भूमंडलीकरण के प्रभाव तथा भारत में माफिया का विस्तार से वर्णन किया गया है।
    यह कहना गलत नहीं होगा कि भारत में नवपूंजीवाद में राजनेताओं, अधिकारियों और व्यवसायियों- इन तीन वर्ग के श्रीमान लोगों का गठजोड़ से सफेदपोश अपराध फलता-फूलता जा रहा है। उदाहरण के लिए वस्तुओं के भंडार और कीमतों में कानून के तहत फेरबदलकर बेहिसाब मुनाफा कमाना, उच्च सरकारी अधिकारियों द्वारा नियमों की अनदेखी करना, सरकारी धन राशि का अन्यत्र व्यय करना, राजनेताओं द्वारा नियमों को तोड़-मरोड़ कर अपने लोगों का निजी हित करना आदि कुछ उदाहरण हैं।
    सरल हिन्दी भाषा में लिखी गई शोध पर आधारित ”सफेदपोशों के अपराध” यह पुस्तक आजादी के बाद, विशेषकर नवउदारवादी चिंतन को अंगीकार करने के बाद, भारत में क्या हुआ और क्या हो रहा है, को समझने में मददगार होगी। जो अध्येता सफेदपोश अपराध पर आगे शोध कार्य करना चाहते हैं उनके लिए यह पुस्तक उपयोगी संदर्भ ग्रंथ साबित होगी।
    पुस्तक: सफेदपोशों के अपराध
    लेखक द्वय:गिरीश मिश्र एवं ब्रजकुमार पांडेय
    प्रकाशक: दानिश बुक्स
    25 सी, स्काइलार्क 450 रूअपार्टमेट्स
    गाजीपुर, दिल्ली-110096
    मूल्य: 450 रूपए

  • टकराव की राजनीति का अंत

    टकराव की राजनीति का अंत

    मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के सबसे लंबे मुख्यमंत्रित्व काल में भले ही रोजगार के साधन विकसित न हो पाए हों लेकिन टकराव की राजनीति ने सकारात्मक दिशा जरूर पकड़ ली है। ये भी अपने आप में बड़ा बदलाव माना जा रहा है। बरसों से टांग खिंचाऊ राजनीति के चलते राजनीतिज्ञों के बीच खेमे बाजी बढ़ती रही थी। कांग्रेस की सरकारें तो अलग अलग नेताओं के गुटों के लिए ही जानी जाती थीं। जनता को खंड खंड विभाजित करने की दिशा में काम करने वाली कांग्रेस की यही खंडित सोच अंततः कांग्रेस के पतन का कारण बनी । इसके बाद जब मध्यप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकारें आईं तब भी कुछ बरसों तक यही खंडित सोच राजनीति पर हावी रही। अब जबकि मुख्यमंत्री प्रदेश में नेतृत्व का सबसे लंबा कार्यकाल पूरा करके नया रिकार्ड बनाने जा रहे हैं तब ये टकराव की राजनीति पूरी तरह तिरोहित होती नजर आ रही है। मध्यप्रदेश विधानसभा के पावस सत्र में राजनीति की यही तस्वीर उभरी है। हालांकि तोड़ने की राजनीति करने वालों को ये नई किस्म की राजनीति रास नहीं आ रही है। वे स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं कि वो विपक्ष कैसे संभव है जो सरकार की सकारात्मक कार्यप्रणाली का भी विरोध न करे। दरअसल अब तक यही माना जाता रहा है कि विपक्ष यानि सरकार का विरोधी गुट। उसका तो काम ही सरकार का विरोध करना है। जबकि नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने बरसों पुरानी इस परिपाटी को अपने छोटे भाई शिवराज सिंह चौहान की कार्यशैली को समझकर इस टकराव की राह ही छोड़ दी है। ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे की तर्ज पर नजर आने वाला विपक्ष कल ठगा सा रह गया जब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने दो टूक शब्दों में कह दिया कि किसानों का कर्ज माफ करने की विपक्ष की मांग वो नहीं मानेंगे। वे किसान को उसकी उपज का उचित मूल्य देने का वादा तो करते हैं लेकिन उसका कर्ज माफ करके वे किसान को पंगु नहीं बनाएंगे। इस घटिया राजनीति को नकारकर शिवराज सिंह चौहान ने अपनी बुलंद राजनीति का परिचय दिया है। नेता प्रतिपक्ष ने भी इसका बेवजह विरोध नहीं किया। कांग्रेस के दिग्गज उनकी इस शैली से भौंचक्के रह गए। दूसरे दिन उन्होंने अपने राहुल भैया पर दबाव बनाया कि उनकी भूमिका तो सरकार का विरोध करने की है। उन्हें अपना विरोध जरूर दर्ज कराना चाहिए था। जाहिर है पार्टी के दिग्गजों के दबाव के आगे उन्होंने दूसरे दिन सरकार के कर्ज माफी की घोषणा न करने से नाराज होकर सदन का बहिर्गमन कर दिया। हालांकि दूसरे दिन इस तरह के विरोध का कोई औचित्य नहीं था फिर भी कांग्रेस के नेताओं ने अपनी तोड़ने वाली सोच को जारी रखकर अपनी ओछी परंपरा का परिचय दे ही डाला। कांग्रेस के नेताओं के साथ समस्या यही है कि वे समझने तैयार नहीं कि वक्त बदल गया है। नर्मदा का पानी हमेशा बहता रहता है और क्षण भर बाद किसी भी स्थान से पानी की नई लहर गुजर जाती है। कांग्रेस के दिग्गज चाहते तो वक्त की नजाकत समझ सकते थे लेकिन वो समझने तैयार नहीं हैं। उन्होंने जिन घटिया हथकंडों से देश की जनता को हांका है वे उन फंडों को छोड़ना नहीं चाहते। वो सोचते हैं कि उनकी पुरानी कार्यशैली ही उन्हें देश की सत्ता पर लौटा देगी। जो अब कभी संभव नहीं है। टकराव की राजनीति के अंत का ये चमत्कार आखिर शिवराज सिंह चौहान ने किया कैसे। इस पर विचार करें तो बड़ा सरल का फार्मूला सामने आता है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को उनके राजनीतिक गुरु सुंदरलाल पटवा ने राजनीति में आगे बढ़ाया था। सुंदरलाल पटवा अर्जुन सिंह के करीबी माने जाते रहे हैं। अर्जुन सिंह ने ठाकुरों की राजनीति के सहारे मध्यप्रदेश में अपना वर्चस्व जमाया था। अपनी राजनीति को जमाए रखने के लिए उन्होंने न केवल अपनी पार्टी के सहयोगियों बल्कि विपक्षी भाजपा के भी दिग्गजों को अपना सहयोगी बनाया था। जब कांग्रेस हाईकमान ने उन्हें कमजोर करने की कोशिश की तो उन्होंने दो बार विपक्षी सुंदरलाल पटवा को सरकार में आने में मदद की । भाजपा में राघवजी भाई जैसे लोगों ने तब इसी बात को लेकर सुंदरलाल पटवा का विरोध भी किया था। भाजपा हाईकमान से भी उन्होंने इस गठबंधन को अवैध बताते हुए शिकायत भी की थी। इसका परिणाम बरसों बाद राघवजी भाई को भुगतना पड़ा। पटवा जी के बाद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उसी परंपरा को जारी रखा है। जिसमें बड़े भाई के रूप में अजय सिंह राहुल भैया शुरु से सहयोगी की भूमिका निभा रहे हैं। ये राजनीतिक समझदारी न केवल सत्ता शीर्ष बल्कि व्यापारिक संबंधों में भी जारी है। कई बड़े औद्योगिक घरानों का साम्राज्य इस दोस्ती की मिसाल के रूप में मौजूद है। ये एक तरह से प्रदेश के लिए बहुत अच्छा है। कारोबारी एकता से विकास की यशोगाथा लिखने का ये माहौल प्रदेश के लिए हितकारी है। कम से कम औद्योगिक स्थिरता से प्रदेश का विकास रथ ठीक दिशा में चल तो रहा है। उधर अजय सिंह अच्छी तरह जानते हैं कि जिस तरह कांग्रेस ने कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया को फ्री हैंड दे रखा है उसके चलते उनकी मुख्यमंत्री बनने की अभिलाषा पूरी नहीं हो पाएगी। जाहिर है इन हालात को देखते हुए खुद का साम्राज्य मजबूत किया जाए और भविष्य के लिए राजनीतिक ऊर्जा बचाए रखने का इंतजाम किया जाए यही बुद्धिमानी है। इस अनूठी यारी में पार्टीगत प्रतिद्वंदिता को ताक पर रखकर अपने विरोधियों को निपटाने में भी सहयोग और परस्पर विश्वास की युति देखी जा रही है। शिवराज जी को प्रदेश की राजनीति से हटाकर केन्द्र में पहुंचाने का जतन करने वाले नेताओं को एक एक कर निपटाया जा रहा है।राजनीति के जानकार किसानों पर मंदसौर में हुए गोलीकांड के मामले को स्थगन के माध्यम से सदन में उठाए जाने को फिक्सिंग बता रहे हैं। उनका कहना है कि इस स्थगन ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को अपनी सरकार का पक्ष जनता के सामने रखने का मौका दिया है। इससे कांग्रेस की भद भी पिटी है। जाहिर है प्रदेश के नेताओं को इस राजनीतिक परिपाटी को अच्छी तरह समझना होगा। वे विकास की इस यात्रा में सहयोगी के रूप में बने रहेंगे तो उनके अच्छे दिन चलते रहेंगे। यदि विरोध करने की राजनीति न छोड़ी तो फिर जयहिंद।

  • किसान आंदोलन पर उलटा पड़ा कांग्रेस का दांव

    किसान आंदोलन पर उलटा पड़ा कांग्रेस का दांव

    भोपाल(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)। मध्यप्रदेश विधानसभा में आज नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने जब किसान आंदोलन पर स्थगन लाने का प्रस्ताव प्रस्तुत किया तब सभी समझ रहे थे कि अब भाजपा सरकार को खासी परेशानी होगी लेकिन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने चर्चा कराने का ये प्रस्ताव तत्काल स्वीकार कर लिया। इसके बाद भाजपा के नेताओं किसानों के लिए किए गए अपनी सरकार के जो कामकाज गिनाए उसके बाद तो सारी बाजी पलट गई। हर नेता ने कांग्रेस की सरकारों की खामियां गिनाईँ और किसान आंदोलन की सारी हकीकत सदन में उजागर कर दी। पंचायत मंत्री गोपाल भार्गव ने तो किसान आंदोलन पर कांग्रेस को आड़े हाथों लिया।

    उन्होंने कहा कि ये आंदोलन सिर्फ उसी हिस्से में था जहाँ पर अफीम का उत्पादन होता है, डोडा चूरा का उत्पादन होता है, हमारे बुन्देलखण्ड के 5 जिलों में कहीं नहीं है, भिण्ड जिले में नहीं है, ग्वालियर चंबल संभाग में कहीं नहीं है. यह स्पष्ट रूप से इस बात का प्रतीक है कि पूरा का पूरा मामला तस्करों के द्वारा प्रेरित था, जिसके लिए यहाँ पर स्थगन लाया गया, उनकी मदद के लिए स्थगन लाया गया, मेरा आरोप है.उन्होने कहा अलाभकारी मूल्य की बात हो रही है. किसान का भावनात्मक शोषण कर रहे हैं. अध्यक्ष महोदय, किसान बहुत भावुक होता है और भावुक होने के कारण ही उसे लोग प्रेरित करते हैं. मैं एक जगह अपने क्षेत्र में सुन रहा था, एक करोड़ रुपये की मुख्यमंत्री जी ने घोषणा की, कुछ लोग हमारे ही क्षेत्र में कहने लगे एक करोड़ मिल जाएँगे तुम लटक जाओ और वे दूसरी पार्टी के लोग थे, मैं उनके बारे में कुछ कहना नहीं चाहता. क्या उनको ऐसा कहना चाहिए? अध्यक्ष महोदय, मैं इस बात को कहना चाहता हूँ कि यदि हम वास्तव में किसानों के हितैषी हैं और हम वास्तव में किसान हैं, तो अपनी सब्जियों को, अपने खाद्यान्न को, अपने दुग्ध उत्पादन को, अपने दूध को, हम सड़कों पर नहीं बहा सकते, हम नालियों में नहीं फेंक सकते और सब्जियों को हम कुचल नहीं सकते. अध्यक्ष महोदय, सरकार ने किसानों के लिए क्या नहीं किया? साढ़े चार हजार करोड़ रुपये पिछले साल फसल बीमा का मिला, साढ़े चार हजार करोड़ रुपया, लगभग राहत राशि का मिला. नौ हजार करोड़ रुपये की राशि पिछले साल किसानों के लिए मिली. आपकी सरकार के समय 100-100, 50-50, रुपये के चेक मिलते थे और जहाँ तक फायरिंग की बात है, फायरिंग की बात के लिए आप याद कर लो मुलताई की 1998 की घटना, 29 किसान मारे गए थे और वाहवाही करने के लिए तो इन्होंने असत्य एनकाउण्टर तक किसानों का किया. अध्यक्ष महोदय, शिवपुरी जिले में रामबाबू गडरिया को मारने की एक घटना हुई. तमगे लगा लिए, प्रमोशन हो गया, आउट आफ टर्न और अध्यक्ष महोदय, जिनको मारा था, वह निकले 3 किसान, खेत में पानी बराने के लिए जा रहे थे, उनके लिए मार दिया गया और तत्कालीन मुख्यमंत्री जी ने, सच है कि नहीं? आप बताएँ. सच है कि नहीं वह 3 किसान मारे गए थे? और उसके बाद में टी.आई. को डी.एस.पी. और डी.एस.पी. को एस.पी. बना दिया, सार्वजनिक सम्मेलन कर के,बताइये यह सही है और आप किसानों के हित की बात करते हैं? इसलिए मैं कहना चाहता हूं कि बात करना है तो तर्क के साथ में करें. हमारी सरकार ने पिछले 13 वर्षों में अनेकों काम किये हैं, उन सब के लिए बात होनी चाहिए. अध्यक्ष महोदय, मैं बहुत विनम्रतापूर्वक हमारे प्रतिपक्ष के सदस्यों से कहना चाहता हूं. अपने मित्रों से कहना चाहता हूं कि आत्मा पर हाथ रखकर आप बोलें कि क्या किसान के हित में इस सरकार ने पिछले वर्षों में कोई काम नहीं किया? बहुत-सी बातें सुसाइड की सामने आईं. माननीय अध्यक्ष महोदय, प्रतिपक्ष के सदस्यों ने यह नहीं बताया कि उन किसानों के पास कितने सुसाइड नोट मिले? कोई वीडियों क्लिपिंग उनके पास मिली क्या? आज कल तो घर-घर में मोबाईल हो गये हैं, मोबाईल की कहीं कोई क्लिपिंग मिली चूंकि किसानों की संख्या ज्यादा है, तादाद ज्यादा है इस कारण से यह माना जाता है कि स्वाभाविक रूप से किसान यदि दर्ज है, रिकार्ड में उसके नाम से कुछ जमीन दर्ज है, घर के भी झगड़े होते हैं, पारिवारिक विवाद होते हैं, अन्य प्रकार की समस्यायें होती हैं, बीमारियाँ होती हैं इस कारण से यदि किसान आत्महत्या करते हैं तो उसके पीछे यह न माना जाना चाहिए वह कर्जदार ही हैं. कई किसान ऐसे हैं जिनके घर में पर्याप्त राशि मिली है लेकिन उन्होंने मृत्यु को प्राप्त किया है.

    हमारे बहुत वरिष्ठ सदस्य रामनिवास जी हैं, इसी सत्र में आपके प्रश्न का एक उत्तर आया है. इस उत्तर में स्पष्ट है कि फसल की विफलता के कारण जो मृतक किसानों की संख्या है वह जीरो है.कर्ज के कारण 6, गरीबी से 2, नशे की लत के कारण 37, बीमारी से परेशान होकर 68, संपत्ति के कारण 5, पारिवारिक कारणों से 51, अन्य कारणों से 20 इस प्रकार कुल 189 किसानों की अलग-अलग कारणों से पिछले छह माह में मृत्यु राज्य के अंदर हुई है. अध्यक्ष महोदय, हम यह नहीं सकते है कि यह किसान ने दिवालिया होकर, किसान ने कर्ज के कारण, किसान ने प्रताड़ित होकर आत्महत्या कर ली. अध्यक्ष महोदय, नीति आयोग की जो रिपोर्ट आई है उसमें यह बात आई है और जहाँ तक किसानों का जो सुसाइड रेट है वह हमारे राज्य में सबसे नीचे है. लेकिन इसका भी हमें बहुत अफसोस है, दुख है. हमारा कोई भी भाई मरता है, चाहे वह किसान हो, व्यापारी हो, परीक्षा में अनुत्तीर्ण छात्र हो या किसी भी वर्ग का आदमी हो, खेतिहर श्रमिक हो, कोई भी हो सभी के लिए तकलीफ होती है, दुख होता है. लेकिन कुछ घटनायें ऐसी रहती हैं जिनको हम और आप कोई भी नहीं रोक सकते हैं लेकिन हमें नीतियाँ ऐसी बनानी चाहिए, क्रियान्वयन इतना पारदर्शी रखना चाहिए कि जितना संभव हो सके राज्य में इस प्रकार की घटनाएं रुके.

    अध्यक्ष महोदय, यदि पार्टीगत बात करते हैं कि बीजेपी की सरकार होने के कारण यहाँ पर आत्महत्यायें हो रही हैं, तो मैं आपको पढ़कर बता रहा हूं, आत्महत्या का परसेंट पांडिच्चेरी में 43.2 है जबकि वहाँ आपकी कांग्रेस की सरकार है, सिक्किम में गैर भाजपा सरकार है वहाँ 37.5 परसेंट है, तेलंगाना में गैर भाजपा सरकार है वहाँ 27 परसेंट है, तामिलनाडु में अन्नाद्रुमक या द्रुमुक की सरकारें रही हैं, वहाँ 22 परसेंट है,केरल में कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार है वहाँ 21 परसेंट है, त्रिपुरा में कम्युनिस्ट पार्टी की मार्क्सवादियों की सरकार है वहाँ 19 परसेंट है, कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार है वहाँ 17 परसेंट है, पश्चिम बंगाल में तृणमूल की सरकार है वहाँ 15 परसेंट है , महाराष्ट्र में पूर्व में जब आपकी कांग्रेस की सरकार थी,उस समय का रेट है 14 परसेंट और मध्यप्रदेश में यह रेट 13 परसेंट है. हालांकि यह 13 परसेंट भी नहीं होना चाहिए. यह हम सब लोगों के लिए चिंता की बात है कि देश में किसी भी किसान की मृत्यु हो, किसी भी वर्ग के व्यक्ति की मृत्यु हो. हमें लोक कल्याणकारी सरकार के लिए प्रयास यह करना चाहिए कि किसी भी व्यक्ति की मृत्यु अभाव के कारण ना हो. लेकिन कुछ घटनायें ऐसी होती हैं जिनको हम रोक नहीं सकते हैं. माननीय गोविंद सिंह जी ने बहुत-सी बातें कहीं औऱ अनेकों सदस्यों ने प्रश्न लगाये हैं, जो स्थगन सूचनायें दी हैं. मैं इतना ही निवेदन करना चाहता हॅूं कि गोली चलाना कोई अच्‍छी बात नहीं है. जैसा गृहमंत्री जी ने अपने उत्‍तर में कहा है 109 कर्मचारी घायल हुए और कई बहुत गंभीर रूप से घायल हुए, परमानेंटली आंख डैमेज हो गई. अब उस कर्मचारी की आंख कभी सुधर नहीं सकती. क्‍या यह किसी विदेशी ने आकर किया था ? यह तो सब हमारे लोग थे और हमारे लोगों के लिए प्रेरित करने का काम, भड़काने का काम यदि किसी ने किया है तो वह ऐसे असामाजिक तत्‍वों ने किया, जो कतई सामाजिक नहीं थे, कतई अच्‍छे लोग नहीं थे. अन्‍य लोग थे और मैं कांग्रेसी मित्रों से भी कहना चाहता हॅूं कि राजनीति करने के लिए हमारे पास बहुत से विषय पडे़ हैं. बहुत-सी समस्‍याएं हैं. आज भी देश और प्रदेश बहुत-सी समस्‍याओं से जूझ रहा होगा. लेकिन मैं यह कहना चाहता हॅूं कि किसानों के शवों के ऊपर राजनीति नहीं करना चाहिए.

    माननीय अध्‍यक्ष महोदय, श्री पी.के.यादव की आंख क्षतिग्रस्‍त हो गई है. कांग्रेस के मित्र हैं मैं नाम नहीं लेना चाहता. इसमें काफी नाम लिखे हुए हैं. जिन्‍होंने सक्रिय रूप से भाग लिया. वीडियोग्राफी है. हम कहना चाहते हैं कि राजनीति होगी जब मकाम होगा, उस समय तय कर लेंगे कि राजनीति की दिशा क्‍या होगी. बिजली की बात, सिंचाई की बात, फर्टिलाइजर की बात, उत्‍तम सीड की बात है. आज आप अपनी आत्‍मा पर हाथ रखकर बताएं कि क्‍या पहले से बेहतरी नहीं आयी है ? वर्ष 2003 के पहले जब मैं विधायक था. मैं एमएलए रेस्‍ट हाउस के फैमिली ब्‍लॉक में रहता था. मैंने वे दिन देखे हैं जब रेस्‍ट हाउस में सुबह 6 बजे से सुबह 10 बजे तक बिजली बंद रहती थी, जबकि हम लोग विधायक थे. एक प्रकार से सरकार के अंग थे लेकिन मैंने सुबह-सुबह मोमबत्‍ती में, लालटेन में अखबार पढे़ हैं क्‍योंकि मुझे स्‍थगन और ध्‍यानाकर्षण सूचनाएं देना पड़ती थीं. क्‍या हमने वह दिन नहीं देखें हैं. हर किसानों के पास जनरेटरों का अंबार लग गया था. विद्युत उत्‍पादन कितना था, मोटर बाईंडिंग के लिए वायर नहीं मिलता था. वह काले दिन थे. हमारे सभी वरिष्‍ठ सदस्‍य बैठे हैं. क्‍या हम वह भूल जाएंगे. याद नहीं करेंगे. हम विद्युत उत्‍पादन के मामले में बहुत बेहतरी में आएं हैं. रबी की फसल की आधी जमीन असिंचित पड़ी रहती थी. आज वह पूरी सिंचित है. कृषि उत्‍पादन बढ़ा है और कई गुना बढ़ा है. गर्व से कहने की बात है कि हम आज कृषि उत्‍पादन के मामले में और जीडीपी के मामले में पंजाब और हरियाणा से भी आगे हैं. (मेजों की थपथपाहट) यह नीति आयोग की रिपोर्ट है. यह पूरा का पूरा प्रामाणिक है. कृषि उत्‍पादन के मामले में, सिंचाई के मामले में आगे हैं. सिंचाई कितनी बढ़ गई है. जब आप लोगों की सरकार थी कृषि ग्रामीण विकास बैंक से ऋण लिया जाता था, हर महीने 24 परसेंट इंट्रेस्‍ट लगता था, आप लोगों को याद होगा और जब कम्‍युलेट होता था तो वह 40 परसेंट तक हो जाता था. कभी कोई किसान अपनी जमीन वापस नहीं ले पाया और हम लोगों ने तय किया कि आज भी हजारों एकड़ जमीन एलडीपी में बंधक रखी हुई है. माननीय मुख्‍यमंत्री जी ने कहा और हम सभी लोगों ने भी तय किया कि एक इंच जमीन भी हम नीलाम नहीं होने देंगे, भले ही पैसा वापस आए अथवा नहीं आए. (मेजों की थपथपाहट) सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक, अपेक्‍स बैंक की दरें सहकारिता के क्षेत्र में जो हमारे बैंक हैं उनकी दरें कभी 24 परसेंट, 22 परसेंट हुआ करती थी घटते-घटते 7, 5, 4, 3 और आते ही हमने शून्‍य कर दी. लोग आश्‍चर्य करते हैं कि बिना ब्‍याज का ऋण और उसके ऊपर मूल में भी छूट है. 10000 रूपए का ऋण लेंगे तो 9000 रूपए वापस करने पडे़गे तो उसमें 1000 रूपए की भी छूट क्‍या किसान के लिए यह सुविधाएं नहीं मिलीं ? व्‍यवस्‍थाएं नहीं मिलीं ? आज मैं यह कहना चाहता हॅूं कि हमें दिल पर हाथ रखकर इस बात को सोचना चाहिए कि हमने क्‍या बेहतर किया और हमें आज बैठकर चर्चा करना चाहिए कि हम क्‍या बेहतर से बेहतर और ज्‍यादा कर सकते हैं. हमने कृषि केबिनेट बनायी और कृषि केबिनेट में वे तमाम फैसले जो किसानों के हित में हो सकते हैं लगातार बैठकें करके हम लोगों ने लागू किया है. घटना के बारे में मुख्‍यमंत्री जी ने केबिनेट की फिर बैठक की और उसके बाद बाहर से विशेषज्ञ बुलाए. दिल्‍ली के पूसा से आईसीएआर के विशेषज्ञ बुलाए गए और विस्‍तृत रूप से यह चर्चा हुई कि हम बेहतर मार्केटिंग कैसे कर सकते हैं ? उत्‍पादन में तो हम आगे हो गए लेकिन हम मार्केटिंग बेहतर से बेहतर कैसे कर सकते हैं ? यह सबको जानकारी है कि नाफेड आज कमजोर आर्थिक स्‍थिति में चल रहा है. चने की, मसूर की, अरहर की, मूंग की जो खरीद होनी चाहिए वह आज नाफेड के माध्‍यम से पूरी तरह से नहीं हो रही है, तो सरकार ने एक हजार करोड़ रुपये यानि कि 10 अरब रुपये का अपना स्‍वयं का मूल्‍य स्‍थरीकरण के लिए फंड बनाया जो कि हिंदुस्‍तान के इतिहास में, मध्‍यप्रदेश के इतिहास में पहली बार हुआ है. एक हजार करोड़ रुपये का फंड स्‍थाई सर्विस के लिए सरकार ने इसलिए बनाया कि यदि घाटा होता हो तो हो जाए, लेकिन मध्‍यप्रदेश के किसी किसान को घाटा न हो, उसे अपनी जान न देनी पड़े.

    अध्‍यक्ष महोदय, रोज अखबारों में प्‍याज की खबर आ रही है, कह दिया गया है कि 8 रुपये प्रति किलोग्राम के भाव से प्‍याज खरीदेंगे और यदि खराब हो जाए तो भी किसान को नुकसान नहीं होने देंगे, एक बार सरकार के लिए नुकसान हो जाए, हम अपनी 10 योजनाओं में कटौती कर देंगे, लेकिन किसान के पेट पर लात नहीं मारने देंगे.

    अध्‍यक्ष महोदय, दर्जनों बातें ऐसी हैं, जिनके कारण मैं अपने विपक्ष के साथियों से कहना चाहता हूँ कि हमें खुले दिल से, राज्‍य के किसानों के हित में और अन्‍य सभी वर्गों के हित में काम करना चाहिए तो मुझे लगता है कि मध्‍यप्रदेश में जैसे हम बेहतर स्‍थिति में आए हैं और ज्‍यादा बेहतर कर सकते हैं अन्‍यथा वही पुराने दिन लौट आएंगे. मुझे स्‍मरण है कि आस्‍ट्रेलिया का वह लाल गेहूँ, लोग तो क्‍या जानवर भी नहीं खाते थे जो ये इम्‍पोर्ट करवाते थे, आस्‍ट्रेलिया के वे लाल गेहूँ खाने के बुरे दिन न आएं. अब तो मुझे खुशी है कि मध्‍यप्रदेश की शरबती और मध्‍यप्रदेश का बासमती आस्‍ट्रेलिया वाले खा रहे हैं तो यह हम लोगों के कारण हुआ है.

    अध्‍यक्ष महोदय, मैं माननीय सदस्‍यों से कहना चाहता हूँ कि ये जो हमारी प्रवृत्‍ति है, इस प्रवृत्‍ति में हमें परिवर्तन करना पड़ेगा. किसान के मुद्दे को लेकर हर गाँव में, हर कस्‍बे में, जिला मुख्‍यालय पर या जगह-जगह पर मजमे करके हम शायद यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि मध्‍यप्रदेश कृषि के मामले में पिछड़ा है, किसान दु:खी है, लेकिन इससे पूरे प्रदेश की बदनामी होती है, पूरे प्रदेश की अवमानना होती है. यदि मेरी अवमानना होगी, भारतीय जनता पार्टी के सदस्‍य की अवमानना होगी तो मैं सदस्‍य तो हूँ ही, लेकिन एक नागरिक भी हूँ. इस कारण से मैं कहना चाहता हूँ कि आपकी भी अवमानना होगी.

    मैं पूर्व में बोल चुका हूं, फसल बीमा का 4660 करोड़ रुपया, पिछले साल ही किसानों के लिए दिया गया है. मैं सदस्यों को बताना चाहता हूं कि आपको सुनकर आश्चर्य होगा. सीहोर जिले में कुल 26 करोड़ रुपया प्रीमियम का जमा हुआ था और बदले में 443 करोड़ रुपया सीहोर जिले के लिए बंटा है. विदिशा में 21 करोड़ रुपया प्रीमियम का जमा हुआ था, 310 करोड़ रुपया बंटा है. रायसेन में 18 करोड़ रुपया प्रीमियम में जमा हुआ था, 172 करोड़ रुपया बंटा है. सागर जिले में 16 करोड़ रुपया प्रीमियम का जमा हुआ था, 254 करोड़ रुपया बंटा है, बुन्देलखंड में बंटा है. मैं इसीलिए इन बातों को कह रहा हूं, जो माननीय श्री के.पी. सिंह साहब कह रहे थे. इसकी रेलिवेंसी है, इसकी सम्बद्धता है, इसका औचित्य है और इसीलिए भी है कि जहां आत्महत्या की बात आती है, जहां गोली चालन की बात आती है, जहां घटनाओं की बात आती है, वहां इन तथ्यों को भी देखना पड़ेगा कि हमने कृषि के क्षेत्र में क्या-क्या किया है. राहत राशि भी लगभग 4600 करोड़ रुपए हमने दी है. इसके बाद में आरबीसी 6 (4) में जितने संशोधन हुए, जितने सुधार हुए, और ज्यादा किया है कि यदि किसान की भैंस, बैल की मृत्यु हो जाय, वह बह जाय, दुर्घटना में, करंट में, सर्प के काटने से कुछ हो जाय, अभी तक तो आदमी के लिए नियम था, मुख्यमंत्री जी ने उसमें पशुओं तक में नियम कर दिया.

    अध्यक्ष महोदय, मैं यह कहना चाहता हूं कि सब एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, यह क्या रेलिवेंट नहीं है? रेलिवेंसी है, इस कारण से मैं इन बातों को कहना चाहता हूं. आरबीसी 6 (4) में लगातार सुधार हुआ है. गेहूं का उपार्जन 70 लाख टन गेहूं खरीदा गया है, उन्हीं प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़कों से मंडियों में उपार्जन केन्दों पर आया, इसलिए इन बातों को कह रहा हूं. सॉइल हेल्थ कॉर्ड, घर जाकर सॉइल हेल्थ कॉर्ड बनाने का काम हो रहा है, हमारा इसके लिए ग्रामोदय अभियान चला. सबसे बड़ी बात जो मुख्यमंत्री जी ने कही है कि अब हम खसरा, खतौनी की नकल एक-एक किसान के घर पर जाकर देंगे ताकि किसी प्रकार के भ्रष्टाचार की कोई गुंजाईश प्रदेश में नहीं रहे. इससे बड़ी क्या उपलब्धि हो सकती है? (अध्यक्ष महोदय, अनेकों बातें हैं, इतना ही कहना चाहता हूं कि मध्यप्रदेश एक शांति का टापू है और जब से हमारे यहां डाकू उन्मूलन हुआ है, मध्यप्रदेश में इस प्रकार की कोई घटना घटित नहीं हुई है, जिससे इस प्रदेश के ऊपर कोई कलंक आए, इस प्रदेश के ऊपर कोई कालिख आए, इस प्रदेश के ऊपर कोई ऊंगली उठाए. यह प्रदेश हम सबका है, मेरा भी है, आपका भी है, सभी का है. हम सभी मध्यप्रदेशवासी शान के साथ में यह कह सकते हैं कि हम कृषि उत्पादन के मामले में देश में अव्वल हैं और जब अव्वल हैं तो स्वाभाविक रूप से यह स्वतः सिद्ध है कि किसान भी सुखी होगा ही, क्योंकि यह कृषि उत्पादन कहां से बढ़ता है, किसान की समृद्धता से और जब किसान समृद्ध है तो मैं यह मानकर चलता हूं कि कोई कारण ऐसा नहीं है कि जिसमें हमें पुलिस का प्रयोग करना पड़े, प्रशासन का प्रयोग करना पड़े, कोई अप्रिय स्थिति न आए और यदि लाई जाती है तो निश्चित रूप से हम सभी के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है.

    अध्यक्ष महोदय, मैं माननीय सदस्यों से यही कहना चाहता हूं. बहुत लोग आ रहे हैं. मंदसौर के लिए आप तीर्थ मत बनाएं, यह अच्छी परंपरा नहीं है, इसलिए मैं कहना चाहता हूं कि इससे एक प्रदूषण का वातावरण भी बनता है. राहुल भैया भी वहां पर गये थे, आप भी गये थे. राहुल गांधी जी गये थे और नानी जी के यहां से जब से लौटे हैं तो नानी जी की कहानियां तो बड़ी शिक्षाप्रद होती थीं, पता नहीं नानी जी ने राहुल भैया को कैसी कहानी सुनाई होगी मुझे तो नहीं मालूम, लेकिन यहां पर नानी याद आ जाएगी, हम नहीं बताना चाहते, इसलिए आप सब इसको नहीं करें. अध्यक्ष महोदय, जो आपने समय दिया, उसके लिए बहुत-बहुत धन्यवाद.

  • चुटका परमाणु बिजली संयंत्र को जमीन आबंटित

    चुटका परमाणु बिजली संयंत्र को जमीन आबंटित

    मंत्रि-परिषद के निर्णय

    भोपाल(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)।

    मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान की अध्यक्षता में आज हुई मंत्रि-परिषद की बैठक में पचमढ़ी अभयारण्य से 11 ग्राम एवं नजूल के 395.939 हेक्टेयर क्षेत्र को अभयारण्य क्षेत्र से बाहर करने तथा अभयारण्य के शेष बचे 28 ग्रामों को अभयारण्य क्षेत्र में इनक्लोजर के रूप में रखने का निर्णय लिया गया। इन ग्रामों पर वन्य-प्राणी संरक्षण अधिनियम 1972 के अभयारण्य से संबंधित प्रावधान लागू नहीं होंगे।

    मंत्रि-परिषद ने केंद्रीय जेल भोपाल के 8 विचाराधीन बंदियों के भागने की घटना की न्यायिक जाँच के लिए गठित जाँच आयोग के कार्यकाल में तीन माह की वृद्धि करने का निर्णय लिया । यह वृद्धि 7 अगस्त से 6 नवंबर 2017 तक की गई है।

    मंत्रि-परिषद ने राजधानी परियोजना प्रशासन के तहत 422 नियमित अस्थाई पद और कार्यभारित स्थापना के तहत 300 पद इस तरह कुल 722 पद 1 मार्च 2017 से आगामी 5 वर्ष के लिए निरंतर रखने की स्वीकृति दी।

    मंत्रि-परिषद ने मध्यप्रदेश के विभिन्न जिलों में सामान्य पूल के आवासगृहों के निर्माण के लिए 220 करोड़ की प्रशासकीय स्वीकृति दी।

    मंत्रि-परिषद ने मध्यप्रदेश गौण खनिज नियम 1996 में संशोधन के संबंध में समन्वय में दिये गये आदेश का अनुसमर्थन किया।

    स्कूल शिक्षा के महत्वपूर्ण निर्णय

    मंत्रि-परिषद ने प्रदेश में शासकीय हाई /हायर सेकेण्डरी विद्यालयों में फर्नीचर और हायर सेकेण्डरी स्कूलों की प्रयोगशाला में आवश्यक सामग्री की पूर्ति करने की स्वीकृति दी। इसका क्रियान्वयन आगामी 3 वर्षों तक होगा।

    मंत्रि-परिषद ने कक्षा 9 से 12 के दिव्यांग बच्चों के लिए संभाग स्तर पर छात्रावास संचालन की स्वीकृति दी। योजना को आगामी 3 वर्ष तक संचालन की स्वीकृति मिली है।

    मंत्रि-परिषद ने शासकीय हाई/हायर सेकेण्डरी विद्यालय भवन में रेट्रोफिटिंग जैसे लैब, पुस्तकालय, खेलकूद कक्ष में आवश्यक कार्य, पार्टीशन, सायकल स्टेण्ड, शेड निर्माण, स्टेज निर्माण, मैदान निर्माण, बगीचा निर्माण, पेयजल व्यवस्था आदि के लिए नयी योजना स्वीकृत की। वर्ष 2017-18 में इस मद में 9.20 करोड़ तथा 3 वर्ष के लिए 43.7 करोड़ की राशि स्वीकृत की गईं।

    राजस्व निर्णय

    मंत्रि-परिषद ने भूमि-अर्जन, पुनर्वासन एवं पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम 2013-शासन के विभिन्न विभागों/उपक्रमों के लिए ‘आपसी सहमति से भूमि क्रय नीति’ 12 नवंबर 2014 में संशोधन की मंजूरी दी। संशोधन के बाद कण्डिका 14 में क्रय की गई भूमियों के विक्रय विलेख के विषय में भारतीय स्टाम्प अधिनियम 1899 एवं रजिस्ट्रीकरण अधिनियम 1908 के प्रावधान लागू होंगे।

    मंत्रि-परिषद ने ‘शासकीय भूमि में से भूमिगत पाइप लाइन, केबल या डक्ट बिछाने के लिए अनुज्ञप्ति’ विषयक नीति लागू करने की मंजूरी दी। निर्णय लिया गया कि विभिन्न परियोजनाओं के लिए भूमिगत पाइप लाइन, केबल या डक्ट बिछाने के लिए निजी भूमियों का उपयोक्ता का अधिकार अर्जन किया जाता है और जहाँ इन कार्यों के लिए शासकीय भूमि की आवश्यकता होगी ऐसी भूमि परियोजना को लाइसेंस पर उपलब्ध करवाई जायेगी।

    मंत्रि-परिषद ने चुटका परमाणु विद्युत परियोजना के लिए न्यूक्लियर पॉवर कार्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड को मंडला और सिवनी जिले की शासकीय भूमि वर्तमान में प्रचलित कलेक्टर गाइड लाइन वर्ष 2017-18 के आधार पर प्रीमियम राशि और 7.5 प्रतिशत वार्षिक भू-भाटक लेकर आवंटन की मंजूरी दी।

  • जीएसटी से देश का आर्थिक एकीकरणःमलैया

    जीएसटी से देश का आर्थिक एकीकरणःमलैया

    भोपाल 12 जुलाई(पीआईसीएमपीडॉटकॉम)।

    वित्त एवं वाणिज्यिक कर मंत्री जयंत मलैया ने कहा है कि वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) ने काश्मीर से कन्याकुमारी तक देश का आर्थिक रूप से एकीकरण किया है। जीएसटी देश की आजादी के बाद आर्थिक क्षेत्र का सबसे बड़ा बदलाव है। इससे देश की तरक्की की रफ्तार को काफी गति मिलेगी। वित्त मंत्री मलैया आज भोपाल के समन्वय भवन में जीएसटी जागरूकता कार्यशाला को संबोधित कर रहे थे। कार्यशाला में राजस्व मंत्री उमाशंकर गुप्ता और सहकारिता राज्य मंत्री विश्वास सारंग भी मौजूद थे।

    वित्त मंत्री श्री मलैया ने कहा कि जीएसटी एक राष्ट्र, एक कर और एक बाजार के उद्देश्य से लागू किया गया है। प्रदेश में एक जुलाई से वाणिज्यिक कर विभाग की 29 चौकी समाप्त हो गयी हैं। उन्होंने कहा कि पहले करीब 18 प्रकार के कर हुआ करते थे। अब इन सबको समाप्त कर एक कर जीएसटी लागू किया गया है। श्री मलैया ने कहा कि मध्यप्रदेश में पूर्व में वेट विधान में व्यवसायियों को पंजीयन लेने की सीमा 10 लाख रुपये वार्षिक टर्न-ओव्हर थी। जीएसटी विधान में यह 20 लाख रुपये वार्षिक टर्न-ओव्हर कर दी गयी है। इसके साथ ही 75 लाख रुपये तक के व्यापारियों को कंपोजिशन की सुविधा भी दी गयी है। जीएसटी कानून में छोटे व्यवसायियों को सुविधा देने के अधिक से अधिक प्रयास किये गये हैं।

    वित्त मंत्री ने कहा कि बेरियर खत्म होने से सड़कों पर चलने वाले ट्रकों की रफ्तार तेज होगी। देश में जब बेरियर थे, तो ट्रकों में लगने वाले ईंधन में प्रतिवर्ष एक लाख 40 हजार करोड़ रुपये का अनावश्यक खर्च होता था। वित्त मंत्री ने कहा कि अमेरिका में मालवाहक ट्रक प्रतिदिन 800 किलोमीटर की दूरी तय करता है। जब बेरियर थे तब मालवाहक ट्रक देश में केवल 280 किलोमीटर प्रतिदिन की दूरी तय करते थे। अब मालवाहक ट्रकों की रफ्तार प्रतिदिन 350 से 400 किलोमीटर हो जायेगी। इससे व्यापारिक गतिविधियों में तेजी आयेगी। जीएसटी के टैक्स स्लेब की चर्चा करते हुए श्री मलैया ने कहा कि जीएसटी में कर की 5 दरें 0, 5, 12, 18 और 28 प्रतिशत हैं। केवल 19 प्रतिशत वस्तुएँ ऐसी हैं, जिन पर कर की दर उच्चतम अर्थात 28 प्रतिशत है। शेष 81 प्रतिशत वस्तुओं पर 18 प्रतिशत या उससे कम की दरें हैं। वित्त मंत्री श्री मलैया ने जीएसटी को देश के संघीय ढाँचे की बेहतर मिसाल बताया।

    राजस्व मंत्री श्री उमाशंकर गुप्ता ने कहा कि जीएसटी का निर्णय देश की तरक्की और आम जनता की भलाई के लिये लिया गया है। उन्होंने व्यापारियों से जीएसटी के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखने की सलाह दी। सहकारिता राज्य मंत्री श्री विश्वास सारंग ने कहा कि जीएसटी को लागू करने का निर्णय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी का साहसिक कदम है। इसके अच्छे प्रभाव आने वाले वर्षों में देखने को मिलेंगे। प्रमुख सचिव वाणिज्यिक कर श्री मनोज श्रीवास्तव ने कहा कि देश के संविधान को बनाने के लिये जितनी चर्चा नहीं हुई थी, उससे ज्यादा जीएसटी कानून को बनाने के लिये हुई है। उन्होंने कहा कि जीएसटी कानून में लगातार चर्चा के बाद जनता के हितों को देखते हुए संशोधन किये जायेंगे। उन्होंने हाल ही में किसानों के हित में फर्टिलाइजर में जीएसटी की दर कम किये जाने का उल्लेख किया। कार्यशाला में वाणिज्यिक कर आयुक्त श्री राघवेन्द्र सिंह और सेंट्रल एक्साइज के चीफ कमिश्नर श्री हेमंत भट्ट ने जीएसटी के प्रावधानों के बारे में जानकारी दी। कार्यशाला का संचालन वित्त मंत्री के विशेष कर्त्तव्यस्थ अधिकारी श्री नितिन नांदगांवकर ने किया। कर सलाहकार श्री आर.एस. महेश्वरी ने व्यापारियों की समस्याओं का समाधान किया।

  • जीएसटी को सहकारी संघवाद बता रही भाजपा

    जीएसटी को सहकारी संघवाद बता रही भाजपा

    भोपाल(पीआईसीएमपीडॉटकॉम) जीएसटी लागू होने के बाद अनुमान लगाया जा रहा है कि इससे सबसे अधिक क्षति भारतीय जनता पार्टी को होगी। उसके समर्थकों में सबसे ज्यादा व्यापारी वर्ग शामिल है और जीएसटी लागू होने से सबसे ज्यादा क्षति उन्हें ही पहुंचने का अनुमान लगाया जा रहा है। भाजपा ने इन हालात को समझते हुए जीएसटी के समर्थन में नारा देना शुरु कर दिया है कि भाजपा जिस सांस्कृतिक संघवाद की आवाज उठाती रही है वो अब सहकारी संघवाद की भावना के साथ देश को आर्थिक समृद्धि भी प्रदान करेगी। व्यापारी वर्ग अपनी पार्टी के इस फैसले से कदमताल करने चल पड़ा है। उसे भरोसा दिलाया जा रहा है कि खातों की इस फेरबदल में यदि व्यापारियों को वास्तविक क्षति पहुंचेगी तो सरकारी तंत्र उन्हें आवश्यक छूटें भी प्रदान करेगा।

    अभी तो ये उम्मीद की जा रही है कि जीएसटी परिषद जल्दी ही मौजूदा व्यवस्था की अपूर्णताओं को दूर करेगी। इन कमियों में कर दरों की बहुलता, विभिन्न रियायतें और प्रक्रियात्मक जटिलता शामिल हैं। इसके लिए काफी हद तक कर नौकरशाही जवाबदेह है जो राज्य और केंद्र दोनों जगहों पर नियंत्रण को नकार रही है। लेकिन जीएसटी के लागू होने को केवल आर्थिक नीति सुधार के रूप में देखना नरेंद्र मोदी सरकार की उपलब्धि को कमतर आंकने जैसा है। इसमें छुपा राजनीतिक संदेश भी उतना ही अहम है। जीएसटी पर बनाई गई आम राजनीतिक सहमति भी काफी कुछ कहती है। भाजपा की राजनीति के लिए भी जीएसटी उतना ही अहम है जितना कि देश की अर्थव्यवस्था के लिए।देखा जाए तो भाजपा इससे तीन महत्वपूर्ण संदेश भी दे रही है।

    पहला, जीएसटी की शुरुआत का इस्तेमाल सत्ताधारी दल बेहद सावधानी से अपनी सहकारी संघवाद की राजनीति के प्रचार के रूप में कर रहा है। वह ऐसा करके देश को याद दिला रहा है कि उनके लिए सहकारी संघवाद आस्था का विषय है और नई अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था उस विचार की प्रतिबद्धता का उदाहरण है। यह बात अहम है क्योंकि सत्ता में आने के पहले मोदी समेत भाजपा के सभी नेता कहते रहे हैं कि सत्ता में आने के बाद वे सहकारी संघवाद की नीति को आगे बढाएंगे।

    बीते तीन सालों में कई बार भाजपा सरकार नीतिगत सुधारों में इस सिद्धांत का पालन करने में नाकाम रही है।उम्मीद की गई थी कि नीति आयोग राज्यों की मदद से देश भर में नीतिगत सुधारों को इसी विचार के अधीन आगे ले जाएगा परंतु ऐसा हुआ नहीं। भूमि अधिग्रहण विधेयक में संशोधन करने में विफल रहने के बाद मोदी सरकार ने संकेत दिया था कि वह राज्यों में ऐसे ही सुधार लाएगी। इसी प्रकार श्रम कानूनों की जटिलताओं मे राहत देने के लिए राज्यों को प्रोत्साहित किया गया कि वे अपने यहां के श्रम कानूनों में बदलाव करें। हालांकि बाद में इस बात पर समुचित ध्यान नहीं दिया गया कि राज्यों ने इस दिशा में क्या कदम उठाए? राज्यों की ओर से कृषि उपज विपणन और अचल संपत्ति संबंधी सुधारों के क्रियान्वयन में भी ऐसी ही ढिलाई बरती गई। जबकि केंद्र ने इन कानूनों में उचित बदलाव कर दिए थे।

    अब लगता है कि जीएसटी का लागू होना शायद पहला बड़ा सुधार है जहां केंद्र सरकार ने सभी राज्यों को साथ लेकर कदम उठाया है। निश्चित तौर पर सहकारी संघवाद का प्रदर्शन करते हुए राज्यों को इस बात के लिए आश्वस्त किया गया कि उनके किसी भी राजस्व नुकसान की भरपाई की जाएगी। इसी प्रकार राज्य सरकारों की बात भी सुनी गई। जीएसटी परिषद की अब तक हुई 18 बैठकों में सभी फैसले बिना किसी मतदान के सबकी सहमति से लिए गए।

    यही कारण है कि संसद के केंद्रीय कक्ष में जब जीएसटी की शुरुआत की गई तो तमाम राज्यों और विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता वहां मौजूद थे। केंद्र सरकार ने जीएसटी को बाकायदा सहकारी संघवाद के प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठित करने मे कामयाबी पाई। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भी कहा कि तमाम राजनीतिक दलों और सरकारों तथा केंद्र के बीच सहयोग से ही जीएसटी का स्वप्न हकीकत में बदल सका।

    दूसरा बड़ा संदेश यह है कि अब जीएसटी की शुरुआत को सरकार की कालेधन से लड़ाई के अंग के रूप में पेश किया जा रहा है। यह सच है कि जीएसटी बड़े पैमाने पर लेनदेन को कर दायरे में लाएगा जो अन्यथा इससे बाहर रहते। सरकार ने चुनाव में भी कालेधन से निपटने का वादा किया था। भाजपा चुनाव के दौरान ही काले धन के खिलाफ लड़ने का वादा करती रही है। अब उसका जीएसटी लागू करने का फैसला काले धन के खिलाफ नोटबंदी से ज्यादा कारगर कदम साबित होने जा रहा है।

    मौजूदा सरकार का कारोबारियों और दुकानदारों से करीबी जुड़ाव है। पार्टी ने एक ऐसा कदम उठाया है जो इस समूह को ही सबसे अधिक प्रभावित करने वाला है। यह उसका राजनीतिक वर्ग है और जीएसटी का सीधा संबंध इसी वर्ग से है। भाजपा नेता भी यह स्वीकार करने में नहीं हिचकते कि कारोबारी जगत के नाराज साथियों को जीएसटी अनुशासित करेगा। इससे यह संकेत मिलता है कि भाजपा ने कारोबारी वर्ग के साथ रिश्ते को नए रूप में ढाला है। जीएसटी का लागू होना इस बदलाव की पुष्टि करता है। भाजपा के नेता कह रहे हैं कि जीएसटी से फर्जी खाते रखने का चलन तो समाप्त होगा लेकिन व्यापारियों की साख में जबर्दस्त इजाफा होगा।

  • चीनी माल की टैक्स चोरी रोकेगा जीएसटी

    चीनी माल की टैक्स चोरी रोकेगा जीएसटी

    राहुल लाल

    चीनी माल से तबाह हो रहे भारतीय उद्योगों के लिए जीएसटी एक नई आशा की किरण बनकर कवच के रूप में सामने आया है। अब तक जो चीनी माल चोरी छुपे भारत के बाजारों में भेजा जा रहा था उसे अब देशी माल से चुनौती का सामना करना पड़ेगा। जीएसटी लागू होने के बाद चीनी माल बेचने वाले व्यापारी हमारे टैक्स तंत्र की खामियों का लाभ नहीं ले पाएंगे। भारत के वैश्विक तौर पर लगातार उभरने से चीन की परेशानियां बढ़ती जा रहीं हैं। चीन ने भारत-भूटान के साथ सीमा-विवाद पर नया दांव चला है. चीन ने नक्शा जारी कर भारत और भूटान के अधिकार क्षेत्र वाली सिक्किम सेक्टर की जमीनों पर दावा किया है. चीन ने नक्शे में डोका ला और डोकलाम के भारत-चीन-भूटान के त्रिकोणीय जंक्शन को चिह्नित कर दावा किया है कि 1890 में ब्रिटिश-चीन संधि के तहत यह इलाका उनके अधिकार क्षेत्र में आता है. 2014 में चीन ने अरुणाचलप्रदेश और जम्मू-कश्मीर को अपना अभिन्न अंग बताया था. तब भारत के उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी चीन के दौरे पर गए थे. भारत ने तब चीन के इस मानचित्र पर कड़ी प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए कहा था कि नक्शा जारी करने से जमीनी हकीकत नहीं बदलती.

    चीन ने भारत पर दबाव बनाने के लिए नाथू ला की तरफ से मानसरोवर यात्रा पर तो पहले खराब मौसम का बहाना लगाकर रोका, फिर तो सिक्किम क्षेत्र से सेना वापसी की मांग रख दी. इसपर भारत ने नाथू ला वाले मानसरोवर यात्रा को ही स्थगित कर दिया. चीन मोदी-ट्रंप की प्रथम मुलाकात से भी बौखला गया है. यही कारण है कि चीनी मुखपत्र ‘ग्लोबल टाइम्स’ में मोदी-ट्रंप की प्रथम मुलाकात की तीखी आलोचना की. परंतु चीन की बौखलाहट यहीं नहीं रुकी. चीन ने भारत को फिर से 1962 की याद दिलाते हुए चेतावनी देने की कोशिश की, जिसका भारतीय रक्षा मंत्री अरुण जेटली ने स्पष्ट शब्दों में जवाब दिया कि चीन वर्तमान भारत को 1962 का भारत समझने का भूल न करे.

    एक जुलाई मध्यरात्रि को जिस तरह कर एकीकरण के मूलभूत परिघटना में जीएसटी क्रियान्वित किया गया, वह भारतीय संघवाद के अंतर्गत ‘सहकारी संघवाद’ का एक बहुत बढ़िया उदाहरण है। यह चीन के आक्रामक रवैए का मुंहतोड़ जवाब भी है. जीएसटी के कारण भारत ने सीमा पर बगैर तनाव बढ़ाए चीन को तगड़ी चुनौती दे डाली है।

    जीएसटी के लागू होने से चिरप्रतीक्षित ‘एक राष्ट्र, एक टैक्स’ की अवधारणा क्रियान्वित हो गई है. 15 अगस्त 1947 मध्य रात्रि को देश को अंग्रेजों के प्रत्यक्ष अधीनता से मुक्ति मिली, अब 1 जुलाई 2017 को मध्य रात्रि को संसद के उसी सेंट्रल हॉल से देश को पुराने 17 करों तथा उपकरों से मुक्ति मिली. चीन ने अपने सीमावर्ती क्षेत्र पर उत्कृष्ट आधारभूत संरचनाओं का निर्माण किया है, जबकि संसाधनों के अभाव के कारण भारत-चीन सीमा पर भारतीय क्षेत्र में आधारभूत संरचना का अभाव है. लेकिन जीएसटी लागू होने तथा काला धन पर सरकार के कठोर रवैया से अब सरकार के पास पर्याप्त संसाधन होंगे, जिससे सीमा प्रबंधन पर भी पूर्ण ध्यान दिया जा सकेगा.

    जीएसटी का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इससे चीन के माल के दबाव से तबाह हो रहे छोटे भारतीय व्यापारी तथा बाजार फिर से सशक्त हो जाएंगे. चीन को सीमा पर लड़े बिना हराने का पूर्ण इंतजाम भी जीएसटी से हो रहा है.

    चीन का सस्ता माल देश की अर्थव्यवस्था को जर्जर कर रहा है. पिछले वर्ष दीपावली से देश में चीनी माल के बहिष्कार का आंदोलन भी चलता रहता है, क्योंकि चीनी माल का आयात होने के बावजूद वह घरेलू निर्माण से सस्ता होता है. सरकार ने इस चीनी लूट से बचने के लिए आयातित एवं घरेलू वस्तुओं पर समान कर लगाने की व्यवस्था कर ली है. जीएसटी लागू होने के बाद चीनी माल अब भारतीय माल से सस्ता नहीं होगा अर्थात् चीन का समान अब भारतीय कारोबारियों की कमर नहीं तोड़ सकेगा.

    राजस्व सचिव हसमुख अढ़िया के अनुसार जीएसटी ‘मेक इन इंडिया’के लिए भी महत्वपूर्ण है. अब तक एक्साइज ड्यूटी के तहत सीवीडी लगाया जा रहा था. उसके अलावा आयातित वस्तुओं पर सिर्फ 4 प्रतिशत स्पेशल एडिशन ड्यूटी (SAD) लगा रहे थे. इस 4 प्रतिशत एसएडी का मतलब यह था कि घरेलू उद्योग को जो वैट देनी पड़ती थी, उसी तरह आयातित को 4% स्पेशल एडिशन ड्यूटी लगाते थे. एक तरह से राज्यों को 14% वैट के बदले में आयातित वस्तु पर 4% एसएडी लगाया जा रहा था. इस तरह स्पष्ट रुप में देख सकते हैं कि घरेलू उद्योगों पर तो कर बोझ 14% था, जबकि आयातित वस्तुओं पर केवल 4%. परंतु जीएसटी आने के बाद घरेलू उद्योगों पर टैक्स का जितना बोझ है, उतना ही आयातित पर भी लगेगा. इससे घरेलू उद्योगों को न केवल बल मिलेगा अपितु भारतीय घरेलू उद्योग भी चीनी माल को आसानी से बाजार में चुनौती दे सकेंगे. इसी कारण पहले आयातित माल सस्ता पढ़ रहा था, जबकि घरेलू महंगा. इससे घरेलू उद्योग चीनी आयातित माल का सामना कर सकेंगे.

    इसी तरह पहले ‘सी’ फॉर्म भरकर व्यापारी सीएसटी में इंटरस्टेट ले जाने की जानकारी देते थे, लेकिन वह माल दूसरे राज्य जाता ही नहीं था, बल्कि उसी राज्य में बेच दिया जाता था. इस तरह व्यापारी केवल 2 प्रतिशत टैक्स देकर काम चला लेता था तथा राज्य के 14% वैट से बचा रह जाता था. अब जीएसटी में यह संभव नहीं है. अब अगर दूसरे राज्य ले भी जाना है, तो उसे पूरा का पूरा टैक्स भरना होगा. राजस्व सचिव के अनुसार 2% के दर से भी राज्यों के राजस्व में कम से कम 50-60 हजार करोड़ बचेंगे, जिसका प्रयोग पुन: राष्ट्र निर्माण हेतु अवश्य हो सकेगा.

    इसके अतिरिक्त जीएसटी से देश में निवेश में वृद्धि होगी तथा निवेश की गई राशि का भी ‘मेक इन इंडिया’ के लिए अधिकतम प्रयोग हो सकेगा. विदेशी निवेश के क्षेत्र में भी अब भारत चीन को कड़ी चुनौती दे सकेगा. इस तरह जीएसटी से जहां भारत में चीनी माल के लिए प्रतिस्पर्धा कठोर होगा, वहीं निवेश में भी चीन को कड़ी चुनौती मिलेगी.

    जीएसटी से देश एक आधुनिक कर प्रणाली की ओर आगे बढ़ रहा है जो पारदर्शिता के साथ काले धन और भ्रष्टाचार को रोकने का अवसर प्रदान करती है. सरकार ने कालाधन, जमाखोरी पर कार्रवाई करने हेतु एक चक्रव्यूह की रचना की है, जिसका असली दरवाजा जीएसटी ही है. विदेश में जमा कालाधन पर प्रहार के बाद नोटबंदी ने कैश गुमनामी को खत्म किया. पैन को आधार से जोड़ने का का भी क्रांतिकारी परिणाम भविष्य में दिखने को मिलेगा. इसके अतिरिक्त सरकार ने बेनामी कानून में संशोधन करके भी भ्रष्टाचार पर कड़ी चोट की है।(चौक साभार)

  • जीएसटी सबसे बड़ा टैक्स सुधारःचीनी मीडिया की राय

    जीएसटी सबसे बड़ा टैक्स सुधारःचीनी मीडिया की राय

    पेइचिंग(भाषा) |

    भारत में जीएसटी लागू किए जाने पर चीन के सरकारी मीडिया ने सलाह दी है। चीन के अखबार ग्लोबल टाइम्स ने अपने एक लेख में कहा, ‘भारत में जीएसटी का पारित होना बड़ा कदम है। लेकिन, इसके क्रियान्वयन के लिए भारत को चीन की तरह ‘सशक्त नेतृत्व’ की जरूरत है।’ ग्लोबल टाइम्स ने एक लेख में कहा कि लंबे समय से प्रतीक्षित जीएसटी आखिरकार भारत में प्रभाव में आ गया और यह 1947 में भारत को मिली आजादी के बाद का सबसे बड़ा टैक्स सुधार है।

    उसने कहा, ‘अब मुख्य सवाल यह है कि क्या इस नए टैक्स सिस्टम को देश के 29 प्रांतों में प्रभावी ढंग से स्थापित किया जा सकता है और इसमें कितना समय लगेगा।’ अखबार ने कहा, ‘नोटबंदी और जीएसटी के साथ भारत अपनी अर्थव्यवस्था को एकरूपता देने के लिए व्यापक सुधारों को आगे बढ़ा रहा है और इसको आगे बढ़ाने में बड़े अवरोध होंगे।’

    अखबार ने कहा, ‘चीन में तेज आर्थिक विकास के लिए नीतियों को प्रभावी ढंग से लागू कराने वाले सशक्त नेतृत्व जैसे ही नेतृत्व की भारत को जरूरत है ताकि वहां पूरे देश में सुधारों को लेकर पूर्ण अनुपालन हो सके।’ अखबार ने लिखा, ‘नीतियों को लागू करने के मामले में भारत अब भी चीन से कहीं पीछे है।’ हालांकि अखबार ने यह भी टिप्पणी की कि जीएसटी सही दिशा में उठाया गया, एक कदम है और भविष्य में इससे बड़े लाभ होंगे।