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  • खरीदी पर लगाम से किसे परेशानी

    खरीदी पर लगाम से किसे परेशानी

    संजय दुबे की दोटूक चेतावनी वित्तीय अनुशासन की कसौटी, सरकारी धन की निगरानी को अफसरशाही का अपराध न बनाया जाए

    लोकतंत्र का एक दिलचस्प दृश्य मध्यप्रदेश के नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग में दिखाई दे रहा है। अपर मुख्य सचिव संजय दुबे ने विभागीय बैठक में स्थानीय निकायों के मुख्य कार्यपालन अधिकारियों (सीईओ) को खरीदी में वित्तीय अनुशासन बरतने की चेतावनी क्या दी, आरोपों, प्रत्यारोपों और उपदेशों का ऐसा बाजार सज गया मानो सरकारी खजाने पर नियंत्रण लगाना ही कोई बड़ा अपराध हो। कोई पूछ रहा है कि अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई, कोई विभाग की प्रतिष्ठा पर सवाल उठा रहा है, तो कोई सरकार की कथित मिलीभगत का आरोप लगा रहा है। कुछ लोगों को यह शिकायत भी है कि पूरी जानकारियां अब तक सार्वजनिक क्यों नहीं की गई। सवाल उठाना लोकतंत्र का अधिकार है, लेकिन सवालों की आड़ में जवाबदेही से बचने की कोशिश हो तो उस पर भी सवाल उठना चाहिए।

    असल प्रश्न यह नहीं है कि संजय दुबे ने खरीदी पर सख्ती क्यों दिखाई। प्रश्न यह है कि यदि सरकारी खरीद में उपलब्ध दरों, बाजार मूल्य और वास्तविक आवश्यकता के बीच अंतर है, तो उसे दूर करने की पहल का स्वागत क्यों नहीं किया जाना चाहिए? सरकारी धन किसी अधिकारी, जनप्रतिनिधि, ठेकेदार या सेवा के नाम पर सक्रिय किसी संस्था की निजी संपत्ति नहीं है। वह जनता की गाढ़ी कमाई से बना खजाना है। उसकी प्रत्येक पाई का हिसाब मांगना प्रशासनिक अधिकार ही नहीं, सार्वजनिक दायित्व भी है।

    विभागीय खरीद से जुड़े उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, मध्यप्रदेश के 374 नगरीय निकायों ने तीन वर्षों में गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस (GeM) के माध्यम से लगभग 1,134 करोड़ रुपये की खरीद की। इस खरीद में औसत दरों के आधार पर 200 से 250 करोड़ रुपये तक की संभावित बचत का अनुमान सामने आया है। इस अनुमान को अंतिम रूप से प्रमाणित बचत या सिद्ध घोटाला मान लेना उचित नहीं होगा। इसके लिए वस्तुओं की गुणवत्ता, विनिर्देश, आपूर्ति की शर्तों, बाजार दरों और भुगतान के अभिलेखों की स्वतंत्र जांच आवश्यक है। लेकिन यदि संभावित बचत इतनी बड़ी है, तो उसकी जांच और जवाबदेही तय करने से पीछे हटने का कोई औचित्य नहीं है।

    यहीं संजय दुबे की सख्ती का महत्व समझ में आता है। प्रशासनिक नेतृत्व का काम केवल बैठकों में योजनाओं की प्रगति सुनना और उपलब्धियां गिनाना नहीं है। उसका काम उन प्रक्रियाओं की कमजोरियां पकड़ना भी है, जिनसे सरकारी पैसा अनावश्यक खर्च होता है। यदि किसी खरीद में कम दर पर समान गुणवत्ता का सामान उपलब्ध था, लेकिन अधिक कीमत चुकाई गई, तो यह जानना जरूरी है कि ऐसा क्यों हुआ। क्या तकनीकी विनिर्देश जरूरत से ज्यादा सीमित थे? क्या बाजार की तुलना नहीं की गई? क्या खरीद की वास्तविक आवश्यकता का आकलन कमजोर था? या फिर कहीं किसी स्तर पर मिलीभगत हुई? इन प्रश्नों के उत्तर दस्तावेज और जांच देंगे, शोर नहीं।

    लोकतंत्र की विडंबना यह है कि कार्रवाई न हो तो प्रशासन को निकम्मा कहा जाता है और कार्रवाई शुरू हो तो उसे कठोर, तानाशाहीपूर्ण या किसी के विरुद्ध अभियान बताने की कोशिश होती है। भ्रष्टाचार पर शिकायत करने वाले और भ्रष्टाचार के विरुद्ध कार्रवाई होने पर असहज हो उठने वाले लोगों के बीच अंतर करना जरूरी है। आलोचना करने का अधिकार सबको है, लेकिन आलोचना के नाम पर जवाबदेही से बचने का अधिकार किसी को नहीं मिल सकता। जो लोग सार्वजनिक सेवा का दावा करते हैं, उनसे भी यह अपेक्षा की जानी चाहिए कि वे सरकारी खर्च में पारदर्शिता और मितव्ययिता के सिद्धांतों का समर्थन करें।

    मध्यप्रदेश में वित्तीय अनुशासन की इस पहल को व्यापक आर्थिक प्रबंधन के संदर्भ में भी देखना होगा। वित्त विभाग के अपर मुख्य सचिव मनीष रस्तोगी सहित वित्तीय नियंत्रण को मजबूत करने में लगे अधिकारियों की भूमिका इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि सरकार के लिए केवल अधिक राजस्व जुटाना पर्याप्त नहीं है; खर्च की गुणवत्ता सुधारना भी उतना ही जरूरी है। राजस्व बढ़ाने की हर कोशिश का लाभ तब सीमित हो जाता है, जब दूसरी ओर खरीद, निर्माण और सेवाओं के भुगतान में अनावश्यक व्यय जारी रहे। सरकार यदि एक रुपये की अतिरिक्त आय जुटाने के लिए मेहनत करती है, तो उसे यह भी देखना चाहिए कि उसी रुपये का अपव्यय न हो।

    खरीद के आंकड़ों की जांच में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और डिजिटल लेखा-विश्लेषण का उपयोग इस दिशा में एक उपयोगी कदम साबित हो रहा है।मध्य प्रदेश कैडर के आईएएस अधिकारी अंशुमन राज ने अपनी इंजीनियरिंग और मशीन लर्निंग (AI) बैकग्राउंड का इस्तेमाल करके एक विशेष डेटा एनालिसिस प्रेजेंटेशन तैयार किया। इस प्रेजेंटेशन को जब नगरीय प्रशासन विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव (ACS) संजय दुबे के सामने पेश किया गया, तो राज्य के विभिन्न नगर निकायों में चल रहे वित्तीय घोटालों की परतें खुल गईं। बड़ी संख्या में लेन-देन का विश्लेषण करके असामान्य दरों, दोहराए गए भुगतानों, संदिग्ध खरीद पैटर्न और संभावित विसंगतियों की पहचान पहले से ज्यादा आसान हो गई है,लेकिन तकनीक किसी को अपने आप दोषी घोषित नहीं करती। वह जांच के लिए संकेत देती है; अंतिम निष्कर्ष दस्तावेजों, संबंधित अधिकारियों के जवाब और निष्पक्ष परीक्षण से ही निकल पाएंगे। इसी संतुलन से वित्तीय नियंत्रण विश्वसनीय बनेगा और ईमानदार कर्मचारियों को अनावश्यक संदेह से बचाया जा सकेगा।

    इस पूरे घटनाक्रम में ईमानदार अधिकारियों की कठिनाइयों को भी समझना होगा। स्थानीय निकायों का प्रशासन केवल नियमों और फाइलों से नहीं चलता। उसे स्थानीय विधायकों, सांसदों, अन्य जनप्रतिनिधियों और विभिन्न हितधारकों की अपेक्षाओं के बीच भी काम करना पड़ता है। विकास कार्यों की मांग, स्थानीय जरूरतों का दबाव और निर्धारित बजट में काम पूरा करने की चुनौती हमेशा बनी रहती है। ऐसे वातावरण में नियमों के अनुसार निर्णय लेना और किसी अनुचित अपेक्षा के सामने न झुकना आसान नहीं होता। जो अधिकारी वित्तीय अनुशासन की बात करते हैं, उन्हें कई बार विरोध और व्यक्तिगत आलोचना भी झेलनी पड़ती है।

    इसलिए संजय दुबे जैसे अधिकारियों की दोटूक बात को केवल एक विभागीय चेतावनी के रूप में नहीं देखना चाहिए। यह उस प्रशासनिक संस्कृति की परीक्षा है जिसमें अधिकारी से अपेक्षा की जाती है कि वह सरकार का पैसा बचाए, लेकिन बचत के लिए सख्ती दिखाए तो उसे अकेला छोड़ दिया जाए। यदि सरकार वास्तव में वित्तीय अनुशासन चाहती है, तो उसे नियमसम्मत निर्णय लेने वाले अधिकारियों के साथ खड़ा होना होगा। साथ ही, यह भी सुनिश्चित करना होगा कि सख्ती मनमानी न बने, किसी निर्दोष को दंडित न किया जाए और कार्रवाई राजनीतिक या व्यक्तिगत पसंद-नापसंद से प्रभावित न हो।

    आगे का रास्ता स्पष्ट है। सभी नगरीय निकायों की खरीद का तुलनात्मक विवरण सार्वजनिक किया जाए। बड़ी खरीद में वस्तु की मात्रा, गुणवत्ता, दर, आपूर्तिकर्ता और भुगतान की जानकारी उपलब्ध कराई जाए। संभावित बचत के मामलों में स्वतंत्र परीक्षण हो, अनियमितता मिलने पर जिम्मेदारी तय की जाए और वास्तविक बचत का सत्यापित हिसाब जनता के सामने रखा जाए। जिन निकायों ने नियमों के अनुरूप खरीद की है, उन्हें भी प्रमाण और प्रक्रिया के आधार पर स्पष्ट रूप से अलग रखा जाए। पारदर्शिता का अर्थ केवल आरोप सार्वजनिक करना नहीं, बल्कि निष्कर्ष और कार्रवाई का पूरा विवरण सामने लाना है।

    सरकारी धन बचाने की कोशिश को विवाद का विषय बनाने के बजाय प्रशासनिक सुधार का अवसर बनाया जाना चाहिए। संजय दुबे की चेतावनी का मूल्य इस बात से तय होगा कि उसके बाद खरीद व्यवस्था कितनी पारदर्शी होती है, संभावित बचत का कितना हिस्सा वास्तव में हासिल होता है और जिम्मेदार लोगों पर नियमसम्मत कार्रवाई कितनी निष्पक्षता से होती है। यही कसौटी वित्तीय प्रबंधन की सफलता भी तय करेगी।अब तक जो कार्रवाई की गई है उससे शासन और प्रशासन की मंशा साफ नजर आ रही है। सरकार चाहती है कि स्थानीय सरकारें अपना दायित्व निभाएं और कमाऊ पूत न भी बन पाएं तो कम से कम सरकार पर बोझ तो न बनें।

    आखिरकार, जनता को सरकार से केवल घोषणाएं और विकास के दावे नहीं चाहिए। उसे यह भरोसा भी चाहिए कि उसकी कमाई से जमा हुआ पैसा जरूरत के अनुसार, उचित दर पर और पूरी जवाबदेही के साथ खर्च हो रहा है। यदि इस उद्देश्य से खरीदी पर नियंत्रण लगाया जा रहा है, तो उसका समर्थन होना चाहिए। सरकारी खजाने की रखवाली करने वाले अधिकारी से यह सवाल जरूर पूछा जाए कि उसने क्या बचाया, कैसे बचाया और किस आधार पर बचाया; लेकिन केवल इसलिए उसे कटघरे में खड़ा करना कि उसने खर्च पर सवाल उठा दिया, वित्तीय अनुशासन के साथ अन्याय होगा।