स्वाधीनता दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लाल किले से देश को दिए संबोधन में जिस दिमागी नक्सली शब्द का उल्लेख किया वह इन दिनों ट्रेंडिंग कर रहा है। छोटे बड़े कई विपक्षी नेताओं ने देश का ध्यान आकर्षित करने के लिए खुद को नक्सली बताना शुरु कर दिया है। कुछ पत्रकारों ने भी बगैर जाने समझे नक्सलवादी सोच का महिमामंडन शुरु कर दिया है। उन्हें न तो नक्सलवाद की जमीनी हकीकत मालूम है और न ही देश में इसे लेकर भारत सरकार की ओर से चलाए गए दुर्गम अभियान की लंबी यात्रा से कोई सरोकार है। वे तो बस फैशन में खुद को दिमागी नक्सलवादी बताकर ये जताना चाह रहे हैं कि वे दिमागी रूप से बहुत होशियार हैं और सरकार की नीतियों का विरोध करने की वजह से उन्हें दिमागी नक्सली बताया जा रहा है। पूर्व केन्द्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने पत्रकार वार्ता के माध्यम से इस अभियान पर पलटवार किया है। उन्होंने कहा कि यदि आप सरकार से असहमत हैं तो विरोध करिए किसने रोका है। आपको प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पसंद नहीं हैं तो उनका विरोध कीजिए। भारत जैसे लोकतंत्र में इसकी खुली छूट है। आप चुनाव की प्रक्रिया में आगे बढ़िए उन्हें और उनकी पार्टी के नेताओं को हरा दीजिए फिर सत्ता में भी आ जाईए इसे कौन रोक सकता है। इसके विपरीत आप यदि सड़कों पर रोते फिरेंगे कि हम सरकार से असहमत हैं इसलिए हमें दिमागी नक्सली कहा जा रहा है तो आपकी इस होशियारी को देश सुनने वाला नहीं है।
पूर्व गृह मंत्री चिदंबरम ने इस उड़ते तीर को अपने ऊपर लेते हुए बयान जारी किया कि हां मैं दिमागी नक्सली हूं। उनके इस बयान पर देश और सरकार की ओर से तीखी प्रतिक्रिया भी सामने आई है। असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा सरमा ने कहा है कि कांग्रेस के कई नेता आपसी प्रतिद्वंदिता के चलते नक्सलियों का सहारा लेते रहे हैं। उनके ही संरक्षण की वजह से नक्सलवाद इतने सालों से देश का सिरदर्द बना रहा ।वामपंथ की विचारधारा से प्रेरित नक्सवाद हो या माओवादी हिंसा की गिरोह बंदी उससे संघर्ष करते हुए देश को लगभग साढ़े तीन हजार होनहार जवान खोना पड़े हैं। कांग्रेस की सरकारें भी नक्सलवाद से विरुद्ध लड़ाई लड़ने का संकल्प दुहराती रहीं हैं लेकिन केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह की घोषणा के बाद अब नक्सलवाद के खात्मे की घोषणा हुई है। कई राज्यों की सरकारों ने केन्द्र के साथ सहयोग करके घेराबंदी की तब जाकर नक्सलवाद से देश का पिंड छूटा है।
ऐसा माना जाता है कि नक्सलबाड़ी आंदोलन की शुरुआत वर्ष 1967 में पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के नक्सलबाड़ी गाँव से हुई थी। यह आंदोलन मुख्य रूप से भू-स्वामियों (जमींदारों) के विरुद्ध गरीब किसानों व आदिवासियों के शोषण और भूमि अधिकारों की मांग के खिलाफ उपजा एक सशस्त्र किसान विद्रोह था।यह आंदोलन ग्रामीण क्षेत्रों में व्याप्त आर्थिक असमानता, गरीबी, और पारंपरिक भू-स्वामित्व प्रणाली के विरुद्ध किसानों के असंतोष की उपज था।इसे उग्र वामपंथी नेता चारू मजूमदार, कानू सान्याल और जंगल संथाल ने अपना नेतृत्व प्रदान किया था। यह मार्क्सवादी-लेनिनवादी और माओवादी विचारधारा से प्रेरित था, जिसमें सशस्त्र संघर्ष के माध्यम से सत्ता के विरुद्ध आवाज उठाई गई थी। इसके बाद ये देश के विभिन्न स्थानों तक फैला। इसके नाम पर कई स्थानीय जमींदारों ने अपनी सेनाएं बना लीं और वे जमीनें हथियाने व अपनी सत्ता कायम रखने के लिए नक्सलवादियों को पालते पोसते रहे। कांग्रेस के कई नेता भी वक्त बेवक्त इस आंदोलन की आड़ लेते रहे ।पूर्व मंत्री विद्याचरण शुक्ल , लिखीराम कांवरे ,उदय मुदलियार, छत्तीसगढ़ कांग्रेस के अध्यक्ष नंद कुमार पटेल,उनके पुत्र नंदकुमार पटेल को इसी नक्सलवाद के चलते जान गंवानी प़ड़ी। विद्याचरण शुक्ल के काफिले को बम से उड़ाने वाले नक्सलियों ने कहा कि वे किसी और को निशाना बना रहे थे ।नक्सलवाद के विरुद्ध भारत सरकार और छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से चलाए गए सलवा जुडूम अभियान की वजह से कांग्रेस नेता महेन्द्र कर्मा को भी अपनी जान गंवानी पड़ी। सलवा जुड़ूम उन्होंने जमीनी हकीकत को देखकर ही शुरु किया था। उनका मानना था कि नक्सलवाद की आड़ में समाज की शोषणकारी ताकतों ने गुंडागर्दी और लूट का अभियान चला रखा है इसकी वजह से गरीब आदिवासी पिस रहा है और क्षेत्र का विकास प्रभावित हो रहा है। उनकी इस पहल से नक्सली माफिया चिढ़ गया । 25 मई 2013 को छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में स्थित दरभा घाटी में जब महेन्द्र कर्मा छत्तीसगढ़ परिवर्तन यात्रा से लौट रहे थे तो उनके काफिले पर घात लगाकर हमला किया गया और बम धमाके से उड़ा दिया गया।
देश ने इस वामपंथी सोच से उपजे आतंकी षड़यंत्र की मंहगी कीमत चुकाई है। हमारी विकास यात्रा में अड़ंगा बनकर ये आंदोलन कभी नर्मदा विरोधी आंदोलन के रूप में सामने आया। पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के सिंगूर (Singur) में टाटा के नैनो कार प्रोजेक्ट का विरोध करके विकास विरोधी काला अध्याय बनकर सामने आया। कुडनकुलम आंदोलन (तमिलनाडु), जैतापुर आंदोलन (महाराष्ट्र), चुटका आंदोलन (मध्य प्रदेश),जैसे परमाणु संयंत्रों के विरुद्ध चलाए गए आंदोलनों ने देश की विकास यात्रा को बुरी तरह प्रभावित किया। इन आंदोलनों की वजह से आज तक देश बिजली उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर नहीं हो पाया है। बिजली आधारित परिवहन न विकसित हो पाने की वजह से हमें हर साल लगभग बीस लाख करोड़ रुपयों का ईंधन आयात करना पड़ता है जो हमारी अर्थव्यवस्था को गहरी क्षति पहुंचाता है।
वामपंथी सोच के इसी दिमागी षड़यंत्र ने नक्सलवाद को ब्लैकमेलिंग का हथियार बना रखा है। जिस अंबानी और अडानी को कांग्रेस की ही सरकारों ने विकसित होने का अवसर दिया उन्हें ब्लैकमेल करने के लिए काग्रेस कुमार राहुल गांधी बदमिजाजी की हद पार कर चुके हैं। जिस कांग्रेसी को देखो वो विकास विरोधी नारेबाजी करके जनता की राह में रोड़े अटकाते नजर आते हैं। प्रधानमंत्री की चिंता देश के भविष्य को लेकर सामने आई।जब युद्धों की विभीषिका ने देश को संकटपूर्ण हालात में डाल रखा है तब भी यही दिमागी नक्सली खुद को बुद्धिमान बताते हुए सरकार का विरोध करने में जुटे हैं। राहुल गांधी तो कई वैश्विक मंचों पर भारत के विरोध में बयानबाजी करते रहे हैं। श्रीलंका में चीन की घुसपैठ हो सकी तो इसके पीछे सोनिया गांधी परिवार की ही वह प्रतिशोधात्मक राजनीति जिम्मेदार बताई जाती है जो राजीव गांधी को बम से उड़ाए जाने के बाद सामने आई। भारत की सेना ने तो जानते बूझते लिट्टे प्रमुख वेलुपिल्लई प्रभाकरण पर हाथ नहीं डाला पर गांधी परिवार ने कथित तौर पर अपने चीनी सहयोगियों को प्रेरित करके तमिलों का भीषण नरसंहार करवाकर प्रतिशोध पूरा किया।
भारत की शिक्षा व्यवस्था पर वामपंथी सोच का असर रहा है। इस वामपंथी सोच वाले रूस हों या चीन वे तो इस सोच के जाल से बाहर निकल आए और उन्होंने अपनी विकास यात्रा की ऊंचाईयां भी हासिल कीं लेकिन भारत के वामपंथी अभी भी लाल सलाम के उसी मकड़जाल में उलझे हैं जो पूंजीवाद को शोषणवादी बताकर उसका विरोध करने में अपनी होशियारी समझता है। ये बात अलग है उसकी ये राजनीतिक धूर्तता पूंजीवाद की ब्लैकमेलिंग से ही गुजरती है।जबकि पूंजीवाद अलग है और शोषणवाद अलग है। आप शोषणवाद को सदैव गाली दीजिए पर उसकी गोदी में बैठकर यदि आप विकास का विरोध करेंगे तो फिर आप निशाने पर जरूर आएंगे। समय आ गया है जब देश इस षड़यंत्र से बाहर निकले और विकास के राजमार्ग पर बिंदास होकर आगे बढ़े।
