भोपाल,25 अप्रैल,(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। मध्यप्रदेश में परिवहन नाकों (चेकपोस्ट) को दोबारा शुरू करने के फैसले ने एक बार फिर सड़क परिवहन व्यवस्था को बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है। राज्य सरकार इसे नियमों के बेहतर पालन, राजस्व में वृद्धि और अवैध गतिविधियों पर अंकुश लगाने की दिशा में जरूरी कदम बता रही है, लेकिन ट्रांसपोर्टरों के बीच इस निर्णय को लेकर गहरी चिंता और असंतोष देखने को मिल रहा है।
दरअसल, पिछले कुछ वर्षों में चेकपोस्ट व्यवस्था को समाप्त कर परिवहन प्रणाली को अधिक डिजिटल और पारदर्शी बनाने की कोशिश की गई थी। ऑनलाइन परमिट, ई-वे बिल और हाल ही में लागू किए गए व्हीकल लोकेशन ट्रैकिंग डिवाइस (VLTD) जैसे उपायों के जरिए वाहनों की निगरानी को आधुनिक स्वरूप दिया गया। ट्रांसपोर्टरों का मानना है कि इन व्यवस्थाओं के बाद ओवरलोडिंग और नियमों के उल्लंघन में काफी कमी आई है। ऐसे में चेकपोस्ट की वापसी उन्हें पुराने ढर्रे की ओर लौटने जैसा प्रतीत हो रही है।
परिवहन सचिव मनीष सिंह और परिवहन आयुक्त उमेश जोगा को दिए गए ज्ञापन में भोपाल के ट्रक आपरेटरों का कहना है कि जब तकनीकी माध्यमों से हर वाहन की गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है, तब भौतिक चेकपोस्ट की जरूरत समझ से परे है। उनका यह भी आरोप है कि चेकपोस्ट व्यवस्था पहले भी देरी, अनावश्यक रोक-टोक और भ्रष्टाचार के कारण बदनाम रही है। लंबी कतारों में फंसे ट्रक न केवल समय की बर्बादी का कारण बनते हैं, बल्कि इससे माल की समय पर डिलीवरी भी प्रभावित होती है, जिसका सीधा असर व्यापार और उद्योग पर पड़ता है।
दूसरी ओर, परिवहन विभाग का तर्क है कि केवल डिजिटल सिस्टम पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। विभाग के अधिकारियों का कहना है कि कई बार तकनीकी खामियों, डेटा में हेरफेर या नेटवर्क समस्याओं के कारण नियमों का उल्लंघन पकड़ में नहीं आ पाता। ऐसे में चेकपोस्ट एक अतिरिक्त सुरक्षा परत के रूप में काम करते हैं, जिससे ओवरलोडिंग, बिना परमिट संचालन और टैक्स चोरी जैसे मामलों पर प्रभावी नियंत्रण रखा जा सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच आर्थिक पहलू भी महत्वपूर्ण है। पहले से ही बढ़ती लागत, ईंधन की कीमतों और नई तकनीकी अनिवार्यताओं के कारण ट्रांसपोर्टर दबाव में हैं। VLTD जैसे उपकरणों पर अतिरिक्त खर्च और उनके रखरखाव की लागत ने उनकी परेशानियों को और बढ़ा दिया है। ऐसे में चेकपोस्ट पर संभावित देरी और अनौपचारिक खर्च की आशंका उन्हें और चिंतित कर रही है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यह विवाद केवल चेकपोस्ट की वापसी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक असंतुलन को दर्शाता है, जो नीति निर्माण और जमीनी हकीकत के बीच मौजूद है। जहां सरकार एक सुदृढ़ और नियंत्रित परिवहन तंत्र स्थापित करना चाहती है, वहीं ट्रांसपोर्टर व्यावहारिक कठिनाइयों और आर्थिक दबावों को सामने रख रहे हैं।
स्थिति की संवेदनशीलता को देखते हुए यह आवश्यक हो गया है कि सरकार और ट्रांसपोर्टर आपसी संवाद के माध्यम से समाधान तलाशें। यदि चेकपोस्ट व्यवस्था को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ते हुए पारदर्शी और समयबद्ध बनाया जाए, तो संभव है कि दोनों पक्षों की चिंताओं का संतुलन स्थापित किया जा सके।
फिलहाल, परिवहन नाकों की वापसी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सुधार के प्रयास तभी सफल होंगे, जब वे जमीनी स्तर पर व्यावहारिक और सभी हितधारकों के लिए स्वीकार्य हों। मध्यप्रदेश की परिवहन व्यवस्था एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां लिए गए फैसले आने वाले समय में इसके भविष्य की दिशा तय करेंगे।
