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  • चंद चेहरे नहीं जनमन की आवाज सुनाता है प्रेस

    चंद चेहरे नहीं जनमन की आवाज सुनाता है प्रेस

    लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यह नहीं कि वहाँ चुनाव होते हैं, बल्कि यह है कि वहाँ संवाद जीवित रहता है। संसद कानून बनाती है, सरकार उन्हें लागू करती है, न्यायपालिका उनकी संवैधानिक समीक्षा करती है और पत्रकारिता जनता के सामने इन सबका लेखा-जोखा प्रस्तुत करती है। यही कारण है कि स्वतंत्र प्रेस को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा गया है। किंतु जब राजनीतिक असहमति का उत्तर तथ्यों से देने के बजाय स्वयं संवाद के माध्यम पर हमला बोला जाने लगे, तब यह केवल मीडिया का संकट नहीं रहता, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा पर आघात बन जाता है।सोशल मीडिया जहां व्यक्तियों की सपाट भावनाओं को व्यक्त करता है वहीं मीडिया को देश का मन पढ़कर जन भावनाओं को व्यक्त करने की जवाबदारी निभाना होती है।

    बीते कुछ वर्षों में एक चिंताजनक प्रवृत्ति सामने आई है। जैसे ही कोई समाचार या विश्लेषण किसी राजनीतिक दल, आंदोलन या विचारधारा की अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं होता, पूरे मीडिया को एक राजनीतिक विशेषण देकर खारिज करने का प्रयास शुरू हो जाता है। किसी चैनल, अखबार या पत्रकार की आलोचना करना एक बात है, लेकिन पूरे मीडिया जगत को अविश्वसनीय घोषित कर देना दूसरी बात है। यह आलोचना नहीं, बल्कि जनता के मन में संस्थाओं के प्रति अविश्वास पैदा करने का प्रयास है।पत्रकारिता की भूमिका केवल धर्मकांटे की होती है। ये कांटा जब खोट को उजागर करता है तो क्या आप उसे झुठलाने के लिए कांटे को ही दोषी बताने लग जाएंगे। 

    भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है। इसी संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत राजनीतिक दल अपनी विचारधारा जनता तक पहुँचाते हैं, चुनाव प्रचार करते हैं और मतदाताओं से समर्थन मांगते हैं। लोकतंत्र ने उन्हें अपनी बात रखने का पूरा अवसर दिया है। यदि किसी राजनीतिक दल को किसी समाचार से आपत्ति है, तो उसका उत्तर तथ्य, दस्तावेज़ और तर्क से दिया जाना चाहिए। संवाद का उत्तर संवाद से होना चाहिए, न कि संवाद के माध्यम को ही कठघरे में खड़ा करके। समाचार माध्यम तो वो हवाएं हैं जो चंद आंदोलनकारियों का चेहरा देखकर नहीं बल्कि समाज के विश्वसनीय तबकों के बीच रायशुमारी के आधार पर भावनाओं का तापमान प्रदर्शित करती हैं। मुट्टी भर आंदोलनकारियों की आवाज को यदि लोकतंत्र की आवाज बताया जाने लगे तो फिर देश के तीन प्रमुख प्रभावी स्तंभों को देश की दिशा तय करना कठिन हो जाएगा।

    यह समझना भी आवश्यक है कि पत्रकारिता और राजनीति का चरित्र मूलतः अलग है। राजनीतिक दल सत्ता प्राप्त करने के लिए संघर्ष करते हैं। उनकी सफलता चुनावी जीत से मापी जाती है। पत्रकारिता की सफलता सत्ता प्राप्त करने में नहीं, बल्कि जनता को विश्वसनीय सूचना उपलब्ध कराने में है। मीडिया न सरकार बनाता है, न मुख्यमंत्री चुनता है, न प्रधानमंत्री नियुक्त करता है। वह मतदाता नहीं है, वह प्रत्याशी नहीं है और वह निर्वाचन आयोग भी नहीं है। उसका कार्य केवल इतना है कि वह समाज के सामने तथ्य रखे, विभिन्न पक्षों को सुने और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर अपनी संपादकीय राय व्यक्त करे।

    यही पत्रकारिता की संवैधानिक और नैतिक मर्यादा भी है। मीडिया अदालत नहीं है कि दोष सिद्ध कर दे। वह कार्यपालिका नहीं है कि दंड दे सके। वह विधायिका नहीं है कि कानून बना सके। इसलिए पत्रकारिता को फतवे जारी करने का अधिकार नहीं है। उसका सबसे बड़ा हथियार विश्वसनीय तथ्य हैं, न कि राजनीतिक घोषणाएँ। इसी प्रकार राजनीति को भी यह अधिकार नहीं है कि वह असहमति के कारण पूरे मीडिया को कठघरे में खड़ा कर दे। लोकतंत्र में किसी संस्था की विश्वसनीयता पर हमला करना आसान है, किंतु उसे पुनः स्थापित करना अत्यंत कठिन।

    यह भी उतना ही सत्य है कि मीडिया को आत्मानुशासन का पालन करना चाहिए। यदि किसी समाचार में तथ्यात्मक त्रुटि है, यदि किसी रिपोर्ट में पक्षपात है या यदि किसी पत्रकार ने नैतिक सीमाएँ लांघी हैं, तो उसकी आलोचना न केवल उचित बल्कि आवश्यक है। स्वतंत्र पत्रकारिता का अर्थ जवाबदेही से मुक्त होना नहीं है। किंतु व्यक्तिगत या संस्थागत त्रुटियों के आधार पर पूरे मीडिया जगत को संदेह के घेरे में खड़ा कर देना न्यायोचित नहीं कहा जा सकता।

    सोशल मीडिया के विस्तार ने इस प्रवृत्ति को और अधिक उग्र बना दिया है। अब किसी समाचार से असहमति होने पर कुछ ही मिनटों में हैशटैग, वीडियो और पोस्ट के माध्यम से पूरे मीडिया को कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। इस डिजिटल भीड़ में तथ्य पीछे छूट जाते हैं और आरोप आगे निकल जाते हैं। परिणाम यह होता है कि नागरिक यह तय ही नहीं कर पाता कि सत्य किसके पास है। जब सत्य पर विश्वास कमजोर पड़ता है, तब अफवाहें लोकतंत्र की सबसे बड़ी शत्रु बन जाती हैं।

    भारतीय पत्रकारिता का इतिहास बताता है कि प्रेस ने स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आपातकाल और उसके बाद के दशकों तक सत्ता की दुरभिसंधियों को उजागर किया है। अनेक बार सरकारों के भ्रष्टाचार का पर्दाफाश भी पत्रकारों ने किया और अनेक अवसरों पर विपक्ष के दावों की भी तथ्य-जाँच की। इसलिए पूरे मीडिया को किसी एक राजनीतिक खांचे में बाँध देना न तो इतिहास के साथ न्याय है और न वर्तमान के साथ।

    राजनीतिक दलों को यह नहीं भूलना चाहिए कि आज जिस मीडिया मंच से वे अपने भाषण, प्रेस कॉन्फ़्रेंस और जनसभाएँ देशभर तक पहुँचाते हैं, उसी मंच की विश्वसनीयता पर यदि वे स्वयं लगातार प्रश्नचिन्ह लगाएंगे, तो अंततः नुकसान उनका भी होगा। लोकतंत्र में संवाद का मंच जितना मजबूत होगा, लोकतंत्र उतना ही मजबूत रहेगा। संवाद का मंच यदि अविश्वसनीय बना दिया गया, तो राजनीति भी अंततः अफवाहों के सहारे चलने लगेगी।

    पत्रकारिता की भी परीक्षा का समय है। उसे किसी दल की प्रशंसा या विरोध के आधार पर नहीं, बल्कि अपने पेशेवर मानकों के आधार पर स्वयं को सिद्ध करना होगा। समाचार और टिप्पणी के बीच स्पष्ट अंतर, तथ्य की कठोर जाँच, सभी पक्षों को अवसर और त्रुटि होने पर सार्वजनिक सुधार—यही वे आधार हैं जिन पर पत्रकारिता का भविष्य टिका है।

    लोकतंत्र में सबसे खतरनाक स्थिति वह होती है जब राजनीतिक प्रतिस्पर्धा संस्थाओं के विरुद्ध अभियान का रूप ले लेती है। आज आवश्यकता यह नहीं कि मीडिया को मित्र या शत्रु घोषित किया जाए। आवश्यकता यह है कि उसे स्वतंत्र, उत्तरदायी और विश्वसनीय बने रहने दिया जाए। क्योंकि जिस दिन समाज संवाद के अपने माध्यम पर भरोसा खो देगा, उस दिन लोकतंत्र केवल चुनावों तक सीमित रह जाएगा और जनमत का निर्माण तथ्यों से नहीं, बल्कि शोर से होगा।

    खासतौर से ये प्रहार मीडिया के ही कुछ बंधुओं के कंधे पर बंदूक रखकर किए जाते हैं। जिनके पास अपनी बात कहने का साहस और ज्ञान नहीं होता वे इसकी भरपाई करने के लिए मीडिया के बंधुओं का उपहास उड़ाना शुरु कर देते हैं। वे मीडिया के जनसरोकारों पर लांछन लगाकर उसकी जड़ें काटने में जुट जाते हैं। इसलिए मतभेद रखिए, कठोर आलोचना कीजिए, समाचारों को चुनौती दीजिए, प्रमाण प्रस्तुत कीजिए—लेकिन लोकतंत्र के उस दर्पण को मत तोड़िए जिसमें पूरा राष्ट्र स्वयं को देखता है। दर्पण पर पत्थर फेंकने से चेहरा नहीं बदलता; केवल प्रतिबिंब धुंधला हो जाता है।