आईएएस संतोष वर्मा के रूप में इस बार फिर विदेशी ताकतों ने भारतीय समाज में फूट डालने का डायनामाईट लगाया है।ब्राह्म्ण की बेटी के दान और संबंध बनाने जैसी ओछी भाषा का इस्तेमाल करके वर्मा ने देश पर कमर के नीचे वार किया है। अस्सी के दशक में दलित शोषित समाज संघर्ष समिति (डीएसफोर) बनाकर बसपा सुप्रीमो कांसीराम ने जब तिलक तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार का नारा दिया तो देश की समग्र चेतना ये सुनकर अवाक रह गई थी। भारतीय समाज में फूट के बीज डालने के लिए उन्होंने एक और नारा दिया था ब्राह्मण , ठाकुर , बनिया छोड़, बाकी सब हैं डीएस4″ ये तबका दौर था जब भारत में जनता पार्टी सरकार की असफलता के बाद एक बार फिर श्रीमती इंदिरा गांधी सत्ता में आ चुकी थीं। कांसीराम पंजाब के रोपड़ जिले के एक गांव के सिख धर्म में परिवर्तित हुए चमार समुदाय से आते थे। बीएससी करने के बाद वे पुणे की गोलाबारूद फैक्टरी में तकनीकी सुपरवाईजर बन गए थे। जनता पार्टी की सरकार को अपदस्थ करने के लिए जो विदेशी ताकतें भारत में सक्रिय थीं वे भारत के सैन्य क्षेत्र में फूट डालने का भी प्रयास कर रहीं थीं। तब उन्होंने कांसीराम को अपना औजार बनाया जो भारत की जातिवादी व्यवस्था के खिलाफ मुखर रहते थे और नौकरी छोड़ चुके थे । उनकी पकड़ सैन्य फैक्टरी के बड़े समुदाय पर पहले से बनी हुई थी। कांसीराम ने महात्मा गांधी का बताया बहुसंख्यक हरिजन वादी ब्रह्मास्त्र चलाया था । वे अच्छी तरह जानते थे कि इस उपेक्षित समुदाय को आसानी से बरगलाया जा सकता है। बाद में उन्होंने लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की ताकत पाने के लिए बहुजन समाज पार्टी बनाई और सत्ता की ऊंचाईयों तक जा पहुंचे। ये विदेशी पटकथा खूब सुपर हिट हुई और 1989 में वीपीसिंह की सरकार के रूप में अपने क्लाईमेक्स पर भी पहुंची। तब भी भारत पर राज करने वाली विदेशियों की ख्वाहिशें परवान चढ़ रहीं थी।कांसीराम ने भी सरकारी अफसरों से चंदा उगाही के लिए दलित कार्ड खेला था। कांसीराम के निधन के बाद ये खुमार थोड़ा मद्धिम पड़ा लेकिन तब भी आरक्षण के नाम पर दलित वर्ग की सामाजिक गुंडागर्दी जारी रही । तब से आज तक जातिवादी समानता के नाम पर सर्वधर्म के टैक्स के सहारे आरक्षण की मीठी गोली बांटी जा रही है। हालांकि आज देश में कथित जातिवादी भेदभाव की झलक तक नहीं मिलती है। राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने 30 जनवरी 1990 को नाराज दलितों को साधने के लिए अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 लागू किया था। कांग्रेस ये कानून अपने खिसकते दलित वोट बैंक को बचाने के लिए डरकर लाई थी इसलिए इस कानून को लागू करने का बहुत शोर मचाया गया । आगे चलकर ये कानून सामाजिक भेदभाव और अत्याचार की मिसाल बनकर सामने आया। इस हथियार का प्रयोग सभी जातियों ने किया। किसी से दुश्मनी भुनाना हो तो किसी दलित से शिकायत करवा दो , उसे आसानी से निपटाया जा सकता था। कांसीराम का वो हथकंडा आज की संतोष वर्मा वाली पीढ़ी भी सफलता पूर्वक इस्तेमाल कर रही है। देश की मोदी सरकार ने सबका साथ सबका विकास का नारा देकर देश को सकल घरेलू उत्पाद के पैमाने पर चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था के सोपान पर ला खड़ा किया है । आगे बढ़ने की इस लडाई को कमजोर करने के लिए एक बार फिर बासी कढ़ी में उबाल लाने का प्रयास किया जा रहा है।
संतोष वर्मा (IAS) ने अपाक्स अधिकारियों के सम्मेलन में 23 नवंबर 2025 को आयोजित सार्वजनिक सभा में ये आपत्तिजनक बयान दिया है। उन्होंने कहा कि मैं आईएएस बन गया हूं तो मेरे बेटो को क्रीमी लेयर मानकर आरक्षण का लाभ भले नहीं मिले, लेकिन असली उद्देश्य तो तब पूरा होगा जब तक उसे कोई ब्राह्मण अपनी बेटी दान कर दे या वह उससे संबंध बना ले। जब तक समाज में रोटी बेटी का संबंध शुरु न हो जाए तब आरक्षण का लाभ मिलते रहना चाहिए। वर्मा ने कहा कि हमें भी अब बदले की भावना से काम करना होगा। हमारी लड़ाई विचारधारा से है जब तक हम इसका मूल नष्ट नहीं कर देते तब तक हमें अपनी कमाई का छटवा हिस्सा इस लड़ाई के लिए खर्च करना होगा।
उनकी इस टिप्पणी को कई समुदायों और सामाजिक संगठनों ने “जात-पात, ब्राह्मण विरोधी, अपमानजनक और महिलाओं के खिलाफ मानवीय गरिमा को ठेस पहुँचाने वाला” बताते हुए कड़ी निंदा की है। वे इस विवाद को देश पर हमला मान रहे हैं।पूर्व आईएएस श्रीमती वीणा घाणेकर कहती हैं कि ये कार्यपालिका की निर्धारित सीमाओं का उल्लंघन है इसलिए अनुशासनहीन वर्मा को बर्खास्त किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि ऐसा बयान सामाजिक एकता, सहिष्णुता और समानता की नींव को ही कमजोर कर देता है। भारत एक बहु-जातीय, बहु-संस्कृतिक देश है, यहां जाति-आधारित भेदभाव और पूर्वाग्रहों से संघर्षों का इतिहास रहा है। ऐसी टिप्पणी, जिसमें एक जाति-विशेष के खिलाफ अपमान और सामान्यीकरण हो, सामाजिक सौहार्द्र को भंग करती है।
जब कोई उच्च पदस्थ सरकारी अधिकारी आईएएस, सार्वजनिक मंच से ऐसे भेदभावपूर्ण वाक्य बोलता है, तो यह संदेश जाता है कि जात-पात का विभाजन, भेदभाव और अपमान का विचार सरकारी संरक्षण में फल फूल रहा है। इसीलिए इसे “देश की आत्मा” – सामाजिक सद्भाव, भाईचारा, समान नागरिकता पर हमला माना जाना चाहिए।
बयान में “कन्या-दान” शब्द का प्रयोग कर ब्राह्मण बेटियों को “दान की वस्तु” बना देना, महिलाओं के साथ सिर्फ उनके परिवार या जाति के आधार पर पूरे देश में असम्मान की भावना जगाता है। यह बयान न सिर्फ संवाद-स्वतंत्रता की सीमाओं को पार करता है, बल्कि उन नैतिक और संवैधानिक मूल्यों पर हमला है, जिनके आधार पर दूसरा-पक्ष समानता, सम्मान, व्यक्तिगत स्वतंत्रता के साथ खड़ा हुआ है।भारतीय परिवेश में बेटी मान का प्रतीक है जिस पर हमला करने की चेष्ठा हर नजरिए से अस्वीकार्य है। जब कोई अधिकारी जात-पात, आरक्षण, सामाजिक असमानता जैसे संवेदनशील विषयों पर ऐसे विवादित और उत्तेजक बयान देता है, तो यह सरकार, प्रशासन और संवैधानिक मूल्यों के प्रति अनादर है। जाहिर है कि ये देश की स्थिरता और सार्वभौमिक अधिकारों पर हमला है। इस तरह के बयान लोगों में कट्टरता, द्वेष, अविश्वास और सामजिक दरारें पैदा कर सकते हैं । खासकर जब जातीय भावना और सम्मान का प्रश्न जुड़ा हो। इतिहास में देखा गया है कि ऐसे वक्तव्यों से सामाजिक अशांति, सांप्रदायिक विभाजन और हिंसा जैसी स्थितियां पैदा होती हैं।
वर्तमान विवाद मात्र पहली घटना नहीं है संतोष वर्मा का नाम कई पुराने आरोपों से भी जुड़ा हुआ है। उनके ऊपर पहले यह आरोप था कि उन्होंने जज के हस्ताक्षर की नकल कर फर्जी दस्तावेज बनाये थे, ताकि प्रमोशन हासिल कर सकें। साथ ही, उनके खिलाफ यौन शोषण और धोखाधड़ी के मामलों की भी शिकायतें रही हैं जिनका सिलसिला अभी भी सवालों के घेरे में है। इस पृष्ठभूमि में, उनका यह नया जात-विरोधी और महिलाओं को वस्तु की तरह दिखाने वाला बयान, उनकी विश्वसनीयता, नैतिकता, और संवैधानिक भूमिकाओं पर गहरा सवाल खड़ा करता है। अगर ऐसे व्यक्ति जिनका इतिहास भ्रष्टाचार व धोखाधड़ी के आरोपों से जुड़ा रहा है यदि वे संवेदनशील पदों पर बने रहेंगे तो आम जनता का विश्वास पूरे सिस्टम से उठ जाएगा। जाहिर है कि देश को ऐसे प्रयासों का पुरजोर विरोध करके विदेशी षडयंत्र को बगैर किसी परिणाम की चिंता किए कुचलना होगा।
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