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  • राज्य को स्वामित्व और राजस्व न्याय दोनों का इंतजार

    राज्य को स्वामित्व और राजस्व न्याय दोनों का इंतजार

    मध्य प्रदेश में मोहन यादव सरकार के सामने राजस्व प्रबंधन की असली चुनौती केवल सरकारी खजाने में अधिक पैसा जमा करना नहीं, बल्कि उपलब्ध संसाधनों का सही आकलन करना, कर चोरी रोकना, सरकारी जमीन और संपत्तियों से वैध आय बढ़ाना तथा आम नागरिक को राजस्व कार्यालयों के चक्कर से मुक्त करना है। बजट में बड़े लक्ष्य तय करना एक बात है; उन लक्ष्यों को समय पर हासिल करना दूसरी। वित्तीय आंकड़े बताते हैं कि राज्य की आय बढ़ाने की कोशिशें जारी हैं, लेकिन कुछ प्रमुख मदों में लक्ष्य और वास्तविक संग्रह के बीच अंतर भी बना हुआ है।सरकार ने पटवारियों की चिंता तो दूर कर दी लेकिन स्वामित्व योजना का क्रियान्वयन अभी शुरु नहीं हो पाया है और अन्य कार्यों के लिए प्रदेशवासियों को आज भी तहसीलों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं।

    सरकार ने राजस्व बढ़ाने के लिए राज्य जीएसटी, आबकारी, पंजीयन एवं मुद्रांक शुल्क, वाहन कर और गैर-कर आय को प्रमुख आधार बनाया है। वित्त वर्ष 2026-27 के बजट में राज्य ने अपने कर राजस्व का लक्ष्य ₹1,17,667 करोड़ रखा है, जो 2025-26 के संशोधित अनुमान ₹1,00,020 करोड़ से लगभग 18 प्रतिशत अधिक है। राज्य जीएसटी से ₹42,311 करोड़, आबकारी से ₹20,279 करोड़ और स्टाम्प एवं पंजीयन शुल्क से ₹19,112 करोड़ जुटाने का लक्ष्य है। खास बात यह है कि पंजीयन शुल्क में 37 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान रखा गया है। इससे स्पष्ट है कि सरकार संपत्ति के लेन-देन और कर प्रशासन को राजस्व वृद्धि के बड़े साधन के रूप में देख रही है।

    इस अंतर को समझने के लिए अक्टूबर 2026 में प्रकाशित एक रिपोर्ट उपयोगी है। रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल से सितंबर 2026 तक वाणिज्यिक कर, आबकारी और पंजीयन एवं मुद्रांक विभागों ने मिलकर ₹44,711 करोड़ जुटाए, जबकि इस अवधि का लक्ष्य ₹47,439 करोड़ था। यानी पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में आय 11.37 प्रतिशत बढ़ी, लेकिन निर्धारित लक्ष्य से ₹2,728 करोड़ कम रही। वाणिज्यिक कर विभाग ने ₹30,686 करोड़ के लक्ष्य के मुकाबले ₹28,385 करोड़ जुटाए; आबकारी विभाग ₹9,900 करोड़ के लक्ष्य के मुकाबले ₹9,769 करोड़ तक पहुँचा; जबकि पंजीयन विभाग ने ₹6,853 करोड़ के लक्ष्य के विरुद्ध ₹6,557 करोड़ वसूले। यह किस्सा राजस्व प्रशासन की वास्तविक तस्वीर दिखाता है: आय बढ़ रही है, फिर भी लक्ष्य पूरा नहीं हो रहा।

    सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती कर आधार का विस्तार और कर अनुपालन है। 2025-26 के संशोधित अनुमानों में राज्य जीएसटी की आय ₹42,140 करोड़ के बजटीय लक्ष्य से घटकर ₹35,560 करोड़ रहने का अनुमान था—करीब 16 प्रतिशत की कमी। वैट और बिक्री कर की आय भी लक्ष्य से नीचे रहने का अनुमान लगाया गया। इन आंकड़ों से संकेत मिलता है कि आर्थिक गतिविधियों, कर दरों, अनुपालन और विभागीय पूर्वानुमानों के बीच बेहतर तालमेल जरूरी है। दूसरी ओर, 2026-27 में राजस्व प्राप्तियों का 54 प्रतिशत केंद्र से आने का अनुमान है। इसलिए राज्य को अपनी आय बढ़ाने के साथ केंद्र से मिलने वाले कर-वितरण और अनुदानों पर निर्भरता के जोखिम को भी समझना होगा।

    राजस्व प्रशासन की जमीनी कमजोरी का दूसरा चेहरा नागरिकों के रोजमर्रा के अनुभव में दिखता है। नामांतरण, बंटवारा, सीमांकन, भूमि अभिलेखों में सुधार, जाति-आय प्रमाणपत्र, बकाया वसूली और सरकारी जमीन से अतिक्रमण हटाने जैसे कामों में स्थितियां नहीं सुधरी हैं। सरकार ने भले ही संपदा 2.0 साफ्टवेयर को धुरी बना दिया है पर अभी भी ये आम जनता के लिए उपयोगिता साबित नहीं कर पाया है। इससे सरकार को नुक्सान ये है कि विवादित भूमि का लेन-देन अटक रहा है।संपत्ति का सही मूल्यांकन नहीं हो पा रहा  है । सरकारी जमीन पर कब्जे से संभावित राजस्व तथा सार्वजनिक उपयोग भी प्रभावित हो रहे हैं। सभी जिलों में या तो प्रकरण लंबित हैं या उन्हें जबरिया खारिज करके आंकड़ों को घटा दिया गया है। प्रकरणों की निस्तारण अवधि को आरसीएमएस पोर्टल पर अपलोड दस्तावेजों की तारीख देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि वास्तविकता क्या है।अपीलों में पलटे गए आदेशों और शिकायतों के आधार पर जनता की परेशानियों का खुलासा हो रहा है।

    पुराने भूमि रिकॉर्ड का समय पर डिजिटलीकरण न होना, नक्शे और खसरे में विसंगतियों का समाधान न करना, निर्धारित समय-सीमा के बाद भी प्रकरण लंबित रखना, बकायेदारों की प्राथमिकता तय न करना और बड़े बकायों की वसूली के बजाय आसान मामलों पर ध्यान केंद्रित करना जैसे प्रकरण राजस्व प्रशासन की असलियत उजागर कर रहे हैं। कई बार लक्ष्य पूरे न होने का कारण केवल अधिकारी की लापरवाही नहीं होता; कर्मचारियों की कमी, तकनीकी समस्याएँ, न्यायालय में लंबित विवाद, खराब मूल्यांकन और नीति संबंधी बाधाएँ भी जिम्मेदार हैं। इसके बावजूद रिकॉर्ड में देरी, आदेशों की अवहेलना या अनुचित लाभ के प्रमाण जगह जगह मिल रहे हैं।

    इस पूरी बहस में केंद्र सरकार की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। 2026-27 में मध्य प्रदेश को केंद्रीय करों में हिस्सेदारी के रूप में ₹1,12,137 करोड़ और केंद्र से अनुदान के रूप में ₹54,505 करोड़ मिलने का अनुमान है। इसके अतिरिक्त पूंजीगत व्यय के लिए 50 वर्ष के ब्याज-मुक्त केंद्रीय ऋण का प्रावधान ₹16,200 करोड़ है। ये संसाधन सड़क, सिंचाई, पेयजल और अन्य विकास परियोजनाओं में मदद कर सकते हैं, लेकिन करों में हिस्सेदारी, अनुदान और ऋण तीन अलग-अलग वित्तीय साधन हैं। ऋण को आय  समझकर और  केंद्रीय सहायता को राज्य के अपने राजस्व का परिणाम बताकर अधिकारियों ने जिस तरह से वाहवाही बटोरने के आदत बना ली है उसने विकास की रफ्तार को केवल भ्रम बना दिया है।

    मोहन यादव सरकार को लक्ष्य के मुकाबले वास्तविक वसूली, नामांतरण और सीमांकन के लंबित मामले, सरकारी भूमि से जुड़े विवाद, खनन रॉयल्टी, अपीलों में निरस्त आदेश और नागरिक शिकायतों के निस्तारण की जानकारी एक साथ जुटानी होंगी। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की आपत्तियों और विभागीय ऑडिट पर कार्रवाई की स्थिति भी सार्वजनिक करना पड़ेगी,तभी जनता अपने विकास का टारगेट पहचान सकेगी।

    मध्य प्रदेश में निश्चित रूप से राजस्व बढ़ाने के प्रयासों के संकेत हैं, लेकिन लक्ष्य से कम संग्रह और नागरिक सेवाओं में संभावित देरी यह बताती है कि सुधार अभी अधूरा है। सरकार की सफलता का पैमाना केवल यह नहीं हो सकता कि खजाने में कितने करोड़ आए।उसे तय करना होगा कि कितनी देय राशि वास्तव में वसूली गई, कितनी सरकारी संपत्ति सुरक्षित हुई, कितने भूमि विवाद समय पर सुलझे और आम नागरिक को बिना अनावश्यक खर्च के सेवा मिली। राजस्व प्रशासन तभी सफल माना जाएगा जब उसकी दक्षता सरकारी आय बढ़ाने के साथ जनता का भरोसा भी बढ़ाए।