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  • खरीदी पर लगाम से किसे परेशानी

    खरीदी पर लगाम से किसे परेशानी

    संजय दुबे की दोटूक चेतावनी वित्तीय अनुशासन की कसौटी, सरकारी धन की निगरानी को अफसरशाही का अपराध न बनाया जाए

    लोकतंत्र का एक दिलचस्प दृश्य मध्यप्रदेश के नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग में दिखाई दे रहा है। अपर मुख्य सचिव संजय दुबे ने विभागीय बैठक में स्थानीय निकायों के मुख्य कार्यपालन अधिकारियों (सीईओ) को खरीदी में वित्तीय अनुशासन बरतने की चेतावनी क्या दी, आरोपों, प्रत्यारोपों और उपदेशों का ऐसा बाजार सज गया मानो सरकारी खजाने पर नियंत्रण लगाना ही कोई बड़ा अपराध हो। कोई पूछ रहा है कि अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई, कोई विभाग की प्रतिष्ठा पर सवाल उठा रहा है, तो कोई सरकार की कथित मिलीभगत का आरोप लगा रहा है। कुछ लोगों को यह शिकायत भी है कि पूरी जानकारियां अब तक सार्वजनिक क्यों नहीं की गई। सवाल उठाना लोकतंत्र का अधिकार है, लेकिन सवालों की आड़ में जवाबदेही से बचने की कोशिश हो तो उस पर भी सवाल उठना चाहिए।

    असल प्रश्न यह नहीं है कि संजय दुबे ने खरीदी पर सख्ती क्यों दिखाई। प्रश्न यह है कि यदि सरकारी खरीद में उपलब्ध दरों, बाजार मूल्य और वास्तविक आवश्यकता के बीच अंतर है, तो उसे दूर करने की पहल का स्वागत क्यों नहीं किया जाना चाहिए? सरकारी धन किसी अधिकारी, जनप्रतिनिधि, ठेकेदार या सेवा के नाम पर सक्रिय किसी संस्था की निजी संपत्ति नहीं है। वह जनता की गाढ़ी कमाई से बना खजाना है। उसकी प्रत्येक पाई का हिसाब मांगना प्रशासनिक अधिकार ही नहीं, सार्वजनिक दायित्व भी है।

    विभागीय खरीद से जुड़े उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, मध्यप्रदेश के 374 नगरीय निकायों ने तीन वर्षों में गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस (GeM) के माध्यम से लगभग 1,134 करोड़ रुपये की खरीद की। इस खरीद में औसत दरों के आधार पर 200 से 250 करोड़ रुपये तक की संभावित बचत का अनुमान सामने आया है। इस अनुमान को अंतिम रूप से प्रमाणित बचत या सिद्ध घोटाला मान लेना उचित नहीं होगा। इसके लिए वस्तुओं की गुणवत्ता, विनिर्देश, आपूर्ति की शर्तों, बाजार दरों और भुगतान के अभिलेखों की स्वतंत्र जांच आवश्यक है। लेकिन यदि संभावित बचत इतनी बड़ी है, तो उसकी जांच और जवाबदेही तय करने से पीछे हटने का कोई औचित्य नहीं है।

    यहीं संजय दुबे की सख्ती का महत्व समझ में आता है। प्रशासनिक नेतृत्व का काम केवल बैठकों में योजनाओं की प्रगति सुनना और उपलब्धियां गिनाना नहीं है। उसका काम उन प्रक्रियाओं की कमजोरियां पकड़ना भी है, जिनसे सरकारी पैसा अनावश्यक खर्च होता है। यदि किसी खरीद में कम दर पर समान गुणवत्ता का सामान उपलब्ध था, लेकिन अधिक कीमत चुकाई गई, तो यह जानना जरूरी है कि ऐसा क्यों हुआ। क्या तकनीकी विनिर्देश जरूरत से ज्यादा सीमित थे? क्या बाजार की तुलना नहीं की गई? क्या खरीद की वास्तविक आवश्यकता का आकलन कमजोर था? या फिर कहीं किसी स्तर पर मिलीभगत हुई? इन प्रश्नों के उत्तर दस्तावेज और जांच देंगे, शोर नहीं।

    लोकतंत्र की विडंबना यह है कि कार्रवाई न हो तो प्रशासन को निकम्मा कहा जाता है और कार्रवाई शुरू हो तो उसे कठोर, तानाशाहीपूर्ण या किसी के विरुद्ध अभियान बताने की कोशिश होती है। भ्रष्टाचार पर शिकायत करने वाले और भ्रष्टाचार के विरुद्ध कार्रवाई होने पर असहज हो उठने वाले लोगों के बीच अंतर करना जरूरी है। आलोचना करने का अधिकार सबको है, लेकिन आलोचना के नाम पर जवाबदेही से बचने का अधिकार किसी को नहीं मिल सकता। जो लोग सार्वजनिक सेवा का दावा करते हैं, उनसे भी यह अपेक्षा की जानी चाहिए कि वे सरकारी खर्च में पारदर्शिता और मितव्ययिता के सिद्धांतों का समर्थन करें।

    मध्यप्रदेश में वित्तीय अनुशासन की इस पहल को व्यापक आर्थिक प्रबंधन के संदर्भ में भी देखना होगा। वित्त विभाग के अपर मुख्य सचिव मनीष रस्तोगी सहित वित्तीय नियंत्रण को मजबूत करने में लगे अधिकारियों की भूमिका इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि सरकार के लिए केवल अधिक राजस्व जुटाना पर्याप्त नहीं है; खर्च की गुणवत्ता सुधारना भी उतना ही जरूरी है। राजस्व बढ़ाने की हर कोशिश का लाभ तब सीमित हो जाता है, जब दूसरी ओर खरीद, निर्माण और सेवाओं के भुगतान में अनावश्यक व्यय जारी रहे। सरकार यदि एक रुपये की अतिरिक्त आय जुटाने के लिए मेहनत करती है, तो उसे यह भी देखना चाहिए कि उसी रुपये का अपव्यय न हो।

    खरीद के आंकड़ों की जांच में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और डिजिटल लेखा-विश्लेषण का उपयोग इस दिशा में एक उपयोगी कदम साबित हो रहा है।मध्य प्रदेश कैडर के आईएएस अधिकारी अंशुमन राज ने अपनी इंजीनियरिंग और मशीन लर्निंग (AI) बैकग्राउंड का इस्तेमाल करके एक विशेष डेटा एनालिसिस प्रेजेंटेशन तैयार किया। इस प्रेजेंटेशन को जब नगरीय प्रशासन विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव (ACS) संजय दुबे के सामने पेश किया गया, तो राज्य के विभिन्न नगर निकायों में चल रहे वित्तीय घोटालों की परतें खुल गईं। बड़ी संख्या में लेन-देन का विश्लेषण करके असामान्य दरों, दोहराए गए भुगतानों, संदिग्ध खरीद पैटर्न और संभावित विसंगतियों की पहचान पहले से ज्यादा आसान हो गई है,लेकिन तकनीक किसी को अपने आप दोषी घोषित नहीं करती। वह जांच के लिए संकेत देती है; अंतिम निष्कर्ष दस्तावेजों, संबंधित अधिकारियों के जवाब और निष्पक्ष परीक्षण से ही निकल पाएंगे। इसी संतुलन से वित्तीय नियंत्रण विश्वसनीय बनेगा और ईमानदार कर्मचारियों को अनावश्यक संदेह से बचाया जा सकेगा।

    इस पूरे घटनाक्रम में ईमानदार अधिकारियों की कठिनाइयों को भी समझना होगा। स्थानीय निकायों का प्रशासन केवल नियमों और फाइलों से नहीं चलता। उसे स्थानीय विधायकों, सांसदों, अन्य जनप्रतिनिधियों और विभिन्न हितधारकों की अपेक्षाओं के बीच भी काम करना पड़ता है। विकास कार्यों की मांग, स्थानीय जरूरतों का दबाव और निर्धारित बजट में काम पूरा करने की चुनौती हमेशा बनी रहती है। ऐसे वातावरण में नियमों के अनुसार निर्णय लेना और किसी अनुचित अपेक्षा के सामने न झुकना आसान नहीं होता। जो अधिकारी वित्तीय अनुशासन की बात करते हैं, उन्हें कई बार विरोध और व्यक्तिगत आलोचना भी झेलनी पड़ती है।

    इसलिए संजय दुबे जैसे अधिकारियों की दोटूक बात को केवल एक विभागीय चेतावनी के रूप में नहीं देखना चाहिए। यह उस प्रशासनिक संस्कृति की परीक्षा है जिसमें अधिकारी से अपेक्षा की जाती है कि वह सरकार का पैसा बचाए, लेकिन बचत के लिए सख्ती दिखाए तो उसे अकेला छोड़ दिया जाए। यदि सरकार वास्तव में वित्तीय अनुशासन चाहती है, तो उसे नियमसम्मत निर्णय लेने वाले अधिकारियों के साथ खड़ा होना होगा। साथ ही, यह भी सुनिश्चित करना होगा कि सख्ती मनमानी न बने, किसी निर्दोष को दंडित न किया जाए और कार्रवाई राजनीतिक या व्यक्तिगत पसंद-नापसंद से प्रभावित न हो।

    आगे का रास्ता स्पष्ट है। सभी नगरीय निकायों की खरीद का तुलनात्मक विवरण सार्वजनिक किया जाए। बड़ी खरीद में वस्तु की मात्रा, गुणवत्ता, दर, आपूर्तिकर्ता और भुगतान की जानकारी उपलब्ध कराई जाए। संभावित बचत के मामलों में स्वतंत्र परीक्षण हो, अनियमितता मिलने पर जिम्मेदारी तय की जाए और वास्तविक बचत का सत्यापित हिसाब जनता के सामने रखा जाए। जिन निकायों ने नियमों के अनुरूप खरीद की है, उन्हें भी प्रमाण और प्रक्रिया के आधार पर स्पष्ट रूप से अलग रखा जाए। पारदर्शिता का अर्थ केवल आरोप सार्वजनिक करना नहीं, बल्कि निष्कर्ष और कार्रवाई का पूरा विवरण सामने लाना है।

    सरकारी धन बचाने की कोशिश को विवाद का विषय बनाने के बजाय प्रशासनिक सुधार का अवसर बनाया जाना चाहिए। संजय दुबे की चेतावनी का मूल्य इस बात से तय होगा कि उसके बाद खरीद व्यवस्था कितनी पारदर्शी होती है, संभावित बचत का कितना हिस्सा वास्तव में हासिल होता है और जिम्मेदार लोगों पर नियमसम्मत कार्रवाई कितनी निष्पक्षता से होती है। यही कसौटी वित्तीय प्रबंधन की सफलता भी तय करेगी।अब तक जो कार्रवाई की गई है उससे शासन और प्रशासन की मंशा साफ नजर आ रही है। सरकार चाहती है कि स्थानीय सरकारें अपना दायित्व निभाएं और कमाऊ पूत न भी बन पाएं तो कम से कम सरकार पर बोझ तो न बनें।

    आखिरकार, जनता को सरकार से केवल घोषणाएं और विकास के दावे नहीं चाहिए। उसे यह भरोसा भी चाहिए कि उसकी कमाई से जमा हुआ पैसा जरूरत के अनुसार, उचित दर पर और पूरी जवाबदेही के साथ खर्च हो रहा है। यदि इस उद्देश्य से खरीदी पर नियंत्रण लगाया जा रहा है, तो उसका समर्थन होना चाहिए। सरकारी खजाने की रखवाली करने वाले अधिकारी से यह सवाल जरूर पूछा जाए कि उसने क्या बचाया, कैसे बचाया और किस आधार पर बचाया; लेकिन केवल इसलिए उसे कटघरे में खड़ा करना कि उसने खर्च पर सवाल उठा दिया, वित्तीय अनुशासन के साथ अन्याय होगा।

  • नगर सरकार के कुशासकों को कड़ा संदेश

    नगर सरकार के कुशासकों को कड़ा संदेश

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    ₹1,134 करोड़ की खरीद में ₹200 से ₹250 करोड़ बचाने की संभावना, शहरों से गांवों तक वित्तीय अनुशासन की चुनौती

    भोपाल22 अक्टूबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर) मध्यप्रदेश पर बढ़ते कर्ज और सीमित राजस्व के बीच स्थानीय निकायों के खर्च का तरीका सवालों के घेरे में है। नगरीय विकास एवं आवास विभाग के अपर मुख्य सचिव संजय दुबे ने आधुनिक अकाउंटिंग सॉफ्टवेयर के जरिए सामने आए खरीद के मूल्य-अंतर पर निकायों के मुख्य कार्यपालन अधिकारियों को चेतावनी दी है। विभागीय विश्लेषण के अनुसार, प्रदेश के 374 नगरीय निकायों ने तीन वर्षों में सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM) से करीब 1,134 करोड़ रुपये की खरीद की। समान वस्तुओं की औसत दरों के आधार पर इसमें 200 से 250 करोड़ रुपये तक बचत की संभावना जताई गई है।

    विभागीय आंकड़ों के मुताबिक, कुछ निकायों में कचरा वाहन लगभग दो लाख रुपये में खरीदे गए, जबकि दूसरे निकाय में अतिरिक्त डस्टबिन सहित ऐसे वाहन करीब छह लाख रुपये में खरीदे गए। एलईडी लाइट की खरीद दरों में भी 306 रुपये से लेकर 11,800 रुपये तक का अंतर सामने आया। इन कीमतों की तुलना करते समय वस्तु की गुणवत्ता, तकनीकी विनिर्देश और आपूर्ति की शर्तों में ् पाया गया है। मूल्य-अंतर अपने आप में भ्रष्टाचार का प्रमाण नहीं, लेकिन जांच की ठोस वजह जरूर है।

    मध्यप्रदेश के 2026-27 के बजट में राज्य की बकाया देनदारियां सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) के 32.5 प्रतिशत रहने का अनुमान है। राज्य का राजकोषीय घाटा करीब 71,458 करोड़ रुपये और ब्याज भुगतान 33,700 करोड़ रुपये से अधिक के स्तर पर है। ऐसे में सरकारी खरीद में अनावश्यक खर्च रोकना और उपलब्ध धन का बेहतर उपयोग करना बेहद जरूरी हो जाता है।

    खरीद में संभावित 200 से 250 करोड़ रुपये की बचत का अर्थ केवल सरकारी खजाने पर बोझ कम करना नहीं है। इतनी राशि से सफाई, सड़क, पेयजल और प्रकाश व्यवस्था जैसी नागरिक सुविधाओं पर अधिक प्रभावी खर्च किया जा सकता है। सवाल यह है कि जब राज्य आर्थिक दबाव में है, तब स्थानीय निकायों की खरीद में इतनी बड़ी कीमतों का अंतर कैसे पैदा हुआ?

    नगर निगमों, नगर पालिकाओं और नगर परिषदों के पास संपत्ति कर, जल शुल्क, दुकानों के किराये और अन्य स्थानीय शुल्क से आय जुटाने के साधन हैं। इसके बावजूद कई निकायों की वित्तीय स्थिति में सुधार की जरूरत बनी हुई है।

    भारतीय रिजर्व बैंक की नगर निगम वित्त संबंधी रिपोर्ट भी देश के अनेक नगर निगमों में स्वयं के राजस्व की सीमित क्षमता और सरकारी अनुदान पर निर्भरता की समस्या रेखांकित करती है।

    समस्या केवल शहरों तक सीमित नहीं है। CAG की मध्यप्रदेश के स्थानीय निकायों पर 2023 की रिपोर्ट में 11,726 लंबित ऑडिट टिप्पणियों और 2,693 निरीक्षण रिपोर्टों का उल्लेख किया गया था। इसी रिपोर्ट के अनुसार, निर्धारित 91,236 सामाजिक अंकेक्षणों में से 36,995 ही किए गए थे। ये पुराने आंकड़े हैं, लेकिन ग्रामीण स्थानीय शासन में लेखा-परीक्षा और सामाजिक अंकेक्षण की अहमियत बताते हैं।

    पंचायतों में भी जरूरी है कि विकास कार्यों पर खर्च हुई राशि का हिसाब, काम की गुणवत्ता और वास्तविक लाभ का आकलन हो। शहरों में महंगी खरीद और गांवों में अधूरे काम—दोनों ही स्थितियों में जनता के धन के उपयोग पर जवाबदेही तय होनी चाहिए।

    आधुनिक सॉफ्टवेयर खरीद की असामान्य दरों और संदिग्ध भुगतान की पहचान कर सकता है, लेकिन वास्तविक सुधार के लिए जांच, वसूली और जिम्मेदारी तय करना आवश्यक है।एआई टूल्स की मदद से न केवल गड़बड़ियां पकड़ी जा सकती हैं बल्कि गड़बड़ियों को रोकने का वैकल्पिक रोडमैप भी बनाया जा सकता है।

    मध्यप्रदेश में स्थानीय शासन की असली कसौटी बजट खर्च करना नहीं, बल्कि उस खर्च से नागरिकों को बेहतर सुविधाएं देना है। बढ़ते कर्ज के दौर में हर रुपये का हिसाब जरूरी है। यदि खरीद में बचत संभव थी, तो उसकी अनदेखी क्यों हुई; और यदि गड़बड़ी मिली है, तो कार्रवाई कब होगी? इन सवालों के जवाब ही तय करेंगे कि यह चेतावनी व्यवस्था में सुधार लाएगी या केवल एक प्रशासनिक निर्देश बनकर रह जाएगी।

  • सैटेलाइट सर्वे ने दबोचा तो समितियां हथियाने लगा भू माफिया

    सैटेलाइट सर्वे ने दबोचा तो समितियां हथियाने लगा भू माफिया

    सरकारी जमीन की सुरक्षा, गरीबों को न्याय और राजस्व वृद्धि—तीनों मोर्चों पर प्रशासनिक सुधार लागू कर रहीं हैं कमिश्नर निधि निवेदिता

    भोपाल, 17 अक्टूबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। सेटेलाईट सर्वे से अब मध्यप्रदेश के राजस्व प्रशासन की गड़बड़ियां उजागर होने लगी हैं। इससे घबराकर भू माफिया ने सामाजिक समितियों को हथियाना शुरु कर दिया है ताकि शासन पर दबाव बनाने के लिए प्रतिष्ठित लोगों की भीड़ की आड़ में छुपा जा सके।हाल ही में मोहन यादव सरकार ने मोदी सरकार की प्रतिष्ठित स्वामित्व योजना को लागू करने का दबाव बनाया तो पटवारियों की हड़ताल भी इसी भू माफिया की रणनीती का ही कदम बताया जा रहा है।हालांकि राजस्व मंत्री करण सिंह वर्मा ने साफ चेतावनी दी है कि यदि किसी कर्मचारी के भ्रष्टाचार की शिकायत मिली तो उन्हें सस्पेंड करके काम से हटा दिया जाएगा।

    राजस्व आयुक्त निधि निवेदिता की सक्रियता से पटवारियों और शासन के बीच चल रहा गतिरोध समाप्त हो गया है।स्वामित्व योजना पर काम भी शुरु हो गया है लेकिन जमीनी अमले की कहानियां आज भी जन असंतोष की वजह को साफ उजागर कर रहीं हैं।सूत्रों का कहना है कि राजस्व प्रशासन के कुछ लोगों ने नेताओं,अफसरों,व्यापारियों और दबंगों की काली कमाई को छुपाने के लिए बड़ी संख्या में जमीनों के दस्तावेज छुपा रखे हैं। इसके एवज में प्रशासन में बैठे जमीनी राजस्व अमले ने कथित तौर पर भारी अग्रिम ले रखा है।यही वजह है कि वे पारदर्शी व्यवस्था लागू करने की दिशा में अड़ंगे लगा रहे हैं।

    हाल ही में भोपाल की मलाईदार तहसील में पदस्थ एक महिला पटवारी की काली कमाई को लेकर जो परचा बंटा है उससे भू माफिया की इन गतिविधियों का पता चल रहा है।ये महिला पटवारी इन दिनों भू माफिया के प्रतिनिधियों के साथ एक समाज की समिति को हथियाने के लिए तरह तरह के षड़यंत्र रच रही है। ये संस्था भू राजस्व अमले से जुड़े एक विशेष समाज के प्रतिनिधियों ने केवल सामाजिक उद्देश्यों के लिए बनाई थी।अब इस समिति का इस्तेमाल ये भू माफिया राजस्व विभाग और सरकार पर दबाव के लिए इस्तेमाल करना चाह रहा है।इसके लिए ये पटवारी अब भू माफिया के साथ मिलकर संस्था बनाने वाली निर्वाचित अध्यक्ष को ही हटाने का षड़यंत्र रच रही है।

     दरअसल सेटेलाईट सर्वे ने जमीन के हर इंच टुकड़े की असलियत उजागर कर दी है। जिन भूखंडों को सरकारी रिकार्ड में खाली प्लाट दिखाया गया था उन पर बड़े बड़े शापिंग माल खड़े नजर आ रहे हैं। जो मकान रहवासी बताए गए थे वहां फैक्टरियां चल रहीं हैं। सरकारी रिकार्ड को झांसा देने के बदले अमले के कुछ अधिकारियों ने करोड़ों की दौलत जुटा ली है। भोपाल की जिस पटवारी का हवाला दिया जा रहा है उसने पति की मौत के बाद अनुकंपा नौकरी पाई थी पर लगभग दस करोड़ रुपयों से ज्यादा की दौलत जुटाकर गुलछर्रे उड़ा रही है।

    वित्त वर्ष 2026-27 के बजट में स्टांप ड्यूटी एवं पंजीयन शुल्क से ₹19,112 करोड़ और भू-राजस्व से ₹877 करोड़ की प्राप्ति का लक्ष्य रखा गया है। यानी इन दो मदों से लगभग ₹19,989 करोड़ जुटाने का अनुमान है। लेकिन यह आंकड़ा अपने आप में राजस्व प्रशासन की पूरी तस्वीर नहीं दिखाता। सैटेलाइट सर्वे और भू-अभिलेखों के डिजिटल मिलान से जमीन के वास्तविक उपयोग, दर्ज रकबे और सरकारी रिकॉर्ड के बीच खासा अंतर पाया गया है। सवाल है कि ऐसी विसंगतियों पर जमीनी अमला कितनी तत्परता से कार्रवाई करता है? यदि किसी सरकारी जमीन पर व्यावसायिक गतिविधि चल रही है, किसी भूखंड का उपयोग बदल चुका है या देय प्रीमियम और भू-भाटक वर्षों से जमा नहीं हुआ, तो उसकी पहचान कर नियमानुसार वसूली करना प्रशासन की जिम्मेदारी है।

    विडंबना यह है कि आम नागरिक को सहज नामांतरण, सीमांकन और रिकॉर्ड दुरुस्ती के लिए भी बार-बार कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। पटवारी से लेकर नायब तहसीलदार और तहसीलदार तक की जवाबदेही तय होती है पर उन्होंने आर सी एम एस पोर्टल को झांसा देने की तरकीबें खोज ली हैं। जनता को परेशान करने वाली व्यवस्था राजस्व बढ़ाने के मामले में सुस्त चल रही है इसलिए उसकी समीक्षा भी की जा रही है।

    गरीबों की जमीन पर दबाव, धोखाधड़ी या अवैध कब्जे के जरिए प्रभावशाली लोगों के लाभ कमाने की शिकायतें भी गंभीर हैं। ऐसे मामलों में निष्पक्ष जांच, स्वामित्व अभिलेखों का सत्यापन और दोष सिद्ध होने पर कठोर कार्रवाई शुरु हो गई है। सत्ता में आने के पहले से भाजपा सरकार भूमि सुधारों की बात करती रही है। सेटेलाईट सर्वे के आधार पर वह जिला वार आडिट करा रही है। सरकारी जमीन, अवैध उपयोग, बकाया भू-भाटक, कम मूल्यांकन और लंबित नामांतरण का सार्वजनिक डैशबोर्ड बनाया जा रहा है। प्रत्येक तहसील के लिए वसूली लक्ष्य के साथ नागरिक सेवाओं की समय-सीमा भी तय की जा रही है।

    राजस्व विभाग का उद्देश्य केवल जनता से वसूली करना नहीं, बल्कि सरकारी संपत्ति की रक्षा और नागरिकों को न्याय देना भी है। जब तक इन दोनों जिम्मेदारियों की जवाबदेही एक साथ तय नहीं होगी, तब तक राजस्व वृद्धि के लक्ष्य अधूरे और सुधार के दावे खोखले बने रहेंगे।