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  • इस दोराहे पर लुटेरों से कैसे मुक्ति दिलाएंगे बाजीराव के सेनानी

    इस दोराहे पर लुटेरों से कैसे मुक्ति दिलाएंगे बाजीराव के सेनानी

    देश के नीति आयोग ने आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को सफल बनाने के लिए मध्यप्रदेश को भी आत्मनिर्भर बनाने का फार्मूला पेश किया है। मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार इसे सफल बनाने के लिए प्राण प्रण से जुट गई है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सभी जिलों के कलेक्टरों को निर्देश दिए हैं कि वे अब कर्ज लेकर बांटे जाने वाले बजट के भरोसे न रहें। उन्हें प्रदेश के लगभग साढ़े सात करोड़ लोगों को काम देना है और अपने अपने जिलों की अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाना है। कमोबेश यही शुरुआत 2003 में उमा भारती की सरकार ने की थी। दिग्विजय सिंह की कांग्रेसी सरकार को प्रदेश की जनता ने जिस आक्रोश के साथ कुचला था उसे देखते हुए यही कामना की जा रही थी कि मध्यप्रदेश की दशा और दिशा बदली जा सकेगी। तब केन्द्र में कांग्रेसी सरकारें थीं और उन्होंने अपने पैरों पर खड़े होते मध्यप्रदेश को एक बार फिर कर्ज की बैसाखियों पर ला खड़ा करने के लिए तमाम षड़यंत्र रचे। उमा भारती को केवल लोधियों से घिरा हुआ दिखाकर उन्हें अपदस्थ किया गया। ये तमाशा देश भर ने देखा लेकिन कोई कुछ न कह सका।

    बाबूलाल गौर की ढपोरशंखी सरकार ने कांग्रेसी हाई कमान की मंशाओं को अक्षरशः लागू किया और प्रदेश एक नए कर्ज के दलदल में फंसने के लिए तैयार हो गया। शिवराज सिंह चौहान की ताजपोशी तो इसी एजेंडे के तहत की गई थी। नतीजतन पंद्रह सालों तक उन्होंने अधोसंरचना के विकास के नाम पर धड़ा धड़ कर्ज लिया। दिग्विजय सिंह की जो फौज मध्यप्रदेश को लूटने का डेरा डाले बैठी थी शिवराज सरकार को उसी ठग लाबी ने घेर लिया। भाजपा के संगठन महामंत्री कप्तान सिंह सोलंकी ने जिन्हें मध्यप्रदेश का स्वाभाविक शासक बताते हुए भाजपा में शामिल किया वे दरअसल बजट के लुटेरे थे।शिवराज को कई सालों बाद ये अहसास हुआ कि वे ठगों से चंगुल में बुरी तरह फंस चुके हैं। उमा भारती ने जिन राघवजी भाई को वित्तमंत्री बनाया था उन्होंने बेहतर वित्तीय प्रबंधन किया और कर्ज पर कर्ज लेने की राह प्रशस्त होती चली गई। राज्य आय बढ़ाता जा रहा था इसलिए तयशुदा कर्ज लेने में कोई गुरेज भी नहीं था। राघवजी भाई के बाद घटिया वित्तीय प्रबंधन और लोकप्रियता की लोलुपता ने राज्य को हवाई किले में तब्दील कर दिया। यही वजह थी कि शिवराज सरकार उस कांग्रेस से चुनाव हारी थी जिसका न तो कोई संगठन था, न नेता और न ही बजट। सत्ता से उतरने पर शिवराज ने ये कहकर अपनी लाचारी का प्रकटीकरण भी किया था कि मैं मुक्त हो गया।

    मध्यप्रदेश का दुर्भाग्य है कि इसे हमेशा से आक्रमणकारी लुटेरों ने अपनी हवस का निशाना बनाया है। मुगलों ने जिस तरह यहां लूट मचाई उससे राज्य के वनवासी अलग अलग टोलों और मजरों में बंट गए और गरीबी की जहालत भरी जिंदगी जीने को मजबूर हुए थे। भारत में मुगल शासन का पतन होने पर मराठों ने 18 वीं शताब्दी में मालवा पर अधिकार करना चाहा था। मालवा के तत्कालीन सूबेदार और जयपुर के सवाई जय सिंह ने भेलसा का अधिकार भोपाल के नवाब को दे दिया था। नवाबों की अक्षमता के चलते ये हिस्सा शीघ्र ही मराठों के आधिपत्य में चला गया। मई 1736 ईस्वी के अंत तक जयसिंह के कहने पर बाजीराव पेशवा को मालवा का नायब सूबेदार बनाया गया। दिल्ली की सल्तनत बहुत कमजोर थी और जयसिंह ने बाजीराव के कंधे पर रखकर अपनी सूबेदारी बचाने की कोशिश की। पेशवा को लगा कि इस इलाके को नए सिरे से संगठित करना चाहिए और उसने अपनी कई मांगों के बारे में दिल्ली को अवगत भी कराया। अपनी शैली का शासन स्थापित करने के बाद वह दक्षिण की ओर चल पड़ा।तब विदिशा मराठों के मार्गदर्शन में चल रहा था। पेशवाओं की ओर से ये क्षेत्र सिंधिया राजघराने की निगरानी में था। सिंधिया राजपरिवार की अंदरूनी उठापटक का फायदा उठाकर देवास के तुकोजी और जीवाजी पंवार बंधुओं ने विदिशा की घेराबंदी कर डाली। 11 जनवरी 1737 को उन्होंने उस पर अधिकार करके कर वसूलना शुरु कर दिया। इस स्थिति पर नियंत्रण के लिए पेशवा को बुंदेलखंड से वापस विदिशा आना पड़ा।

    मराठों की शक्ति बढ़ रही थी इसे देखते हुए निजाम को दिल्ली बुलाकर पुख्ता रणनीति बनाई गई। निजाम अपने लाव लश्कर के साथ सिरोंज पहुंच गया। यहां का मराठा एजेंट विशाल सेना देखकर भाग गया। निजाम यहां से पेशवा की गतिविधियों का अध्ययन कर रहा था तभी उसे उत्तर से लौटता पिलाजी जाधव मिल गया। निजाम ने उसका उचित सम्मान किया। पिलाजी तब निजाम की सेना का सहयोगी बन गया था। निजाम ने दिल्ली जाकर वहां के मुगल बादशाह को आश्वासन दिया कि वह मराठों को नर्मदा से आगे बढ़ने से रोक देगा। इस हूल के बदले में निजाम को मुगल बादशाह से पांच सूबे और एक करोड़ रुपए का वचन मिल गया। दिल्ली के तख्त ने तभी जयसिंह को सूबेदार और बाजीराव को नायब सूबेदार पद से हटाकर निजाम के बड़े बेटे को मालवा का सूबेदार बना दिया।

    मराठों को भगाने के लिए निजाम ने दिल्ली से बड़ी सेना ली। वह दिसंबर 1737 के शुरु में सिरोंज और 13 दिसंबर को भोपाल पहुंचा। तब पेशवा नजदीक ही पड़ाव डाले पड़ा था। उसने चतुराई से निजाम की सेना की नाकेबंदी कर डाली। निराश निजाम ने निकल भागने की कोशिश की लेकिन मराठों ने उसे पीछा करके हलाकान कर दिया। उसकी सेना की रसद बंद कर दी गई। छापामार शैली में हमले किए गए। इससे घबराकर निजाम ने 6 जनवरी 1738 में दोराहा सराय में पेशवा से संधि कर ली। संधि की शर्तों के अनुसार निजाम ने मालवा में मराठों का प्रभुत्व स्वीकार कर लिया। नर्मदा और चंबल के बीच के पूरे इलाके में उसने मराठों की संप्रभुता स्वीकार कर ली। हालांकि इस संधि पर पड़ा पर्दा 1741 में जाकर उठा। अगले पांच सालों में पेशवा ने अपनी स्थिति मजबूत कर ली और प्रशासन दुरुस्त कर लिया।

    मराठा सेनाओं ने मार्च 1745 में विदिशा(भेलसा) के किले पर आक्रमण किया और उस पर कब्जा कर लिया। विदिशा 1753 तक पेशवा मराठों के अधिकार में रहा। मराठों ने अपने कुशल भूमि प्रबंधन के सहारे धीरे धीरे भोपाल राज्य में भी अपना दखल बढ़ा लिया था। पेशवाओं का साम्राज्य और भी अधिक मजबूत हो सकता था लेकिन मराठों के बीच अयोग्य लोगों को मिले महत्व की वजह से ये इलाका अधिक प्रगति नहीं कर पाया।

    आजादी के बाद दिल्ली की सल्तनत ने नेहरू इंदिरा को मजबूत बनाकर मराठों को तहस नहस कर दिया। इंदिरा गांधी के करीबियों ने जब सिंधिया राजघराने का खजाना और जमीनें लूटने का अभियान चलाया तो उन्हें भरपूर संरक्षण मिलता रहा। अब कालचक्र घूमकर एक बार फिर सिंधिया घराने की ओर आशाभरी निगाहों से देख रहा है। कमलनाथ सरकार के माध्यम से दस जनपथ यहां क्षत्रियों की सत्ता को कुचलने का प्रयास कर रहा था लेकिन सिंधिया की बगावत ने उसकी मंशा पर पानी फेर दिया । बाजीराव का प्रयास था कि वह भारत की धरती से लुटेरों को खदेड़कर बाहर कर दे। बहुत हद तक वह इसमें सफल भी हुआ। दोराहा की संधि इस दिशा में सबसे प्रमुख मील का पत्थर बनी। सिंधिया की बगावत लगभग यही संदेश देती है कि पेशवाई एक बार फिर लाचार निजाम को घुटनों पर लाने में सफल हुई है।

    भारतीय जनता पार्टी के मजबूत होने और नरेन्द्र मोदी जैसे मजबूत शासक की मौजूदगी ने अलग अलग ढपली और अपना अपना राग सुना रहे शासकों को एकजुट होने का अवसर दिया है। आत्मनिर्भर मध्यप्रदेश इसी प्रशासनिक सुधारों का मुखपत्र बनकर सामने आया है। देखना ये है कि मध्यप्रदेश को चरोखर समझने वाले लुटेरे इस जन अभियान में क्या भूमिका निभाते हैं। बाजीराव के सेनानी रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया के वंशजों की योग्यता भी इस अभियान में कसौटी पर है। उन्हें दशकों तक दिल्ली की सल्तनत संभालते रहे माफिया से भी निपटना है और मध्यप्रदेश में मजबूत हो चुके भ्रष्ट माफिया से भी टक्कर लेनी है। शिवराज सिंह चौहान जिस शैली में शासन चला रहे हैं वह निश्चित रूप से आगे जाकर टकराव का रूप लेगी यह संकेत अभी से मिलने लगे हैं।

    ( लेख के ऐतिहासिक तथ्य विदिशा जिले के गजेटियर से लिए गए हैं.)

  • घेरकर और घुसकर मारने वाला योद्धा बालाजी बाजीराव पेशवा

    घेरकर और घुसकर मारने वाला योद्धा बालाजी बाजीराव पेशवा

    बाजीराव मस्तानी फिल्म ने भारत के इस वीर योद्धा को एक बार फिर समझने का अवसर दिया है.

    -आलोक सिंघई-

    देश पर आक्रमण करने वाले लुटेरों से संग्राम का शंखनाद और उन पर फतह भारत भूमि के कण कण की विशेष पहचान है। इतिहास गवाह है कि जब जब विदेशी आक्रांताओं ने इसे हथियाने की जुर्रत की है उन्हें अंततः पराजित होकर भागना पड़ा है। अंग्रेजों, फ्रांसीसियों, पुर्तगालियों, मुगलों,अफगानों,यूनानियों के बीच से अनेक आक्रांता तरह तरह के रूप धरकर हिंदुस्तान आते रहे लेकिन हिंदुत्व की सहिष्णु परंपरा के बीच उन्हें या तो लौट जाना पड़ा या फिर यहीं की संस्कृति में ढलकर समाहित हो जाना पड़ा है। जब भारत की तरुणाई किसी शासक की असलियत जान जाती है तो फिर वह उसकी विदाई के लिए अपनी जान भी दांव पर लगा देती है। ऐसे ही एक बहादुर की कहानियां आज भी तरुणाई की रगों में चेतना का संचार कर देती है। वह वीर योद्धा था बालाजी बाजीराव प्रथम। बरसों तक इस वीर योद्धा की चेतना को षड़यंत्र पूर्वक मुगल शासकों की ऐतिहासिक गाथाओं के बीच दबाकर रखा गया। कोशिश की गई कि हिंदुत्व का तेज कहीं मुगल वंशजों को नाराज न कर दे।इसके पीछे वोट की वह राजनीति थी जो सत्ता पाने के लिए अनिवार्य मानी जाती थी। इसके बावजूद सूर्य का प्रताप, बादलों की ओट हमेशा के लिए तो नहीं ढांप सकती। अंततः इस वीर योद्धा की यशोगाथा एक बार फिर देश की चेतना को एकसूत्र में बांधने की सुरलहरियां लेकर सामने आ गई है।

    बालाजी बाजीराव पेशवा प्रथम को भले ही उनके ही परिजनों के आपसी द्वेष से जूझना पड़ा हो पर केवल बहादुरी और इंसानियत को अपना धर्म मानने वाले इस रणबांकुरे की सच्चाई अंततः सामने आ ही गई। उनकी बहादुर जीवन संगिनी यवन सुंदरी मस्तानी की प्रेमकथाओं ने आज की नई पीढ़ी को बेचैन कर दिया है। युवा मन ये सोचने को मजबूर है कि आखिर क्यों इस अविजित योद्धा को अपनी पारिवारिक कलह का दंश झेलना पडा।देश के वे क्या हालात थे जब इस तूफानी योद्धा की विजय यात्रा पर लू जैसे सामान्य रोग ने असमय ही विराम लगा दिया।

    हिंदुत्व की आधारशिला कहे जाने वाले ज्योतिष शास्त्र में ऐसे नक्षत्रों की जीवनयात्रा समझने के लिए भरपूर प्रकाश डाला गया है। इस पैमाने पर सहज ही समझा जा सकता है कि बालाजी बाजीराव पेशवा जैसे योद्धा को यदि अपने ही राजघराने या अपने ही देशज शासकों का सहयोग मिला होता तो भारत का इतिहास चीनी राजवंशों से कहीं बेहतर मुकाम छू चुका होता। अंग्रेजों ने भारत की चेतना को कुंठित करने का जो षड़यंत्र रचा आजादी के बाद के शासकों ने उसे जारी रखकर अंग्रेजों के नमक का कर्ज भरपूर चुकाया। अंग्रेजों की इसी रणनीति की वजह से पौंड की यात्रा तो बदस्तूर जारी रही लेकिन भारतीय रुपए की दुर्गति निरंतर जारी रही। आज जब नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा भारतीय मुद्रा के खिलाफ रचे गए जिन षड़यंत्रों को पलटने का प्रयास कर रही है तब बाजीराव बल्लाल जैसे योद्धा के संदेश को नए संदर्भों में तरोताजा करना जरूरी हो गया है।

    तेज दिमाग और कठोर कर्म की प्रतिमूर्ति बालाजी बाजीराव पेशवा दरअसल भारतीय प्रज्ञा की विशिष्ट पहचान रहे। जब दिसंबर 1737 में सिरोंज होते हुए भोपाल पहुंचे बाजीराव ने निजाम की मुगल सेना को चारों ओर से घेर लिया,उसकी रसद काट दी लगातार युद्धों से विशाल मुगल सेना को लाचार कर दिया तब 6 जनवरी 1738 को सीहोर के दोराहा में निजाम ने शाही मुहर लगाकर बाजीराव को मालवा,नर्मदा और चंबल तक का इलाका सौंपा और पचास लाख रुपए भेंट किए। इस युद्ध के बाद बाजीराव पेशवा का नाम पूरे हिंदुस्तान में स्थापित हो गया।समाजसेवी रवि चतुर्वेदी बताते हैं कई देशी विदेशी इतिहासकारों ने तब उन्हें लायन ऑफ इंडिया की उपाधि से विभूषित किया था। बाजीराव ने बीस वर्ष की उम्र में ये तय किया था कि जो विदेशी आक्रांता जहां से आए हैं उन्हें वापस वहीं तक खदेड़ना है। इस लक्ष्य को पाने में वे बड़ी हद तक सफल भी हुए। इसके बाद उन्होंने भारतीय संस्कृति के अनुरूप हिंदुस्तान गढ़ने का अभियान चलाया जो समय समय पर आज भी प्रकट होता रहता है।

    भारतीय स्वाधीनता संग्राम की कहानियों को ही भारतीय इतिहास साबित करने वाले षड़यंत्रकारियों ने 1720 से 1740 तक देश की अस्मिता स्थापित करने वाले पेशवा सरदार बाजीराव प्रथम के तेज को भुला देने की कोशिशें कीं। वामपंथी राजनेता जानते थे कि यदि हिंदुस्तान बाजीराव पेशवा की राह पर चल पड़ा तो विदेशी आक्रांताओं के उन वंशजों को हाड़तोड़ मेहनत करनी पड़ेगी जिन्हें लूटे हुए धन पर गुरछर्रे उड़ाने की लत लग चुकी है। यही वजह थी कि उन्होंने श्रीमती इंदिरा गांधी की मदद से धर्मनिरपेक्षता जैसे शब्द को संविधान में डलवा दिया। उनका प्रयास था कि सर्वधर्म समभाव जैसे संभ्रांत शब्द के सहारे वे अन्याय के खिलाफ उठने वाली हर आवाज को कुचलने में सफल हो सकते हैं। विशाल भारत की जनता अपने हक की आवाज बुलंद न कर सके इसके लिए उन्होंने गरीब नवाज की विचारधारा को कौमी सद्भाव की चाशनी में लपेटकर परोसा। वास्तव में ये गरीबी को संरक्षित करने का ऐसा षड़यंत्र था जिसने भारत को कर्ज आधारित इकानामी बना दिया। वो तो भला हो विश्व बैंक और एशियन डेवलपमेंट बैंक जैसी सूदखोर संस्थाओं का जिन्हें अपनी मूल राशि डूबती नजर आई और उसने आर्थिक सुधारों के नाम पर अपने प्रशिक्षित शासकों को सत्तासीन कराया। दस सालों तक डॉ.मनमोहन सिंह के रूप में देश को ऐसा शासक मिला जिसने कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को जमीनी दिशा दिखाई। इसके बावजूद खैराती लोकतंत्र को आत्मनिर्भर देश में बदलना उनके बस में नहीं था। कांग्रेसी तो आज तक इन आर्थिक सुधारों के खिलाफ जूते खोलकर पीछे पड़े हैं।

    नरेन्द्र मोदी के रूप में जब देश को ऐसा बेखौफ शासक मिला है जो विकास के नाम पर लूट के भौंडे षड़यंत्रों को बेनकाब करने में जुटा है तब बालाजी बाजीराव की चेतना एक नए रूप में उभरकर सामने आई है। मध्यभारत में बालाजी बाजीराव ने जिस सिंधिया परिवार को देश की पहचान स्थापित करने की जवाबदारी सौंपी थी उस परिवार के कुलदीपक ज्योतिरादित्य सिंधिया ने एक बार फिर देशविरोधी षड़यंत्रों के खिलाफ संघर्ष का शंखनाद किया है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए लूट की इबारत लिखने वाले कमलनाथ जैसे षड़यंत्रकारी को सत्ताच्युत करवाकर सिंधिया ने हिंदुत्व आधारित सशक्त भारत को बुलंद करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। कृषि में आर्थिक सुधारों के माध्यम से नरेन्द्र मोदी यदि भारत को आत्मनिर्भर बनाने का अभियान चलाए हुए हैं तो मध्यप्रदेश एक बार फिर बालाजी बाजीराव बल्लाल की पेशवाई का अधूरा स्वप्न साकार कर रहा है। इस अधूरे स्वप्न को साकार करके ही मजबूत भारत और सुखी भारत की स्थापना की जा सकेगी।

  • सिंधिया से ठलुए कांग्रेसी और बोगस भाजपाई दोनों खफा

    सिंधिया से ठलुए कांग्रेसी और बोगस भाजपाई दोनों खफा

    भोपाल,14 मार्च,(प्रेस सूचना केन्द्र)। मोदी अमित शाह की जोड़ी ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को राज्यसभा में भेजने का फैसला लेकर भारतीय राजनीति के परंपरावादी युग का अंत कर दिया है। इसके साथ ही चंद मुद्दों के इर्द गिर्द चकरघिन्नी बनी राजनीति की इबारतें भी वाशिंग मशीन के ड्रायर में रखे गीले कपड़ों के समान सींलन मुक्त होने लगीं हैं। इस एक अकेले मूव ने न केवल कांग्रेस बल्कि भारतीय जनता पार्टी के भी पिछलग्गू राजनेताओं को हतप्रभ कर दिया है। स्वर्गीय कुशाभाऊ ठाकरे ने कांग्रेसी राजनीति के शीर्ष दिनों में भी कर्मठ कार्यकर्ताओं की फौज जुटाकर जो संगठन खड़ा किया था वह आज सिफारिशी भाजपाईयों से भर गया है। चौदह सालों के शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में जो भाजपा चमचों की भी़ड़ बनकर रह गई थी वह सिंधिया के आगमन से उत्साहित तो है लेकिन उसमें भी भविष्य को लेकर संशय के स्वर उभर रहे हैं।

    लगभग बीस सालों तक कांग्रेस की राजनीति को शीर्ष मंच पर करीब से देखने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया का राजनीतिक प्रशिक्षण बहुत लंबा रहा है। बचपन से राजघराने में जन्म लेने के बाद आधुनिक राजनीति के पुरोधा स्वर्गीय माधवराव सिंधिया की सफल राजनीति को करीब से देखने वाले ज्योतिरादित्य को जनसेवा का पाठ अपने खानदान से मिला है। उनकी दादी स्वर्गीय विजयराजे सिंधिया ने जनसंघ से भारतीय जनता पार्टी में बदले एक नए राजनीतिक दल को अपने राजघराने की विरासत से पाला पोसा था। वीर शिवाजी जिस तरह आधुनिक महाराष्ट्र की राजनीति की पहचान रहे हैं। मध्यप्रदेश में यही पहचान आज भी बालाजी बाजीराव पेशवा द्वितीय की कर्मठता से है। परम प्रतापी राजा भोज द्वितीय के शासन की जो सुगंध मध्यप्रदेश के स्मृतिपटल पर आज भी अंकित है उसे चिरस्थायी बनाने का काम बालाजी बाजीराव पेशवा ने किया था। पेशवा ने ही ग्वालियर में सिंधिया वंशजों को सल्तनत सौंपी थी। इसके बाद सिंधिया घराने के कई राजाओं ने उस राजनीति को आगे बढ़ाया।

    राजमाता विजयाराजे सिंधिया इस राजनीतिक गौरव की मशाल लेकर ही राजनीति में आईं थीं। उनके ऐश्वर्य और विरासत से ईर्ष्या करने वाली श्रीमती इंदिरा गांधी ने सिंधिया राजघराने को मटियामेट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। लोकतंत्र और स्वाधीनता की दुहाई देकर अंग्रेजों की पिछलग्गू कांग्रेस का नेतृत्व करते हुए श्रीमती गांधी ने भारतीय राजनीति के तमाम ठिए ठिकानों को ध्वस्त करने का अभियान चलाया था। उनके कुछ सिपाहसालारों ने जिस तरह की कहानियां गढ़ीं उस पर अमल करते श्रीमती इंदिरागांधी ने सिंधिया सल्तनत को लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ी। एसपी बनाकर भेजे गए स्वर्गीय अयोध्यानाथ पाठक को लगातार सात गैलेन्ट्री अवार्ड इसी सोच का सबूत हैं। इस दमन चक्र का ही नतीजा था कि चंबल घाटी डकैतों के आतंक से थर्राती रही। श्रीमती विजयाराजे सिंधिया के निधन के बाद भी भारतीय जनता पार्टी ने चंबल में सामाजिक न्याय की बड़ी लड़ाई लड़ी। उमा भारती के नेतृत्व में बनी भाजपा की सरकार तक ये परंपरा जारी रही। शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली भाजपा ने डकैती उन्मूलन के नाम पर खेती को सिंचित करने का जो अभियान चलाया उससे न केवल चंबल बल्कि धार झाबुआ के आदिवासी अंचल में भी अपराधों का ग्राफ गिरा था।

    इस सबके बावजूद मध्यप्रदेश की राजनीति में आर्थिक विषयों के जानकार नेतृत्व की जरूरत महसूस की जाती रही है। ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपनी राजनीतिक पारी शुरु करने से पहले आधुनिक अर्थशास्त्र की जो तैयारी की वह अब तक चलती रही राजनीति में फिट नहीं बैठती है। कांग्रेस की राजनीति तो इसके लिए बिल्कुल ही बोगस है। कांग्रेस गरीबी को संरक्षित करने की जिस राजनीति के तहत समाज को बांटने की विचारधारा लेकर चलती है उससे मध्यप्रदेश कभी गुजरात जैसा या उससे भी आधुनिक राज्य नहीं बन सकता है। दिग्विजय सिंह का बंटाढ़ार शासनकाल रहा हो या फिर शिवराज सिंह चौहान का कर्ज लेकर खैरात बांटने वाला दीर्घ शासनकाल सभी में प्रदेश की जनता की भरपूर उपेक्षा की गई। योजनाओं के नाम पर खैरात बांटकर वोट खरीदने की इस शैली का अंत कभी न कभी तो होना ही था। ये पहल कौन करता। कमलनाथ को उद्योगपति के रूप में प्रचारित करने वाला वर्ग राजनीति की इसी पाठशाला से आता है। बैंकों से कर्ज लेकर घाटे के उद्योग स्थापित करने वाली फर्जी उद्योगपतियों की लाबी इस राजनीति की सूत्रधार है। इस राजनीति से देश को 5 ट्रिलियन डॉलर की इकानामी बना पाना किसी भी तरह संभव नहीं है।

    देश में धनाड्य राजनीति की इस उड़ान का पायलट कोई आर्थिक विषयों का जानकार ही हो सकता है। भाजपा के प्रवक्ता के रूप में काम करने वाले डायचे बैंक के पूर्व प्रबंध निदेशक जफर इस्लाम ने ज्योतिरादित्य सिंधिया में वे क्षमताएं देखीं और उन्हें भाजपा की राजनीति की तरफ मोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य किया। भाजपा को उनकी दादी राजमाता सिंधिया ने सिंधिया सल्तनत की बागडोर से सींचा था। उनकी बुआएं श्रीमती यशोधरा राजे सिंधिया और राजस्थान की मुख्यमंत्री रहीं वसुंधरा राजे सिंधिया ने इस विरासत को सहेजकर रखा था। यशोधरा जी जब मध्यप्रदेश की उद्योगमंत्री थीं तो उन्होंने विश्व भर में फैले औद्योगिक घरानों को प्रदेश से जोड़ने का सफल अभियान चलाया था। शिवराज सिंह चौहान को संरक्षण देने वाली लाबी को ये पसंद नहीं था और उन्होंने इस अभियान को धराशायी कर दिया।

    कांग्रेस हो या भाजपा दोनों में इंदिरागांधी के बैंकों के राष्ट्रीयकरण वाले अभियान से लूट करने वाले दलालों का वर्चस्व रहा है। इस लाबी को कमलनाथ अनुकूल लगते हैं लेकिन ज्योतिरादित्य खटकते हैं। कांग्रेस की सरकार बनाने में मध्यभारत से लगभग चौबीस विधायकों का साथ रहा है। ज्योतिरादित्य सिंधिया से जुड़े यही विधायक और पूर्व मंत्री आज कमलनाथ सरकार के पतन की वजह बन रहे हैं। मध्यप्रदेश को यदि देश की नई अर्थनीति के साथ कदमताल करना है तो उसे कमलनाथ सरकार से मुक्ति पाना ही होगा। कमलनाथ सरकार के पतन के बाद जो भी नेतृत्व उभरेगा उसमें सिंधिया का असर जरूर रहेगा। ज्योतिरादित्य सिंधिया को राज्यसभा में भेजने के बाद भाजपा चाहे नरेन्द्र सिंह तोमर को प्रदेश की कमान थमाए या फिर उमा भारती या कैलाश विजयवर्गीय को ,शिवराज, नरोत्तम मिश्रा या बीडी शर्मा कोई भी हो ये लीडरशिप प्रदेश में मोदी सरकार की नीतियों को लागू करने में सफल साबित होगी।

    जाहिर सी बात है कि कर्ज आधारित अर्थव्यवस्था की राजनीति की पैरवी करने वाले गमले में उगे राजनेता प्रदेश की साढ़े सात करोड़ जनता की अपेक्षाओं को अब तक पूरा नहीं कर पाए हैं। कमलनाथ तो छिंदवाड़ा के ही मुख्यमंत्री बनकर रह गए। उनके कार्यकाल में सरकारी क्षेत्र को जिस तरह लूट का अड़्डा बना दिया गया उससे जनता में भारी निराशा है। शिवराज सरकार की सारी कल्याणकारी योजनाओं को बंद करके कमलनाथ जिस सस्ती बिजली का ढिंडोरा पीट रहे हैं वह जनता के लिए मंहगा सौदा है। शिवराज सिंह चौहान की खैराती राजनीति की तरह ये भी मीठा जहर बनकर जनता को लुभा रहा है। जाहिर है कि ऐसे में आर्थिक विकास की मूलभूत राजनीति करने वालों का वर्चस्व बढ़ना इन ठलुओं और बोगस राजनेताओं को भला कैसे रुचेगा। वे भले ही खफा होते रहें लेकिन इतना तो तय है कि मध्यप्रदेश ने एक नई राजनीति की दिशा में अपने कदम बढ़ा लिये हैं। दिग्गी के चमचे इसे गद्दारी कहें या शिवराज विभीषण की उपमा दें लेकिन बदलाव की ये बयार फिलहाल थमने वाली नहीं है।