बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने जब यूनानी चिकित्सा की डॉक्टर नुसरत परवीन का हिजाब उठाकर उसकी आंखों की चमक देखने का प्रयास किया तो कट्टर पंथियोंऔर नीतिश विरोधियों ने अपनी ओछी राजनीति शुरु कर दी। इस घटनाक्रम को नीतिश विरोधियों ने महिला और इस्लाम का अपमान बताना शुरु कर दिया । इस शोरगुल से घबराई नुसरत अब सरकारी नौकरी ज्वाईन करने को तैयार हो गई है। नीतिश ने कभी नरक बन चुके बिहार को तेजी से विकसित और आत्मनिर्भर हो रहे प्रांत में बदलने का भगीरथ किया है। दंगे,लूट और अराजकता के दौर में जा चुके बिहार की गाड़ी को पटरी पर लाना कभी लगभग असंभव माना जाता रहा है। ऐसे में बिहार की तरुणाई की आंखों में विकास को लेकर जो संकल्प और दृढ़ विश्वास पनपा है वह अद्भुत है। युवाओं के मुस्कुराते चेहरे आज बिहार के नव सूर्योदय की झलक दिखाते हैं। कोई शिल्पकार अनगढ़ पत्थर को तराशकर उसमें मूर्ति का सौंदर्य उभारता है तो वह बार बार हर कोण से उसकी मुस्कान को उभारने का प्रयास करता है । नीतिश कुमार भी कुछ इसी तरह बिहार के नागरिकों के चेहरों पर मुस्कान लाने का प्रयास कर रहे हैं। उम्र के 74 वें पड़ाव पर वे आश्वस्त होना चाहते हैं कि बिहार के युवाओं की आंखों में आगे बढ़ने के कैसे स्वप्न पल रहे है।उनकी राजनीतिक पारी का लंबा इतिहास रहा है। उस यात्रा में नुसरत जैसी न जाने कितनी नारियां उनके साथ कदम मिलाकर चलती रहीं हैं। इतने लंबे इतिहास में कभी नीतिश कुमार को अय्याश या चरित्र हीन व्यक्ति नहीं माना गया है। वे एक संवेदनशील राजनेता हैं जो अपने राज्य की बेहतरी के लिए दुर्दांत माफिया से भी टकराता रहा है। बिहार के आपराधिक गिरोह जिस तरह संसाधनों को लूटते रहे हैं और वहां की तरुणाई मजबूर होकर अन्य राज्यों व दूर देशों में काम करने को मजबूर की जाती रही हो वहां एक युवती वो भी मुस्लिम समाज के बीच से निकलकर डाक्टर बनने जा रही हो ये सुखद आश्चर्य से कम नहीं है। उसकी आंखों की चमक देखने का प्रयास करने वाले नीतिश कुमार अकेले व्यक्ति नहीं हैं । जिन चयनकर्ताओं ने उसे एक बड़ी सामाजिक जिम्मेदारी के लिए चुना वे भी उसकी योग्यता और सामाजिक समर्पण के कायल थे तभी तो उन्होंने उसे नौकरी के लिए चुना। ये नियुक्ति नीतिश कुमार के निर्देश पर नहीं हुई थी। जाहिर है कि उस क्षण को जिसे नीतिश कुमार भाव विभोर होकर देखने का प्रयास कर रहे थे उसे पूरी दुनिया में रह रहे बिहारी भी प्रसन्न भाव से देख रहे हैं। केवल कुछ कट्टरपंथी और विरोधी इस पर बखेड़ा खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं। जिन्होंने इतिहास पढ़ा है उन्होंने अंग्रेजों, मुगलों, जमींदारों, छुटभैये राजाओं की वे कहानियां खूब पढ़ी हैं जिनमें वे राज्य की नवयुवतियों को अपनी सेज पर ले जाने का कुकर्म करते देखे गए थे। इन्हीं बैचैनियों से निकलकर लोकतांत्रिक व्यवस्था ने जन्म लिया। आज कोई भी शासक या राजा ऐसी जुर्रत भी नहीं कर सकता है। नुसरत की उम्र तो उनके नाती पोतियों के बराबर है।वे सार्वजनिक स्थल पर उसके साथ अश्लील व्यवहार करने की सोच भी कैसे सकते हैं। वे जिस प्रशंसा भरे भाव से नुसरत को देख रहे थे वह दृश्य न केवल बिहार की आगे बढ़ती एक लड़की की कहानी सुनाता है बल्कि भारत के मुसलमानों की आगे बढ़ती नई पीढ़ी का दृष्टांत भी देता है। मुस्लिम वोटरों के जो ठेकेदार बरसों से भाजपा और उसके सहयोगी गैर कांग्रेसी राजनीतिक दलों को मुस्लिम विरोधी बताते रहे हैं वे इस घटनाक्रम से जरूर बैचेन घूम रहे हैं। उन्हें भय है कि यदि भारत के मुसलमानों की नई पीढ़ी के बीच से हिंदुत्व वादी राजनीति को मुस्लिम विरोधी बताने वाला नेरेटिव टूट गया तो वे कभी सत्ता का ख्वाब भी नहीं देख पाएंगे। जिस तरह हिंदू मुस्लिम और जातिगत व भाषाई राजनीति करके उन्होंने भारतीय समाज में फूट के बीज बोए थे वह षड़यंत्र धराशायी हो जाएगा। इसीलिए वे तरह तरह के दुष्प्रचार करके समाज को भ्रमित करने का प्रयास कर रहे हैं। ये अच्छा है कि नुसरत ने उनके बहकावे में न आकर अपने पैरों पर खड़े होकर चिकित्सा के माध्यम से समाजसेवा का निर्णय लिया है वह प्रशंसनीय है और स्वागत करने योग्य है। नुसरत के समान देश के सभी युवाओं को संकरे पैमानों से बाहर आकर विकास यात्रा का सहयात्री बनना है,तभी हम एक नए भारत का स्वप्न साकार कर पाएंगे।
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नीतिश के हिजाब उठाने पर हंगामा क्यों