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  • जगदीश देवड़ा ने बजट में बताया कैसे सफल होगा विकास

    जगदीश देवड़ा ने बजट में बताया कैसे सफल होगा विकास


    मध्यप्रदेश की राजनीति में इस वर्ष के बजट को कई नजरियों से देखा जा रहा है। मध्यप्रदेश विधानसभा में वित्तमंत्री जगदीश देवड़ा ने जो बजट प्रस्तुत किया उसे उन्होंने विकास की निरंतरता और सामाजिक प्रतिबद्धता का दस्तावेज बताया है। बजट भाषण के दौरान हस्तक्षेप करते हुए नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने कहना शुरु कर दिया कि ये प्रस्ताव जमीनी सच्चाइयों से कटे हुए हैं। और केवल आंकड़ों की कलाकारी हैं। सत्ता और विपक्ष के इन परस्पर विरोधी दावों के बीच यह आवश्यक हो जाता है कि बजट की वास्तविक प्रकृति और उसके संभावित प्रभावों को विस्तार से समझा जाए।

    सरकार का कहना है कि यह बजट राज्य की अर्थव्यवस्था को गति देने के साथ-साथ सामाजिक सरोकारों को भी केंद्र में रखता है। पूंजीगत व्यय में वृद्धि को इसकी सबसे महत्वपूर्ण विशेषता बताया जा रहा है। अधोसंरचना के लिए बड़े प्रावधान—सड़क निर्माण, पुल-पुलियों, ग्रामीण संपर्क मार्गों और सिंचाई परियोजनाओं के विस्तार—को राज्य की दीर्घकालिक आर्थिक वृद्धि का आधार माना जा रहा है। सरकार का तर्क है कि बेहतर कनेक्टिविटी और सिंचाई सुविधाएं न केवल कृषि उत्पादकता बढ़ाएंगी बल्कि औद्योगिक निवेश के लिए भी अनुकूल वातावरण तैयार करेंगी। औद्योगिक क्षेत्रों के विकास, एमएसएमई को प्रोत्साहन और स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र को समर्थन देने की घोषणाएं भी इसी सोच का हिस्सा हैं।सबसे बड़ी बात तो ये कि इन कार्यों से बड़ी संख्या में रोजगारों का भी सृजन होगा।

    कृषि क्षेत्र के मामले में देखा जाए तो बजट में समर्थन मूल्य व्यवस्था के क्रियान्वयन, भंडारण क्षमता में वृद्धि और कृषि आधारित प्रसंस्करण इकाइयों को बढ़ावा देने जैसे प्रावधानों का उल्लेख किया गया है। सरकार का दावा है कि इससे किसानों की आय में स्थिरता आएगी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी। साथ ही पशुपालन, दुग्ध उत्पादन और उद्यानिकी को प्रोत्साहन देने की योजनाएं भी जोड़ी गई हैं, ताकि कृषि आय के स्रोतों में विविधता लाई जा सके।सरकार कृषि ढांचे को मजबूत बनाने के लिए भी व्यापक इंतजाम कर रही है।

    सामाजिक क्षेत्र में शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ाने की घोषणा को भी बजट का महत्वपूर्ण पक्ष माना जा रहा है। स्कूलों के उन्नयन, डिजिटल शिक्षण सुविधाओं और चिकित्सा अधोसंरचना के विस्तार के लिए आवंटन बढ़ाने की बात कही गई है। महिलाओं और बालिकाओं के लिए संचालित योजनाओं का विस्तार तथा युवाओं के कौशल विकास कार्यक्रमों पर जोर यह संकेत देता है कि सरकार जनसांख्यिकीय लाभांश को साधने की दिशा में प्रयासरत है। सरकार का तर्क है कि कल्याणकारी योजनाओं और विकास परियोजनाओं के बीच संतुलन बनाकर ही समावेशी विकास संभव है।

    हालांकि नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने बजट पर गंभीर आपत्तियां दर्ज कराई हैं। उनका आरोप है कि बेरोजगारी और महंगाई जैसे मुद्दों पर स्पष्ट रणनीति का अभाव है। वे कहते हैं कि रोजगार सृजन के आंकड़े आश्वस्त करने वाले नहीं हैं और युवाओं के लिए घोषित कार्यक्रमों में ठोस वित्तीय प्रावधानों की कमी दिखाई देती है। इसके अतिरिक्त उन्होंने राज्य पर बढ़ते ऋण बोझ और राजकोषीय घाटे की ओर ध्यान आकर्षित किया है। उनका कहना है कि यदि कर्ज का स्तर लगातार बढ़ता रहा तो भविष्य में सामाजिक योजनाओं के लिए संसाधनों का संकट उत्पन्न हो सकता है।उनकी अधिकतर आपत्तियां कांग्रेस की पूर्ववर्ती सरकारों की ओर से अपनाई गई सफेद कालर की नौकरियों को लेकर थीं।

    वस्तुस्थिति पर विचार करें तो यह सच है कि राज्य का ऋण अनुपात पिछले वर्षों में बढ़ा है, किंतु यह प्रवृत्ति केवल मध्यप्रदेश तक सीमित नहीं है। अधोसंरचना निवेश और कल्याणकारी व्यय को बनाए रखने के लिए अधिकांश राज्य उधारी का सहारा ले रहे हैं। महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि यह उधारी किस प्रकार के व्यय में परिवर्तित हो रही है। यदि कर्ज से निर्मित परिसंपत्तियां उत्पादक सिद्ध होती हैं—जैसे सिंचाई परियोजनाएं, औद्योगिक कॉरिडोर या स्वास्थ्य अधोसंरचना—तो दीर्घकाल में राजस्व सृजन और आर्थिक गतिविधि के माध्यम से यह बोझ संतुलित किया जा सकता है। परंतु यदि व्यय का बड़ा हिस्सा केवल उपभोग आधारित योजनाओं में सिमट जाए और अपेक्षित आर्थिक परिणाम न मिलें, तो वित्तीय दबाव बढ़ सकता है।

    एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू क्रियान्वयन की क्षमता है। मध्यप्रदेश जैसे बड़े और विविधतापूर्ण राज्य में बजट घोषणाओं को जमीन पर उतारना प्रशासनिक दक्षता और पारदर्शिता पर निर्भर करता है। विपक्ष की यह चिंता कि कई योजनाएं घोषणा स्तर से आगे नहीं बढ़ पातीं, पूरी तरह निराधार नहीं कही जा सकती। अतः बजट की सफलता का वास्तविक आकलन तभी संभव होगा जब आगामी वित्तीय वर्ष में परियोजनाओं की प्रगति और लाभार्थियों तक पहुंच का ठोस मूल्यांकन सामने आए।

    समग्र रूप से यह बजट विकास, अधोसंरचना विस्तार और सामाजिक प्रतिबद्धता के बीच संतुलन साधने का प्रयास प्रतीत होता है। सरकार इसे राज्य की अर्थव्यवस्था को नई गति देने वाला दस्तावेज बता रही है, जबकि विपक्ष वित्तीय जोखिमों और जमीनी चुनौतियों की ओर ध्यान आकर्षित कर रहा है। लोकतांत्रिक विमर्श का यही सार है कि बजट केवल आय-व्यय का लेखा-जोखा न रहकर सार्वजनिक उत्तरदायित्व का माध्यम बने।डाक्टर मोहन यादव यदि अपने मंत्रियों और प्रशासनिक मशीनरी के सफल संचालन से योजनाओं को जमीन पर उतार पाएंगे तभी बजट के ये प्रावधान भी सफल कहे जाएंगे। जब तक सरकार जनता की कसौटी पर खरी साबित नहीं होती तब तक मोहन सरकार वाहवाही नहीं बटोर पाएगी।

  • एमपी में उद्यमियों को नहीं झेलना पड़ेगा सत्ता की दलाली का बोझ

    एमपी में उद्यमियों को नहीं झेलना पड़ेगा सत्ता की दलाली का बोझ


    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारत की सत्ता संभालते ही गुजरातियों के व्यापारिक सोच से पूरे देश को रोशन करने का अभियान चलाया हुआ है। भारत ही नहीं बल्कि वे पूरे देश में अपने इसी सोच की वजह से वे आज आकर्षण का केन्द्र बन गए हैं। भोपाल में जब ग्लोबल इंवेस्टर्स समिट का आयोजन तय किया गया तभी से पूरी दुनिया के भारत मित्रों की निगाह देश के दिल की ओर लगी हुईं थीं। फ्रांस,जर्मनी, अमेरिका समेत विश्व के तमाम देशों में जाकर प्रधानमंत्री ने निवेशकों को भारत आने का न्यौता दिया है। यही वजह है कि एमपी आज निवेशकों के लिए एक प्रमुख डेस्टिनेशन बनकर सामने आया है। उद्योग अनुकूल माहौल बनाने के लिए भाजपा ने लगभग दो दशक पहले आधारभूत ढांचे को विकसित करने पर जोर दिया था। बिजली, सड़क और पानी की मूलभूत जरूरतें पूरी करने के साथ प्रधानमंत्री आवास योजना, जल नल योजना जैसी तमाम योजनाओं ने एमपी के इंफ्रास्टक्चर को मजबूती प्रदान की है। आज प्रदेश की तस्वीर पूरी तरह बदली हुई नजर आती है। कल्याणकारी हितग्राही मूलक योजनाओं से यहां के आम नागरिक की खरीद क्षमता भी बढ़ी है जिससे राज्य आज एक सफल बाजार के रूप में उभरकर सामने आया है। इस सबसे अलग जो बात आज श्री मोदी ने इंवेस्टर्स समिट में आए निवेशकों को समझाने का प्रयास किया वो यह कि देश का दिल आज निवेशकों को मुनाफे की गारंटी वाला राज्य बन गया है।


    इसके लिए हमें दो दशक पहले मध्यप्रदेश पर गौर करना होगा। तब राज्य में न तो सड़कें थीं, न बिजली पानी की मूलभूत व्यवस्थाएं थीं। कांग्रेस की सरकारों ने राज्य में लूटपाट का माहौल बना रखा था। वोट बटोरने के लिए तुष्टिकरण और जनता को बरगलाने के लिए उद्योगपतियों, व्यापारियों, सेठों को खलनायक बताने की राजनीति की जाती थी। शोषण की कहानियां सुनाकर कांग्रेस के नेता लोगों को बरगलाते थे। व्यापारियों और उद्योगपतियों को चोर व शोषक बताया जाता था। उनकी पैरवी करने वाली भाजपा को व्यापारियों की पार्टी बताकर लांछित किया जाता था। चंबल में डकैतों का आतंक इतना गहरा था कि लोग शाम के वक्त घरों से बाहर नहीं निकलते थे। उन्हीं डकैतों की कहानियां दिखाकर मुंबई की फिल्म नगरी कांग्रेस की जीवनरेखा बनी हुई थी। मीडिया की अपराध कथाएं भी उद्यमियों को कलंकित करती होती थीं। यही वजह है कि न तो यहां उद्योग विकसित हो पाए और न ही पूंजी का निर्माण हो पाया । आर्थिक रूप से बुरी तरह टूट चुका मध्यप्रदेश एक दुःस्वप्न बनकर रह गया था।


    बदले माहौल में आज इन्हीं पिछड़ेपन की नीतियों को मार भगाया गया है। लगभग दो दशकों की भाजपा की सरकारों ने पहले डकैतों, माफियाओं, ठगों और षड़यंत्र कारियों के विरुद्ध अभियान चलाया। अब वह सत्ता के दलालों को मार भगाने में जुटी हुई है। शिवराज सिंह की भाजपा सरकार ने आधारभूत ढांचे को तो विकसित किया लेकिन वह राज्य को सत्ता के दलालों से मुक्ति नहीं दिला पाई थी। डकैतों और माफियाओं ने जंगल छोड़ दिए लेकिन वे बस्तियों में आकर सेठ बन गए। राज्य की आय तो नहीं बढ़ी लेकिन कर्ज बढ़कर साढ़े तीन लाख करोड़ हो गया। चोरों मवालियों और ठगों ने अपनी आय बढ़ाई लेकिन वे न तो उद्योग स्थापित कर रहे थे और न ही उन्होंने अपनी काली कमाई का टैक्स चुकाया ।


    इस बार प्रदेश की जनता ने जैसे ही भाजपा को एक बार फिर सत्ता सौंपी तो सबसे पहले सत्ता के दलालों के आगे नतमस्तक नेताओं को सत्ता से बाहर किया और नई पीढ़ी को बागडोर सौंपी। डाक्टर मोहन यादव जैसे जमीनी नेता के हाथों कमान सौंपकर केन्द्र सरकार ने सत्ता के दलालों को घर बैठने का संदेश दिया। लाठी लेझम चलाने वाले पहलवान मोहन यादव हों या फिर वित्तमंत्री जगदीश देवड़ा जैसे समर्पित राजनेताओं तो आगे लाकर उन्होंने जड़ हो चुकी राजनीति को एक खुला आसमान सौप दिया है। इसके साथ ही काला धन बटोरकर जिन राजनेताओं ने अपने चहेते व्यापारियों के माध्यम से निवेश किया और महाराजा बन बैठे उनसे काला धन भी निकलवाया जाने लगा है।इस सब कार्य के लिए मोहन यादव ने अफसरशाही को खुला अवसर दिया है।


    मुख्य सचिव के रूप में अनुराग जैन को भेजकर राज्य में निवेश अनुकूल वातावरण बनाया गया है।जिन अफसरों के हाथों में आज राज्य की कमान है,योजनाओं को लागू करने की जवाबदारी है वे अपेक्षाकृत रूप से साफ सुथरे हैं। ये भी कहा जा सकता है कि अफसरशाही पर शिकंजा कसकर उसे औद्योगिक विकास के अनुकूल बनाया गया है। यही वजह है कि इस बार की इंवेस्टर समिट पिछले तमाम सम्मेलनों से अलग तस्वीर लेकर सामने आई है। निवेशकों की परख के लिए राज्य की पूरी जानकारी डिजिटल कर दी गई है। उनके आवेदनों की प्रक्रिया भी इतनी सरल कर दी गई है कि वे निवेश का प्रस्ताव देकर आसानी से अपना कारोबार शुरु कर सकते हैं।दुनिया के बहुराष्ट्रीय बैंकों में कार्य कर चुके भोपाल के ही युवा उद्यमी अंकेश मेहरा ने बताया कि उन्होंने अलान्ना ब्रांड नेम से राजधानी में एक स्टार्टअप शुरु किया है। उनका प्रोडक्ट होंठों की सुंदरता के लिए दुनिया का आधुनिकतम आविष्कार है। अपने माल को सस्ता और आम जनता की पहुंच का बनाने के लिए उन्हें कुछ पैकिंग मटेरियल आज भी चीन से बुलाना पड़ता है। जल्दी ही वे ये सामान भी भारत में बनाने लगेंगे। राज्य की औद्योगिक नीतियां उद्यमियों के लिए दोस्ताना हैं ।ये माहौल बना रहेगा तो राज्य जल्दी ही एक सफल स्टेट के रूप में अपना नाम रौशन करेगा।


    इसके पहले तक राज्य में एक कुप्रथा छाई हुई थी कि टेंडर किसी भी उद्यमी के नाम खुले उसे एक विशेष प्रजाति का साईलेंट पार्टनर रखना पड़ता था। कांग्रेस के आपराधिक चरित्र वाले मुख्यमंत्रियों की चलाई इस प्रथा का पालन भाजपा की सरकारें भी दो दशक तक करती रहीं।इसका सबसे बड़ा नुक्सान ये होता था कि निवेशक यदि गुणवत्ता का कार्य करे और कम मुनाफा ले तब भी उसे सत्ता के दलालों को मुनाफे का कट देना पड़ता था। सत्ता का पेट भरते भरते उसे यहां कारोबार करना घाटे का सौदा बन जाता था और वो यहां की परंपराओं से घबराकर निवेश से पीछे हट जाता था। पहली बार डाक्टर मोहन यादव की सरकार ने निवेशकों को सत्ता के दलालों के भय से मुक्ति दिलाकर स्वच्छंद वातावरण मुहैया कराया है। यही वजह है कि राज्य में निवेशकों ने धड़ाधड़ निवेश शुरु कर दिया है।


    लोक निर्माण विभाग के प्रमुख सचिव आईएएस नीरज मंडलोई ने बताया कि इंवेस्टर्स समिट की सफलता का आलम ये है कि आज पहले दिन ही उनके विभाग को लगभग ढाई सौ करोड़ रुपयों के निवेश के प्रस्ताव मिल चुके हैं। कल तक ये आंकडा़ नया रिकार्ड स्थापित करेगा। इसी तरह एमपी इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कार्पोरेशन लिमिटेड के अध्यक्ष राघवेन्द्र कुमार सिंह ने बताया कि उद्यमियों में जो उत्साह देखने मिल रहा है वह अद्वितीय है। हमें अब तक के अनुभवों और निरंतर संवाद का लाभ भी मिला है। ये बात सही है कि राज्य में कई मूलभूत बदलाव हुए हैं लेकिन अब तक भाजपा के कई स्थानीय नेता भी इस बदलाव को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं। उन्हें कांग्रेस से आए ज्योतिरादित्य सिंधिया गुट के नेताओं के नाम पर भड़काया जा रहा है। अब तक जो हुआ सो हुआ पर जीआईएस के आयोजन की सफलता की जो तस्वीर उभरी है वह मध्यप्रदेश और देश में मेक इन इंडिया का एक सफल माडल दुनिया के सामने लाने में सफल हुई है।

  • अटल सुशासन है इस मेगा कैबिनेट का संदेश

    अटल सुशासन है इस मेगा कैबिनेट का संदेश


    मध्यप्रदेश की जनता ने दिग्विजय सिंह की कांग्रेस सरकार को केवल इसीलिए विदा किया था क्योंकि उसे उम्मीद थी कि भाजपा सत्ता में आकर अटलजी के सुशासन वाला राष्ट्रवाद देगी। बरसों से देश के बच्चे बच्चे ने अटल बिहारी वाजपेयी को सुना था और आज प्रौढ़ हो चली उस पीढ़ी के लिए सुराज एक स्वप्नलोक नजर आता था। भाजपा की नेत्री उमा भारती ने सत्ता में आकर उस सुराज की इबारत भी लिखनी शुरु कर दी थी। इसके बाद जब सत्ता के सटोरियों ने ताश के पत्ते फेंटे तो सुराज का वो स्वप्नलोक कहां गायब हो गया आज तक पता नहीं चल सका। आज तो नई पीढ़ी राकेश शर्मा और सौरभ शर्मा जैसे सत्ता के पुर्जों के भ्रष्टाचार की कहानियां देख सुन रही है।मुख्यमंत्री डाक्टर मोहन यादव भी दौड़ दौड़कर प्रदेश भर में क्लास लगा रहे हैं। कार्यकर्ताओं और नेताओं को संदेश दे रहे हैं कि हमें सुराज की ओर चलना है। हमारे केन्द्रीय नेतृत्व ने प्रदेश में नई पीढ़ी को सत्ता में भेजकर यही कुछ बदलाव करने का संदेश दिया है। शायद इसी वजह से मोहन यादव ने प्रदेश के अनेक स्थानों पर औद्योगिक सम्मेलन किए। जगह जगह जाकर कैबिनेट की बैठक ली और लोगों को सत्ता में भागीदार होने का आमंत्रण भी दिया। इसके बावजूद पाप की पोटलियां सामने आ आकर पूरा माहौल कड़वा बना रहीं हैं। मुख्यमंत्री महोदय ने भोपाल के मिंटो हाल के कंन्वेंशन सेंटर में कैबिनेट बुलाई है। उन्हें लगता है कि शायद सरकार और शासन के बीच बढ़ती चली आ रहीं दूरियां पाटने में वे सफल होंगे । पिछली दो दशकों की ऐसी ही कवायदों के बाद भी राज्य में कुदेवों का कुशासन जारी है। अब तक सुशासन की आबोहबा जमीन पर अपनी खुशबू नहीं फैला पाई है। जिन सत्ताधीशों को हमने कुर्सी सौंपी है वे अब तक किसी आदर्शवाद की झलक प्रस्तुत नहीं कर पाए हैं। मोहन यादव बार बार राजा विक्रमादित्य के सुशासन की दुहाई देते रहते हैं। उन्हें उम्मीद है कि सत्ता में शीर्ष पदों पर शामिल लोग उनका संकेत समझ पाएंगे। उनका ये आकलन बिल्कुल थोथा है ।सुशासन तो उस कुशल घुड़सवार की कला है जो घोड़े की लगाम भी थामता है और एड़ लगाकर उसे रेस की लेन में चाबुक भी फटकारता है। सधे घोड़े अपने सवार का संकेत अच्छी तरह समझते हैं। उन्हें नहीं मालूम होता कि रेस में अव्वल आ जाने पर क्या होगा पर उन्हें इतना जरूर मालूम होता है कि यदि वे ठीक तरह दौड़े तो उनका सवार उसे थपकी भरी शाबासी जरूर देगा। जिस घुड़सवार को अपनी कला पर भरोसा नहीं होता वह सभी निर्णायकों के पास सिफारिश लेकर भटकता रहता है। जिस घुड़सवार को अपनी मेहनत अपनी दूरदर्शिता पर भरोसा होता है वह बगैर किसी की परवाह किए रेस में कूदता है और अपना परचम फहराता है। डाक्टर मोहन यादव की भोपाल में आयोजित मेगा कैबिनेट भी शायद कुछ इसी तरह का इशारा कर रही है।