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  • खरीदी पर लगाम से किसे परेशानी

    खरीदी पर लगाम से किसे परेशानी

    संजय दुबे की दोटूक चेतावनी वित्तीय अनुशासन की कसौटी, सरकारी धन की निगरानी को अफसरशाही का अपराध न बनाया जाए

    लोकतंत्र का एक दिलचस्प दृश्य मध्यप्रदेश के नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग में दिखाई दे रहा है। अपर मुख्य सचिव संजय दुबे ने विभागीय बैठक में स्थानीय निकायों के मुख्य कार्यपालन अधिकारियों (सीईओ) को खरीदी में वित्तीय अनुशासन बरतने की चेतावनी क्या दी, आरोपों, प्रत्यारोपों और उपदेशों का ऐसा बाजार सज गया मानो सरकारी खजाने पर नियंत्रण लगाना ही कोई बड़ा अपराध हो। कोई पूछ रहा है कि अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई, कोई विभाग की प्रतिष्ठा पर सवाल उठा रहा है, तो कोई सरकार की कथित मिलीभगत का आरोप लगा रहा है। कुछ लोगों को यह शिकायत भी है कि पूरी जानकारियां अब तक सार्वजनिक क्यों नहीं की गई। सवाल उठाना लोकतंत्र का अधिकार है, लेकिन सवालों की आड़ में जवाबदेही से बचने की कोशिश हो तो उस पर भी सवाल उठना चाहिए।

    असल प्रश्न यह नहीं है कि संजय दुबे ने खरीदी पर सख्ती क्यों दिखाई। प्रश्न यह है कि यदि सरकारी खरीद में उपलब्ध दरों, बाजार मूल्य और वास्तविक आवश्यकता के बीच अंतर है, तो उसे दूर करने की पहल का स्वागत क्यों नहीं किया जाना चाहिए? सरकारी धन किसी अधिकारी, जनप्रतिनिधि, ठेकेदार या सेवा के नाम पर सक्रिय किसी संस्था की निजी संपत्ति नहीं है। वह जनता की गाढ़ी कमाई से बना खजाना है। उसकी प्रत्येक पाई का हिसाब मांगना प्रशासनिक अधिकार ही नहीं, सार्वजनिक दायित्व भी है।

    विभागीय खरीद से जुड़े उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, मध्यप्रदेश के 374 नगरीय निकायों ने तीन वर्षों में गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस (GeM) के माध्यम से लगभग 1,134 करोड़ रुपये की खरीद की। इस खरीद में औसत दरों के आधार पर 200 से 250 करोड़ रुपये तक की संभावित बचत का अनुमान सामने आया है। इस अनुमान को अंतिम रूप से प्रमाणित बचत या सिद्ध घोटाला मान लेना उचित नहीं होगा। इसके लिए वस्तुओं की गुणवत्ता, विनिर्देश, आपूर्ति की शर्तों, बाजार दरों और भुगतान के अभिलेखों की स्वतंत्र जांच आवश्यक है। लेकिन यदि संभावित बचत इतनी बड़ी है, तो उसकी जांच और जवाबदेही तय करने से पीछे हटने का कोई औचित्य नहीं है।

    यहीं संजय दुबे की सख्ती का महत्व समझ में आता है। प्रशासनिक नेतृत्व का काम केवल बैठकों में योजनाओं की प्रगति सुनना और उपलब्धियां गिनाना नहीं है। उसका काम उन प्रक्रियाओं की कमजोरियां पकड़ना भी है, जिनसे सरकारी पैसा अनावश्यक खर्च होता है। यदि किसी खरीद में कम दर पर समान गुणवत्ता का सामान उपलब्ध था, लेकिन अधिक कीमत चुकाई गई, तो यह जानना जरूरी है कि ऐसा क्यों हुआ। क्या तकनीकी विनिर्देश जरूरत से ज्यादा सीमित थे? क्या बाजार की तुलना नहीं की गई? क्या खरीद की वास्तविक आवश्यकता का आकलन कमजोर था? या फिर कहीं किसी स्तर पर मिलीभगत हुई? इन प्रश्नों के उत्तर दस्तावेज और जांच देंगे, शोर नहीं।

    लोकतंत्र की विडंबना यह है कि कार्रवाई न हो तो प्रशासन को निकम्मा कहा जाता है और कार्रवाई शुरू हो तो उसे कठोर, तानाशाहीपूर्ण या किसी के विरुद्ध अभियान बताने की कोशिश होती है। भ्रष्टाचार पर शिकायत करने वाले और भ्रष्टाचार के विरुद्ध कार्रवाई होने पर असहज हो उठने वाले लोगों के बीच अंतर करना जरूरी है। आलोचना करने का अधिकार सबको है, लेकिन आलोचना के नाम पर जवाबदेही से बचने का अधिकार किसी को नहीं मिल सकता। जो लोग सार्वजनिक सेवा का दावा करते हैं, उनसे भी यह अपेक्षा की जानी चाहिए कि वे सरकारी खर्च में पारदर्शिता और मितव्ययिता के सिद्धांतों का समर्थन करें।

    मध्यप्रदेश में वित्तीय अनुशासन की इस पहल को व्यापक आर्थिक प्रबंधन के संदर्भ में भी देखना होगा। वित्त विभाग के अपर मुख्य सचिव मनीष रस्तोगी सहित वित्तीय नियंत्रण को मजबूत करने में लगे अधिकारियों की भूमिका इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि सरकार के लिए केवल अधिक राजस्व जुटाना पर्याप्त नहीं है; खर्च की गुणवत्ता सुधारना भी उतना ही जरूरी है। राजस्व बढ़ाने की हर कोशिश का लाभ तब सीमित हो जाता है, जब दूसरी ओर खरीद, निर्माण और सेवाओं के भुगतान में अनावश्यक व्यय जारी रहे। सरकार यदि एक रुपये की अतिरिक्त आय जुटाने के लिए मेहनत करती है, तो उसे यह भी देखना चाहिए कि उसी रुपये का अपव्यय न हो।

    खरीद के आंकड़ों की जांच में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और डिजिटल लेखा-विश्लेषण का उपयोग इस दिशा में एक उपयोगी कदम साबित हो रहा है।मध्य प्रदेश कैडर के आईएएस अधिकारी अंशुमन राज ने अपनी इंजीनियरिंग और मशीन लर्निंग (AI) बैकग्राउंड का इस्तेमाल करके एक विशेष डेटा एनालिसिस प्रेजेंटेशन तैयार किया। इस प्रेजेंटेशन को जब नगरीय प्रशासन विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव (ACS) संजय दुबे के सामने पेश किया गया, तो राज्य के विभिन्न नगर निकायों में चल रहे वित्तीय घोटालों की परतें खुल गईं। बड़ी संख्या में लेन-देन का विश्लेषण करके असामान्य दरों, दोहराए गए भुगतानों, संदिग्ध खरीद पैटर्न और संभावित विसंगतियों की पहचान पहले से ज्यादा आसान हो गई है,लेकिन तकनीक किसी को अपने आप दोषी घोषित नहीं करती। वह जांच के लिए संकेत देती है; अंतिम निष्कर्ष दस्तावेजों, संबंधित अधिकारियों के जवाब और निष्पक्ष परीक्षण से ही निकल पाएंगे। इसी संतुलन से वित्तीय नियंत्रण विश्वसनीय बनेगा और ईमानदार कर्मचारियों को अनावश्यक संदेह से बचाया जा सकेगा।

    इस पूरे घटनाक्रम में ईमानदार अधिकारियों की कठिनाइयों को भी समझना होगा। स्थानीय निकायों का प्रशासन केवल नियमों और फाइलों से नहीं चलता। उसे स्थानीय विधायकों, सांसदों, अन्य जनप्रतिनिधियों और विभिन्न हितधारकों की अपेक्षाओं के बीच भी काम करना पड़ता है। विकास कार्यों की मांग, स्थानीय जरूरतों का दबाव और निर्धारित बजट में काम पूरा करने की चुनौती हमेशा बनी रहती है। ऐसे वातावरण में नियमों के अनुसार निर्णय लेना और किसी अनुचित अपेक्षा के सामने न झुकना आसान नहीं होता। जो अधिकारी वित्तीय अनुशासन की बात करते हैं, उन्हें कई बार विरोध और व्यक्तिगत आलोचना भी झेलनी पड़ती है।

    इसलिए संजय दुबे जैसे अधिकारियों की दोटूक बात को केवल एक विभागीय चेतावनी के रूप में नहीं देखना चाहिए। यह उस प्रशासनिक संस्कृति की परीक्षा है जिसमें अधिकारी से अपेक्षा की जाती है कि वह सरकार का पैसा बचाए, लेकिन बचत के लिए सख्ती दिखाए तो उसे अकेला छोड़ दिया जाए। यदि सरकार वास्तव में वित्तीय अनुशासन चाहती है, तो उसे नियमसम्मत निर्णय लेने वाले अधिकारियों के साथ खड़ा होना होगा। साथ ही, यह भी सुनिश्चित करना होगा कि सख्ती मनमानी न बने, किसी निर्दोष को दंडित न किया जाए और कार्रवाई राजनीतिक या व्यक्तिगत पसंद-नापसंद से प्रभावित न हो।

    आगे का रास्ता स्पष्ट है। सभी नगरीय निकायों की खरीद का तुलनात्मक विवरण सार्वजनिक किया जाए। बड़ी खरीद में वस्तु की मात्रा, गुणवत्ता, दर, आपूर्तिकर्ता और भुगतान की जानकारी उपलब्ध कराई जाए। संभावित बचत के मामलों में स्वतंत्र परीक्षण हो, अनियमितता मिलने पर जिम्मेदारी तय की जाए और वास्तविक बचत का सत्यापित हिसाब जनता के सामने रखा जाए। जिन निकायों ने नियमों के अनुरूप खरीद की है, उन्हें भी प्रमाण और प्रक्रिया के आधार पर स्पष्ट रूप से अलग रखा जाए। पारदर्शिता का अर्थ केवल आरोप सार्वजनिक करना नहीं, बल्कि निष्कर्ष और कार्रवाई का पूरा विवरण सामने लाना है।

    सरकारी धन बचाने की कोशिश को विवाद का विषय बनाने के बजाय प्रशासनिक सुधार का अवसर बनाया जाना चाहिए। संजय दुबे की चेतावनी का मूल्य इस बात से तय होगा कि उसके बाद खरीद व्यवस्था कितनी पारदर्शी होती है, संभावित बचत का कितना हिस्सा वास्तव में हासिल होता है और जिम्मेदार लोगों पर नियमसम्मत कार्रवाई कितनी निष्पक्षता से होती है। यही कसौटी वित्तीय प्रबंधन की सफलता भी तय करेगी।अब तक जो कार्रवाई की गई है उससे शासन और प्रशासन की मंशा साफ नजर आ रही है। सरकार चाहती है कि स्थानीय सरकारें अपना दायित्व निभाएं और कमाऊ पूत न भी बन पाएं तो कम से कम सरकार पर बोझ तो न बनें।

    आखिरकार, जनता को सरकार से केवल घोषणाएं और विकास के दावे नहीं चाहिए। उसे यह भरोसा भी चाहिए कि उसकी कमाई से जमा हुआ पैसा जरूरत के अनुसार, उचित दर पर और पूरी जवाबदेही के साथ खर्च हो रहा है। यदि इस उद्देश्य से खरीदी पर नियंत्रण लगाया जा रहा है, तो उसका समर्थन होना चाहिए। सरकारी खजाने की रखवाली करने वाले अधिकारी से यह सवाल जरूर पूछा जाए कि उसने क्या बचाया, कैसे बचाया और किस आधार पर बचाया; लेकिन केवल इसलिए उसे कटघरे में खड़ा करना कि उसने खर्च पर सवाल उठा दिया, वित्तीय अनुशासन के साथ अन्याय होगा।

  • नगर सरकार के कुशासकों को कड़ा संदेश

    नगर सरकार के कुशासकों को कड़ा संदेश

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    ₹1,134 करोड़ की खरीद में ₹200 से ₹250 करोड़ बचाने की संभावना, शहरों से गांवों तक वित्तीय अनुशासन की चुनौती

    भोपाल22 अक्टूबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर) मध्यप्रदेश पर बढ़ते कर्ज और सीमित राजस्व के बीच स्थानीय निकायों के खर्च का तरीका सवालों के घेरे में है। नगरीय विकास एवं आवास विभाग के अपर मुख्य सचिव संजय दुबे ने आधुनिक अकाउंटिंग सॉफ्टवेयर के जरिए सामने आए खरीद के मूल्य-अंतर पर निकायों के मुख्य कार्यपालन अधिकारियों को चेतावनी दी है। विभागीय विश्लेषण के अनुसार, प्रदेश के 374 नगरीय निकायों ने तीन वर्षों में सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM) से करीब 1,134 करोड़ रुपये की खरीद की। समान वस्तुओं की औसत दरों के आधार पर इसमें 200 से 250 करोड़ रुपये तक बचत की संभावना जताई गई है।

    विभागीय आंकड़ों के मुताबिक, कुछ निकायों में कचरा वाहन लगभग दो लाख रुपये में खरीदे गए, जबकि दूसरे निकाय में अतिरिक्त डस्टबिन सहित ऐसे वाहन करीब छह लाख रुपये में खरीदे गए। एलईडी लाइट की खरीद दरों में भी 306 रुपये से लेकर 11,800 रुपये तक का अंतर सामने आया। इन कीमतों की तुलना करते समय वस्तु की गुणवत्ता, तकनीकी विनिर्देश और आपूर्ति की शर्तों में ् पाया गया है। मूल्य-अंतर अपने आप में भ्रष्टाचार का प्रमाण नहीं, लेकिन जांच की ठोस वजह जरूर है।

    मध्यप्रदेश के 2026-27 के बजट में राज्य की बकाया देनदारियां सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) के 32.5 प्रतिशत रहने का अनुमान है। राज्य का राजकोषीय घाटा करीब 71,458 करोड़ रुपये और ब्याज भुगतान 33,700 करोड़ रुपये से अधिक के स्तर पर है। ऐसे में सरकारी खरीद में अनावश्यक खर्च रोकना और उपलब्ध धन का बेहतर उपयोग करना बेहद जरूरी हो जाता है।

    खरीद में संभावित 200 से 250 करोड़ रुपये की बचत का अर्थ केवल सरकारी खजाने पर बोझ कम करना नहीं है। इतनी राशि से सफाई, सड़क, पेयजल और प्रकाश व्यवस्था जैसी नागरिक सुविधाओं पर अधिक प्रभावी खर्च किया जा सकता है। सवाल यह है कि जब राज्य आर्थिक दबाव में है, तब स्थानीय निकायों की खरीद में इतनी बड़ी कीमतों का अंतर कैसे पैदा हुआ?

    नगर निगमों, नगर पालिकाओं और नगर परिषदों के पास संपत्ति कर, जल शुल्क, दुकानों के किराये और अन्य स्थानीय शुल्क से आय जुटाने के साधन हैं। इसके बावजूद कई निकायों की वित्तीय स्थिति में सुधार की जरूरत बनी हुई है।

    भारतीय रिजर्व बैंक की नगर निगम वित्त संबंधी रिपोर्ट भी देश के अनेक नगर निगमों में स्वयं के राजस्व की सीमित क्षमता और सरकारी अनुदान पर निर्भरता की समस्या रेखांकित करती है।

    समस्या केवल शहरों तक सीमित नहीं है। CAG की मध्यप्रदेश के स्थानीय निकायों पर 2023 की रिपोर्ट में 11,726 लंबित ऑडिट टिप्पणियों और 2,693 निरीक्षण रिपोर्टों का उल्लेख किया गया था। इसी रिपोर्ट के अनुसार, निर्धारित 91,236 सामाजिक अंकेक्षणों में से 36,995 ही किए गए थे। ये पुराने आंकड़े हैं, लेकिन ग्रामीण स्थानीय शासन में लेखा-परीक्षा और सामाजिक अंकेक्षण की अहमियत बताते हैं।

    पंचायतों में भी जरूरी है कि विकास कार्यों पर खर्च हुई राशि का हिसाब, काम की गुणवत्ता और वास्तविक लाभ का आकलन हो। शहरों में महंगी खरीद और गांवों में अधूरे काम—दोनों ही स्थितियों में जनता के धन के उपयोग पर जवाबदेही तय होनी चाहिए।

    आधुनिक सॉफ्टवेयर खरीद की असामान्य दरों और संदिग्ध भुगतान की पहचान कर सकता है, लेकिन वास्तविक सुधार के लिए जांच, वसूली और जिम्मेदारी तय करना आवश्यक है।एआई टूल्स की मदद से न केवल गड़बड़ियां पकड़ी जा सकती हैं बल्कि गड़बड़ियों को रोकने का वैकल्पिक रोडमैप भी बनाया जा सकता है।

    मध्यप्रदेश में स्थानीय शासन की असली कसौटी बजट खर्च करना नहीं, बल्कि उस खर्च से नागरिकों को बेहतर सुविधाएं देना है। बढ़ते कर्ज के दौर में हर रुपये का हिसाब जरूरी है। यदि खरीद में बचत संभव थी, तो उसकी अनदेखी क्यों हुई; और यदि गड़बड़ी मिली है, तो कार्रवाई कब होगी? इन सवालों के जवाब ही तय करेंगे कि यह चेतावनी व्यवस्था में सुधार लाएगी या केवल एक प्रशासनिक निर्देश बनकर रह जाएगी।

  • सैटेलाइट सर्वे ने दबोचा तो समितियां हथियाने लगा भू माफिया

    सैटेलाइट सर्वे ने दबोचा तो समितियां हथियाने लगा भू माफिया

    सरकारी जमीन की सुरक्षा, गरीबों को न्याय और राजस्व वृद्धि—तीनों मोर्चों पर प्रशासनिक सुधार लागू कर रहीं हैं कमिश्नर निधि निवेदिता

    भोपाल, 17 अक्टूबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। सेटेलाईट सर्वे से अब मध्यप्रदेश के राजस्व प्रशासन की गड़बड़ियां उजागर होने लगी हैं। इससे घबराकर भू माफिया ने सामाजिक समितियों को हथियाना शुरु कर दिया है ताकि शासन पर दबाव बनाने के लिए प्रतिष्ठित लोगों की भीड़ की आड़ में छुपा जा सके।हाल ही में मोहन यादव सरकार ने मोदी सरकार की प्रतिष्ठित स्वामित्व योजना को लागू करने का दबाव बनाया तो पटवारियों की हड़ताल भी इसी भू माफिया की रणनीती का ही कदम बताया जा रहा है।हालांकि राजस्व मंत्री करण सिंह वर्मा ने साफ चेतावनी दी है कि यदि किसी कर्मचारी के भ्रष्टाचार की शिकायत मिली तो उन्हें सस्पेंड करके काम से हटा दिया जाएगा।

    राजस्व आयुक्त निधि निवेदिता की सक्रियता से पटवारियों और शासन के बीच चल रहा गतिरोध समाप्त हो गया है।स्वामित्व योजना पर काम भी शुरु हो गया है लेकिन जमीनी अमले की कहानियां आज भी जन असंतोष की वजह को साफ उजागर कर रहीं हैं।सूत्रों का कहना है कि राजस्व प्रशासन के कुछ लोगों ने नेताओं,अफसरों,व्यापारियों और दबंगों की काली कमाई को छुपाने के लिए बड़ी संख्या में जमीनों के दस्तावेज छुपा रखे हैं। इसके एवज में प्रशासन में बैठे जमीनी राजस्व अमले ने कथित तौर पर भारी अग्रिम ले रखा है।यही वजह है कि वे पारदर्शी व्यवस्था लागू करने की दिशा में अड़ंगे लगा रहे हैं।

    हाल ही में भोपाल की मलाईदार तहसील में पदस्थ एक महिला पटवारी की काली कमाई को लेकर जो परचा बंटा है उससे भू माफिया की इन गतिविधियों का पता चल रहा है।ये महिला पटवारी इन दिनों भू माफिया के प्रतिनिधियों के साथ एक समाज की समिति को हथियाने के लिए तरह तरह के षड़यंत्र रच रही है। ये संस्था भू राजस्व अमले से जुड़े एक विशेष समाज के प्रतिनिधियों ने केवल सामाजिक उद्देश्यों के लिए बनाई थी।अब इस समिति का इस्तेमाल ये भू माफिया राजस्व विभाग और सरकार पर दबाव के लिए इस्तेमाल करना चाह रहा है।इसके लिए ये पटवारी अब भू माफिया के साथ मिलकर संस्था बनाने वाली निर्वाचित अध्यक्ष को ही हटाने का षड़यंत्र रच रही है।

     दरअसल सेटेलाईट सर्वे ने जमीन के हर इंच टुकड़े की असलियत उजागर कर दी है। जिन भूखंडों को सरकारी रिकार्ड में खाली प्लाट दिखाया गया था उन पर बड़े बड़े शापिंग माल खड़े नजर आ रहे हैं। जो मकान रहवासी बताए गए थे वहां फैक्टरियां चल रहीं हैं। सरकारी रिकार्ड को झांसा देने के बदले अमले के कुछ अधिकारियों ने करोड़ों की दौलत जुटा ली है। भोपाल की जिस पटवारी का हवाला दिया जा रहा है उसने पति की मौत के बाद अनुकंपा नौकरी पाई थी पर लगभग दस करोड़ रुपयों से ज्यादा की दौलत जुटाकर गुलछर्रे उड़ा रही है।

    वित्त वर्ष 2026-27 के बजट में स्टांप ड्यूटी एवं पंजीयन शुल्क से ₹19,112 करोड़ और भू-राजस्व से ₹877 करोड़ की प्राप्ति का लक्ष्य रखा गया है। यानी इन दो मदों से लगभग ₹19,989 करोड़ जुटाने का अनुमान है। लेकिन यह आंकड़ा अपने आप में राजस्व प्रशासन की पूरी तस्वीर नहीं दिखाता। सैटेलाइट सर्वे और भू-अभिलेखों के डिजिटल मिलान से जमीन के वास्तविक उपयोग, दर्ज रकबे और सरकारी रिकॉर्ड के बीच खासा अंतर पाया गया है। सवाल है कि ऐसी विसंगतियों पर जमीनी अमला कितनी तत्परता से कार्रवाई करता है? यदि किसी सरकारी जमीन पर व्यावसायिक गतिविधि चल रही है, किसी भूखंड का उपयोग बदल चुका है या देय प्रीमियम और भू-भाटक वर्षों से जमा नहीं हुआ, तो उसकी पहचान कर नियमानुसार वसूली करना प्रशासन की जिम्मेदारी है।

    विडंबना यह है कि आम नागरिक को सहज नामांतरण, सीमांकन और रिकॉर्ड दुरुस्ती के लिए भी बार-बार कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। पटवारी से लेकर नायब तहसीलदार और तहसीलदार तक की जवाबदेही तय होती है पर उन्होंने आर सी एम एस पोर्टल को झांसा देने की तरकीबें खोज ली हैं। जनता को परेशान करने वाली व्यवस्था राजस्व बढ़ाने के मामले में सुस्त चल रही है इसलिए उसकी समीक्षा भी की जा रही है।

    गरीबों की जमीन पर दबाव, धोखाधड़ी या अवैध कब्जे के जरिए प्रभावशाली लोगों के लाभ कमाने की शिकायतें भी गंभीर हैं। ऐसे मामलों में निष्पक्ष जांच, स्वामित्व अभिलेखों का सत्यापन और दोष सिद्ध होने पर कठोर कार्रवाई शुरु हो गई है। सत्ता में आने के पहले से भाजपा सरकार भूमि सुधारों की बात करती रही है। सेटेलाईट सर्वे के आधार पर वह जिला वार आडिट करा रही है। सरकारी जमीन, अवैध उपयोग, बकाया भू-भाटक, कम मूल्यांकन और लंबित नामांतरण का सार्वजनिक डैशबोर्ड बनाया जा रहा है। प्रत्येक तहसील के लिए वसूली लक्ष्य के साथ नागरिक सेवाओं की समय-सीमा भी तय की जा रही है।

    राजस्व विभाग का उद्देश्य केवल जनता से वसूली करना नहीं, बल्कि सरकारी संपत्ति की रक्षा और नागरिकों को न्याय देना भी है। जब तक इन दोनों जिम्मेदारियों की जवाबदेही एक साथ तय नहीं होगी, तब तक राजस्व वृद्धि के लक्ष्य अधूरे और सुधार के दावे खोखले बने रहेंगे।

  • राज्य को स्वामित्व और राजस्व न्याय दोनों का इंतजार

    राज्य को स्वामित्व और राजस्व न्याय दोनों का इंतजार

    मध्य प्रदेश में मोहन यादव सरकार के सामने राजस्व प्रबंधन की असली चुनौती केवल सरकारी खजाने में अधिक पैसा जमा करना नहीं, बल्कि उपलब्ध संसाधनों का सही आकलन करना, कर चोरी रोकना, सरकारी जमीन और संपत्तियों से वैध आय बढ़ाना तथा आम नागरिक को राजस्व कार्यालयों के चक्कर से मुक्त करना है। बजट में बड़े लक्ष्य तय करना एक बात है; उन लक्ष्यों को समय पर हासिल करना दूसरी। वित्तीय आंकड़े बताते हैं कि राज्य की आय बढ़ाने की कोशिशें जारी हैं, लेकिन कुछ प्रमुख मदों में लक्ष्य और वास्तविक संग्रह के बीच अंतर भी बना हुआ है।सरकार ने पटवारियों की चिंता तो दूर कर दी लेकिन स्वामित्व योजना का क्रियान्वयन अभी शुरु नहीं हो पाया है और अन्य कार्यों के लिए प्रदेशवासियों को आज भी तहसीलों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं।

    सरकार ने राजस्व बढ़ाने के लिए राज्य जीएसटी, आबकारी, पंजीयन एवं मुद्रांक शुल्क, वाहन कर और गैर-कर आय को प्रमुख आधार बनाया है। वित्त वर्ष 2026-27 के बजट में राज्य ने अपने कर राजस्व का लक्ष्य ₹1,17,667 करोड़ रखा है, जो 2025-26 के संशोधित अनुमान ₹1,00,020 करोड़ से लगभग 18 प्रतिशत अधिक है। राज्य जीएसटी से ₹42,311 करोड़, आबकारी से ₹20,279 करोड़ और स्टाम्प एवं पंजीयन शुल्क से ₹19,112 करोड़ जुटाने का लक्ष्य है। खास बात यह है कि पंजीयन शुल्क में 37 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान रखा गया है। इससे स्पष्ट है कि सरकार संपत्ति के लेन-देन और कर प्रशासन को राजस्व वृद्धि के बड़े साधन के रूप में देख रही है।

    इस अंतर को समझने के लिए अक्टूबर 2026 में प्रकाशित एक रिपोर्ट उपयोगी है। रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल से सितंबर 2026 तक वाणिज्यिक कर, आबकारी और पंजीयन एवं मुद्रांक विभागों ने मिलकर ₹44,711 करोड़ जुटाए, जबकि इस अवधि का लक्ष्य ₹47,439 करोड़ था। यानी पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में आय 11.37 प्रतिशत बढ़ी, लेकिन निर्धारित लक्ष्य से ₹2,728 करोड़ कम रही। वाणिज्यिक कर विभाग ने ₹30,686 करोड़ के लक्ष्य के मुकाबले ₹28,385 करोड़ जुटाए; आबकारी विभाग ₹9,900 करोड़ के लक्ष्य के मुकाबले ₹9,769 करोड़ तक पहुँचा; जबकि पंजीयन विभाग ने ₹6,853 करोड़ के लक्ष्य के विरुद्ध ₹6,557 करोड़ वसूले। यह किस्सा राजस्व प्रशासन की वास्तविक तस्वीर दिखाता है: आय बढ़ रही है, फिर भी लक्ष्य पूरा नहीं हो रहा।

    सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती कर आधार का विस्तार और कर अनुपालन है। 2025-26 के संशोधित अनुमानों में राज्य जीएसटी की आय ₹42,140 करोड़ के बजटीय लक्ष्य से घटकर ₹35,560 करोड़ रहने का अनुमान था—करीब 16 प्रतिशत की कमी। वैट और बिक्री कर की आय भी लक्ष्य से नीचे रहने का अनुमान लगाया गया। इन आंकड़ों से संकेत मिलता है कि आर्थिक गतिविधियों, कर दरों, अनुपालन और विभागीय पूर्वानुमानों के बीच बेहतर तालमेल जरूरी है। दूसरी ओर, 2026-27 में राजस्व प्राप्तियों का 54 प्रतिशत केंद्र से आने का अनुमान है। इसलिए राज्य को अपनी आय बढ़ाने के साथ केंद्र से मिलने वाले कर-वितरण और अनुदानों पर निर्भरता के जोखिम को भी समझना होगा।

    राजस्व प्रशासन की जमीनी कमजोरी का दूसरा चेहरा नागरिकों के रोजमर्रा के अनुभव में दिखता है। नामांतरण, बंटवारा, सीमांकन, भूमि अभिलेखों में सुधार, जाति-आय प्रमाणपत्र, बकाया वसूली और सरकारी जमीन से अतिक्रमण हटाने जैसे कामों में स्थितियां नहीं सुधरी हैं। सरकार ने भले ही संपदा 2.0 साफ्टवेयर को धुरी बना दिया है पर अभी भी ये आम जनता के लिए उपयोगिता साबित नहीं कर पाया है। इससे सरकार को नुक्सान ये है कि विवादित भूमि का लेन-देन अटक रहा है।संपत्ति का सही मूल्यांकन नहीं हो पा रहा  है । सरकारी जमीन पर कब्जे से संभावित राजस्व तथा सार्वजनिक उपयोग भी प्रभावित हो रहे हैं। सभी जिलों में या तो प्रकरण लंबित हैं या उन्हें जबरिया खारिज करके आंकड़ों को घटा दिया गया है। प्रकरणों की निस्तारण अवधि को आरसीएमएस पोर्टल पर अपलोड दस्तावेजों की तारीख देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि वास्तविकता क्या है।अपीलों में पलटे गए आदेशों और शिकायतों के आधार पर जनता की परेशानियों का खुलासा हो रहा है।

    पुराने भूमि रिकॉर्ड का समय पर डिजिटलीकरण न होना, नक्शे और खसरे में विसंगतियों का समाधान न करना, निर्धारित समय-सीमा के बाद भी प्रकरण लंबित रखना, बकायेदारों की प्राथमिकता तय न करना और बड़े बकायों की वसूली के बजाय आसान मामलों पर ध्यान केंद्रित करना जैसे प्रकरण राजस्व प्रशासन की असलियत उजागर कर रहे हैं। कई बार लक्ष्य पूरे न होने का कारण केवल अधिकारी की लापरवाही नहीं होता; कर्मचारियों की कमी, तकनीकी समस्याएँ, न्यायालय में लंबित विवाद, खराब मूल्यांकन और नीति संबंधी बाधाएँ भी जिम्मेदार हैं। इसके बावजूद रिकॉर्ड में देरी, आदेशों की अवहेलना या अनुचित लाभ के प्रमाण जगह जगह मिल रहे हैं।

    इस पूरी बहस में केंद्र सरकार की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। 2026-27 में मध्य प्रदेश को केंद्रीय करों में हिस्सेदारी के रूप में ₹1,12,137 करोड़ और केंद्र से अनुदान के रूप में ₹54,505 करोड़ मिलने का अनुमान है। इसके अतिरिक्त पूंजीगत व्यय के लिए 50 वर्ष के ब्याज-मुक्त केंद्रीय ऋण का प्रावधान ₹16,200 करोड़ है। ये संसाधन सड़क, सिंचाई, पेयजल और अन्य विकास परियोजनाओं में मदद कर सकते हैं, लेकिन करों में हिस्सेदारी, अनुदान और ऋण तीन अलग-अलग वित्तीय साधन हैं। ऋण को आय  समझकर और  केंद्रीय सहायता को राज्य के अपने राजस्व का परिणाम बताकर अधिकारियों ने जिस तरह से वाहवाही बटोरने के आदत बना ली है उसने विकास की रफ्तार को केवल भ्रम बना दिया है।

    मोहन यादव सरकार को लक्ष्य के मुकाबले वास्तविक वसूली, नामांतरण और सीमांकन के लंबित मामले, सरकारी भूमि से जुड़े विवाद, खनन रॉयल्टी, अपीलों में निरस्त आदेश और नागरिक शिकायतों के निस्तारण की जानकारी एक साथ जुटानी होंगी। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की आपत्तियों और विभागीय ऑडिट पर कार्रवाई की स्थिति भी सार्वजनिक करना पड़ेगी,तभी जनता अपने विकास का टारगेट पहचान सकेगी।

    मध्य प्रदेश में निश्चित रूप से राजस्व बढ़ाने के प्रयासों के संकेत हैं, लेकिन लक्ष्य से कम संग्रह और नागरिक सेवाओं में संभावित देरी यह बताती है कि सुधार अभी अधूरा है। सरकार की सफलता का पैमाना केवल यह नहीं हो सकता कि खजाने में कितने करोड़ आए।उसे तय करना होगा कि कितनी देय राशि वास्तव में वसूली गई, कितनी सरकारी संपत्ति सुरक्षित हुई, कितने भूमि विवाद समय पर सुलझे और आम नागरिक को बिना अनावश्यक खर्च के सेवा मिली। राजस्व प्रशासन तभी सफल माना जाएगा जब उसकी दक्षता सरकारी आय बढ़ाने के साथ जनता का भरोसा भी बढ़ाए।

  •  मन में करुणा और दया हो तभी आती है क्षमा:आचार्य समय सागर जी

     मन में करुणा और दया हो तभी आती है क्षमा:आचार्य समय सागर जी

    भोपाल 06 अक्टूबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। मध्यप्रदेश विधानसभा परिसर में आज मंगलवार को अनोखी धर्मसभा के बीच आचार्य श्री 108 समयसागर जी महाराज और उनके संघ के सभी साधुओं की उपस्थिति में सामूहिक क्षमावाणी महोत्सव का आयोजन किया गया। इस अवसर पर विधानसभा अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, लघु एवं मध्यम उद्योग मंत्री चेतन काश्यप,विधायक भगवानदास सबनानी,पूर्व वित्तमंत्री जयंत मलैया,महापौर मालती राय, राहुल कोठारी,  सहित प्रदेश के अनेक जनप्रतिनिधि और गणमान्य लोग मौजूद रहे।

     कुंडल पुर के बड़े बाबा और आचार्य विद्या सागर महाराज के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलन के साथ शुरू हुए आयोजन में प्रदेश के मुख्य मंत्री विधान सभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर ने आचार्य श्री को शास्त्र भेट किए। डॉक्टरअंजुल दहाले और नीरू नांदगांवकर ने नृत्य के माध्यम से मंगलाचरण की भावपूर्ण प्रस्तुति दी।  जनप्रतिनिधियों ने आचार्यश्री को श्रीफल भेंट कर आशीर्वाद लिया।

    मुख्य मंत्री मोहन यादव ने आचार्यश्री की वंदना करने के बाद धर्मसभा के बीच कहा कि ये हमारा सौभाग्य है जो लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर में गुरुवर के आने से दिवाली और होली जैसे त्यौहार एक साथ मनाए जा रहे हैं। मैं सरकार की ओर से उनका ससंघ स्वागत वंदन करता हूं। विधानसभा में इससे पहले आचार्य श्री विद्या सागर महाराज के चरण भी पड़ चुके हैं। ये सुखद संयोग है कि कल प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के सेवाकाल के 25 वर्ष पूर्ण हो रहे हैं। माननीय प्रधान मंत्री ने अपने राजनैतिक जीवन में जीव दया और अहिंसा को आधार माना। शासन के मुखिया होने के नाते कई बार कठोर निर्णय भी लेने पड़ते हैं। मैं अपने ऐसे कर्मों के लिए भी सभी बांधवों से क्षमा मांगता हूं। क्षमा पर्व व्यक्ति के अंतर मन को मजबूत बनाता है। अहंकार का नाश कर क्षमा जीवन में सरलता सहजता लाती है।

     विधान सभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा धर्म के बिना जीवन अधूरा है। धर्म प्रकृति को देखा जाए तो जैन सिद्धांत त्याग, कठोरता,और समर्पण से सराबोर है।ये भावना सभी आमजन  के लिए भी अनुकरणीय है। लोग भिंड मुरैना को डकैत ग्रस्त इलाके के रूप में जानते रहे हैं।असलियत इस छवि से बिल्कुल अलग है। भिंड मुरैना में भी प्राचीन मंदिरों और आध्यात्मिक क्रियाओं माहौल रहा है। हम सभी का सौभाग्य है कि भारत भूमि संतों ऋषियों की तपस्या की भूमि रही है। संतो के आशीर्वाद ने इस भूमि को सोने की चिड़िया बनाया।आज ये देश एक बार फिर विश्व का नेतृत्व करने के लिए तैयार है। उन्होंने आचार्य श्री से कहा इस लोक तंत्र के मंदिर में पक्ष भी है और विपक्ष भी है। ऐसा आशीर्वाद दीजिए कि सभी में सकारात्मकता और देश भक्ति की भावना रहे।हम सभी का ये लोक भी सुधरे और परलोक भी संवर जाए।

    आचार्य श्री समय सागर महाराज ने कहा जैन धर्म जाति वाद का धर्म नहीं है यहां वैराग्य और जीव दया की भावना से अहिंसा की उपासना की जाती है। अहिंसा व्यक्ति विशेष का नहीं मानव मात्र का वैश्विक धर्म है। प्रत्येक जीव सुख शांति चाहता है। क्षमा धर्म की उपासना के बिना सुख शांति नहीं रह सकती। आचार्य श्री विद्यासागरजी  ने हमेशा भारत से मांस निर्यात का विरोध किया। सरकारों ने उनकी बात को सुना और उस पर बड़ी हद तक अमल भी किया। आचार्य श्री ने कहा रिश्तों में विचारों के अंतर से क्रोध की अग्नि जलती हे इसे हम क्षमा रूपी नीर से बुझा सकते हैं। इसमें संयम की औषधि का भी लेप जरूरी है। आत्मानुशासन के बिना विश्व पर शासन करना कठिन है। राम कृष्ण, गौतम, नानक ने भी अहिंसा को आधार मान कर विश्व कल्याण की भावना का संदेश दिया।लोकतंत्र के मंदिर में भी हमारी यही भावना है कि सभी लोग अहिंसा का महत्व समझें और अपना जीवन सुखी बनाएं।

    स्वागत अध्यक्ष अखिलेंद्र जैन ने बताया आचार्य श्री की अगवानी विधान सभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर ने स्वयं अपने सभी अधिकारियों के साथ की।  आयोजन में मौजूद श्रद्धालु जय हिंद जय जिनेंद्र के जयकारे लगा रहे थे। आयोजन समिति के प्रमुख अध्यक्ष पंकज  सुपारी मुख्य संयोजक मनोज बांगा समाज सेवी मनोज प्रधान स्वागत अध्यक्ष अखिलेंद्र जैन ने मुख्य मंत्री विधान सभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर का सम्मान किया।

    कार्यक्रम में श्री दिगंबर जैन पंचायत कमेटी ट्रस्ट के अध्यक्ष पंकज जैन सुपारी, विद्योदय वर्धिनी चातुर्मास समिति के मुख्य संयोजक मनोज जैन बांगा,स्वागत अध्यक्ष अखिलेन्द्र जैन, एमपीनगर मंदिर निर्माण कमेटी के देवेन्द्र जैन(रुचि),राकेश जैन ओएसडी,हेमलता कोठारी,मप्र हाऊसिंग बोर्ड के अध्यक्ष ओम जैन,समेत अन्य गणमान्य अतिथि भी उपस्थित थे। स्वागत भाषण पंकज जैन ओर आभार मनोज बांगा ने व्यक्त किया संचालन पूर्व प्रशासनिक अधिकारी नितिन नांदगांवकर ने किया।

  • नया भोपाल बनाने का मसौदा जारी

    नया भोपाल बनाने का मसौदा जारी


    मास्टर प्लान पर नागरिकों से सुझाव आमंत्रित

    भोपाल 26 सितंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि श्री गणेश अनंत चतुर्दशी के पावन अवसर पर एक लंबे अंतराल के बाद भोपाल विकास योजना-2047 (मास्टर प्लान) के प्रारूप (ड्रॉफ्ट) का प्रकाशन कर दिया गया है।मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि कैपिटल सिटी की यह विकास योजना (मास्टर प्लान) भोपाल की प्राकृतिक धरोहर- भोजताल, वन क्षेत्रों एवं बाघ भ्रमण क्षेत्र के संरक्षण के साथ नागरिकों को बेहतर सुविधाएं, सुगम मोबिलिटी और आर्थिक विकास के अवसर उपलब्ध कराने की दृष्टि से तैयार की गई है। इस विकास योजना में हरित टीडीआर का बेहतर प्रावधान किया गया है, इससे हरित क्षेत्र में आने वाली भूमि के स्वामियों की क्षतिपूर्ति के साथ विकासकर्ताओं को टीडीआर के जरिए अतिरिक्त विकास की सुविधा भी मिल सकेगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि समृद्ध, सुगम, सुरक्षित और विकसित भोपाल के संकल्प की दिशा में यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण पहल है। उन्होंने कहा कि भोपाल विकास योजना के प्रकाशित प्रारूप पर नागरिकगण अपनी आपत्ति एवं सुझाव दे सकते हैं।

    भोपाल मास्टर प्लान ड्रॉफ्ट के हैं चार प्रमुख स्तंभ

    प्रकाशित भोपाल मास्टर प्लान का ड्रॉफ्ट सतत् विकास, समावेशी शहर और समृद्ध भविष्य की संकल्पना से अभिप्रेरित है। इसकी कोर थीम हरित भोपाल, समृद्ध भोपाल और विकसित भोपाल रखी गई है। इस मास्टर प्लान ड्रॉफ्ट के चार प्रमुख आधार स्तंभ रखे गए हैं। इसमें पहला प्राकृतिक पारिस्थितिकीय तंत्र के संरक्षण को प्राथमिकता दी गई है। इसके बाद दूसरा आधुनिक दृष्टिकोण एवं नागरिक हितैषी नियोजन पर बल दिया गया है। तीसरा सुधारोन्मुख एवं परिवर्तनकारी नियोजन को भी केन्द्रीय लक्ष्य (कोर टारगेट) में रखा गया है। चौथा इस मास्टर प्लान को आत्मनिर्भर एवं आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करने वाले सतत् विकास की अवधारणा पर केन्द्रित किया गया है।

    भोपाल मास्टर प्लान ड्रॉफ्ट की प्रमुख विशेषताएं

    • प्राकृतिक संवेदनशीलता सम्मत नियोजन इस मास्टर प्लान की प्रमुख विशेषता है।
    • आर्थिक विकास एवं रोजगार सृजन सम्बन्धी प्रस्ताव।
    • महानगरीय अवधारणा के अनुरूप प्रस्ताव।
    • ग्रोथ कॉरिडोर के माध्यम से शहर का आर्थिक विकास।
    • राज्य की टीओडी नीति के अनुरूप मिश्रित भूमि उपयोग का प्रस्ताव।
    • असीमित एफएआर एवं भवन ऊंचाई।
    • विकास मापदंडों का सरलीकरण एवं युक्तियुक्तकरण।
    • मास्टर प्लान ड्रॉफ्ट में शहर के हरित क्षेत्र को 16 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत किया गया है।
    • विकास योजना के क्रियान्वयन के लिए पूंजी संग्रहण की समुचित व्यवस्था।
    • क्रिएटिव री-डेवलपमेंट के माध्यम से पुनर्विकास।
    • अफोर्डेबल हाउसिंग को प्रोत्साहन दिया गया है।
    • हरित टीडीआर के प्रावधान भी किए गए हैं।
    • मास्टर प्लान के क्रियान्वयन का प्रभावी पर्यवेक्षण भी सुनिश्चित किया गया है।
    • मास्टर प्लान ड्रॉफ्ट में सुरक्षित शहर (सेफ सिटी) के सभी प्रावधान भी किए गए हैं।
    • पार्किंग प्रोत्साहन संबंधी प्रावधान भी किए गए हैं।
    • निजी विकासकर्ताओं द्वारा विकास योजना की मांगों का क्रियान्वयन भी तय किया गया है।
    • मास्टर प्लान ड्रॉफ्ट में भोपाल को इकाई सिटी (EKAI – एज्युकेशन, नॉलेज एंड आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस सिटी) के रूप में डेवलप करने के लिए भी समुचित प्रस्ताव/प्रविधान किए गए हैं।
  • एमपी की पहचान बाघ को बचाएं बोले डॉ.मोहन यादव

    एमपी की पहचान बाघ को बचाएं बोले डॉ.मोहन यादव

    भोपाल,28 जुलाई(प्रेस इनफॉर्मेशन सेंटर).मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि यह हमारा सौभाग्य है कि मध्यप्रदेश सर्वाधिक बाघ वाला प्रदेश है। प्रदेश में बाघों की आबादी बढ़कर 785 पहुँच गई है। यह प्रदेश के लिये गर्व की बात है। उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस पर प्रदेशवासियों को बधाई और शुभकामनाएँ दी हैं।

    मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा है कि वन्य प्राणियों की सुरक्षा का कार्य अत्यंत मेहनत और परिश्रम का है। समुदाय के सहयोग के बिना वन्य प्राणियों की सुरक्षा संभव नहीं है। वन विभाग और वन्य प्राणियों की सुरक्षा में लगे सभी लोग बधाई के पात्र हैं, जिनके कारण मध्यप्रदेश एक बार फिर टाइगर स्टेट बन गया है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस पर जंगलों में बाघों के भविष्य को सुरक्षित करने और प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने के लिए एकजुट होकर कार्य करने का संकल्प लेने का आहवान किया है।

    मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि बाघों के संरक्षण के लिये संवेदनशील प्रयासों की आवश्यकता होती है जो वन विभाग के सहयोग से संभव हुई है। हमारे प्रदेश के राष्ट्रीय उद्यानों में बेहतर प्रबंधन से जहाँ एक ओर वन्य प्राणियों को संरक्षण मिलता है, वहीं बाघों के प्रबंधन में लगातार सुधार भी हुए हैं।

    वन्य प्राणियों के प्रति संवेदनशीलता

    वन्य प्राणियों के प्रति संवेदनशीलता का हाल ही में सीहोर जिले में एक उदाहरण सामने आया था। सीहोर जिले के बुदनी के मिडघाट रेलवे ट्रेक पर बाघिन के तीन शावक ट्रेन की चपेट में आ गये थे, जिसमें दो गंभीर रूप से घायल शावकों को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के निर्देश पर जिला प्रशासन और वन्य प्राणी चिकित्सकों की टीम द्वारा एक डिब्बे की विशेष ट्रेन से उपचार के लिये भोपाल लाया गया था।

  • पंचायत चुनाव नहीं कराए तो आंदोलन करेगी कांग्रेस,कमलनाथ ने धमकाया

    पंचायत चुनाव नहीं कराए तो आंदोलन करेगी कांग्रेस,कमलनाथ ने धमकाया

    भोपाल,10 जनवरी(प्रेस इँफार्मेशन सेंटर)। मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने प्रदेश की शिवराज सिंह चौहान सरकार को चेतावनी देकर कहा है कि सरकार दो महीने के अंदर परिसीमन, रोटेशन और ओबीसी आरक्षण के साथ पंचायत चुनाव कराए, नहीं तो कांग्रेस आंदोलन करेगी।
    सोमवार को भोपाल में मीडियाकर्मियों से बातचीत में कमलनाथ ने बीजेपी को ओबीसी विरोधी बताया।

    उन्होंने कहा कि सरकार की ओबीसी और आरक्षण विरोधी नीति के कारण प्रदेश में सात साल से पंचायत चुनाव नहीं हो पा रहे हैं। कुछ महीने पहले शिवराज सरकार इसके लिए अध्यादेश लेकर आई थी। उन्होंने अध्यादेश को काला कानून बताते हुए कहा कि इसमें न रोटेशन का पालन किया गया, न परिसीमन का और न आरक्षण का। इसी वजह से चुनाव रद्द हो गए। अगर सरकार दो महीने के भीतर परिसीमन, रोटेशन और ओबीसी आरक्षण के साथ ग्राम पंचायत चुनाव नहीं कराएगी तो कांग्रेस पार्टी जिला से लेकर ग्राम पंचायत स्तर तक आंदोलन करेगी ।


    कमलनाथ ने कहा कि शिवराज सिंह चौहान 15 साल से मुख्यमंत्री हैं, लेकिन कभी ओबीसी को 27% आरक्षण देने का प्रस्ताव सदन में नहीं रखा। पिछले दो साल से ओबीसी स्कॉलरशिप का 1210 करोड़ रुपये बकाया है। छात्र परेशान हैं, लेकिन सरकार को कोई चिंता नहीं है।


    हाल में हुई ओलावृष्टि के सवाल पर उन्होंने कहा कि सरकार को तत्काल किसानों को मुआवजा देना चाहिए। इस बारे में मुख्यमंत्री शिवराज की घोषणा को धूठा बताते हुए कमलनाथ ने कहा कि किसानों को हुए नुकसान का आकलन अब तक शुरू नहीं हुआ। फसल बीमा की राशि के भुगतान में हुई देरी के लिए भी उन्होंने बीजेपी सरकार को जिम्मेदार ठहराया।

  • शिक्षा विभाग एमपी के हर जिले में चलाएगा विश्वस्तरीय स्कूल

    शिक्षा विभाग एमपी के हर जिले में चलाएगा विश्वस्तरीय स्कूल

    शिक्षा विभाग की बड़ी तैयारी, हर जिले में खुलेंगे नए स्कूल और होगी ग्लोबल ब्रांडिंग

    इस योजना को सभी विद्यालयों के लिए शिक्षा योजना का नाम दिया गया है

    भोपाल,8 दिसंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। मध्य प्रदेश स्कूल (MP School) शिक्षा मुक्त बोर्ड (School Education Open Board) ने सांस्कृतिक मूल्यों के साथ छात्रों को शिक्षित करेंगे। इसके लिए तैयारी पूरी कर ली गई है। राज्य में अंतरराष्ट्रीय मानकों (international standards) के साथ 52 स्कूल स्थापित करने के लिए मंगलवार को स्कूल शिक्षा विभाग (school education department) और महर्षि पतंजलि संस्कृत संस्थान के साथ एक समझौता ज्ञापन (MOU) पर हस्ताक्षर किए हैं। जिसके बाद संस्कृत पाठ्यक्रम (Sanskrit) का अनिवार्य हिस्सा होगा। प्रत्येक जिले में ऐसा एक स्कूल स्थापित किया जाएगा।

    ये स्कूल पारंपरिक सांस्कृतिक मूल्यों के साथ शिक्षा पर ध्यान देंगे। एमपी ओपन स्कूल एजुकेशन बोर्ड के निदेशक पीआर तिवारी ने कहा कि स्कूल परिसर का उपयोग स्कूल के समय के बाद व्यावसायिक प्रशिक्षण के लिए किया जाएगा। इस योजना को सभी विद्यालयों के लिए शिक्षा योजना का नाम दिया गया है। एमओयू दस्तावेज में कहा गया है कि अकादमिक गतिविधियों में समकालीन इतिहास पर लघु फिल्मों का निर्माण, स्क्रीनिंग और अध्ययन शामिल है।

    तिवारी ने कहा कि इन स्कूलों को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप अत्याधुनिक सुविधाओं से विकसित किया जाएगा। ये आवासीय विद्यालय लोअर किंडरगार्टन (LKG) से बारहवीं कक्षा तक के छात्रों को शिक्षा प्रदान करेंगे। उन्होंने कहा कि बुनियादी ढांचा ओपन बोर्ड द्वारा स्थापित किया जाएगा।

    इन स्कूलों की ग्लोबल ब्रांडिंग अमेरिका स्थित एजेंसी- नॉर्थवेस्ट एक्रिडिटेशन कमीशन (NWAC) की मदद से की जाएगी। 42 देशों में मान्यता प्राप्त एनडब्ल्यूएसी की मदद से छात्रों की मार्कशीट और सर्टिफिकेट जारी किए जाएंगे। शिक्षकों को सीखने और सिखाने के लिए एक टैबलेट के साथ एक मेमोरी और सिम कार्ड प्रदान किया जाएगा। सभी क्लासरूम स्मार्ट होंगे और शिक्षण में प्रोजेक्टर और प्रेजेंटेशन का व्यापक रूप से उपयोग किया जाएगा।

    छात्रों को व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया जाएगा। जिसके मॉड्यूल उद्यमिता विकास संस्थान द्वारा तैयार किए जाएंगे। स्कूल भवनों को हरित परिसरों के रूप में विकसित किया जाएगा। जहां छात्रों को जलवायु परिवर्तन और इसके प्रभावों के बारे में भी पढ़ाया जाएगा।

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    ईएफए (एजुकेशन फॉर ऑल)स्कूल योजना के तहत प्रदेश के जिला मुख्यालयों में स्थित 53 शासकीय विद्यालयों को विश्व-स्तरीय विद्यालय के रूप में कायाकल्प करने के उद्देश्य से लोक शिक्षण संचालनालय,मध्यप्रदेश राज्य ओपन बोर्ड और महर्षि पतंजलि संस्कृत संस्थान के बीच संयुक्त रूप से एमओयू साइन हुआ। – इन्दरसिंह परमार (@Inder_Singh_Parmar) 8 Dec 2021
  • एमपी में बन रहा गौशालाओं का नेटवर्क

    एमपी में बन रहा गौशालाओं का नेटवर्क

    भोपाल,(सुनीता दुबे).वर्तमान में मध्यप्रदेश देश का सर्वाधिक गौवंश और गौशालाओं वाला प्रदेश है। यहाँ गौवंश के विकास, गौ-पालन, गौ-संरक्षण, गौ-संवर्धन और गौ आधारित उत्पादों के संवर्धन के लिये सार्थक प्रयास किये जा रहे हैं। मुख्यमंत्री गौ-सेवा योजना और अशासकीय स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा संचालित 1768 गौ-शालाओं में ढाई लाख से ज्यादा गौ-वंश की देखभाल की जा रही है। शासन द्वारा प्रति गौवंश प्रति दिवस के मान से 20 रुपये का अनुदान दिया जाता है। मुख्यमंत्री गौ-सेवा योजना में अब तक पूर्ण 1141 गौ-शालाओं में 76 हजार 941 गौ-वंश का पालन किया जा रहा है। स्वयंसेवी संस्थाओं की पंजीकृत 627 गौ-शालाओं में भी करीब एक लाख 74 हजार गौ-वंश की देखभाल की जा रही है।

    विकसित होंगे गौवंश वन्य विहार

    गौ-वंश को जंगल से आहार और वन को गोबर से खाद मिलने की व्यवस्था प्राकृतिक है। गौपालन एवं पशुधन संवर्धन बोर्ड द्वारा जंगलों के पास गौ-वंश वन्य विहार विकसित किये जा रहे हैं। रीवा जिले के बसावन मामा क्षेत्र में 51 एकड़ क्षेत्र में गौ-वंश वन्य विहार विकसित किया गया है, जिसमें 4 हजार गौ-वंश हैं। जबलपुर जिले के गंगईवीर में 10 हजार और दमोह जिले में 4 हजार गौ-वंश की क्षमता वाला वन्य विहार विकसित किया जा रहा है। आगर-मालवा के सुसनेर में 400 एकड़ में कामधेनु अभयारण्य विकसित किया गया है, जिसमें वर्तमान में 3400 बेसहारा, वृद्ध और बीमार गायों की देखभाल की जा रही है। इसी माह सागर विश्वविद्यालय में कामधेनु पीठ की स्थापना भी की गई है।

    मध्यप्रदेश में गौ हत्या संज्ञेय अपराध

    मध्यप्रदेश में गौ हत्या संज्ञेय अपराध है। यहाँ आरोप सिद्ध होने पर सजा का प्रावधान है। मध्यप्रदेश में चार प्रजाति का देशी गौ-वंश पाया जाता है, जिनका दूध गिर गाय की तरह ही स्वर्णयुक्त एवं उच्च गुणवत्ता वाला है। देशी गाय के दूध में मानव स्वास्थ्य के लिये आवश्यक सभी पोषक तत्व पाये जाते हैं।

    प्रतिदिन 9.13 लाख किलो लीटर दूध का संकलन

    प्रदेश में लगभग सवा 7 हजार दुग्ध सहकारी समितियाँ कार्यरत हैं, जिनके माध्यम से पिछले वित्त वर्ष में प्रतिदिन औसतन 9 लाख 13 हजार किलो लीटर दुग्ध संकलन और औसत 6 लाख 38 हजार लीटर पैकेट दुग्ध विक्रय हुआ है। लॉकडाउन के दौरान दुग्ध संघों द्वारा 2 करोड़ 54 लाख लीटर दूध अतिरिक्त रूप से खरीदा गया। उल्लेखनीय यह भी है कि कोरोना लॉकडाउन के कारण जहाँ कई व्यवसाइयों को आर्थिक तंगी से गुजरना पड़ा, वहीं दुग्ध उत्पादक किसानों को 94 करोड़ रुपये राशि का अतिरिक्त भुगतान किया गया।

    आइसक्रीम, पनीर आदि संयंत्रों का निर्माण

    पिछले एक साल में इंदौर में 4 करोड़ रुपये की लागत से आइसक्रीम संयंत्र और खण्डवा में 25 हजार लीटर क्षमता के संयंत्र निर्माण का कार्य पूरा हुआ। जबलपुर में पौने 10 करोड़ रुपये की लागत से 10 मीट्रिक टन प्रतिदिन क्षमता के स्वचलित पनीर निर्माण संयंत्र की स्थापना का काम भी पूरा हो चुका है। सागर में भी एक लाख लीटर क्षमता के संयंत्र की स्थापना की गई।

    सौर ऊर्जा को बढ़ावा

    दुग्ध संयंत्रों को ऊर्जा में आत्म-निर्भर बनाने के लिये सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापना की कार्यवाही को प्रोत्साहित किया जा रहा है। प्रदेश के 5 संयंत्रों में 4 करोड़ 13 लाख रुपये की लागत से सौर ऊर्जा आधारित गर्म पानी के संयंत्रों की स्थापना की जा रही है।

     अतिरिक्त दूध का उपयोग मिल्क पावडर बनाने में

    दुग्ध संघों द्वारा वितरण से बचे हुए दूध का मिल्क पावडर बनाकर महिला-बाल विकास विभाग की “टेक होम राशन” योजना के लिये प्रदाय किया जाता है। आँगनवाड़ियों के लिये सुगंधित मीठा दुग्ध चूर्ण भी पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के माध्यम से प्रदाय किया जा रहा है।

    देश की दूसरी सीमन प्रयोगशाला भोपाल में

    केन्द्रीय वीर्य संस्थान द्वारा साढ़े 47 करोड़ रुपये की लागत से देश की दूसरी सेक्स सार्टेड सीमन प्रयोगशाला भोपाल में स्थापित की गई है। प्रयोगशाला में अब तक 21 हजार 580 सीमन का उत्पादन किया जा चुका है। सागर जिले के रतौना में राष्ट्रीय गोकुल मिशन में गोकुल ग्राम और कृत्रिम गर्भाधान प्रशिक्षण संस्थान की स्थापना की गई है। बुंदेलखण्ड क्षेत्र विकास योजना में दतिया जिले के नौनेर में आत्म-निर्भर मध्यप्रदेश के तहत प्रदेश का दूसरा वीर्य उत्पादन संस्थान स्थापित किया गया है। पिछले साल राष्ट्रीय कृषि विकास योजना में 1500 और गोकुल मिशन में 850 मैत्री को प्रशिक्षण दिया गया।

    स्वास्थ्य सुरक्षा के लिये टीकाकरण

    प्रदेश के सभी गौ-भैंस वंशीय पशुओं को नेशनल एनीमल डिजीज कंट्रोल प्रोग्राम में एफएमडी और ब्रूसेल्ला का टीका लगाया गया। समस्त पशुओं को यूआईडी टेग लगाकर इनाफ पोर्टल पर दर्ज किया जा रहा है। राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम में ढाई करोड़ से अधिक पशुओं का एफएमडी रोग के विरुद्ध टीकाकरण किया गया है। उद्देश्य वर्ष 2025 तक मुँहपका, खुरपका (एफएमडी) और ब्रूसेल्ला रोग पर नियंत्रण पाना और वर्ष 2030 तक इनका उन्मूलन करना है। दुधारु पशुओं के निरोगी होने से दूध, पशुधन और उत्पादों में वृद्धि होगी। परिणाम स्वरूप किसानों और पशुपालकों की आय में वृद्धि सुनिश्चित होगी। टीकाकरण का प्रथम चरण 31 जनवरी, 2021 को पूरा हो चुका है।

    राष्ट्रव्यापी कृत्रिम गर्भाधान कार्यक्रम

    कार्यक्रम के प्रथम चरण में 7 लाख 65 हजार गौ-भैंस वंशीय पशुओं का कृत्रिम गर्भाधान, 5 लाख 91 हजार गर्भधारण परीक्षण और एक लाख 62 हजार वत्सोत्पादन किया गया। द्वितीय चरण में 19 लाख 15 हजार गौ-भैंस वंशीय पशुओं का कृत्रिम गर्भाधान, 9 लाख 29 हजार का गर्भधारण परीक्षण और 38 हजार 365 वत्सोत्पादन हुआ। तीसरा चरण एक अगस्त, 2021 से प्रारंभ होकर 31 मई, 2022 तक चलेगा। इसमें अब तक डेढ़ लाख कृत्रिम गर्भाधान और 3 हजार से अधिक गर्भ परीक्षण किये जा चुके हैं। इनकी प्रविष्टि भी इनाफ पोर्टल पर की जा रही है।

    बकरी दूध विक्रय आरंभ

    जनजातीय गौरव दिवस 15 नवम्बर से प्रदेश में ग्राहकों को बकरी का दूध भी मिलना आरंभ हो गया है। बकरी दूध विक्रय की शुरूआत जनजातीय बहुल जिलों सिवनी, बालाघाट और धार, झाबुआ और बड़वानी जिलों में उत्पादित 50 से 70 रूपये प्रतिकिलो की दर से खरीदे गये दूध से की गई है। उच्च गुणवत्ता वाला पौष्टिक बकरी का दूध फिलहाल जबलपुर और इंदौर संघ के पार्लर पर उपलब्ध है।

  • जन संतोष हमारा दायित्वःविवेक जौहरी

    जन संतोष हमारा दायित्वःविवेक जौहरी

    महिला अपराध अनुसंधान कौशल उन्‍नयन विकास प्रशिक्षण कार्यक्रम सम्‍पन्‍न

    भोपाल, 23 सिंतबर (प्रेस इंफार्मेशन सेंटर). पुलिस मुख्‍यालय में दो दिवसीय महिला अपराध अनुसंधान कौशल विकास प्रशिक्षण कार्यक्रम का समापन पुलिस महानिदेशक विवेक जौहरी के मुख्‍य आतिथ्‍य तथा जिला एवं सत्र न्‍यायाधीश सुश्री गिरीबाला सिंह के विशेष आतिथ्‍य में संपन्‍न हुआ।

          डीजीपी श्री जौहरी ने प्रशिक्षुओं को संबोधित करते हुए कहा कि महिला अपराध की विवेचना तथा की जाने वाली कार्यवाहियों में संवेदनशीलता अत्‍यावश्‍यक है। पीडि़त के साथ सहानुभूति पूर्ण सद्व्‍यवहार करें। कानून की जानकारी अद्यतन (अपडेट) रखें। सर्वोच्‍च न्‍यायालय, उच्‍च न्‍यायालय के नवीन निर्णयों का अध्‍ययन करें। पीडि़ता को शासन द्वारा उपलब्‍ध कराई जा रही सहायता और सुविधाओं से सुविज्ञ रहें। प्रशिक्षण लगातार चलने वाली प्रक्रिया है। जनअपेक्षाओं पर खरा उतरना हमारा दायित्‍व है, आदर्श पुलिसिंग करने का प्रयास करें।

          जिला एवं सत्र न्‍यायाधीश सुश्री गिरीबाला सिंह ने कहा कि न्‍याय होने के साथ-साथ होता हुआ दिखना भी चाहिए। विवेचना में निष्‍पक्षता एवं तथ्‍यात्‍मक दृष्टिकोण होना चाहिए। पीडि़त पक्ष की शिकायत दर्ज करते समय पूर्वागृहों से पूर्णत: मुक्‍त रहें। पीडि़त की आस्‍था और विश्‍वास का केन्‍द्र आप ही होते हैं अत: अपने उत्‍तरदायित्‍व से पूरा न्‍याय करें। अनुसंधान में तथ्‍यों की स्‍पष्‍टता पर पूरा ध्‍यान दें। अपने काम का खुद ऑडिट करें तभी सकारात्‍मक परिवर्तन ला सकेंगें।

          अतिरिक्‍त पुलिस महानिदेशक (महिला अपराध) श्रीमती प्रज्ञा ऋचा श्रीवास्‍तव ने बताया कि विगत दो वर्षों से पहला ऑफलाईन प्रशिक्षण कार्यक्रम रहा। जिसमें अच्‍छी सहभागिता रही है। प्रशिक्षण कार्यक्रम का फीडबेक उप पुलिस अधीक्षक आशुतोष पटेल तथा निरीक्षक सुश्री ज्‍योति सिंह ने दिया। प्रशिक्षुओं में उत्‍कृष्‍ट प्रदर्शन करने वाले प्रतिभागियों में निरीक्षक सुश्री प्रियंका पाठक, उप पुलिस अधीक्षक संदीप मालवीय, सुश्री यशस्‍वी शिंदे, सुश्री कीर्ति बघेल तथा अनिल कुमार को अतिथियों द्वारा प्रशस्ति पत्र प्रदान किए गए।

  • प्रदेश को समृद्ध बनाएगा रोडमैपःडॉ.मनमोहन सिंह

    प्रदेश को समृद्ध बनाएगा रोडमैपःडॉ.मनमोहन सिंह

    भोपाल, 17 दिसंबर(प्रेस सूचना केन्द्र)।भारत के पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने आज यहाँ मध्यप्रदेश सरकार द्वारा तैयार ‘विजन टू डिलीवरी रोड मैप 2020-25’ दस्तावेज का विमोचन करते हुए इसे मध्यप्रदेश की जनता की आकांक्षाओं और प्राथमिकताओं का दस्तावेज बताया।  उन्होंने  प्रदेश की त्वरित आर्थिक समृद्धि और विकास के लक्ष्यों को पूरा करने में विचारों की स्पष्टता और प्रतिबद्धता के लिए मुख्यमंत्री कमल नाथ की प्रशंसा की। डॉ. सिंह ने लोगों के आर्थिक विकास और समृद्धि लाने के लिए एक साल के कम समय में उठाए गए कदमों के लिए बधाई दी। मुख्य रूप से उद्योग के साथ मिलकर रोजगार के नये अवसरों का निर्माण करने की सराहना की।

    डॉ. मनमोहन सिंह ने रोडमैप को सूक्ष्म और वृहद  स्तर  पर अर्थ-व्यवस्था  को  आगे बढ़ाकर रोजगार उत्पन्न करने के प्रयासों पर फोकस करने की सराहना की। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र और सतत विकास के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए न सिर्फ  सुस्पष्ट दृष्टि-पत्र  बनाया गया है बल्कि इसको  लागू करने के लिए एक रोडमैप भी तैयार किया गया है। इसमें सभी विभागों का सहयोग  है।

    डॉ. सिंह ने कहा कि यह दृष्टि-पत्र आम नागरिकों, किसानों के कल्याण,  सतत विकास और सूक्ष्म स्तर पर अर्थ-व्यवस्था को मजबूत बनाने,  असंगठित क्षेत्र को गति देने,  अधोसंरचना का विकास करने जैसे विषयों पर केंद्रित है। उन्होंने एक साल में सरकार द्वारा उठाए गए कदमों की चर्चा करते हुए किसानों की जय किसान फसल ऋण माफी  योजना और असंगठित क्षेत्र के लिये नया सवेरा योजना, आयुष्मान भारत जैसी योजना का उल्लेख करते हुए  कहा कि इन  प्रयासों  में मुख्यमंत्री श्री कमल नाथ के विचारों और  विकास का संकल्प स्पष्ट दिखता है।

    डॉ. मनमोहन सिंह ने कहा कि दृष्टि-पत्र में 11 क्षेत्रों पर ध्यान केन्द्रित किया गया है। आर्थिक समृद्धि के लिए कृषि प्र-संस्करण उद्योग, अधोसंरचना विकास और सेवा क्षेत्र पर ध्यान देने से भविष्य में ज्यादा से ज्यादा संख्या में रोजगार निर्माण करने में मदद मिलेगी।

    पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. सिंह ने कहा कि स्कूल शिक्षा, उच्च शिक्षा, कौशल विकास और तकनीकी शिक्षा पर ध्यान केन्द्रित करने से गुणवत्तापूर्ण  मानव संसाधन तैयार करने की सरकार की सोच साफ़ दिखती है। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में मेडिकल कॉलेजों की संख्या और सीटें बढ़ाने तथा स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार करने से भविष्य में प्रदेश में स्वास्थ्य पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। उन्होंने कहा कि मैग्नीफिसेंट मध्यप्रदेश जैसे आयोजन से उद्योग क्षेत्र में घरेलू और विदेशी पूंजी निवेश बढ़ाने में मदद मिलेगी। डू-इट योरसेल्फ गवर्नेंस व्यवस्था को दूसरे चरण में ले जाने से प्रशासन में भी पारदर्शिता बढ़ेगी। पंचायत राज संस्थाओं और स्थानीय संस्थाओं के संसाधनों और क्षमता को मजबूत बनाने पर ध्यान देने से प्रशासन तंत्र मजबूत होगा और  दृष्टि पत्र को समय पर पूरा करने में मदद मिलेगी। डॉ. मनमोहन सिंह ने विजन टू डिलीवरी 2020-25 को सुगठित,  फोकस्ड और यथार्थवादी बताते हुए कहा कि यह लोगों की आकांक्षाओं का दस्तावेज है।

    मुख्यमंत्री श्री कमल नाथ ने पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह का स्वागत एवं आभार व्यक्त करते हुए कहा कि मुझे 10 साल तक डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में केन्द्रीय मंत्री-मंडल में काम करने का सौभाग्य मिला। मुख्यमंत्री ने कहा कि हमने दढ़ इच्छाशक्ति के साथ 365 दिन में वचन पत्र के 365 बिन्दुओं को पूरा किया।

    मुख्य सचिव एस.आर. मोहंती ने सरकार का एक साल पूरा होने पर उठाए गए कल्याणकारी कदमों और निर्णयों का उल्लेख करते हुए लोगों के विकास के लिए तैयार किए गए विजन टू डिलीवरी 2020-25 की विशेषताओं की चर्चा की। अपर मुख्य सचिव योजना मोहम्मद सुलेमान ने आभार व्यक्त किया।

  • एक करोड़ उपभोक्ताओं को मिली सस्ती बिजली बोले प्रियव्रत सिंह

    एक करोड़ उपभोक्ताओं को मिली सस्ती बिजली बोले प्रियव्रत सिंह

    भोपाल,9 दिसंबर(प्रेस सूचना केन्द्र)। ऊर्जा मंत्री प्रियव्रत सिंह ने दावा किया है मध्यप्रदेश सरकार ने अपने चुनावी वादे को पूरा करते हुए एक करोड़ बिजली उपभोक्ताओं को इंदिरा ज्योति योजना में सस्ती बिजली उपलब्ध कराई है। केवल सत्रह लाख उपभोक्ता इस सुविधा के दायरे में नहीं आए हैं। हितग्राही उपभोक्ताओं को अब तीस दिनों की बिजली खपत डेढ़ सौ यूनिट से कम होने पर सौ यूनिट का बिल मात्र सौ रुपए लिया जा रहा है।

    प्रेस वार्ता में श्री सिंह ने बताया कि उपभोक्ताओं को लाभ देने के लिए राज्य सरकार 3400 करोड़ रुपए की सब्सिडी दे रही है। इससे 90 फीसदी उपभोक्ता लाभान्वित हो रहे हैं। उन्होंने बताया कि जब नई सरकार सत्ता में आई तब बिजली कंपनियों पर 37963 करोड़ रुपए का कर्ज था और लगभग 44975 करोड़ का संचयी घाटा था।

    उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के उस बयान को गैर लोकतांत्रिक बताया जिसमें उन्होंने उपभोक्ताओं से अधिक बिजली बिल का भुगतान न करने का आव्हान किया है। उन्होंने कहा कि इस तरह के भड़काऊ बयानों से अराजकता फैल जाएगी जिसे नियंत्रण करने के लिए राज्य को अपने बहुमूल्य संसाधन खर्च करने होंगे।

    जुलाई महीने से लेकर अब तक ऊर्जा विभाग में कितने तबादले किए गए और इन तबादलों से विभाग को क्या लाभ हुआ पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि ये तबादले पांच साल की समयसीमा पूरी होने पर किए गए हैं। उन्होंने कहा कि तबादलों की निश्चित संख्या तो बता पाना फिलहाल संभव नहीं है लेकिन ये तबादले जरूरत के अनुसार ही किए गए हैं।

    नवंबर के महीने तक मीटर बदलने की समय सीमा बढ़ाए जाने की बात स्वीकार करते हुए श्री सिंह ने कहा कि ये समय सीमा मार्च 2020 तक तय की गई है।