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  • भाजपा के प्रदेश कार्यालय में सजा  मंत्रियों का जनता दरबार

    भाजपा के प्रदेश कार्यालय में सजा मंत्रियों का जनता दरबार


    मध्य प्रदेश में, भाजपा ने निर्णय लिया है कि अब राज्य के मंत्रियों को हफ्ते में पांच दिन दोपहर 1 से 3 बजे तक पार्टी (प्रदेश) कार्यालय में बैठना होगा, ताकि कार्यकर्ता और आम लोग सीधे उनसे अपनी समस्याएँ या सुझाव रख सकें। इस व्यवस्था के तहत सोमवार से शुक्रवार हर दिन दो-दो मंत्री लगाए जाएँगे। शनिवार–रविवार इस सूची में नहीं होंगे। इस पहल की शुरुआत राज्य के उपमुख्यमंत्री और अन्य राज्य मंत्रियों से की गई है।
    राजस्थान के भाजपा कार्यालय में “वर्कर हियरिंग” (कार्यकर्ता सुनवाई) का ये मॉडल लागू किया गया है, जहाँ मंत्री प्रति हफ्ते तय दिन कार्यालय में बैठेंगे।इस व्यवस्था से जमीनी स्तर पर कार्य करने वाला कार्यकर्ता सीधे सरकार के शीर्ष व्यक्ति से सीधे संवाद कर पाएगा।ये कामकाजी व्यवस्था कार्यकर्ताओं व आम लोगों को सीधे अपने प्रतिनिधियों (मंत्रियों) तक पहुँचने का अवसर देती है। इससे संगठन और सरकार में “नीचे से ऊपर” (bottom-up) संवाद की संभावना बढ़ती है।
    सरकारी ढांचे के कार्य करने का जो माडल आजादी के बाद से बना हुआ था उसमें भाजपा की सरकारों ने मुख्यमंत्री से सीधे मुलाकात का माडल विकसित किया था। इसके पहले की कांग्रेसी सरकारों के मंत्री अपने बंगलों पर जनता से मुलाकात करते रहे हैं। वहां मंत्री के स्टाफ का एक काकस स्थापित हो जाता था और तबादलों, पोस्टिंग के अलावा कई अन्य जन शिकायतों का निवारण किया जाता था।इस व्यवस्था में अक्सर शिकायतकर्ता (worker / आम नागरिक) को लम्बा इंतजार करना पड़ता था, या मंत्री तक पहुँचने में दिक्कत होती थी। अब तय समय होने से, मुद्दों को सुनने व समाधान का असली मौका मिलेगा।इससे प्रशासन में जवाबदेही (accountability) और प्रतिसाद (responsiveness) की छवि मजबूत हो सकती है। पार्टी कार्यकर्ता महसूस कर सकते हैं कि “उनकी आवाज सुनी जाती है” — इससे संगठन में भरोसा और जुड़ाव (motivation) बनेगा। विशेष रूप से, ऐसे कार्यकर्ताओं जिन्हें पहले अनदेखा महसूस होता था, वे अब सक्रिय और जागरूक महसूस करेंगे।
    सीधे जनता से संवाद होने से क्षेत्र की विशिष्ट समस्याएं, लोक-विकास की मांगें, समझौतों की जरूरत आदि सामने आएँगी।इससे सरकार को नीतिगत फैसलों में grassroots का इनपुट मिलेगा, जो विकास व प्रशासन में सुधार ला सकता है। भक्त या समर्थक नहीं बस, आम नागरिक या कार्यकर्ता भी अपनी बात रख सकते हैं — इससे राजनीतिक जीवन थोड़ा “लोक-केंद्रित” बनेगा।
    केवल दो घंटे प्रतिदिन और सिर्फ दो मंत्री से बहुत सारे कार्यकर्ता या आम लोग अपनी बातें पूरी तरह नहीं रख पाएँगे। केवल सुनना पर्याप्त नहीं है; समस्या हल करना अलग है। संसाधन, अधिकार, बजट, प्रशासनिक बाधाएं आदि हो सकते हैं।यदि केवल पार्टी कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता दी गई आम नागरिकों या निवासियों को नहीं तो लोकतंत्र से समाधान के मूल लक्ष्य को हासिल नहीं किया जा सकेगा। वे ही लोग आगे आएंगे जिनके पास पहुंच होगी; इससे “नज़रअंदाज़” वर्ग फिर पीछे रह सकते हैं।
    जब मंत्री नियमित रूप से संगठन कार्यालय में बैठेंगे, तो सरकार तथा पार्टी की भूमिका और दायित्व में कई भ्रम भी फैल सकते हैं। कार्यकर्ता-मुद्दों पर सरकारी फैसले लेंगे या सिर्फ उनके प्रश्नों का जवाब देकर अपना ज्ञान पेलेंगे। यह कदम संभवतः 2027 के लिए तैयारियों की दिशा में है पार्टी संगठन को मजबूत करना, grassroots कार्यकर्ताओं को जोड़ना, सुनने की संस्कृति बनाना। यह जनता (या कार्यकर्ता) के दृष्टिकोण से भाजपा की “खुली” और “जवाबदेह” छवि पेश करता है, जिससे विपक्षी आलोचना कम हो सकती है।
    क्षेत्रीय और स्थानीय स्तर पर पार्टी की पकड़ मजबूत होगी जिससे मतदाताओं से जुड़ाव आसान होगा। लेकिन अगर यह सिर्फ एक दिखावा (symbolic gesture) बना रह गया , जहाँ सुनने का समय है, लेकिन समाधान नहीं — तो आलोचना और असंतोष भी बढ़ सकता है।ये कहा जा सकता है कि यह व्यवस्था सही दिशा में एक सकारात्मक पहल है, बशर्ते इसे सिर्फ “प्रोटोकॉल” न समझा जाए, बल्कि “सशक्त लोकतांत्रिक संवाद” के रूप में सक्रिय रूप से लागू किया जाए। अगर मंत्रियों ने वास्तव में जनता व कार्यकर्ताओं की सुनवाई की, उनकी समस्याओं पर संवेदनशीलता दिखायी, और त्वरित समाधान व असर दिखाया तो इससे पार्टी-सरकार दोनों को ही लाभ होगा। लेकिन सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि यह व्यवस्था कितनी नियमित, पारदर्शी, निष्पक्ष और जवाबदेह साबित होती है।

  • परिवहन माफिया को कुचलते मुख्यमंत्री डाक्टर मोहन यादव

    परिवहन माफिया को कुचलते मुख्यमंत्री डाक्टर मोहन यादव

         भोपाल,07 जनवरी (प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव की कार्यशैली जनता को चौंका रही है। जिस तरह पिछले बीस सालों से मध्यप्रदेश के लोग शिवराज सिंह चौहान की जी हुजूरी वाली सरकार देखने के आदी हो चले थे उन्हें अब नई सरकार का कामकाज चौंका रहा है।छह जनवरी से मुख्यमंत्री जो जनता दरबार की परंपरा शुरु करने जा रहे हैं उसके लिए प्रशासन ने व्यापक व्यवस्थाएं की है। इस जनता दरबार से दलालों को दूर रखा जाएगा जो मूलभूत समस्याएं लेकर पहुंचने वालों को बदनाम करके हतोत्साहित करने का प्रयास करते हैं।  
    
          राजनीति के गलियारों के सूत्र बताते हैं कि  सौरभ शर्मा पिछले कुछ महीनों से मुख्यमंत्री कार्यालय के चक्कर काट रहा था। उसे परिवहन विभाग के अफसरों ेने बताया था कि सरकार परिवहन चौकियों को बंद करने जा रही है। तबसे सौरभ ने मुख्यमंत्री को एकमुश्त चुनावी चंदा पहुंचाने का प्रस्ताव भेजा था। उसके कुछ परिचितों ने उसे मुख्यमंत्री कार्यालय के जिम्मेदार अफसरों से भी मिलवाया था। उन अफसरों को साफ निर्देश थे कि परिवहन माफिया की कोई भी पेशकश पर गौर न किया जाए। परिवहन नाकों पर जनता की लूट खसोट रोकने के लिए भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व की मंशा भ्रष्टाचार रोकने की है इसलिए चौकियां हटाई जाएं।
     
          इससे बरसों से परिवहन चौकियों को कमाई का अड्डा बनाने वाले नेता, और माफिया के गुर्गों ने मिलकर काफी चंदा जुटाकर मुख्यमंत्री के निजी फंड में चंदा देने की तैयारी की थी। मुख्यमंत्री कार्यालय के अधिकारियो ने जानकारी मिलने के बाद लोकायुक्त पुलिस को छापामार कार्रवाई को कह दिया। सौरभ शर्मा और इसके आकाओं को अंदेशा था कि मुख्यमंत्री चंदा लेने का प्रस्ताव नामंजूर कर सकते  हैं. इसके बावजूद उन्होंने सोना,चांदी और नकदी गाड़ी में भरकर रवाना कर दी। जब लोकायुक्त पुलिस छापा मार रही थी तब भी सौरभ शर्मा के गुर्गे मुख्यमंत्री सचिवालय के अफसरों को कह रहे थे कि लोकायुक्त ने छापा भले ही मार दिया है पर आप आदेश करें तो ये गाड़ी सीधे मुख्यमंत्री के बंगले पर पहुंच जाएगी। 
    
         सूत्र बताते हैं कि लोकायुक्त का जो व्यक्ति इस छापे सं संबंधित प्रक्रिया का संवाद सूत्र था उसने डीजी जयदीप प्रसाद तक वही जानकारियां पहुंचने दीं िजससे नियंत्रित धनराशि ही पकड़ी जा सके। इसी सूत्र ने गाड़ी को घर से रवाना करके सुनसान इलाके में खडी़ करने वाली योजना बनाई ताकि किसी को मालूम न पड़े और मुख्यमंत्री कार्यालय को चंदा पहुंचाकर परिवहन नाकों की पुरानी परंपरा जारी रखी जा सके। 
    
           बताते हैं कि सरकार ने प्रदेश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए परिवहन नाकों से चली आ रही पुरानी चोरी की परंपरा को बंद करने को बड़े उपाय के रूप में अपनाया है। परिवहन नाकों से चंदा वसूली की ये प्रक्रिया कांग्रेस के शासनकाल से चलती आ रही है। इस प्रक्रिया में जुटाई गई धनराशि चंदे के रूप में कथित तौर पर मुख्यमंत्री के फंड, अफसरों और नेताओं पत्रकारों तक भी पहुंचाई जाती थी।
     
         परिवहन माफिया के चंदे पर पलने वाले पत्रकारों की जो  सूची पिछले दिनों जारी हुई थी  उसके बाद सरकार ने जब जांच कराई तो पता चला कि ये करतूत भी परिवहन माफिया की ही है। एक तरह से यह गिरोह सरकार को धमकाने का प्रयास कर रहा था कि अभी तो पत्रकारों की असलियत खोली गई है।यदि सरकार ने चंदा वसूली की परिपाटी नहीं रोकी तो सरकार के भी कुछ नेताओं की कलई खोली जा सकती है। 
    
     पूर्व परिवहन मंत्री भूपेन्द्र सिंह और गोविंद राजपूत दोनों इस सूची के उजागर हो जाने के बाद असहज हो गए थे। दोनों के बीच पिछले दिनों जिस तरह के आरोप प्रत्यारोप सामने आए उनके पीछे परिवहन नाकों के काले धंधे की कहानियां भी शामिल थीं।  जानकारों का कहना है कि पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और केपी सिंह कक्काजू का अनुमान था कि पत्रकारों की सूची सामने आ जाने से मुख्यंमंत्री मोहन यादव डरेंगे और परिवहन नाकों पर अपनी नीति बदलने की प्रक्रिया रोक देंगे. 
    
          सरकार ने जबसे परिवहन नाकों की प्रक्रिया को रोककर जांच की परिपाटी शुरु की है तबसे माफिया का प्रयास है कि किसी तरह सरकार के इस तंत्र को बदनाम किया जाए ताकि अभी भी परिवहन विभाग अपने पुराने ढर्रे पर लौट आए। सूत्र बताते हैं कि इसके बाद भी मुख्यमंत्री ने अपने स्टाफ को साफ कह दिया है कि सरकार को जो भी कीमत चुकानी पड़े नाकों से टैक्स चोरी की परंपरा दुबारा चालू नहीं की जाएगी। 
          परिवहन माफिया ने सरकार को चंदा देने के लिए बड़ी रकम को सोने और चांदी में बदलवाया था। ये सारी प्रक्रिया पूर्ववर्ती नेताओं के अनुभवों के आधार पर पूरी की गई थी। इसके बावजूद सरकार ने ट्रांसपोर्ट से होने वाली आय माफिया और दलालों के हाथों में पहुंचने से रोकने की इच्छा शक्ति को नहीं डिगने दिया। इस प्रलोभन के जाल में न फंसकर सरकार ने एक तरह से अपना दामन साफ रखने में कामयाबी पाई है। यदि मुख्यमंत्री सचिवालय इस चंदे को स्वीकार कर लेता और सोचता कि ये राशि मुख्यमंत्री महोदय के हाथों से बंटवाकर वाहवाही बटोरी जाएगी तो वो परिवहन माफिया की ब्लैकमेलिंग का शिकार हो जाता।
    
          युवा आईएएस और मुख्यमंत्री के कामकाज को संभालने वाले भरत यादव वैसे भी सख्त प्रशासक माने जाते रहे हैं। उन्होंने परिवहन माफिया के संदेशों और दलालों के प्रस्तावों की पूरी जानकारी मुख्यमंत्री तक पहुंचाई ताकि किसी भी प्रकार की गलतफहमी न पनप सके। दलालों के गिरोह पर अंकुश लगाने के लिए मुख्यमंत्री डाक्टर मोहन यादव ने सभी विभागों के आला अधिकारियों को निर्देश दिया है कि अब तक चली आ रहीं पुरानी परिपाटियों को बदला जाए। प्रदेश को आत्मनिर्भर बनाकर विकास कार्यों में गति लाई जाए और रोजगार के अवसर बढ़ाए जाएं। इसी का नतीजा है कि परिवहन माफिया के बड़े घोटाले पर अंकुश लगाया जा सका है।
     
         हालांकि राजनीति के कई बड़े खिलाड़ी अब कह रहे हैं कि चंदे की रकम रोककर मुख्यमंत्री एक नए जाल में फंसने जा रहे हैं। इस तरह राजनीति करके वे घनघोर अलोकप्रियता को आमंत्रित कर रहे हैं। ये माफिया बहुत ताकतवर है और सरकार को कई मोर्चों पर बदनाम कर देगा। इसके बावजूद सरकार ने अपनी नीति में कोई बदलाव नहीं किया है। 
    
          पुलिस महानिदेशक कैलाश मकवाना ने तो पत्रकारों के वेश में आने वाले दलालों को जन सुनवाई से बाहर रखने के निर्देश दिए हैं। जाहिर है कि मोहन सरकार पहली बार सत्ता के दलालों पर रोक लगाती नजर आ रही है. नए साल में सरकार की ये पहल सराहनीय कही जा रही है।