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  • सबके विकास के दौर में बार बार कुचली जाएगी धर्मांधता

    सबके विकास के दौर में बार बार कुचली जाएगी धर्मांधता


    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का हिंदुस्तान सबके विकास का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ता जा रहा है। इसके लिए सबको समान अवसर उपलब्ध कराए जा रहे हैं। विकास योजनाओं का लाभ भी सबको समान रूप से दिया जा रहा है। इसके बावजूद चंद कट्टरपंथी ताकतें अपना धर्म सबसे अव्वल वाली विचारधारा की ध्वज वाहक बनी हुई हैं। ये ताकतें न केवल मुस्लिम बल्कि सभी धर्मों में मौजूद हैं। दरअसल धर्म की आस्थावान सोच को लोग वैज्ञानिक आधार पर नहीं बल्कि पाखंडों के आधार पर विकसित करने का प्रयास करते हैं इसलिए उन्हें झूठे मुद्दों पर भीड़ जुटानी पड़ती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने जिस एकात्मकता को अपनी कार्यशैली बनाया है उसके बीच किसी भी कट्टरता को स्थान मिलना संभव नहीं है। फूट डालो राज करो वाली अंग्रेज परस्त कांग्रेस की राजनीति इसके सामने विदा होती चली जा रही है। पहलगाम आतंकी हमले के बाद जिस तरह आपरेशन सिंदूर के अंतर्गत पाकिस्तान की कुटाई की गई उसे देखकर इन कट्टरपंथी ताकतों को समझ लेना चाहिए कि उनकी वैमनस्य भरी राजनीति का अंत अब निकट आ गया है।


    सदियों से युद्ध वास्तव में किसी भी समाज की गंदगी साफ करने का प्रमुख अस्त्र साबित होता रहा है।इससे जहां लोगों में सामाजिक उद्देश्यों के प्रति जागरूकता बढ़ती है वहीं एकात्मकता का भाव भी विकसित होता है।कट्टरपंथी इस्लाम वादियों ने कथित भाईचारे के नाम पर एकात्मकता विकसित करने का फार्मूला अपना रखा है। ये भाईचारा मुस्लिम मुस्लिम भाई भाई तो कहता है लेकिन गैर मुस्लिम को काफिर कहकर लूटने और काटने की सलाह भी देता है। औपनिवेशिक दौर में भले ही ये चलता रहा हो। इसे सामाजिक स्वीकार्यता मिलती रही हो लेकिन पूंजीवाद के इस दौर में इस विकास विरोधी विचार के लिए कोई जगह नहीं है। जो लोग पूंजीवाद को कोसते फिरते हैं उन्हें भी अंततः पूंजीवाद की ठकुर सुहाती ही करनी पड़ती है।

    दरअसल पूंजीवाद और शोषणवाद दो अलग अलग विचार हैं। पूंजीवाद कहीं नहीं कहता कि श्रमिकों का शोषण किया जाए। ये तो वही अक्षम लोग हैं जो पूंजी पाकर शोषण पर उतारू हो जाते हैं।कई बार ऐसे लोगों का इलाज कानून से नहीं अपराध से ही करना पड़ता है। अमेरिका का पूंजीवादी समाज अपराध की वाशिंग मशीन में ही डालकर झकास साफ निखार पाता है। इसलिए दक्षिण एशिया में धर्म की ध्वजा थामने वालों को भी जान लेना होगा धर्म की आड़ में शोषणवादी ताकतों को संरक्षण देने की उनकी प्रवृत्ति अंततः कुचल ही दी जाएगी। चाहे पाकिस्तान हो या फिर हिंदुस्तान कहीं भी आतंक के अड्डों को स्वीकार नहीं किया जा सकता। जो लोग सोचते हैं कि इस्लामिक आतंकवाद से निपटने के लिए हमें हिंदू आतंकवाद को खड़ा करना होगा वे निहायत ही नादानी की बात करते हैं। आतंकवाद हमेशा ही विकास विरोधी होता है फिर वह किसी भी धर्म की आड़ लेकर क्यों न खड़ा किया जा रहा हो। पाकिस्तान के जो शासक ये बोलते हैं कि हम भी आतंकवाद का शिकार रहे हैं ये बोलकर वे दरअसल खुद की अक्षमता का ही उद्घोष कर रहे हैं। देश में नरेन्द्र मोदी हों या फिर उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ इन्होंने कहीं भी धर्म के नाम पर गुंडागर्दी को बढ़ावा नहीं दिया है। यही तो वह सकारात्मक विचार है जो देश को पांच ट्रिलियन डालर की अर्थव्यवस्था के लक्ष्य से आगे लेकर बढ़ता जा रहा है। पाकिस्तान के शासक क्या सोचते हैं ये उनकी समस्या है लेकिन उनकी समस्या यदि भारत को परेशान करेगी तो भारत की मजबूरी होगी कि वह सीमापार जाकर उन फोडों का इलाज करे। इसे यदि पाकिस्तान खुद पर हमला बताता है तो इस पर यकीन करना उसकी आवाम और वहां के शासकों की मूर्खता भरी सोच ही कही जाएगी।चीन जैसे देशों को भी समझना होगा कि वह भारत के प्रति वैमनस्यता रखकर यदि पाकिस्तान के आतंकवाद के साथ खड़ा होता है तो वह खुद के लिए एक नई कब्र खोद रहा है।

    तीन दिन के युद्ध में आपरेशन सिंदूर ने ये बता दिया है कि भारत, पाकिस्तान, बंग्लादेश और बंगाल के मुसलमानों को भी साफ समझ लें कि वे कट्टरपंथी ताकतों के भ्रमजाल में न उलझें। मोदी सरकार की नीति उनके विरुद्ध नहीं है। उन्हें उनकी धार्मिक सोच के साथ जीने की पूरी आजादी है। वे अपना जीवन संवारें इससे किसी को आपत्ति नहीं है। इसके विपरीत यदि वे चाहते हैं कि हम आतंकवाद के सहारे धर्मांतरण करेंगे और गजवा ए हिंद के मूर्खता पूर्ण सोच को लागू करने की कवायद में लगे रहेंगे तो फिर उनकी ये जिद अवश्य ही कुचली जाएगी। भारत के हिंदु हों या यहां के मुसलमान उन्हें कट्टरता की पट्टी पढ़ाकर उनका जीवन नहीं संवारा जा सकता। हां विकास की राह प्रशस्त करके जरूर उनका जीवन सुखमय बनाया जा सकता है। फिर वे चाहे तो हिंदु बनकर रहें या मुस्लिम बनकर किसी को क्या फर्क पड़ता है।

  • अग्निवीरों को चिंतामुक्त करने के उपाय करेगी सेना

    अग्निवीरों को चिंतामुक्त करने के उपाय करेगी सेना


    नई दिल्ली,13 जुलाई(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय सेना वर्तमान में सशस्त्र बलों के लिए अग्निपथ भर्ती कार्यक्रम का आंतरिक मूल्यांकन कर रही है और कुछ समायोजन का सुझाव दे सकती है ।
    केंद्र सरकार ने 2022 में इस महत्वाकांक्षी योजना को शुरु किया था। लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस ने इस योजना पर सवाल उठाए थे इसके बाद सेना ने आंतरिक मूल्यांकन करके योजना में और भी नए सुधार शामिल करने की तैयारी की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस समीक्षा का उद्देश्य आने वाली सरकार को कार्यक्रम में संभावित संशोधन करने में सहायता प्रदान करना है।


    इंडियन एक्सप्रेस ने जिन अधिकारियों के हवाले से ये खबर जारी की है उसमें बताया गया है कि , सेना का सर्वेक्षण अग्निवीरों सहित विभिन्न हितधारकों से फीडबैक एकत्र कर रहा है, साथ ही विभिन्न रेजिमेंटल केंद्रों में भर्ती और प्रशिक्षण कर्मियों, तथा अग्निवीरों की देखरेख करने वाले यूनिट और सब-यूनिट कमांडरों से भी फीडबैक एकत्र कर रहा है।रिपोर्ट में बताया गया है कि सेना ने संबंधित पक्षों को 10 सवालों वाली प्रश्नावली भेजी थी। मई माह तक उसने प्राप्त फीडबैक के आधार पर नए सुधार लागू करके योजना को कारगर बनाया है।


    फीडबैक में योजना के शुरू होने से पहले भर्ती किए गए सैनिकों के साथ अग्निवीरों के तुलनात्मक प्रदर्शन का विश्लेषण, साथ ही उनके सकारात्मक और नकारात्मक गुणों पर टिप्पणियां शामिल होंगी।
    इस फीडबैक के आधार पर, सेना योजना में संभावित समायोजन का प्रस्ताव करेगी। इसके अतिरिक्त, अग्निवीरों से रक्षा सेवाओं में शामिल होने के उनके उद्देश्यों, उनके पिछले नौकरी प्रयासों और क्या उन्हें लगता है कि उन्हें स्थायी रूप से सेना में शामिल किया जाना चाहिए, के बारे में इनपुट मांगा जाएगा। वे अपनी चार साल की सेवा पूरी होने के बाद अपने पसंदीदा करियर विकल्पों के बारे में भी जानकारी देंगे और क्या वे सेना में सेवा जारी रखना चाहते हैं।इसके अलावा, सर्वेक्षण में यह भी पूछा जाएगा कि क्या ये सैनिक अपने परिचितों को अग्निवीर बनने के लिए प्रोत्साहित करेंगे।


    अग्निपथ योजना के तहत सेना, नौसेना और वायु सेना के लिए पुरुष और महिला दोनों उम्मीदवारों की भर्ती की जाती है, जिन्हें अग्निवीर के नाम से जाना जाता है। उन्हें या तो सीधे शैक्षणिक संस्थानों से या भर्ती रैलियों के माध्यम से भर्ती किया जाता है। सैनिकों से अपेक्षा की जाती है कि वे पेंशन के लिए पात्रता के बिना चार साल की अवधि तक सेवा करें।
    योजना की शर्तों ने विवाद को जन्म दिया है, तथा सेवानिवृत्त सैनिकों और इच्छुक व्यक्तियों ने सेवारत कार्मिकों पर इसके संभावित प्रभाव, सशस्त्र बलों की व्यावसायिकता और नागरिक समाज के संभावित सैन्यीकरण के संबंध में चिंताएं व्यक्त की हैं।


    हरियाणा में हाल ही में एक रैली में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने दावा किया कि सेना अग्निपथ योजना का विरोध करती है, जिसका श्रेय उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को दिया तथा कहा कि यदि कांग्रेस सत्ता में आई तो वह इसे बंद कर देंगे।
    हालाँकि, केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने पहले कहा था कि यदि आवश्यक हो तो सरकार अग्निपथ योजना में समायोजन करने के लिए तैयार है।
    वर्तमान में, 40,000 अग्निवीरों के दो बैच सेना में सेवारत हैं, जिनमें से 7,385 अग्निवीरों के तीन बैचों ने नौसेना में प्रशिक्षण पूरा कर लिया है, तथा 4,955 अग्निवीर वायु प्रशिक्षु वायु सेना में प्रशिक्षण पूरा कर चुके हैं।

    गौरतलब है कि कांग्रेस के इस दुष्प्रचार अभियान से सेना के भीतर भी असमंजस की स्थितियां बन गईं थीं। जिस प्रकार नई पेंशन स्कीम को लेकर कांग्रेस ने हंगामा मचाया था उसी प्रकार सेना की पेंशन के आधार पर वैमनस्य के बीज बोने की कोशिश की गई है।गृह मंत्रालय के सूत्र इस हंगामे को विदेश प्रवर्तित मानने से इंकार नहीं कर रहे हैं। उनका कहना है कि भले ही ये दुष्प्रचार किन्हीं विदेशी ताकतों के इशारे पर किया जा रहा हो लेकिन इससे हमें आंतरिक सुधार का अवसर मिला है और हम अपने सैनिकों और उनके परिवारों के बेहतर भविष्य के लिए आवश्यक सुधार की संभावना पर पूरी गंभीरता से विचार कर रहे हैं।

  • संसाधन हड़पने वाले खलनायक को कौन कुचलेगा

    संसाधन हड़पने वाले खलनायक को कौन कुचलेगा


    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वाधीनता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से देश को जगाने का जो प्रयास किया है आज पूरा देश उस पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दे रहा है। प्रधानमंत्री ने आज कोई कलात्मक भाषण की झांकी न देकर जिन तथ्यों और योजनाओं से देश को अवगत कराया है वह भविष्य के हिंदुस्तान की एक रूपरेखा प्रस्तुत करते हैं। प्रधानमंत्री ने भ्रष्टाचार, परिवारवाद और तुष्टिकरण जैसी तीन बुराईयों को समाप्त करने का संकल्प खुलेआम दुहराया और कहा कि मेरा वादा है कि मैं जीवन भर इनसे लड़ता रहूंगा। प्रधानमंत्री ने कहा कि अगले साल भी मैं लाल किले पर आऊंगा और देश के सामर्थ्य और सफलता का गौरवगान करूंगा। उन्हें देश के प्रमुख विपक्षी दल की विचारधारा पर प्रहार करते हुए कहा कि आजादी के अमृत महोत्सव तक वे केवल बातें करते रहे जबकि हमने सरकार में आकर देश के संकल्पों को साकार कर दिखाया है। दरअसल कांग्रेस जिसे देश की विचारधारा कहती रही है वह एक परिवार के चंद सहयोगी परिवारों को पुष्ट करने का षड़यंत्र रहा है। देश के करोड़ों हाथों को काम देना कोई उपकार की बात नहीं बल्कि मानव बल का सदुपयोग करके उत्पादकता बढ़ाना है। जबकि सर्वाधिक सत्ता संभालने वाली कांग्रेस इसे देश पर उपकार गिनाते नहीं थकती।राजाओं, मुगलों, अंग्रेजों, जमींदारों, साहूकारों, जमाखोरों, मिलावटखोरों से लड़ने का काम देश की आम जनता आगे बढ़कर संभालती रही है लेकिन कांग्रेसी इसे अपना किया अहसान बताने में ही लगे रहते हैं। किसी भी कांग्रेसी से पूछिए वह यही दुहराता है हमने देश को आजादी दिलाई। जबकि हकीकत ये है कि करोड़ों हिंदुस्तानियों ने बलिदान देकर अंग्रेजों को देश से भागने पर विवश किया था। गांधी नेहरू की कांग्रेस ने तो अंग्रेजों को निकल भागने के लिए सुरक्षित पैसेज उपलब्ध कराया और उसका इनाम बटोरा। हिंदुओं और मुसलमानों के बीच वैमनस्य के बीज बोकर पाकिस्तान बंटवारा स्वीकार करना इसी गहरे षड़यंत्र का हिस्सा था। आजादी के बाद से लेकर जब तक कांग्रेस सत्ता में रही वह केवल फूट डालो राज करो की नीति पर ही अमल करती रही। आज भी देश में कांग्रेस को वोट देने वाला बड़ा तबका इसी तरह वैमनस्य की खेती करके अपना उल्लू सीधा करता है।केवल डेढ़ दो प्रतिशत लोगों को मंहगी सरकारी नौकरियां देकर शेष हिंदुस्तान के विरुद्ध षड़यंत्र की कलई तब खुल रही है जब भारतीय जनता पार्टी ने अंत्योदय के विचार पर अमल करके हर नागरिक को संसाधनों का बंटवारा करने की नीति पर अमल शुरु किया है। दरअसल हमेशा से यही समस्या रही है कि समाज के संसाधनों पर कुछ लोग कब्जा जमा लेते थे। कभी राजा,कभी मुगल, कभी अंग्रेज, कभी जमींदार,साहूकार और आज उन पर कब्जा बेतहाशा बढ़ते सरकारी तंत्र ने जमा लिया है। शोषण का ये कहर इतना अधिक बढ़ गया है कि लोग त्राहिमाम कर उठे हैं। जनता विद्रोह पर उतारू है। वह ये नहीं समझ पा रही है कि उसका असली खलनायक कौन है। कांग्रेस को अपना तारणहार मानने वाला तबका भाजपा को खलनायक बताने में जुटा है । भाजपा पर ये आरोप इसलिए चिपक रहा है क्योंकि लगभग दो दशक तक शासन करने के बाद भी भाजपा जनता के कंधे पर रखा ये जुआ नहीं उतार सकी है। सरकारी नौकरियों का वेतन लगातार बढ़ता जा रहा है और अमीरी गरीबी की खाई भी बढ़ती जा रही है।भाजपा ने अपने समर्थकों को सरकारी नौकरियों में भेज दिया तो शोषण का ये आंकड़ा और बढ़ गया। दिन भर में दो सौ रुपए की मजदूरी पाने वाला श्रमिक दाल,चावल,सब्जी उसी भाव पर खरीद रहा है जिस भाव पर ढाई तीन लाख रुपए मासिक वेतन पाने वाला अफसर खरीद रहा है। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पच्चीस लाख रुपए का पैकेज पाने वाले अमीर तबके से तय हो रहा है जबकि गरीब वर्ग बेवजह उसमें पिसा जा रहा है। मोदी जी जब मेरे प्यारे परिवारजन का संबोधन देते हैं को उन्हें और उनकी भाजपा को सोचना होगा कि वह अपने परिवारजनों के लिए मुखिया कैसे साबित हों। कहा गया है मुखिया मुख सो चाहिए, खान पान को एक, पाले पोसे सकल अंग तुलसी सहित विवेक । यदि मोदी जी और उनकी भाजपा कांग्रेस की छाया से बाहर नहीं निकल पाएगी और देश के संसाधनों का न्यायोचित बंटवारा नहीं कर पाएगी तो वह लाख बार कांग्रेस के परिवार वाद को गाली देती रहे जनता की समस्याओं का समाधान नहीं हो पाएगा। चंद परिवारों को जरूरत से ज्यादा संसाधन बांटने से उपभोक्ता सामग्री बनाने बेचने वाला कार्पोरेट सेक्टर तो मजबूत होता जा रहा है लेकिन वह सरकार और आम जनता दोनों का धन उलीचता जा रहा है। जनता इससे परेशान है और इससे अमीरी गरीबी के बीच खाई बढ़ती जा रही है। भाजपा ने हितग्राही मूलक योजनाओं से संसाधनों का बंटवारा आम जनता तक पहुंचाने की पहल तो की है लेकिन इसमें भी इतनी सारी शर्तें थोप दी गईं हैं कि वह संसाधन हर व्यक्ति को लाभ नहीं पहुंचा पा रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सामने खुली चुनौती है कि वे हर नागरिक तक देश के संसाधन पहुंचाना सुनिश्चित करें। मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान की भाजपा भी चीन्ह चीन्ह के रेवड़ी बांटने की शैली पर कार्य कर रही है। जाहिर है कि इससे जन आक्रोश बढ़ेगा और आने वाले विधानसभा चुनावों और लोकसभा चुनावों में भाजपा को इसकी मंहगी कीमत चुकानी पड़ेगी। संसाधन तो सीमित हैं। कर्ज लेकर बांटने की सीमा भी निश्चित है। जाहिर है कि सरकार को निष्पक्ष होकर शल्यक्रिया करनी होगी। संसाधन रिसकर आम जनता तक पहुंचाने वाला कांग्रेसी मॉडल उसे न केवल छोड़ना होगा बल्कि अंत्योदय की विचारधारा पर अमल की नाटकबाजी छोड़कर सख्ती से अमल शुरु करना होगा। अनुत्पादक सरकारी तंत्र को पालते रहने से वह भले ही चुनावी हेराफेरी करने में थोड़ी हद तक सफल हो जाए लेकिन जन आक्रोश का सैलाब उसे न घर का रहने देगा न घाट का ।