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  • स्वामित्व योजना लागू होगी,नहीं फंसेंगे पटवारी

    स्वामित्व योजना लागू होगी,नहीं फंसेंगे पटवारी

    भोपाल, 18 सितंबर (प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। मध्यप्रदेश के गांवों की आबादी भूमि पर रह रहे परिवारों को मालिकाना हक देने के लिए शुरू की गई स्वामित्व अधिकार अभिलेख निष्पादन एवं पंजीयन योजना-2026 को पटवारियों के एक वर्ग के विरोध का सामना करना पड़ रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन 17 सितंबर से शुरू हुए अभियान के तहत करीब 50 लाख ग्रामीण संपत्तियों की नि:शुल्क रजिस्ट्री की जानी है।

    पटवारियों की मुख्य आपत्ति रजिस्ट्री के दस्तावेज में उन्हें निष्पादन अधिकारी बनाए जाने को लेकर है। उनका कहना है कि स्वामित्व योजना में ड्रोन सर्वे, सीमांकन और सत्यापन के बाद ग्रामीणों के नाम सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज किए जा चुके हैं। अब उन्हीं संपत्तियों की रजिस्ट्री में उनके ई-सिग्नेचर कराए जा रहे हैं। भविष्य में संपत्ति को लेकर परिवारों या पड़ोसियों के बीच विवाद हुआ तो दस्तावेज तैयार करने वाले पटवारी को भी विवाद में पक्षकार बनाया जा सकता है। पटवारियों का सवाल है कि जब विवाद का फैसला करने का अधिकार उनके पास नहीं है तो इसकी जिम्मेदारी भी उन्हें क्यों दी जा रही है।प्रदेश के विभिन्न स्थानों से पटवारियों ने इस आशय के ज्ञापन स्थानीय प्रशासन को दिए हैं। दमोह में मध्यप्रदेश राजस्व कर्मचारी कल्याण संघ की जिला शाखा की ओर से कलेक्टर को दिए ज्ञापन में कहा गया है कि हम कानूनी पेचीदगियों का सामना करने को राजी नहीं हैं।

    प्रदेश के कई जिलों में पटवारी संगठनों ने प्रशासन को ज्ञापन देकर इस व्यवस्था में बदलाव की मांग की है। कुछ स्थानों पर काम प्रभावित होने की खबरें भी सामने आई हैं। उनका कहना है कि वे ग्रामीणों को मालिकाना हक देने के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि अपनी व्यक्तिगत कानूनी जवाबदेही को लेकर चिंतित हैं।

    राज्य सरकार का तर्क है कि यह सामान्य जमीन की खरीद-बिक्री की रजिस्ट्री नहीं है। स्वामित्व योजना के तहत सर्वे और सत्यापन के बाद तैयार अधिकार अभिलेखों का पंजीयन किया जा रहा है। जून में राज्य मंत्रिमंडल ने इसके लिए योजना को मंजूरी दी थी। रजिस्ट्री पर लगने वाली स्टांप ड्यूटी और पंजीयन शुल्क भी सरकार वहन कर रही है। इसका उद्देश्य ग्रामीणों को ऐसा वैध दस्तावेज देना है, जिसका उपयोग बैंक ऋण और दूसरी आर्थिक जरूरतों के लिए किया जा सके।

    केंद्र सरकार की स्वामित्व योजना में ड्रोन तकनीक से आबादी भूमि का सर्वे कर नक्शे और अधिकार अभिलेख तैयार किए जाते हैं। इसके बाद राज्यों को जमीनी सत्यापन और संपत्ति कार्ड उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी दी गई है। मध्यप्रदेश इसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाकर अधिकार अभिलेखों का पंजीयन कर रहा है।

    पटवारियों की आपत्ति का मामला 15 सितंबर की कैबिनेट बैठक में भी उठा। प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार राजस्व मंत्री करण सिंह वर्मा ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के सामने यह मुद्दा रखा। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को पटवारियों की चिंता दूर करने और कलेक्टरों को उन्हें समझाने के निर्देश दिए। सरकार का कहना है कि भविष्य में संपत्ति को लेकर विवाद होने पर पटवारी को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार नहीं माना जाएगा।

    मुख्य सचिव अशोक बर्णवाल ने भी अधिकारियों को पंचायत स्तर पर शिविर लगाकर तेजी से रजिस्ट्रियां पूरी करने के निर्देश दिए हैं। अधिकारियों को प्रतिदिन 30 से 40 रजिस्ट्रियां करने का लक्ष्य दिया गया है।

    अब विवाद का समाधान केवल मौखिक आश्वासन से नहीं, बल्कि लिखित रूप से जिम्मेदारियां स्पष्ट करने से होगा। सरकार को यह बताना होगा कि अधिकार अभिलेख में दर्ज जानकारी की जिम्मेदारी किस स्तर की है, निष्पादन अधिकारी के रूप में पटवारी की भूमिका कितनी सीमित है और भविष्य में विवाद होने पर उसकी व्यक्तिगत जवाबदेही किस सीमा तक होगी। यह स्पष्ट होने पर एक ओर ग्रामीणों को संपत्ति का कानूनी दस्तावेज मिल सकेगा और दूसरी ओर मैदानी कर्मचारियों की आशंका भी दूर हो सकती है।