Tag: #GeM

  • नगर सरकार के कुशासकों को कड़ा संदेश

    नगर सरकार के कुशासकों को कड़ा संदेश

    Writing

    ₹1,134 करोड़ की खरीद में ₹200 से ₹250 करोड़ बचाने की संभावना, शहरों से गांवों तक वित्तीय अनुशासन की चुनौती

    भोपाल22 अक्टूबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर) मध्यप्रदेश पर बढ़ते कर्ज और सीमित राजस्व के बीच स्थानीय निकायों के खर्च का तरीका सवालों के घेरे में है। नगरीय विकास एवं आवास विभाग के अपर मुख्य सचिव संजय दुबे ने आधुनिक अकाउंटिंग सॉफ्टवेयर के जरिए सामने आए खरीद के मूल्य-अंतर पर निकायों के मुख्य कार्यपालन अधिकारियों को चेतावनी दी है। विभागीय विश्लेषण के अनुसार, प्रदेश के 374 नगरीय निकायों ने तीन वर्षों में सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM) से करीब 1,134 करोड़ रुपये की खरीद की। समान वस्तुओं की औसत दरों के आधार पर इसमें 200 से 250 करोड़ रुपये तक बचत की संभावना जताई गई है।

    विभागीय आंकड़ों के मुताबिक, कुछ निकायों में कचरा वाहन लगभग दो लाख रुपये में खरीदे गए, जबकि दूसरे निकाय में अतिरिक्त डस्टबिन सहित ऐसे वाहन करीब छह लाख रुपये में खरीदे गए। एलईडी लाइट की खरीद दरों में भी 306 रुपये से लेकर 11,800 रुपये तक का अंतर सामने आया। इन कीमतों की तुलना करते समय वस्तु की गुणवत्ता, तकनीकी विनिर्देश और आपूर्ति की शर्तों में ् पाया गया है। मूल्य-अंतर अपने आप में भ्रष्टाचार का प्रमाण नहीं, लेकिन जांच की ठोस वजह जरूर है।

    मध्यप्रदेश के 2026-27 के बजट में राज्य की बकाया देनदारियां सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) के 32.5 प्रतिशत रहने का अनुमान है। राज्य का राजकोषीय घाटा करीब 71,458 करोड़ रुपये और ब्याज भुगतान 33,700 करोड़ रुपये से अधिक के स्तर पर है। ऐसे में सरकारी खरीद में अनावश्यक खर्च रोकना और उपलब्ध धन का बेहतर उपयोग करना बेहद जरूरी हो जाता है।

    खरीद में संभावित 200 से 250 करोड़ रुपये की बचत का अर्थ केवल सरकारी खजाने पर बोझ कम करना नहीं है। इतनी राशि से सफाई, सड़क, पेयजल और प्रकाश व्यवस्था जैसी नागरिक सुविधाओं पर अधिक प्रभावी खर्च किया जा सकता है। सवाल यह है कि जब राज्य आर्थिक दबाव में है, तब स्थानीय निकायों की खरीद में इतनी बड़ी कीमतों का अंतर कैसे पैदा हुआ?

    नगर निगमों, नगर पालिकाओं और नगर परिषदों के पास संपत्ति कर, जल शुल्क, दुकानों के किराये और अन्य स्थानीय शुल्क से आय जुटाने के साधन हैं। इसके बावजूद कई निकायों की वित्तीय स्थिति में सुधार की जरूरत बनी हुई है।

    भारतीय रिजर्व बैंक की नगर निगम वित्त संबंधी रिपोर्ट भी देश के अनेक नगर निगमों में स्वयं के राजस्व की सीमित क्षमता और सरकारी अनुदान पर निर्भरता की समस्या रेखांकित करती है।

    समस्या केवल शहरों तक सीमित नहीं है। CAG की मध्यप्रदेश के स्थानीय निकायों पर 2023 की रिपोर्ट में 11,726 लंबित ऑडिट टिप्पणियों और 2,693 निरीक्षण रिपोर्टों का उल्लेख किया गया था। इसी रिपोर्ट के अनुसार, निर्धारित 91,236 सामाजिक अंकेक्षणों में से 36,995 ही किए गए थे। ये पुराने आंकड़े हैं, लेकिन ग्रामीण स्थानीय शासन में लेखा-परीक्षा और सामाजिक अंकेक्षण की अहमियत बताते हैं।

    पंचायतों में भी जरूरी है कि विकास कार्यों पर खर्च हुई राशि का हिसाब, काम की गुणवत्ता और वास्तविक लाभ का आकलन हो। शहरों में महंगी खरीद और गांवों में अधूरे काम—दोनों ही स्थितियों में जनता के धन के उपयोग पर जवाबदेही तय होनी चाहिए।

    आधुनिक सॉफ्टवेयर खरीद की असामान्य दरों और संदिग्ध भुगतान की पहचान कर सकता है, लेकिन वास्तविक सुधार के लिए जांच, वसूली और जिम्मेदारी तय करना आवश्यक है।एआई टूल्स की मदद से न केवल गड़बड़ियां पकड़ी जा सकती हैं बल्कि गड़बड़ियों को रोकने का वैकल्पिक रोडमैप भी बनाया जा सकता है।

    मध्यप्रदेश में स्थानीय शासन की असली कसौटी बजट खर्च करना नहीं, बल्कि उस खर्च से नागरिकों को बेहतर सुविधाएं देना है। बढ़ते कर्ज के दौर में हर रुपये का हिसाब जरूरी है। यदि खरीद में बचत संभव थी, तो उसकी अनदेखी क्यों हुई; और यदि गड़बड़ी मिली है, तो कार्रवाई कब होगी? इन सवालों के जवाब ही तय करेंगे कि यह चेतावनी व्यवस्था में सुधार लाएगी या केवल एक प्रशासनिक निर्देश बनकर रह जाएगी।