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  • शिवराज का गोदी मीडिया अपने पाप छुपाने में जुटा

    शिवराज का गोदी मीडिया अपने पाप छुपाने में जुटा

    भोपाल,04 दिसंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। मुख्यमंत्री डाक्टर मोहन यादव ने जबसे मध्यप्रदेश सरकार को पाखंडी परिपाटियों से बाहर निकालने की मुहिम चलाई है तबसे तंत्र की आड़ में बैठकर आम नागरिकों का खून चूसने वाले दलालों में हड़कंप मचा हुआ है।   पूर्ववर्ती शिवराज सिंह चौहान जिस गोदी मीडिया को पालने पोसने के लिए सरकारी खजाने से लगभग हजार करोड़ रुपए खर्च कर रहे थे वह तो लगभग बौखला गया है । उसने सरकारी फरमान को हाईकोर्ट का भय दिखाकर पापों का पिटारा छुपाने की कोशिश शुरू कर दी है।

    जनता से सीधा संवाद स्थापित करने के लिए शासन ने नर्मदापुरम संभाग में उपायुक्त राजस्व 2012 बैच के गणेश कुमार जायसवाल को जनसंपर्क विभाग में अपर संचालक के पद पर पदस्थ करने का आदेश जारी कियाथा। जैसे ही ये आदेश जारी हुआ तो जनसंपर्क विभाग के अधिकारियों कर्मचारियों ने ये कहकर शासन के आदेश को मानने से इंकार कर दिया कि ये अधिकारी तो जूनियर है। हमारे तो उपसंचालक भी इससे वरिष्ठ हैं। सरकार किसी बाहिरी अफसर को हमारे विभागीय कैडर में कैसे पदस्थ कर सकती है। इससे पहले शिवराज सिंह सरकार ने जिस आईपीएस अधिकारी को संचालक बनाकर भेजा था वह सीनियर था लेकिन ये तो बहुत जूनियर है। हम इसके अधीन कैसे काम कर सकते हैं। इस एक दिवसीय कलमबंद हड़ताल की कमर तब टूट गई जब उन्हें समझाया गया कि शासन के आदेश का विरोध सड़कों पर करना अनुशासन हीनता होगी।

    विभाग के अधिकारियों का कहना था कि वे सरकार का प्रचार कार्य संभालते हैं। यदि सरकार उनकी बात नहीं मानेगी तो वे सरकार का जनसंवाद ढप कर देंगे । उन्होंने अपना विरोध मुखरता पूर्वक दर्ज कराने के लिए कर्मचारी संगठनों को भी साथ खड़ा कर लिया था। जैसे ही इस प्रदेशव्यापी हड़ताल की खबर मंत्रालय तक पहुंची तो आला अधिकारियों ने विभाग को निर्देश दिए कि वे अपनी हड़ताल समाप्त करें ,हम इन स्थितियों को  संवाद से समझेंगे। कमिश्नर जनसंपर्क आईएएस दीपक सक्सेना ने अधिकारियों को समझाया कि वे हड़ताल समाप्त करें हम आपकी मांगों पर सदाशयता पूर्वक विचार करके कोई रास्ता निकालेंगे।

    अधिकारियों ने मौके की नजाकत को भांपकर हड़ताल तो वापस ले ली लेकिन अपने दांव पेंच जारी रखे। जिन पत्रकारों और मीडिया संस्थानों के नाम पर बजट की बड़ी राशि खर्च की जाती थी उन्हें अपने पक्ष में लामबंद करके अधिकारियों ने उनके कंधे से अपनी बंदूक चलानी शुरु कर दी। विभिन्न पत्रकार संगठनों और मीडिया संस्थानों ने भी अधिकारियों की नाराजगी से हामी भरते हुए सरकारी फरमान की मुखालिफत शुरु कर दी। अब जबकि सरकारी खजाने से भजकलदारम करने वाले इस गोदी मीडिया को समझ में आ गया है कि शासन अपने जनसंवाद को बगैर किसी दलाली झोल के जारी करना चाहता है तो उन्होंने सरकारी फरमान को अदालत में चुनौती देने की तैयारी कर शुरु कर दी है।

    इस संबंध में आज एक पत्रकार की जनहित याचिका की प्रति सोशल मीडिया पर प्रसारित की गई है । इस पत्रकार का कहना है कि विभाग के अधिकारी सीधे सरकार से पंगा नहीं ले सकते इसलिए उनके कहने पर ही मैं हाईकोर्ट जा रहा हूं। जब उसे बताया गया कि वह पीड़ित पक्ष नहीं है। वह विभाग में अधिकारी नहीं है । इस सरकारी आदेश से जनता को कोई नुक्सान नहीं हो रहा है इसलिए वह पीड़ित पक्ष बनकर यदि अदालत जाएगा तो उसे स्टे मिलने के बजाए दंड भी भुगतना पड़ सकता है। यदि अधिकारियों के हक छीने जा रहे हैं तो वे स्वयं अदालत जा सकते हैं।

    गोदी मीडिया से जुड़े अधिकारियों और कर्मचारियों को भय है कि यदि बाहिरी अधिकारी विभाग में आ गया तो वह यहां बरसों से चल रहे गोरखधंधे की पोल खोल देगा। इससे उन्हें प्रमोशन की जगह जेल यात्रा तक भुगतना पड़ सकती है। ऐसे में सरकारी फरमान का विरोध करना उनकी मजबूरी है। हालांकि अभी सरकार ने नव आगंतुक को फिलहाल अपनी पुरानी पदस्थापना पर ही बने रहने को कहा है। उसे कहा गया है कि जब विभागीय अधिकारियों की नाराजगी दूर हो जाएगी तब आपको भेजा जाएगा।

    भाजपा संगठन से जुड़े कुछ कार्यकर्ताओं का कहना है कि ये डाक्टर मोहन यादव की सरकार है। सरकार यदि कोई फैसला करती है तो उसे सख्ती से लागू भी करती है। यदि जनसंपर्क विभाग के अफसर इसी तरह विरोध करते रहेंगे तो उनका ये कदम विभाग के पैरों पर मारी गई कुल्हाड़ी साबित होगा।

  • जनसंपर्क माफिया में कोहराम

    जनसंपर्क माफिया में कोहराम


    लगातार शिकायतों और पत्रकारों के विरोध दर्ज कराए जाने के बाद मध्यप्रदेश शासन ने जनसंपर्क संचालनालय में नर्मदापुरम संभाग के उपायुक्त(राजस्व) गणेश कुमार जायसवाल को अपरसंचालक के पद पर भेजा है। राज्य प्रशासनिक सेवा के 2012 बैच के इस युवा अधिकारी की पदस्थापना से जनसंपर्क विभाग के खासतौर पर अधिकारी वर्ग में बैचेनी की लहर दौड़ गई है। पहली बार वे शासन के निर्णय के खिलाफ एकजुट होकर कलमबंद हड़ताल पर उतर आए हैं। जनसंपर्क कमिश्नर दीपक सक्सेना से चर्चा के दौरान विभाग के अधिकारियों का तर्क था कि वे बरसों से इस विभाग में सरकार की छवि सुधारने का काम करते हैं इसके बावजूद सरकार ने एक राजस्व विभाग के एक जूनियर अधिकारी को भेजकर हमारा अपमान किया है। हमें प्रमोशन भी वक्त पर नहीं मिलते हैं और रात दिन हम सरकार की छवि सुधारने में जुटे रहते हैं। इसके बावजूद सरकार ने बाहिरी व्यक्ति को भेजकर हम पर अविश्वास जताया है जो अपमानजनक है। इस संबंध में सामान्य प्रशासन विभाग के अपर मुख्य सचिव संजय कुमार शुक्ल से अभी बात नहीं हो पाई है लेकिन जो जानकारियां छनकर बाहर आ रहीं हैं उनके मुताबिक सरकार ने आधिकारिक फीड बैक के आधार पर ही राजस्व विभाग के अधिकारी की नियुक्ति की है। यही नहीं विभाग के अपर मुख्य सचिव पद पर भारतीय प्रशासनिक सेवा के 1993 बैच के वरिष्ठ आईएएस अनुपम राजन को शासन की ओर से जवाबदारी सौंपी गई है। मुख्य सचिव अनुराग जैन के इस फैसले पर तो कोई सवाल नहीं उठाया जा रहा है लेकिन सामान्य प्रशासन विभाग के फैसले पर अधिकारियों का विरोध सबको चौंका रहा है। अधिकारियों के इस विरोध प्रदर्शन में विभाग के कर्मचारियों ने भी कलमबंद हड़ताल को समर्थन दिया है लेकिन वे अंदरूनी तौर पर खामोश हैं। विज्ञापन माफिया ने इस कलमबंद हड़ताल में जनसंपर्क संवर्ग के अधिकारियों को समेट लिया है। उनके माध्यम से वे सरकार पर दबाव बनाने का प्रयास कर रहे हैं। इस विरोध प्रदर्शन में कुछ पत्रकार संगठन भी कूद पड़े हैं। दरअसल में कुछ सालों से जनसंपर्क विभाग ने ऐसे गठरियों पत्रकार संगठन खड़े कर दिये हैं जिन्हें साथ लेकर विभाग के अधिकारी अपने फैसले लेते रहे हैं। खबरों के फैसले तो वे स्वयं ले लेते हैं लेकिन विज्ञापन के फैसलों में पत्रकार संगठनों को भी अपने साथ खड़ा कर लिया जाता है। इस गठजोड़ में शामिल माफिया शख्सियतें विभाग के माध्यम से लगभग आठ सौ करोड़ रुपयों से अधिक की राशि गड़प जाती हैं। पहली बार शासन ने विज्ञापन के नाम पर बजट की लूटपाट के इस धंधे पर लगाम कसने का प्रयास किया है। जाहिर है राजस्व विभाग का प्रशासनिक अधिकारी आयव्यय के सभी रिकार्ड पर भी निगरानी करेगा इससे जनसंपर्क विभाग के कुछ भ्रष्ट अधिकारियों को अपने काले कारनामों की कलई खुल जाने का भय लग रहा है। पत्रकारों की आड में दलाली करने वाले जिन कथित पत्रकारों ने इस घोटाले में लाभ उठाना अपना जन्मसिद्ध अधिकार बना रखा है वे भी इस फैसले से बौखलाए हुए हैं। केन्द्रीय स्तर पर प्रेस सेवा पोर्टल के माध्यम से भारत सरकार ने मीडिया को व्यवस्थित करने का अभियान चला रखा है। इससे पत्रकारों को काफी कठिनाई हो रही है। जबकि राज्य स्तर पर जनसंपर्क विभाग के अधिकारियों की प्रशासनिक अकुशलता की वजह से पत्रकारों के लिए आबंटित की जाने वाली राशि गैर पत्रकारों के पास पहुंच रही है। सत्तारूढ़ दल की सिफारिशों पर भी इस राशि का बड़ा हिस्सा साईफन कर लिया जाता है। ऐसे में पत्रकार वंचित रह जाते हैं और कलंक की कालिख उनके माथे पड़ जाती है। शासन की जवाबदारी है कि वह वास्तविक पत्रकारों को संवाद की भूमिका निभाने के लिए आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए । वह अपना दायित्व निभाने के लिए जब फैसले ले रही है तो माफिया ताकतें इस फैसले को रोकने में जुट गईं हैं। ऊटपटांग के तर्क देकर वे इसे अपमान का कारण बता रहे हैं ।मध्यप्रदेश सरकार के वित्तीय संसाधनों पर ही जनसंपर्क विभाग के अधिकारियों कर्मचारियों को वेतन मिलता है और उन्हीं संसाधनों से राज्य प्रशासनिक सेवा के अन्य संवर्ग के अधिकारियों को वेतन मिलता है। इन सभी की जिम्मेदारी है कि वे प्रदेश की बेहतरी के लिए कार्य करें।ऐसे में राजस्व विभाग के वित्तीय प्रबंधन में कुशल अधिकारी की पदस्थापना स्वागत योग्य फैसला है। शासन को यदि अपने प्रशासनिक सुधारों पर जन समर्थन चाहिए तो उसे पत्रकारों की आड़ में पनप चुके विज्ञापन माफिया को उखाड़ फेंकना होगा तभी शासन और सरकार जनता की ओर से दिए गए अपने दायित्वों का निर्वहन सही तरीके से कर पाएंगे । फिलहाल शासन को अपने फैसले पर अडिग रहना होगा और माफिया की गीदड़ भभकियों को नजरंदाज करना होगा। वैसे भी सरकार की छवि बनाने बिगाड़ने का कार्य सोशल मीडिया संभाल चुका है। दलालों को बाहर किया जाएगा तो इसका सर्वत्र स्वागत किया जाएगा।