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  • नई अर्थव्यवस्था के लिए तय हो पुलिस की भूमिका

    नई अर्थव्यवस्था के लिए तय हो पुलिस की भूमिका



    मध्यप्रदेश, हिंदुस्तान के उन गिने चुने राज्यों में शामिल है जिन्होंने पुलिस कमिश्नर प्रणाली लागू करके भारतीय पुलिस अधिनियम 1861 के प्रावधानों को आज के संदर्भों में नया रूप देने का प्रयास किया है।केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह कहते रहे हैं कि आज हमें डंडे वाली नहीं बल्कि नॉलेज बेस्ड टेक्नोसेवी पुलिस की जरूरत है। अंग्रेजों ने 1857 की क्रांति को कुचलने के बाद जो पुलिस अधिनियम लागू किया था उसका मकसद आजादी की ललक को कुचलना था। आज की पुलिस के सामने अपराध नियंत्रण के साथ साथ देश के उद्यमियों को सुरक्षा प्रदान करने का भी लक्ष्य है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश के सामने 2024 तक पांच ट्रिलियन डॉलर(350 लाख करोड़ रुपए) की अर्थव्यवस्था बनाने का स्वप्न प्रस्तुत किया है। इसे साकार करने के लिए पुलिस की भूमिका को भी नए सिरे से परिभाषित किया जाना जरूरी है। ये पुलिस जाति, धर्म, संप्रदाय के आधार पर मुरौव्वत करने वाली नहीं बल्कि फोरेंसिक साईंस की कसौटी पर साईबर अपराधों को भी नियंत्रित करने वाली भी बनाई जा रही है।क्योंकि अर्थव्यवस्था उद्यमियों के हाथ हो चोरों के हाथ नहीं ये प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।
    मध्यप्रदेश के गृहमंत्री डॉ.नरोत्तम मिश्रा कहते हैं कि जिस तरह सरदार वल्लभ भाई पटेल ने रियासतों के एकीकरण से देश को अखंड भारत बनाने का भगीरथ किया था उसी तरह केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह पुलिस की भूमिका सार्थक बनाने का जतन कर रहे हैं। ये पुलिस अब ऐसे व्यक्तियों का निकाय बनती जा रही है जो कानूनों को लागू करने , संपत्तियों की रक्षा करने, संगठित अपराध पर अंकुश लगाने के साथ साथ देश के दीर्घ लक्ष्यों का भी समर्थन कर रही है। भोपाल और इंदौर में पुलिस कमिश्नर प्रणाली से पुलिस के जिम्मेदारी भरे बर्ताव की तस्वीर उभर रही है। अब पुलिस ऐसे सभी अपराधियों पर निगाह रख रही है जो समाज, धर्म या राजनीति की आड़ में आपराधिक गतिविधियों को अंजाम देते रहे हैं। सबसे बड़ी बात तो ये है कि ये निगरानी बाकायदा फोरेंसिक साक्ष्यों के आधार पर की जा रही है। पुलिस के कर्मठ सेवक जो जानकारियां जुटाते हैं उनसे अदालत में अपराध के तरीके को तफसील से प्रस्तुत करना संभव हो गया है। पुलिस के जुटाए साक्ष्य अपराधी को दंड की देहरी तक ले जा रहे हैं। ये संतोष की बात है।
    भारतीय साक्ष्य अधिनियम ने तथ्यों को संकलित करने और उसके आधार पर आरोपी का अपराध साबित करने की विधि हमें दी थी। अब तक पुलिस इसी अधिनियम के दायरे में अपराध को प्रमाणित करने का काम करती रही है। अब बढ़ते साईबर क्राईम ने पुलिस का काम बढ़ा दिया है। अब पुलिस को टेक्नोसेवी होना जरूरी है।अपराधी अब किसी दूसरे देश में बैठकर भी अपराध कारित कर देता है। प्रशिक्षण से पुलिस बल को शिक्षित करने का भरपूर प्रयास किया गया है लेकिन इसके बावजूद पुलिस बल की कार्यक्षमता में क्रांतिकारी बदलाव नहीं आया है। जो पुलिस कर्मी लंबे समय से पुलिस बल में काम कर रहे हैं उनके लिए आज अपराध की विवेचना दुरूह कार्य नजर आता है। पुलिस कर्मियों के चयन के मापदंड भी कुछ ऐसे रहे हैं जिनमें खिलाड़ी, पहलवान और तकनीकी पढ़ाई से विमुख कर्मचारियों की भरती की जाती रही है। यही वजह है कि पुलिस में दो तरह के कर्मचारी हैं। कुछ कंप्यूटर कक्ष में बैठकर कार्य कर रहे हैं तो कुछ को मैदानी दौड़ भाग में लगाया गया है। इनके बीच काम के असंतुलन को लेकर तकरार भी चलती रहती है। साथ में महिला पुलिस कर्मियों की बढ़ती संख्या ने भी पुलिस की कार्यप्रणाली में कई बदलाव किए हैं।
    इन सबके बावजूद पुलिस का चरित्र अभी नहीं बदला है। जब तक उच्च स्तर से अपने बल को बार बार संदेश नहीं दिया जाता कि उनकी भूमिका ठसके वाली थानेदारी करने की नहीं बल्कि ज्ञान आधारित शक्तिप्रदर्शन की हो गई है तब तक पुलिस को नवजीवन नहीं मिल सकता। कहा जाता है कि ज्ञान शेरनी के दूध की तरह होता है जो पिएगा वह दहाड़ेगा। इस सूत्रवाक्य को अपराधियों ने ज्यादा तेजी से अपनाया है। तकनीकों की आड़ लेकर वे तरह तरह के अपराध कर रहे हैं और पुलिस की निगाह से भी बचते रहते हैं। किसी चोरी की घटना में जब फरियादी पुलिस थाने पहुंचता है तो पुलिस का बर्ताव टालने वाला होता है। पुलिस वाले चाहते हैं कि फरियादी ही जांच करे, हमें साक्ष्य लाकर दे, साथ में सेवाशुल्क भी दे तब हम मुकदमा दर्ज करेंगे। हम अपने रजिस्टर में मुकदमों की संख्या क्यों बढ़ाएं।जबकि इन मुकदमों का खर्च सरकार स्वयं उठाती है। पुलिस का प्रयास रहता है कि मामले को दीवानी बताकर व्यक्ति को अदालत की ओर ठेल दे। क्षेत्राधिकार की पुरानी कहानी तो आज भी जस की तस है। अब यदि अपराधी की धरपकड़ किसी नागरिक को स्वयं करनी है तो फिर पुलिस की जरूरत क्या है। क्यों पुलिस वालों के लिए आवास, बजट और भरती की मांग की जाती है। आपराधिक मामले भी यदि व्यक्ति को स्वयं निपटाना है तो फिर बिहार की तरह निजी सेनाएं या बाऊंसर रखने की परिपाटी शुरु हो ही जाएगी।
    आज पुलिस बल के कई काम आऊटसोर्स किए जा रहे हैं। निर्माण, यातायात और अभियोजन के लिए वैसे भी पुलिस निजी एजेंसियों पर निर्भर रही है। क्या अब समय नहीं आ गया है कि जब राज्य की ओर से निजी एजेंसियों को भी पुलिस की तरह अधिकार दिए जाएं ताकि वे अनुसंधान करके अपराध नियंत्रण का काम संभाल सकें। जब पुलिस अपना दायित्व न निभा सके तो क्यों न इस विकल्प पर भी गौर किया जाए। अब यदि कोई किसान खेती करके अनाज का उत्पादन कर रहा है। मजदूरों को वेतन बांट रहा है। सरकारी मंडियों में शुल्क चुका रहा है। साबुन से लेकर खाद, कीटनाशक बीज ,वाहन आदि सभी पर टैक्स चुका रहा है। नगरीय या ग्रामीण निकायों का टैक्स भर रहा है और वो चोरी की शिकायत लेकर पुलिस के पास जाए तो पुलिस उससे कहे कि वह तो बड़ा आदमी है चोरी हो गई तो क्या फर्क पड़ता है। ऐसे में पुलिस की भूमिका पर एक बार फिर चिंतन क्यों न किया जाए। पुलिस यदि उद्यमियों के साथ न खड़ी हो और अपनी अक्षमता से अपराधियों को संरक्षण प्रदान करने का कारण बनने लगे तो उसकी भूमिका पर नए सिरे से विचार करना जरूरी हो जाता है।
    दरअसल नई सदी का भारत तेजी से करवट ले रहा है। जिस देश की अर्थव्यवस्था लगभग ढाई सौ सालों तक अंग्रेजों के षड़यंत्रों का शिकार रही हो, और वो अपनी तेज प्रगति से सारे मानदंड पीछे छोड़ रहा हो, उसे उपनिवेशिक मानसिकता वाली संस्थाओं से मुक्ति दिलानी ही होगी। शासकों और प्रशासकों को समय की इस मांग की पहचान करनी होगी। अपराध नियंत्रण का पुराना ढर्रा बदलना होगा तभी इन संस्थाओं का अस्तित्व बचा रह पाएगा। आज पुलिस कानूनों में बदलाव या सुधार की बात हो रही है कल पुलिस को ही बदलने की बात होने लगे तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के लक्ष्य के लिए यदि पुलिस का मौजूदा ढांचा होम करना पड़े तो भी ये सस्ता सौदा होगा।