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  • घरों में बाजार बनाने वालों पर कार्रवाई कौन करेगा

    घरों में बाजार बनाने वालों पर कार्रवाई कौन करेगा

    भोपाल06 सितंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)।राजधानी में अरेरा कॉलोनी, रोहित नगर, बावड़ियाकलां और दूसरे आवासीय इलाकों में व्यावसायिक गतिविधियों के खिलाफ चल रही कार्रवाई को केवल दुकानदारों और रहवासियों के बीच का विवाद मानना बड़ी भूल होगी। यह संकट एक-दो साल में पैदा नहीं हुआ। इसके पीछे दो दशक से चली आ रही नगर नियोजन की कमजोरी, राजनीतिक संरक्षण, जमीन के कारोबार से जुड़े हित और प्रशासन की आंखों के सामने नियमों के उल्लंघन का लंबा सिलसिला है। अब जब नगर निगम कार्रवाई कर रहा है तो सवाल यह भी उठना चाहिए कि इतने वर्षों तक यह सब किसकी अनुमति, संरक्षण या लापरवाही से चलता रहा?

    अरेरा कॉलोनी और रोहित नगर मूल रूप से आवासीय क्षेत्र हैं। यहां घर बनाने के लिए स्वीकृत भूखंडों पर धीरे-धीरे दुकानें, शोरूम, रेस्टोरेंट, होटल, क्लीनिक और कार्यालय खुलते चले गए। इससे सड़क पर पार्किंग बढ़ी, यातायात का दबाव बढ़ा और रहवासियों की निजता तथा सुरक्षा प्रभावित हुई। रहवासियों की शिकायतें नई नहीं हैं। अरेरा कॉलोनी के एक निवासी के अनुसार 2021 से अब तक इस संबंध में अनेक शिकायतें शासन और नगर निगम के विभिन्न अधिकारियों को दी गईं, फिर भी प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।

    व्यापारियों का अपना तर्क है। उनका कहना है कि भोपाल का मास्टर प्लान लंबे समय से लंबित रहा और नए व्यावसायिक क्षेत्र विकसित नहीं किए गए। इसलिए शहर की जरूरत के साथ कारोबार आवासीय इलाकों में फैलता गया। यह तर्क पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। लेकिन मास्टर प्लान का न आना किसी व्यक्ति को आवासीय भूखंड पर अपनी मर्जी से व्यावसायिक निर्माण करने का अधिकार नहीं देता। यही इस पूरे विवाद का मूल प्रश्न है।वास्तविक जिम्मेदारी तीन स्तरों पर तय होनी चाहिए।

    पहली जिम्मेदारी उन संपत्ति मालिकों और कारोबारियों की है जिन्होंने स्वीकृत आवासीय उपयोग के विपरीत निर्माण किया या व्यवसाय शुरू किया। यदि किसी ने जानबूझकर आवासीय अनुमति लेकर व्यावसायिक भवन खड़ा किया है तो केवल यह कह देना पर्याप्त नहीं है कि उसने बिजली का बिल, संपत्ति कर, जीएसटी या ट्रेड लाइसेंस लिया था। किसी विभाग की ओर से लिया गया कर या जारी किया गया लाइसेंस भूमि उपयोग को अपने आप वैध नहीं बना देता।

    दूसरी और अधिक गंभीर जिम्मेदारी नगर नियोजन और स्थानीय प्रशासन की है। जिस भवन में वर्षों से होटल चल रहा हो, जहां रोज दर्जनों वाहन खड़े होते हों, जहां शोरूम या अस्पताल संचालित हो रहा हो, उसे प्रशासन ने एक दिन में नहीं देखा। नगर निगम के अधिकारी, नगर तथा ग्राम निवेश विभाग, भवन अनुज्ञा से जुड़े अधिकारी और स्थानीय प्रशासन इस बदलाव से अनजान नहीं हो सकते। फिर सवाल उठता है कि कार्रवाई इतने वर्षों तक क्यों नहीं हुई?

    तीसरी जिम्मेदारी उस राजनीतिक तंत्र की बनती है जिसने इस अव्यवस्था को बढ़ने दिया। सत्ता में आने वाली सरकारों और स्थानीय राजनीतिक प्रतिनिधियों ने यदि लगातार बढ़ते व्यावसायीकरण को देखा और रोकने के बजाय उसे नजरअंदाज किया, तो जवाबदेही सभी की होनी चाहिए। आज राजनीतिक दल व्यापारियों के साथ खड़े होकर राहत की मांग कर रहे हैं और दूसरी ओर रहवासी कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। यह राजनीति समस्या का समाधान नहीं है।

    इस पूरे मामले में भू-माफिया और बिल्डर लॉबी की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए। आवासीय भूखंड का व्यावसायिक उपयोग उसकी कीमत कई गुना बढ़ा देता है। यही वह आर्थिक प्रोत्साहन है जिसने कई जगह नियमों को पीछे धकेला। यदि किसी बिल्डर या कॉलोनाइजर ने खरीदार को यह भरोसा दिलाकर संपत्ति बेची कि भविष्य में यहां दुकान या कार्यालय चल जाएगा, तो उसकी भी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। केवल उस व्यक्ति को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा जिसने अंत में दुकान खोली। यह पता लगाना जरूरी है कि उसे व्यावसायिक उपयोग का भरोसा किसने दिया, भवन का नक्शा किसने पास किया और वर्षों तक निरीक्षण किसने नहीं किया।

    नगर निगम ने अब बड़े पैमाने पर नोटिस और सीलिंग की कार्रवाई शुरू की है। अगस्त में अरेरा कॉलोनी और रोहित नगर से कार्रवाई शुरू हुई और बाद में शहर के अन्य क्षेत्रों तक पहुंची। अगस्त के अंत तक हजारों नोटिस जारी होने की जानकारी सामने आई। सितंबर की शुरुआत में भी कार्रवाई जारी रही, हालांकि कुछ स्थानों पर नोटिस लगे होने के बावजूद आसपास की दुकानें चलती मिलने से कार्रवाई की समानता पर सवाल उठे हैं

    यही स्थिति सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। कार्रवाई हो तो सब पर समान हो। प्रभावशाली व्यक्ति का होटल, बिल्डर का शोरूम और सामान्य नागरिक की छोटी दुकान—कानून के सामने इनके लिए अलग-अलग पैमाना नहीं हो सकता।

    मामला न्यायालय में भी गंभीर स्तर पर पहुंच चुका है। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के बाद भोपाल में कार्रवाई शुरू हुई और इस विषय की अगली महत्वपूर्ण सुनवाई 15 सितंबर को निर्धारित है। सरकार के लिए अब राजनीतिक समझौते से ज्यादा महत्वपूर्ण न्यायालय के आदेश और कानून के अनुरूप स्थायी व्यवस्था बनाना है।

    समाधान केवल सीलिंग नहीं है। सरकार को सबसे पहले हर संपत्ति का स्वीकृत भूमि उपयोग, स्वीकृत नक्शा और वास्तविक उपयोग सार्वजनिक करना चाहिए। इसके बाद तीन श्रेणियां बन सकती हैं—पूरी तरह वैध, नियमों के तहत सीमित रूप से नियमित किए जा सकने वाले और पूरी तरह अवैध। तीसरी श्रेणी पर बिना राजनीतिक हस्तक्षेप कार्रवाई होनी चाहिए। जहां मिश्रित भूमि उपयोग वैज्ञानिक आधार पर संभव है, वहां सड़क की चौड़ाई, पार्किंग, यातायात, अग्निसुरक्षा और सीवेज व्यवस्था को देखकर नए मास्टर प्लान में स्पष्ट प्रावधान किया जा सकता है।

    सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अवैध कारोबार को पहले बढ़ने दिया जाए और फिर उसके कारण पैदा हुई मानवीय परेशानी का पूरा भार सरकार पर डाल दिया जाए, यह भी न्याय नहीं है। कारोबार शुरू करने वाले को अपने निवेश का जोखिम समझना होगा। वहीं सरकार और नगर निगम यह नहीं कह सकते कि उन्हें कुछ पता ही नहीं था।

    भोपाल का असली सवाल दुकानों की सीलिंग नहीं है। सवाल यह है कि आवासीय भोपाल को व्यावसायिक भोपाल में बदलने की अनुमति किसने दी? अगर इसका जवाब नहीं मिला तो आज कुछ दुकानें सील होंगी, कल दूसरी जगह वही कहानी दोहराई जाएगी। कार्रवाई की सार्थकता तभी होगी जब दुकान के साथ उस व्यवस्था पर भी कार्रवाई हो जिसने आवासीय जमीन को बाजार बनने दिया—चाहे उसमें कारोबारी हो, बिल्डर हो, अधिकारी हो या राजनीतिक संरक्षण देने वाला व्यक्ति।