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  • भेल संगम गृह निर्माण सहकारी संस्था की आमसभा में कई फैसले

    भेल संगम गृह निर्माण सहकारी संस्था की आमसभा में कई फैसले


    भोपाल,29 सितंबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। भेल संगम गृह निर्माण सहकारी संस्था मर्यादित भोपाल के सदस्यों ने आज अपनी वार्षिक आम सभा में शहर को सुंदर बनाने के लिए संस्था की ओर से कई निर्णय पारित किए हैं। सहकारिता अधिनियम के अनुसार संस्था भूखंडों को कलेक्टर गाईडलाईन के अनुसार युक्ति संगत बनाएगी। बेनामी सदस्यों के भूखंडों के आबंटन निरस्त किए जाएंगे ताकि संस्था के क्षेत्राधिकार में आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकें और राजधानी के आधुनिकीकरण की प्रक्रिया में सहयोग दिया जा सके।


    संस्था के अध्यक्ष सुरेश कर्नाटक की अध्यक्षता में आयोजित वार्षिक आमसभा में संस्था के तमाम सदस्यों ने भाग लिया और फैसलों पर अपनी सहमति की मुहर लगाई। संस्था के वरिष्ठ सदस्य आरएस ठाकुर ने पूर्व में किए गए विकास कार्यों को आगे ले जाने में नए सदस्यों के योगदान की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी अपने दायित्वों को पूरा करके सहकारिता आंदोलन को मजबूती प्रदान कर रही है।


    संस्था के सदस्य नितिन वर्मा ने बताया कि एम्स अस्पताल परिसर के नजदीक साकेत नगर सामुदायिक भवन में आयोजित इस वार्षिक आमसभा में पारंपरिक तरीकों से हटकर कई महत्वपूर्ण फैसले लिए गए। सभी सदस्यों को नियमानुसार उपस्थित रहने की सूचना दी गई थी। संस्था की सदस्यता सूची के प्रकाशन के लिए सभी सदस्यों से अपने सदस्यता संबंधित दस्तावेज जमा कराने का अनुरोध किया गया था। साफ निर्देश दिया गया कि जो सदस्य अपने दस्तावेज उपलब्ध नहीं करा पाएंगे उनकी सदस्यता निरस्त कर दी जाएगी।

    संस्था के निर्देश के बाद सभी रहवासियों ने वार्षिक आमसभा में पहुंचकर नए फैसलों पर सहमति जताई है।


    सहकारिता विभाग के निर्देशानुसार पूरे आयोजन की वीडियोग्राफी कराई गई है। पिछली आडिट रिपोर्टों का अनुमोदन कराया गया है और नए वित्तीय सत्र के लिए अनुमानित बजट का अनुमोदन कराया गया है। संस्था ने फैसला लिया है कि भूखंडों से लगी हुई अतिरिक्त भूमियां कलेक्टर रेट पर युक्ति संगत बनाई जाऐंगी। कालोनी में जिन भूखंडों के सामने सड़क,नल लाईन और नालियों का निर्माण नहीं किया गया था उन लंबित विकास कार्यों को तय समयसीमा में पूरा किया जाएगा। जो भूखंड नगर निगम से मुक्त कराए गए हैं उन पर तय की गई विकास दर पर भवन निर्माण कराए जाने का निर्णय लिया गया है।


    साकेत सामुदायिक भवन सेवा न्यास के उपाध्यक्ष जे.पी. साहू का नाम नए प्रतिनिधि के रूप में अनुमोदन किया गया है।इसके साथ ही अब तक प्रतिनिधि रहे एसपी शुक्ला पद मुक्त हो जाएंगे। श्री शुक्ला के विरुद्ध कई अनियमितताओं की शिकायतें मिलीं थीं जिनकी जांच चल रही है। संस्था ने पूर्व सदस्य रहे नन्नू लाल राज की सदस्यता निरस्त कर करने की घोषणा भी की है।भौतिक सत्यापन के बाद अवैध सदस्यों का निष्कासन होगा और लावारिस संपत्तियों का वैधानिक तौर पर निष्पादन भी किया जाएगा।

  • अफसरशाही की गर्राहट

    अफसरशाही की गर्राहट


    आदिवासियों को कुत्ता कहकर उनकी औकात बताने वाले एसपी अरविंद तिवारी को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने हड़बड़ाहट में हटा दिया है। झाबुआ के कलेक्टर सोमेश मिश्रा को भी हटाया गया है। उन पर आरोप था कि वे सरकारी योजनाओं की डिलीवरी नहीं कर पा रहे थे। पिछले विधानसभा चुनावों में आदिवासियों की नाराजगी से भाजपा अपनी सरकार खोने का दंश झेल चुकी है। इस बार भी भाजपा चिंतित है। यदि आदिवासियों के आक्रोश को न थामा गया तो उसे इस बार भी सरकार बनाना कठिन हो जाएगा। आदिवासी ही नहीं भाजपा के सबसे बड़े जनाधार पिछड़ा वर्ग की बेचैनी भी भाजपा के लिए चिंता का सबब बनी हुई है। पिछले चुनाव में ब्राह्रण मतदाताओं ने जिस तरह अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए भाजपा से विद्रोह किया वह भी भाजपा के लिए भय की एक वजह बनी हुई है। यही कारण था कि भाजपा ने ब्राह्मण अफसरों ,नेताओं और ठेकेदारों को भरपूर लूट की छूट दी। अब भाजपा इस मुहाने पर आ गई है जहां सभी तबके उसे ब्लैकमेल कर रहे हैं। कमलनाथ कांग्रेस विद्रोह की इस खेती को करने में पूरी शिद्दत से जुटी हुई है।हालत ये है कि कमलनाथ राहुल गांधी की पदयात्रा और विधानसभा जैसे मौकों में भी उलझने से बच रहे हैं। भाजपा की स्थिति भई गति सांप छछूंदर जैसी हो गई है। तमाम हितग्राही मूलक योजनाएं बनाने और कांग्रेस से जनता की सहज नफरत के बावजूद भाजपा को चुनावी दौड़ में हांफी आ रही है।मध्यप्रदेश के शासकों की अकुशलता इसकी सबसे बड़ी वजह रही है।शिवराज सरकार को लगभग अठारह साल काम करने का मौका मिला। अथाह बहुमत ने उन्हें भरपूर आजादी दी। इसके बावजूद उनकी सरकार अब तक जनता की कसौटी पर खरी नहीं उतर पाई है। दिग्विजय सिंह की भ्रष्ट सरकार 2003 में सत्ताच्युत हुई थी। उन्होंने पंचायती राज के माध्यम से सत्ता के समानांतर तंत्र खड़ा करने का असफल प्रयास किया था। वह प्रयास बुरी तरह औंधे मुंह गिरा। इसकी पृष्ठभूमि में पंचायतों और प्रतिनिधियों का भ्रष्टाचार प्रमुख वजह रही थी। अफसरशाही को उन्होंने जिस तरह गली का कुत्ता बनाया उससे अफसरशाही ने भाजपा के प्रतिनिधि बनकर उमा भारती की सरकार को रिकार्डतोड़ सफलता दिलाई थी। उमा भारती ने तो अफसरशाही को उत्पादकता के लिए कसा लेकिन उनके बाद बाबूलाल गौर और फिर शिवराज दोनों ने अफसरशाही के इस अहसानों के बदले में सत्ता की बागडोर उसे ही थमा दी। शुरु से भाजपा के नेता और मंत्री बोलते रहे हैं कि अफसर उनकी नहीं सुनते। वे जो प्रस्ताव अफसरों के पास बनाकर देते हैं उन्हें वे रद्दी की टोकरी में फेंक देते हैं। भाजपा के नेताओं का ये दर्द सही था और आज भी बरकरार है। अफसरशाही ने शिवराज के कार्यकाल में जो मलाई कूटी है उसे अफसरों पर पड़े छापों और रंगे हाथों पकड़े गए अफसरों की संख्या देखकर आसानी से समझा जा सकता है। भाजपा ने खुद अफसरशाही की गोदी में बैठकर हितग्राही मूलक योजनाओं का भरपूर लाभ उठाया है। अपने कार्यकर्ताओं को दोनों हाथों में लड्डू थमाए। संघ के नाम पर तो चिरकुटों तक ने सरकारी खजाने को मनचाहे ढंग से उलीचा। अफसरशाही और भाजपा की इस लूट में जनता उपेक्षित होती रही। यदा कदा जनता के बीच भी योजनाओं का लाभ पहुंचा जिससे असंतोष अब तक हिंसक विद्रोह का रूप नहीं ले सका है।लोगों को अब भी लगता है कि शायद कभी उनकी भी लाटरी लग जाए, जो अब संभव नहीं है। कमलनाथ इसी असंतोष को उभारने का जतन कर रहे हैं। दिल्ली के बाद पंजाब में आप पार्टी ने भाजपा की धन बटोरने वाली शैली को मुफ्त बिजली के वादे से धराशायी किया है। राहुल गांधी भी अपनी यात्रा में भाजपा को अडानी अंबानी की सरकार कह रहे हैं।कांग्रेस वैसे भी पूंजीपतियों को शैतान बताकर उन पर कंकर फेंककर तालियां बजवाती रही है। कांग्रेस का ये पुराना तरीका उसे एक बार फिर जीवन दे रहा है। भाजपा के नेतागण असहाय हैं वे अपने लिए धन जुटाने वाले अफसरों उद्योगपतियों और ठेकेदारों पर आखिर कैसे प्रहार कर सकते हैं। झाबुआ के कलेक्टर एसपी को हटाकर शिवराज सिंह ने आदिवासियों को खुश करने का फौरी प्रयास किया है। भाजपा के मुख्यमंत्री जिनमें शिवराज सिंह चौहान सबसे अव्वल हैं वे चोरी छिपे मोदी सरकार की नीतियों को जन असंतोष की वजह बताते रहे हैं। ये बात बहुत हद तक सही भी है। मोदी सरकार ने टैक्स वसूलने और सब्सिडी बंद करने में जो तेजी दिखाई है उससे जनता में असंतोष फैला है। इसके बावजूद शिवराज सिंह चौहान और अन्य राज्यों की सरकारें जनता को इन बदली परिस्थितियों के बीच जिंदा रहने की कला नहीं सिखा पाई हैं। कांग्रेस की मुफ्तखोरी वाली राजनीति को बंद कभी न कभी तो होना ही था लेकिन भाजपा ने अधूरे प्रहार किए हैं। वह न तो मुफ्तखोरी की नीतियां पूरी तरह बंद कर पाई है और न ही जनता को धन बनाने की कला सिखा पाई है। जाहिर है इससे असंतोष बढ़ रहा है। उस पर झाबुआ एसपी अरविंद तिवारी की नशे में धुत्त बदतमीजी और प्रशासनिक अकुशलता की वजह से कलेक्टर सोमेश मिश्र ने आदिवासियों के असंतोष को हवा दे दी है। जाहिर है मुख्यमंत्री ने मजबूरी में उन्हें हटाया है। सोमेश मिश्र ने कलेक्टरी से पहले आयुष्मान मिशन के सीईओ की जवाबदारी संभाली थी। कलेक्टरी भी उन्हें इनाम के तौर पर मिली थी। जब भाजपा की शिवराज सरकार अफसरों की मैदानी पोस्टिंग उपकृत करने के अंदाज में करती रही है तो फिर अफसर मैदान में जाकर अपना करिश्मा आखिर क्यों न दिखाएंगे। जाहिर है मध्यप्रदेश में भाजपा की सरकार को अपने किए कर्मों का फल मिलना शुरु हो गया है। भाजपा की अकुशलता कांग्रेस के लिए भाग्य से छींका टूटने वाली साबित हो रही है। पिछले चुनाव में भी कांग्रेस के भाग्य से छींका टूटा था उसने सत्ता में आकर यही लूट का दौर चलाया था। अब यदि जनता भाजपा से नाराज होती है तो उसे एक बार फिर कमलनाथ जैसा नागनाथ सौगात में मिलेगा।अफसरशाही तो मदमस्त है ही।

  • होलिका में गौकाष्ठ का  उपयोग करें- कलेक्टर

    होलिका में गौकाष्ठ का उपयोग करें- कलेक्टर

    भोपाल12 फरवरी(प्रेस सूचना केन्द्र)।कलेक्टर तरूण पिथोड़े और केन्द्रीय पर्यावरण विभाग के अधिकारियों के साथ हुई चर्चा में निर्णय लिया गया कि इस बार होलिका दहन में लकड़ी का उपयोग नहीं करते हुए अधिकाधिक गौकाष्ठ का उपयोग हो इसके लिए विशेष अभियान चलाकर नागरिकों और स्कूली विद्यार्थियों को जागरूक किया जाये । भोपाल जिले में शवदाह गृहों में भी गौकाष्ठ का उपयोग हो इसके लिए भी मुहिम चलाई जायेगी । पर्यावरणविद डॉ. योगेश सक्सेना ने बताया कि जिले की शासन सेअनुदान प्राप्त गौशालाएं गौकाष्ठ का निर्माण कर शवदाह गृहों एवं लकड़ी के टालों पर इसका विक्रय कर रोजगार का जरिया बनाया जा सकता है । इसी प्रकार सेन्ट्रल जेल भोपाल के कैदियों को भी गौकाष्ठ निर्माण कराकर रोजगार से जोड़ा गया है । इसके लिए गोकाष्ठ निर्माण की मशीन जेल परिसर में स्थापित की गई है ।

    पर्यावरण संरक्षण प्रदेश के लिए स्थाई जरूरतों में से एक है । पर्यावरण केसंरक्षण, बचाव और हरा भरा शीतल प्रदेश हो इसके लिए शासन प्रशासन हर संभव प्रयास कर रहा है । पेड़ों को कटने से बचाने के लिए गौकाष्ठ आधारित लकड़ी, कंडे और अन्य संसाधन आज पर्यावरण को सामान्य स्थिति में लाने के लिए उपयोग में लाए जा रहे हैं ।

    कमिश्नर एवं कलेक्टर भोपाल के इस अभियान से नवाचार हो रहे हैं । गौकाष्ठ के उपयोग से सघन जंगल, जलवायु और पर्यावरण को बचाने में मदद मिलेगी । गौकाष्ठ आधारित वस्तुएं पर्यावरण को नुकसान से बचाने के लिए उपयोग में लाई जा रही हैं ।इस ओर कईं सामाजिक संस्थाएं, समाजसेवी भी अपना योगदान कर रहे हैं । गौकाष्ठ के उपयोग से जहां पर्यावरण को नई ऊर्जा मिल रही है वहां इसके उपयोग से पर्यावरण और बेवक्त बदलते मौसम की प्रतिकूल परिस्थिति को बदलने में मदद मिल रही है । गौकाष्ठ के उपयोग से जहां पेड़ों को कटने से बचाने में मदद मिलेगी वहां इसके उपयोग से रोजगार के नवीन अवसरों का सृजन हो सकेगा । साथ ही विभिन्न संस्थाओं को, आजीविका मिशन और गौशालाओं को पर्याप्त व्यवस्था के साथ साथ उनकी आर्थिक स्थिति में भी बदलाव लाया जा सकेगा । महिलाओं को भी रोजगारसे जोड़ा जा सकेगा । इससे शासन प्रशासन की विभिन्न योजनाओं का लाभ विभिन्न संस्थाओं और शासकीय अशासकीय गौशालाओं को भी मिल सकेगा ।

    क्या है गौकाष्ठ

    गाय के गोबर से निर्मित कंडे रूपी लकड़ियां हैं । गौकाष्ठ के उपयोग से वातावरण में कार्बनडाई आक्साईड की मात्रा भी कम होती है और गौकाष्ठ की केलोरिक वेल्यू लकड़ी से अधिक और घनत्व ज्यादा होता है जो पर्याप्त मात्रा में ईधन के लिए भी अनुपयोगी है । गौकाष्ठ निर्मित वस्तुएं प्रदूषण को रोकने, बढ़ती जरूरतों के लिए उपयोगी साबित हो रही हैं । गौकाष्ठ दैनिक जीवन में भी बहुतायत उपयोगी साबित हो रही है, साथ ही कईं कार्यक्रमों में भी इसकी उपयोगिता प्रमाणित है । गौकाष्ठ के उपयोग से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार के नए अवसर प्राप्त होंगे । साथ ही पूरे प्रदेश में लकड़ियों एवं अन्य वस्तुओं के जलाने से पर्यावरण को बचाया जा सकेगा । पेड़ों की अत्यधिक कटाई को रोकने में मदद मिलेगी एवं इसके दोहरे उपयोग से हम पर्यावरण के संरक्षण में भागीदार बनेंगे और वातावरण को शुद्ध बना सकेंगे ।

  • रबर की गुड़िया का खेल नहीं कलेक्टरी

    रबर की गुड़िया का खेल नहीं कलेक्टरी

    रबर की गुड़िया और खिलौनों से खेलने वाले बच्चे पूरी जिंदगी उस साए से मुक्त नहीं हो पाते हैं। चाहे वे कितनी ही बड़ी जवाबदारी क्यों न संभाल लें लेकिन उन्हें लगता है कि वे गुड़िया से ही खेल रहे हैं और वह कोई जवाब नहीं देगी। उसके जवाब भी उन्हें ही देना होंगे। ऐसा ही कुछ राजगढ़ की कलेक्टर निधि निवेदिता और डिप्टी कलेक्टर प्रिया वर्मा के साथ घट रहा है।जिला दंडाधिकारी का पद पाने के बाद भी उन्हें लगता है कि वे बच्चों का खेल खेल रहीं हैं। गलती करने पर उन्हें लाड़ से डपटने वालों को छोड़कर किसी का सामना नहीं करना पड़ेगा। वे भूल रहीं हैं कि वे जनता की अनुबंधित नौकर हैं। उन्हें जनता ने अपनी व्यवस्थाओं की जवाबदारी निभाने के लिए नौकरी पर रखा हुआ है। अफसरी का ज्यादा अनुभव न होने की वजह से उन्हे लगता है कि उनकी जवाबदारी जनता के प्रति नहीं बल्कि शासकों के प्रति है। अंग्रेजों की प्रेरणा से बनी अफसरशाही शुरु से ही शासकों के प्रति झुकाव रखती रही है।इस समस्या के निदान के लिए ही स्वर्गीय राजीव गांधी ने पंचायती राज की अवधारणा को पूरे देश में लागू किया था। जिस दिग्विजय सिंह ने पंचायती राज व्यवस्था को प्रदेश में सख्ती से लागू किया वही आज बिगड़े दिमाग वाली अफसरों का बचाव कर रहे हैं। उन्हें तो अपनी सरकार केवल इसलिए गंवानी पड़ी थी क्योंकि पंचायती राज व्यवस्था अराजकता की भेंट चढ़ गई थी और अफसरशाही ने उनकी सरकार का वध कर दिया था। इसी अफसरशाही की असफलताएं गिनाकर कांग्रेस की मौजूदा सरकार सत्ता में आई है। इसके बावजूद सत्ता में आने के बाद वह अफसरों की गुलामी करने लगी है। राजगढ़ के कुछ जागरूक नागरिक जब नागरिकता संशोधन कानून का समर्थन कर रहे थे तब उन्हें जरा भी भान नहीं था कि जिस सरकारी अमले पर कानून लागू करवाने की जिम्मेदारी है वे ही उनके ऊपर हमला कर देंगे।उस समय वे शांतिपूर्ण तरीके से विरोध जता रहे थे। उनके हाथों में तिरंगा झंड़ा था। कमलनाथ सरकार ने चूंकि राजनीतिक एजेंडे के तहत विरोध प्रदर्शन को अनुमति न देने का अघोषित आदेश दिया है इसलिए खुद को सरकार का सिपाहसालार बताने के लिए कुछ अफसरों में होड़ सी लग गई है। जाहिर है कि राजगढ़ की कलेक्टर और डिप्टी कलेक्टर को भी राज्य सरकार की चिलम भरने में जुटना ही था। जिस बेखौफ अंदाज में कलेक्टर ने नारे लगाते कार्यकर्ता को झांपड़ रसीद किया और जिस गुंडई भरे लहजे में डिप्टी कलेक्टर ने तिरंगा धारियों को घसीटा उससे तो ऐसा ही लग रहा था मानों अंग्रेजों के टुकड़खोर आजादी के परवानों पर जुल्म ढा रहे हों। इस बदतमीजी का जवाब खून खराबे से भरा भी हो सकता था। भीड़ चूंकि हिंसक नहीं थी और न ही हिंसा का उसका कोई इरादा था इसलिए किसी शैतान प्रदर्शनकारी ने डिप्टी कलेक्टर की चोटी खींचकर उसे याद दिलाया कि वह सीमा लांघ रही है। पुलिस के बीचबचाव से भले ही दोनों अफसर बच गईं हों लेकिन जनता के बीच इसकी प्रतिक्रिया अच्छी नहीं है। इस घटना से नाराज भाजपा के कार्यकर्ता जब प्रदर्शन कर रहे थे तो पूर्व मंत्री बद्री यादव ने भावनाओं के अतिरेक में कुछ ज्यादा ही काल्पनिक कहानी सुना डाली। उन्होंने कहा कि यहां की कलेक्टर कांग्रेसियों को तो गोदी में बिठाकर दूध पिलाती है लेकिन भाजपा के कार्यकर्ताओं को थप्पड़ मारती है। हंसी ठिठोली के अंदाज में कही गई इस बात ने तूल पकड़ लिया और डिप्टी कलेक्टर की शिकायत पर बद्रीयादव की गिरफ्तारी और जमानत की प्रक्रिया भी की गई। दूध दुहना और लोगों को पिलाना बद्रीयादव का खानदानी काम रहा है। इसी वजह से उन्होंने कलेक्टर के कांग्रेस प्रेम को दर्शाने के लिए इस जुमले का इस्तेमाल कर डाला। जब प्रतिक्रियाएं आईं तो उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने यह कहते हुए माफी भी मांग ली कि उनकी बात का गलत अर्थ न निकाला जाए। हालांकि जब बात बिगड़ती है तो उसकी कई तस्वीरें सामने आती हैं।एक एएसआई और पटवारी ने कलेक्टर के दुर्व्यवहार को लेकर ही शिकायत कर डाली। जिसमें कलेक्टर ने उन्हें भी थप्पड़ मारा था। अब कलेक्टर साहिबा की मानसिक दशा का दूसरा ही पक्ष सामने आने लगा है। जाहिर है कि भारतीय प्रशासनिक सेवा के आला अधिकारियों और उन्हें मध्यप्रदेश कैडर में भेजने वाले केन्द्रीय कार्मिक मंत्रालय को ऐसी मानसिकता वाली अफसर की कार्यशैली पर गंभीरता से विचार करना चाहिए जो जनता के प्रति असहिष्णु हो। फौरी प्रतिक्रिया के तौर पर निधि निवेदिता और प्रिया वर्मा को निलंबित किया जाना चाहिए। राज्य सरकार से फिलहाल ये उम्मीद इसलिए नहीं की जाती क्योंकि भाजपा की ओर से इस घटना को लेकर अफसरों का विरोध किया जा रहा है। सबसे बड़ी बात तो ये है कि अफसरों को नसीहत देने वाले मुख्यमंत्री कमलनाथ महिला अफसरों के मामले में थोड़े ज्यादा सहिष्णु हैं। शायद यही वजह है कि उनकी कांग्रेस भाजपा के प्रदर्शन को महिलाओं का अपमान बताने में जुटी है। वीडियो क्लीपिंग्स में जो हकीकत सामने आई है उसमें साफ दिख रहा है कि किसी भी प्रदर्शन कारी ने महिला अफसरों से बदतमीजी नहीं की थी। इसके बावजूद महिला अफसरों ने सीमाएं लांघकर कार्यकर्ताओं पर हमला किया। प्रिया वर्मा तो अपनी अफसर से जुगलबंदी करने की रौ में इतना बह गईं कि उन्होंने भीड़ में घुसकर तिरंगा लिए व्यक्तियों को चुन चुनकर घसीटना शुरु कर दिया। गैर जिम्मेदार अफसरों पर कार्रवाई करने की जवाबदारी निश्चित रूप से राज्य सरकार की है। उसे इन अफसरों को तत्काल हटाकर निलंबित करना चाहिए। उनके व्यवहार की जांच कराई जानी चाहिए और केन्द्र को सूचित किया जाना चाहिए।ये भी सुनिश्चित किया जाए कि जो अफसर भीड़ को नियंत्रित करने के बजाए उसे भड़काने की मानसिकता रखते हों उन्हें भविष्य में कभी मैदानी पोस्टिंग न दी जाए। कमलनाथ सरकार से फिलहाल ऐसे किसी सख्त कदम की उम्मीद नहीं की जा सकती। जो सरकार नागरिकता संशोधन कानून जैसे संसद से पारित व्यवस्था को लेकर अनर्गल बयानबाजी कर रही हो उससे जिम्मेदाराना व्यवहार की अपेक्षा भी क्यों की जाए। केन्द्र सरकार ने आईएएस अफसरों की व्यवस्था सुधारने की दिशा में कई प्रयास किए हैं। निश्चित रूप से ऐसे बिगड़े अफसरों के भविष्य का फैसला उसे करना चाहिए। सबसे बड़ी जवाबदारी तो भाजपा जैसे राजनीतिक दलों और आम नागरिकों की है।जनता के प्रति सड़ांध भरी मानसिकता लेकर नौकरी में आ गए इन अफसरों की शैली को अदालत में चुनौती दी जानी चाहिए। उनकी योग्यता की छानबीन कराई जाए और उन्हें पदमुक्त किया जाए ताकि सरकार और जनता के बीच संवादहीनता की स्थितियां न बनें। जिन अफसरों को जनता और सरकार के बीच संवाद की कड़ी बनना चाहिए यदि वे रोड़ा बन रहे हों तो बेहतर है इस रोड़े को जल्दी से जल्दी रास्ते से हटाया जाए। क्योंकि कलेक्टरी कोई रबर के गुड्डे गुड़ियों का खेल नहीं है। कमलनाथ सरकार इस पर गौर करे तो अच्छा ही होगा।