भारतीय जनता पार्टी के फैसलों को देखकर आज लोग हतप्रभ हैं। नरोत्तम मिश्रा जैसे दिग्गज की पतंग कटने से भाजपा के कार्यकर्ता और नेता सभी बौखलाए घूम रहे हैं। उन कार्यकर्ताओं की पूरी जमीन दरक गई है जिन्होंने नरोत्तम के लंबी दौड़ का घोड़ा मानकर अपनी पूरी जायदाद दांव पर लगा दी थी। भाजपा की राजनीति को जिन्होंने भी करीब से देखा है उन्होंने नरोत्तम की दबंगई से बैचेनी भी महसूस की है। ब्राह्मण राजनीति का संबल पाकर नरोत्तम सत्ता के जिस सत्रहवें आसमान पर पहुंच गए थे उसे देखकर कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि पार्टी कभी उनका टिकिट काटने का फैसला भी ले सकती है। खुद को केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह का करीबी होने का अहसास भरने वाले नरोत्तम भी इस तरह की कोई उम्मीद नहीं कर रहे थे. उन्होंने अपनी चुनावी तैयारी पूरे आत्म विश्वास से चालू कर दी थी।
भाजपा बार बार अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को संदेश देने का प्रयास कर रही है कि वे समय की मांग को देखते हुए अपने तौर तरीके बदलें। कांग्रेस के जमाने की राजनीतिक शैली की पूंछ पकड़कर चलने की कुनबे वाली राजनीति छोड़ें पर गमले में उगे हुए नेता ये समझने को राजी नहीं हैं। विधानसभा अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर, पीडब्ल्यूडी मंत्री राकेश सिंह, पंचायत मंत्री प्रहलाद पटेल जैसे नेताओं को मध्यप्रदेश भेजकर भाजपा हाईकमान ने पार्टी की लाईन और लैंथ बदलने की कोशिश की लेकिन वह असफल रही। उमा भारती जैसी कद्दावर नेता को विदा करके संदेश देने का प्रयास किया कि भारत की राजनीतिक जरूरतें कुछ अलग हैं लेकिन कार्यकर्ता पुराना ढर्रा छोड़ने को तैयार नहीं हैं। गोपाल भार्गव , भूपेन्द्र सिंह, जयंत मलैया, हिम्मत कोठारी जैसे दिग्गजों को दर्शक दीर्घा में बिठाकर पार्टी ने अन्य नेताओं को नई राजनीति करने का संदेश दिया पर वे कांग्रेस के दिग्विजय सिंह की दगाबाजी को अपना माडल बनाकर चलने लगे। शिवराज सिंह चौहान को केन्द्र भेजकर पार्टी ने चाहा था मध्यप्रदेश में वह भाजपा को कांग्रेस की छत्रछाया बनकर चलने वाली पिछलग्गू छवि से मुक्त कर पाएगी। इसके बाद भी लगभग पांच लाख करोड़ रुपए डकारकर बैठे नेताओं के मुंह लगा खून उन्हें आदमखोर बनने से नहीं रोक पा रहा है। नरोत्तम के टिकिट कटने के बाद उनके समर्थकों ने जिस तरह भाजपा कार्यालय को बंधक बनाया, शहर के बाजार बंद कराने का प्रयास करके सरकार को ठेंगा दिखाया उससे लगता है कि नरोत्तम अपने पतन की नई इबारत लिख रहे हैं।
आज भाजपा के सामने चुनौती है कि वह कांग्रेस के छोड़े गए पापों को भी ढोए और वैश्विक परिस्थितियों जन्य मंहगाई से भी जनता को बचाए। ऐसे में वह दंभी नेताओं की स्वयं का घर भरने वाली राजनीति को बर्दाश्त कैसे कर सकती है। जिन नेताओं को उसने घर बिठाया है वे सभी अरबों की जायदाद खड़ी करके किनारे किए जाने के बाद स्वयं को सहानुभूति का पात्र बताने का प्रयास कर रहे हैं। वे अपने स्थान पर अपनी औलादों को राजगद्दी दिलाने का पुरजोर प्रयास भी कर रहे हैं। भाजपा हाईकमान ने कई बार स्पष्ट कर दिया है कि वह कांग्रेस की तरह परिवारवादी पार्टी नहीं है। किसी कार्यकर्ता को केवल इसलिए सत्ता में नहीं उतारा जा सकता कि वह फलां राजनेता का बेटा या बेटी है। इसके बावजूद पार्टी के नेतागण चंद उदाहरणों का हवाला देकर अपनी नई पीढ़ी को अवसर दिए जाने की वकालत कर रहे हैं।
मध्यप्रदेश भाजपा की प्रयोगशाला रही है। यहीं से भाजपा का संगठन परवान चढ़ा है। इसके बावजूद कुशाभाऊ ठाकरे,राजमाता विजयाराजे सिंधिया, वीरेन्द्र कुमार सखलेचा,प्यारेलाल खंडेलवाल, कैलाश जोशी,सत्यनारायण जटिया, राघवजी भाई,जैसे अनेकानेक नेताओं ने जो भाजपा खडी की थी वह धीरे धीरे कांग्रेस में तब्दील हो गई। सुंदरलाल पटवा ने उस भाजपा को अर्जुनसिंह कांग्रेस की बी टीम बनाकर यहां केन्द्र विरोधी राजनीति की नींव रखी थी। कैलाश नारायण सारंग, बाबूलाल गौर, जैसे नेताओं को खड़ा करके कांग्रेस ने भाजपा को अपने अनुकूल बनाकर उपयोग किया। आज वह भाजपा कांग्रेस की लूटो और भागो की संस्कृति की वाहक बन गई है। दिग्विजय सिंह ने अपने गुरु अर्जुनसिंह की तरह शतरंज की चाल चलते हुए भाजपा को सत्ता में आने का अवसर देकर सोचा था कि समय आने पर हम इसे पटवा सरकार की तरह गिराकर दुबारा गद्दी संभाल लेंगें।उनका ये दांव वक्त की आंधी में धराशायी हो गया। अपने राजनीतिक जीवनकाल में उन्होंने भाजपा में कई नेता खड़े कर लिए थे जो हमेशा उनके हुकुम के गुलाम बने रहे। कैलाश विजयवर्गीय जैसे नेता तो खुलकर आज भी दिग्विजय सिंह का गुणगान करते नहीं थकते।
भाजपा की इसी दुहरे मुंह वाली राजनीति देखकर हाईकमान के चिंतक और विचारक बैचेन हो गए हैं। मध्यप्रदेश की धीमी राजनीतिक विकास यात्रा, किसान कर्मण्य अवार्ड जीतकर फर्जी विकास के दावे करने वाली राजनीति की पोल राज्य की बैलेंसशीट बार बार खोल रही है। इसके बावजूद भ्रष्टाचार करके माफिया सरगना बन चुके दंभी नेताओं की धमकियों के सामने हाईकमान कई बार खुद को लाचार पाता रहा है। भाजपा संगठन की कमान युवा नेता विष्णुदत्त शर्मा को सौंपकर भाजपा ने सोचा था कि वे नई पीढ़ी के योग्य युवाओं को आगे लाएंगे पर वे ब्राह्रणवादी राजनीति के मोहपाश में इस कदर उलझे कि राजनीति के परिदृश्य में अलग थलग हो गए।
भाजपा ने महाकाल लोक का निर्माण करके धर्म की राजनीति को सत्ता का सहायक बनाने का प्रयास किया है पर नरोत्तम मिश्रा दतिया में नवगृह मंदिर बनाकर राजनीति को धर्म का चेला बनाने चल निकले। आखिर कब तक भाजपा हाईकमान इस ब्लैकमेलिंग को बर्दाश्त कर सकता था। अपनी बारी आने पर उसने टिकिट काटकर संदेश देने का प्रयास किया है कि कार्यकर्ता यदि मालिक बनने का प्रयास करेगा तो फिर उसे उसकी भूमिका याद जरूर दिलाई जाएगी। शिवराज सिंह चौहान की पिलपिली सरकार में मलखंभ पर चढ़कर राजनीति करने वाले नरोत्तम ये भूल गए हैं कि भाजपा आज विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है। उसके सामने चुनौती है कि वह भारत को विश्व की महाशक्ति बनाकर दिखलाए। किसी छुटभैये नेता की जयजयकार कराने के लिए भाजपा का मंच आज सीढ़ी नहीं बन सकता।हाईकमान ने पार्टी संगठन से कई नजरियों से छानबीन कराई और उसके बाद टिकिट काटने का फैसला लिया । जाहिर है कि कार्यकर्ताओं को इस फैसले का सम्मान करना पड़ेगा। आखिर कैप्टन को ये अधिकार तो होना ही चाहिए कि वह किस वक्त पर किस खिलाड़ी को कहां उतारे।
