भोपाल चेंबर आफ कामर्स एंड इंडस्ट्रीज के चुनावों में जिस तरह कार्पोरेट जगत से जुड़े धन्नासेठों का बोलबाला दिखा और पच्चीस हजार व्यापारियों के बीच महज बाईस सौ व्यापारियों के बीच ये चुनाव कराए गए उसे देखकर कहा जा सकता है कि एक छोटी सी संस्था को भोपाल के व्यापार जगत की शीर्ष संस्था बनाने की कोशिश की जा रही है। सबसे बड़ी बात तो ये है कि सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी से जुड़े व्यापारियों ने अपना कोई प्रत्याशी मैदान में नहीं उतारा था। प्रगतिशील पैनल के अध्यक्ष पद के प्रत्याशी तेजकुल पाल सिंह पाली हों या उनके प्रतिद्वंदी उन्नति पैनल के गोविंद गोयल दोनों पूर्व में कांग्रेस से जुड़कर राजनीति करते रहे हैं। ये बात अलग है कि चुनाव जीतने के बाद गोविंद गोयल अपने समर्थकों के साथ भाजपा कार्यालय पहुंचे और मीडिया प्रभारी आशीष अग्रवाल से भेंट करके शुभकामनाएं प्राप्त कीं। दरअसल ये जताने की कोशिश है कि भोपाल के व्यापारी सरकार के साथ खड़े हैं।प्रगतिशील पैनल के उपाध्यक्ष पद पर निर्वाचित कमल पंजवानी बरसों से गोविंद गोयल के ही साथी रहे हैं। व्यापारियों की आवाज ने उन्हें प्रगतिशील पैनल में भेज दिया। अब चेंबर में जो नया नेतृत्व उभरा है वह मौजूदा समस्याओं पर लगभग एकराय है। जो भाजपा के लिए खतरे की घंटी बनने जा रहा है।

भोपाल में लगभग पच्चीस हजार व्यापारी हैं जिनके कारोबार को बड़ा कहा जा सकता है और जो जीएसटी भी जमा करते हैं।जबकि चुनाव में मत डालने पहुंचे ज्यादातर छोटे व्यापारी थे और उनमें भी जीएसटी भरने वालों की संख्या तो बहुत कम है।जिस तरह व्यापार जगत में इन दिनों आनलाईन कारोबार ने दस्तक दी है और स्थानीय कारोबारी परेशानी महसूस कर रहे हैं उन हालात में व्यापारी यदि कांग्रेस से दूरी रखते हैं तो वे भाजपा मे भी बैचेनी ही महसूस कर रहे हैं। भाजपा ने व्यापारियों की समस्याओं के समाधान के लिए कोई विशेष प्रयास नहीं किए हैं। जीएसटी और अन्य तरह की दस्तावेजी जरूरतों ने व्यापार करना बहुत कठिन बना दिया है. जाहिर है कि ये स्थिति भोपाल चेंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज के एक चुनाव तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके भीतर भारतीय राजनीति, व्यापारिक वर्ग और बदलते वैश्विक आर्थिक परिदृश्य के बीच के जटिल संबंध छिपे हैं। लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी को ‘बनियों की पार्टी’ या व्यापार-उद्योग समर्थक दल के रूप में देखा जाता रहा है। ऐसे में भोपाल जैसे प्रमुख व्यापारिक केंद्र में चेंबर के अध्यक्ष पद पर भाजपा से जुड़े किसी भी प्रत्याशी का न होना कई तरह के सवाल खड़े करता है।
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि चेंबर ऑफ कॉमर्स जैसे संगठनों के चुनाव औपचारिक रूप से गैर-राजनीतिक माने जाते हैं, लेकिन व्यवहार में उनका सीधा रिश्ता सत्ता, नीतियों और राजनीतिक दलों से रहता है। व्यापारिक समुदाय अक्सर उसी दल या विचारधारा के करीब खड़ा दिखता है, जिसे वह अपने हितों के लिए अधिक अनुकूल मानता है। भाजपा को दशकों तक यही लाभ मिलता रहा। उदारीकरण के बाद, जीएसटी, कॉर्पोरेट टैक्स में कटौती, इंफ्रास्ट्रक्चर पर जोर जैसी नीतियों ने इस धारणा को और मजबूत किया कि भाजपा व्यापार के स्वाभाविक साथी के रूप में खड़ी है। ऐसे में भोपाल चेंबर के चुनावों में भाजपा पृष्ठभूमि वाले किसी चेहरे का आगे न आना या न उभर पाना एक सामान्य घटना नहीं कही जा सकती।
यह स्थिति व्यापार जगत में हो रहे उन बदलावों की ओर इशारा करती है, जिन पर शायद भाजपा का सीधा संवाद कमजोर पड़ा है। छोटे और मध्यम व्यापारियों का एक बड़ा वर्ग बीते कुछ वर्षों में असहजता महसूस करता रहा है—चाहे वह जीएसटी की जटिलताएं हों, अनुपालन का बोझ हो, ऑनलाइन और कॉर्पोरेट व्यापार से बढ़ती प्रतिस्पर्धा हो या फिर नोटबंदी के बाद नकदी आधारित कारोबार पर पड़े दीर्घकालिक प्रभाव। बड़े उद्योग समूहों और कॉर्पोरेट सेक्टर के लिए नीतियां अपेक्षाकृत अनुकूल रहीं, लेकिन परंपरागत व्यापारिक वर्ग, जिसे कभी भाजपा का सबसे पक्का आधार माना जाता था, स्वयं को हाशिये पर महसूस करने लगा है। भोपाल चेंबर का चुनाव इसी असंतोष का एक स्थानीय प्रतिबिंब भी हो सकता है।
दूसरी ओर, वैश्विक बाजार में चल रही उथल-पुथल—चीन-अमेरिका तनाव, आपूर्ति श्रृंखला में बदलाव, युद्धों और भू-राजनीतिक संघर्षों का असर, तकनीकी परिवर्तन—भारतीय व्यापार जगत की मानसिकता को भी बदल रहा है। आज व्यापारी केवल स्थानीय या राष्ट्रीय नीतियों तक सीमित नहीं सोच रहा, वह वैश्विक प्रतिस्पर्धा, निर्यात-आयात, डिजिटल अर्थव्यवस्था और नई पीढ़ी के उपभोक्ताओं को ध्यान में रखकर अपनी रणनीति बना रहा है। ऐसे में राजनीतिक दलों से उसकी अपेक्षाएं भी बदली हैं। वह केवल कर रियायत या संरक्षण नहीं, बल्कि स्पष्ट दीर्घकालिक दृष्टि, सरल नियम और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा के लिए सक्षम वातावरण चाहता है।
यहां सवाल उठता है कि क्या भाजपा के भीतर इन बदलावों को लेकर पर्याप्त चिंतन चल रहा है, या पार्टी अब भी पुराने ‘व्यापार समर्थक’ टैग पर ही संतुष्ट है। पार्टी की नीति-निर्माण प्रक्रिया में अर्थशास्त्री, कॉर्पोरेट सलाहकार और बड़े उद्योग समूहों की आवाज तो सुनाई देती है, लेकिन जमीनी व्यापारिक संगठनों, मंडियों, छोटे उद्योगों और चेंबरों की बदलती सोच को समझने का प्रयास अपेक्षाकृत कमजोर दिखता है। भोपाल चेंबर का चुनाव इस दूरी को उजागर करता है—जहां व्यापारिक समुदाय ने संभवतः किसी राजनीतिक पहचान से अलग हटकर अपने आंतरिक समीकरणों और प्राथमिकताओं के आधार पर नेतृत्व चुना।
यह मौन भी गौर करने लायक है। भाजपा या उसके स्थानीय नेतृत्व की ओर से इस तरह के संकेतों पर सार्वजनिक आत्ममंथन कम ही दिखाई देता है। जबकि एक ऐसे दौर में, जब वैश्विक अर्थव्यवस्था अनिश्चितता से घिरी हो, राजनीतिक दलों का व्यापारिक वर्ग से संवाद और भरोसा बनाए रखना बेहद जरूरी है। यदि भाजपा सचमुच स्वयं को व्यापार और उद्योग की पार्टी मानती है, तो उसे केवल नीतिगत घोषणाओं से आगे बढ़कर व्यापारिक संगठनों के भीतर उभर रहे नए नेतृत्व, नई चिंताओं और नई अपेक्षाओं को समझना होगा।
अंततः, भोपाल चेंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज के चुनाव में भाजपा से जुड़ा कोई अध्यक्ष प्रत्याशी न होना एक घटना भर नहीं, बल्कि एक संकेत है। यह संकेत है कि व्यापार जगत एक संक्रमण के दौर से गुजर रहा है और उसकी राजनीति से अपेक्षाएं बदल रही हैं। यदि भाजपा इन बदलावों को समय रहते पढ़ने और उन पर गंभीर मंथन करने में सफल होती है, तो वह अपने पुराने आधार को नए संदर्भ में फिर से जोड़ सकती है। अन्यथा, ‘बनियों की पार्टी’ की छवि केवल एक पुरानी राजनीतिक स्मृति बनकर रह जाने का खतरा भी नकारा नहीं जा सकता।
