सरकारी जमीन की सुरक्षा, गरीबों को न्याय और राजस्व वृद्धि—तीनों मोर्चों पर प्रशासनिक सुधार लागू कर रहीं हैं कमिश्नर निधि निवेदिता
भोपाल, 17 अक्टूबर(प्रेस इंफार्मेशन सेंटर)। सेटेलाईट सर्वे से अब मध्यप्रदेश के राजस्व प्रशासन की गड़बड़ियां उजागर होने लगी हैं। इससे घबराकर भू माफिया ने सामाजिक समितियों को हथियाना शुरु कर दिया है ताकि शासन पर दबाव बनाने के लिए प्रतिष्ठित लोगों की भीड़ की आड़ में छुपा जा सके।हाल ही में मोहन यादव सरकार ने मोदी सरकार की प्रतिष्ठित स्वामित्व योजना को लागू करने का दबाव बनाया तो पटवारियों की हड़ताल भी इसी भू माफिया की रणनीती का ही कदम बताया जा रहा है।हालांकि राजस्व मंत्री करण सिंह वर्मा ने साफ चेतावनी दी है कि यदि किसी कर्मचारी के भ्रष्टाचार की शिकायत मिली तो उन्हें सस्पेंड करके काम से हटा दिया जाएगा।
राजस्व आयुक्त निधि निवेदिता की सक्रियता से पटवारियों और शासन के बीच चल रहा गतिरोध समाप्त हो गया है।स्वामित्व योजना पर काम भी शुरु हो गया है लेकिन जमीनी अमले की कहानियां आज भी जन असंतोष की वजह को साफ उजागर कर रहीं हैं।सूत्रों का कहना है कि राजस्व प्रशासन के कुछ लोगों ने नेताओं,अफसरों,व्यापारियों और दबंगों की काली कमाई को छुपाने के लिए बड़ी संख्या में जमीनों के दस्तावेज छुपा रखे हैं। इसके एवज में प्रशासन में बैठे जमीनी राजस्व अमले ने कथित तौर पर भारी अग्रिम ले रखा है।यही वजह है कि वे पारदर्शी व्यवस्था लागू करने की दिशा में अड़ंगे लगा रहे हैं।
हाल ही में भोपाल की मलाईदार तहसील में पदस्थ एक महिला पटवारी की काली कमाई को लेकर जो परचा बंटा है उससे भू माफिया की इन गतिविधियों का पता चल रहा है।ये महिला पटवारी इन दिनों भू माफिया के प्रतिनिधियों के साथ एक समाज की समिति को हथियाने के लिए तरह तरह के षड़यंत्र रच रही है। ये संस्था भू राजस्व अमले से जुड़े एक विशेष समाज के प्रतिनिधियों ने केवल सामाजिक उद्देश्यों के लिए बनाई थी।अब इस समिति का इस्तेमाल ये भू माफिया राजस्व विभाग और सरकार पर दबाव के लिए इस्तेमाल करना चाह रहा है।इसके लिए ये पटवारी अब भू माफिया के साथ मिलकर संस्था बनाने वाली निर्वाचित अध्यक्ष को ही हटाने का षड़यंत्र रच रही है।

दरअसल सेटेलाईट सर्वे ने जमीन के हर इंच टुकड़े की असलियत उजागर कर दी है। जिन भूखंडों को सरकारी रिकार्ड में खाली प्लाट दिखाया गया था उन पर बड़े बड़े शापिंग माल खड़े नजर आ रहे हैं। जो मकान रहवासी बताए गए थे वहां फैक्टरियां चल रहीं हैं। सरकारी रिकार्ड को झांसा देने के बदले अमले के कुछ अधिकारियों ने करोड़ों की दौलत जुटा ली है। भोपाल की जिस पटवारी का हवाला दिया जा रहा है उसने पति की मौत के बाद अनुकंपा नौकरी पाई थी पर लगभग दस करोड़ रुपयों से ज्यादा की दौलत जुटाकर गुलछर्रे उड़ा रही है।
वित्त वर्ष 2026-27 के बजट में स्टांप ड्यूटी एवं पंजीयन शुल्क से ₹19,112 करोड़ और भू-राजस्व से ₹877 करोड़ की प्राप्ति का लक्ष्य रखा गया है। यानी इन दो मदों से लगभग ₹19,989 करोड़ जुटाने का अनुमान है। लेकिन यह आंकड़ा अपने आप में राजस्व प्रशासन की पूरी तस्वीर नहीं दिखाता। सैटेलाइट सर्वे और भू-अभिलेखों के डिजिटल मिलान से जमीन के वास्तविक उपयोग, दर्ज रकबे और सरकारी रिकॉर्ड के बीच खासा अंतर पाया गया है। सवाल है कि ऐसी विसंगतियों पर जमीनी अमला कितनी तत्परता से कार्रवाई करता है? यदि किसी सरकारी जमीन पर व्यावसायिक गतिविधि चल रही है, किसी भूखंड का उपयोग बदल चुका है या देय प्रीमियम और भू-भाटक वर्षों से जमा नहीं हुआ, तो उसकी पहचान कर नियमानुसार वसूली करना प्रशासन की जिम्मेदारी है।
विडंबना यह है कि आम नागरिक को सहज नामांतरण, सीमांकन और रिकॉर्ड दुरुस्ती के लिए भी बार-बार कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। पटवारी से लेकर नायब तहसीलदार और तहसीलदार तक की जवाबदेही तय होती है पर उन्होंने आर सी एम एस पोर्टल को झांसा देने की तरकीबें खोज ली हैं। जनता को परेशान करने वाली व्यवस्था राजस्व बढ़ाने के मामले में सुस्त चल रही है इसलिए उसकी समीक्षा भी की जा रही है।
गरीबों की जमीन पर दबाव, धोखाधड़ी या अवैध कब्जे के जरिए प्रभावशाली लोगों के लाभ कमाने की शिकायतें भी गंभीर हैं। ऐसे मामलों में निष्पक्ष जांच, स्वामित्व अभिलेखों का सत्यापन और दोष सिद्ध होने पर कठोर कार्रवाई शुरु हो गई है। सत्ता में आने के पहले से भाजपा सरकार भूमि सुधारों की बात करती रही है। सेटेलाईट सर्वे के आधार पर वह जिला वार आडिट करा रही है। सरकारी जमीन, अवैध उपयोग, बकाया भू-भाटक, कम मूल्यांकन और लंबित नामांतरण का सार्वजनिक डैशबोर्ड बनाया जा रहा है। प्रत्येक तहसील के लिए वसूली लक्ष्य के साथ नागरिक सेवाओं की समय-सीमा भी तय की जा रही है।
राजस्व विभाग का उद्देश्य केवल जनता से वसूली करना नहीं, बल्कि सरकारी संपत्ति की रक्षा और नागरिकों को न्याय देना भी है। जब तक इन दोनों जिम्मेदारियों की जवाबदेही एक साथ तय नहीं होगी, तब तक राजस्व वृद्धि के लक्ष्य अधूरे और सुधार के दावे खोखले बने रहेंगे।









